Thursday, 7 May 2026

मोर गॉव अब शहर बनगे.....

 ....मोर गॉव अब शहर बनगे.....

शहरिया शोर म दबगे,सिसन्हिन के ताना|

लहलहावत खेतखार म बनगे,बड़े-बड़े कारखाना|

नदिया नहर जबर होगे ,डाहर बनगे बड़ चंवड़ा|

पड़की परेवा फुरफुंदी नंदात हे,नंदात हे तितली भंवरा|

सड़क तीर के बर पीपर कटगे, कटगे अमली आमा|

सियान के किस्सा नई भॉय,सब देखे टीभी डरामा|

पाहट के आहट,अउ संझा के शॉति आज कहर बनगे...|

मैय हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज  शहर बनगे.........|


संगमरमर के मंदिर ह,देवत हवे नेवता|

कहॉ पाबे गली म,अब बंदन चुपरे देवता?

तरिया ढोड़गा सुन्ना होगे,घर म होगे पखाना सावर|

बोंदवा होगे बिन रूख राई के,डंगडंग ले गड़गे टावर|

मया के बोली करकस होगे,लईका होगे हुशियार|

अत्तिक पढ़ लिख डारे हे,दाई ददा ल देथे बिसार|

बिहनिया के ताजा हवा घलो,अब जहर बनगे....|

मै हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज शहर बनगे...|


मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारा संग, सबला बॉट डरिस|

जंगल अउ रीता भुंइया ल,चुकता चॉट डरिस|

छत के घर म, कसके तमासा|

नई करेय कोई कखरो ले आसा|

होरी देवारी तीजा पोरा,घर के डेहरी म सिमटागे|

चाहे कोनो परब तिहार होय,सब एक बरोबर लागे|

नक्सा खसरा संग आदमी बदलगे होगे ताना बाना|

चाकू छुरी बंदूक निकलगे  सजगे  मयखाना |

चपेटागे बखरी बियारा,पैडगरी अब फोरलेन डहर बनके....|

मै हॉसव कि रोववौ मोर गॉव आज  शहर बनगे......|

                                    जीतेन्द्र कुमार वर्मा

                                   खैरझिटी (राजनॉदगॉव)

कलम रोंये हे

कलम रोंये हे

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सब बर रोटी पोये हे,

तभो बिन खाय सोये हे......|

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे..............||


हे खई-खजाना ओली म,

मीठ मंदरस हे बोली म||

सिधोत बारी-बखरी;खेत-खार,

दिन गुजरगे रंधनी खोली म||

जब ले धरे जनम,

तब ले करे जतन||

घर-बन;लइका; गोंसैंया के,

बेटी;महतारी;सुवारी बन|

मुंदरहा पहिली जागे हे ,

रतिहा आखिर म सोये हे.....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे...........||


कोख के पीरा कोन मेर बॉचे|

रोवत  लइका  कोरा म  हॉसे|

सोना  चॉदी  हीरा  बनाइस,

रहिके  जिनगी  भर  कॉचे|

बनके दरपन घर के,

सजाये घर-परिवार ल|

कोन बोह पाही ये भुंइयाँ म,

महतारी  के  भार  ल|

फरे साग-भाजी;महके फूल-फूलवारी,

बाढ़े रूख-राई ;महतारी जे बोये हे....|

जे बेर लिखे हे, गोठ महतारी के,

ते  बेर  कलम  रोये हे....................|


बारे हे दिया तुलसी चंवरा म,

लिपे-पोते हे अँगना दुवारी||

मुचमुच हॉसे कुंदरा ह घलो,

जेन   घर   हे      महतारी||

महतारी अवतार दुरगा काली के|

देखाइस दुख म  घलो जी के|

हॉसिस ऑखी के ऑसू ल पी के|

फेर कोनो नइ देखिस घाव ल छी के|

खुदे मइलाके ;गंगा कस,

जग के  पाप ल धोये हे....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते   बेर   कलम   रोये  हे......||

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                 📝  जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को( कोरबा )

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मोर महतारी मोर अभिमान

हम नही

 हम नही


रिस्तें बिगड़ने का, किसी को कोई गम नही।

आज सबको सिर्फ पैसा चाहिये, हमदम नही।।


खंजर से खुदे जख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

जुबां से बढ़कर जमाने में, बारूद बम नही।।


खुद को राजा समझ रहें हैं, रील वालें।

रीयल में उनमें, जरा सा भी दम नही।।


एकता अखंडता भाई चारा, दिखावा है।

जहर जाति धर्म का, हो रहा है कम नही।


पता नही, ये पैमाना है या मौका परस्ती,

देश संविधान से चलेगा, पर हम नही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

खन खन खन खन खन खन।।

 खन खन खन खन खन खन।।


उगती ला खन।

बुड़ती ला खन।

भंडार ला खन।

रक्सेल ला खन।

निकाल कोयला लोहा हीरा।

झन देख कखरो दुःख पीरा।।

भाड़ मा जाय खेत खार घर बन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

जिहां बइला के घुंघरू बाजे।

खन खन खन खन,

तिहां होवत हावय आजे।।

एक के उजड़त हे सुख सपना,

एक के बाढ़त हे धन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

महतारी के छाती ला खन।

फोड़ पवर्त पठार,

मार बम बारूद हथौड़ा घन।।

खन खन खन खन एकेदरी खन।

झन बचा कुछु एकोकन कन।।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

एक के बाजत हे खीसा।

एक मर जावत हे,

दुख पीरा मा पीसा।।

आजे दुःख खड़े हे ठाढ़,

कोन जन काली का होही?

गुदा खाय आने मन,

छत्तीसगढिया चगले गोही।

सबले बढ़िया हे छत्तीसगढिया मन।

लुल्हाड़त हें नेता वैपारी अउ शासन।।

खन खन खन खन खन खन।।


सहेज सहेज के राखिन सियान मन।

तब कहीं जाके फुदरत हें आन मन।।

पुरखा घलो अपन पाहरो मा सब ला सिरा देतिन।

ता आज ये नवा पीढ़ी घलो जनम नइ लेतिन।।

जतन के रखिन खेत खार ताल नदी बन।

तब जाके जियत साँस लेवत हन।।

खन खन खन खन खन खन।।


हवा मा झन उड़ा माटी मा सन।

मनखें अस ता रक्सा झन बन।।

खन खन खन खन जरूरत के पूर्ति।

सुवारथ तज, बन मानवता के मूर्ति।।

धरती के सुघराई ए, नदी पहाड़ बन।

खन खन खन खन खन खन।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा(छग)

कोन हे

 कोन हे


बात बात मा चिड़थस, बता बात कोन हे।

तोर पेट पिटारा उन्ना हे, ता खात कोन हे।


नसा नाश ए कहे, भट्ठी के ठेका दार मन,

ता मनखें मन ला दारू, पियात कोन हे।।


जय जवान जय किसान के, नारा रटथस,

फेर आपस मा दुनो ला, लड़ात कोन हे।।


जल जंगल जमीन के, करथस रोज बात,

ता लोहा हीरा कोइला ला, चोरात कोन हे।।


गारी गल्ला देय मा, हो जावत हे फांसी।,

मार काट के गली मा, मेछरात कोन हे।।


कोट कछेरी नाम सुनके, थरथर काँपे कोई,

ता कोट कानून के धज्जी, उड़ात कोन हे।।


जीयत मनखें, गड़ जावत हें कबर भीतरी,

ता जुन्ना बात ला घेरी बेरी, सुनात कोन हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)

 मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)


छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।

सात करोड़ी धान डकारे, खबर आय हे अइसे।।


चांटी खाही अब पर्वत ला, दिंयार लोहा सोना।

निगल जही अजगर धरती ला, नइ बाँचे कुछु कोना।।

दूध दही गुड़ माखन मिश्री, कहही पथरा खइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जंगल ला छेरी हा चरके, लगथे बिरान करही।

नवा सड़किया उजड़ जही अब, रेंगय बछिया मरही।।

सागर के पानी पी जाही, बूड़े बुढ़वा भइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


रखवारे के नीयत नइहे, देन कोन ला बद्दी।

कोन जनी कल का हो जाही, गोल्लर तिर हे गद्दी।।

ये कलजुग अउ राजपाठ के, होही विनाश कइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द

 मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द


बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।

खाय धान ला हवै पचावत, नाचत गावत सुर में।।


मुड़ धर बइठे हे लंबोदर, बिलई देखत भागे।

धाने भर मा पेट भरे नइ, खाथें कुकरी सागे।।

सजा बदी नइ लागे वोला, चपकाये नइ खुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


घूम घूम के चारो कोती, खोजत रहिथें दौलत।

कुछ बिगाड़ नइ पाये ओखर, नीर घलो हा खौलत।।

सेना भारी डेना भारी, उमियायें मदचुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


धरा गगन पाताल घलो ला, भाजी पाला जाने।

सात पुस्त बर माल सकेले, बेच धरम ईमाने।।

बेरा रहिते दे बर पड़ही, मिला दवाई गुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजब दिन भइगे

 गजब दिन भइगे


गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।

गुरुजी के गुर्रई अउ, सुँटी बेत देखे।।


दाई के दरघोटनी, सील लोड़हा के चटनी।

नजरे नजर झूलथे, पठउँहा के पटनी।।

बबा के ढेरा, अउ बारी के केरा।

कोठी काठा मरकी, गँजाये पेरा।।

कोदईधोना झेंझरी, नियम नेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


कोठा के झँउहा, खरहेरा गरू गाय।

पपीता मुनगा पेड़, सपना मा आय।।

गोबर के छर्रा छीटा, चूल्हा के आगी।

खुमरी मैनकप्पड़, साफा पागा पागी।।

तरिया के लद्दी, अउ नदी नरवा के रेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


घठोंदा के पचरी अउ, पथरा बुलाथे।

सल्हई पँड़की बोली, गजब मन भाथे।।

जुन्ना बर पीपर अउ, छींद बोइर जाम।

हरर हरर बूता अउ, मरत ले काम।।

नाक बोहई लइका के, सियानी चेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मुक्तक-होली

 मुक्तक-होली


एक हाथ में माला, एक हाथ में भाला है।

ज़्यादातर मदहोशी का कारण हाला है।

आख़िर होली उसको क्या रंग लगाए,

जिनका तन और मन बिल्कुल काला है।।


हाथ में बम-गोली है कहकर लूट लिया,

खाली मेरी झोली है कहकर लूट लिया।

लुटेरों की न सूरत और न सीरत होती है,

"बुरा न मानो, होली है" कहकर लूट लिया।।

`

अक्षत, चंदन, रोली है,

मधुर-रस घुली बोली है।

झूमो, नाचो, गाओ यारो—

झूमकर आई होली है।।


रंग जाए ऐसा अंग नहीं है।।

मन भाए ऐसा भंग नहीं है।

मैं बदला हूँ या बदल गई होली—

रंग में भी अब वो रंग नहीं है,



गाँव, थाना, कस्बा, ज़िला—सब बाँट लिए हैं,

पर्व, त्योहार, नृत्य-लीला—सब बाँट लिए हैं।

होली रंगे तो भला किसको किस रंग में रंगे?

हरा, नीला, लाल, पीला—सब बाँट लिए हैं।।



लाया हूँ तुम्हारे लिए ये सुर्ख लाल रंग,

आँखों से उतारो चश्मा—तो रंग दूँ मैं।।


सभी तो कल है, आज कौन है।

नजर में सब है, राज कौन है।।

सब तो हाक रहे है, विद्वता अपनी

तो बताओ मूर्खाधिराज कौन है।।


खैरझिटिया

आन भरोसा-सार छंद

 आन भरोसा-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी अउ टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

नरी सुखावत हवय प्यास मा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Wednesday, 6 May 2026

मुक्तक

 एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद


पइसा बिन एटीएम हा, खड़े रथे मुँह फार।

हमर होय बैलेंस कम, दंड लेय सरकार।।

दंड लेय सरकार, आम खाता धारी ले।

बोचक जाये बैंक, झाड़ पल्ला पारी ले।।

सुने भला अब कोन, करिन का काये कइसा।

ठँउका रहिथे काम, मिले नइ खोजे पइसा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुण्डलियां-नेता घर नेता


नेता के बेटी बहू, बाई भाई पूत।

नित नेता बनते रही , भागे नइ ये भूत।।

भागे नइ ये भूत, हरे कुर्सी इँखरे बर।

होवत रहिथे खेल, इहिच मन ला नित दे बर।

गला फाड़ चिल्लाय, उहू ये पद के क्रेता।

आम चुहकहीं आम, रही नेता घर नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



फेक अकड़ गुमान- कुंडलियाँ

धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा हरेक किरदार।।

निभा हरेक किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



तीन सवारी-कुंडलियाँ


तीन सवारी देख के, काटे पुलिस चलान।

भरे खचाखच रेल हे, निकल जथे जी जान।।

निकल जथे जी जान, व्यवस्था कोन सुधारे।

लेये बर लउहाय, देय बर पल्ला झारे।

आम खास मा भेद, होय सब कोती भारी।

रोड दिखे ना भीड़, दिखे बस तीन सवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


कुर्सी-कुंडलियाँ

जनता के पीये लहू, नेता मन बन शेर।

जॉब घटय कुर्सी बढ़य, कइसन आगे बेर।।

कइसन आगे बेर, मचे कुर्सी के झगड़ा।।

कइसे होय विकास, करें घोटाला तगड़ा।।

सब ला जोर सुनाँय, कहानी संता बंता।।

इती उती के बात, सुने हँस हँस के जनता।


खैरझिटिया



अइसन काबर-कुंडलियाँ


डॉक्टर झोला छाप कहि, शासन वसुलै दंड।

नेता झोला छाप हे, मिलजुल खावँय फंड।।

मिलजुल खावँय फंड, उठावै अँगरी कौने।

नियम तोड़थें रोज, नियम नित हाँके तौने।

मनके करथें काम, सबे ला खीसा मा धर।

गरजे अँगठा छाप, डरे भल मास्टर डॉक्टर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रोय रसोई


रोय रसोई गैस बिन, गाड़ी हा बिन तेल।

चीज सबे महँगात हे, होय युद्ध जस खेल।।

होय युद्ध जस खेल, बजत हे दुख के बाजा।

बनके तिगड़म बाज, जुलुम ढावत हें राजा।।

कर नइ सके विकास, तेल टावर बिन कोई। 

रहे सदा सुख चैन, कभू झन रोय रसोई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




