Saturday, 24 October 2026

छत्तीसगढ़ी ला पोठ करे बर समाचार पत्र पत्रिका मन के भूमिका--*

 


*छत्तीसगढ़ी ला पोठ करे बर समाचार पत्र पत्रिका मन के भूमिका--*


                मुँह ले हम कोनो बोली भाँखा ल कतको कहि सुन डरन, फेर जब तक वोला कलम शब्द नइ देय, तब  तक वो बोली- भाँखा साहित्य के रूप नइ ले सके। छत्तीसगढ़ी भाँखा के बारे म अपन विचार रखे के पहली कहूँ कि-जब हिंदी साहित्य के आधुनिक काल चालू होइस, अउ  अपन जुबान म बसे भाषा ल कलमकार मन पोथी म उतारिन ताहन का कहना , हिंदी के बढ़वार सतत होते गिस, अउ आज देखते हन हिंदी खूब फलत फूलत हे। हिंदी खड़ी बोली जब कागज म उतरिस त, वोला पढ़े बर कतको झन मन हिंदी सीखिन। उदाहरण बर सुरता आवत हे, देवकीनंदन खत्री के उपन्यास *चन्द्रकान्ता(1898),*  ये अतिक प्रसिद्ध अउ नामी होइस कि जउन मन हिंदी नइ जानत रिहिस तहू मन, वोला पढ़े बर हिंदी भाषा ल सीखे के उदिम करिन। भारतेंदु, राजा लक्ष्मण सिंह, जगन्नाथदास रत्नाकर,श्रीधर पाठक, अबिकाचरन गुप्त, ठाकुर जगमोहन सिंह, राधाकृष्ण दास,लाला भगवान दींन, -------जइसन कतको अउ मूर्धन्य साहित्यकार मन  हिंदी भाषा म खड़ी बोली ल स्थापित करे बर जी जान लगाके भाषा के सेवा करिन। ये सब साहित्यकार मन साहित्य के संगे संग हिंदी भाषा ल  सब तीरन पहुचाये खातिर पत्र पत्रिका घलो निकालिन, जेखर ले भाषा के बढ़वार दुगुना होय लगिस।  छत्तीसगढ़ी भाषा म घलो साहित्य के संगे संग पत्र पत्रिका बरोबर देखे बर मिलथे, हमर पुरखा साहित्यकार-भाषाविद  मन साहित्य रचे के संगे संग छत्तीसगढ़ी भाषा ल सब तीर सहज पहुँचाये बर पत्र पत्रिका के सहारा लिन, जेमा खबर, कहिनी, लेख, कविता अउ ज्ञान विज्ञान के बात समाहित रहय। अंचल के समाचार अउ कवि लेखक मनके विचार लेख, कविता ल जन जन तक पहुँचाये बर कतको हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के अखबार निकलिस, जेखर ले हमर छत्तीसगढ़ी भाँखा के विकास होइस अउ आजो घलो पत्र पत्रिका, साहित्य, रेडियो, टीवी, सम्मेलन आदि के माध्यम ले सतत होवत हे। 


              छत्तीसगढ़ म पत्र पत्रिका के जनक के रूप म माधवराव सप्रे जी ल जाने जाथे, जे वामनराव लाखे अउ रामराव चिंचोलकर के सहयोग ले सन 1900 म, गौरेला पेंड्रा ले *छत्तीसगढ़ मित्र* नामक मासिक पत्रिका निकालिन। 1955 म मुक्तिबोध जी के सम्पादन म रायपुर ले *छत्तीसगढ़ी* नामक मासिक पत्रिका निकलिस।  रायपुर ले श्री सुशील वर्मा जी के सम्पादन म *मयारू माटी* अउ श्री रंजन लाल पाठक के सम्पादन म *छत्तीसगढ़ सहयोग* नामक पत्रिका जन जन तक पहुँचिस।  डाँ विनय कुमार पाठक जी के सम्पादन म बिलासपुर ले *भोजली, धान के कटोरा, चिंगारी के फूल* अउ सन 1998 म श्री नन्दकिशोर तिवारी जी के सम्पादन म *लोकाक्षर* जइसे लोकप्रिय समाचार पत्रिका हिंदी के संगे संग छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर समर्पित रिहिस। लक्ष्मण मस्तूरिहा के सम्पादन मा *माटी कहे कुम्हार से* सुशील भोले के सम्पादन मा मयारू माटी,  सुधा वर्मा जी के सम्पादन म *मड़ई*,  शकुंतला तरार जी के सम्पादन म *नारी सम्बल*, दुर्गाप्रसाद पारकर जी के संपादन म  *लोकमंजरी*, जयंत साहू जी के सम्पादन म  *अंजोर,* विश्वनाथ वैशम्पायन जी के सम्पादन म  *विचार समाचार*, तुकाराम कंसारी जी के सम्पादन म  *राजिम टाइम्स* जइसे अनेक मासिक, त्रैमासिक अउ साप्ताहिक समाचार पत्र पत्रिका लोकप्रिय होइस। श्याम वर्मा जी के संयोजन म  *मोर भुइयां* जइसे रेडियों पत्रिका घलो छत्तीसगढ़ी भाषा ल पोठ करे बर सतत लगे हे। 

