Friday, 18 September 2026

काँसी फूल-सरसी छंद

 काँसी फूल-सरसी छंद


सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।

छटा धरा के लगे सुहावना, जब काँसी मुस्काय।।


हरियर धरती सादा फूल मा, सज हो जाथे खास।

मनुष देव अउ पितर घलो ला, आये फुलवा रास।

देत बिदाई बरसा ऋतु ला, शरद मास परघाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


चारो मूड़ा छाये दिखथे, स्वेत काँस के फूल।

हाथ हलाके नाचे लगथे, पुरवइया मा झूल।।

दिखे गगन कस दिन भर धरती, बिहना बरफ जनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


तना फूल जड़ सब काँसी के, आथे अड़बड़ काम।

माटी ला बोहान देय नइ, पके घास दै दाम।।

डोरी बहरी खटिया मचिया, जाने तौन बनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बढ़त चमचाई- लावणी छंद

 बढ़त चमचाई- लावणी छंद


घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।

अउ बाहिर मा रिस्ता जोड़े, रातउ दिन चमचाई ले।।


बात बात मा मुँहफट होके, नियम धियम गनवात रथे।

हक के बात घरे मा करथे, बाहिर मुड़ी नवात रथे।।

कथनी करनी जेखर करिया, ओहर बड़े कन्हाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


ददा बनावत हे आने ला, दरदर भटका खावत हे।

देखावा के नत्ता जोरे, कुकुर बरोबर धावत हे।।

बाज आत नइहे धक्का खा, रहि रहि पुछी हलाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।


चमचागिरी बढ़त हे भारी, आघू अउ अब का होही।

स्वभिमानी गिनके बाचे हे, कोन सुमत समता बोही।।

सत के बाना कोन बोहही, उबर असत लत खाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

बाढ़त बिजली बिल-(16-12)

 बाढ़त बिजली बिल-(16-12)


टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।

नेता अधिकारी बैपारी, लूटत हावैं मिल के।।


वाट वाट कहि वाट लगावै, रुपिया वसुलै भारी।

छोट वाट के लट्टू पंखा, मीटर के मति हारी।।

बता बजावत रहिबों ताली, अउ केदिन मुँह सिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


बरत बगाबग एक ठिहा हे, एक ठिहा अँधियारी।

सरकारी बिल सर जावत हे, सिस्टम जस गंधारी।।

पाले हमर कोइला पानी, आन लेग के ढिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।


सोलर सिस्टम लेवव कहिके, चलत हवै मनमानी।

हाँसत हावय हिही हिही बड़ , घर मा बइठ अडानी।।

बँटे रेवड़ी आनी बानी, हमर चाम ला छिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