कोल्ड ड्रिंक्स के राज मा, नींबू सरबत फेल।

कब का हा महँगा जही, आय समझ नइ खेल।

हावी हावय उधोगी।

आम जन भुक्तभोगी।


नेता


नेता मन रैली करे, सड़क चौक ला घेर।

जाम लगे चारो डहर, खड़े पुलिस मुँह फेर।।

खड़े पुलिस मुँह फेर, देख के फुदरे नेता।।

पाके मनखें आम, नियम कहि हुदरे नेता।

शासन ला रख जेब, घुमे बन विश्व विजेता।

जनता जाए भाड़, करे मनमानी नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


फूफा


रिस्ता मा बिखराव आम होगे।

जुड़ छइयां देख आज घाम होगे।

भीतरे भीतर तिगड़म फूफू करे,

इती फूफा बिचारा बदनाम होंगे।

खैरझिटिया



किरायेदार-कुंडलियाँ


गरू लगे दाई ददा, हरू किरायेदार।

होन देन नइ कुछु कमी, खूब करे सत्कार।।

खूब करे सत्कार, लागमानी हो जइसे।

पइसा खातिर आज, मनुष रँग बदले कइसे।।

सबझन के इहि  हाल, कहे मा करू लगे।

कइसन दिन हे आय, ददा दाई गरू लगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पद पइसा- कुंडलियाँ

पद पइसा के चाह मा, बाँचे कहाँ ईमान।

झन जा बोली बात मा, बिक जाथे इंसान।।

बिक जाथे इंसान, अपन पहिचान भुलाके।

हो जाथे खामोश, मूड़ मा ताज सजाके।।

माया आघू मान, मनुष के होवव रदखद।

अवसर देख जुगाड़, करें पाए बर सब पद।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


नत्ता रिस्ता आज बाजारू होगे।

नँदात नरियर गंगा बारू होगे।

गय सुदामा किशन के जमाना,

अब दोस्ती मतलब दारू होगे।।

खैरझिटिया


सोचो यदि मच्छर साठ साल जीते,  

न जाने किसका कितना खून पीते।  

इसीलिए जल्दी मौत मिली है उसे,  

पर आदमी क्यों बन बैठा है चीते।  

खैरझिटिया


छप्पर-छानी कब छत हो गई, पता नहीं चला।  

मेरे खिलाफ़ कब जनमत हो गई, पता नहीं चला।  

कभी यहाँ, कभी वहाँ—रोज़ मंज़िल ढूँढते रहे,  

कब राह से मोहब्बत हो गई, पता नहीं चला।  

खैरझिटिया

रार मचे हे खाड़ी मा

 रार मचे हे खाड़ी मा


भात चुरे नइ काड़ी मा।

सोवा परगे हाँड़ी मा।

गैस सिरागे जेब चिरागे,

रार मचे हे खाड़ी मा।।


साग उगे नइ बाड़ी मा।

खेत पटागे झाड़ी मा।।

आफत हा अब अवसर बनगे,

लहू सुखागे नाड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


हें मजदूर दिहाड़ी मा।

फोकस हवैं खिलाड़ी मा।।

भला भरोसा काय करीं अब।

गुजराती मरवाड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


दरद उठत हे माड़ी मा।

तेल सिरागे गाड़ी मा।।

पिसागेन पर के झगरा मा,

बइठे बइठे भाँड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


कतकों बिकगे साड़ी मा।

कतकों  दारू ताड़ी मा।

नेता ला बस कुर्सी चाही,

सोज बाय अउ आड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 1 May 2026

कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद

 कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद


मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।

गँवा जथे कतको जिनगी हा, मजा करे के चक्कर मा।।


बीहड़ डोंगर पर्वत घाटी, बन बरफ समुंदर पानी।

ये सब सँग खेले के सेती, उजड़े कतको जिनगानी।।

खेलव झन पानी पुरवा ले, हवा गरेरा झक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


अपन दायरा जतका हावै, ततके नित पाँव लमावव।

कुदरत के कानून कड़ा हे, जादा झने मेछरावव।।

पानी मिल पानी कर देथे, नून होय या शक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


मनखें मन सँग हाँसव खेलव, गढ़व कढ़व कुदरत ला।

सोचें समझे के ताकत हे, छोडव मद जिद अउ लत ला।।

काम करव झन बनके अड़हा, पड़के लउहा लक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



Sunday, 26 April 2026

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे

 तभो नेता मन के कद बाढ़े हे


पानी बिजली के हाल बेहाल हे।

डहर बाट मा खुदे नरवा ताल हे।।

नियम धियम गुंडा मन बनात हें,

न ढंग के स्कूल न अस्पताल हे।

विकास घोषणा पत्र मा माढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


कपड़ा ओनहा बस सादा हे।

मन भीतर भराय खादा हे।।

पैसा पहुँच के बस पर लगाथे,

एको ठन पुरोये नइ वादा हे।।

जनता बर शनि साते साढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


फूल माला के दीवाना ये मन।

जाने बस नित खाना ये मन।।

अपन जेब मा धरके रखें सदा,

कोर्ट कछेरी अउ थाना ये मन।

तभो जयकार करइया ठाढ़े हे।

तभे नेता मन के कद बाढ़े हे।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


रावन रावन हे तिंहा, राम कहाँ ले आय।

रावन ला रावन हने, रावन खुशी मनाय।

रावन खुशी मनाय, भुलाके अपने गत ला।

अंहकार के दास, बने हे तज तप सत ला।

धनबल गुण ना ज्ञान, तभो लागे देखावन।

नइहे कहुँती राम, दिखे बस रावन रावन।।


रावन के पुतला कहे, काम रतन नइ आय।

अहंकार ला छोड़ दव, झन लेवव कुछु हाय।

झन लेवव कुछु हाय, बाय हो जाही जिनगी।

छुटही जोरे चीज, धार बोहाही जिनगी।

मद माया अउ मोह, खोज के खुदे जलावन।

नइ ते जलहू रोज, मोर कस बनके रावन।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


विजय दशमी की आप सबको ढेरों बधाइयाँ





गीत-तैं मोला भुला के जी पाबे का बता।

 गीत-तैं मोला भुला के जी पाबे का बता।



तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।

मैं तो तड़पते हौं, तैं खुद ला झन सता।।


मोर दिल के धड़कन, नाम लेथे तोर वो।

तोर दिल के धड़कन, नाम लेथे मोर वो।

तोर मोर जिनगी के, एक्के हे पता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।।


कइसे पहाबे जिनगी, तोर उमर हे सोला।

कोन बात ला धरे हस, नइहे सुरता मोला।

जिनगी मा होते रइथे, छोट मोट खता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।।


चुरत रबे रिस मा कब तक, भूत ला भूल जा।

छुटे नही जिनगी भर, मया रंग मा घूल जा।।

ये तन पुजारन ए, दिल आये देवता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


गीत-झन छोड़ मया ला।


झन छोड़ मया ला।

झन छोड़ मया ला।।

हाय मोर मया ला।

हाय मोर मया ला।।

जान के तैंहा खेल खिलौना,

झन तोड़ मया ला—----------


मया हे ता,  सांस चलत हे।

मया मा मन पंछी पलत हे।।

बिन मया के तन न मन हे,

राखे रहिबे जोड़ मया ला—------


देखेंव सपना मया ला पा के।

सरी दुनिया ले दुरिहा जाके।।

बीच मझधार मा तैंहा सजनी,

झन बोर मया ला—-----------


लड़की

जरत हवों मैं अलथी कलथी।

होगे मोर ले भारी गलती।।

अंतस मा बसाके रखहूँ,

मैं तोर मया ला—----------


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)







गरमी मा ताल नदी स्नान-सार छंद

 गरमी मा ताल नदी स्नान-सार छंद


देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।

चटचट जरथे चारो कोती, जुड़ जल जिया लुभाथे।।


पार पाय नइ नल अउ बोरिंग, नदिया अउ तरिया के।

भेदभाव नइ करे ताल नद, गुरिया अउ करिया के।

कल कल करथे धार नदी के, लहर ताल के गाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।।


कोनो कूदे कानों तँउरे, कोनो डुबकी मारे।

तन के कतको रोग रई हा, डुबकत तँउरत हारे।

बुड़े बुड़े पानी के भीतर, कतको बेर पहाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


लहरा होथे गहरा होथे, डर तक रहिथे भारी।

नइ जाने तँउरें बर तउने, मारे झन हुशियारी॥ 

जीव जंतु तक के ये डेरा, काम सबे के आथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गर्मी छुट्टी(रोला छंद)

 """"""""गर्मी छुट्टी(रोला छंद)


बन्द हवे इस्कूल,जुरे सब लइका मन जी।

बाढ़य कतको घाम,तभो घूमै बनबन जी।

मजा उड़ावै घूम,खार बखरी अउ बारी।

खेले  खाये खूब,पटे  सबके  बड़ तारी।


किंजरे धरके खाँध,सबो साथी अउ संगी।

लगे जेठ  बइसाख,मजा  लेवय  सतरंगी।

पासा  कभू  ढुलाय,कभू  राजा अउ रानी।

मिलके खेले खेल,कहे मधुरस कस बानी।


लउठी  पथरा  फेक,गिरावै  अमली मिलके।

अमरे आमा जाम,अँकोसी मा कमचिल के।

धरके डॅगनी हाथ,चढ़े सब बिरवा मा जी।

कोसा लासा हेर ,खाय  रँग रँग के खाजी।


घूमय खारे  खार,नहावय  नँदिया  नरवा।

तँउरे ताल मतंग,जरे जब जब जी तरवा।

आमाअमली तोड़,खाय जी नून मिलाके।

लाटा खूब बनाय,कुचर अमली ला पाके।


खेले खाय मतंग,भोंभरा  मा गरमी के।

तेंदू कोवा चार,लिमउवा फर दरमी के।

खाय कलिंदर लाल,खाय बड़ ककड़ी खीरा।

तोड़  खाय  खरबूज,भगाये   तन   के  पीरा।


पेड़ तरी मा लोर,करे सब हँसी ठिठोली।

धरे  फर  ला  जेब,भरे बोरा अउ झोली।

अमली आमा देख,होय खुश घर मा सबझन।

कहे  करे बड़ घाम,खार  मा  जाहू  अबझन।


दाइ ददा समझाय,तभो कोनो नइ माने।

किंजरे  घामे घामे,खेल  भाये  ना आने।

धरे गोंदली जेब,जेठ ला बिजरावय जी।

बर पीपर के छाँव,गाँव गर्मी भावय जी।


झट बुलके दिन रात,पता कोई ना पावै।

गर्मी छुट्टी आय,सबो  मिल मजा उड़ावै।

बाढ़े मया पिरीत,खाय अउ खेले मा जी।

तन मन होवै पोठ,घाम  ला झेले मा जी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

Saturday, 25 April 2026

खूनी खेल जारी हे,, काबर लालेच म खेलथस???

 खूनी खेल जारी हे,,


काबर लालेच म खेलथस???


अऊ तो रंग बहुत हे,

काबर लालेच म काबर खेलथस?

हॉसत खेलत जिनगी म,

काबर बारूद मेलथस?


पीके पानी फरी,

जुडा़ अपन नरी,

फेर काबर लहू पियत हस?

मनखे अस ता, मन म समा,

रक्सा कस का जियत हस?


हरिंयर रंग हरागे हे,

ललहूं होगे हे माटी।

थोरकन तो दया धरम देखा,

का पथरा के हे तोर छाती?

भरके बंदूक म  गोली,

निरदई कस ठेलथस......

अऊ तो रंग ............

.............खेलथस  ???


बंदूक गईंज चलायेस,

अब भाईचारा भँजा के देख !

मारे हस जेखर गोंसईंया,बेटा ल,

ओखरो घर जाके देख,!.

मनखे होके मनखे ल ,                                                                                                                                                                     खावत हस नोंच नोंच !

फिलगे हे अचरा आंसू म,

अब ताे दाई के आंसू पोंछ !

छेदा छेदा के बम बारूद म,

दाई के छाती चानी हाेगे हे !

तरिया ढोंड़गा नरवा के पानी,

ललहुं  बानी होगे हे  !

कोन देखाथे ऑखी तोला,

बता!! का बात ल पेलथस?

अऊ तो रंग................

.....................खेलथस ??


अलहन ऊपर अलहन होत हे।

जंगल तीर के गांव रोज रोत हे।

कल्हरत हे कुंदरा,

 आँसू ढारत हे महतारी।

कब जिवरा ले डर भागही,

 कब टरही गोला बारी।।

खून खराबा बने नोहे,

आखिर दरद तो तहूँ झेलथस।

अऊ तो रंग.....................

..........................खेलथस?


जंगल के जीव जीवलेवा हे,

फेर तोर जइसे नही,!

कहां लुकाबे बनवासी बन,

जब श्री राम आ जही!

छीत मया के रंग,

अऊ खेल रंग गुलाल ले,!

नाच पारा -पारा बाजे नंगाडा़!

निकल जंगल के जाल ले!

खेल खेल म का खेले तैं,

मनखे के जीव लेलेय तैं,

अति के अंत हब ले होही,

बात मोर मान ले!

लड़ना हे त देश बर लड़,

छाती फूलाके शान ले!

फूल-फूलवारी मितान बना,

आखिर काखर बात ल एल्हथस??

अऊ तो रंग.....................

.............................खेलथस????


जीतेन्र्द वर्मा

खैरझिटी(राजनांदगांव)

संगे संग मया

 संगे संग मया


अब कइसे रचही, मधूबन म रास रे ? 

मोर तीर हे बंसरी, अऊ तोर तीर हे साँस रे ।


कलेचुप खड़े हे, कदम के रूखवा ।

 तंय पूर्वाइयाँ, अऊ मंय हर पात ||


कइसे ममहाही,  मोंगरा मया के ?

 मंय हर पतझड़, अऊ तंय मधूमास रे ।।


चलत हे बरोड़ा, उड़ावत हे धूर्रा ।

 तंय हर बिरौनी, मंय हर आँख रे ।।


मइलहा मन, मनभात नइहे मनखे के ।

 मया के तरिया म, मन ल काँच रे ।।


फेंक के देख मया के गरी, छत्तीसगढ़ भर । 

अइसने अरझ जही, फेर छल ले झन फाँस रे ।।


न रो, न रोवा, खा तेंदू -चार - कोवा ।

टपका मुंहुँ ले मंदरस, अऊ मन भर हाँस रे ।।


थोरकिन ते खा, थोरकिन भूखाय ल खवा ।

 कर सिंगार महतारी के, नंवाके माथ रे ।।


ओनहा- कोनहाल, करदे अंजोर । 

मया के माटी ले, उँच-नीच ल पाट रे ।।


का हे भरोसा, जिनगी के सिरतोन म ? 