                वर्तमान मा समाचार पत्र मन म घलो छत्तीसगढ़ी भाषा म एक साप्ताहिक कालम आथे। दैनिक भास्कर म सूर्यकांत द्विवेदी जी के सम्पादन म *संगवारी*, पत्रिका म गुलाल वर्मा जी के सम्पादन म  *पहट*, हरिभूमि म डाँ हिमांशू द्विवेदी जी अउ डाँ दीनदयाल साहू जी के सम्पादन म *चौपाल*, नवभारत म डाँ पालेश्वर शर्मा जी के सम्पादन म *गुड़ी के गोठ*, अमृतसन्देश म तुकाराम कंसारी जी के सम्पादन म  *अपन डेरा*, देशबन्धु म परमानंद वर्मा जी के सम्पादन म  *डहर चलती बेरा बेरा के बात*  *चैनल इंडिया*  म डाँ स्वराज करुण जी के सम्पादन म साहित्य विशेष अंक पढ़े सीखे बर मिलथे। एखर आलावा  लोकसदन, कान्यकुब्ज, महाकौशल,लोक वाणी, बस्तरिया, सोनहा बिहान(रायपुर), छत्तीसगढ़ी संगवारी(रायपुर), गोंदली(राजनांदगांव), महतारी भाँखा, सुकवा, खबर गंगा,आरुग चौरा (ईश्वर साहू आरुग), राजकुमार निषाद(हमर गंवई गांव) * जइसे अउ कतको नवा जुन्ना आंचलिक पत्र पत्रिका निकलिस अउ कुछ निकलते हे, जे छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर प्रत्यक्ष अउ अपत्यक्ष रूप ले समर्पित हे। साहित्य के  धार जन जन तक इही सब पत्र पत्रिका के माध्यम ले पहुँचथे, जेखर ले भाषा बोली के संगे सँग मनखे अउ देश राज के घलो विकास होथे। 


            हमर महतारी भाँखा छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर हमर पुरखा मन खूब महिनत करिन, अब हमर बारी हे। आज  के समय म नवा नवा  साहित्य तो छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर जरूरी हे ही, संगे संग पत्र पत्रिका के घलो अहम भूमिका हे। समाचार पत्र मन म ज्यादातर देखे बर मिलथे कि साहित्य विशेष पृष्ठ भर छत्तीसगढ़ी भाषा म होथे, बाकि पेज नही। संगे संग आज के समय अनुसार मानक छत्तीसगढ़ी रूप के घलो अभाव दिखथे। विकृत अउ अपभ्रंश शब्द के मोह अभो नजर आथे। छत्तीसगढ़ी भाषा सिरिफ  गीत कविता परोसे ले समृद्ध नइ होय, चिंतन, मनन,खेल कूद अउ ज्ञान विज्ञान के समायोजन घलो जरूरी हे। साहित्य म सबे विधा के संगे संग साहित्य के स्तर ऊपर सम्पादक मंडल अउ साहित्यकार दुनो ल धियान देना पड़ही। आज ई पत्रिका के समय हे, जेला सालों साल सहजे जा सकत हे, जे सोसल मीडिया म लगातार छाये रहिथे, अइसन म छत्तीसगढ़ी म समाचार ल बढ़ाये अउ सिरजाय के जरूरत हे। *वइसे तो हिंदी ल हर छत्तीसगढिया पढ़ के समझ जाथन, तभो जब अपन महतारी भाषा के बात आथे त, निरवा छत्तीसगढ़ी म  समाचार के आवश्यकता मससूस होथे।* यदि छत्तीसगढ़ी म समाचार सिरजाये जाही त छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार मनके माँग बढ़ही, अउ जब मनखे के माँग बढ़ही त, भाषा के घलो बढ़वार होही। *समर्पण कहिके कतको चिल्ला डरन, एक-दू-तीन- चार समर्पित आदमी जरूर मिल जही, जे छत्तीसगढ़ी बर निःस्वार्थ लगे हे, फेर जब तक छत्तीसगढ़ी रोजगार म नइ जुड़ही लोगन के रुझान बढ़ नइ सके।*  *अंग्रेजी म अवसर हे, रोजगार हे ,तेखर सेती ओखर बोलइयाँ, जनइयाँ बढ़ते जावत हे।* अपन राज म छत्तीसगढ़ी के महत्ता ल बढ़ाके महतारी भाषा के मान अउ माँग बढ़ाये जा सकत हे। आज के युग म संचार क्रांति अउ ज्ञान विज्ञान के बढ़वार के सेती, मनखें मन बहुभाषी होवत हे, अइसन म छत्तीसगढ़ के रोजगार, पत्र पत्रिका, पढ़ई लिखई छत्तीसगढ़ी म होय। *अपन राज म छत्तीसगढ़ी, भारत भ्रमण बर हिंदी अउ विश्व के बात करन त अंग्रेजी ये त्रिफार्मूला म चिंतन करना पड़ही।*


                  ज्यादातर देखे बर मिलथे, पत्र पत्रिका म कोनो साहित्यकार के लेख, कविता छ्पथे त वो पेज ओखरे बर महत्व के होथे, बाकी मन पढ़े घलो नही, यहू चिंतनीय हे। साहित्य म सा-हित के क्षमता होय, सबके मन ल लुभाय, सबके ज्ञान बढ़ाये, ये दिशा म चितंन अउ काम करना पड़ही। छत्तीसगढ़ी म छपत समाचार पत्र पत्रिका मन ल सरकारो ल बढ़ावा देना चाहिये। जइसे हिंदी अन्ग्रेजी म शब्द शुद्धता अउ एकरूपता दिखथे, वइसने छत्तीसगढ़ी म घलो जरूरी हे। मानकता भाषा के विकास बर आवश्यक हे। पत्र पत्रिका मनके लोकप्रियता बने रहय ये दिशा म प्रयास जरूरी हे। कतको पत्रिका पूरा के पूरा छत्तीसगढ़ी भाषा म घलो निकलथे, फेर आज ओखर माँग नइ हो पावत हे, सम्पादक मंडल खर्चा ल वहन नइ कर पावत हे। अइसन म समर्पण के दिन तक रही? आखिर म एके रद्दा बचथे-कलेचुप बैठ जाना। माँग के हिसाब ले उपज काम आथे, माँगे नइ रही त उपज ल का करबों, अउ कहूँ छत्तीसगढ़ म  ही छत्तीसगढ़ी के माँग नइ रही त, भला अउ कहाँ रही। छत्तीसगढ़ी के बढ़वार बर वइसे तो मनखें संग पत्र पत्रिका ल घलो निःस्वार्थ काम करना चाही, फेर आज के समय म बिना कुछ अर्जन के सम्भव नइ हे। नाना प्रकार के संचार क्रांति के चलते प्रतियोगिता  के दौर आगे हे, अइसन म कोन पत्र पत्रिका रही कोन नइ रही, यहू कह पाना मुश्किल हे। कतको इही सब के कारण बन्द होगे, कतको ले देके छपत घलो हे। एक जमाना रिहिस जब पत्र पत्रिका पढ़े बर दुकान या ठेला म अपन बारी जोहे बर पड़त रिहिस, इही क्रांति पैदा करत रिहिस, फेर आज नवा जमाना म, पत्र पत्रिका खुदे अधर म हे। तभो स्थापित अउ जम्मो पत्र पत्रिका ल छत्तीसगढ़ी भाषा के बढ़वार बर छपे साहित्य अउ कोनो ज्ञान विज्ञान के बात के स्तर, शुद्धता अउ मॉनकता ऊपर धियान देना चाही। साहित्यकार ले बढ़के सम्पादक होथे। साहित्यकार लिख दिस अउ सम्पादक जस के तस छाप दिस यहू सबे लेख, कविता म नइ होना चाही।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Thursday, 22 October 2026

