Thursday, 16 July 2026

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वैध शराब-कुंडलियाँ

 वैध शराब-कुंडलियाँ


पीयव वैध शराब ला, हे अवैध बेकार।

साथ देव सरकार के, झन पारव गोहार।

झन पारव गोहार, कोष बर हवै जरूरी।

जनता मन के मांग, इही मा होही पूरी।।

भट्ठी बढ़ही रॉज5, मरौ चाहे तुम जीयव।

सरकारी फरमान, वैध दारू ले पीयव।।


मानो शासन बात ला, होठ दाँत मा दाब।।

वैध शराब अमृत हरे, जहर अवैध शराब।

जहर अवैध शराब, बचो पीये ले येला।

बेंचे जेला लोग, कई मोहल्ला ठेला।।

वैध शराब बिसाव, स्वाद ओखर पी जानो।

भरत हवै नित कोष, बात शासन के मानो।।


भट्ठी हे सरकार के, काबर जाथस भूल।

दू पइसा बचही कही, इती उती झन ढूल।

इती उती झन ढूल, तीर के भट्ठी मा जा।

होही यदि तकलीफ, बात शासन ला बतला।।

असली मंद खरीद, मना शादी अउ छट्ठी।

झांक तीर तखार, हवै सरकारी भट्ठी।


 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


चुप हैं


बाबा लोग लत लोभ और प्रपंच लेकर चुप हैं।

नेता साहब वैपारी नोटों का बंच लेकर चुप हैं।।

आम जनता शिफ्ट बलेनो पंच लेकर चुप हैं।।

वक्ता कवि लेखक माइक मंच लेकर चुप हैं।।

अय्यासी करने वाले माल टंच लेकर चुप हैं।।

दल्ला लोग टूर और पंच लंच लेकर चुप हैं।।


खैरझिटिया


पावस पावन-सवैया


पावस पावन आ बरसावन लागत हे रस धार सखा।

तरिया परिया हरिया भरगे जल लांघत हावय पार सखा।।

गरजे बदरा चमके बिजुरी जस मातय हावय रार सखा।

झिंगुरा खग दादुर मोर ह गावय लागय रोज तिहार सखा।।


खोर गली बन बाग कली सब नीर ल पी मुस्कात जही।

ताल कुआँ नदिया नरवा भरही तब दादुर बात कही।।

सूरज देव लुकाय रही त बिहान घलो हर रात रही।

झींगुर चातक मोर खुशी अब मोर जिया म हमात नही।।


पावस के बड़ पावन बूंद ल लावत हे बरसा धरके।

हाँसत हे बखरी अउ रोज नहावत हे परवा घर के।।

ताल खुशी म नाचत हे सुर छेड़त हे डबरा भरके।

मंद फुहार धरे बरसा सब जीव म आस भरे झरके।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा


https://youtu.be/j2V9_XbiozI?si=nW_f6ZdokiZwPjCg


मनखें मनके अति-सार छंद


सब के संख्या हवै बराबर, ताल मेल तभ्भे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


हवा दवा फर फूल देय बन, बन बिन नइ जिनगानी।

ताल नदी नरवा नदिया दै, जीव जंतु ला पानी।।

माटी उप्पर छाभे गारा, ये जग संकट में हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


मनखें मनके स्वारथ आघू, कुछु हा नइ बाँचत हें।

हाय हटर कर रतन जोरके, देख देख नाँचत हें।

हाथी माँछी कुकुर बिलाई, धरती मा सब्बे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


कोनो काटे बन बिरवा ला, कोनो नदिया पाटे।

मछरी कुकरी कुकुर मार के, लहू घलो ला चाँटे।।

मनुष अकेल्ला जी पाही का, कतका अवकाते हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


मनखें करैं जे मन मा आये, कइसन किरिया खाहे।

अपन जघा मा सबें जियत हें, तभो जातरी आहे।।

भुगते पड़ही करनी के फल, लिखे विधाता जे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


