कुवाँ के आंसू
कुवाँ के घिर्री म,
अब बाल्टी नइ झूले|
पार मा ऑवर-भॉवर,
भँसकटिया नइ फूले |
टेंड़ा पाटी टूट के सरगे हे|
कोला-बारी परिया परगे हे |
तरी ले ऊप्पर तक,
मेकरा के जाला बनगे हे|
गोड़ेला,पुचपुची,सल्हई के,
चारो मुड़ा झाला बनगे हे|
जागे हे बोईर-बंम्भरी,
कुवाँ के पार म |
खोजे म बिरले मिलथे,
कुवाँ खेत-खार म |
मनखे ल नल अउ बोरिंग मिलगे|
कुवाँ ल भीतरे-भीतर पाताल लिलगे|
कनकी कोदई धोवत नइ दिखे दादी नानी|
अब लगर नहाये नही कोनो राजा रानी |
नवा जमाना ह करे हे,
ओखर हिरदे के चानी|
कुवाँ के ऑसू ए,
थोर बहुत भराय पानी|
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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