 *दीपावली और हिंदी गीत कविताएँ*


                    कार्तिक मास अमावस्या को मनाये जाने वाला पावन पर्व दीपावली भारतवर्ष के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। इसी दिन भगवान राम चौदह वर्ष वन में व्यतीत कर अयोध्या पधारे थे, और अयोध्या वासियों ने दीप जलाकर भगवान राम का स्वागत किया था। तब से लोग दीपावली के दिन दीप जलाते आ रहे है। धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन, गोवर्धनपूजन और भाईदूज इस तरह दीपावली पाँच दिनों का त्यौहार होता है, सभी त्यौहारों के पीछे अलग अलग धार्मिक/ पौराणिक महत्ता है। शीतल मंद पवन और गुलाबी ठंड लेकर पधारने वाली महापर्व दीपावली लोगों को नाचने गाने पर मजबूर कर देता है। दीपावली की तैयारियाँ सभी लोग बड़े जोर शोर से करते हैं। घर आँगन की साफ सफाई, लिपाई पुताई के साथ, सभी नए नए कपड़े पहनकर फुलझड़ी  और पटाखें फोड़ते है, मेवा मिठाई बाँटते है, दीये जलाते है, और भाईचारे की भावना से ओतप्रोत एक दूसरे को प्रकाश पर्व की बधाई देकर गले मिलते है। टिमटिमाते हजारों दिये, रंग रोगन होकर इठलाते घर आँगन, खेतो में नाचती धान की सुनहरी बालियाँ, फूटते पटाखें, नए नए कपड़े सभी के मन को मुग्ध कर देती है। ऐसे में  हम सबके मुखार बिंद से गीत कविता न निकले, ऐसा हो ही नही सकता। दीपावली को असंख्य कवियों और गीतकारों ने अपने अपने शब्दों में बांधे हैं, चलते है, उनमें से कुछ गीत कविताओं की ओर--


               माता लक्ष्मी कार्तिक अमावस्या के अँधेरी रातों में किस तरह और कैसे लोगों के घर घर तक दस्तक देतीं है, उसे बताते हुये कवि *माखनलाल चतुर्वेदी* जी लिखतें हैं-

सुलग-सुलग री जोत दीप से दीप मिलें

कर-कंकण बज उठे, भूमि पर प्राण फलें।

लक्ष्मी खेतों फली अटल वीराने में

लक्ष्मी बँट-बँट बढ़ती आने-जाने में

लक्ष्मी का आगमन अँधेरी रातों में

लक्ष्मी श्रम के साथ घात-प्रतिघातों में

लक्ष्मी सर्जन हुआ

कमल के फूलों में

लक्ष्मी-पूजन सजे नवीन दुकूलों में।।


             हमारा भारत कृषिप्रधान राष्ट्र है। त्यौहार आदि सब कृषि के अनुसार ही मनाये जाते है। किसान,श्रमिक, मेहनत कस मजदूर आदि सतत काम करते हैं, पर फल नाममात्र पाते हैं। उन सब लोगों के लिये, सुख समृद्धि की कामना करते हुए, दीवाली के दीपक के माध्यम से राष्ट्रकवि *मैथलीशरण गुप्त* जी कहतें हैं-

जल, रे दीपक, जल तू

जिनके आगे अँधियारा है,

उनके लिए उजल तू

जोता, बोया, लुना जिन्होंने

श्रम कर ओटा, धुना जिन्होंने

बत्ती बँटकर तुझे संजोया,

उनके तप का फल तू

जल, रे दीपक, जल तू


                दीपावली हिंदुओ का सबसे बड़ा धार्मिक त्यौहार है, इस पर्व को सभी लोग बड़े धूमधाम से मनाते है। इस दिन छोटे बड़े सभी के घरों में खासा उत्साह,उमंग और चहल पहल रहती है। देश,राज और समाज की स्थिति को देखकर, दीये को सम्बोधित करते हुए कवि श्री *अयोध्या सिंह उपाध्याय"हरिऔध"* जी तातंक छंद में कहते है--

दीपमालिके! दीपावलि ले आती हो, तो आ जाओ;

घूम तिमिर-पूरित भारत में भारतीयता दिखलाओ।

जो आलोकवान बनते हैं, उनमें है आलोक नहीं;

ज्योति-भरे उनके लोचन हैं, जो सकते अवलोक नहीं।

हैं हिन्दू-कुल-कलस कहाते, सूझ बहुत ही है आला;

किंतु विलोक नहीं सकते, वे हिन्दू-अंतर की ज्वाला।


          दीपावली उत्साह उमंग के साथ साथ आशा और विश्वास का भी पर्व होता है, जो अमावस को भी पूनम कर देती है। पुरानी बातों को भूलकर नवविश्वास और आस ले, नए कार्य में रत हो जाने की प्रेरणा, दीपावली हम सबको प्रदान करती है। दीपावली पर बुझे दीपक जलाने की बात करते हुए, कवि सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सायन अज्ञेय जी कहते हैं-

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

है कंहा वह आग जो मुझको जलाए,

है कंहा वह ज्वाल पास मेरे आए,

रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।


              जब चहुँओर हताशा हो और बुराई अच्छाई पर हावी हो जाए, तब मानव मन में नव ऊर्जा की संचार करती हुई, पूर्व प्रधानमंत्री, कवि श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की ये पंक्ति दीपावली पर याद आती है---

आओ फिर से दिया जलाएं

भरी दुपहरी में अंधियारा

सूरज परछाई से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़ें

बुझी हुई बाती सुलगाएं।

आओ फिर से दिया जलाएं


                    दीपावली की रात चहुँओर टिमटिमाते दीपों को देखकर कवि *सोहनलाल द्विवेदी* जी लिखतें हैं-

हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,

नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,

कैसी उजियाली है पग-पग,

जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,

तुलसी के नन्हें थाले में,

यह कौन रहा है दृग को ठग?

