Friday, 22 May 2026

सार छंद -जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 सार छंद -जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"


मुखारी(दतुन)


ब्रस मंजन के माँग बाढ़गे, दतुन देख फेकागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


खेत खार अब कोन ह जावै, तोड़ै कोन मुखारी।

मंजन आगे आनी बानी, होवै मारा मारी।

करँव भला का गोठ शहर के, गाँव ह घलो झपागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


दवा बरोबर दतुन जान के, पहली सबझन खोजे।

बम्हरी नीम करंज जाम के, दतुन करे सब रोजे।

दाँत मसूड़ा मुँह के रोग ह, करत मुखारी भागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


एक मिनट मा दाँत चमकगे, चाबे के नइ कंझट।

जीभी आगे अब नइ हावय, चिड़ी करे के झंझट।

दाँत बरत हे मोती जइसे, चाबत चना खियागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


दाँत घलो हा पोंडा परगे, ब्रस मंजन के सेती।

चना ठेठरी चाब सके नइ, चाब पाय का रेती।

शरद गरम नइ सहि पावत हे, असली नकली लागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद

 पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद


कतको गाड़ी रद्द हे, कतको मा बड़ झोल।

सफर रेल के जेल ले, का कमती हे बोल।

का कमती हे बोल, रेलवे के सुविधा मा।

देख मगज भन्नाय, पड़े यात्री दुविधा मा।

सिस्टम होगे फेल, उतरगे पागा पटको।

ढोवत हावै कोल, भटकगे मनखे कतको।


ना तो कुहरा धुंध हे, ना गर्रा ना बाढ़।

तभो ट्रेन सब लेट हे, लाहो लेवय ठाढ़।

लाहो लेवय ठाढ़, रेलवे अड़बड़ भारी।

चलत ट्रेन थम जाय, मचे बड़ मारा मारी।

टीटी छिड़के नून, कहै आ टिकट दिखा तो।

यात्री हें हलकान, होय सुनवाई ना तो।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Monday, 18 May 2026

पर उपदेस (सार छंद)

 पर उपदेस (सार छंद)


देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।

स्वारथ मा सन काम करत हें, दया मया सत लेस।


धरम करम के बात करैं नित, कहैं झूठ झन बोलौ।

सुख सुम्मत मा जिनगी जीयौ, जहर कभू झन घोलौ।

बात मया मरहम के बोलँय, बाँटय उही कलेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


नशापान के हानि बतावँय, रोजे भाषण पेलें।

उहू भुलागे बात बचन ला, अध्धी पाव ढकेलें।

बिहना लागे संत गियानी, संझा बदले भेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


मनखे मनखे एके आवन, छोड़ौ कहै लड़ाई।

तिही बड़े छोटे नइ मानै, दाई ददा न भाई।

आन छोड़ दे अपने मन ला, पहुँचावत हें ठेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


कहिस तउन करके दिखलाइस, तुलसी बुद्ध कबीरा।

तज दिस धन दौलत वैभव ला, किसन पाय बर मीरा।

आज मनुष तज सही गलत ला, मारत हावँय टेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Thursday, 7 May 2026

मोर गॉव अब शहर बनगे.....

 ....मोर गॉव अब शहर बनगे.....

शहरिया शोर म दबगे,सिसन्हिन के ताना|

लहलहावत खेतखार म बनगे,बड़े-बड़े कारखाना|

नदिया नहर जबर होगे ,डाहर बनगे बड़ चंवड़ा|

पड़की परेवा फुरफुंदी नंदात हे,नंदात हे तितली भंवरा|

सड़क तीर के बर पीपर कटगे, कटगे अमली आमा|

सियान के किस्सा नई भॉय,सब देखे टीभी डरामा|

पाहट के आहट,अउ संझा के शॉति आज कहर बनगे...|

मैय हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज  शहर बनगे.........|


संगमरमर के मंदिर ह,देवत हवे नेवता|

कहॉ पाबे गली म,अब बंदन चुपरे देवता?

तरिया ढोड़गा सुन्ना होगे,घर म होगे पखाना सावर|

बोंदवा होगे बिन रूख राई के,डंगडंग ले गड़गे टावर|

मया के बोली करकस होगे,लईका होगे हुशियार|

अत्तिक पढ़ लिख डारे हे,दाई ददा ल देथे बिसार|

बिहनिया के ताजा हवा घलो,अब जहर बनगे....|

मै हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज शहर बनगे...|


मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारा संग, सबला बॉट डरिस|

जंगल अउ रीता भुंइया ल,चुकता चॉट डरिस|

छत के घर म, कसके तमासा|

नई करेय कोई कखरो ले आसा|

होरी देवारी तीजा पोरा,घर के डेहरी म सिमटागे|

चाहे कोनो परब तिहार होय,सब एक बरोबर लागे|

नक्सा खसरा संग आदमी बदलगे होगे ताना बाना|

चाकू छुरी बंदूक निकलगे  सजगे  मयखाना |

चपेटागे बखरी बियारा,पैडगरी अब फोरलेन डहर बनके....|

मै हॉसव कि रोववौ मोर गॉव आज  शहर बनगे......|

                                    जीतेन्द्र कुमार वर्मा

                                   खैरझिटी (राजनॉदगॉव)

