Wednesday, 17 June 2026

बढ़त चमचाई- लावणी छंद

 बढ़त चमचाई- लावणी छंद


घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।

अउ बाहिर मा रिस्ता जोड़े, रातउ दिन चमचाई ले।।


बात बात मा मुँहफट होके, नियम धियम गनवात रथे।

हक के बात घरे मा करथे, बाहिर मुड़ी नवात रथे।।

कथनी करनी जेखर करिया, ओहर बड़े कन्हाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


ददा बनावत हे आने ला, दरदर भटका खावत हे।

देखावा के नत्ता जोरे, कुकुर बरोबर धावत हे।।

बाज आत नइहे धक्का खा, रहि रहि पुछी हलाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।


चमचागिरी बढ़त हे भारी, आघू अउ अब का होही।

स्वभिमानी गिनके बाचे हे, कोन सुमत समता बोही।।

सत के बाना कोन थामही, उबर खुशामद खाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

बरसात (गीतिका छ्न्द)

 बरसात (गीतिका छ्न्द)


घन घटा घनघोर धरके, बूँद बड़ बरसात हे।

नाच के गाके मँयूरा, नीर ला परघात हे।

खेत पानी पी अघागे, काम के हे शुभ लगन।

दिन किसानी के हबरगे, कहि कमैया हें मगन।।


ढोंड़िहा धमना हा भागे, ए मुड़ा ले ओ मुड़ा।

साँप बिच्छू बड़ दिखत हे, डर हवैं चारो मुड़ा।

बड़ चमकथे बड़ गरजथे, देख ले आगास ला।

धर तभो नाँगर किसनहा, खेत बोंथे आस ला।


घूमथे बड़ गोल लइका, नाचथें बौछार मा।

हाथ मा चिखला उठाके, पार बाँधे धार मा।

जब गिरे पानी रदारद, नइ सुनें तब बात ला।

नाच गाके दिन बिताथें, देख के बरसात ला।


लोग लइका जब सनावैं, धोयँ तब ऍड़ी गजब।

नाँदिया बइला चलावैं, चढ़ मचें गेड़ी गजब।

छड़ गड़उला खेल खेलैं, छोड़ गिल्ली भाँवरा।

लीम आमा बर लगावैं, अउ लगावैं आँवरा।।


ताल डबरी भीतरी ले, बोलथे टर मेचका।

ढेंखरा उप्पर मा चढ़के, डोलथे बड़ टेटका।

खोंधरा झाला उझरगे, का करे अब मेकरा।

टाँग के डाढ़ा चलत हें, चाब देथें केकरा।।


पार मा मछरी चढ़े तब, खाय बिनबिन कोकड़ा।

रात दिन खेलैं गरी मिल, छोकरा अउ डोकरा।

जब करे झक्कर झड़ी, सब खाय होरा भूँज के।

पाँख खग बड़ फड़फड़ाये, मन लुभाये गूँज के।।


खेत मा डँटगे कमैया, छोड़ के घर खोर ला।

लोर गेहे बउग बत्तर, देख के अंजोर ला।

फुरफुँदी फाँफा उड़े बड़, अउ उड़ें चमगेदरी।

सब कहैं कर जोर के घन, झन सताबे ए दरी।


होय परसानी गजब जब, रझरझा पानी गिरे।

काखरो घर ओदरे ता, काखरो छानी गिरे।

सज धरा सब ला लुभावै, रूप हरिहर रंग मा।

गीत गावै नित कमैया, काम बूता संग मा।


ओढ़ना कपड़ा महकथे, नइ सुखय बरसात मा।

झूमथें भिनभिन अबड़, माछी मछड़ दिन रात मा।

मतलहा पानी रथे, बोरिंग कुवाँ नद ताल के।

जर घरो घर मा हबरथे, ये समै हर साल के।


चूंहथे छानी अबड़, माते रथे घर सीड़ मा।

जोड़ के मूड़ी पुछी कीरा, चलैं सब भीड़ मा।

देख के कीरा कई, बड़ घिनघिनासी लागथे।

नींद घुघवा के परे नइ, रात भर नित जागथे।


नीर मोती के असन, घन रोज बरसाते हवे।

मन हरेली तीज पोरा, मा मगन माते हवे।

धान कोदो जोंधरी, कपसा तिली हे खेत मा।

लहलहावै पा पवन, छप जाय फोटू चेत मा।


बूँद तक बरसै नही, कतको बछर आसाढ़ मा।

ता कभू घर खेत पुलिया, तक बहे बड़ बाढ़ मा।

बाढ़ अउ सूखा पड़े ता, झट मरे मन आस हा।

चाल के पानी गिरे तब, भाय मन चौमास हा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद

 चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद


पानी गिरे चौमास मा, बादर करे गड़गड़ गजब।

जिवरा डरे सुनके अजब, बिजुरी करे कड़कड़ गजब।


छाये घटा घनघोर अउ, टकराय घन आगास मा।

बिजुरी गिरे के डर रथे, चारो डहर चौमास मा।।


का जानवर अउ का मनुष, सब बर बिजुरिया काल हे।

घर बन घलो जाथे उजड़, बिजुरी बिकट जंजाल हे।।


गिरही कते कोती बिजुरिया, ये समझ मा आय ना।

फोकट मरे झन पेड़ पउधा ना मनुष गरु गाय ना।।


खींचे बिजुरिया ला अपन कोती सुचालक चीज हर।

रहिथे तड़ित चालक जिहाँ तौने सुरक्षित गाँव घर।।


यमराज बनके गिर जथे, अउ प्राण ला लेथे झटक।

पानी गिरत रहिथे गजब ता, बाग बन मा झन भटक।।


बादर गजब गर्जन करे तब, टेप टीवी बंद रख।

नित होश मा रहि काम कर, मुख मा कहानी छंद रख।।


बाहिर हवस ता बैठ उखड़ू, मूंद के मुँह कान ला।

रख जानकारी सावधानी अउ बचाले जान ला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)शीर्षक

हम नहीं

 हम नहीं


रिश्ते बिगड़ने का किसी को कोई ग़म नहीं।

आज सबको सिर्फ़ पैसा चाहिए, हमदम नहीं।।


खंजर से खुदे ज़ख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

ज़ुबां से बढ़कर ज़माने में कोई बारूद-बम नहीं।।


खुद को राजा समझ रहे हैं रील वाले।

रीयल में उनमें ज़रा-सा भी दम नहीं।।


एकता, अखंडता, भाईचारा — सब दिखावा है।

ज़हर जाति-धर्म का हो रहा है कम नहीं।।


पता नहीं, ये पैमाना है या मौकापरस्ती।

देश संविधान से चलेगा, पर हम नहीं।।


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)

Tuesday, 16 June 2026

जिंदा राखेल लगही-गीत

 जिंदा राखेल लगही-गीत


अधमी अत्याचारी मन बर, निंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


बइरी हरहा मन ला, मनाके  रखे बर।

मनखे ला मनखे कस, बनाके के रखे बर।।

धरम करम ला बाँध नियम मा, सोच उछिंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


अवइया पीढ़ी मा, मानवता भरे बर।।

जानवर अउ मनखें मा, भेद करे बर।।

मन मा आस विश्वास राम गोविंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


नता रिस्ता अउ छोटे बड़े के, लिहाज बर।

देखावा मा चूर उड़त मनखें, रंगबाज बर।।

दंभ दुराचारी बधे बर, किष्किन्धा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सुविधा दुविधा-सार छंद

 सुविधा दुविधा-सार छंद


सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।

प्राण ल सीधा हर लेवत हे , आजकाल के गाड़ी।।


खपरा छाये माटी के घर, गर्मी मा मन भाये।

बिन कूलर पंखा एसी के , नींद ससन भर आये।।

छत के घर हा भभके भारी, नइहे ब्यारा बाड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


जतके सुविधा बढ़त जात हे, ततके दुविधा बाढ़े।

समय बचाके घलो मनुष मन, बोकबाय हें ठाढ़े।।

बम बारुद अउ यंत्र तंत्र ला, देख जुड़ाथे नाड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


हवै आसरा कम जीये के, कलजुगिया बेरा मा।

रास रसायन बढ़त जात हे, मौत हवै डेरा मा।।

फेक देय हन जुन्ना चीज ल, कहिके कचरा काड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कुंडलियाँ-भीड़

 कुंडलियाँ-भीड़ 


बाबा मन हा बाप कस, देवत हें उपदेश।

धरम करम ले मुक्ति कहि, होय मनुष मन पेश।

होय मनुष मन पेश, भीड़ के हिस्सा बनके।

भीड़ भाड़ ला देख, चले बाबा मन तनके।।

बिना भीड़ नइ होय, मदीना काशी काबा।

जाति धरम के नाम, सबे कोती हे बाबा।।


झंडा डंडा भीड़ बिन, मान कहाँ ले पाय।

बने बने मा हे बने, गिनहा मा हे बाय।।

गिनहा मा हे बाय, भीड़ हा भेड़ ताय जी।

सहमति साथ विरोध, सबे बर भीड़ आय जी।

मेला नेता खेल, संत राजा का पंडा।

सब ला चाही भीड़, भीड़ हे ता हे झंडा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सब बण्ठाधार होगे

 सब बण्ठाधार होगे


दहीं के जघा कपसा माढ़े हे।

देवता के जघा रक्सा ठाढ़े हे।

दवा अउ दुवा थोरको भी, काम नइ आत हे।

जरूरतमंद के राशनकार्ड म, नाम नइ आत हे।

मिर्चा मिट्ठा होगे, नून जमकरहा झार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।


मार मा झरगेहे, ढोलक तबला के खरवन।

ददा दाई ला तपत हे, आज के सरवन।

नाम के नदियाँ हे, जिहाँ पानी के नाम नही।

कोड़िहा मन काटे फर्जी,कमैया बर काम नही।

घर मा बारी बखरी दबगे, बंजर खेत खार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


मनखे दवा ल मजबूरी मा,अउ दारू ल हाँस के पीयत हे।

कोई जीये बर खात हे, ता कतको खाय बर जीयत हे।

शहर के सताये सर्व सुविधा गाँव खोजत हे।

गाँव के लफरहा, पिज़्ज़ा बर्गर बोजत हे।

हँसिया बसुला भोथरागे,मनखे मन कटार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


भँइसा के भाग म, स्विमिंग पूल हे।

तितली भौरा मरे,माछी बर फूल हे।

बेंदरा बइठे हे, परवा छानी मा।

झगरा फदके हे, जेठानी देरानी मा।

करधन ककनी ले वजनी, झुमका ढार होगे ।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


खजाना वाले, चिख चिख के खात हे।

भुखाय मनखे चीख चीख चिल्लात हे।

बूता के मारे कखरो,माँस नइहे।

ता कखरो तन मा, अमात नइहे।

निच्चट सरहा, नत्ता रिस्ता के तार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


राजा घोड़ा छोड़, गदहा चढ़त हे।

सत स्वाहा होवत हे,बुराई बढ़त हे।

एक दूसर के ला खात हे, ता एक ला दूसर खवात हे।

बने मनखे बीच के,घानी के बइला कस पेरात हे।

बिन लड़े भिड़े, सिपइहा के हार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


मनखे आन लाइन गुलाम होगे।

मोबाइल धरे सुबे ले शाम होगे।।

भीड़ घलो गोठियात नइहे।

नता गोत्ता सुहात नइहे।

रमजत हे घेरी बेरी आँखी अउ बाटा ला।

बुता  सब माड़े हे उरकात हे डाटा ला।

लाइक कमेंट चाहे ते साहित्यकार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सत्ता- कुंडलियाँ

 सत्ता- कुंडलियाँ


सत्ता बदलत देर हे, नइ दे कोनो साथ।

बदल लिही पाला अपन, मान आन ला नाथ।।

मान आन ला नाथ, तोर बर गड्ढा खनही ।

ताज तोरन छोड़, बचे नइ पग के पनही।।

राजनीति के खेल, आय पुरवा अउ पत्ता।

हे तब तक जयकार, हाथ हे जब तक सत्ता।।1


मुद्दा पंथ विचार ना, ना सत सुम्मत आय।

देख ताख के फायदा, नेता मन तिरियाय।।

नेता मन तिरियाय, देख के दल अउ बल ला।

निर्लज बन मुस्काय, भुला के करनी कल ला।।

सत्ता आघू दूम, हलावँय खाकें हुद्दा।

काय मान सम्मान, काय उंखर बर मुद्दा।।2


कुकुर घलो हा जानथे, पालिस पोसिस कोन।

राजनीति के खेल मा, का कौड़ी का सोन।।

का कौड़ी का सोन, मोल नइ चिन्हें सत्ता।

का सग अउ का आन, काम नइ आये नत्ता।।

होवत हे बदनाम, आज के संग कलो हा।

नेता जाथें भूल, चिन्हथे कुकुर घलो हा।।3


खेमा बदलैं हार मा, जीते अधम मचाय।

धरम करम ईमान नइ, उहिमन नेता ताय।।

उहिमन नेता ताय, जेन ला कुछ नइ लागे।

एती ओती होत, अपन धुन मा बस भागे।।

भूला तैं अउ तोर, जियत रहिथें नित में मा।

आयँ घलो नइ लाज, हार मा बदलैं खेमा।।4


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

बाल्को कोरबा(छग)

गत तरिया के (दोहा चौपाई)

 गत तरिया के (दोहा चौपाई)