जगमग जगमग जगमग जगमग!


           वैज्ञानिक युग में आज हम चाँद तारों पर पग रख रहे है, हमारी पहचान और पहुँच बढ़ती ही जा रही है। दूर देखने के चक्कर में हम कभी कभी पास को देखना भूल जाते है, उसी को "दीवाली के दिये" के माध्यम से याद दिलाते हुये कवि श्री *केदारनाथ सिंह* जी कहते है--

जाना, फिर जाना,

उस तट पर भी जा कर दिया जला आना,

पर पहले अपना यह आँगन कुछ कहता है,

उस उड़ते आँचल से गुड़हल की डाल

बार-बार उलझ जाती हैं,

एक दिया वहाँ भी जलाना;


                 दीपक महज दीये,बाती और तेल का नही, बल्कि आत्ममविश्वास, एकता और भाईचारे का भी जलना चाहिये,तभी  हार,बाधा,विकार जैसे तम दूर होते है, इसी बात को शब्द देती हुई कवयित्री *महादेवी वर्मा* जी लिखतीं है---

सब बुझे दीपक जला लूँ!

घिर रहा तम आज दीपक-रागिनी अपनी जगा लूँ!

क्षितिज-कारा तोड़ कर अब

गा उठी उन्मत आँधी,

अब घटाओं में न रुकती

लास-तन्मय तड़ित् बाँधी,

धूलि की इस वीण पर मैं तार हर तृण का मिला लूँ!


मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!

युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल

प्रियतम का पथ आलोकित कर!

- महादेवी वर्मा


            एक कहावत है- दीया तले अँधेरा। इसी पर व्यंग्य कसते और चुनौती देते हुये *गोपालदास "नीरज"* जी कहते हैं---

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना,

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। 


                  दीवाली में हजारों छोटे बड़े दीप जलकर अमावस को पूनम करते है, इसी भावना से ओतप्रोत कवि *हरिवंश राय बच्चन* जी एकता के दीप जलाने के लिये कह रहे है-

शत-शत दीप इकट्ठे होंगे

अपनी-अपनी चमक लिए,

अपने-अपने त्याग, तपस्या,

श्रम, संयम की दमक लिए।


           आदमी को भी दीपक बनकर जलना चाहिये, हार से निराश नही सीख लेकर बढ़ना चाहिये। हर कार्य और श्रम को साधना मानकर चलना चाहिये। इसी भाव में दीपक के बहाने कवि *हरिवंश राय बच्चन* जी कहते है----

उजियारा कर देने वाली

मुस्कानों से भी परिचित हूं,

पर मैंने तम की बाहों में अपना साथी पहचाना है

मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।


             दीवाली के जगमग जलते दीपक को देखकर अपने मन को संबोधित करते हुए *रामेश्वर शुक्ल 'अंचल'* जी लिखते हैं--

जलती बाती मुक्त कहाती 

दाह बना कब किसको बंधन

रात अभी आधी बाकी है 

मत बुझना मेरे दीपक मन


               जिस तरह बाती को जलने के लिये तेल की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार से प्रेम रस जिंदगी को सदा आलोकित करती रहती है। इसी भाव को गति देते हुए *गोपालसिंह 'नेपाली'* जी  लिखते हैं---

बची रही प्रिय की आँखों से,

मेरी कुटिया एक किनारे,

मिलता रहा स्नेह रस थोड़ा,

दीपक जलता रहा रात-भर ।


           दीये की रौशनी महज रौशनी नही, *शाहिद मिर्ज़ा शाहिद* के नजरिये में कुछ और भी है, चलो हम भी उस चमकते लौ में अपने मंजिल/आस-विश्वास को ढूंढने का प्रयास करें-

दीपमाला में मुसर्रत की खनक शामिल है

दीप की लौ में खिले गुल की चमक शामिल है

जश्न में डूबी बहारों का ये तोहफ़ा शाहिद

जगमगाहट में भी फूलों की महक शामिल है


                         इस तरह दीवाली से संबन्धित असंख्य कविताएं हैं, उन सब का जिक्र कर पाना मुश्किल है। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल में अब तक, बहुत सारे कविगण दीपावली को अपने शब्दों में बाँधे है। उक्त  लेख में सिर्फ कुछ पंक्तियाँ ही उल्लेखित है, और भी पढ़ने से पूर्णतया कवि के भाव शिल्प को जाना जा सकता है, और प्रकाश पर्व का सम्पूर्ण काव्यमय आनंद लिया जा सकता है। अब बात करते है, दीपावली से संबन्धित कुछ चर्चित गीतों की---


1, आई दीवाली आई दीवाली दीपक संग नाचे पतंग

फिल्म- रतन (1944) 


2, आई दिवाली आई कैसे उजाले लाई, घर-घर खुशियों के दीप जले

फिल्म-खजांची [1958]


3, आई अब की साल दिवाली मुंह पर अपने खून मले

फिल्म -हकीकत (1964)


4, आई दिवाली दीप जलाये जा, ओ मतवाले साजन

फिल्म-पगड़ी (1948)


5, आई दीवाली दीपों वाली गाय सखियां 

 फिल्म -महाराणा प्रताप (1964)


6, आई है दिवाली सखी आई है दिवाली रे आई है दिवाली

फिल्म-शीश महल (1950)


7, आई है दिवाली सुनो जी घरवाली आई है दिवाली

फिल्म -आमदानी अठ्ठनी खर्चा रुपइया [2001]


8, ए दुनिया बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा

फिल्म- किस्मत (1943)


9, दीप जले दीप दिवाली आई हो

फिल्म- पैसा (1957)