Sunday, 13 September 2026

हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी भाँखा म अन्तर्सम्बन्ध

 हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी भाँखा म अन्तर्सम्बन्ध

          जइसे पानी ढलान कोती बहिथे, उसने भाषा घलो सरलता ल धरत जाथे। अब हिंदीच ल ले लौ संस्कृत- पाली- प्राकृत- तेखर बादअपभ्रंस होवत हिंदी। जइसे सरल सहज मनखे ल सबो चाहथे, वइसने भाषा के सरलता घलो ओखर अपनाये के कारण बनथे। पूर्वी हिंदी के अंतर्गत हमर छत्तीसगढ़ी भाषा आथे, जेमा अवधी, बघेली अउ हमर छत्तीसगढ़ी भाषा मिंझरे हे। ब्राम्ही लिपि ले उपजे जइसे हिंदी हे वइसने छत्तीसगढ़ी घलो हे। आज जब हमन हिंदी के बात करथन, तब आधुनिक युग के पहली के कवि सुर, तुलसी, कबीर, जायसी, केशव, बिहारी जैसे कवि मनके कालजयी रचना घलो हमर आँखी म झुलथे, जेमन के भाषा अवधी, ब्रज के साथ साथ कई ठन मिंझरा भाषा बोली रहिस। आधुनिक युग म तो ठेठ खड़ी बोली म जबर रचना होइस, जेमा भारतेंदु, पन्त, निराला, प्रसाद,महादेवी वर्मा, मैथलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, जइसे कतको कवि लेखक मन अपन जीवन ल खपा दीन। मोर कहे के मतलब हे कि हिंदी के समानांतर ही ब्रज अउ अवधी अपन स्थान रखथे, त छत्तीसगढ़ी काबर नइ रखे? जबकि हमर भाँखा घलो लगभग हिंदी के सबे गुण ल समेटे हे।  हो सकथे हमर साहित्य कमसल होही, या फेर ब्रज अउ अवधी कस ऊंचाई नइ पाइस होही। फेर हमर साहित्य घलो पोठ हे, कतको उत्कृष्ठ साहित्य हमर पुरखा कवि मन लिखे हे अउ आजो लिखावत हे, अइसन उदिम होवत देख इही कल्पना मन म आथे कि वो दिन दूर नइहे जब छत्तीसगढ़ी घलो ब्रज, अवधी के साहित्य कस हिंदी म मिल जही। 

        अब बात हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के अन्तर्सम्बन्ध के हो जाय। दूनों भाँखा के महतारी एके आय(ब्राम्ही), दूनो के रंग रूप, चेहरा- मुहरा एक्के जइसे हे, दूनो सगे बहिनी बरोबर हे। आजकल के कवि लेखक मन हिंदी वर्णमाला के जम्मो आखर ल बउरत घलो हे, जे बड़ खुसी के बात आय। *आन राज के कई मनखे मन हमर छत्तीसगढ़ी के बारे म कहिथे कि हिंदी ल बिगाड़ दव त छत्तीसगढ़ी हो जही* का सच म अइसने हे???? आपो मन कस मोरो न हे। येखर ले बचे बर छत्तीसगढ़ी के पाँच परगट शब्द ल बउरे ल लगही अउ हिंदी ल तोड़ मरोड़ करे ले बचेल लगही। हमर भाँखा के व्याकरण घलो हिंदी ले पहली बने हे, जेन हम सब बर गर्व के बात ये। एक बात अउ *जइसे मैं उप्पर म परगट शब्द लिखेंव, जे हिंदी के प्रगट के अपभ्रंश ये। परगट कहे म घलो अर्थ म कोनो प्रकार के भटकाव नइ लगत हे, अउ ये छत्तीसगढ़ म पूर्णतः चलन म घलो हे। अइसने कई ठन शब्द हे, जे हिंदी के अपभ्रंश के रूप म हमर भाँखा म रचे बसे हे ,अउ चलत घलो हे। जइसे ह्रदय(हिरदे),उम्र(उमर), दर्द(दरद), बज्र(बजुर), तीर्थ(तीरथ), छतरी(छत्ता)त्यौहार(तिहार) आदि आदि। कई ठन शब्द ल चिटिक बदलाव के साथ घलो बउरथन, जइसे व्याकुल(ब्याकुल), विनास(बिनास), व्रत(बरत), पर्व(परब), व्यवहार(ब्यवहार), वरदान(बरदान), वंदन(बंदन), वजन(बजन), वन(बन) आदि आदि। फेर येला देख के कतको झन कहि देथे की छत्तीसगढी म "व" नइ होय,, तेहा नइ जमे। पहली चलत घलो रिहिस हे, फेर ये बात गलत हे की 'व' ल लिखेच नइहे। होवत , बोवत, खोवत, पोवत काखर शब्द ये,,,, हमरे न,, त कइसे "व" नइ होही। यदि पहली कस(व बर ब लिखबों) आजो करबों त वर(दूल्हा) ल बर कहिबो। तब तो पेड़ वाले बर, काबर वाले बर अउ दूल्हा वाले बर, सब एक्के म जर बर जही। आज के लइका मनके रामेश्वरी, जागेश्वरी, रामेश्वर, ईश्वर, श्रवण, आदि घलो होथे, तिखर मरना हो जही। मोर एके इशारा हे अर्थ संगत शब्द ल बउरे जाय, अउ निर्थक या जेन वो संज्ञा ल बदल देय ओखर ले परहेज करना चाही। जइसे हिंदी म प्रकृति अब येला परकिरिती, प्रकार ल परकार, प्रकास ल परकास, क्षमा ल छिमा,शक्कर ल सककर, रायगढ़ ल रइगढ़,आदि आदि। ये मन थोड़ीक भ्रम पैदा करथे, तेखर सेती येमा चिंतन जरूरी हे अउ सही अउ स्पस्ट शब्द के माँग आज होवत घलो हे।*