*तरिया के गत देख के, देथँव मुँह ला फार|*

*एक समय सबझन जिहाँ, लगर नहावै मार|*


*आज हाल बेहाल हे, लिख के काय बताँव।*

*जिवरा थरथर काँपथे, सुन तरिया के नाँव।*


कोन जनी काखर हे बद्दी। तरिया भीतर बड़ हे लद्दी।

सुते ढ़ोड़िहा लामा लामी। धँसे मोंगरी रुदवा बामी।।


तुलमुलाय बड़ मेंढक मछरी। काई मा रचगे हे पचरी।

घोंघा घोंघी जोक जमे हे। सुँतई भीतर जीव रमे हे।


कमल सिंघाड़ा जलकुंभी जड़। पानी उप्पर फइले हे बड़।

उरइ ओगला कुकरी काँदा। लामे हावै जइसे फाँदा।।


टूट गिरे हे बम्हरी डाला। पुरे मेकरा जेमा जाला।

सड़ सड़ मरगे थूहा फुड़हर। सांस आखरी लेय कई जर।


गाद ढेंस चीला हे भारी। नरम कई ता कुछ जस आरी।

जड़ उपजे हे कई किसम के। थकगे हावै पानी थमके।


घाट घठौंदा काँपत हावय। जघा केकड़ा नापत हावय।

तुलमुल तुलमुल करे तलबिया। उफले हे मंजन के डबिया।


भैंसा भैंसी तँउरे नइ अब। मनुष कमल बर दँउड़े नइ अब।

कोन पोखरा जरी निकाले। कोन फोकटे आफत पाले।।


किचकिच किचकिच करे केचुआ। पेट गपागप भरे केछुवा।

चले नाँव कस कीरा करिया। रदखद लागै अब्बड़ तरिया।


बतख कोकडा अउ बनकुकरी। दिखय काखरो नइ अब टुकड़ी।

चिरई चिरगुन डर मा काँपे। मनुष तको कोई नइ झाँके।


*दहरा हे लहरा नही, पानी हे जलरंग।*

*जड़ अउ जल के बीच मा, छिड़े हवै बड़ जंग।।*


*पानी के जस हाल हे, तस फँसगे हे पार।*

*कीरा काँटा काँद धर, पारत हे गोहार।।*


पार तको के हालत बद हे। काँटा काँद उगे रदखद हे।

खजुर केकड़ा चाँटा चाँटी। पार उपर पइधे हे खाँटी।।


बम्हरी बोइर अमली बिरवा। बेला मा ढँकगे हे निरवा।

हवै मोखला गुखरू काँटा। चारो कोती हे बन भाँटा।


सोये जागे आड़ा आड़ी। हवै बेसरम अब्बड़ भारी।

झुँझकुर छँइहा बर पीपर के। सुरुज देव तक भागे डरके।


हले हवा मा झूला बर के। फंदा जइसे सर सर सरके।

मटका पीपर मा झूलत हे। पासा जइसे फर ढूलत हे।


बिच्छी रेंगे डाढ़ा टाँगे। चाबे ते पानी नइ माँगे।।

घिरिया झींगुर उद बनबिल्ली। करे रात दिन चिल्लम चिल्ली।


बिखहर नागिन बिरवा नाँपे। देख नेवला थरथर काँपे।

हे दिंयार मन के घरघुँदिया। सरपट दौड़त हे छैबुँदिया।


घउदे हे बड़ निमवा बुचुवा। भिदभिद भिदभिद भागे मुसुवा।

फाँफा चिटरा मुड़ी हलाये। घर खुसरा घुघवा नरियाये।।


भूत प्रेत के लागे माड़ा। कुकुर कोलिहा चुँहके हाड़ा।

डर मा कतको मनुष मरे हे। कतको कइथे जीव परे हे।


देख जुड़ा जावै नस नाड़ी। पार उपर के झुँझकुर झाड़ी।

काल ताल मा डारे डेरा। नइ लगाय मनखे मन फेरा।


*मन्दिर तरिया पार के, हे खँडहर वीरान।*

*पानी बिन भोला घलो, होगे हे हलकान।*


*तरिया आना छोड़ दिस, जबले मनखे जात।*

*तबले खुशी मनात हे, जींव जंतु जर पात।।*


मनखे के नइ पाँव पड़त हे। जींव जंतु जर पेड़ बढ़त हे।

मछरी मेढक बड़ मोटावै। कछुवा पथरा तरी उँघावै।।


करे साँप हा सलमिल सलमिल। हांसे कमल बिहनिया ले खिल।

पेड़ पात घउदत हे भारी। पटय सबे के सब सँग तारी।


रंग रंग के फुलवा महके। चिरई चिरगुन चिंव चिंव चहके।

खड़े पेड़ सब मुड़ी नँवाके, गूँजै सरसर गीत हवा के।


तिरथ बरोबर राहय तरिया। नाहै जिहाँ गोरिया करिया।

बइला भैसा मनखे बूड़े। दया मया सब उप्पर घूरे।।


दार चुरे तरिया पानी मा। राहै शामिल जिनगानी मा।

करे सबो झन दतुन मुखारी। नाहै धोवै ओरी पारी।


घाम घरी दुबला हो जावै। बरसा पानी पी मोटावै।

लहरा गावै गुरतुर गाना। मछरी कस तँउरे बर पाना।


सुबे शाम डुबके लइका मन। तन सँग मन तक होवै पावन।

छोटे बड़े सबे झन नाहै। तरिया के सुख सब झन चाहै।


अब होगे घर मा बोरिंग नल। चौबिस घण्टा निकलत हे जल।

आगे हे अब नवा जमाना। नाहै घर मा दादा नाना।


हाँसय सब सुख सुविधा धरके। मनखे मन अब होगे घर के।

शहर लहुटगे गाँव जिहाँ के। हाल अइसने हवै तिहाँ के।।


मनखें बिन कई ताल बढ़त हें। जीव जंतु नव आस गढ़त हें।

ता कतको ठन रोयँ पटाके। मनखें के स्वारथ मा आके।।


*नेता मन जुरियाय हें, देख ताल के हाल।*

*तरिया ला सुघराय बर, फेकत हावै जाल।*


*जीव जंतु मरही गजब, कटही कतको पेड़।*

*हो जाही क्रांकीट के, घाट घठौदा मेड।।*


*सुंदरता जब के नाम मा, मनखे करही राज।*

*बिन मनखें झुमरत हवैं, पेड़ पात मन आज।*


नदी ताल बन नाँचथें, जब मनखें दुरिहाय।

फकत मनुष के जात, पर्यावरण मताय।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

स्कूल जाबों-लावणी छंद

 स्कूल जाबों-लावणी छंद


गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।

घण्टी तख्ता कुर्सी टेबल, आँखी आघू झूलत हे।।


खाना पानी पुस्तक कॉपी, सब हियाव कर धरना हे।

खेल कूद अब कमती करके,पढ़ई लिखई करना हे।।

भारी भरकम बस्ता हावय, साँस देख के फूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


बनही कतको झन स्कूल म, नवा नवा संगी साथी।

सबो किसम के ज्ञान ल पाबों, नइ छूटे माँछी हाथी।।

जघा जघा स्कूल खुले ले, अँधियारी पट धूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


पढ़बों लिखबों आघू बढ़बों, देखे सपना सिरजाबों।।

पढ़े लिखे के मोल गजब हे, पढ़ लिख ज्ञानी कहिलाबों।।

पढ़े लिखे ते छुवै अगासे, पढ़े नही ते ढूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Thursday, 11 June 2026

सन्त कवि सतगुरु कबीरदास जी महराज अउ छत्तीसगढ़-खैरझिटिया

 सतगुरु कबीर साहेब प्राकट्य दिवस के बहुत बहुत बधाई---


सन्त कवि सतगुरु कबीरदास जी महराज अउ छत्तीसगढ़-खैरझिटिया


                   संत कवि सतगुरु कबीर दास जी महाराज के नाम जइसे ही हमर मुखारबिंद म आथे, त ओखर जीवन-दर्शन, साखी-शबद अउ जम्मों सीख सिखौना नजर आघू झूल जथे। *वइसे तो कबीरदास जी के अवतरण हमर राज ले बाहिर होय रिहिस, तभो ले, सन्त कवि कबीर दास जी अउ ओखर शिक्षा दीक्षा हमर छत्तीसगढ़ म अइसे रचबस गिस, जेला देखत सुनत कभू नइ लगिस कि कबीरदास जी आन राज के सिध्द संत रिहिन।* सतगुरु कबीर दास जी के नाम छत्तीसगढ़ भर म रोज सुबे शाम गूँजत रहिथे। इहाँ के बड़खा आबादी कबीरपंथी हें, जेला कबीरहा घलो कहिथें,येमा कोनो जाति विशेष नही, बल्कि सबे जाति धरम के मनखे मन कबीर साहब के पंथ ल स्वीकारे हें। छत्तीसगढ़ ल कबीरमय करे म कबीर दास जी के पट चेला धनी धरम दास(जुड़ावन साहू) जी के बड़खा योगदान हे। सुने म मिलथे कि , एक बेर कबीरदास जी नानक देव संग पंथ के प्रचार प्रसार बर छत्तीसगढ़ के गौरेला पेंड्रा म अपन पावन पग ल मढ़ाये रहिन हे, उही समय ,जुड़ावन साहू जी कबीरदास जी ले अतका प्रभावित होइस कि अपन जम्मों धन दौलत ल कबीरदास के चरण कमल म अर्पित कर दिन, अउ ओखर दास बनगिन(जुड़ावन दीक्षा पाके धरम दास होगिन)। अउ हमर परम् सौभाग्य कि धनी धरम दास जी महाराज अपन गद्दी छत्तीसगढ़ म बनाइन, अउ इँहिचे रहिके कबीरपंथ ल आघू बढ़ाइन, अउ छत्तीगढ़िया मन अड़बड़ संख्या म जुड़िन घलो। धनी धरम दास जी ह कबीर के मुखाग्र साखी शब्द मन ल अपन कलम म ढालिस, ओ भी  हमर महतारी भाषा छत्तीसगढ़ी म। वइसे तो कबीरदास जी के भाषा  ल पंचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी कहे जाथे, तभो ओखर प्रकशित पोथी म छत्तीसगढ़ी के प्रभाव दिखतेच बनथे--


धनी धर्मदास जी के कुछ छतीसगढ़ी पदः-


मैं तो तेरे भजन भरोसो अविनाशी

तिरथ व्रत कछु नाही करे हो

वेद पड़े नाही कासी

जन्त्र मन्त्र टोटका नहीं जानेव

नितदिन फिरत उदासी

ये धट भीतर वधिक बसत हे

दिये लोग की ठाठी

धरमदास विनमय कर जोड़ी

सत गुरु चरनन दासी

सत गुरु चरनन दासी

**


आज धर आये साहेब मोर। 

हुल्सि हुल्सि घर अँगना बहारौं, 

मोतियन चऊँक पुराई। 

चरन घोय चरनामरित ले हैं 

सिंधासन् बइ ठाई। 

पाँच सखी मिल मंगल गाहैं, 

सबद्र मा सुरत सभाई।

**


संईया महरा, मोरी डालिया फंदावों। 

काहे के तोर डोलिया, काहे के तोर पालकी 

काहै के ओमा बाँस लगाबो 

आव भाव के डोलिया पालकी 

संत नाम के बाँस लगावो 

परेम के डोर जतन ले बांधो, 

ऊपर खलीता लाल ओढ़ावो 

ज्ञान दुलीचा झारि दसाबो, 

नाम के तकिया अधर लगावो 

धरमदास विनवै कर जोरी, 

गगन मंदिर मा पिया दुलरावौ।"


ये पद मन पूर्णतः सतगुरु कबीरदास जी ले ही प्रभावित हे,


              धनी धरम दास जी के जनम घलो छत्तीसगढ़ ले इतर मध्यप्रदेश(उमरिया) म होय रहिस, फेर वो जुन्ना समय म मध्यप्रदेश के  मेड़ो तीर के गांव  सँग गौरेला पेंड्रा के जम्मो इलाका बिलासपुर के सँग जुड़े रहय, तेखर सेती धनी धरमदास जी म छत्तीगढ़िया पन कूट कूट के भरे रिहिस। अउ जब कबीर के साखी शबद रमैनी मन ल धनी धरम दास जी पोथी म उतारिन, त वो  जम्मों छत्तीगढ़िया मनके अन्तस् म सहज उतरगे। 


                   धनी धरम दास जी के परलोक गमन के बाद, ओखर सुपुत्र चूड़ामणि(मुक्तामणि नाम साहेब) साहब घलो छत्तीसगढ़ म ही कबीर पंथ के गद्दी ल सँभालिन, अउ कोरबा जिला के कुदुरमाल गाँव म अपन गद्दी बनाइन, कुदुरमाल के बाद कबीर गद्दी परम्परा आघू बढ़त गिस अउ रतनपुर, मण्डला, धमधा, सिंगोढ़ी, कवर्धा म घलो गुरुगद्दी बनिस। चूड़ामणि साहेब के बाद ओखर सुपुत्र सुदर्शन नाम साहेब रतनपुर म गुरुगद्दी परम्परा के निर्वहन करिन, तेखर बाद कुलपति नाम साहेब, प्रमोध नाम साहेब, केवल नाम साहेब -----आदि आदि गुरु मनके सानिध्य म कबीरपंथ छत्तीसगढ़ म फलन फूलन लगिस। *गुरुगद्दी के 12वा  गुरु महंत अग्रनाम साहेब ह दामाखेड़ा म धनी धरम दास जी महाराज के मठ सन 1903 म स्थापित करिन, जिहाँ आजो कबीरपंथी मनके विशाल मेला भराथे।* वइसे तो कबीर पंथ के मुख्यालय सन्त कवि कबीरदास जी के नाम म बने जिला कबीरधाम जिला म हे, फेर कबीर पंथी मन छत्तीसगढ़ के चारो मुड़ा म समाये हें। 


                   धनी धरम दास जी ल दक्षिण के गुरुगद्दी के कमान सौपत बेरा कबीरदास जी भविष्यबानी करे रिहिन कि, धरम दास जी के नेतृत्व म कबीरपंथ खूब  फलही फुलही, अउ उही होइस घलो। *धनी धरम दास जी, कबीर साहेब के आशीर्वाद ले ,कबीर पंथ के 42 गुरुगद्दी के स्वामी मनके नाम लिख के परलोक गमन करे रिहिन। वर्तमान म 14 वाँ गुरुगद्दी के स्वामी प्रकाशमुनि नाम साहेब जी हे।* छत्तीसगढ़ के कबीरपंथी मन कबीरदास जी महाराज के नीति नियम ल हृदय ले स्वीकार करथें, अउ सुख दुख सबे बेरा कबीरदास जी महाराज के नाम लेथें। छत्तीसगढ़ म कबीरपंथी समुदाय म चौका आरती के परम्परा हें, जेमा कबीर साहेब के साखी शबद गूँजथें। कबीरपंथी छत्तीसगढ़ के उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम चारो मुड़ा सहज मिल जथे, अउ जेमन कबीर पंथी नइहे उहू मन कबीरदास जी के सीख सिखौना ल नइ भुला सकें। सबे जाति वर्ग समुदाय म कबीरदास जी महाराज के छाप हे। छत्तीसगढ़ भर म कबीर जयंती धूमधाम ले मनाये जाथे। जघा जघा मेला भराथे। *दामाखेड़ा, कुदुरमाल, कवर्धा, सिरपुर,नांदिया, खरसिया* आदि जघा कबीरपंथी मनके पावन तीर्थ आय, जिहाँ न सिर्फ कबीर पंथी बल्कि जम्मो जाति समुदाय सँकलाथे।