10, दीपक से दीपक जल गए, लो आज अंधेरे ढल गए

फिल्म- अंजलि (1957)


11, दीपावली मनाए सुहानी मेरे साई के हाथों में जादू का पानी

फिल्म -शिरडी के साईं बाबा (1977)


12, दिवाली आई रे घर-घर दीप जले

फिल्म -- लीडर (1964)


13, दिवाली के चिरागों हमें इश्क सिखा दे

फिल्म- रेणुका (1947)


14, दिवाली की रात, पिया घर आने वाली है,साजन घर आने वाली है

फिल्म-- अमर कहानी (1949)


15, दिवाली फिर आ गई सजनी, हां हां मन का दीप

फिल्म- खजांची (1941)


16, एक वो भी दिवाली थी एक यह भी दिवाली है 

फिल्म --नजराना (1961)


17, एक नया संसार सजाओ आज खुशी का दिन आया

फिल्म --वीर घटोत्कच (1949)


18, इस रात दीवाली ये कैसी यह कैसा उजाला छाया है

 फिल्म- सबसे बड़ा रुपैया 1955


19, जहां मैं आई दिवाली जले चराग जले

फिल्म-ताज (1956)


20, जगमगाती दिवाली की रात आ गई, जैसे तारों के घर में बारात आ गई

फ़िल्म - स्टेज [1951]


21, जल जल रे दीपक जल, काली काली रात निराली आज दिवाली

फिल्म-वामन अवतार (1956)


22, कैसे मनाएं दिवाली हम लाला, अपना तो 12 महीने दिवाला कै

फिल्म-- पैगाम (1959)


23, मेले हैं चिरागों के रंगीन दिवाली है

 फिल्म- नजारा (1961)


24, मेरे तुम्हारे सबके लिए हैप्पी दिवाली

 फिल्म- होम डिलीवरी (2005)


25, लाखों तारे आसमान में

 फिल्म-‘हरियाली और रास्ता‘(1962)


26, जोत से जोत जलाते चलो

फिल्म -“संत ज्ञानेश्वर”(1964)


                         दीपावली पर जिस तरह घर आँगन को साफ सफाई कर उत्साह उमंग के साथ जगमग दीप जलाते है, उसी प्रकार हम सबके अंतर्मन में भी सद्भावना,भाईचारे,सत,सम्मत और आशा विश्वास का दीपक,मानवता और प्रेम रूपी तेल में डूबकर सदा सर्वदा जलते रहना चाहिये।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

9981441795


साभार-गूगल,अल्पना वर्मा,प्रकाश गोविंद

कऊहा रवार म🤔 -----------------------------------

 🤔कऊहा रवार म🤔

-----------------------------------

तोला अगोरत हंव वो,

बीच     खार       म।

कऊहा    रवार    म।

मया   के    डोंगा ल,

झन बोर मझधार म।


मोर  मन  के    परेवना,

लेवत हे लऊहा-लऊहा।

आ      जाना      जोही,

मुड़  म  बोहे   झंऊहा।

गोबर - छेना   बीने बर,

बीने     बर      मऊहा।

मोर संग तोर बॉट जोहे,

कलेचुप खड़े  कऊहा।

घेरी-बेरी तोला  देखथों,

चढ़-चढ़  मेड़-पार   म।

तोला अगोरत  हंव  वो,

बीच     खार         म।

कऊहा    रवार      म।


परे   हंव     कऊहा   तरी,

जिवरा   मोर      घबराथे।

ऊप्पर   म    कोसा  कीरा,

रहि   -   रहि     बिजराथे।

चलत       हे       पुरवाही,

फेर  साँस  मोर फूलत  हे।

तोर     रूप     ह      गोरी,

आंखी-आंखी म झुलत हे।

मोर   मया    ल    बाँध ले,

अपन   नरी   के   हार  म।

तोला    अगोरत   हंव   वो,

बीच        खार           म।

कऊहा       रवार        म।


मोर   मया   ह   कोनो ,

ठठ्ठा  -  मजाक    नोहे।

दिन मोर  बर दिन  नही,

रात मोर  बर रात  नोहे।

तोर      अगोरा       म ,

भूख लगे न पियास वो।

आके     मन    मिलाले,

झन    कर   निरास वो।

अपने-अपन सुखात हंव,

पोपट कस  फरे नार म।

तोला   अगोरत  हंव वो,

बीच       खार        म।

कऊहा      रवार     म।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

Tuesday, 20 October 2026

देवारी

 दोहा--

धन्वन्तरि भगवान के , तेरस मा गुण गाव।

धनबल यस जस शांति सुख, सुमिरन करके पाव।।


धनतेरस-सार छंद


धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।

धनतेरस मा दीप जलाके, करत हवौं पहुनाई।।


चमकै चमचम ठिहा ठौर हा, दमकै बखरी बारी।

धन तेरस के दीया के सँग, आगे हे देवारी।।

भोग लगावौं फूल हार अउ , नरियर खीर मिठाई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।।


रखे सबे के सेहत बढ़िया , धन्वंतरि देवा हा।

करै कुबेर कृपा सब उप्पर, बरसै धन मेवा हा।।

सुख समृद्धि देबे सब ला, धन वैभव बरसाई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।।


देवारी कस सब दिन लागै, सबदिन बीतै सुख मा।

मनखे बन जिनगी जे जीये , दबे रहै झन दुख मा।

काय जीव का मनखे तनखे, दे सुख सब ला माई।

धन्वंतरि कुबेर के सँग मा, आबे लक्ष्मी दाई।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


सेहत सब ले बड़का धन- सार छन्द


जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।

सेहत सबले बड़का धन ए, धन दौलत धन जाली।।


काली बर धन जोड़त रहिथस, आज पेट कर उन्ना।

संसो फिकर करत रहिबे ता, काल झुलाही झुन्ना।।

तन अउ मन हा हावय चंगा, ता होली दीवाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


खाय पिये अउ सुते उठे के, होय बने दिनचरिया।

काया काली बर रखना हे, ता रख तन मन हरिया।

फरी फरी पी पुरवा पानी, देख सुरुज के लाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।।