       हिंदी के आखर अउ शब्द छत्तीसगढ़ी म घुरे हे,काहन या फेर  छत्तीसगढ़ी के शब्द मन हिंदी म घुरे हे काहन,,, येला सिद्ध करे म हमला कोनो ल नइ घूरना चाही। काबर भाँखा गतिमान हे, पानी असन स्वरूप बदलत जथे, कखरो पोगरी घलो नोहे। *एक छत्तीसगढिया मनखे घलो हिंदी लगभग समझ जथे, अउ हिंदी वाले छत्तीसगढ़ी, त येखर ले बढ़के अउ का अन्तर्सम्बन्ध देखन* हिंदी वाले घलो सहज छत्तीसगढ़ी पढ़ सकथे,अउ छत्तीसगढ़ी वाले घलो आखर ज्ञान के बाद हिंदी। काबर के पहली घलो केहेंव दुनो के रंग, रूप, चेहरा-मुहरा एके हे दुनो के *क* एक्के हे दुनो के *ट* एक्के हे। हिंदी के पिक्चर ल घलो छत्तीसगढिया मन मन लगाके देखथे अउ समझथे ,अब छत्तीसगढ़ी के पिक्कर आन कोती काबर नइ देखे जाय येखर बर खुद ल सोचेल लगही। *ब्रज भाँखा ले हिंदी के शान बाढ़िस, अवधी भाँखा ले हिन्दी के शान बाढ़िस त छत्तीसगढ़ी भाँखा ले हिंदी के शान काबर नइ बाढ़ही*।खच्चित बाढ़ही फेर उसने साहित्य हमर बीच म आय उसने पठन, पाठन अउ वाचन होय अतकी विनती हे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में अंतर्संबंध

 

हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में अंतर्संबंध

​जिस प्रकार जल ढलान की ओर स्वाभाविक रूप से बहता है, ठीक उसी प्रकार भाषा भी सरलता को अपनाती हुई प्रवाहित होती है। हिंदी के विकासक्रम को ही देखें—संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, फिर अपभ्रंश से होते हुए आधुनिक हिंदी का स्वरूप सामने आया। जिस तरह सरल और सहज स्वभाव का मनुष्य हर किसी का प्रिय बन जाता है, वैसे ही भाषा की सरलता और सहजता भी उसके सर्वस्वीकार्य होने का मुख्य कारण बनती है।

​पूर्वी हिंदी के विशाल प्रांगण में छत्तीसगढ़ी भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, जहाँ अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी का सुंदर संगम दिखाई देता है। जिस प्रकार हिंदी की उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि से जुड़ी है, उसी गौरवशाली परंपरा से हमारी छत्तीसगढ़ी भी उपजी है। आज जब हम हिंदी की बात करते हैं, तो आधुनिक युग से पूर्व के सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, केशव और बिहारी जैसे कालजयी कवियों की रचनाएँ हमारी आँखों के सामने तैरने लगती हैं। इन महान कवियों की भाषा अवधी और ब्रज के साथ-साथ कई लोकबोलियों से परिपुष्ट थी। आधुनिक युग में जब ठेठ खड़ी बोली का दौर आया, तब भारतेंदु, पंत, निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद जैसे अनगिनत साहित्यकारों ने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य साधना में खपा दिया।