           कबीरदास जी दलित शोषित मनके मसीहा, पीड़ित मनके उद्धारक, दबे कुचले मनके आवाज रिहिन, सामाजिक अन्याय अउ विषमता के  घोर विरोधी अउ न्याय संग समता के संस्थापक रिहिन। तेखरे सेती न सिर्फ हिन्दू मन बल्कि मुस्लिम अउ ईसाई मन घलो कबीरदास जी के अनुसरण करिन। कबीरदास जी के दोहा, साखी सबद न सिर्फ कबीरपंथी बल्कि छत्तीसगढ़ के घरों घर म टीवी रेडियो टेप टेपरिकार्डर के माध्यम ले मन ल बाँधत सरलग सुनाथे। कबीरदास जी महराज धनी धरम दास जी कारण छत्तीसगढ़ के कण कण म विराजित हे। कबीरदास जी के दोहा साखी सबद मनके कोनो सानी नइहे, विरोध के सुर के संगे संग जिनगी जिये के सार जम्मो छत्तीगढ़िया मन ल अपन दीवाना बना लेहे। पूरा भारत भर म छत्तीसगढ़ म ही कबीर पंथ के सबले जादा आश्रम अउ गद्दी संस्थान हे। कतको छत्तीगढ़िया मन आपस म *साहेब* कहिके सुबे शाम अभिवादन करथें। जनश्रुति के अनुसार कबीर साहेब के कबीरधाम जिला मा घलो आय जे बात पता चलथे। हमर छत्तीसगढ़ मा कबीरदास जी के नाम मा कबीरधाम जिला हे संगे संग गांव शहर गली खोर मा रामायण मण्डली, भजन मंडली, नाच पार्टी, चौक चौराहा, आश्रम, स्थल, पुस्तकालय, नगर, भवन, घर, दुकान सबे मा कबीर साहब के नाम समाहित हे। कबीर दास जी महाराज भक्ति के कभू विरोध नइ करिन, बल्कि भक्ति के नाम मा पैठ जमाये आडम्बर अउ देखावा ला कोसिन। कबीर साहब जी ला नमन करत, मोर कुछ कुंडलियाँ------


धरहा करके लेखनी, कहिन बात ला सार।

सत के जोती बार के, दुरिहाइन अँधियार।

दुरिहाइन अँधियार, सुरुज कस संत कबीरा।

हरिन आन के पीर, झेल के खुद दुख पीरा।

एक तुला सब तोल, बताइन बढ़िया सरहा।

करिन कलह मा वार, बात कहिके बड़ धरहा।


बानी संत कबीर के, दुवा दवा अउ बान।

साधु सुने सत बात ला, लोभी तोपे कान।

लोभी तोपे कान, कहे जब गोठ कबीरा।

लोहा होवय सोन, चमक खो देवय हीरा।

तन मन निर्मल होय, झरे जब अमरित पानी।

तोड़य गरब गुमान, कबीरा के सत बानी।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

असाढ़ म पानी-सार छंद(जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया")

असाढ़ म पानी-सार छंद(जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया")

जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।
निकले कई किसम के कीरा, रेंगय मुँह ला फारे।

रंग रंग के साँप निकलथे, रंग रंग के कीरा।
सावचेत नइ रहे म होथे, तन मन ला बड़ पीरा।
भरका बिला म पानी भरथे, गिल्ला रहिथे मिट्टी।
सरपट सरपट भागत दिखथे, इती उती पिरपिट्टी।
कीरा काँटा साँप बिच्छु ले, कतको जिनगी हारे।
जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।

वाईपर अजगर सँग डोमी, माम्बा अउ मुड़हेरी।
सुतत उठत बस झूलत रहिथे, नयन म घेरी बेरी।
फिरे करैत ढोड़िहा धमना, जिया देख के काँपे।
बारिस घरी काल बन घूमय, कई किसम के साँपे।
ठौर ठिहा बन खेत खार में, रइथे डेरा डारे।
जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।

फाँफा फुरफुन्दी चमगादड़, झिंगुरा मुसवा चाँटा।
कान खजूरा बत्तर अँधरी, बिच्छी कीरा काँटा।
डाढ़ा टाँग केकरा रेंगय, मेंढक टरटर बोले।
किलबिल किलबिल कीरा करथे, देखत जिवरा डोले।
झन सोवव बिन खाट धरा में, रेंगव नयन उघारे।
जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

पानी होगे हे का?

 पानी होगे हे का?

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पानी  होगे  हे का,  खून  छत्तीसगढ़िया  के?

कहॉगे ऊबाल अऊ जुनून छत्तीसगढ़िया के?


ये जंगल अऊ जमीन तोर ए|

ये  रात  अऊ  दिन   तोर ए |

धूर्रा चंटाये हस,बड़े-बड़े ल |

दूसर झोरत हे,तोर रॉधे गढ़े ल|

सिरागे बासी अउ,नून छत्तीसगढ़िया के|

पानी होगेहे का,खून छत्तीसगढ़िया के?


अघुवा बेटा पिछलग्गू होगे|

बारूद के गोला लड्डू होगे|

अलगागे जेन संघरा राहय|

ऑखी जेखर अँगरा राहय|

बोले नही दूसर,बोली सुन छत्तीसगढ़िया के|

पानी  होगे  हे  का, खून  छत्तीसगढ़िया के?


गुलामी के बूबू,चॉब देहे सबला|

दूसर के धुन म,बजात हे तबला|

वो मेंछा के ताव कहॉ हे?

लड़ईया मरईया गॉव कहॉ हे?

का करना कहिके काया म,

लगगे घुन छत्तीसगढ़िया के..|

पानी होगे हे का,खून छत्तीसगढ़िया के?


पछाड़ के सबला,अघवाएल पड़ही|

कतका दम हे, तेला देखाएल पड़ही|

खात हस तेला छूटना हे|

सबला अब जुटना हे|

तभे गाही सब गुन छत्तीसगढ़िया के..|

पानी होगेहे का,खून छत्तीसगढ़िया के?

कहॉगे ऊबाल अऊ जुनून छत्तीसगढ़िया के?

                जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                    बाल्को(कोरबा)

[ छत्तीसगढ़ में रहने वाले सभी लोग जो यहॉ के अन्न पानी खाये व वस्तुओ और सेवाओ के उत्पादन में अपना योगदान दे....सभी छत्तीसगढ़िया है.]....

Wednesday, 10 June 2026

संगे संग मया

 संगे संग मया


अब कइसे रचही, मधूबन म रास रे ? 

मोर तीर हे बंसरी, अऊ तोर तीर हे साँस रे ।


कलेचुप खड़े हे, कदम के रूखवा ।

 तंय पूर्वाइयाँ, अऊ मंय हर पात ||


कइसे ममहाही,  मोंगरा मया के ?

 मंय हर पतझड़, अऊ तंय मधूमास रे ।।


चलत हे बरोड़ा, उड़ावत हे धूर्रा ।

 तंय हर बिरौनी, मंय हर आँख रे ।।


मइलहा मन, मनभात नइहे मनखे के ।

 मया के तरिया म, मन ल काँच रे ।।


फेंक के देख मया के गरी, छत्तीसगढ़ भर । 

अइसने अरझ जही, फेर छल ले झन फाँस रे ।।


न रो, न रोवा, खा तेंदू -चार - कोवा ।

टपका मुंहुँ ले मंदरस, अऊ मन भर हाँस रे ।।


थोरकिन ते खा, थोरकिन भूखाय ल खवा ।

 कर सिंगार महतारी के, नंवाके माथ रे ।।


ओनहा- कोनहाल, करदे अंजोर । 

मया के माटी ले, उँच-नीच ल पाट रे ।।


का हे भरोसा, जिनगी के सिरतोन म ? 

मया - पिरीत ल, झंऊहा- झंऊहा बाँट रे ।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को कोरबा (छग)

Wednesday, 3 June 2026

वन महोत्सव -खैरझिटिया

 वन महोत्सव -खैरझिटिया


               पानी बरसात के दिन जमे कोती हरियाली हे, मनखे मन संग जीव जंतु जमे मतंग हे। जीव जिनावर तो बिन अक्कल के बस खात पियत पड़े रहिथे बिचारा मन , फेर मनखे मन कर तो अक्कल के भरमार रहिथे। तभे तो मनखे मन, पर्यावरण संरक्षण बर रात दिन  उदिम करथे,गला फाड़ नारा लगाथे, अउ कूद कूद के पेड़ पौधा घलो लगाथे भले एक ठन पेड़ ल लगाय बर 15 झन झूमे रहय, फेर सुध तो सुध होथे, प्रकृति के जतन म तो लगे हे। वो बात अलग हे कि लगाये के बाद भले सब भुला जथे, पेड़ मरे चाहे जिये। अपन काम तो कर देथे बपुरा मन। 

              बड़खा मंच सजे हे, पोगा रेडिया पोरोर पोरोर बजत हे। जमे कार्यकर्ता सूट बूट पहिरे भाग दौड़ करत हे। लइका लोग सियान सबे जुरियाय हे। गीत कविता के तैयारी घलो हे। रेडियो म बजत  *मोर खेती खार रुनझुन मन भँवरा नाचे झुमझुम*  गीत मन ल भावत हे।। पेड़ लगाओ के नारा गजब गूँजत हे, तरिया कस खनाय सड़क म मुरुम बिछ्त हे, काबर की मंत्री जी वृक्षारोपण करे बर अवइया हे। नही नही म मंच के अलग बगल मनखे मिलाके 100 आदमी तो रहिबे करे रिहिस ,अउ मंत्री जी संग जेला चंगुरवा आही ते अलग।  यहू संख्या कोरोना काल म रिहिस, जब जादा भीड़ भाड़ नइ करना हे। फेर पेड़ , जेखर रोपण करना रिहिस वो हर गिन के 10 ठन। खैर दसो पेड़ घलो बहुत होथे, बढ़ जाए त। गर्मी म जरत मनखे संग जीव जंतु बर एक पेड़ के छाँव घलो काफी होथे। लइका सियान जमे के हाथ म झंडा लहरावत हे अउ गला म मंत्री जी के अगुवाई म मिले फेंटा गजब चमकत हे, भले ओ बपुरा मनके ओनहा कुर्था के गत नइहे। कार्यकर्ता मन कोन जन का काम म लगे हे ते, येती वोती मार भागत हे, जबकि जम्मो रेजा, कुली मन बरोबर काम ल सिधोत हे तभो। एक झन गाड़ी म चढ़के आइस अउ खबर देथे के मंत्री जी 10 मिनट म पहुँच जही। ताहन का कहना बताये अनुसार जम्मो मनखे लाइन म खड़ा होके झंडा हलाये अउ  जयकार  करे म लग गे। मंत्री जी के गाड़ी बोमियावत पहुँच गे। फूल माला म मन्त्री जी के घेंच तोपागे। स्वागत सत्कार के बाद भाषण बाजी चालू होगे। उही रटटम रट्टा डयलाक गूँजत रहय जेन आम तौर म बड़े बड़े मंच ले मंत्री ,नेता मनके मुख ले निकलथे। हव बने सुरता करेव, गरीबी भागना हे, रोजगार देना हे, विकास लाना हे ,,,,,,,,आदि आदि। बिसलरी के बोतल के संग, काजू किसमिस के प्लेट घलो नेता मनके  आघू म माढ़गे। फेर बपुरा दर्शक जेन मन अघुवाई करे बर कोन जन कतका बेर ले ओड़ा ल देहे, उन ल पानी पुछइया घलो कोनो नइहे। बिचारा मन जब ले आये हे, तब ले खुद तो हारे हे अउ नेता के जय जयकार करत हे। मंत्री जी के मीठ बचन ल सुनके सब खुश हे, मानो उही म उँखर पेट भरत हे।  उँखर पाछु तुतारी घलो चलत हे कोरोना हे मास्क लगावव। बिचारा मनके मुख बेंदरा कस करिया,पिवरा,लाल दिखत हे। फेर मंच म बैठे कार्यकर्ता मन घलो तोप लिही, त उन मन कोन पहचानही, नेता मन के मास्क घलो  मुँह ले उतर के घेंच म झूलत हे।

             भाषण बाजी के बाद मंत्री मन अपन चेला चन्गुरवा के साथ खाल्हे उतरिस अउ पेड़ लगाय बर खने गढ्ढा मेर पहुँचिस। एक ठन पेड़ मंत्री ल दिस, बाकी 9 ठन ल आने मन धरिस, फेर लगाये म धियान कहाँ हे कखरो? सब तो मंत्री संग फोटो आही कहिके ओखरे पेड़ ल आरती के थारी बरोबर धर लिस। आने मन सब अपन अपन पेड़ ल अइसने खोंच दिस, अउ मंत्री जी के बाजू म खड़ा होगे। मार पेड़ लगाओ, अउ मंत्री जी के जयकार गूँजत हे। कोरोना काल म घलो पेलिक पेला होवत हे। फेर ये का मंत्री पेड़ ल धरे हे, चेला मन खड़े हे, पर फोटोग्राफर के अता पता नइहे। कार्यकर्ता मन दाँत ल कटरत हे, अभी तो रिहिस कहाँ गे रे। बिना फ़ोटो खिंचाय मंत्री जी घलो कइसे पेड़ लगा दिही। सब सन्न हे ,खोजो खोजो मात गेहे। मंत्री जी गुसियागे ये का तमाशा ये, फोटोग्राफर बिन पौधारोपण कइसे होही। दू तीन झन अधिकारी उप्पर गाज घलो गिरगे। तमक के मंत्री जी सस्पेंड कर देहूं कहि दे हे, फेर उहू मन का करे, वो मन तो बकायदा फ़ोटो ग्राफर लगाय रिहिस, अब वो धोखा दे दिही तेला, वो मन का करही? फेर रिस तो रिस ए,का करे? कोनो मन काहत हे, कि फोटोग्राफर गाड़ी धर लकर धकर कोनो  विपत आय कस भागिस हे। कार्यकर्ता मन संग मंत्री जी घलो नाराज हे, *कहूँ फोटोग्राफर घलो सरकारी होतिस, त तो ओखर खैर नइ रितिस।* फेर का विपत आगे ,जउन अत्तिक बड़ कार्यक्रम ल छोड़ भाग गिस भगवान जाने? एती हल्ला होवत हे, कोनो दुसरा फोटोग्राफर बलाव, त कोनो काहत हे महँगा मोबाइल म फ़ोटो खींच लव, त कोनो काहत हे, थोड़ीक देर अउ खोज ली,अभी रूक जाव, पेड़ ल झन खोंचव। नही ते काली के पेपर अउ देश दुनिया म मंत्री जी के पेड़ लगावत फोटू कइसे बगरही? माने पेड़ लगई ले जादा फोटो के महत्व हे। अउ हे घलो तभे तो एक ठन पेड़ ल धरे कईझन मनखे रोजेच सोसल मीडिया म दिख जथे। कोन जन हमर पुरखा मन घलो फोटोग्राफर खोजथिस, त बड़े बड़े बर, पीपर रहितिस कि नही?  पर आज फ़ोटो जरूरी घलो हे काबर कि कोन का करत हे, तेखर पुख्ता सबूत घलो इही ताय। फ़ोटो बिना आज कहाँ कोनो काम होथे। सोसल मीडिया के जमाना हे, उठत बइठत फ़ोटो मनखे मन बगरावत हे, मुँह ल अँइठ  अँइठ के फ़ोटो खिंचावत हे। बिन फ़ोटो के उछाह के काम ल तो छोड़ दी, मरनी हरनी या कहे जाय त दुख के काम घलो नइ होय। फलाना ल श्रद्धाञ्जलि देवत फलाना, अइसनहो फ़ोटो दिखथे। घूमई फिरई , काम बुता सबके फ़ोटो चलत हे। *नांगर जोतत फलाना, अब ले करम फूट गे न।* फेर कइसनो होय केमरामेन के जाय ले सब अधर म लटकगे। तभो अपन अपन हिसाब ले उँधला  धुँधला मोबाईल म खींचत हे,कि मंत्री जी थोड़े घेरी बेरी आही। खैर कार्यकर्ता मन संग मंत्री जी के मूड घलो खराब हे, बिन फोटो ग्राफर के। तभो मोबाइल म फ़ोटो खींच खिंचाके  एक ठन पेड़ ल जम्मो झन ख़ोचीस, अउ नास्ता पानी बर बैठ गे। बाकी 9 ठन पेड़ बने से गड़े घलो नइहे। बता जब आजे ये स्थिति हे त, आघू के देख रेख भला कोन करही। चल कइसनो होय, छेरी पठरू के भोजन के तो जुगाड़ होगे। वोमन चरही,त अउ उल्होही ताहन अउ चरही, अउ उल्होही त अउ--------। फेर जेन दिमाक वाले प्राणी हे तेमन कहूँ टोर फेक दिही, त थोरे उल्होही। खैर आज वृक्षारोपण तो होगे, बाकी समय का होही, तेला का करना हे। बस एके चीज के कमी खलिस, वो हरे कैमरामैन। कैमरामैन रिहितिस, त हाँस हॉस के पेड़ लगावत सबके फ़ोटो रिहितिस। मंत्री जी दल बल समेत भाग गे, ओखर जाते ही कार्यकर्ता मन। बेचारा अगुवाई करइया दर्शक मन देखते रहिगे। फोटोग्राफर के बारे म, कार्यकर्ता मन पता करिस त मालूम चलिस की फ़ोटो ग्राफर के परिवार वाले मनके कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आये हे, अउ गाड़ी म डॉक्टर मन उनला धरके लेजत हे। उहू बपुरा के का गलती हे।येती सभा म जुरे मन म घलो दहसत हे, कैमरामैन पॉजिटिव होही त?