हफर हफर के हाड़ा टोड़े, जोड़े कौड़ी काँसा।

जब खाये के पारी आइस, अटके लागिस स्वाँसा।।

उपरे उपर उड़ा झन फोकट, जड़ हे ता हे डाली।

जिबे आज ला जब तैं बढ़िया, तब तो रहिबे काली।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


भगवान धन्वंतरि ला स्वस्थ सुखी रखे।।।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

यमराजा- सरसी छंद


चौदह दीया तोर नाँव के, बरत हवय घर खोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


कालदंड अउ गदा पाश धर, घुमत रथस दिन रात।

मोर मुकुट पहिरे भैंसा मा, रहिथस तँय तैनात।।

छोटे बड़े सबे झन काँपे, सुनत नाँव ला तोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


सूर्य पुत्र यमुना के भाई, तोर ठिहा यमलोक।

बैरी हितवा कोनो ला भी, देबे बड़ झन शोक।।

जान अकाल जाय झन कखरो, विनती हावय मोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


सावित्री ला सत्यवान दे, करे हवस उपकार।

हे यमदेवा करबे किरपा, बोहय सुख के धार।।

पाप पुण्य सत गत लत देखत, लेबे सबके शोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


घोर नरक कोनो झन पाये, बने करँय सब काम।

देखा सब ला सत के रद्दा, दया मया सुख धाम।।

नेकी धर्मी उपकारी ला, पीया अमरित घोर।

नरक चतुर्दशी तोला सुमरँव, यमराजा कर जोर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


1,देवारी तिहार-घनाक्षरी


कातिक के अँधियारी,आये परब देवारी।

सजे घर खोर बारी,बगरे अँजोर हे।

रिगबिग दीया बरे,अमावस देख डरे।

इरसा दुवेस जरे,कहाँ तोर मोर हे।

अँजोरी के होये जीत,बाढ़े मया मीत प्रीत।

सुनाये देवारी गीत,खुशी सबे छोर हे।।

लड़ी फुलझड़ी उड़े,बरा भजिया हे चुरे।

कोमढ़ा कोचई बुड़े,कड़ही के झोर हे।।


बैंकुंठ निवास होही, पाप जम्मों नास होही।

दीया बार चौदस के, चमकाले भाग ला।

नहा बड़े बिहना ले, यमराजा ला मनाले।

व्रत दान अपनाले, धोले जम्मों दाग ला।

ये दिन हे बड़ न्यारी, कथा कहानी हे भारी।

जीत जिनगी के पारी, जला द्वेष राग ला।

देव धामी ला सुमर, बाढ़ही तोरे उमर।

पा ले जी भजन कर, सुख शांति पाग ला।


आमा पान के तोरन, रंग रंग के जोरन।

रमे हें सबे के मन, देवारी तिहार मा।

लिपाये पोताये हवे, चँउक पुराये हवे।

दाई लक्ष्मी आये हवे, सबके दुवार मा।

अन्न धन देवत हे, दुख हर लेवत हे।

आज जम्मों सेवक हे, बहे भक्ति धार मा।

हाथ मा मिठाई हवे, जुरे भाई भाई हवै।

देवत बधाई हवै,गूँथ मया प्यार मा।


गौरा गौरी जागत हे,दुख पीरा भागत हे।

बड़ निक लागत हे,रिगबिग रात हा।।

थपड़ी बजा के सुवा,नाचत हे भौजी बुआ।

सियान देवव दुवा,निक लागे बात हा।।

दफड़ा दमऊ बजे,चारों खूँट हवे सजे।

धरती सरग लगे,नाँचे पेड़ पात हा।।

घुरे दया मया रंग,सबो तीर हे उमंग।

संगी साथी सबो संग,भाये मुलाकात हा।।


गौरा गौरी सुवा गीत,लेवै जिवरा ल जीत।

बैगा निभावय रीत,जादू मंतर मार के।।

गौरा गौरी कृपा करे,दुख डर पीरा हरे।

सुवा नाचे नोनी मन,मिट्ठू ल बइठार के।।

रात बरे जगमग,परे लछमी के पग।

दुरिहाये ठग जग,देवारी ले हार के।।

देवारी के देख दीया,पबरित होवै जिया।

सोभा बड़ बढ़े हवै,घर अउ दुवार के।


मया भाई बहिनी के, जियत मरत टिके।

भाई दूज पावन हे, राखी के तिहार कस।

उछाह उमंग धर, खुशी के तरंग धर।

आये अँगना मा भाई, बन गंगा धार कस।

इही दिन यमराजा, यमुना के दरवाजा।

पधारे रिहिस हवै, शुभ तिथि बार कस।

भाई बर माँगे सुख, दुख डर दर्द तुक।

बेटी माई मन होथें, लक्ष्मी अवतार कस।


कातिक के अँधियारी, चमकत हवै भारी।

मन मोहे सुघराई, घर गली द्वार के।।

आतुर हे आय बर, कोठी मा समाय बर।

सोनहा सिंगार करे, धान खेत खार के।।

सुखी रहे सबे दिन, मया मिले छिन छिन।

डर जर दुख दर्द, भागे दूर हार के।।

मन मा उजास भरे, सुख सत फुले फरे।

गाड़ा गाड़ा हे बधाई, देवारी तिहार के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


2, कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


देवारी त्यौहार के, होवत हावै शोर।

मनखे सँग मुस्कात हे, गाँव गली घर खोर।

गाँव गली घर खोर, करत हे जगमग जगमग।

करके पूजा पाठ, परे सब माँ लक्ष्मी पग।

लइका लोग सियान, सबे झन खुश हे भारी।

दया मया के बीज, बोत हावय देवारी।


भागे जर डर दुःख हा, छाये खुशी अपार।

देवारी त्यौहार मा, बाढ़े मया दुलार।।

बाढ़े मया दुलार, धान धन बरसे सब घर।

आये नवा अँजोर, होय तन मन सब उज्जर।

बाढ़े ममता मीत, सरग कस धरती लागे।

देवारी के दीप, जले सब आफत भागे।


लेवव  जय  जोहार  जी,बॉटव  मया   दुलार।

जुरमिल मान तिहार जी,दियना रिगबिग बार।

दियना रिगबिग बार,अमावस हे अँधियारी।

कातिक पबरित मास,आय  हे  जी देवारी।

कर आदर सत्कार,बधाई सबला देवव।

मया  रंग  मा रंग,असीस सबे के लेवव।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