​मूल बात यह है कि जब हिंदी के समानांतर ब्रज और अवधी का अपना एक प्रतिष्ठित स्थान है, तो छत्तीसगढ़ी का क्यों न हो? जबकि हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा भी हिंदी के लगभग सभी समृद्ध गुणों को अपने भीतर समेटे हुए है। यह संभव है कि हमारा साहित्य मात्रा में थोड़ा कम रहा हो या फिर इसे ब्रज और अवधी जैसी ऐतिहासिक ऊँचाई न मिली हो; फिर भी हमारा छत्तीसगढ़ी साहित्य अत्यंत समृद्ध और प्रामाणिक है। हमारे पूर्वज कवियों ने अनेक उत्कृष्ट रचनाएँ रची हैं और आज भी यह सृजन-प्रवाह निरंतर जारी है। इस भागीरथ प्रयास को देखकर यह विश्वास दृढ़ होता है कि वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ी भी ब्रज और अवधी के साहित्य की तरह हिंदी के विशाल सागर में समाहित होकर उसकी शोभा बढ़ाएगी।

​अब बात करते हैं हिंदी और छत्तीसगढ़ी के अंतर्संबंध की। दोनों ही भाषाओं की जननी एक ही है—ब्राह्मी। दोनों का रंग-रूप, बनावट और स्वरूप एक जैसा है; मानो दोनों सगी बहनें हों। आज के आधुनिक कवि और लेखक छत्तीसगढ़ी में हिंदी वर्णमाला के सभी अक्षरों का प्रयोग निसंकोच कर रहे हैं, जो अत्यंत प्रसन्नता का विषय है।

​अन्य राज्यों के कुछ लोग कभी-कभी कह देते हैं कि "हिंदी को थोड़ा बिगाड़ दो तो छत्तीसगढ़ी बन जाती है।" क्या वास्तव में ऐसा है? बिल्कुल नहीं। इस भ्रांति को दूर करने के लिए हमें छत्तीसगढ़ी के अपने पाँच मौलिक (प्रकट) शब्दों का सही प्रयोग करना होगा और हिंदी को जबरन तोड़-मरोड़कर लिखने से बचना होगा। हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा का व्याकरण तो हिंदी से भी पहले लिखा जा चुका है, जो हम सभी के लिए अत्यंत गर्व का विषय है।

​उदाहरण के लिए, 'परगट' शब्द हिंदी के 'प्रकट' का ही तद्भव रूप है। 'परगट' कहने से अर्थ में कोई भटकाव या परिवर्तन नहीं आता और यह संपूर्ण छत्तीसगढ़ में पूरी तरह से प्रचलित भी है। ऐसे अनेक शब्द हैं जो हिंदी के अपभ्रंश या तद्भव रूप में हमारी भाषा में रचे-बसे हैं; जैसे—हृदय (हिरदे), उम्र (उमर), दर्द (दरद), वज्र (बजुर), तीर्थ (तीरथ), छतरी (छत्ता), त्योहार (तिहार) आदि।