 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

कुंडलियाँ-भीड़

 कुंडलियाँ-भीड़ 


बाबा मन हा बाप कस, देवत हें उपदेश।

धरम करम मुक्ति कहि, होय मनुष मन पेश।

होय मनुष मन पेश, भीड़ के हिस्सा बनके।

भीड़ भाड़ ला देख, चले बाबा मन तनके।।

बिना भीड़ नइ होय, मदीना काशी काबा।

जाति धरम के नाम, सबे कोती हे बाबा।।


झंडा डंडा भीड़ बिन, मान कहाँ ले पाय।

बने बने मा हे बने, गिनहा मा हे बाय।।

गिनहा मा हे बाय, भीड़ हा भेड़ ताय जी।

सहमति साथ विरोध, सबे बर भीड़ आय जी।

मेला नेता खेल, संत राजा का पंडा।

सब ला चाही भीड़, भीड़ हे ता हे झंडा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

विश्व पर्यावरण दिवस मा

 विश्व पर्यावरण दिवस मा


छींद-जयकारी छंद


कमती कहाँ खजूर ले, हमर गांव के छींद।

गर्मी के फर ये हरे, खाके भाँजव नींद।।


गुण ला सुन उड़ जाही नींद। एक पेड़ जेला कहिथे छींद।।

छींद पेड़ के गुण अउ राज। मोर कलम बरनत हे आज।।


जागे अउ बाढ़े बिन बोय। पात फोंक काँटा कस होय।।

इही गांव के हरे खजूर। खाये हँस किसान मजदूर।।


नरिया नरवा नदी कछार। खेत खार सँग मेड़उ पार।।

रथे छींद के झुँझकुर झाड़। सहत घाम पानी अउ जाड़।।


एक तना मा बाढ़े सोझ। कई मुरख मन माने बोझ।।

काटे कहि नइ आये काम। जाने तेमन पाये दाम।।


चटई बहरी शादी मौर। बिना छींद नइ हाँसे ठौर।।

माटी घर के बन रखवार। रोके बरसा घरी झिपार।।


आय पँदोली दै के काम। एखर कुँदरा दै आराम।।

गाड़ा के टट्टा बन जाय। पहिर बबा कलगी मुस्काय।।


चलत फिरत उद्योग कुटीर। छाये रहे छींद सब तीर।।

छींद रसा तक बड़ मन भाय। गुड़ अउ शक्कर घलो मिठाय।।


छींद गबौती जौने खाय। खेवन खेवन खाय ललाय।।

पाके फर के नही जवाब। खाये ते बन जाय नवाब।।


बैरी काँटा देख डराय। ठिहा छींद मा बया बनाय।।

खग के करलव जिया लुभाय। छतरी जइसन छींद सुहाय।।


पूरा के पानी ला सोख। सींचे धरती दाई कोख।

वाटर लेबल घलो बढ़ाय। नाइट्रोजन जर हा गठियाय।।


बाँध रखे माटी के कोर। जर जइसे रेशम के डोर।।

माटी ला उपजाउ बनाय। सखा किसनहा के ये आय।।


पाना बाजे चटचट खूब। खेले लइका मन हा डूब।।

खेलत बनथे छींद डँगाल। उल्हवा पाना लगे कमाल।।


सुक्खा लकड़ी पाना डार। बने पठउँहा पाठ मियार।।

बनथे सजावटी सामान। मनुष आज के हें अंजान।।


हवा दवा फर लकड़ी देय। खड़े खड़े पर जिनगी सेय।।

धरे काठ मा झटकुन आग। पानी घलो बिगाड़ै राग।।


छिंदवाड़ा छिंदई कस गांव। धरे छींद के कारण नांव।।

पारा मोहल्ला बन खार। छींद नाम ले परे गुहार।।


छिंदी कांदा फर जर पान। देय जीव ला जीवनदान।।

नित डँट पर्यावरण बचाय। दूत प्रकृति के छींद आय।।


सबके अलग महत्त्व हें, होय कइसनों पेड़।।

छींद लगावव जान गुण, रिता रहे झन मेड़।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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जंगल बचाओ-सरसी छन्द


पेड़ लगावव पेड़ लगावव, रटत रथव दिन रात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


हवा दवा फर फूल सिराही, मरही शेर सियार।

हाथी भलवा चिरई चिरगुन, सबके होही हार।

खुद के खाय कसम ला काबर, भुला जथव लघिनात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जंगल हे तब जुड़े हवय ये, धरती अउ आगास।

जल जंगल हे तब तक हावै,ये जिनगी के आस।

आवय नइ का लाज थोरको, पर्यावरण मतात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


सड़क खदान शहर के खातिर, बन होगे नीलाम।

उद्योगी बैपारी फुदकय, तड़पय मनखे आम।

लानत हे लानत हव घर मा, आफत ला परघात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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**पेड़: न उजाड़ो**  


न उजाड़ो धरती के धन को,

हो सके तो बढ़ाओ वन को।।


बाग-बगीचे, फूल-पौधे,

लुभाते हैं सबके मन को।।


जीवन को खुशहाल बनाते,

निरोग रखते हैं तन को।।


तपती धूप में छाँव देते,

लाते हैं वन-घन को।।


रक्षा का स्वयं संकल्प लो,

समझाओ सभी जन को।।


पेड़ लगाकर पुण्य कमाओ,

धन्य करो जीवन को।।


      जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

                बालको कोरबा

 विश्व परियावरण दिवस की ढेरो बधाई💐💐💐💐💐

हिरदय- सार छंद

 विश्व हिरदय दिवस म


हिरदय- सार छंद


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम जग नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम सब चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Tuesday, 2 June 2026

गीत गाँबों

 गीत गाँबों


घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।

दुःख दरद डर द्वेष मिटाके, लेबों मन ला जीत।


कोई सुलगे भीतर भीतर, कोई कहय लबारी।

कोई देखय गुर्री गुर्री, कोई देवय गारी।

भभकत इरखा मा पिरीत के, पानी देबों छीत।।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत----।


रोज डराय डरे ला सबझन, अउ हराय हारे ला।

मया करइया नइहे कोई, दँउड़े सब मारे ला।

मनखे मनखे ला मिलवाक़े, बधवाबों चल मीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


गिरे थके हारे हपटे ला, देबों चलव पँदोली।

कोन काय करना चाहत हे, सबके जिया टटोली।

मनुष होय के फरज निभाबों, बदल बुरा गत रीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मनखे मन के करनी के फल- सार छंद

 मनखे मन के करनी के फल- सार छंद


छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।

फल ला भोगत हावँय फोकट, मनखें के करनी के।।


चिरई चिरगुन मरैं घाम मा, नइहे पेड़उ पानी।

लहकत हावँय बानर भालू, हलाकान जिनगानी।

बोहय बन विकास के गंगा, धारा बैतरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


धरती दाई के छाती मा, छड़ सीमेन्ट छभागे।

माटी के सेउक मन मरगे, उद्योगी हरियागे।।

इंच इंच ला चाँट खात हें, चटनी कस बरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


आज जनम धर काली मरगे, जीव जंतु मन कतको।

कोनो जुग मा नइ देखें हन, निरदई मनखें अतको।।

स्वारथ बर सरलग माते हे, लूट पाट धरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)

 गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)


चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।

दाई अँचरा कस जुड़ छइहाँ, ओढ़ ओढ़ इतराबों।


पवन धूकथे पंखा रहि रहि, सुरुज देव बिजराथे।

छमछम नाचय पाना डारा, गीत कोयली गाथे।

ढेला फेक गिराबों आमा, मिलजुल के सब खाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गरमी घरी तको जुड़ रहिथे, अमरइया के छइहाँ।

जिहाँ पहुँच सब खेल खेलबों, जोर सबे झन बइहाँ।

आम तरी मा बाँध झूलना, झुलबों अउ झूलाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


बइहाँ जोड़े पेड़ खड़े हे, सहि जुड़ बादर पानी।

हवा दवा फल फूल लुटाथे, सबदिन बनके दानी।

ठिहा ठौर हे जीव जंतु के, देख देख हरसाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गली खोर घर खेत खार सँग, साथी ताल तलैया।

गिल्ली डंडा बाँटी भँवरा, के हम सब खेलैया।।

चंदन जइसे धुर्रा माटी, माथा तिलक लगाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

आगे का मानसून(गीत)

 आगे का मानसून(गीत)  


बुलके नइहें मई घलो हा, लागे नइहें जून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


नवतप्पा मा चप्पा चप्पा, माते हावय गैरी।

टुहूँ देखाये कस लागत हे, ये बादर हर बैरी।।

कोई बतावव करहूँ बाँवत, खाके बासी नून।।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


होरी हरिया संसो मा हें, नाँगर धरै कि पेरा।

घर अउ खेत के काम बचे हे, काँपे आमा केरा।।

उमड़त घुमड़त देख बदरा ला, अँउटत हावय खून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


साँप सुते नइ हावय मन भर, बतर किरी हे बौना।

कांदी कुल्थी नार लमेरा, जागे तुलसी दौना।।

हरियर होवत हवै धरा, पुरवा छेड़य धून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 29 May 2026

एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद

 एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद


पइसा बिन एटीएम हा, खड़े रथे मुँह फार।

हमर होय बैलेंस कम, दंड लेय सरकार।।

दंड लेय सरकार, आम खाता धारी ले।

बोचक जाये बैंक, झाड़ पल्ला पारी ले।।

सुने भला अब कोन, करिन का काये कइसा।

ठँउका रहिथे काम, मिले नइ खोजे पइसा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुण्डलियां-नेता घर नेता


नेता के बेटी बहू, बाई भाई पूत।

नित नेता बनते रही , भागे नइ ये भूत।।

भागे नइ ये भूत, हरे कुर्सी इँखरे बर।

होवत रहिथे खेल, इहिच मन ला नित दे बर।

गला फाड़ चिल्लाय, उहू ये पद के क्रेता।

आम चुहकहीं आम, रही नेता घर नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



फेक अकड़ गुमान- कुंडलियाँ

धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा हरेक किरदार।।

निभा हरेक किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



तीन सवारी-कुंडलियाँ


तीन सवारी देख के, काटे पुलिस चलान।

भरे खचाखच रेल हे, निकल जथे जी जान।।

निकल जथे जी जान, व्यवस्था कोन सुधारे।

लेये बर लउहाय, देय बर पल्ला झारे।

आम खास मा भेद, होय सब कोती भारी।

रोड दिखे ना भीड़, दिखे बस तीन सवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


कुर्सी-कुंडलियाँ

जनता के पीये लहू, नेता मन बन शेर।

जॉब घटय कुर्सी बढ़य, कइसन आगे बेर।।

कइसन आगे बेर, मचे कुर्सी के झगड़ा।।

कइसे होय विकास, करें घोटाला तगड़ा।।

सब ला जोर सुनाँय, कहानी संता बंता।।

इती उती के बात, सुने हँस हँस के जनता।


खैरझिटिया



अइसन काबर-कुंडलियाँ


डॉक्टर झोला छाप कहि, शासन वसुलै दंड।

नेता झोला छाप हे, मिलजुल खावँय फंड।।

मिलजुल खावँय फंड, उठावै अँगरी कौने।

नियम तोड़थें रोज, नियम नित हाँके तौने।

मनके करथें काम, सबे ला खीसा मा धर।

गरजे अँगठा छाप, डरे भल मास्टर डॉक्टर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रोय रसोई


रोय रसोई गैस बिन, गाड़ी हा बिन तेल।

चीज सबे महँगात हे, होय युद्ध जस खेल।।

होय युद्ध जस खेल, बजत हे दुख के बाजा।

बनके तिगड़म बाज, जुलुम ढावत हें राजा।।

कर नइ सके विकास, तेल टावर बिन कोई। 

रहे सदा सुख चैन, कभू झन रोय रसोई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