3,मत्तग्यंद सवैया- देवारी


चिक्कन चिक्कन खोर दिखे अउ चिक्कन हे बखरी घर बारी।

हाँसत  हे  मुसकावत  हे  सज  आज  मने  मन  गा  नर नारी।

माहर  माहर  हे  ममहावत  आगर  इत्तर  मा  बड़  थारी।

नाचत हे दियना सँग देखव कातिक के रतिहा अँधियारी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


4,बरवै छंद(देवारी)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


सबे खूँट देवारी, के हे जोर।

उज्जर उज्जर लागय, घर अउ खोर।


छोट बड़े सबके घर, जिया लुभाय।

किसम किसम के रँग मा, हे पोताय।


चिक्कन चिक्कन लागे, घर के कोठ।

गली गाँव घर सज़ धज, नाचय पोठ।


काँटा काँदी कचरा, मानय हार।

मुचुर मुचुर मुस्कावय, घर कोठार।


जाला धुर्रा माटी, होगे दूर।

दया मया मनखे मा, हे भरपूर।


चारो कोती मनखे, दिखे भराय।

मिलजुल के सब कोई, खुशी मनाय।


बनठन के सब मनखे, जाय बजार।

खई खजानी लेवय, अउ कुशियार।


पुतरी दीया बाती, के हे लाट।

तोरन ताव म चमके,चमचम हाट।


लाड़ू मुर्रा काँदा, बड़ बेंचाय।

दीया बाती वाले, देख बलाय।


कपड़ा लत्ता के हे, बड़ लेवाल।

नीला पीला करिया, पँढ़ड़ी लाल।


जूता चप्पल वाले, बड़ चिल्लाय।

टिकली फुँदरी मुँदरी, सब बेंचाय।


हे तिहार देवारी, के दिन पाँच।

खुशी छाय सब कोती, होवय नाँच।


पहली दिन घर आये, श्री यम देव।

मेटे सब मनखे के, मन के भेव।


दै अशीष यम राजा, मया दुलार।

सुख बाँटय सब ला, दुख ला टार।


तेरस के तेरह ठन, बारय दीप।

पूजा पाठ करे सब, अँगना लीप।


दूसर दिन चौदस के, उठे पहात।

सब संकट हा भागे, सुबे नहात।


नहा खोर चौदस के, देवय दान।

नरक मिले झन कहिके, गावय गान।


तीसर दिन दाई लक्ष्मी, घर घर आय।

धन दौलत बड़ बाढ़य, दुख दुरिहाय।


एक मई हो जावय, दिन अउ रात।

अँधियारी ला दीया, हवै भगात।


बने फरा अउ चीला, सँग पकवान।

चढ़े बतासा नरियर, फुलवा पान।


बने हवै रंगोली, अँगना द्वार।

दाई लक्ष्मी हाँसे, पहिरे हार।


फुटे फटाका ढम ढम, छाय अँजोर।

चारो कोती अब्बड़, होवय शोर।


होय गोवर्धन पूजा, चौथा रोज।

गूँजय राउत दोहा, बाढ़य आज।


दफड़ा दमऊ सँग मा, बाजय ढोल।

अरे ररे हो कहिके, गूँजय बोल।


पंचम दिन मा होवै, दूज तिहार।

बहिनी मनके बोहै,भाई भार। 


कई गाँव मा मड़ई, घलो भराय।

देवारी तिहार मा, मया गढ़ाय।


देवारी बगरावै, अबड़ अँजोर।

देख देख के नाचे, तनमन मोर।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


कज्जल छंद- देवारी


मानत हें सब झन तिहार।

होके मनखे मन तियार।

उज्जर उज्जर घर दुवार।

सरग घलो नइ पाय पार।


बोहावै बड़ मया धार।

लामे हावै सुमत नार।

बारी बखरी खेत खार।

नाचे घुरवा कुँवा पार।


चमचम चमके सबे तीर।

बने घरो घर फरा खीर।

देख होय बड़ मन अधीर।

का राजा अउ का फकीर।


झड़के भजिया बरा छान।

का लइका अउ का सियान।

सुनके दोहा सुवा तान।

गोभाये मन मया बान।


फुटे फटाका होय शोर।

गुँजे गाँव घर गली खोर।

चिटको नइहे तोर मोर।

फइले हावै मया डोर।


जुरमिल के दीया जलायँ।

नाच नाच सब झन मनायँ।

सबके मन मा खुशी छायँ।

दया मया के सुर लमायँ।


रिगबिग दीया के अँजोर।

चमकावत हे गली खोर।

परलव पँवरी हाथ जोर।

लक्ष्मी दाई लिही शोर।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐


देवारी मा पानी(तातंक छंद)


रझरझ रझरझ बरसे बादर,आँसों के देवारी मा।

कतको के सपना पउलागे,अइसन आफत आरी मा।


हाट बजार मा पानी फिरगे,दीया बाती बाँचे हे।

छोट बड़े बैपारी सबके,भाग म बादर नाँचे हे।

खुशी झोपड़ी मा नइ हावै,नइहे महल अटारी मा।

रझरझ रझरझ बरसे बादर,आँसों के देवारी मा।


काम करइया मनके जाँगर,बिरथा आँसों होगे हे।

बिना लिपाये घर दुवार के,चमक धमक सब खोगे हे।

फुटे फटाका धमधम कइसे,चिखला पानी धारी मा।

रझरझ रझरझ बरसे बादर,आँसों के देवारी मा----।


चौंक पुराये का अँगना मा,काय नवा कपड़ा लत्ता।

काय सुवा का गौरा गौरी,तने हवे खुमरी छत्ता।

काय बरे रिगबिग दियना हा,कातिक केअँधियारी मा।

रझरझ रझरझ बरसे बादर,आँसों के देवारी मा-----।


पाके धान के कनिहा टुटगे,कल्हरत हे दुख मा भारी।

खेत खार अउ रद्दा कच्चा,कच्चा हे बखरी बारी।

मुँह किसान के सिलदिस बादर,भात ल देके थारी मा।

रझरझ रझरझ बरसे बादर,आँसों के देवारी मा-----।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


.......देवारी आगे.....