काव्याञ्जलि- दलित जी

 काव्याञ्जलि- दलित जी


करिस छंद के जौन हा, लिख लिख नित बढ़वार।

पग मा माथ नवाँव मँय, पिरो भाव के हार।।1


नाँव मिटाये नइ मिटै, करनी जेखर पोठ।

साहित के आगास मा, बरै सियानी गोठ।।2


पैरी जब जब बाजही, मुख मा आही गीत।

दया मया सत बाढ़ही, फुलही फलही मीत।।3


रचना रिगबिग हे बरत, भले बछर गे बीत।

डहर नवा गढ़ते हवै, जनकवि जी के गीत।।4


जनकवि जी के काव्य ए, जन जन के आवाज।

पढ़े दलित जी मंच ले, करै जिया मा राज।।5


नाँव अमर जुगजुग रही, जब तक पुरवा नीर।

जनकवि कोदू राम जी, लिखिन जगत के पीर।।6


साहित के वो देंवता, जनकवि वो कहिलाय।

बगरै बाँढ़य छंद बड़, आस ओखरे आय।।7


सँजो ददा के आस ला, अरुण निगम जी आज।

पालत पोंसत छंद ला, करत हवैं निक काज।।8


साधक बन सीखत हवैं, कतको कवि मन छंद।

महूँ करत हँव साधना, लइका अँव मतिमंद।।9


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा)


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संगीत की दुनिया ही अलग है

 संगीत की दुनिया ही अलग है


संगीत में शक्ति है,

संगीत में विरक्ति है।

संगीत में अभिव्यक्ति है,

संगीत में भक्ति है।

संगीत में भाव है,

संगीत में जुड़ाव है।

संगीत में लगाव है,

संगीत नाव है।

संगीत के बिना सब अलग-थलग है,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत में धरती है,

संगीत में अंबर है।

संगीत में कानन है,

संगीत में घर है।

संगीत में सादगी है,

संगीत में आज़ादगी है।

संगीत हकीम है,

संगीत असीम है।

संगीत में थिरकते सबके पग हैं,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत हवा है,

संगीत दवा है।

संगीत साज है,

संगीत आवाज़ है।

संगीत परवाज़ है,

संगीत रिवाज़ है।

संगीत तलाश है,

संगीत मोह-पाश है।

संगीत विश्वास है,

संगीत सबसे ख़ास है।

संगीत सुनते जड़-चेतन नभ-खग हैं,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत में प्रीत है,

संगीत अमृत है।

संगीत में जीत है,

संगीत में रीत है।

संगीत आनंद है, 

संगीत परमानंद है।

संगीत में न भूख है, न प्यास है,

कला साधकों के लिए संगीत एक आस है।

जो संगीत से भागे, वह ठग है,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत सुकून है,

संगीत धुन है।

संगीत प्रसून है,

संगीत बिन सब सून है।

संगीत भोर है,

संगीत शाम है।

संगीत स्वर है,

संगीत आराम है।

संगीत उड़ान है,

संगीत उत्थान है।

संगीत ईमान है,

संगीत पहचान है।

संगीत में समाया सारा जग है,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


 जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा (छग)


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साथी कस हवा बरोड़ा-लावणी छंद

 साथी कस हवा बरोड़ा-लावणी छंद


हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।

बिजली चमके बादर गरजे, घूमन बन बन हाथी कस।।


बादर पानी देखत लइका, घर भीतर आज लुकाये।

फेर हमन ला हवा गरेरा, संगी के असन बुलाये।।

भाग ठिहा ले खेत खार मा, रेंगत राहन पाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


घाम घरी भर खेत खार मा, डारे राहन सब डेरा।

कांदा कूसा फर फुलवा बर, रोज लगावन फेरा।।

बाग बगीचा खेत मेड़ मा, रहन बइठ शरनाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


आमा अमली काइत जामुन, बेल लान बिन बिन के।

एक जघा सँकला के बाँटन, फर फुलवा गिन गिन के।।

खेत खार बन बाग मया ला, गठियाय रहन थाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छत्तीसगढ़ मा अभिवादन के परम्परा मा जोहार अउ जय जोहार*

 *छत्तीसगढ़ मा अभिवादन के परम्परा मा जोहार अउ जय जोहार*


गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज भगवान के नाम के महिमा के बखान करत लिखथें कि- 