कोल्ड ड्रिंक्स के राज मा, नींबू सरबत फेल।

कब का हा महँगा जही, आय समझ नइ खेल।

हावी हावय उधोगी।

आम जन भुक्तभोगी।


नेता


नेता मन रैली करे, सड़क चौक ला घेर।

जाम लगे चारो डहर, खड़े पुलिस मुँह फेर।।

खड़े पुलिस मुँह फेर, देख के फुदरे नेता।।

पाके मनखें आम, नियम कहि हुदरे नेता।

शासन ला रख जेब, घुमे बन विश्व विजेता।

जनता जाए भाड़, करे मनमानी नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


फूफा


रिस्ता मा बिखराव आम होगे।

जुड़ छइयां देख आज घाम होगे।

भीतरे भीतर तिगड़म फूफू करे,

इती फूफा बिचारा बदनाम होंगे।

खैरझिटिया



किरायेदार-कुंडलियाँ


गरू लगे दाई ददा, हरू किरायेदार।

होन देन नइ कुछु कमी, खूब करे सत्कार।।

खूब करे सत्कार, लागमानी हो जइसे।

पइसा खातिर आज, मनुष रँग बदले कइसे।।

सबझन के इहि  हाल, कहे मा करू लगे।

कइसन दिन हे आय, ददा दाई गरू लगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पद पइसा- कुंडलियाँ

पद पइसा के चाह मा, बाँचे कहाँ ईमान।

झन जा बोली बात मा, बिक जाथे इंसान।।

बिक जाथे इंसान, अपन पहिचान भुलाके।

हो जाथे खामोश, मूड़ मा ताज सजाके।।

माया आघू मान, मनुष के होवव रदखद।

अवसर देख जुगाड़, करें पाए बर सब पद।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


नत्ता रिस्ता आज बाजारू होगे।

नँदात नरियर गंगा बारू होगे।

गय सुदामा किशन के जमाना,

अब दोस्ती मतलब दारू होगे।।

खैरझिटिया


सोचो यदि मच्छर साठ साल जीते,  

न जाने किसका कितना खून पीते।  

इसीलिए जल्दी मौत मिली है उसे,  

पर आदमी क्यों बन बैठा है चीते।  

खैरझिटिया


छप्पर-छानी कब छत हो गई, पता नहीं चला।  

मेरे खिलाफ़ कब जनमत हो गई, पता नहीं चला।  

कभी यहाँ, कभी वहाँ—रोज़ मंज़िल ढूँढते रहे,  

कब राह से मोहब्बत हो गई, पता नहीं चला।  

खैरझिटिया

तेंदू- दोहा- चोपाई छंद

 तेंदू- दोहा- चोपाई छंद


लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।

काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।


तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।

छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।


तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।

टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।


बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।

औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।


तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।

तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।


लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।

अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाभे घलो केंवची जर हा।।


आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।

हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।


तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।

फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।


जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।

भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद

 कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद


मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।

गँवा जथे कतको जिनगी हा, मजा करे के चक्कर मा।।


बीहड़ डोंगर पर्वत घाटी, बन बरफ समुंदर पानी।

ये सब सँग खेले के सेती, उजड़े कतको जिनगानी।।

खेलव झन पानी पुरवा ले, हवा गरेरा झक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।


अपन दायरा जतका हावै, ततके नित पाँव लमावव।

कुदरत के कानून कड़ा हे, जादा झने मेछरावव।।

पानी मिल पानी कर देथे, नून होय या शक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।


मनखें मन सँग हाँसव खेलव, गढ़व कढ़व कुदरत ला।

सोचें समझे के ताकत हे, छोडव मद जिद अउ लत ला।।

काम करव झन बनके अड़हा, पड़के लउहा लक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

रार मचे हे खाड़ी मा

 रार मचे हे खाड़ी मा


भात चुरे नइ काड़ी मा।

सोवा परगे हाँड़ी मा।

गैस सिरागे जेब चिरागे,

रार मचे हे खाड़ी मा।।


साग उगे नइ बाड़ी मा।

खेत पटागे झाड़ी मा।।

आफत हा अब अवसर बनगे,

लहू सुखागे नाड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


हें मजदूर दिहाड़ी मा।

फोकस हवैं खिलाड़ी मा।।

भला भरोसा काय करीं अब।

गुजराती मरवाड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


दरद उठत हे माड़ी मा।

तेल सिरागे गाड़ी मा।।

पिसागेन पर के झगरा मा,

बइठे बइठे भाँड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


कतकों बिकगे साड़ी मा।

कतकों  दारू ताड़ी मा।

नेता ला बस कुर्सी चाही,

सोज बाय अउ आड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)

 वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)


दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।

गुण गियान यश धन बल बाढ़ै,बाढ़ै झन अभिमान।


तोर कृपा नित होवत राहय, होय कलम अउ धार।

बने बात ला पढ़ लिख के मैं, बढ़ा सकौं संस्कार।

मरहम बने कलम हा मोरे, बने कभू झन बान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जेन बुराई ला लिख देवँव, ते हो जावय दूर।

नाम निशान रहे झन दुख के, सुख छाये भरपूर।

आशा अउ विस्वास जगावँव, छेड़ँव गुरतुर तान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


मोर लेखनी मया बढ़ावै, पीरा के गल रेत।

झगड़ा झंझट अधम करइया, पढ़के होय सचेत।

कलम चले निर्माण करे बर, लाये नवा बिहान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


अपन लेखनी के दम मा मैं, जोड़ सकौं संसार।

इरखा द्वेष दरद दुरिहाके, टार सकौं अँधियार।

जिया लमाके पढ़ै सबो झन, सुनै लगाके कान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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सुभगति छंद-शारद मां


दे ज्ञान माँ।वरदान माँ।

भव तारदे।माँ शारदे।


आनन्द दे।सुर छंद दे।

गुण ज्ञान दे।सम्मान दे।


सुख गीत दे।सत मीत दे।

सुरतान दे।अरमान दे।


दुख क्लेश ला।लत द्वेश ला।

दुरिहा भगा।सतगुण जगा।।


जोती जला।दे गुण कला।

माथा नवा।माँगौ दवा।


चढ़ हंस मा।सुभ अंस मा।

आ द्वार मा।भुज चार मा।


दुरिहा बला।अवगुण जला।

बिगड़ी बना।सतगुण जना।


वीणा सुना।मैं हँव उना।

पैंया परौं।अरजी करौं।


सद रीत दे।अउ जीत दे।

सत वार दे।माँ शारदे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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दोहा गीत- माँ शारदे


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।

तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।


तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।

तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।

रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।

मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।

वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।

प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।

दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


जय माँ शारदे, बसन्त पंचमी की सादर बधाइयाँ

जब तक चुनाव रिहिस

 जब तक चुनाव रिहिस


अच्छा दिन के हाव भाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

आम जनता के हियाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।1


आव अउ समस्या बताव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

अंडा मछरी भेल खाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।2


तेल पानी गैस में ठहराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

नारा मा महँगाई दुरिहाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।3


ईरान अमरीका संग जुराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

हारमुज ले बुलकत नाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।4


संसो के नइ दिखत सिर पाँव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

चारों खूंट विश्व गुरु के दबाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।5


जीतेन्द्र वर्मा'₹"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

झालमुड़ी अभी के का?

 झालमुड़ी अभी के का?


डिही घर गांव गुड़ी, अभी के का।

ये बिंदिया ये चुड़ी, अभी के का।।1


रँग रँग के रोटी पीठा खात आवत हन,

ये भजिया ये पुड़ी, अभी के का।।2


कोनो ला गर्मी लगे, कोनो ला सर्दी,

तन लोर फोड़ा जुड़ी, अभी के का।।3


तँउरे के अलगे मजा हे नदी ताल के,

लहरा फोटका बुड़बुड़ी,अभी के का।।4


खात हें देखा देखा आज सब अचानक,

ये भेल झालमुड़ी, अभी के का।।5


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद

 सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद


सड़क तीर के तोर खेत मा, नजर हवै बैपारी के।।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


नपा नपा के खेत खार ला, गाँजत हें उन मन खरही।

उँखर हाथ जा महतारी हा, दिखत हवै निच्चट मरही।।

टावर गारा छत मा दरके, छाती हा महतारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


साम दाम अउ दंड भेद ले, भुइयाँ ला उन कब्जाथें।।

नाका बंदी कर पिछोत के, मनखें मन ला रोवाथें।।

औने पौने देय दाम उन, लेय लाभ लाचारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


शासन अफसर सँग पा गरजे, बरजे नइ कोनो उन ला।

सोन उपजइया महतारी मा, छीचत हें उन मन घुन ला।

लोभ आय झन अउ सताय झन, संसो दुनियादारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद

 पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद


पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।

एक जमाना मा घर गाँव ह, सुख के लागे खान ।।


नइ माँगिस हे खपरा छानी, कभ्भू कूलर फ्रीज।

मुड़मिंजनी माटी के आघू, फेल लक्स अउ ब्रीज।।

छेना लकड़ी खाके हाँडी, हाँसे साँझ बिहान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


कोलाबारी के तरकारी, पारा ला दै तार।

नदिया नरवा बोरिंग कुआँ, बहे दूध कस धार।।

असली धन अरसी जौ सरसो, चना गहूँ अउ धान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


नीम आम अमली बर पीपर, देय फूल फर छाँव।

सिंहासन कस चौकउ चौरा, लगे सरग कस गाँव।

छत सीमेंट आय हे जब ले, तब ले हन हल्कान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


बबा कहानी रोज सुनावै, दाई लोरी गाय।

हाट सजे हर हप्ता हप्ता, चीज सबे मिल जाय।।

पेट संग मा जिया अघाये, गांव देय वरदान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।



सुविधा दुविधा बनत जात, हाल होय बेहाल।

महँगाई के मार पड़त हे, मनुष बजावँय गाल।।

सुरता जुन्ना समय आत हे, काला काय बतान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

खेती किसानी के गत-सरसी छंद

 खेती किसानी के गत-सरसी छंद


विलासना के चीज बनाये, ते होगे धनवान।

साग दार फर अन्न उगाके, रोवैं आज किसान।।


पानी पुरवा के सँग चाही, खाये खातिर अन्न।

फेर आज ये काय चलत हे, सोच होय मन सन्न।।

खाली पेट दिमाक चले नइ, भरे आय तब ज्ञान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।


जांगर खपगे नांगर खपगे, खपगे आस तमाम।

कतका रुपया का के मिलही, गढ़े आन मन दाम।

उद्योगी बैपारी फुदरे, मनके बेंच समान।

साग दार फर अन्न उगाके,रावैं आज किसान।।



बिजनेस बढ़े बढ़े नौकरी, खेती ले दुरिहाँय।

जे हे थेभा ये दुनिया के, तौने भटका खाँय।।

खेत किसानी आये जिनगी, पाय किसानी मान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वाटर पार्क-सरसी छंद

 वाटर पार्क-सरसी छंद


वाटर पार्क म नाहै खातिर, मनखें मन जुरियाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


घाट घठौंदा अरदा परदा, नइ हावै कुछु चीज।

बेढंगा सब झुमरत दिखथें, नइहें तौर तमीज।।

मजा मजा कहि मान बेंच के, छोट बड़े इतराँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


देहाती मन तँउरे तरिया, कहि नइ झाँकैं पार।

तेन तउल मा पानी पाके, होगे हें मतवार।।

मारे डींग खिंचाये फोटू, सुधबुध अपन भुलाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


नवा उदिम बैपारी मन के, आये सब ला रास।

देखे सुने म अटपट लागे, उड़े मनुष बन तास।।

नवा जमाना के बाजार म, लाज शरम बेंचाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को,कोरबा(छग)

खातू-कुंडलियाँ छंद

 खातू-कुंडलियाँ छंद


खातू मनके राज मा, खातू बर लुलवान।

खातू ले खेती हवै, का अब करन किसान।।

का अब करन किसान, अधर मा हवै किसानी।

कोन सुने गोहार, कोन दै खातू पानी।।

हें जे जिम्मेदार, सबे खाए के पातू।

संसो खाए खूब, कतिक कब मिलही खातू।।


जीतेन्द्र वर्मा'₹"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Wednesday, 27 May 2026

गरीब मजदूर किसान

 गरीब मजदूर किसान


गरीब मन उपर अत्याचार,सरे-आम होवत हे।

मान  मरियादा महिनत,नित नीलाम होवत हे।


जाँगर टोरे  दिन- रात,पर  बर जे हा,

वोला दू टेम के रोटी,हराम होवत हे।


सबके सपना सँजोये,जे एके साँस मा,

ओखरे  सपना आज,धड़ाम होवत हे।


सब कन्नी काटत हे,कोन देय सहारा।

छूरी  धरइया  कोती, राम  होवत  हे।


आजो गरीब,गड़ जावत हे नेंव बन,

सेठ साहूकार मनके नाम होवत हे।


महिनत करइया  घर  चूल्हा,गुंगवाय  घलो नही,

बैठान्गुर तले भजिया,जब साम होवत होवत हे।


बेंदरा  कस  नाँचे मजदूर  किसान,

कुंदरा म दिनों दिन,घाम होवत हे।


करिया काया म, बरसे दनादन  कोर्रा,

महिनत के कमती,अब दाम होवत हे।


बड़े  बड़े महल अटारी,बनवाये शाहजहाँ,

फेर हाथ ल काटवाये,जब काम होवत हे।


जरगे-मरगे-गड़गे-सरगे,कतको खैरझिटिया,

छोड़  न अब अइसन घटना ,आम होवत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

9981441795

Saturday, 23 May 2026

हाल खेती भुइयाँ के- सरसी छंद

 हाल खेती भुइयाँ के- सरसी छंद


भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।

शहर लगत ना गाँव लगत हे, फइले हावै जाल।।


कुटका कुटका कर भुइयाँ ला, बना बना के प्लाट।

बेंचत हावै वैपारी मन, नदी ताल तक पाट।।

धान गहूँ तज समय फसल बो, नाचै दे दे ताल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


माटी हा महतारी जइसे, उपजाये धन सोन।

आफत आगे ओखर ऊपर,जतन करै अब कोन।।

धमकी चमकी अउ पइसा मा, होय किसान हलाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


बड़े बड़े बिल्डर बइठे हें, भुइयाँ मा लिख नाम।

गला घोंट खेती भुइयाँ के, करत हवै नीलाम।।

अइसन मा मुश्किल हो जाही, कल बर रोटी दाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


इंच इंच मा बनगे बासा, नइ बाँचिस दैहान।

जीव जंतु के मरना होगे, देवै कोन धियान।।

तार रुधांगे भू कब्जागे, बचिस पात ना डाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Friday, 22 May 2026

सार छंद -जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 सार छंद -जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"


मुखारी(दतुन)


ब्रस मंजन के माँग बाढ़गे, दतुन देख फेकागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


खेत खार अब कोन ह जावै, तोड़ै कोन मुखारी।

मंजन आगे आनी बानी, होवै मारा मारी।

करँव भला का गोठ शहर के, गाँव ह घलो झपागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


दवा बरोबर दतुन जान के, पहली सबझन खोजे।

बम्हरी नीम करंज जाम के, दतुन करे सब रोजे।

दाँत मसूड़ा मुँह के रोग ह, करत मुखारी भागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


एक मिनट मा दाँत चमकगे, चाबे के नइ कंझट।

जीभी आगे अब नइ हावय, चिड़ी करे के झंझट।

दाँत बरत हे मोती जइसे, चाबत चना खियागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