मया - पिरीत ल, झंऊहा- झंऊहा बाँट रे ।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को कोरबा (छग)

Monday, 20 April 2026

डीजे

 डीजे


जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।

लगे देख अलकरहा, मनखें कुकुर माकर होगे।।


कानफोड़वा साउंड, हिरदे दरकत बेस।

कला दिखे बला मा, आगी लगे हे टेस।।

हो हल्ला हरहा होगे, सुर संगीत बर साँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


ना कोनो  हा सुनत हें, ना कोनो गुनत हें।

लोक लाज के पट ला, सबझन चुनत हें।।

पके बस ख्याली खिचड़ी, मया मीत डाँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


छट्ठी बरही बर बिहाव, रमाएन गीता भगवद।

सबो मा हबरगे डीजे, होगे खदबद गदबद।।

कला कल्हरे कोंटा मा, बला घर नौकर चाकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

नाली

 नाली


जब ले घर के आघू मा, नाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बड़े बड़े मच्छर बड़, भभन भनन करथे।

जिवरा करला जाथे, नींद कहाँ परथे।।

का संझा का बिहना, चुँहकय लहू ला।

जर बुखार धरेच रथे, घर मा कहूँ ला।।

बइद डाक्टर हर घर के, माली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बारो महीना भरे रथे, नहवई धोवई मा।

नाक पिरा जाथे, नाली के बस्सई मा।।

दौना के दम घुटगे, तुलसी तिरियागे।

गमके नइ गोंदा, भौरा तितली भागे।।

ना ठउर थाली, ना दसमत के डाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


शहर के देखा सीखी, गाँव बउरागे।

सुविधा हा दुविधा, बनके तनियागे।।

नल बोरिंग सुख्खा हे, नाली भराये।

धरती के छाती मा, कांक्रीट हे छाये।।

ना आज बने हावय, ना काली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

तेंदू- दोहा- चोपाई छंद

 तेंदू- दोहा- चोपाई छंद


लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।

काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।


तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।

छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।


तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।

टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।


बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।

औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।


तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।

तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।


लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।

अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाथे घलो केंवची जर हा।।


आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।

हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।


तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।

फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।


जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।

भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

विश्व हिरदय दिवस म हिरदय- सार छंद

 विश्व हिरदय दिवस म


हिरदय- सार छंद


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम जग नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम सब चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

घाट न घर के-रोला छंद

 घाट न घर के-रोला छंद


छोटे मोटे काम, गिनावय कर बड़ हल्ला।

श्रेय लेत अघुवाय, श्राप सुन भागय पल्ला।।

खुद के खामी तोप, उघारय गलती पर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


सोंचे समझे छोड़, करे मनमानी रोजे।

पर के ठिहा उजाड़, अटारी खुद बर खोजे।।

झटक आन के अन्न, खाय नित उसर पुसर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


दाई ददा ल छोड़, नता के किस्सा खोले।

मीठ मीठ बस बोल, जहर सब कोती घोले।।

कभू होय नइ सीध, रहे अँइठाये जरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


रखे पेट मा दाँत, खोंचका पर बर कोड़े।

अवसर पाके पाँव, गलत पथ कोती मोड़े।

पहिर स्वेत परिधान, चले नित कालिख धरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


घर के भेद ल खोल, मान मरियादा बारे।

आफत जब आ जाय, रहे देखत मुँह फारे।।

बरसे अमरित धार, फुले तभ्भो नइ झरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


पापी बनके पाप, करे नित लेवय बद्दी।

जाने नही नियाव, तभो पोटारे गद्दी।।

दानवीर कहिलाय, आन के धन बल हरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


मरहम धरके हाथ, मले के करे दिखावा।

सुलगे बनके रोज, भीतरे भीतर लावा।।

रहे सदा मिटकाय, मया सत मीत ल चरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 18 April 2026

घाम घरी के फर- सार छंद

 घाम घरी के फर- सार छंद


किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।

रंग रूप अउ स्वाद देख सुन, लड्डू फूटय मन मा।।


पिकरी गंगाअमली आमा, कैत बेल फर डूमर।

जोत्था जोत्था छींद देख के, तन मन जाथें झूमर।।

झुलत कोकवानी अमली हा, डारे खलल लगन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


तेंदू तीरे अपने कोती, चार खार मा नाँचै।

कोसम कारी कुरुलू कोवा, कखरो ले नइ बाँचै।

डिहीं डोंगरी के ये फर मन, राज करै जन जन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


पके पपीता लीची निमुवा, लाल कलिंदर चानी।

खीरा ककड़ी खरबुज अंगुर, करथे पूर्ती पानी।।

जर बुखार लू ला दुरिहाके, ठंडक लाथे तन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Sunday, 5 April 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                छत्तीसगढ़ सबे प्रकार ले अग्रणी राज मा गिने जाथे, चाहे प्राकृतिक छटा होय, पर्वत पठार, जंगल खान खदान होय, कल कारखाना होय या फेर संस्कृति संस्कार।  छत्तीसगढ़ के संस्कृति सब ला अपन कोती खींच लेथे। संस्कृति संस्कार के बाना बोहे छत्तीसगढ़ के परब तिहार के घलो अलगे महत्ता हे। वइसने एक तिहार हे, आदिशक्ति दाई दुर्गा के उपासना के तिहार नवरात्रि।  नवरात्रि जेन बछर मा दू बेर आथे। एक कुँवार मा अउ एक चैत मा। कुँवार नवरात्रि अउ चैत नवरात्रि दूनों मा आदि शक्ति के उपासना,आराधना अउ पूजा पाठ जम्मो छत्तीसगढ़ के मनखें मन तन्मयता ले करथें। ये बेरा मा छत्तीसगढ़ के जम्मो गांव शहर, मंदिर देवाला अउ घरो-घर मा ज्योत जलाए जाथे। माता के भक्ति मा विधुन होके सेउक मन माता के आराधना करथें, सेवा अउ जस गीत गाथें। छत्तीसगढ़ मा कई कोरी देवी मंदिर हे, जिहाँ नवराति के पावन बेरा मा सुघ्घर भक्तन मन के मेला भराथे। डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी, रतनपुर के महामाई, कोरबा के कोशगाई, धमतरी के बिलई माता, चंद्रपुर के चन्द्रहादिनी, दुरुग के चंडी माई, सूरजपुर के कुदुरगढ़हिन माई, बंजारी दाई, भवानी माई, बूढ़ी माई आदि कस अउ कतको देवी मन पूरा छत्तीसगढ़ मा अपन आशीष अउ मया दुलार लुटावत हें। ता अइसन भक्क्तिमय बेरा मा कवि मन के कलम कइसे चुप रही सकथे? उंखरो कलम ले माता के भक्ति भाव, आखर रूपी गंगा बरोबर बहिथे। संगीतकार मन के महिनत अउ साज बाज के संग कवि के लेखनी ही गीत ला जनम देथे। नवराति के बेरा मा हजारों मनभावन गीत सुने बर मिलथे। ता आवन कवि मन के कविता मा देवी आराधना के दर्शन करथन।

              छत्तीसगढ़ के कोरा मा बिराजे दाई रणचंडी ला माथ नवावत लाला फूलचंद श्रीवास्तव जी लिखथें- 

*रणचंडी चढ़ आये खप्पर। नइ देखे अपन भेष।*

*जय जय जय जय कैसिल्या के जय देश।।*


                माटी पूत महान गायक अउ कवि लक्ष्मण मस्तूरिहा जी मन माता रानी के कतको अकन गीत कविता लिखें हें,अउ स्वर घलो दिए हें--

*हो मइया, तोर तीर आएंव तार लेबे।स्वर-कविता कृष्णमूर्ति*


*रतनपुर वाली महामाया मैया हे पुरवान।*

*शारद रूप सवांगे तोरे, जश गूँजें आसमान।*


              रतनपुर महामाई अउ डोगरगढ़हिन दाई बमलाई ला भाव पुष्प अर्पित करत कवियित्री आशा झा जी मन कहिथें-

*रतनपुर मा नरियर धर। बमलाई मा मूड़ नवा।*

*भोरमदेव मा बदना बदके। बिगड़े काम बना।।*


           हथबन्द के वरिष्ठ कवि चोवा राम 'बादल' जी मन माता रानी बर लिखथें--

*लाल चुनरिया लाल सँवागा, शेर सवारी तोर।*

*रावाँभाँठा के बंजारी, निकले धरती फोर।।*

*डोंगरगढ़ मा बमलाई के, लगे रथे दरबार।*

*शरण परे गोहारत हाववँ, सुन ले मातु पुकार।।*


           गाँव गाँव मा माँ शीतला अउ बंजारी दाई के बसेरा होथे, उन ला माथ नवावत, सुमधुर गीतकार छंदकार बलराम चन्द्राकर जी चौपाई के माध्यम ले कहिथें-

*नमन शीतला माँ कल्याणी।बंजारी माँ शक्ति भवानी।*


          कवि नन्दकुमार नन्दगँइहाँ दंतेश्वरी देवी ला सुमरत कहिथें-

*दंतेश्वरी दंतेवाड़ा तोर डेरा हे। जंगल भीतरी मा बसेरा हे।*

*संखनी डंकनी दू नदिया के। तोर तीर मा घेरा हे।।*


           माता रानी के हजारों सेवा गीत लिखइया, हर्ष कुमार बिंदु के कलम के एक भाव, दंतेश्वरी दाई बर-

*दंतेश्वरी तोर हवय महिमाके शोर।चारो दिशा मा मइया मोर।*


             कवि मोहन लाल वर्मा जी मन नवरात मा माता रानी के मनभावन दरबार के वर्णन करत कथें--

*आगे हे नवरात, बरत हे दियना बाती।*

*जगमग-जगमग जोत, करय उजियारी राती।*

*माता के दरबार, भगत मन आथें जाथें।*

*करके पूजा-पाठ, शक्ति ला माथ नवाथें।।*


          जस सम्राट दुकालू यादव के गीत बिना माता रानी के कोरा सुन्ना लगथे, उंखर गाये हजारों जस सेवा गीत, गांव गली मा नवरात्रि के बेरा सहज सुनाथे, वइसने एक गीत हे, गीतकार एम के कुर्रे के लिखे--

*मूड़ मा बिराजे हवै महामाई ना। मोहनी बरन लागे।*


           युवा कवि अउ गीतकार अनिल सलाम जी कहिथें-

*चंडी दाई के आएंव दुवार। आज मोर भाग जागे।*


             छंदकार ज्ञानू दास मानिकपुरी जी मन चंद्रसेनी दाई ला श्रद्धा सुमन अर्पित करत अपन कविता मा कहिथें

*चंद्रपुर तोर गाँव हे। चंद्रसेनी तोर नाँव हे।*


             पारितोष धीरेंद्र जी मन माता रानी बर लिखथें-

*दाई रतनपुर महामाई बरोबर। डोंगरगढ़ बमलाई आय।*

*कोरबा के सरमंगला दाई। छुरी के कोसगाई आय।*


            छत्तीसगढ़ जे देवी मन ला सुमरत श्रेमासिंह ठाकुर जी मन लिखथें--

*डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी ला सुमरंव,रायपुर के दुग्धा-धारी।*

*जय छत्तीसगढ़ सिरपुर चण्डी,राजिम लोचन खल्लारी।*

*बागबाहरा के चण्डी डोंगरी, कुंवर अछरिया बमलाई।*


             हमर छत्तीसगढ़ के सबे जिला मा कतकोन नामी देवी मन बिराजमान हें, अपन कविता मा सबे देवी मन ला सुमरत आचार्य तोषणकुमार चुनेंद्र जी मन लिखथें---

*सरगुजा म सरगुजहीन दाई दन्तेवाडा दन्तेश्वरी।*

*बालोद के मोर गंगा मंइया मल्हार म डिडिनेश्वरी।*

*अड़भार म अष्टभुजी मंइया मड़वा के मडवारानी।*

*कोरबा में सरमंगला दाई जशपुर काली भवानी।*


          छंदकार बोधनराम निषादराज विनायक जी मन लिखथें-

*आशीष बने, लेव  सबोझन, ये समलाई।*

*रिक्षिन   दाई, चंडी  दाई, अउ  महमाई।।*

*सर्वमंगला,   हे   बंजारी,    हे   बमलाई।*

*सत्ती   दाई,    गौरी - गौरा,  कोसागाई।।*


            छंद त्रिभंगी मा माता रानी ला मोरो भाव पुष्प अर्पित हे-

*नवरात लगे हे, आस जगे हे, माता रानी, आय हवै।*

*दर्शन पाये बर, जस गाये बर, सेउक सब जुरि-याय हवै।*

*सब करथें सेवा, पाथें मेवा, ढोलक माँदर, झाँझ बजे।*

*हे जोत जँवारा, तोरण तारा, रिगबिग रिगबिग, द्वार सजे।*

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


चैनल इंडिया में स्थान देने हेतु, स्वराज करुण जी को विशेष आभार, नमन

Saturday, 4 April 2026

गोपी छंद- बसंत ऋतु

 गोपी छंद- बसंत ऋतु

बसंती गीत पवन गाये।
बाग घर बन बड़ मन भाये।
कोयली आमा मा कुँहके।
फूल के रस तितली चुँहके।

करे भिनभिन भौरा करिया।
कलेचुप हे नदिया तरिया।।
घाम अरझे  अमरइया मा।
भरे गाना पुरवइया मा।।

पपीहा शोर मचावत हे।
कोयली गीत सुनावत हे।
मगन मन मैना हा गावै।
परेवा पड़की मन भावै।।

फरे हे बोइर लटलट ले।
आम हे मउरे मटमट ले।
गिराये बर पीपर पाना।
फूल परसा मारे ताना।।

फुले धनिया सादा सादा।
टमाटर लाल दिखे जादा।
लाल भाजी पालक मेथी।
घुमा देवय सबके चेथी।

मसुर अरहर मुसमुस हाँसे।
बाग बन खेत जिया फाँसे।
चना गेहूँ अरसी सरसो।
याद आवै बरसो बरसो।

सरग कस लागत हे डोली।
कहे तीतुर गुरतुर बोली।
फूल लाली हे सेम्हर के।
बलावै बिरवा डूमर के।।