1,एक घड़ी आधो घड़ी, पुनि आधो के आध।

 तुलसी चर्चा राम के, कटे कोटि अपराध।।


2,कलयुग केवल नाम अधारा।

 सुमर सुमर नर उतरहीं पारा।।


                आदिजुग ले मनखें मन भगवान के महिमा के गुनानवाद करत आवत हें, नाम लेवत आवत हें, चाहे भजन कीर्तन होय या फेर दुआ सलामती या फेर अभिवादन। भारतीय संस्कृति मा अभिवादन करे के जुन्ना परम्परा हे। अभिवादन मा जय राम, राम राम, जय श्री कृष्ण, राधे राधे, सीताराम, जय भगवान, जय भोले, हरि ओम, जय माता दी आदि ...... कस कतकोन नाम मनखें मन लेथें। जेमा वो विधाता के नाम तो लेवाते हे, संगे संगे इही अभिवादन के बहाना मनखें के आत्मीय जुड़ाव, मया ममता अउ सादर सम्मान के भाव घलो दिखथें। वइसे तो बड़े के छोटे मन पाँव पायलागी करथें, फेर गांव घर के रोज मिलइया लइका, सियान, जवान मन ला अभिवादन करके आदर भाव दे जाथें। अभिवादन के शब्द बोले बर बड़े छोटे नइ लगे सब अपन जुड़ाव अउ विनम्रता देखावत अभिवादन करथें। छत्तीसगढ़ मा मितान बदे के घलो रिवाज। एक मितान दूसर मितान ल घलो बरोबर अभिवादन के शब्द बोलथे, जैसे- सीताराम मितान, जय जोहार मितान, सीताराम गंगाजल, गंगाबारु आदि आदि।

                        मनखें मनके आपस मा मेल मिलाप के बेरा अभिवादन स्वरूप भगवान मनके नाम लेय के ये जुन्ना परम्परा, आजो सरलग चलन मा हे। आज आधुनिक काल मा गुडमार्निंग, गुड़ इवनिंग,हाय हलो,नमस्ते----आदि  कस कतको नवा शब्द घलो सुनब मा मिलथे। पंथ अउ समाज के अनुसार घलो अभिवादन मा जय सतनाम, साहेब बन्दगी, जय बूढ़ादेव, जय बड़ादेव, जय लोधेश्वर, जय बहादुरीन कलारिन, जय राजिम दाई, जय शकाम्भरी........ आदि कस अउ कतकोन अपन अपन इष्ट देव के नाम लेवत मनखें मन दिखथें। धरम अनुसार घलो अलग अलग अभिवादन के शब्द प्रचलित हे, जैसे सलाम, खुदा हाफिज आदि आदि। हमर भारत वर्ष मा भिन्न भिन्न राज के पहिचान उंखर अभिवादन ले घलो हो जथे, जइसे तमिलनाडु अउ केरल मा वणक्कम, पंजाब मा सत श्री काल, राजस्थान मा खम्बा घणी, गुजरात मा केम छो ---आदि चलथे, वइसने हमर राज छत्तीसगढ़ के बहुप्रचचित अभिवादन के शब्द आय जोहार। हमर छत्तीसगढ़ के पार परम्परा, संस्कृति संस्कार अउ तीज तिहार मा कृषि अउ ऋषि संस्कृति के साथ साथ आदिवासी संस्कृति के घलो बरोबर योगदान हें। "जोहार" जे आदिवासी संस्कृति के उपज आय।  जेला मुख्य रूप ले आस्ट्रो एशियाई/मुंडारी या सन्थाली भाषा ले निकले एक आदिवासी अभिवादन के शब्द माने जाथे। जेखर मूल अर्थ मा प्रकृति के प्रति भाव समर्पण समाहित हे। "जोहार" हमर छत्तीसगढ़ के संगे संग उड़ीसा, झारखंड, मध्यप्रदेश अउ पश्चिम बंगाल के वनांचल क्षेत्र मा अभिवादन के रूप मा सुने बर मिलथे। जोहार माने जो अउ हार या जउन हार गय हे, उंखर मन बर या उंखर जयकार, अइसन शाब्दिक अर्थ बिल्कुल भी नोहे। बल्कि जोहार के एक  अर्थ- जय+हर ला माने जाथे, जय मतलब जय जयकार अउ हर माने प्रकृति के देवता भगवान शिव। मतलब जोहार मा भगवान शिव अउ प्रकृति के जयजयकार समाहित हे। भगवान शिव आदिवासी संस्कृति मा अपन विशेष स्थान रखथें, बड़ादेव, बूढ़ादेव......आदि रूप मा भी भगवान शिव ला पूजे भी जाथे। जोहार के मूल मा सबके कल्याण करइया भगवान शिव अउ प्रकृति के जयकार हे। जोहार कहे से देश, राज,पेड़ प्रकृति अउ मनखें संग जीव जानवर आदि सबो के सलामती अउ बढ़वार के भाव झलकथे। 