दाँत घलो हा पोंडा परगे, ब्रस मंजन के सेती।

चना ठेठरी चाब सके नइ, चाब पाय का रेती।

शरद गरम नइ सहि पावत हे, असली नकली लागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद

 पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद


कतको गाड़ी रद्द हे, कतको मा बड़ झोल।

सफर रेल के जेल ले, का कमती हे बोल।

का कमती हे बोल, रेलवे के सुविधा मा।

देख मगज भन्नाय, पड़े यात्री दुविधा मा।

सिस्टम होगे फेल, उतरगे पागा पटको।

ढोवत हावै कोल, भटकगे मनखे कतको।


ना तो कुहरा धुंध हे, ना गर्रा ना बाढ़।

तभो ट्रेन सब लेट हे, लाहो लेवय ठाढ़।

लाहो लेवय ठाढ़, रेलवे अड़बड़ भारी।

चलत ट्रेन थम जाय, मचे बड़ मारा मारी।

टीटी छिड़के नून, कहै आ टिकट दिखा तो।

यात्री हें हलकान, होय सुनवाई ना तो।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Monday, 18 May 2026

पर उपदेस (सार छंद)

 पर उपदेस (सार छंद)


देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।

स्वारथ मा सन काम करत हें, दया मया सत लेस।


धरम करम के बात करैं नित, कहैं झूठ झन बोलौ।

सुख सुम्मत मा जिनगी जीयौ, जहर कभू झन घोलौ।

बात मया मरहम के बोलँय, बाँटय उही कलेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


नशापान के हानि बतावँय, रोजे भाषण पेलें।

उहू भुलागे बात बचन ला, अध्धी पाव ढकेलें।

बिहना लागे संत गियानी, संझा बदले भेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


मनखे मनखे एके आवन, छोड़ौ कहै लड़ाई।

तिही बड़े छोटे नइ मानै, दाई ददा न भाई।

आन छोड़ दे अपने मन ला, पहुँचावत हें ठेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


कहिस तउन करके दिखलाइस, तुलसी बुद्ध कबीरा।

तज दिस धन दौलत वैभव ला, किसन पाय बर मीरा।

आज मनुष तज सही गलत ला, मारत हावँय टेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Thursday, 7 May 2026

मोर गॉव अब शहर बनगे.....

 ....मोर गॉव अब शहर बनगे.....

शहरिया शोर म दबगे,सिसन्हिन के ताना|

लहलहावत खेतखार म बनगे,बड़े-बड़े कारखाना|

नदिया नहर जबर होगे ,डाहर बनगे बड़ चंवड़ा|

पड़की परेवा फुरफुंदी नंदात हे,नंदात हे तितली भंवरा|

सड़क तीर के बर पीपर कटगे, कटगे अमली आमा|

सियान के किस्सा नई भॉय,सब देखे टीभी डरामा|

पाहट के आहट,अउ संझा के शॉति आज कहर बनगे...|

मैय हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज  शहर बनगे.........|


संगमरमर के मंदिर ह,देवत हवे नेवता|

कहॉ पाबे गली म,अब बंदन चुपरे देवता?

तरिया ढोड़गा सुन्ना होगे,घर म होगे पखाना सावर|

बोंदवा होगे बिन रूख राई के,डंगडंग ले गड़गे टावर|

मया के बोली करकस होगे,लईका होगे हुशियार|

अत्तिक पढ़ लिख डारे हे,दाई ददा ल देथे बिसार|

बिहनिया के ताजा हवा घलो,अब जहर बनगे....|

मै हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज शहर बनगे...|


मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारा संग, सबला बॉट डरिस|

जंगल अउ रीता भुंइया ल,चुकता चॉट डरिस|

छत के घर म, कसके तमासा|

नई करेय कोई कखरो ले आसा|

होरी देवारी तीजा पोरा,घर के डेहरी म सिमटागे|

चाहे कोनो परब तिहार होय,सब एक बरोबर लागे|

नक्सा खसरा संग आदमी बदलगे होगे ताना बाना|

चाकू छुरी बंदूक निकलगे  सजगे  मयखाना |

चपेटागे बखरी बियारा,पैडगरी अब फोरलेन डहर बनके....|

मै हॉसव कि रोववौ मोर गॉव आज  शहर बनगे......|

                                    जीतेन्द्र कुमार वर्मा

                                   खैरझिटी (राजनॉदगॉव)

कलम रोंये हे

कलम रोंये हे

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सब बर रोटी पोये हे,

तभो बिन खाय सोये हे......|

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे..............||


हे खई-खजाना ओली म,

मीठ मंदरस हे बोली म||

सिधोत बारी-बखरी;खेत-खार,

दिन गुजरगे रंधनी खोली म||

जब ले धरे जनम,

तब ले करे जतन||

घर-बन;लइका; गोंसैंया के,

बेटी;महतारी;सुवारी बन|

मुंदरहा पहिली जागे हे ,

रतिहा आखिर म सोये हे.....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे...........||


कोख के पीरा कोन मेर बॉचे|

रोवत  लइका  कोरा म  हॉसे|

सोना  चॉदी  हीरा  बनाइस,

रहिके  जिनगी  भर  कॉचे|

बनके दरपन घर के,

सजाये घर-परिवार ल|

कोन बोह पाही ये भुंइयाँ म,

महतारी  के  भार  ल|

फरे साग-भाजी;महके फूल-फूलवारी,

बाढ़े रूख-राई ;महतारी जे बोये हे....|

जे बेर लिखे हे, गोठ महतारी के,

ते  बेर  कलम  रोये हे....................|


बारे हे दिया तुलसी चंवरा म,

लिपे-पोते हे अँगना दुवारी||

मुचमुच हॉसे कुंदरा ह घलो,

जेन   घर   हे      महतारी||

महतारी अवतार दुरगा काली के|

देखाइस दुख म  घलो जी के|

हॉसिस ऑखी के ऑसू ल पी के|

फेर कोनो नइ देखिस घाव ल छी के|

खुदे मइलाके ;गंगा कस,

जग के  पाप ल धोये हे....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते   बेर   कलम   रोये  हे......||

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                 📝  जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को( कोरबा )

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मोर महतारी मोर अभिमान

हम नही

 हम नही


रिस्तें बिगड़ने का, किसी को कोई गम नही।

आज सबको सिर्फ पैसा चाहिये, हमदम नही।।


खंजर से खुदे जख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

जुबां से बढ़कर जमाने में, बारूद बम नही।।


खुद को राजा समझ रहें हैं, रील वालें।

रीयल में उनमें, जरा सा भी दम नही।।


एकता अखंडता भाई चारा, दिखावा है।

जहर जाति धर्म का, हो रहा है कम नही।


पता नही, ये पैमाना है या मौका परस्ती,

देश संविधान से चलेगा, पर हम नही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

खन खन खन खन खन खन।।

 खन खन खन खन खन खन।।


उगती ला खन।

बुड़ती ला खन।

भंडार ला खन।

रक्सेल ला खन।

निकाल कोयला लोहा हीरा।

झन देख कखरो दुःख पीरा।।

भाड़ मा जाय खेत खार घर बन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

जिहां बइला के घुंघरू बाजे।

खन खन खन खन,

तिहां होवत हावय आजे।।

एक के उजड़त हे सुख सपना,

एक के बाढ़त हे धन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

महतारी के छाती ला खन।

फोड़ पवर्त पठार,

मार बम बारूद हथौड़ा घन।।

खन खन खन खन एकेदरी खन।

झन बचा कुछु एकोकन कन।।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

एक के बाजत हे खीसा।

एक मर जावत हे,

दुख पीरा मा पीसा।।

आजे दुःख खड़े हे ठाढ़,

कोन जन काली का होही?

गुदा खाय आने मन,

छत्तीसगढिया चगले गोही।

सबले बढ़िया हे छत्तीसगढिया मन।

लुल्हाड़त हें नेता वैपारी अउ शासन।।

खन खन खन खन खन खन।।


सहेज सहेज के राखिन सियान मन।

तब कहीं जाके फुदरत हें आन मन।।

पुरखा घलो अपन पाहरो मा सब ला सिरा देतिन।

ता आज ये नवा पीढ़ी घलो जनम नइ लेतिन।।

जतन के रखिन खेत खार ताल नदी बन।

तब जाके जियत साँस लेवत हन।।

खन खन खन खन खन खन।।


हवा मा झन उड़ा माटी मा सन।

मनखें अस ता रक्सा झन बन।।

खन खन खन खन जरूरत के पूर्ति।

सुवारथ तज, बन मानवता के मूर्ति।।

धरती के सुघराई ए, नदी पहाड़ बन।

खन खन खन खन खन खन।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा(छग)

कोन हे

 कोन हे


बात बात मा चिड़थस, बता बात कोन हे।

तोर पेट पिटारा उन्ना हे, ता खात कोन हे।


नसा नाश ए कहे, भट्ठी के ठेका दार मन,

ता मनखें मन ला दारू, पियात कोन हे।।


जय जवान जय किसान के, नारा रटथस,

फेर आपस मा दुनो ला, लड़ात कोन हे।।


जल जंगल जमीन के, करथस रोज बात,

ता लोहा हीरा कोइला ला, चोरात कोन हे।।


गारी गल्ला देय मा, हो जावत हे फांसी।,

मार काट के गली मा, मेछरात कोन हे।।


कोट कछेरी नाम सुनके, थरथर काँपे कोई,

ता कोट कानून के धज्जी, उड़ात कोन हे।।


जीयत मनखें, गड़ जावत हें कबर भीतरी,

ता जुन्ना बात ला घेरी बेरी, सुनात कोन हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)

 मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)


छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।

सात करोड़ी धान डकारे, खबर आय हे अइसे।।


चांटी खाही अब पर्वत ला, दिंयार लोहा सोना।

निगल जही अजगर धरती ला, नइ बाँचे कुछु कोना।।

दूध दही गुड़ माखन मिश्री, कहही पथरा खइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जंगल ला छेरी हा चरके, लगथे बिरान करही।

नवा सड़किया उजड़ जही अब, रेंगय बछिया मरही।।

सागर के पानी पी जाही, बूड़े बुढ़वा भइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


रखवारे के नीयत नइहे, देन कोन ला बद्दी।

कोन जनी कल का हो जाही, गोल्लर तिर हे गद्दी।।

ये कलजुग अउ राजपाठ के, होही विनाश कइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द

 मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द


बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।

खाय धान ला हवै पचावत, नाचत गावत सुर में।।


मुड़ धर बइठे हे लंबोदर, बिलई देखत भागे।

धाने भर मा पेट भरे नइ, खाथें कुकरी सागे।।

सजा बदी नइ लागे वोला, चपकाये नइ खुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


घूम घूम के चारो कोती, खोजत रहिथें दौलत।

कुछ बिगाड़ नइ पाये ओखर, नीर घलो हा खौलत।।

सेना भारी डेना भारी, उमियायें मदचुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


धरा गगन पाताल घलो ला, भाजी पाला जाने।

सात पुस्त बर माल सकेले, बेच धरम ईमाने।।

बेरा रहिते दे बर पड़ही, मिला दवाई गुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजब दिन भइगे

 गजब दिन भइगे


गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।

गुरुजी के गुर्रई अउ, सुँटी बेत देखे।।


दाई के दरघोटनी, सील लोड़हा के चटनी।

नजरे नजर झूलथे, पठउँहा के पटनी।।

बबा के ढेरा, अउ बारी के केरा।

कोठी काठा मरकी, गँजाये पेरा।।

कोदईधोना झेंझरी, नियम नेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


कोठा के झँउहा, खरहेरा गरू गाय।

पपीता मुनगा पेड़, सपना मा आय।।

गोबर के छर्रा छीटा, चूल्हा के आगी।

खुमरी मैनकप्पड़, साफा पागा पागी।।

तरिया के लद्दी, अउ नदी नरवा के रेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


घठोंदा के पचरी अउ, पथरा बुलाथे।

सल्हई पँड़की बोली, गजब मन भाथे।।

जुन्ना बर पीपर अउ, छींद बोइर जाम।

हरर हरर बूता अउ, मरत ले काम।।

नाक बोहई लइका के, सियानी चेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मुक्तक-होली

 मुक्तक-होली


एक हाथ में माला, एक हाथ में भाला है।

ज़्यादातर मदहोशी का कारण हाला है।

आख़िर होली उसको क्या रंग लगाए,

जिनका तन और मन बिल्कुल काला है।।


हाथ में बम-गोली है कहकर लूट लिया,

खाली मेरी झोली है कहकर लूट लिया।

लुटेरों की न सूरत और न सीरत होती है,

"बुरा न मानो, होली है" कहकर लूट लिया।।

`

अक्षत, चंदन, रोली है,

मधुर-रस घुली बोली है।

झूमो, नाचो, गाओ यारो—

झूमकर आई होली है।।


रंग जाए ऐसा अंग नहीं है।।

मन भाए ऐसा भंग नहीं है।

मैं बदला हूँ या बदल गई होली—

रंग में भी अब वो रंग नहीं है,



गाँव, थाना, कस्बा, ज़िला—सब बाँट लिए हैं,

पर्व, त्योहार, नृत्य-लीला—सब बाँट लिए हैं।

होली रंगे तो भला किसको किस रंग में रंगे?