​कुछ शब्दों का प्रयोग थोड़े से उच्चारण परिवर्तन के साथ किया जाता है; जैसे—व्याकुल (ब्याकुल), विनाश (बिनास), व्रत (बरत), पर्व (परब), व्यवहार (ब्यवहार), वरदान (बरदान), वंदन (बंदन), वन (बन) आदि। लेकिन इन प्रयोगों को देखकर कुछ लोग यह मान लेते हैं कि छत्तीसगढ़ी में 'व' वर्ण होता ही नहीं है—यह धारणा अनुचित है। प्राचीन समय से ही इसका प्रयोग होता आया है। 'होवत', 'बोवत', 'खोवत', 'पोवत' जैसे शब्द किसके हैं? हमारे ही तो हैं, फिर कैसे कह सकते हैं कि 'व' नहीं है? यदि हम हर जगह 'व' के स्थान पर 'ब' ही लिखते रहेंगे, तो 'वर' (दूल्हा) को 'बर' कहना पड़ेगा। इससे तो वटवृक्ष (बरगद), 'काबर' (क्यों) और 'वर' (दूल्हा) सब एक ही में मिलकर भ्रम पैदा कर देंगे। आज के बच्चों के नाम रामेश्वरी, जागेश्वरी, रामेश्वर, ईश्वर, श्रवण आदि रखे जाते हैं, अतः भाषा की शुद्धता का लोप नहीं होना चाहिए।

​मेरा स्पष्ट संकेत यही है कि हमें अर्थसंगत शब्दों का प्रयोग करना चाहिए तथा निरर्थक या संज्ञा का अर्थ बदल देने वाले शब्दों से परहेज करना चाहिए। जैसे हिंदी का 'प्रकृति' शब्द है, इसे 'परकिरिती', 'प्रकार' को 'परकार', 'प्रकाश' को 'परकास', 'क्षमा' को 'छिमा', 'शक्कर' को 'सककर' या 'रायगढ़' को 'रइगढ़' लिखना भ्रम उत्पन्न करता है। इसलिए इस विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक है और आज स्पष्ट एवं शुद्ध शब्दों की माँग उठ रही है।

​हिंदी के शब्द छत्तीसगढ़ी में घुले-मिले हैं या छत्तीसगढ़ी के शब्द हिंदी में, इसे सिद्ध करने के लिए हमें किसी से उलझने की आवश्यकता नहीं है। भाषा तो जल की भाँति सदा गतिमान रहती है, वह अपना स्वरूप बदलती रहती है और किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होती। एक साधारण छत्तीसगढ़ी भाषी व्यक्ति हिंदी को सहजता से समझ लेता है और हिंदी भाषी व्यक्ति छत्तीसगढ़ी को; इससे बड़ा अंतर्संबंध और क्या हो सकता है?

​अक्षर ज्ञान के बाद एक हिंदी भाषी व्यक्ति सहज छत्तीसगढ़ी पढ़ सकता है और छत्तीसगढ़ी भाषी व्यक्ति हिंदी। क्योंकि दोनों का आधार और बनावट एक ही है—दोनों का 'क' एक है, दोनों का 'ट' एक है। हिंदी की फ़िल्में छत्तीसगढ़ का जनमानस बड़े चाव से देखता और समझता है, अब छत्तीसगढ़ी सिनेमा को भी अन्य प्रदेशों तक पहुँचाने के लिए हमें स्वयं प्रयास करना होगा।

​जिस प्रकार ब्रजभाषा और अवधी ने हिंदी की शान और समृद्धि को बढ़ाया, उसी प्रकार छत्तीसगढ़ी भाषा भी हिंदी के वैभव को अवश्य बढ़ाएगी। निश्चित ही यह गौरव बढ़ेगा, बस आवश्यकता इस बात की है कि हमारे बीच वैसा ही उत्कृष्ट साहित्य रचा जाए, और उसका निरंतर पठन-पाठन तथा वाचन होता रहे।

— जितेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)

अब बता-गजल

 अब बता-गजल


बिन काम के पद नाम होगे अब बता।

पैसा पहुँच मा काम होगे अब बता।।1


दू टेम के रोटी कहाँ होइस नशीब।

गारत पछीना शाम होगे अब बता।2


केंवट के शबरी के पुछइया कोन हे।

रावण के थेभा राम होगे अब बता।3


कहिथें चिन्हाथे खून के रिस्ता नता।

बिरवा ले बड़का खाम होगे अब बता।4


नइ मोल मिल पावत हे असली सोन के।

लोहा सहज नीलाम होगे अब बता।5


फल फूल तारिक चीज बस अउ आदमी।

का खास सब तो आम होगे अब बता।6


धन जोर के करबोंन का रटते हवन।

कोठी फुटिस गोदाम होगे अब बता।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