बबा सँग नाचत हे नाती।
खुशी के आये हे पाती।
नँगाड़ा झाँझ मँजीरा धर।
फाग ले जावै पीरा हर।।

सुनावै हो हल्ला भारी।
मगन मन झूमै नर नारी।
प्रकृति सज धज के हे ठाढ़े।
मया मनखे मा हे बाढ़े।।

मटक के रेंगें मुटियारी।
पार खोपा पाटी भारी।
नयन मा काजर ला आँजे।
मया ममता खरही गाँजे।।

राग फगुवा के रस घोरे।
चले सखि मन बँइहा जोरे।
दबाये बाखा मा गगरी।
नहाये खोरे बर सगरी।

पंच मन बइठे बर खाल्हे।
मगन गावै कर्मा साल्हे।
ढुलावय मिलजुल के पासा।
धरे अन्तस् मा सुख आसा।।

हदर के खावत हे टूरा।
चाँट अँगरी थारी पूरा।।
चुरे हे सेमी अउ गोभी।
पेट तन जावै बन लोभी।

टमाटर चटनी नइ बाँचे।
मटर गाजर मूली नाँचे।
पपीता पिंवरा पिंवरा हे।
ललावत सबके जिवरा हे।।

हाट हटरी मड़ई मेला।
जिंहा होवय पेलिक पेला।
ढेलुवा सरकस अउ खाजी।
मजा लेवय दादी आजी।।

जनावत नइहे जड़काला।
प्रकृति लागत हावै लाला।
खुशी सुख मन भर बाँटत हे।
मया के डोरी  आँटत हे।

सबे ऋतुवन के ये राजा।
बजावै आ सुख के बाजा।
खुशी हबरे चोरो कोती।
बरे  नित दया मया जोती।

खैरझिटिया

Sunday, 29 March 2026

टीबी रोग- दोहा छंद

 टीबी रोग- दोहा छंद


बड़का बड़का रोग के, हवै दवाई आज।

घबराये मा नइ बने, करवावव ईलाज।।1


टीबी के लक्षण दिखे, डॉक्टर ला देखाव।

बेरा मा खाके दवा, झट बढ़िया हो जाव।।2


साँस फुले बाढ़े दरद, बिकट पछीना आय।

वजन घटे तीपे बदन, टीबी रोग झपाय।।3


खाँसी आथे रोज के, लहू घलो दिख जाय।

अँकड़े जकड़े तन बदन, जी मचले घबराय।।4


खाँसे छीके अउ छुये, मा फइले ये रोग।

जेन सावधानी रखें, पाये सुख संजोग।।5


इम्यूनिटी शरीर के, होथे जब कमजोर।

टीबी के बैक्टीरिया, दै तन ला झकझोर।।6


जेन छुपाये तेन हा, खुद बर काल बुलाय।

लक्षण देखत करँय दवा, समझदार उहि आय।।7


होय फेफली फेफड़ा, धूम्रपान दव त्याग।

बीड़ी अउ सिगरेट ए, तन बर बिखहर नाग।।8


खाना खावव ताकती, हरा साग फल फूल।

रखव सफाई सब तिरन, इहि सेहत के मूल।।9


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


24 मार्च विश्व टीबी दिवस

Sunday, 22 March 2026

महतारी-लावणी छंद

 महतारी-लावणी छंद


मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।

मया लुटाथे बेसुध होके, अवतारी उपकारी ए।।


मया कतिक होथे माई के, तउल सके नइ कोनों हा।

कलम काय गुण बरनन सकही, नइ सकैं धरा नभ दोनों हा।।

महतारी देवी धरती के, सगरो जगत पुजारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


नइ पनपे ये जग मा जिनगी, मया बिना महतारी के 

जतन लोग लइका के करथे, तज सुख दुनियादारी के।।

महतारी ए खान मया के, बाकी सब बैपारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


मया पाय बर महतारी के, देवन तक तरसत रहिथे।

मुख मा लोरी अँचरा ओली, गोरस गंगा कस बहिथे।।

लड़ जाथे लइकन बर सब ले, ज्वाला ए चिंगारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 20 March 2026

चइत नवरात्री अउ हिन्दू नव बछर के गाड़ा गाड़ा बधाई आगे आगे नवा साल

 चइत नवरात्री अउ हिन्दू नव बछर के गाड़ा गाड़ा बधाई


नवा साल-गीत


ये नवा साल मा का हे नवा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


चैत अँजोरी एक्कम, दाई पधारे हे।

माता के भक्ति मा, गूँजत घर द्वारे हे।।

सब माँ ला मनाएँ, जस गा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


जम्बूद्वीप के जामुन, नवा सजे हे।

उल्हवा निमवा मा, फूल लदे हे।।

नाचे रुख राई, फूल पात पा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


सरसो अरसी चना गहूँ, घर आवत हे।

पडकी परेवना मन झूम झूम गावत हें।।

जाड़ घाम के नइहे पता।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)




आगे आगे नवा साल 


आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।

डारा  पाना  गीत   गाये,पुरवाही  मा  हाल।


पबरित महीना हे,एक्कम  चैत अँजोरी के।

दिखे चक ले भुइँया हा,रंग लगे हे होरी के।

माता रानी आये हे,रिगबिग बरत हे जोती।

घन्टा शंख बाजत हे,संझा बिहना होती।

मुख  मा  जयकार  हवे ,तिलक  हवे  भाल।

आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


नवा  नवा  पाना  मा,रूख  राई नाचत हे।

परसा फुलके लाली,रहिरहि के हाँसत हे।

कउहा अउ मउहा हा इत्तर लगाये हे।

आमा  के  मौर मा छोट फर आये हे।

कोयली  नाचत गावत हे,लहसे आमा डाल।

आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


सोन फूल्ली बेंच बम्भरी,पयरी बेंचे चॉदी के।

मउहा  परसा   पाना  म, पतरी बने मांदी के।

अमली कोकवानी हा,सबला ललचाय।

मन  के  चरत  हावय,छेल्ला गरू गाय।

लइका  मन  नाचत  हे,झनपूछ हाल चाल।

आगे आगे नवा सालआगे आगे नवा साल।


खेत ले घर आगे हे,चना गहूँ सरसो अरसी।

गर्मी  के  दिन आवत  हे,बेंचावत हे करसी।

साग भाजी बारी म,निकलत हे जमके।

दीया  रोज  बरत  हे, गली खोर चमके।

बरतिया मन नाचत हे,दफड़ा दमऊ के ताल।

आगे  आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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नवा बछर (सार छंद)


फागुन के  रँग कहाँ हटे हे, कहाँ  घटे हे मस्ती।

नवा बछर धर चैत हबरगे,गूँजय घर बन बस्ती।


चैत  चँदैनी  चंदा  चमकै,चमकै रिगबिग जोती।

नवरात्री के पबरित महिना,लागै जस सुरहोती।

जोत जँवारा  तोरन  तारा,छाये चारों कोती।

झाँझ मँजीरा माँदर बाजै,झरै मया के मोती।

दाई  दुर्गा  के  दर्शन ले,तरगे  कतको  हस्ती।

फागुन के रँग कहाँ हटे हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


कोयलिया बइठे आमा मा,बोले गुरतुर बोली।

परसा  सेम्हर  पेड़  तरी  मा,बने  हवै रंगोली।

साल लीम मा पँढ़री पँढ़री,फूल लगे हे भारी।

नवा  पात धर नाँचत हावै,बाग बगइचा बारी।

खेत खार अउ नदी ताल के,नैन करत हे गस्ती।

फागुन  के रँग कहाँ हटे  हे,कहाँ  घटे हे मस्ती।


बर  खाल्हे  मा  माते पासा, पुरवाही मन भावै।

तेज बढ़ावै सुरुज नरायण,ठंडा जिनिस सुहावै।

अमरे बर आगास गरेरा,रहि रहि के उड़ियावै।

गरती चार चिरौंजी कउहा,मँउहा बड़ ममहावै।

लाल कलिंदर ककड़ी खीरा,होगे हावै सस्ती।

फागुन के रँग कहाँ हटे हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


खेल मदारी नाचा गम्मत,होवै भगवत गीता।

चना गहूँ सरसो घर आगे,खेत खार हे रीता।

चरे  गाय गरुवा मन मनके,घूम घूम के चारा।

बर बिहाव के बाजा बाजै,दमकै गमकै पारा।

चैत अँजोरी नवा साल मा,पार लगे भव कस्ती।

फागुन के रँग  कहाँ  हटे  हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरखिटिया"

बाल्को(कोरबा)


नवरात🐾🐾


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माता रानी के आगे , नवरात  संगी रे।

दाई के पँवरी म , नंवे हे  माथ संगी रे।


बिराजे हे दाई,गाँव गली खोर म,

कुँवार अंजोरी  हे, पाख संगी रे।


झांझ  - मंजीरा ,  मादर   बजत  हे,

जस-सेवा  सेऊक  हे,गात  संगी रे।


बरत हे देवाला,रिगबिग-रिगबिग,

अंगना म लइका,मेछरात संगी रे।


घन्टा अउ संख संग,गुंजत हे आरती,

भरे माड़े  हे परसाद म,परात संगी रे।


संख चक्र गदा धरे,बघवा म बइठे,

धरम ध्वजा दाई,फहरात  संगी रे।


चल   रे  "जीतेन्द्र" , भक्ति   के  रद्दा,

दाई दुर्गा के रहि,मुड़ म हाथ संगी रे।


             जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


              बालको(कोरबा)


              9981441795


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गंगोदक सवैया

देख  नारा  लगे  रात  बारा  बजे जेन  सोये  रही तेन खोही  सदा।

नाचही ताल मा जे नवा साल मा ओखरे नाम मा शान होही सदा।

फोकटे  वो नवा साल फैले नसा  जाल पैसा  सिराही पदोही सदा।

चैत जोती जलाले नवा साल वाले जिया मा खुशी दाइ बोही सदा।


खैरझिटिया

विश्व गौरैय्या दिवस विशेष- दोहा गीत

 विश्व गौरैय्या दिवस विशेष- दोहा गीत


गौरैय्या चिरई हरौं, फुदकत रहिथौं खोर।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


मोर पेट भर जाय बस, दाना  देबे  छीत।

पानी रखबे घाम मा, जिनगी जाहूँ जीत।।

गोटीं मोला मारके, देथस काबर खेद।

भले पड़े या झन पड़े, जी हो जाथे छेद।।

हावय तोरे हाथ मा, ये जिनगी हा मोर।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


दू दाना के आस मा, आथँव बिना बुलाय।

कभू पेट जाथे अघा, कभू रथँव बिन खाय।

जंगल झाड़ी भाय नइ, नइ भाये वीरान।

मनुष देख फुदकत रथँव, मैं पंछी अंजान।।

पानी पुरवा पेड़ मा, बिख जादा झन घोर।।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


बाढ़त हावय ताप हा, बाढ़त हे संताप।

छिन भर मा मर जात हौं, मैंहा अपने आप।

सबदिन मैं फुदकत रहौं, इही हवै बस आस।

गाना गाहूँ तोर बर, छोड़ भूख अउ प्यास।

कुनबा देख सिरात हे, आरो ले ले मोर।।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


जीतेंद्र वर्मा"खैझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


गौरइया


परछी अँगना मा फुदक, मन ला लेवै जीत।

वो गौरइया नइ दिखे, नइ सुनाय अब गीत।।

नइ सुनाय अब गीत, सिरावत हे गौरइया।

मारे पानी घाम, मनुष तक हे हुदरैया।

छागे छत सीमेंट, जिया मा गड़गे बरछी।

उजड़त हे बन बाग, कहाँ हे परवा परछी।।


काँदी पैरा जोड़ के, झाला अपन बनाय।

ठिहा ठौर के तीर मा, गौरइया इतराय।।

गौरइया इतराय, चुगे उड़ उड़ के दाना।

छत छानी मा बैठ, सुनावै गुरतुर गाना।

आही गाही गीत, रखव जल भरके नाँदी।

गौरइया के जात, खोजथे पैरा काँदी।।


दाना पानी छीन के, हावय मनुष मतंग।

बाढ़त स्वारथ देख के, गौरइया हे दंग।।

गौरइया हे दंग, तंग जिनगी ला पाके।

गाके काय सुनाय, मौत के मुँह मा जाके।

छिन छिन सुख अउ चैन, झरे जस पाके पाना।

कहाँ खुशी सुख पाय, कोन ला माँगे दाना।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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कुंडलियाँ


चिरई बइठे हाथ मा,कइसे चूमय गाल।

मनखे मनहा आज तो,बनगे हावै काल।

बनगे हावै काल, हवा पानी ला चुँहके।

मरे पखेड़ू भूख,छिंनय चारा ला मुँह के।

जंगल झाड़ी काट, करत हे मनके तिरई।

काखर कर बतियाय,अपन पीरा ला चिरई।


खैरझिटिया


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गीत-चिरई बर पानी


चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।

गरमी के बेरा आगे, तड़पे जीव परानी।।


जरत हवय चटचट भुइँया, हवा तात तात हे।

मनखे बर हे कूलर पंखा, जीव जंतु लरघात हे।।

रुख राई के जघा बनगे, हमर छत छानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


बिहना आथे चिंवचिंव गाथे, रोथे मँझनी बेरा।

प्यास मा मर खप जाथे, संझा जाय का डेरा।।

काल बनगे जीव जंतु बर, हमर मनमानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


दू बूँद पानी माँगे, दू बीजा दाना।

पेड़ पात बीच रहिथे, बनाके ठिकाना।।

चिरई बिन कहानी कइसे, कही दादी नानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


https://youtu.be/KOhYz_btXhQ?si=-9HU9ANTZirSyr_A&sfnsn=wiwspwa

खेती अफीम के-सरसी छंद

 खेती अफीम के-सरसी छंद


धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।

का होही अब छत्तीसगढ़ के, चढ़े करेला नीम।।


गोल्लर पइधे धान खेत मा, हें किसान मजबूर।।

हवे चमाचम बाड़ नसा के, मनखें तक ले दूर।।

पर नइ मारन सके परिंदा, हवें रखे बर टीम।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


बड़े बड़े पहिचान बताके, कतको एकड़ घेर।

सूट पहिर के करे किसानी, इँखरे हावँय बेर।।

दानी धर्मी इहिमन बनगें, लें लें के इस्कीम।।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


काय उगाही का ला खाहीं, कुच्छु समझ नइ आय।

लालच के खेती बाढ़त हे, करम धरम तिरियाय।।

खेती के होही का काली,  दरकत हावय बीम।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको, कोरबा(छग)


लगथे अइसने मा दारू बंद होही। विकल्प आवत हे

घर होना चाही.....

