खन खन खन खन खन खन।।
उगती ला खन।
बुड़ती ला खन।
भंडार ला खन।
रक्सेल ला खन।
निकाल कोयला लोहा हीरा।
झन देख कखरो दुःख पीरा।।
भाड़ मा जाय खेत खार घर बन।
खन खन खन खन खन खन।।
खन खन खन खन,
जिहां बइला के घुंघरू बाजे।
खन खन खन खन,
तिहां होवत हावय आजे।।
एक के उजड़त हे सुख सपना,
एक के बाढ़त हे धन।
खन खन खन खन खन खन।।
खन खन खन खन,
महतारी के छाती ला खन।
फोड़ पवर्त पठार,
मार बम बारूद हथौड़ा घन।।
खन खन खन खन एकेदरी खन।
झन बचा कुछु एकोकन कन।।
खन खन खन खन खन खन।।
खन खन खन खन,
एक के बाजत हे खीसा।
एक मर जावत हे,
दुख पीरा मा पीसा।।
आजे दुःख खड़े हे ठाढ़,
कोन जन काली का होही?
गुदा खाय आने मन,
छत्तीसगढिया चगले गोही।
सबले बढ़िया हे छत्तीसगढिया मन।
लुल्हाड़त हें नेता वैपारी अउ शासन।।
खन खन खन खन खन खन।।
सहेज सहेज के राखिन सियान मन।
तब कहीं जाके फुदरत हें आन मन।।
पुरखा घलो अपन पाहरो मा सब ला सिरा देतिन।
ता आज ये नवा पीढ़ी घलो जनम नइ लेतिन।।
जतन के रखिन खेत खार ताल नदी बन।
तब जाके जियत साँस लेवत हन।।
खन खन खन खन खन खन।।
हवा मा झन उड़ा माटी मा सन।
मनखें अस ता रक्सा झन बन।।
खन खन खन खन जरूरत के पूर्ति।
सुवारथ तज, बन मानवता के मूर्ति।।
धरती के सुघराई ए, नदी पहाड़ बन।
खन खन खन खन खन खन।।
जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'
बाल्को, कोरबा(छग)