किरदार- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

 किरदार- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया(तेरा धियान किधर है)

                  वास्तव में जिंदगी एक रंगमंच है और हम सभी उसके किरदार हैं। इस रंगमंच पर हर व्यक्ति को कोई न कोई भूमिका मिली है—किसी को पिता की, किसी को माँ की, किसी को शिक्षक, विद्यार्थी, अधिकारी, कर्मचारी या नागरिक की। भूमिका छोटी हो या बड़ी, उसका महत्व इस बात में है कि उसे हम कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से निभाते हैं।

                   किरदार केवल पहनावे या बाहरी रूप का नाम नहीं है। असली किरदार हमारे आचरण, व्यवहार और जिम्मेदारियों से सामने आता है। आज हम अनेक अवसरों पर किसी पात्र का रूप धारण तो कर लेते हैं, लेकिन उसके गुण और मर्यादा को अपनाना भूल जाते हैं। भगवान शिव, श्रीराम या श्रीकृष्ण का रूप धारण करना केवल वेशभूषा बदलना नहीं है। उस रूप की गरिमा और मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। मनोरंजन अपनी जगह है, लेकिन आस्था और चरित्र की मर्यादा का सम्मान उससे ऊपर है।।                                  हमारी परंपरा में रामलीला और नाट्य-मंचन के कलाकार केवल संवाद बोलने तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि अपने पात्र की गरिमा को आत्मसात करने का प्रयास करते थे। दर्शक को अभिनय में पात्र दिखाई देता था, केवल अभिनेता नहीं। यही अभिनय की वास्तविक सफलता थी। आज साधन और मंच बढ़ गए हैं, विशेषकर सोशल मीडिया ने प्रदर्शन के नए अवसर दिए हैं, लेकिन बाहरी रूप को ही किरदार समझ लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म और कर्तव्य का महत्व समझाया। जीवन में भी यही बात लागू होती है। परिस्थितियाँ हमें कोई भूमिका दे सकती हैं, लेकिन उस भूमिका को किस निष्ठा से निभाना है, यह हमारे हाथ में है। केवल अधिकार चाहना आसान है, कर्तव्य निभाना कठिन; केवल सम्मान पाना सरल है, सम्मान के योग्य बनना कठिन।

                 विडंबना यह है कि हम अपना किरदार तो नही निभा पा रहे है, और दिखावे के लिए देवी देवताओं के रूप लेकर, उनके आदर्श को धूमिल करने की कुचेष्टा कर रहें है। दूसरों के प्रति संवेदना, सत्य, ईमानदारी, सहयोग और जिम्मेदारी—यही मनुष्य के सबसे बड़े आभूषण हैं। यदि इन्हें ही जीवन से निकाल दिया जाए तो कोई भी बाहरी वेश हमारे किरदार को सार्थक नहीं बना सकता। किस्सा चाहे मंच का हो या जीवन का, असली पहचान संवादों से नहीं, आचरण से होती है। कपड़े बदलने से किरदार नहीं बदलता, किरदार तब बदलता है जब आचरण बदलता है।

               जिंदगी का मंच एक दिन समाप्त हो जाएगा, लेकिन हमारे निभाए हुए किरदार की छाप लोगों की स्मृतियों में रह जाएगी। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हमें कौन-सा किरदार मिला, बल्कि यह है कि हमने उसे कितनी ईमानदारी से निभाया। जीवन ने हमें जो भूमिका दी है, उसे बोझ नहीं, जिम्मेदारी समझकर निभाना ही सच्चे अर्थों में जिंदगी जीना है।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को, कोरबा(छग)