हरा, नीला, लाल, पीला—सब बाँट लिए हैं।।



लाया हूँ तुम्हारे लिए ये सुर्ख लाल रंग,

आँखों से उतारो चश्मा—तो रंग दूँ मैं।।


सभी तो कल है, आज कौन है।

नजर में सब है, राज कौन है।।

सब तो हाक रहे है, विद्वता अपनी

तो बताओ मूर्खाधिराज कौन है।।


खैरझिटिया

आन भरोसा-सार छंद

 आन भरोसा-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी अउ टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

नरी सुखावत हवय प्यास मा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Wednesday, 6 May 2026

मुक्तक

 एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद


पइसा बिन एटीएम हा, खड़े रथे मुँह फार।

हमर होय बैलेंस कम, दंड लेय सरकार।।

दंड लेय सरकार, आम खाता धारी ले।

बोचक जाये बैंक, झाड़ पल्ला पारी ले।।

सुने भला अब कोन, करिन का काये कइसा।

ठँउका रहिथे काम, मिले नइ खोजे पइसा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुण्डलियां-नेता घर नेता


नेता के बेटी बहू, बाई भाई पूत।

नित नेता बनते रही , भागे नइ ये भूत।।

भागे नइ ये भूत, हरे कुर्सी इँखरे बर।

होवत रहिथे खेल, इहिच मन ला नित दे बर।

गला फाड़ चिल्लाय, उहू ये पद के क्रेता।

आम चुहकहीं आम, रही नेता घर नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



फेक अकड़ गुमान- कुंडलियाँ

धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा हरेक किरदार।।

निभा हरेक किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



तीन सवारी-कुंडलियाँ


तीन सवारी देख के, काटे पुलिस चलान।

भरे खचाखच रेल हे, निकल जथे जी जान।।

निकल जथे जी जान, व्यवस्था कोन सुधारे।

लेये बर लउहाय, देय बर पल्ला झारे।

आम खास मा भेद, होय सब कोती भारी।

रोड दिखे ना भीड़, दिखे बस तीन सवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


कुर्सी-कुंडलियाँ

जनता के पीये लहू, नेता मन बन शेर।

जॉब घटय कुर्सी बढ़य, कइसन आगे बेर।।

कइसन आगे बेर, मचे कुर्सी के झगड़ा।।

कइसे होय विकास, करें घोटाला तगड़ा।।

सब ला जोर सुनाँय, कहानी संता बंता।।

इती उती के बात, सुने हँस हँस के जनता।


खैरझिटिया



अइसन काबर-कुंडलियाँ


डॉक्टर झोला छाप कहि, शासन वसुलै दंड।

नेता झोला छाप हे, मिलजुल खावँय फंड।।

मिलजुल खावँय फंड, उठावै अँगरी कौने।

नियम तोड़थें रोज, नियम नित हाँके तौने।

मनके करथें काम, सबे ला खीसा मा धर।

गरजे अँगठा छाप, डरे भल मास्टर डॉक्टर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रोय रसोई


रोय रसोई गैस बिन, गाड़ी हा बिन तेल।

चीज सबे महँगात हे, होय युद्ध जस खेल।।

होय युद्ध जस खेल, बजत हे दुख के बाजा।

बनके तिगड़म बाज, जुलुम ढावत हें राजा।।

कर नइ सके विकास, तेल टावर बिन कोई। 

रहे सदा सुख चैन, कभू झन रोय रसोई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




कोल्ड ड्रिंक्स के राज मा, नींबू सरबत फेल।

कब का हा महँगा जही, आय समझ नइ खेल।

हावी हावय उधोगी।

आम जन भुक्तभोगी।


नेता


नेता मन रैली करे, सड़क चौक ला घेर।

जाम लगे चारो डहर, खड़े पुलिस मुँह फेर।।

खड़े पुलिस मुँह फेर, देख के फुदरे नेता।।

पाके मनखें आम, नियम कहि हुदरे नेता।

शासन ला रख जेब, घुमे बन विश्व विजेता।

जनता जाए भाड़, करे मनमानी नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


फूफा


रिस्ता मा बिखराव आम होगे।

जुड़ छइयां देख आज घाम होगे।

भीतरे भीतर तिगड़म फूफू करे,

इती फूफा बिचारा बदनाम होंगे।

खैरझिटिया



किरायेदार-कुंडलियाँ


गरू लगे दाई ददा, हरू किरायेदार।

होन देन नइ कुछु कमी, खूब करे सत्कार।।

खूब करे सत्कार, लागमानी हो जइसे।

पइसा खातिर आज, मनुष रँग बदले कइसे।।

सबझन के इहि  हाल, कहे मा करू लगे।

कइसन दिन हे आय, ददा दाई गरू लगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पद पइसा- कुंडलियाँ

पद पइसा के चाह मा, बाँचे कहाँ ईमान।

झन जा बोली बात मा, बिक जाथे इंसान।।

बिक जाथे इंसान, अपन पहिचान भुलाके।

हो जाथे खामोश, मूड़ मा ताज सजाके।।

माया आघू मान, मनुष के होवव रदखद।

अवसर देख जुगाड़, करें पाए बर सब पद।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


नत्ता रिस्ता आज बाजारू होगे।

नँदात नरियर गंगा बारू होगे।

गय सुदामा किशन के जमाना,

अब दोस्ती मतलब दारू होगे।।

खैरझिटिया


सोचो यदि मच्छर साठ साल जीते,  

न जाने किसका कितना खून पीते।  

इसीलिए जल्दी मौत मिली है उसे,  

पर आदमी क्यों बन बैठा है चीते।  

खैरझिटिया


छप्पर-छानी कब छत हो गई, पता नहीं चला।  

मेरे खिलाफ़ कब जनमत हो गई, पता नहीं चला।  

कभी यहाँ, कभी वहाँ—रोज़ मंज़िल ढूँढते रहे,  

कब राह से मोहब्बत हो गई, पता नहीं चला।  

खैरझिटिया

रार मचे हे खाड़ी मा

 रार मचे हे खाड़ी मा


भात चुरे नइ काड़ी मा।

सोवा परगे हाँड़ी मा।

गैस सिरागे जेब चिरागे,

रार मचे हे खाड़ी मा।।


साग उगे नइ बाड़ी मा।

खेत पटागे झाड़ी मा।।

आफत हा अब अवसर बनगे,

लहू सुखागे नाड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


हें मजदूर दिहाड़ी मा।

फोकस हवैं खिलाड़ी मा।।

भला भरोसा काय करीं अब।

गुजराती मरवाड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


दरद उठत हे माड़ी मा।

तेल सिरागे गाड़ी मा।।

पिसागेन पर के झगरा मा,

बइठे बइठे भाँड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


कतकों बिकगे साड़ी मा।

कतकों  दारू ताड़ी मा।

नेता ला बस कुर्सी चाही,

सोज बाय अउ आड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 1 May 2026

कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद

 कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद


मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।

गँवा जथे कतको जिनगी हा, मजा करे के चक्कर मा।।


बीहड़ डोंगर पर्वत घाटी, बन बरफ समुंदर पानी।

ये सब सँग खेले के सेती, उजड़े कतको जिनगानी।।

खेलव झन पानी पुरवा ले, हवा गरेरा झक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


अपन दायरा जतका हावै, ततके नित पाँव लमावव।

कुदरत के कानून कड़ा हे, जादा झने मेछरावव।।

पानी मिल पानी कर देथे, नून होय या शक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


मनखें मन सँग हाँसव खेलव, गढ़व कढ़व कुदरत ला।

सोचें समझे के ताकत हे, छोडव मद जिद अउ लत ला।।

काम करव झन बनके अड़हा, पड़के लउहा लक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



Sunday, 26 April 2026

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे

 तभो नेता मन के कद बाढ़े हे


पानी बिजली के हाल बेहाल हे।

डहर बाट मा खुदे नरवा ताल हे।।

नियम धियम गुंडा मन बनात हें,

न ढंग के स्कूल न अस्पताल हे।

विकास घोषणा पत्र मा माढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


कपड़ा ओनहा बस सादा हे।

मन भीतर भराय खादा हे।।

पैसा पहुँच के बस पर लगाथे,

एको ठन पुरोये नइ वादा हे।।

जनता बर शनि साते साढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


फूल माला के दीवाना ये मन।

जाने बस नित खाना ये मन।।

अपन जेब मा धरके रखें सदा,

कोर्ट कछेरी अउ थाना ये मन।

तभो जयकार करइया ठाढ़े हे।

तभे नेता मन के कद बाढ़े हे।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


रावन रावन हे तिंहा, राम कहाँ ले आय।

रावन ला रावन हने, रावन खुशी मनाय।

रावन खुशी मनाय, भुलाके अपने गत ला।

अंहकार के दास, बने हे तज तप सत ला।

धनबल गुण ना ज्ञान, तभो लागे देखावन।

नइहे कहुँती राम, दिखे बस रावन रावन।।


रावन के पुतला कहे, काम रतन नइ आय।

अहंकार ला छोड़ दव, झन लेवव कुछु हाय।

झन लेवव कुछु हाय, बाय हो जाही जिनगी।

छुटही जोरे चीज, धार बोहाही जिनगी।

मद माया अउ मोह, खोज के खुदे जलावन।

नइ ते जलहू रोज, मोर कस बनके रावन।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


विजय दशमी की आप सबको ढेरों बधाइयाँ





गीत-तैं मोला भुला के जी पाबे का बता।

 गीत-तैं मोला भुला के जी पाबे का बता।



तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।

मैं तो तड़पते हौं, तैं खुद ला झन सता।।


मोर दिल के धड़कन, नाम लेथे तोर वो।

तोर दिल के धड़कन, नाम लेथे मोर वो।

तोर मोर जिनगी के, एक्के हे पता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।।


कइसे पहाबे जिनगी, तोर उमर हे सोला।

कोन बात ला धरे हस, नइहे सुरता मोला।

जिनगी मा होते रइथे, छोट मोट खता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।।


चुरत रबे रिस मा कब तक, भूत ला भूल जा।

छुटे नही जिनगी भर, मया रंग मा घूल जा।।

ये तन पुजारन ए, दिल आये देवता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


गीत-झन छोड़ मया ला।


झन छोड़ मया ला।

झन छोड़ मया ला।।

हाय मोर मया ला।

हाय मोर मया ला।।

जान के तैंहा खेल खिलौना,

झन तोड़ मया ला—----------


मया हे ता,  सांस चलत हे।

मया मा मन पंछी पलत हे।।

बिन मया के तन न मन हे,

राखे रहिबे जोड़ मया ला—------


देखेंव सपना मया ला पा के।

सरी दुनिया ले दुरिहा जाके।।

बीच मझधार मा तैंहा सजनी,

झन बोर मया ला—-----------


लड़की

जरत हवों मैं अलथी कलथी।

होगे मोर ले भारी गलती।।

अंतस मा बसाके रखहूँ,

मैं तोर मया ला—----------


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)







गरमी मा ताल नदी स्नान-सार छंद

 गरमी मा ताल नदी स्नान-सार छंद


देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।

चटचट जरथे चारो कोती, जुड़ जल जिया लुभाथे।।


पार पाय नइ नल अउ बोरिंग, नदिया अउ तरिया के।

भेदभाव नइ करे ताल नद, गुरिया अउ करिया के।

कल कल करथे धार नदी के, लहर ताल के गाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।।


कोनो कूदे कानों तँउरे, कोनो डुबकी मारे।

तन के कतको रोग रई हा, डुबकत तँउरत हारे।

बुड़े बुड़े पानी के भीतर, कतको बेर पहाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


लहरा होथे गहरा होथे, डर तक रहिथे भारी।

नइ जाने तँउरें बर तउने, मारे झन हुशियारी॥ 

जीव जंतु तक के ये डेरा, काम सबे के आथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गर्मी छुट्टी(रोला छंद)

 """"""""गर्मी छुट्टी(रोला छंद)


बन्द हवे इस्कूल,जुरे सब लइका मन जी।

बाढ़य कतको घाम,तभो घूमै बनबन जी।

मजा उड़ावै घूम,खार बखरी अउ बारी।

खेले  खाये खूब,पटे  सबके  बड़ तारी।


किंजरे धरके खाँध,सबो साथी अउ संगी।

लगे जेठ  बइसाख,मजा  लेवय  सतरंगी।

पासा  कभू  ढुलाय,कभू  राजा अउ रानी।

मिलके खेले खेल,कहे मधुरस कस बानी।


लउठी  पथरा  फेक,गिरावै  अमली मिलके।

अमरे आमा जाम,अँकोसी मा कमचिल के।

धरके डॅगनी हाथ,चढ़े सब बिरवा मा जी।

कोसा लासा हेर ,खाय  रँग रँग के खाजी।


घूमय खारे  खार,नहावय  नँदिया  नरवा।

तँउरे ताल मतंग,जरे जब जब जी तरवा।

आमाअमली तोड़,खाय जी नून मिलाके।

लाटा खूब बनाय,कुचर अमली ला पाके।


खेले खाय मतंग,भोंभरा  मा गरमी के।

तेंदू कोवा चार,लिमउवा फर दरमी के।

खाय कलिंदर लाल,खाय बड़ ककड़ी खीरा।

तोड़  खाय  खरबूज,भगाये   तन   के  पीरा।


पेड़ तरी मा लोर,करे सब हँसी ठिठोली।

धरे  फर  ला  जेब,भरे बोरा अउ झोली।

अमली आमा देख,होय खुश घर मा सबझन।

कहे  करे बड़ घाम,खार  मा  जाहू  अबझन।


दाइ ददा समझाय,तभो कोनो नइ माने।

किंजरे  घामे घामे,खेल  भाये  ना आने।

धरे गोंदली जेब,जेठ ला बिजरावय जी।

बर पीपर के छाँव,गाँव गर्मी भावय जी।


झट बुलके दिन रात,पता कोई ना पावै।

गर्मी छुट्टी आय,सबो  मिल मजा उड़ावै।

बाढ़े मया पिरीत,खाय अउ खेले मा जी।

तन मन होवै पोठ,घाम  ला झेले मा जी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

Saturday, 25 April 2026

खूनी खेल जारी हे,, काबर लालेच म खेलथस???

 खूनी खेल जारी हे,,


काबर लालेच म खेलथस???


अऊ तो रंग बहुत हे,

काबर लालेच म काबर खेलथस?

हॉसत खेलत जिनगी म,

काबर बारूद मेलथस?


पीके पानी फरी,

जुडा़ अपन नरी,

फेर काबर लहू पियत हस?

मनखे अस ता, मन म समा,

रक्सा कस का जियत हस?


हरिंयर रंग हरागे हे,

ललहूं होगे हे माटी।

थोरकन तो दया धरम देखा,

का पथरा के हे तोर छाती?

भरके बंदूक म  गोली,

निरदई कस ठेलथस......

अऊ तो रंग ............

.............खेलथस  ???


बंदूक गईंज चलायेस,

अब भाईचारा भँजा के देख !

मारे हस जेखर गोंसईंया,बेटा ल,

ओखरो घर जाके देख,!.

मनखे होके मनखे ल ,                                                                                                                                                                     खावत हस नोंच नोंच !

फिलगे हे अचरा आंसू म,

अब ताे दाई के आंसू पोंछ !

छेदा छेदा के बम बारूद म,

दाई के छाती चानी हाेगे हे !

तरिया ढोंड़गा नरवा के पानी,

ललहुं  बानी होगे हे  !

कोन देखाथे ऑखी तोला,

बता!! का बात ल पेलथस?

अऊ तो रंग................

.....................खेलथस ??


अलहन ऊपर अलहन होत हे।

जंगल तीर के गांव रोज रोत हे।

कल्हरत हे कुंदरा,

 आँसू ढारत हे महतारी।

कब जिवरा ले डर भागही,

 कब टरही गोला बारी।।

खून खराबा बने नोहे,

आखिर दरद तो तहूँ झेलथस।

अऊ तो रंग.....................

..........................खेलथस?


जंगल के जीव जीवलेवा हे,

फेर तोर जइसे नही,!

कहां लुकाबे बनवासी बन,

जब श्री राम आ जही!

छीत मया के रंग,

अऊ खेल रंग गुलाल ले,!

नाच पारा -पारा बाजे नंगाडा़!