कलम रोंये हे

कलम रोंये हे

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सब बर रोटी पोये हे,

तभो बिन खाय सोये हे......|

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे..............||


हे खई-खजाना ओली म,

मीठ मंदरस हे बोली म||

सिधोत बारी-बखरी;खेत-खार,

दिन गुजरगे रंधनी खोली म||

जब ले धरे जनम,

तब ले करे जतन||

घर-बन;लइका; गोंसैंया के,

बेटी;महतारी;सुवारी बन|

मुंदरहा पहिली जागे हे ,

रतिहा आखिर म सोये हे.....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे...........||


कोख के पीरा कोन मेर बॉचे|

रोवत  लइका  कोरा म  हॉसे|

सोना  चॉदी  हीरा  बनाइस,

रहिके  जिनगी  भर  कॉचे|

बनके दरपन घर के,

सजाये घर-परिवार ल|

कोन बोह पाही ये भुंइयाँ म,

महतारी  के  भार  ल|

फरे साग-भाजी;महके फूल-फूलवारी,

बाढ़े रूख-राई ;महतारी जे बोये हे....|

जे बेर लिखे हे, गोठ महतारी के,

ते  बेर  कलम  रोये हे....................|


बारे हे दिया तुलसी चंवरा म,

लिपे-पोते हे अँगना दुवारी||

मुचमुच हॉसे कुंदरा ह घलो,

जेन   घर   हे      महतारी||

महतारी अवतार दुरगा काली के|

देखाइस दुख म  घलो जी के|

हॉसिस ऑखी के ऑसू ल पी के|

फेर कोनो नइ देखिस घाव ल छी के|

खुदे मइलाके ;गंगा कस,

जग के  पाप ल धोये हे....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते   बेर   कलम   रोये  हे......||

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                 📝  जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को( कोरबा )

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मोर महतारी मोर अभिमान

हम नही

 हम नही


रिस्तें बिगड़ने का, किसी को कोई गम नही।

आज सबको सिर्फ पैसा चाहिये, हमदम नही।।


खंजर से खुदे जख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

जुबां से बढ़कर जमाने में, बारूद बम नही।।


खुद को राजा समझ रहें हैं, रील वालें।

रीयल में उनमें, जरा सा भी दम नही।।


एकता अखंडता भाई चारा, दिखावा है।

जहर जाति धर्म का, हो रहा है कम नही।


पता नही, ये पैमाना है या मौका परस्ती,

देश संविधान से चलेगा, पर हम नही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

खन खन खन खन खन खन।।

 खन खन खन खन खन खन।।


उगती ला खन।

बुड़ती ला खन।

भंडार ला खन।

रक्सेल ला खन।

निकाल कोयला लोहा हीरा।

झन देख कखरो दुःख पीरा।।

भाड़ मा जाय खेत खार घर बन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

जिहां बइला के घुंघरू बाजे।

खन खन खन खन,

तिहां होवत हावय आजे।।

एक के उजड़त हे सुख सपना,

एक के बाढ़त हे धन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

महतारी के छाती ला खन।

फोड़ पवर्त पठार,

मार बम बारूद हथौड़ा घन।।

खन खन खन खन एकेदरी खन।

झन बचा कुछु एकोकन कन।।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

एक के बाजत हे खीसा।

एक मर जावत हे,

दुख पीरा मा पीसा।।

आजे दुःख खड़े हे ठाढ़,

कोन जन काली का होही?

गुदा खाय आने मन,

छत्तीसगढिया चगले गोही।

सबले बढ़िया हे छत्तीसगढिया मन।

लुल्हाड़त हें नेता वैपारी अउ शासन।।

खन खन खन खन खन खन।।


सहेज सहेज के राखिन सियान मन।

तब कहीं जाके फुदरत हें आन मन।।

पुरखा घलो अपन पाहरो मा सब ला सिरा देतिन।

ता आज ये नवा पीढ़ी घलो जनम नइ लेतिन।।

जतन के रखिन खेत खार ताल नदी बन।

तब जाके जियत साँस लेवत हन।।

खन खन खन खन खन खन।।


हवा मा झन उड़ा माटी मा सन।

मनखें अस ता रक्सा झन बन।।

खन खन खन खन जरूरत के पूर्ति।

सुवारथ तज, बन मानवता के मूर्ति।।

धरती के सुघराई ए, नदी पहाड़ बन।

खन खन खन खन खन खन।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा(छग)