 ......घर होना चाही.....

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मनखे अस त मों मया ल,

फरे हस त गुत्तुर फर होना चाही|


कर मनके;मन ल भाय त,

फेर ऊप्पर वाले के,डर होना चाही|


इतराबे धन के राहत ले,

फेर मरे म नसीब कबर होना चाही|


अत्तीक झन भूला अपनेच म,

दुनिया के घलो खबर होना चाही|


बड़े नई होय कोनो धन-दऊलत ले,

बड़का बने बर छाती जबर होना चाही|


चाहे महल-अटारी;फ्लेट ;बंगला राहय,

फेर वोला सबले पहिली घर होना चाही|


               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया'

                   बाल्को(कोरबा)

आज फेर कलम धरे हों.......

 ....आज फेर कलम धरे हों.......

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ओखर बर जे दबते जात हे|

ओखरो बर जे तपते जात हे|

जेन नई बोल सके,

अपन मन के भॉखा|

जेन खात हे,

जघा-जघा चॉटा|

कतरो रोवत हे ,

सुसक-सुसक के|

गोड़ तरी चपकाय हे,

मचान म घलो चक के|

दरद ल दिल के,

देखा नई सके|

जेन रॉंधथे रोटी,

फेर खा नई सके|

जुलूम के तॉवा म,

मंहू जरे हों.............|

आज फेर कलम धरे हों||


गिरे-थके हपटे बर|

खोंचका-डिपरा ल खपटे बर|

सुमत के दिया बारे बर|

अंधरा के ऑखी उघारे बर|

बंटाय मया ल जोरे बर|

सुवारथ के सुरता छोरे बर|

सिखाय बर इंसानी बात|

मॉगे बर सबके साथ|

पंवरी म सबके परे हों.........|

अाज फेर कलम धरे हों......|


खा पेटभर; खवा पेटभर|

कखरो रोटी ल,झन नंगा पेटभर|

देखा भुलाय ल रद्दा|

झन खन कखरो बर गढ्ढा|

उजरा ओनहा- कोनहा ल|

सजा दाई सोनहा ल|

कखरो बॉटा ल ,

कोनो ल खान झन दे|

फोकटे नई रोय,

कोनो ल ऑसू बोहान झन दे|

बॉटे म बढ़ते मया,

मंय धरे मया खड़े हों.....|

आज फेर कलम धरे हों...|

              जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                  बाल्को(कोरबा)

Monday, 16 March 2026

बता भला-सार छंद

 बता भला-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी तन टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

जल बिन जल जावत हे टोंटा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गड़ी-शक्ति छन्द

 शक्ति छन्द- गड़ी चल


गड़ी चल ढुलाबों हमन गड़गड़ी।

मया के सबे दिन बरसही झड़ी।।

झड़क भात बासी अदौरी बड़ी।

किंजरबों गली मा हँसत हर घड़ी।


निकलबों ठिहा ले बहाना बना।

बबा डोकरी दाइ माँ ला मना।

सबें यार जुरबोंन बर रुख कना।

नँगत खेलबों धूल माटी सना।


कका देही गारी दिखाही छड़ी।

तभो नइ टुटे ये मया के कड़ी।

गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन बरसही झड़ी।।


उड़ाबों हवा मा बना फिलफिली।

चना भूंज खाबोंन खाबों तिली।।

नहाबों नदी मा उठावत मजा।

जगाबों सुते ला नँगाड़ा बजा।।


छिंदी चार आमा कमल के जड़ी।

झराबोंन अमली ग जिद मा अड़ी।।

गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन झरे बस झड़ी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


तभो नइ टुटे मीत मन के लड़ी।

भाजी बोहार के

 भाजी बोहार के


भाजी बोहार के।

राँध भूंज बघार के।।

दे लसुन मिर्चा के फोरन।

अउ छीटा मार  दार के।।


तन मा चुस्ती देथे,

सुस्ती जाथे हार के।।

बढ़त जात हे मांग भारी,

विनाश होवत हे खेत खार के।


ले दे के ये भाजी मिलथे,

चक्कर लगाय मा बाजार के।।

नइ हे पइसा हाथ मा,

ता देखत रह मुँह फार के।।


बड़ गुणकारी होथे ये भाजी,

राँध खा डकार के।

कफ दुरिहाथे,पाचन बढ़ाथे,

पेट के कृमि ला मार के।।


गर्मी घरी आथे,

उल्हवा उल्हवा राँध निमार के।

फर फूल घलो होथे काम के,

रख पेड़ ला दुलार के।।


जे खाय ते जाने स्वाद ला,

का होही बताय मा चार के।

भाजी पाला बैद आय तन मन के,

अउ मुख्य साग आय बुधियार के।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Friday, 6 March 2026

अऊ आगे बईरी बादर तन म मॉस नई बॉचे हे,


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  अऊ आगे बईरी बादर


तन म मॉस नई बॉचे हे,

अब हाड़ा ल घलो खा डर |

मोर सपना ल सरोय बर,

अऊ आगे बईरी बादर|

करेजा ल चानी करेबर,

फर म चना के पानी भरे बर|

रौंदें  बर  लाख-लाखड़ी  ल|

बॉचे-खोंचे आस आखरि ल|

मसरंगी अरसी के फूल कस,

हिरदे म जागे रिहिस सपना|

राहेर सरसो कस खड़े रेंहेव,

बईरी  हवा  हलईस  कतना|

लिड़िंग-लिड़िंग हालत रेंहेव,

अऊ आगे बिपत आगर....|

सरोय  बर मोर  सपना  ल,

अऊ आगे बईरी बादर......|


मोर मंसूर ल मसके बर|

मारे टोंटा ल कसके धर|

मंय   गंहू   कस,  गोहार   पारत  हंव|

जांगर ल जीतेव,जिनगी ल हारत हंव|

बुता करथन; करके करेजा के चानी|

फेर फूले-लुवे-मिंसे के बेरा; गिरथे पानी|

मंय कॉपत हंव थर-थर,

सब कीथे  जॉंगर हे त का डर.......?

मोर सपना  ल  सरोय  बर,

अऊ आगे  बईरी बादर.................|


पड़े ले थपड़ा ,करके थोथना तिरछा|

सुसके कोला म,धनिया-मेथी-मिरचा|

बिगड़हा बनाय हे जनम जात,

भगवान  मोर  रासि |

मोर लगाय ऑलू-भॉटा-गोभी,

अरो  लेहे   फॉंसी |

किसानी ल धरम मान के,

सिधोथो खेत-खार,बखरी-बारी|

उद्धमी ब्यपारी मन हॉसथे ,

गरियाथे बेटा-बहू-सुवारी |

मन  ल  मनाथो ,

किसान होय के सजा पा डर.....|

सपना ल सरोय बर,

अऊ आगे बईरी बादर.............|

               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                     बाल्को( कोरबा)

                     ९९८१४४१७९५

Sunday, 1 March 2026

गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)

 गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)



आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।


बिन अमुवा के करे कोयली का, कांता हा बिन कंत।।



बिन फुलवा के हावय सुन्ना, मोर जिया के बाग।


आसा के तितली ना भौरा, ना सुवना के राग।।


हे बहार नइ पतझड़ बस हे, हावय दुःख अनंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



सनन सनन बोलय पुरवइया, तन मन लेवय् जीत।


आय पिया हा हाँसत गावत, धर फागुन जे गीत।।


मरत हवै मन माँघ मास मा, पठा संदेश तुरंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



देख दिखावा के दुनिया हा, बैरी होगे मोर।


छीन डरिस सुख चैन पिया के, काट मया के डोर।


पुरवा पानी पियत बने ना, आगे बेरा अंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)



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 होरी अउ पीरा पलायन के- सरसी छन्द



होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।


रंग छीच के फेर बुझाहूँ, फागुन हवय बुलात।।



देवारी के दीया बुझथे, बरथे मन मा आग।


शहर दिही दू पइसा कहिके, देथौं गाँव तियाग।


अपन ठिहा मा दरद भुलाहूँ, फागुन ला परघात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



प्लास आम डूमर कस ठाढ़े, नित गातेंव मल्हार।


फोकट देहस मोला भगवन, पेट पार परिवार।


जनम भूमि जुड़ अमरइया हे, करम भूमि हे तात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



अइसन रँगबे सब ला आँसो, हे फागुन महराज।


सबे बाँह बर होवै बूता, झलकत रहै अनाज।।


दरद पलायन के झन भुगते, गाँव गुड़ी देहात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)




दोहा गीत- माँ शारदे



जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।



तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।


तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।


रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।


मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।


वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।


प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।


दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)






गीत- बने करे भगवान(सरसी छंद)

 गीत- बने करे भगवान(सरसी छंद)


काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।

महिनत करथौं पइसा पाथौं, नइ डोले ईमान।


पचे नहीं फोकट के पइसा, जस आये तस जाय।

होथे बिरथा बड़का बनना, कखरो ले के हाय।।

बने करम नित करत रहौं मैं, भरत रहै धन धान।

काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।


खून पछीना के धन दौलत, देवय चैन सुकून।

जादा के हे लालच बिरथा, लोभ मोह ए घून।

बने करम के होथे पूजा, करम धरम अउ दान।

काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।


घूसखोर के गत देखे हँव, माया पइस न राम।

लरहा बनके घुमते रहिगे, होगिस काम तमाम।।

इँहें सरग हे इँहें नरक हे, लिखथे करम विधान।

काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)




गीत-करजा(लावणी छन्द)



बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।


लूट लूट बाजार बैंक ला, पाय रथें बड़का दरजा।



राज देश दुनिया मा करथें, करत रथें नित मनमानी।


उँखर ठिहा मा नेता गुंडा, अउ अफसर भरथें पानी।


सुरा सुंदरी शौक पुरावय,जय जयकार करयँ परजा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



दुनिया के कोना कोना मा, करजा के महल अटारी।


कहे कंगला अपन आप ला, आय चुकाये के बारी।


देश छोड़ के होवैं चंपत, कहि जो करना हे कर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



भेद करे बाजार बैंक हा, सूट बूट अउ पटको के।


एक ठिहा मा पहुँचे पइसा, घींसय पनही कतको के।


लगे एक घर कोट कछेरी, धरे एक ला घर घर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



मान शान ला भारत भू के, कोनो कोढ़ी झन चाँटे।


एक होय सब नियम धियम हा, बैंक रेवड़ी झन बाँटे।


फोकट मा बाँटे बर हे ता, सबके खीसा ला भर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)





लाजवाब कृति - गांव के हो गए (हिंदकी संग्रह)*

 *लाजवाब कृति  - गांव के हो गए (हिंदकी संग्रह)* 



                  डॉ माणिक विश्वकर्मा "नवरंग" जी की कृति "गाँव के हो गए" पढ़ने को मिला। पढ़कर मैं पूर्णतः "नवरंग" जी का हो गया। मैं क्या?  जो भी पाठक इस पुस्तक को पढ़ेंगे "नवरंग" जी के कायल हो जाएंगे। "गांव के हो गए" ग़ज़ल संग्रह (हिंदकी) एक अथाह सागर की भाँति है,जिसमें, जो पाठक जितना गोता लगाएगा, वो उतना ही जीवनोपउयोगी मोती निकाल सकता है। नवरंग साहब की बेजोड़, बेबाक लेखनी में उनके अनुभव का साक्षात सम्मिश्रण इस पुस्तक में है। नवरंग साहब की यह पुस्तक एक तरफ उनके जीवन की परिभाषा नज़र आती है तो दूसरी तरफ पाठकों को जीवन जीने की कला सिखाती है। हर कलेवर की रचना, बेजोड़ शब्द शिल्प, बिंब, प्रतीक, मुहावरें आदि में पिरोकर नवरंग जी ने इस पुस्तक में अपने मनोभाव और अनुभव को उकेरा है। 208 ग़ज़लों का विशाल संग्रह, आज के समय और विचारों को हूबहू परिभाषित कर, अलौकिक आनंद की सृष्टि निर्मित करने में पूर्णतः सक्षम है। सुप्त मनोभाव उद्वेलित करने की क्षमता नवरंग जी की ग़ज़लों में समाहित है। समाहित है- स्वच्छ चिंतन, सादगी, सत्य, जिम्मेदारी, प्रेम भाव, दर्द, इंसानियत जैसे मानवीय मूल्यों की सभी ज़रूरी चीजें। जीवन और मृत्यु के बीच नवरंग साहब ने अपनी लेखनी के माध्यम से एक हिंडोलना निर्मित कर दिया है, जिसमें मनुष्य सर्वत्र झूलता नजर आता है।


                 विसंगतियों को फटकारते हुए, निर्माण और नवनिर्माण की परिकल्पना नवरंग जी की लेखनी की ख़ासियत है। साहित्यकार होने की सच्ची परिभाषा नवरंग जी के साहित्य में सहज नज़र आती है।  सर्व प्रचलित विषयों को भी मौलिक ढंग से कहने की ताकत नवरंग जी की लेखनी में है। सभी ग़ज़लों के बारे में लिख पाना सम्भव नही है, फिर भी कुछ मतलों, शेरों का जिक्र करना चाहूंगा।



सुर तुलसी हूँ न केशव दास हूँ मैं


भूख से व्याकुलजनों की प्यास हूँ मैं।


चापलूसी कर नही सकता किसी की,


जन्म से बेबाक हूँ बिंदास हूँ मैं।



बेवजह मैं आज तक बोला नही हूँ


सत्य के पथ पर कभी डोला नही हूँ।


जानता हूँ खेल में बाजी पलटना,


मित्रवर पत्ता अभी खोला नही हूँ।


उक्त शेर नवरंग जी को परिभाषित करते नज़र आ रहे, जिसमें उनकी सहजता,सरलता,स्वाभिमान,सत्यता और आत्मविश्वास के साथ साथ बिंदास और बेबाकपन है।



ज़रूरत पड़ने पर अपनों और रिश्ते नातों के लिये ख़ामोशी और कुर्बानी की बात करते हुए, नवरंग जी लिखते है--