निकल जंगल के जाल ले!

खेल खेल म का खेले तैं,

मनखे के जीव लेलेय तैं,

अति के अंत हब ले होही,

बात मोर मान ले!

लड़ना हे त देश बर लड़,

छाती फूलाके शान ले!

फूल-फूलवारी मितान बना,

आखिर काखर बात ल एल्हथस??

अऊ तो रंग.....................

.............................खेलथस????


जीतेन्र्द वर्मा

खैरझिटी(राजनांदगांव)

संगे संग मया

 संगे संग मया


अब कइसे रचही, मधूबन म रास रे ? 

मोर तीर हे बंसरी, अऊ तोर तीर हे साँस रे ।


कलेचुप खड़े हे, कदम के रूखवा ।

 तंय पूर्वाइयाँ, अऊ मंय हर पात ||


कइसे ममहाही,  मोंगरा मया के ?

 मंय हर पतझड़, अऊ तंय मधूमास रे ।।


चलत हे बरोड़ा, उड़ावत हे धूर्रा ।

 तंय हर बिरौनी, मंय हर आँख रे ।।


मइलहा मन, मनभात नइहे मनखे के ।

 मया के तरिया म, मन ल काँच रे ।।


फेंक के देख मया के गरी, छत्तीसगढ़ भर । 

अइसने अरझ जही, फेर छल ले झन फाँस रे ।।


न रो, न रोवा, खा तेंदू -चार - कोवा ।

टपका मुंहुँ ले मंदरस, अऊ मन भर हाँस रे ।।


थोरकिन ते खा, थोरकिन भूखाय ल खवा ।

 कर सिंगार महतारी के, नंवाके माथ रे ।।


ओनहा- कोनहाल, करदे अंजोर । 

मया के माटी ले, उँच-नीच ल पाट रे ।।


का हे भरोसा, जिनगी के सिरतोन म ? 

मया - पिरीत ल, झंऊहा- झंऊहा बाँट रे ।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को कोरबा (छग)

Monday, 20 April 2026

डीजे

 डीजे


जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।

लगे देख अलकरहा, मनखें कुकुर माकर होगे।।


कानफोड़वा साउंड, हिरदे दरकत बेस।

कला दिखे बला मा, आगी लगे हे टेस।।

हो हल्ला हरहा होगे, सुर संगीत बर साँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


ना कोनो  हा सुनत हें, ना कोनो गुनत हें।

लोक लाज के पट ला, सबझन चुनत हें।।

पके बस ख्याली खिचड़ी, मया मीत डाँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


छट्ठी बरही बर बिहाव, रमाएन गीता भगवद।

सबो मा हबरगे डीजे, होगे खदबद गदबद।।

कला कल्हरे कोंटा मा, बला घर नौकर चाकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

नाली

 नाली


जब ले घर के आघू मा, नाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बड़े बड़े मच्छर बड़, भभन भनन करथे।

जिवरा करला जाथे, नींद कहाँ परथे।।

का संझा का बिहना, चुँहकय लहू ला।

जर बुखार धरेच रथे, घर मा कहूँ ला।।

बइद डाक्टर हर घर के, माली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बारो महीना भरे रथे, नहवई धोवई मा।

नाक पिरा जाथे, नाली के बस्सई मा।।

दौना के दम घुटगे, तुलसी तिरियागे।

गमके नइ गोंदा, भौरा तितली भागे।।

ना ठउर थाली, ना दसमत के डाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


शहर के देखा सीखी, गाँव बउरागे।

सुविधा हा दुविधा, बनके तनियागे।।

नल बोरिंग सुख्खा हे, नाली भराये।

धरती के छाती मा, कांक्रीट हे छाये।।

ना आज बने हावय, ना काली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

तेंदू- दोहा- चोपाई छंद

 तेंदू- दोहा- चोपाई छंद


लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।

काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।


तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।

छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।


तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।

टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।


बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।

औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।


तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।

तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।


लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।

अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाथे घलो केंवची जर हा।।


आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।

हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।


तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।

फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।


जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।

भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

विश्व हिरदय दिवस म हिरदय- सार छंद

 विश्व हिरदय दिवस म


हिरदय- सार छंद


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम जग नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम सब चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

घाट न घर के-रोला छंद

 घाट न घर के-रोला छंद


छोटे मोटे काम, गिनावय कर बड़ हल्ला।

श्रेय लेत अघुवाय, श्राप सुन भागय पल्ला।।

खुद के खामी तोप, उघारय गलती पर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


सोंचे समझे छोड़, करे मनमानी रोजे।

पर के ठिहा उजाड़, अटारी खुद बर खोजे।।

झटक आन के अन्न, खाय नित उसर पुसर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


दाई ददा ल छोड़, नता के किस्सा खोले।

मीठ मीठ बस बोल, जहर सब कोती घोले।।

कभू होय नइ सीध, रहे अँइठाये जरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


रखे पेट मा दाँत, खोंचका पर बर कोड़े।

अवसर पाके पाँव, गलत पथ कोती मोड़े।

पहिर स्वेत परिधान, चले नित कालिख धरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


घर के भेद ल खोल, मान मरियादा बारे।

आफत जब आ जाय, रहे देखत मुँह फारे।।

बरसे अमरित धार, फुले तभ्भो नइ झरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


पापी बनके पाप, करे नित लेवय बद्दी।

जाने नही नियाव, तभो पोटारे गद्दी।।

दानवीर कहिलाय, आन के धन बल हरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


मरहम धरके हाथ, मले के करे दिखावा।

सुलगे बनके रोज, भीतरे भीतर लावा।।

रहे सदा मिटकाय, मया सत मीत ल चरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 18 April 2026

घाम घरी के फर- सार छंद

 घाम घरी के फर- सार छंद


किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।

रंग रूप अउ स्वाद देख सुन, लड्डू फूटय मन मा।।


पिकरी गंगाअमली आमा, कैत बेल फर डूमर।

जोत्था जोत्था छींद देख के, तन मन जाथें झूमर।।

झुलत कोकवानी अमली हा, डारे खलल लगन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


तेंदू तीरे अपने कोती, चार खार मा नाँचै।

कोसम कारी कुरुलू कोवा, कखरो ले नइ बाँचै।

डिहीं डोंगरी के ये फर मन, राज करै जन जन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


पके पपीता लीची निमुवा, लाल कलिंदर चानी।

खीरा ककड़ी खरबुज अंगुर, करथे पूर्ती पानी।।

जर बुखार लू ला दुरिहाके, ठंडक लाथे तन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Sunday, 5 April 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                छत्तीसगढ़ सबे प्रकार ले अग्रणी राज मा गिने जाथे, चाहे प्राकृतिक छटा होय, पर्वत पठार, जंगल खान खदान होय, कल कारखाना होय या फेर संस्कृति संस्कार।  छत्तीसगढ़ के संस्कृति सब ला अपन कोती खींच लेथे। संस्कृति संस्कार के बाना बोहे छत्तीसगढ़ के परब तिहार के घलो अलगे महत्ता हे। वइसने एक तिहार हे, आदिशक्ति दाई दुर्गा के उपासना के तिहार नवरात्रि।  नवरात्रि जेन बछर मा दू बेर आथे। एक कुँवार मा अउ एक चैत मा। कुँवार नवरात्रि अउ चैत नवरात्रि दूनों मा आदि शक्ति के उपासना,आराधना अउ पूजा पाठ जम्मो छत्तीसगढ़ के मनखें मन तन्मयता ले करथें। ये बेरा मा छत्तीसगढ़ के जम्मो गांव शहर, मंदिर देवाला अउ घरो-घर मा ज्योत जलाए जाथे। माता के भक्ति मा विधुन होके सेउक मन माता के आराधना करथें, सेवा अउ जस गीत गाथें। छत्तीसगढ़ मा कई कोरी देवी मंदिर हे, जिहाँ नवराति के पावन बेरा मा सुघ्घर भक्तन मन के मेला भराथे। डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी, रतनपुर के महामाई, कोरबा के कोशगाई, धमतरी के बिलई माता, चंद्रपुर के चन्द्रहादिनी, दुरुग के चंडी माई, सूरजपुर के कुदुरगढ़हिन माई, बंजारी दाई, भवानी माई, बूढ़ी माई आदि कस अउ कतको देवी मन पूरा छत्तीसगढ़ मा अपन आशीष अउ मया दुलार लुटावत हें। ता अइसन भक्क्तिमय बेरा मा कवि मन के कलम कइसे चुप रही सकथे? उंखरो कलम ले माता के भक्ति भाव, आखर रूपी गंगा बरोबर बहिथे। संगीतकार मन के महिनत अउ साज बाज के संग कवि के लेखनी ही गीत ला जनम देथे। नवराति के बेरा मा हजारों मनभावन गीत सुने बर मिलथे। ता आवन कवि मन के कविता मा देवी आराधना के दर्शन करथन।

              छत्तीसगढ़ के कोरा मा बिराजे दाई रणचंडी ला माथ नवावत लाला फूलचंद श्रीवास्तव जी लिखथें- 

*रणचंडी चढ़ आये खप्पर। नइ देखे अपन भेष।*

*जय जय जय जय कैसिल्या के जय देश।।*


                माटी पूत महान गायक अउ कवि लक्ष्मण मस्तूरिहा जी मन माता रानी के कतको अकन गीत कविता लिखें हें,अउ स्वर घलो दिए हें--

*हो मइया, तोर तीर आएंव तार लेबे।स्वर-कविता कृष्णमूर्ति*


*रतनपुर वाली महामाया मैया हे पुरवान।*

*शारद रूप सवांगे तोरे, जश गूँजें आसमान।*


              रतनपुर महामाई अउ डोगरगढ़हिन दाई बमलाई ला भाव पुष्प अर्पित करत कवियित्री आशा झा जी मन कहिथें-

*रतनपुर मा नरियर धर। बमलाई मा मूड़ नवा।*

*भोरमदेव मा बदना बदके। बिगड़े काम बना।।*


           हथबन्द के वरिष्ठ कवि चोवा राम 'बादल' जी मन माता रानी बर लिखथें--

*लाल चुनरिया लाल सँवागा, शेर सवारी तोर।*

*रावाँभाँठा के बंजारी, निकले धरती फोर।।*

*डोंगरगढ़ मा बमलाई के, लगे रथे दरबार।*

*शरण परे गोहारत हाववँ, सुन ले मातु पुकार।।*


           गाँव गाँव मा माँ शीतला अउ बंजारी दाई के बसेरा होथे, उन ला माथ नवावत, सुमधुर गीतकार छंदकार बलराम चन्द्राकर जी चौपाई के माध्यम ले कहिथें-

*नमन शीतला माँ कल्याणी।बंजारी माँ शक्ति भवानी।*


          कवि नन्दकुमार नन्दगँइहाँ दंतेश्वरी देवी ला सुमरत कहिथें-

*दंतेश्वरी दंतेवाड़ा तोर डेरा हे। जंगल भीतरी मा बसेरा हे।*

*संखनी डंकनी दू नदिया के। तोर तीर मा घेरा हे।।*


           माता रानी के हजारों सेवा गीत लिखइया, हर्ष कुमार बिंदु के कलम के एक भाव, दंतेश्वरी दाई बर-

*दंतेश्वरी तोर हवय महिमाके शोर।चारो दिशा मा मइया मोर।*


             कवि मोहन लाल वर्मा जी मन नवरात मा माता रानी के मनभावन दरबार के वर्णन करत कथें--

*आगे हे नवरात, बरत हे दियना बाती।*

*जगमग-जगमग जोत, करय उजियारी राती।*

*माता के दरबार, भगत मन आथें जाथें।*

*करके पूजा-पाठ, शक्ति ला माथ नवाथें।।*


          जस सम्राट दुकालू यादव के गीत बिना माता रानी के कोरा सुन्ना लगथे, उंखर गाये हजारों जस सेवा गीत, गांव गली मा नवरात्रि के बेरा सहज सुनाथे, वइसने एक गीत हे, गीतकार एम के कुर्रे के लिखे--

*मूड़ मा बिराजे हवै महामाई ना। मोहनी बरन लागे।*


           युवा कवि अउ गीतकार अनिल सलाम जी कहिथें-

*चंडी दाई के आएंव दुवार। आज मोर भाग जागे।*


             छंदकार ज्ञानू दास मानिकपुरी जी मन चंद्रसेनी दाई ला श्रद्धा सुमन अर्पित करत अपन कविता मा कहिथें

*चंद्रपुर तोर गाँव हे। चंद्रसेनी तोर नाँव हे।*


             पारितोष धीरेंद्र जी मन माता रानी बर लिखथें-

*दाई रतनपुर महामाई बरोबर। डोंगरगढ़ बमलाई आय।*

*कोरबा के सरमंगला दाई। छुरी के कोसगाई आय।*


            छत्तीसगढ़ जे देवी मन ला सुमरत श्रेमासिंह ठाकुर जी मन लिखथें--

*डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी ला सुमरंव,रायपुर के दुग्धा-धारी।*

*जय छत्तीसगढ़ सिरपुर चण्डी,राजिम लोचन खल्लारी।*

*बागबाहरा के चण्डी डोंगरी, कुंवर अछरिया बमलाई।*


             हमर छत्तीसगढ़ के सबे जिला मा कतकोन नामी देवी मन बिराजमान हें, अपन कविता मा सबे देवी मन ला सुमरत आचार्य तोषणकुमार चुनेंद्र जी मन लिखथें---

*सरगुजा म सरगुजहीन दाई दन्तेवाडा दन्तेश्वरी।*

*बालोद के मोर गंगा मंइया मल्हार म डिडिनेश्वरी।*

*अड़भार म अष्टभुजी मंइया मड़वा के मडवारानी।*

*कोरबा में सरमंगला दाई जशपुर काली भवानी।*


          छंदकार बोधनराम निषादराज विनायक जी मन लिखथें-

*आशीष बने, लेव  सबोझन, ये समलाई।*

*रिक्षिन   दाई, चंडी  दाई, अउ  महमाई।।*

*सर्वमंगला,   हे   बंजारी,    हे   बमलाई।*

*सत्ती   दाई,    गौरी - गौरा,  कोसागाई।।*


            छंद त्रिभंगी मा माता रानी ला मोरो भाव पुष्प अर्पित हे-

*नवरात लगे हे, आस जगे हे, माता रानी, आय हवै।*

*दर्शन पाये बर, जस गाये बर, सेउक सब जुरि-याय हवै।*

*सब करथें सेवा, पाथें मेवा, ढोलक माँदर, झाँझ बजे।*

*हे जोत जँवारा, तोरण तारा, रिगबिग रिगबिग, द्वार सजे।*

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


चैनल इंडिया में स्थान देने हेतु, स्वराज करुण जी को विशेष आभार, नमन