Thursday, 12 February 2026

गीत-पतझड़

 गीत-पतझड़


आथे पतझड़ दे जाथे संदेश रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक।।


बनना हे बढ़िया ता, तज दे विकार ला।

अपन बूता खुद कर, झन देख चार ला।

आवत जावत रहिथे, सुख दुख के बेरा।

समय मा चलबे ता, कटथे घन घेरा।।

विधि विधना ला, माथा टेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


राम अउ माया, संग मा नइ मिले।

सदा दिन बिरवा मा, फुलवा नइ खिले।

परसा सेम्हर, पात झर्रा मुस्काथे।

फागुन महीना, पुरवा संग गाथे।

पूरा पानी ला झन कभू छेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


नाहे धोये मा नइ, अन्तस् धोवाये।

मन ला उजराये ते, ज्ञानी कहाये।

मन हावै निर्मल ता, जिनगी हे चोखा।

करबे देखावा ता, खुद खाबे धोखा।

देथे प्रकृति संदेशा नेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक----


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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छबि छंद


छाये बहार, चहुँओर यार।

आहे बसंत, सुख हे अनंत।


गावै बयार, नद ताल धार।

फइले उजास,भागे हतास।


सरसो तियार,बाँटे पिंयार।

नाचे पलास,कर ले तलास।


कइथे कनेर,उठ छोड़ ढेर।

बोइर बुलाय,आमा झुलाय।


जिवरा ललाय,अमली जलाय।

मुँह ला फुलाय,लइका रिसाय।


बन बाग मात,दिन मान रात।

होके मतंग,छीचे ग रंग।।


माँदर बजाय,होली जलाय।

सबला सुहाय,शुभ मास आय।


बाजे धमाल,होवय बवाल।

गा फाग गीत,ले बाँट प्रीत।


रचगे कपाल,हे गाल लाल।

फगुवा लुभाय,कनिहा झुलाय।


हे मीठ तान,मधुरस समान।

जब जब सुनाय,आलस चुनाय।


खैरझिटिया

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गोपी छंद- बसंत ऋतु


बसंती गीत पवन गाये।

बाग घर बन बड़ मन भाये।

कोयली आमा मा कुँहके।

फूल के रस तितली चुँहके।


करे भिनभिन भौरा करिया।

कलेचुप हे नदिया तरिया।।

घाम अरझे  अमरइया मा।

भरे गाना पुरवइया मा।।


पपीहा शोर मचावत हे।

कोयली गीत सुनावत हे।

मगन मन मैना हा गावै।

परेवा पड़की मन भावै।।


फरे हे बोइर लटलट ले।

आम हे मउरे मटमट ले।

गिराये बर पीपर पाना।

फूल परसा मारे ताना।।


फुले धनिया सादा सादा।

टमाटर लाल दिखे जादा।

लाल भाजी पालक मेथी।

घुमा देवय सबके चेथी।


मसुर अरहर मुसमुस हाँसे।

बाग बन खेत जिया फाँसे।

चना गेहूँ अरसी सरसो।

याद आवै बरसो बरसो।


सरग कस लागत हे डोली।

कहे तीतुर गुरतुर बोली।

फूल लाली हे सेम्हर के।

बलावै बिरवा डूमर के।।


बबा सँग नाचत हे नाती।

खुशी के आये हे पाती।

नँगाड़ा झाँझ मँजीरा धर।

फाग ले जावै पीरा हर।।


सुनावै हो हल्ला भारी।

मगन मन झूमै नर नारी।

प्रकृति सज धज के हे ठाढ़े।

मया मनखे मा हे बाढ़े।।


मटक के रेंगें मुटियारी।

पार खोपा पाटी भारी।

नयन मा काजर ला आँजे।

मया ममता खरही गाँजे।।


राग फगुवा के रस घोरे।

चले सखि मन बँइहा जोरे।

दबाये बाखा मा गगरी।

नहाये खोरे बर सगरी।


पंच मन बइठे बर खाल्हे।

मगन गावै कर्मा साल्हे।

ढुलावय मिलजुल के पासा।

धरे अन्तस् मा सुख आसा।।


हदर के खावत हे टूरा।

चाँट अँगरी थारी पूरा।।

चुरे हे सेमी अउ गोभी।

पेट तन जावै बन लोभी।


टमाटर चटनी नइ बाँचे।

मटर गाजर मूली नाँचे।

पपीता पिंवरा पिंवरा हे।

ललावत सबके जिवरा हे।।


हाट हटरी मड़ई मेला।

जिंहा होवय पेलिक पेला।

ढेलुवा सरकस अउ खाजी।

मजा लेवय दादी आजी।।


जनावत नइहे जड़काला।

प्रकृति लागत हावै लाला।

खुशी सुख मन भर बाँटत हे।

मया के डोरी  आँटत हे।


सबे ऋतुवन के ये राजा।

बजावै आ सुख के बाजा।

खुशी हबरे चोरो कोती।

बरे  नित दया मया जोती।


खैरझिटिया

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