दर्द सहना पड़े तो सह लेना


चोट खा लेना वार मत करना।


टूटकर रिश्ते कभी नही जुड़ते,


भूलकर भी दरार मत करना।


राज़ मन मे दबा के रख लेना


तुम कभी इश्तिहार मत करना।



श्रम,अभाव और पीड़ा को शब्द देना,कोई नवरंग जी से सीखें-


पेट में सूरज लिए निकला हूँ घर से


शाम की ख़ातिर सुबह से जल रहा हूँ।


नाम के पीछे कभी भागा नही हूँ


अनबूझे प्रश्नों का मैं ही हल रहा हूँ।



धीरज ,सन्तोष, सब्र जीवन की ज़रूरी चीजों में से एक है, इसे ज़िंदगी के शब्दकोश में किस तरह समाहित करना चाहिये, एक बानगी देखिये-


मन को काबू में रखने से खुशियां मिलती है


धीरे-धीरे दुख का हर लम्हा टल जाता है


लाख हवा विपरीत रहे फिर भी इस गुलशन में


जिसकी किस्मत में फलना है वो फल जाता है



परोपकार और स्वालम्बन मानवता का मापदंड है,तभी तो नवरंग जी क़लम चलाते हुए लिखते है--


फिर ना कहना दोस्तों जोड़ा नहीं


बो दिया एक बार भी कोड़ा नहीं


हो सका जितना किया मैं शौक़ से


काम औरों के लिए छोड़ा नहीं


चल सको तो दूर तक ले जाऊंगा


मैं किसी की राह का रोड़ा नहीं



फक्कड़पन सादगी जिन्दगी में कुछ इस तरह हो--


जिंदगी में सुर नहीं है लय नहीं है


इसलिए मन में किसी का भय नहीं है


पूछते हैं लोग ठहरूँगा कहां पर


मुझको जाना किधर है यह तय नहीं है


आपको अच्छा नहीं लगता करूं क्या


यह मेरा अंदाज़ है अभिनय नहीं है



नवरंग जी के शब्द दर्पण की तरह दाग़ दिखाते नज़र आते है----


कब तलक चल पाओगे लेकर मुखौटा


सब समझते हैं बुरे कितने भले हो


जिसने भी बढ़ कर दिया है हाथ तुमको


मूंग छाती में उसी की तुम दले हो


सीढ़ियों के वास्ते बैठे रहे तुम


क्या किसी के साथ दो पल भी चले हो



मनुष्य को दूरदर्शी होकर कोरे दिखावे से दूर चले जाने की बात कहते हुए,नवरंग जी लिखते है---


नींव गर कमजोर हो तो घर बदल देता हूं मैं


छोड़कर शहनाइयां को दूर चल देता हूं मैं



व्यवस्था पर तंज कसते हुए नवरंग जी लिखते है-


योजनाएं कागजों में है सफल


जी रहे हैं ये मसल है क्या करें


पा गया बहुरूपिया मंत्री का पद


आजकल वो ही सफल है क्या करें


रोज होता है पलायन गांव से


फाइलों में ही फसल है क्या करें



अर्श से फर्श पर पहुँची ज़िंदगी, कोई क़ागज का टुकड़ा नही होता है, जो हवाओं में उड़ जाए। परिश्रम कभी भी व्यर्थ नही जाता, इसी तरह के भाव, प्रकट करते हुए नवरंग जी लिखते है--


धूल से लिपता हूं कीचड़ से सना हूं


इसलिए मजबूत हूं सबसे घना हूं


है सभी हैरान क्यों टूटा नहीं मैं


धुन रहे हैं सिर निहाई का बना हूं


खिल रही है शाखाएं मेरे ही दम से


जो जड़ों को सींचता हो वो तना हूँ



गरीबी भुखमरी के बीच क़ागजी पहल के कोरे किस्से, कैसे नवरंग जी की क़लम से छूट जाएंगे---


हर तरफ रोटी नून के किस्से


माह हफ्ते दो जून के किस्से


वक्त पे कारगर नहीं होते


 कागजी है कानून के किस्से



फटकार में भी शालीनता, नवरंग जी की ख़ासियत है, शब्द तीर की तरह लक्ष्य भेदन में समर्थ है -


सालों भट्ठी में तपा हूं तब गला हूं


इसलिए सब कह रहे हैं जलजला हूं


ज़ुल्म सहने की मेरी फ़ितरत नहीं है


छीन लूंगा नींद रातों की बला हूँ



कुछ लोग मद महुआ के नशे में चूर है, तो कुछ लोग चीज बस के, तभी तो नवरंग जी कहते है,


लोग आदत से बहुत मजबूर हैं


कीजिएगा क्या नशे में चूर हैं


लूटते हैं जो वफ़ा के नाम पर


ठीक क्या हो पाएंगे नासूर हैं



इतिहास में नाम दर्ज़ कराने के लिए ज़िंदगी के सारे जंग जीतने पड़ते हैं, हार निराशा जैसी चीजों से दूर होकर  विश्वास लेकर आगे बढ़ना पड़ता है, तभी तो नवरंग जी लिखते हैं-


दर्ज़ होते हैं वही इतिहास में


जीतते हैं जंग जो खरमास में


दिल किसी का तोड़ना अच्छा नहीं


हौसला होता है हर विश्वास में


जीत लेंगे हम यकीनन एक दिन


आज हिम्मत और प्रण है पास में



वर्ष,व्यवस्था और वातावरण की वस्तुस्थिति पर चुटकी लेते हुए नवरंग जी लिखते हैं---


कल रहा जो वही आज का हाल है


बोलने के लिए यह नया साल है


योजनाएं धरी की धरी रह गई


जो मिला मित्रवर जी का जंजाल है


बेवजह लोग डरते रहे उम्र भर


जिस्म पर भेड़ के शेर की खाल है



ख़ास चलता है आम चलता है


बस इसी तरह काम चलता है


नाम लिखना जिन्हें आता नहीं


ऐसे लोगों का नाम चलता है


इल्म वाले किनारे बैठे हैं


आजकल तामझाम चलता है



समाज में बेवजह शोर-शराबा देख दिखावा किस कदर हावी है नवरंग जी की पंक्ति  देखिये-


तुम मेरी मौत को भुनाना मत


हर जगह अस्थियां ले जाना मत


डाल देना नदी में चुपके से


देश भर में बिगुल बजाना मत


दूर रखना मुझे सियासत से


नाम पर झांकियां सजाना मत


 लोग हर बात को समझते हैं


 बेवजह शोर तुम मचाना मत



इंसान को इंसानियत से लबरेज़ आत्म आंकलन करने की ज़रूरत है, तभी तो नवरंग जी कहते हैं--


प्यार से आजकल डांटता कौन है


खाइयाँ औरो की पाटता कौन हैं


जो मिला वह उठाते रहे उम्र भर


बेबसी में भला छाँटता कौन है


लोग लिखने लगे औरों की गलतियां


अपनी गुस्ताखियां आँटता कौन है



नवरंग जी ने मानव समाज में जो देखा उसे हूबहू लिख दिया, पर लिखने जा अंदाज़ क्या कहना--


रहा जुगनू जब से सितारा हुआ हूं


तभी से शहर में नकारा हुआ हूं


नदिया तो सब पूजा करते थे मेरी


समुंदर से मिलकर मैं खारा हुआ हूं



पहले भोले थे ये शहर वाले


दांत रखते हैं अब जहर वाले


औरों के दम पर लोग उड़ते हैं


अब परिंदे बचे न पर वाले



पौराणिक कथ्य का आधुनिक परिवेश में प्रयोग पाठक को वाह-वाह करने के लिए मजबूर कर देता है-


करने से पहले वार कई बार सोचना


धोखे से मारा जाए वह बाली नहीं हूं मैं


बरगद बना हुआ हूं मैं दुनिया के वास्ते


तूफ़ां में टूट जाए वह डाली नहीं हूं मैं



मंदिर में था तो कोई मुझे जानता न था


बाज़ार में आते ही ख़बर हो रहा हूं मैं



बिंब,प्रतीक और अभिव्यक्ति की कलात्मकता कोई नवरंग जी से सीखे--


मेढकी को जुकाम आया है


आजकल मुद्दा ये गर्माया है


मछलियां कांपने लगी डर से


बाखुदा कैसा वक्त आया है


जांच से यह नतीजा निकला है


आग मेंढक ने ही लगाया है


वो पकड़ में नहीं आया अब तक


सारे षड्यंत्र का जो पाया है


 


नवरंग जी की हिंदकी संग्रह में सिर्फ हिंदी का नहीं बल्कि विविध आयातित भाषाओं(उर्दू,फारसी,तुर्की,अंग्रेजी--) का भी प्रयोग, बेशुमार हुआ है, मनुष्य की फ़ितरत को शेर में बांधते हुए नवरंग जी कहते हैं---


है हवा जिस तरफ उस तरफ फेस कर


जी रहे हैं सभी आत्मा बेचकर


गांव पहले जहां था वहीं रह गया


लोग आए गए रोटियां सेक कर


यह नया दौर है बच के रहना


यहां कोई रुकता नहीं चीखते देखकर



आज हर कोई जल्दी मुकाम पाने के लिए छटपटा रहा है, पर मानव मेहनत कम और जुगत ज्यादा बना रहा है, तभी तो नवरंग जी लिखते हैं---


पकने से पहले वो बिकना चाहता है


मीर गालिब जैसा दिखना चाहता है


इतनी जल्दी है शिखर छूने की उसको


कुछ भी पढ़ना कुछ भी लिखना चाहता है


नाचती है रात दिन आंखों में दौलत


सालों वो महफ़िल में टिकना चाहता है



समस्या, संस्कृति, संस्कार,गंभीर चिंतन,निर्माण,पुनर्निर्माण और तात्कालिक प्रसंगों के साथ-साथ नवरंग जी के ग़ज़ल संग्रह में प्रेम मोहब्बत की बानगी भी सहज नजर आते है---


चले आओ सुरों में गीत बनकर


लुभाऊंगा तुम्हें संगीत बनकर


करूंगा रात दिन पूजा तुम्हारी


रहूंगा उम्र भर मैं प्रीत बनकर


 समय रहते बसा लो धड़कनों में


जुदा होने न पाऊं रीत बनकर



उनकी बात निराली है


वह पूजा की थाली है


जब से उनके पांव पड़े


आंगन में हरियाली है


महक रहा है मन उपवन


फूलों वाली डाली है



जब तुम लेती हो अंगड़ाई


बजने लगती है शहनाई


मादकता में भर जाती है


आलिंगन करने पुरवाई


मंडराने लगते हैं भौरे


मौसम करता है अगवाई



मनुष्यों को मजहबी रंग में नही बल्कि मानवता के रंग में रंगकर भाई चारे की भावना रखनी चाहिये, इसी भाव में अपनी अन्तर्रात्मा के शब्दों को लेखनी में ढालते हुए नवरंग जी कहते हैं--


परिंदों को मैं हर दिन प्यार से पानी पिलाता हूं


जहां होती है पहुनाई मैं उस सुबे में आता जाता हूं


मनाता हूँ दिवाली ईद वैशाखी और क्रिसमस भी


सभी देवालयों के सामने मैं सिर झुकाता हूं


कहीं नवरंग होकर रह ना जाए एक ही दर का


उजाला दे जो हर चौखट पर वह दीपक जलाता हूं*्



                अनुभव के आकाश में तारों की तरह टिमटिमाते नवरंग जी के एक एक शब्द कही सुनी बातों को नही बल्कि, जी गयी जिंदगी की हकीकत को बयां कर रहे है। जीवन या जमाने का कोई भी पहलू अछूता नही है, पाठक पढ़कर सभी रंगों में रंग सकता है। बहु प्रचलित बहरों में गुथे, राग रंग का अद्भुत संग्रह है, गाँव के हो गए गजल संग्रह, जिसके शब्दों में शक्ति है- निर्माण की, अधंकार को चीरने की, गलत को रोकने टोकने की, बैर वैमनस्य दूर करने की, प्रेम भाव भरने की, सही राह प्रशस्त करने की। यही नवरंग साहब की ख़ासियत है। गांव के हो गए गजल संग्रह में, नवरंग जी की क़लम आत्मरंजन के लिए नही बल्कि सत्य, सामाजिक समरसता और प्रेम भाव स्थापित करने के लिए चली है। एक शब्द में कहूँ तो "गाँव के हो गए" ग़ज़ल संग्रह एक पुस्तक नही, आईना है।


विविध कलेवर के 208 गजलों को शब्द दे पाना या उसके एक एक शेर के बारे में कह पाना मुश्किल है, इसके लिये पाठक को स्वयं शब्दों के समुंदर में डूबना होगा। अतः आप सब जरूर पढ़ें, नवरंग जी की लाजवाब कृति--- गांव के हो गए।



जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)


मो.नं.99814 41795,



Friday, 27 February 2026

लाली फूल सेंम्हर के

 लाली फूल सेंम्हर के

.....................................

आगे बसंत;कुहके कोयली,

परसा,आमा मन भाय हे|

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे बर बलाय हे.............||


कॉटा   पेड़  भर   लटके   हे|

खाल्हे एकोठन नइ टपके हे||

हॉंसत  हे  के  रोवत  हे,

लाली  फूल  जँऊहर  घपटे हे ||

झर्राके  पाना फूल  ल,

पेड़ तरी सेज बनाय हे...........||

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे   बर   बलाय हे..............||


लाली फूले हे तभो कोनो नइ भावत हे|

फगुवा   पूर्वाइया  म  उहू  ह गावत  हे|

कोन अब खाके वोला मुंहु रचावत हे|

मनखे के मया ले सेंम्हर दुरिहावत हे|

बाढ़े हे डंगडंग ले,

छंइहाँ बर डारा-खांधा लमाय हे||

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे     बर   बलाय हे............||


तीर तखार म मनखे दिखे ल काहत हे|

एकेक ठन कॉंटा तनले झिंके ल काहत हे|

बसंत  म मंहु  मुचमुचाथो  फूल के,

कवि मन ल अपनो बारे में लिखे ल काहत हे|

एके घरी हाँसय एके घरी रोवय,

पाना गिराके फूले फूल म लदाय हे||

सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,

बइठे बर  बलाय हे..............||


            जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                   बाल्को(कोरबा)

काबर लालेच म खेलथस???

 

काबर लालेच म खेलथस???


अऊ तो रंग बहुत हे,

काबर लालेच म काबर खेलथस?

हॉसत खेलत जिनगी म,

काबर बारूद मेलथस?


पीके पानी फरी,

जुडा़ अपन नरी,

फेर काबर लहू पियत हस?

मनखे अस ता, मन म समा,

रक्सा कस का जियत हस?