           कतको मनखें मन जोहार के संग जय जोड़के "जय जोहार" घलो कथें, जेला सियान/ जानकार मन सही नइ माने।जइसे  राम राम ह जय राम होइस, जय, भोले ह जय भोले होइस, सतनाम ह सतनाम  होइस.......... लगथे इही सब के देखा देखी अउ भाव प्रवाह  के सेती जोहार घलो आज "जय जोहार" के रूप ले ले हे। जानकार मन जोहार शब्द ला अपन आप मा पूर्ण अउ सार्थक अभिवादन के शब्द माने हें, फेर अभी चलन मा जय जोहार घलो हे। जय जुड़े के एक कारण यहू हो सकथे। जइसे खेवनहार, पालनहार, संहार------ आदि शब्द ल देखबों ता येमा हार मतलब हरना अर्थ हे। आखिर खेवनहार/पालनहार/डोंगहार------ तो वो विधाता/भगवान ही आय। मतलब जोहार  माने जो हरन करने वाला ए, अर्थात जो दुख हरइया ए। अइसन दुख हरइया के जय हो, इही भाव मा "जय जोहार" घलो प्रासंगिक लगथे। जोहार के घलो दू भेद दिखथे- सेवा जोहार अउ जय जोहार। आज  सेवा जोहार बनांचल अउ जयजोहार मैदानी छत्तीसगढ़ के अभिवादन के शब्द बन गय हे। उड़ीसा, झारखंड,पश्चिम बंगाल अउ मध्यप्रदेश के वनांचल क्षेत्र मा आजो अभिवादन बर जोहार ही बोले जाथें। 

                     पहली बेर जोहार कोन बोलिस होही, ये शब्द इहाँ कब ले प्रचलित हे, ए डाहर जाबों ता रामचरित मानस के अयोध्याकांड मा एक चोपाई हे, जेमा निषादराज जी महराज भगवान राम ले मिले के बेरा उन लाजोहार करत अपन सैन्य साज के बढ़वार के कामना करत दिखथें--

*चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥*

माने निषादराज जी द्वारा त्रेता युग मा ये शब्द के प्रयोग के वर्णन मिलथे। निषादराज जी पेड़ प्रकति के बीच रहत रिहिन ते पाय के वनांचल मा ये शब्द आजो प्रचलित हे। जोहार ले ही जोहारना बने हे, जेखर मतलब हे अपन श्रद्धा भाव ला व्यक्त करना। यादव भाई मन के दोहा मा सुने बर घलो मिलथे, "ठाकुर घर जोहारेल गेंव बुचुवा हड़िया मा बासी रे" माने  मिलेल जाना, भाव प्रकट करना एखर मूल अर्थ ए। पौनी पसारी के नेंग करत गांव मा ठाकुर, लोहार, बैगा आदि मन घलो घर घर जोहारथे अउ अपन पौनी पसारी लेथें।। कुछ मन भड़के, चिढ़े या खिसियात बेरा घलो कथें कि "मैं फलाना ला बनेच जोहारेंव" फेर एखर मतलब सकारात्मक न होके अपन रिस/रोष ला व्यक्त करना हे।

                     जोहार शब्द ला लेके छत्तीसगढ़ी मा कतको कन मनमोहक गाना सुने बर मिलथे। 


कुछ गीत के मुखड़ा प्रस्तुत हे- जोहर जोहर मोर ठाकुर देवता/ 

बिहना के जोहार लेले, मुस्काके जोहार लेले।

 देवी जोहार-जोहार/

 तोला गाड़ा गाड़ा जोहार/

तैं जोहार लेबे संगी/

जोहार ले सगा/

छेरछेरा जोहार/

तोला सौ सौ जोहार, घेरी बेरी जोहार।।

सेवा जोहार/

जोहार जोहार दाई/

तोला जोहार दाई/जोहार हे जोहार हे/

जोहार जोहार देव 

जोहार बुढ़िदाई------


आदि कतकोन गीत मा जोहार संघरे हे, कुछ गीत मन मा मा जय जोहार भी हे। जइसे- जय जोहार ले ले मोर भैया.... अउ कतकोन गीत हे

  

                    जोहार सिर्फ अभिवादन के शब्द नोहे, येला  बोले भर नइ जाय बल्कि बोलत बेरा हाथ घलो जोड़े जाथे, जेमा सम्मान, विनम्रता अउ आदर के भाव झलकथे। सार मा कहन ता जोहार मा जग कल्याण के भाव, आदर सत्कार, विनम्रता,अभिवादन, सुवागत आदि के संगे संग एक भावात्मक जुड़ाव हे। ता आप जम्मो ला मोर जोहार हे पायलागी हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)