हरिंयर रंग हरागे हे,

ललहूं होगे हे माटी।

थोरकन तो दया धरम देखा,

का पथरा के हे तोर छाती?

भरके बंदूक म  गोली,

निरदई कस ठेलथस......

अऊ तो रंग ............

.............खेलथस  ???


बंदूक गईंज चलायेस,

अब भाईचारा भँजा के देख !

मारे हस जेखर गोंसईंया,बेटा ल,

ओखरो घर जाके देख,!.

मनखे होके मनखे ल ,                                                                                                                                                                     खावत हस नोंच नोंच !

फिलगे हे अचरा आंसू म,

अब ताे दाई के आंसू पोंछ !

छेदा छेदा के बम बारूद म,

दाई के छाती चानी हाेगे हे !

तरिया ढोंड़गा नरवा के पानी,

ललहुं  बानी होगे हे  !

कोन देखाथे ऑखी तोला,

बता!! का बात ल पेलथस?

अऊ तो रंग................

.....................खेलथस ??


अलहन ऊपर अलहन होत हे।

जंगल तीर के गांव रोज रोत हे।

कल्हरत हे कुंदरा,

 आँसू ढारत हे महतारी।

कब जिवरा ले डर भागही,

 कब टरही गोला बारी।।

खून खराबा बने नोहे,

आखिर दरद तो तहूँ झेलथस।

अऊ तो रंग.....................

..........................खेलथस?


जंगल के जीव जीवलेवा हे,

फेर तोर जइसे नही,!

कहां लुकाबे बनवासी बन,

जब श्री राम आ जही!

छीत मया के रंग,

अऊ खेल रंग गुलाल ले,!

नाच पारा -पारा बाजे नंगाडा़!

निकल जंगल के जाल ले!

खेल खेल म का खेले तैं,

मनखे के जीव लेलेय तैं,

अति के अंत हब ले होही,

बात मोर मान ले!

लड़ना हे त देश बर लड़,

छाती फूलाके शान ले!

फूल-फूलवारी मितान बना,

आखिर काखर बात ल एल्हथस??

अऊ तो रंग.....................

.............................खेलथस????


जीतेन्र्द वर्मा

खैरझिटी(राजनांदगांव)

Monday, 23 February 2026

कुंडलियां-रिचार्ज के नाम मा लूट

 कुंडलियां-रिचार्ज के नाम मा लूट


सरकारी आदेश हे, बिसा एक ठन फोन।

बिक जा भले रिचार्ज बर, सुध लेवव अब कोन।।

सुध लेवव अब कोन, मिले हें नेता अफसर।

महँगा फोन रिचार्ज, रुवावत रहिथे अक्सर।।

फोन जाय के छोड़, आय के तक लाचारी।

नम्बर सब मा जोड़, हुकुम हावै सरकारी।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


जियो नाम रख मारथे, कहँव दुःख ला काय।

लूटमार के खेल हे, सेवा बनगे बाय।।

Sunday, 22 February 2026

हरिगीतिका छंद-परसा

 हरिगीतिका छंद-परसा


*परसा कहै अब मोर कर भौरा झुले तितली झुले।*

*तड़पे हवौं मैं साल भर तब लाल फुलवा हे फुले।*


*जब माँघ फागुन आय तब सबके अधर छाये रथौं।*

*बाकी समय बन बाग मा चुपचाप मिटकाये रथौं।*


*सजबे सँवरबे जब इहाँ तब लोग मन बढ़िया कथे।*

*मनखे कहँव या जीव कोनो सब मगन खुद मा रथे।*


*कवि के कलम मा छाय रहिथौं एक बेरा साल मा।*

*देथौं झरा सब फूल ला नाचत नँगाड़ा ताल मा।*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Thursday, 12 February 2026

गीत-पतझड़

 गीत-पतझड़


आथे पतझड़ दे जाथे संदेश रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक।।


बनना हे बढ़िया ता, तज दे विकार ला।

अपन बूता खुद कर, झन देख चार ला।

आवत जावत रहिथे, सुख दुख के बेरा।

समय मा चलबे ता, कटथे घन घेरा।।

विधि विधना ला, माथा टेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


राम अउ माया, संग मा नइ मिले।

सदा दिन बिरवा मा, फुलवा नइ खिले।

परसा सेम्हर, पात झर्रा मुस्काथे।

फागुन महीना, पुरवा संग गाथे।

पूरा पानी ला झन कभू छेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


नाहे धोये मा नइ, अन्तस् धोवाये।

मन ला उजराये ते, ज्ञानी कहाये।

मन हावै निर्मल ता, जिनगी हे चोखा।

करबे देखावा ता, खुद खाबे धोखा।

देथे प्रकृति संदेशा नेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक----


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐


छबि छंद


छाये बहार, चहुँओर यार।

आहे बसंत, सुख हे अनंत।


गावै बयार, नद ताल धार।

फइले उजास,भागे हतास।


सरसो तियार,बाँटे पिंयार।

नाचे पलास,कर ले तलास।


कइथे कनेर,उठ छोड़ ढेर।

बोइर बुलाय,आमा झुलाय।


जिवरा ललाय,अमली जलाय।

मुँह ला फुलाय,लइका रिसाय।


बन बाग मात,दिन मान रात।

होके मतंग,छीचे ग रंग।।


माँदर बजाय,होली जलाय।

सबला सुहाय,शुभ मास आय।


बाजे धमाल,होवय बवाल।

गा फाग गीत,ले बाँट प्रीत।


रचगे कपाल,हे गाल लाल।

फगुवा लुभाय,कनिहा झुलाय।


हे मीठ तान,मधुरस समान।

जब जब सुनाय,आलस चुनाय।


खैरझिटिया

💐💐💐💐💐💐💐💐💐


गोपी छंद- बसंत ऋतु


बसंती गीत पवन गाये।

बाग घर बन बड़ मन भाये।

कोयली आमा मा कुँहके।

फूल के रस तितली चुँहके।


करे भिनभिन भौरा करिया।

कलेचुप हे नदिया तरिया।।

घाम अरझे  अमरइया मा।

भरे गाना पुरवइया मा।।


पपीहा शोर मचावत हे।

कोयली गीत सुनावत हे।

मगन मन मैना हा गावै।

परेवा पड़की मन भावै।।


फरे हे बोइर लटलट ले।

आम हे मउरे मटमट ले।

गिराये बर पीपर पाना।

फूल परसा मारे ताना।।


फुले धनिया सादा सादा।

टमाटर लाल दिखे जादा।

लाल भाजी पालक मेथी।

घुमा देवय सबके चेथी।


मसुर अरहर मुसमुस हाँसे।

बाग बन खेत जिया फाँसे।

चना गेहूँ अरसी सरसो।

याद आवै बरसो बरसो।


सरग कस लागत हे डोली।

कहे तीतुर गुरतुर बोली।

फूल लाली हे सेम्हर के।

बलावै बिरवा डूमर के।।


बबा सँग नाचत हे नाती।

खुशी के आये हे पाती।

नँगाड़ा झाँझ मँजीरा धर।

फाग ले जावै पीरा हर।।


सुनावै हो हल्ला भारी।

मगन मन झूमै नर नारी।

प्रकृति सज धज के हे ठाढ़े।

मया मनखे मा हे बाढ़े।।


मटक के रेंगें मुटियारी।

पार खोपा पाटी भारी।

नयन मा काजर ला आँजे।

मया ममता खरही गाँजे।।


राग फगुवा के रस घोरे।

चले सखि मन बँइहा जोरे।

दबाये बाखा मा गगरी।

नहाये खोरे बर सगरी।


पंच मन बइठे बर खाल्हे।

मगन गावै कर्मा साल्हे।

ढुलावय मिलजुल के पासा।

धरे अन्तस् मा सुख आसा।।


हदर के खावत हे टूरा।

चाँट अँगरी थारी पूरा।।

चुरे हे सेमी अउ गोभी।

पेट तन जावै बन लोभी।


टमाटर चटनी नइ बाँचे।

मटर गाजर मूली नाँचे।

पपीता पिंवरा पिंवरा हे।

ललावत सबके जिवरा हे।।


हाट हटरी मड़ई मेला।

जिंहा होवय पेलिक पेला।

ढेलुवा सरकस अउ खाजी।

मजा लेवय दादी आजी।।


जनावत नइहे जड़काला।

प्रकृति लागत हावै लाला।

खुशी सुख मन भर बाँटत हे।

मया के डोरी  आँटत हे।


सबे ऋतुवन के ये राजा।

बजावै आ सुख के बाजा।

खुशी हबरे चोरो कोती।

बरे  नित दया मया जोती।


खैरझिटिया

कुवाँ के आंसू

 कुवाँ के आंसू


कुवाँ के घिर्री म,

अब बाल्टी नइ झूले|

पार मा ऑवर-भॉवर,

भँसकटिया नइ फूले |


टेंड़ा पाटी टूट के सरगे हे|

कोला-बारी परिया परगे हे |

तरी ले ऊप्पर तक,

मेकरा के जाला बनगे हे|

गोड़ेला,पुचपुची,सल्हई के,

चारो मुड़ा झाला बनगे हे|


जागे हे बोईर-बंम्भरी,

कुवाँ के पार म |

खोजे म बिरले मिलथे,

कुवाँ खेत-खार म |


मनखे ल नल अउ बोरिंग मिलगे|

कुवाँ ल भीतरे-भीतर पाताल लिलगे|

कनकी कोदई धोवत नइ दिखे दादी नानी|

अब लगर नहाये नही कोनो राजा रानी |


नवा जमाना ह करे हे,

ओखर हिरदे के चानी|

कुवाँ के ऑसू ए,

 थोर बहुत भराय पानी|


                जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को(कोरबा)

सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा


 सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा


                                सुरता आथे वो बेरा के, जब गाँव के घर,गली,खोर,कोठार, कोला, ब्यारा, बारी  रेडियो के गूँज मा गुंजायमान रहय। तन संग मन घलो रेडियो के गीत संगीत मा बिधुन  होके नाँचे। रेडियो के उहू सोनहा बेरा ला देखे हन जब, घर मा रेडियो नइ राहय ता संगी संगवारी या पारा परोसी घर के चौरा मा बइठ के संझा, बिहना अउ मंझनिया के कतकोन कार्यक्रम के आनंद लेवन। रेडियो ऐसे मनोरंजन के साधन रिहिस जे भले एक घर बजे फेर सुनात भर ले पारा परोसी सबके मनोरंजन करे। एक जमाना मा घरों घर रेडियो घर के कोठ मा अरवाय रहय। आकाशवाणी अउ आंचलिक स्टेशन ले हिंदी, अंग्रेजी अउ छत्तीसगढ़ी मा कतकोन कार्यक्रम आय। हिंदी छत्तीसगढ़ी गीत संगीत, खेती किसानी/ज्ञान विज्ञान/ परब तिहार, संस्कृति-संस्कार के गोठ, रोजगार के अवसर,खेल, समाचार, युवा/ नारी/ लइका अउ सियान मन के कार्यक्रम, नाटक,कहानी,कविता, रूपक,भाव,भजन,खेल कमेंट्री, ------- का का नइ सुनन रेडियों मा। ऐसे नही कि ये सब अब रेडियो मा नइ आय। आजो बरोबर अइसन कतको कार्यक्रम रेडियो मा आथे फेर नवा जमाना के नवा शोरगुल मा दबगे हे। नवा जमाना के नवा नवा ढेंचरा जुन्ना दौर के सोनहा सुरता ऊपर कुंडली मार के बइठ गय हे। रेडियो सुनत सुनत घर के बुता काम अउ बेरा कब बुलके पता नइ लगत रिहिस। सुरता आथे कुनकुन कुनकुन जाड़ के बेरा मा बजत रेडियो अउ बबा के फाँदे दौरी/बेलन। धान कोदो कब मिंजा जाय पता तको नइ चले। जाड़ घरी  कोठार बियारा मा काम कमई के बेरा मा, कमइयां मन बर रेडियो ताकती बरोबर काम करे। घर बनइया मिस्त्री, दर्जी, कुम्हार, लोहार, हजामत बनइया होय या एक जघा बइठ के सिधोय वाले अउ कतकोन काम, रेडियो सबके तीर रहय। पहली रेडियो सेल ले चले,ताहन बिजली ले अउ अब तो मोबाइल मा ही aap के माध्यम ले कतको चैनल संघरा मिल जावत हे, बस छुए करे भर के देरी हे, तभो मनखे मन के रुझान जादा नइ दिखे। चाहे लोकगीत संगीत होय या फिल्मी गीत संगीत/ गजल/ सुगम संगीत-------खांटी रेडियो सुनइया मन ला मुँहअखरा गीत, गीतकार, फिल्म, संगीतकार आदि के नाँव सुरता रहय। आजो जेन रेडियो के वो सोनहा बेरा ला जिये होही, वोखर जेहन मा रेड़ियो के मनभावन रिंगटोन अउ जुन्ना गीत संगीत अंतस जे कोनो कोंटा मा समाय होही। जेन स्टेशन के कार्यक्रम ला सुनना हे, वो स्टेशन के नम्बर मिलाय के अलगे आनन्द रहय। 

                     मनोरंजन, ज्ञान विज्ञान के संगे संग रेडियो घर बइठे राज भर मा संगवारी बना देवय। सुन के अटपटा लगत हे न, फेर ये सच हे। रेडियो मा लगभग सबे कार्यक्रम मा स्रोता मन के चिट्टी पाती आय। कतको नियमित स्रोता मन बरोबर चिट्टी भेजे, उंखर नाम गांव रेडियो के उद्घोषक संग अन्य स्रोता मन ला तको रटा जावत रिहिस।  कोनो गांव मा घुमत घामत जाय बर मिल जाय ता, नाम बताके पूछे मा वो स्रोता मिल घलो जात रिहिस। रेडियो  मोरो कतको झन संगवारी बनाइस, चाहे नवागढ़ मा होय, बालोद मा होय या बरदा लवन मा--- ------। कई बेर तो इही रेडियो संगवारी मन के सेती रद्दा बाट मा आय कोई अड़चन  सहज टर घलो जाय। महुँ रेडियो मा बरोबर चिट्टी लिखँव, उद्घोषक के मुख ले अपन नाँव सुनत अन्तस् अघा जावत रिहिस। उद्घोषक संग सबे स्रोता मन के मन ला आपस मा जोड़ के रखे रेडियो हा। स्रोता मन के सुझाव,शोर खबर, फरमाइस अउ  कतको कार्यक्रम रेडियो के चिट्ठी पाती कार्यक्रम मा आय, जे बड़ मनभावन लगे।

                       रेडियो के चढ़े दीवानगी राजभर मा चारो कोती दिखे। घर- दुवार, गली-खोर संग चाहे होटल ढाबा होय या खेत खार, नदी-ताल या फेर ठेला-मेला। कोई खीसा मा छोटे रेडियो धरके चले ता कोई  बड़े रेडियो ला छोड़े घलो नही। रेडियो सुनत मन मा आय कि रेडियो के वक्ता/कवि/कलाकार/ गायक आदि मन कतिक भागमानी होही जेन ला सरी जमाना शान ले सुनथे। मोर ननपन आकाशवाणी रायपुर के संग बीते हे। रामचरित मानस के दोहा- चौपाई, चौपाल, बालवाटिका, युगवाणी, घर आंगन, मोर भुइँया, गाँव गुड़ी, ग्राम सभा, फोन इन फरमाइस------ अउ कतको कार्यक्रम के रिंग टोन आजो अन्तस् मा गुंजत रथे। रेडियो मा सुने  छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी गीत मन कभू नइ भुलाये, न वो गीत के गीतकार, संगीतकार अउ गायक मन के नाम। मनोरंजन के जब कमती साधन रिहिस ता आकाशवाणी, दूरदर्शन, खेल मदारी, सर्कस----- आदि कतकोन चीज पूरा तन अउ मन ला रच के रंजित करे, आनन्दित करे। फेर जइसे जइसे मनोरंजन के साधन बढ़त गिस, मनोरंजन मन ल छोड़ सिर्फ नयन तक सिमट गिस। नवा जमाना के नवा चोचला मा अरझ रेडियो ले कइसे दुरिहाएंव मोला खुदे पता नइ चलिस?

                          मैं रेडियो मा आय के कभू सोचे घलो नइ रेहेंव, फेर जब तीन चार साल पहली आकाशवाणी बिलासपुर मा मोर कविता रिकार्डिंग होइस तब खुशी के ठिकाना नइ रिहिस। आज  सात आठ पँइत आकाशवाणी बिलासपुर अउ रायपुर  मा कविता/गीत/कहानी पढ़त गावत होगे। नियमित स्रोता के रूप मा खुद ला, आज नइ पाके आत्मग्लानि होथे। मोर ये हाल हे, ता आने ला का कहँव? तभो विश्वास हे जब दर्शन के चीज ले दिल भर जही ता एक घांव फेर श्रवण के वो सुनहरा दौर जरूर आही। भले नवा रूप मा ही सही। जइसे भाजी कोदई, काँदा कूसा, खोंधरा-झोपड़ी,पंगत, धोती कुर्ता कस कतको जुन्ना चीज नवा रूप मा मनखें मन के बीच आवत हे। अपन रंग रूप बदल, धीरे धीरे सबे बने चीज एक घांव अउ लहुटही, आखिर धरती गोल जे हे।

                          विश्व रेडियो दिवस के आप जमो ला सादर बधाई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 24 January 2026

सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा

 सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा


       आज माँदी भात के कोनो पुछारी नइहे, मनखे बफे सिस्टम कोती भागत हे। जिहाँ के साज-सज्जा अउ आनी बानी के मेवा मिष्ठान, खान पान के भारी चरचा घलो चलथे। भले मनखे कहि देथे, कि पंगत म बैठ के खवई म ही आदमी मनके मन ह अघाथे, फेर आखिर म उहू बफे कोती खींचा जथे। मनखे के मन ला कोन देखे हे, आज तन के पहिरे कपड़ा मन के मैल ल तोप देथे। आज कोट अउ सूटबूट के जमाना हे, ओखरे पुछारी घलो हे ,चिरहा फटहा(उज्जर मन) ल कोन पूछत हे। अइसने बफे सिस्टम आय साहित्य अउ साहित्यकार बर सोसल मीडिया। भले अंतस झन अघाय पर पेट तो भरत हे, भले खर्चा होवत हे, पर चर्चा घलो तो होवत हे। कलम कॉपी माँदी बरोबर मिटकाय पड़े हे। 


         सोसल मीडिया के आय ले अउ छाय ले ही पता लगिस कि फलाना घलो कवि, लेखक ए। जुन्ना जमाना के कतको लेखक जे पाठ, पुस्तक, मंच अउ प्रपंच ले दुरिहा सिरिफ साहित्य सेवा करिस, ओला आज कतकोन मन नइ जाने। अउ उँखर लिखे एको पन्ना घलो नइ मिले। फेर ये नवा जमाना म सोसल मीडिया के फइले जाला जमे जमाना ल छिन भर म जनवा देवत हे कि फलाना घलो साहित्यकार ए, अउ ए ओखर रचना। सोसल मीडिया ,साहित्य कार के जरूरत ल चुटकी बजावत पूरा कर देवत हे, कोनो विषय , वस्तु के जानकारी झट ले दे देवत हे, जेखर ले साहित्यकार मन ल कुछु भी चीज लिखे अउ पढ़े  म कोनो दिक्कत नइ होवत हे। पहली  प्रकृति के सुकुमार कवि पंत के रचना ल पढ़ना रहय त पुस्तक घर या फेर पुस्तक खरीद के पढ़े बर लगे, फेर आज तो पंत लिखत देरी हे, ताहन पंत जी के जम्मो गीत कविता आँखी के आघू म दिख जथे। 


             सोसल मीडिया ल बउरना घलो सहज हे, *न कॉपी न पेन-लिख जेन लिखना हे तेन।* शुरू शुरू म थोरिक लिखे पढ़े म अटपटा लगथे ताहन बाद म आदत बनिस, ताहन छूटे घलो नही। सोसल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ साहित्यकार मन भर बर नही,सब बर उपयोगी हे। गूगल देवता बड़ ज्ञानी हे, उँखर कृपा सब उपर बरसत रइथे, बसरते माँग अउ उपयोग के माध्यम सही होय। आज साहित्यकार मन अपन रचना ल कोनो भी कर भेज सकत हे, अपन रचना ल कोनो ल भी देखाके सुधार कर सकत हे। पेपर  अउ पुस्तक म छपाय के काम घलो ये माध्यम ले सहज, सरल अउ जल्दी हो जावत हे। आय जाय के झंझट घलो नइहे। सोसल मीडिया म कोनो भी चीज जतेक जल्दी चढ़थे ,ओतके जल्दी उतरथे घलो, येखर कारण हे मनखे मनके बाहरी लगाव, अन्तस् ल आनंद देय म सोसल मीडिया आजो असफल हे। कोरोनच काल म देख ले रंग रंग के मनखे जोड़े के उदिम आइस, आखिर म सब ठंडा होगे। चाहे कविता बर मंच होय या फेर मेल मिलाप, चिट्ठी पाती अउ बातचीत के मीडिया समूह। पहली कोनो भी सम्मान पत्र के भारी मान अउ माँग रहय फेर ये कोरोना काल के दौरान अइसे लगिस कि सम्मान पत्र फोकटे आय। कोनो भी चीज के अति अंत के कारण बनथे, इही होवत घलो हे सोसल मीडिया म। सोसल मीडिया म सबे मनखे पात्र भर नही बल्कि सुपात्र हे, तभे तो कुछु होय ताहन ,जान दे तारीफ। *वाह, गजब, उम्दा, बेहतरीन जइसे कतको शब्द म सोसल मीडिया के तकिया कलाम बन गेहे।* सब ल अपन बड़ाई भाथे, आलोचना आज कोनो ल नइ रास आवत हे। मनखे घलो दुरिहा म रहिगे कखरो का कमी निकाले, तेखर ले अच्छा वाह, आह कर देवत हे। सात समुंद पार बधाई जावत हे, हैपी बर्थ डे, हैपी न्यू इयर,  हैपी फादर्स डे,हैपी फलाना डे। फेर उही हैपी फादर्स डे या मदर डे लिखइया मन ददा दाई ल मिल के बधाई , पायलागि नइ कर पावत हे, सिर्फ सोसल मीडिया म दाई, ददा, बाई, भाई, संगी साथी के मया दिखथे, फेर असल म दुरिहाय हे। अइसे घलो नइहे कि सबेच मन इही ढर्रा म चलत हे, कई मन असल म घलो अपनाय हे।


       सोसल मीडिया हाथी के खाय के दाँत नइ होके दिखाय के दाँत होगे हे। जम्मो छोटे बड़े मनखे येमा बरोबर रमे हे। सोसल मीडिया साहित्यकार मन बर वरदान साबित होइस। लिख दे, गा दे अउ फेसबुक वाट्सअप म चिपका दे। नाम, दाम ल घलो सोसल मीडिया तय कर देवत हे। सोसल मीडिया म जतका लिखे जावत हे, ओतका पढ़े नइ जावत हे, ते साहित्य जगत बर बने नइहे। ज्ञान ही जुबान बनथे, बिन ज्ञान के बोलना या लिखना जादा  प्रभावी नइ रहे। सोसल मीडिया के उपयोग ल साहित्यकार मन नइ करत हे, बल्कि सोसल मीडिया के उपयोग साहित्यकार मन खुद ल साबित करे बर करत हे, खुद ल देखाय बर करत हे। कुछु भी पठो के वाहवाही पाय के चाह बाढ़ गेहे। कुछु मन तो कॉपी पेस्ट म घलो मगन हे, बस पठोये विषय वस्तु ल इती उती बगराये म लगे हे, वो भी बिन पढ़े। कॉपी पेस्ट म सही रचनाकार के नाम ल घलो कई झन मेटा देवत हे। सोसल मीडिया सहज, सरल, कम लागत अउ त्वरित काम करइया प्लेटफार्म आय, जे साहित्य, समाज, ज्ञान ,विज्ञान के साथ साथ  दुर्लभ जइसे शब्द ल भी हटा देहे। येखर भरपूर सकारात्मक  उपयोग करना चाही। छंद के छ परिवार सोसल मीडिया के बदौलत 300 ले जादा, प्रदेश भर के साधक मन ल संघेरके 50, 60 ले जादा प्रकार के छंद आजो सिखावत हे। 2016 ले  छंदपरिवार सरलग  छत्तीसगढ़ी साहित्य के मानक रूप म  काम  करत हे। इसने लोकाक्षर, गद्य खजाना,आरुग चौरा, हमर गँवई गाँव अउ कई ठन समूह घलो हे जे येखर सकारात्मक उपयोग करत हे। सोसल मीडिया दिखावा के साधन मात्र झन बने।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा

अमीर ए ना--

 अमीर ए ना--


इज्जत गँवाके वो इज्जत वाला हे, अमीर ए ना।

कोन का कहे सबके मुँह मा ताला हे, अमीर ए ना।


बने करइया मन बन बन भटकत रहिथे रात दिन।

पाये आसन काम जेखर काला हे, अमीर ए ना।।


भगत के पथरा मा पात पानी घलो नइ चढ़त हे।

ओखर देवाला मा भगवान बाला हे, अमीर ए ना।


रोज चढ़थे रोज उतरथे कई किसम के नकाब।

उँहचे मरहम, उँहचे बरछी भाला हे, अमीर ए ना।


पानी मिला पी जथे खून,मनखे होय के गुण हे शून।

गिनाये बर धन दोगानी महल माला हे, अमीर ए ना।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

देस बर जीबो , देस बर मरबों

 देस   बर   जीबो , देस  बर  मरबों

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चल माटी के काया ल,हीरा करबों।

देस   बर  जीबो, देस   बर  मरबों।

सिंगार करबों,सोन चिरँइया के।

गुन ल गाबोंन,भारत मइया  के।

सुवारथ के  सुरता ले, दुरिहाके।

धुर्रा चुपर के माथा म,भुँइया के।

घपटे अँधियारी भगाय बर,भभका धरबों।

देस    बर      जीबो, देस    बर     मरबों।


उँच    -  नीच    ल, पाटबोन।

रखवार बन देस ल,राखबोन।

हवा   म      मया ,  घोरबोन।

हिरदे ल हिरदे  ले, जोड़बोन।

चल  दुख - पीरा  ल, मिल  के  हरबों।

देस   बर   जीबों,   देस    बर  मरबों।


मोला गरब - गुमान हे,

ए   भुँइया   ल  पाके।

खड़े   रहूं   मेड़ो   म ,

जबर छाती फइलाके।

फोड़ दुहूँ वो आँखी ल,

जे मोर माटी बर गड़ही।

लड़हूँ  -  मरहूँ  देस बर ,

तभे काया के करजा उतरही।

तँउरबों बुड़ती समुंद म,उग्ति पहाड़

चढ़बों।

चल   देस    बर   जीबो,   देस   बर  

मरबों।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा) 

09981441795

गणतंत्रता दिवस की ढेरों बधाइयाँ

Thursday, 22 January 2026

चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

 बसंत

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चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  -  घरी।


मोहे   मन   मोर   मउरे,मउर आमा के।

मधूबन कस लागे,मोला ठउर आमा के।

कोयली   कुहके  ,कूह - कूह   डार  म।

रंग-रंग के फूले हे,परसा-मउहा खार म।

बोइर-बर-बंम्भरी बर,बरदान बने बसंत।

सबो   रितुवन  म , महान  बने   बसंत।

मुड़ नवाये डोले पाना,तरी-तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  - घरी।


डोलत हे  जिवरा देख,सरसो  फूल  पिंवरा।

फूल - फर  धरे नाचे ,  राहेर, मसूर, तिवरा।

घमघम  ले   फूले  हे,  अरसी       मसरंगी।

हंरियर गंहूँ-चना बीच,बजाय धनिया सरँगी।

सुहाये  खेत -खार , तरिया - नंदिया कछार।

नाचे  सइगोन-सरई  डार, तेंदु-चिरौंजी-चार।

सुघरई बरनत पिरागे,नरी-नरी।

पूर्वा   गाये   गाना , घरी -घरी।


गोभी-सेमी-बंगाला,निकलत हे बारी म।

रोजेच साग चूरत हे, सबो  के हाँड़ी म।

छेंके  रद्दा रेंगइया ल, हवा अउ बंरोड़ा।

धरे नंगाडा पारा म , फगुवा डारे डोरा।

गाँव लहुटे सहर,अब दुरिहात हे बसंत।

जुन्ना पाना-पतउवा ल,झर्रात हे बसंत।

नवा - नवा  प्रकृति  ल,बनात हे बसंत।

खुदे  रोके;मनखे   बर, गात  हे बसंत।

कर्मा-ददरिया-सुवा,तरी-हरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी-घरी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795