-----------------------------------

उज्जर  -  उज्जर   घर     दुवार,

उज्जर-उज्जर बखरी-बारी लागे।

घरो   -     घर     खुसी      लेके,

देख         देवारी            आगे।


ददा डार  देहे  दू  डुवा,

तेल उपरहा  दिया   म।

चुक-चुक ले लिपाय हे,

सुत    जा   भिंया   म।


दाई के हाथ लऊहा-लऊहा,

चलत     हेवे     हाँड़ी    म।

कुकुर-बिलई ताकत हे रोटी,

बइठे  -  बइठे    भाँड़ी   म।


कखरो    घर   नवा     सइकिल,

त कखरो घर नवा  गाड़ी  आगे।

घरो   -     घर     खुसी      लेके,

देख         देवारी            आगे।


छभा-मुंदा लिपा-पोता के,

खुसी  म हाँसत  हे कोठ।

छुरछुरी टिकली बत्ती धरे,

लइकामन नाचत हे पोठ।


गाय - बछरू बइला-भंईस्सा,

चिक्कन-चिक्कन दिखत हे।

आनी - बानी    के   जिनिस,

जघा  - जघा    बिकत    हे।


दोहा    पारे      कांछर      उन्डे,

डुगडुग  - डुगडुग  दफड़ा  बाजे।

घरो   -     घर     खुसी      लेके,

देख         देवारी            आगे।


रतिहा तुलसी चंवरा रिगबिगात हे।

दुवार भर बहिनी रंगोली बनात हे।

ओनहा-कोनहा म दिया बरत हे।

बरा - भजिया महर-महर करत हे।


सइमो  - सइमो  करे  गली  खोर,

बईगिन  घर  गौरी  - गौरा  जागे।

घरो   -     घर     खुसी      लेके,

देख         देवारी            आगे।


दाई लछमी के  पाँव,घरो-घर परे हे।

बईरी-मितवा सबो बर , मया भरे हे।

गांव के गांव एक जघा सकलाय हे।

देवारी सब बर  , मया  धर आय हे।


अलिन-गलिन ल का कहिबे,

मन म घलो ऊजियारी छागे।

घरो   -  घर     खुसी    लेके,

देख    देवारी            आगे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


💐💐💐💐💐💐💐💐


देख देवारी,दिनों-दिन दुबरात हे।

--------------------------------------------

अँगसा-सँगसा म दीया,कोन  जलाय?

दूसर   संग   जिया  , कोन    मिलाय?

कोन   हटाय  , काँदी  -  कचरा    ल?

कोन   पाटे ,  खोंचका -  डबरा     ल?

मनखे के मन म,हिजगा पारी हमात हे।

देख  देवारी ,दिनों - दिन , दुबरात    हे।


पाँच    दिन    के    तिहार    बर,

पाख   भर  पहिली  जोरा  होय।

छभई  - मुंदई ,   लिपई  -  पोतई,

साफ-सफई,कचरा  कोरा   होय।

नाचे नवा-नवा होके,गाँव गली खोर।

सुघराई राहय,ए छोर ले ओ छोर।

फेर मनखे अब ,जांगर  चोरात हे।

देख देवारी ,दिनों-दिन  दुबरात हे।


तेरस के यम दिया, कोन  जलाय हे?

चऊदस म बिहनिया ,कोन नहाय हे?

कोन दाई लक्षमी बर , चँऊक पुरे हे?

कहाँ कढ़ी म,कोमढ़ा-कोचेई बुड़े हे?

निकाला होगे गाय गरुवा के घर ले।

छिनमिनात हे, सब गोवर्धन के गोबर ले,

भाई-दूज  बर  घर म ,कोन राहत हे?

देख देवारी, दिनों- दिन  दुबरात  हे।


कोन गाय बइला ल सजाय हे।

सुपा म  कोन, सुखधना मड़ाय हे?

कती बाजत हे,सिंग-दफड़ा-दमऊ?

कति  पहटिया,सोहई  धर आय हे?

अँटात हे तेल ,दिया के दिनों - दिन।

सिरात हे मया,जिया के दिनों -दिन।

का     करही    फोड़     फटाका ?

मनखे   बम   कस   गोठियात    हे।

देख  देवारी , दिनों - दिन दुबरात हे।


पहिरे    हे   नवा- नवा  कुरथा,

फेर      मन   मइलाय      हे।

बूँड़े  हे   मंद  -     मँउहा में,

मास  -  मटन     खाय    हे।

तभो  मनखे  दाई लक्ष्मी तीर,

पइसा   माँगेल   ल   आय  हे।

हुदरइया - कोचकइया  मिलथे,

नचइया    -     गवइया   नही।

ददा-दाई ल  , बेटा नइ मिलत हे,

बहिनी     ल     भइया      नही।

कोन   जन  का   चीज  धरे  हे?

सबो अपने   अपन अँटियात हे।

देख देवारी,दिनों-दिन दुबरात हे।


    जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

     बालको(कोरबा)

     9981441795


आप सबो ला देवारी तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई

Monday, 19 October 2026

देवारी

 उल्लाला छंद


भुँइया के एको छोर हा,झन राहय अँधियार।

देवारी हा आये हवे,जुरमिल  के  दीया बार।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)



मत्तग्यंद सवैया

चिक्कन चिक्कन खोर दिखे अउ चिक्कन हे बखरी घर बारी।

हाँसत  हे  मुसकावत  हे  सज  आज  मने  मन  गा  नर नारी।

माहर  माहर  हे  ममहावत  आगर  इत्तर  मा  बड़  थारी।

नाचत हे दियना सँग देखव कातिक के रतिहा अँधियारी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)




कुण्डलिया

लेवव  जय  जोहार  जी,बॉटव  मया   दुलार।

जुरमिल मान तिहार जी,दियना रिगबिग बार।

दियना रिगबिग बार,अमावस हे अँधियारी।

कातिक पबरित मास,आय  हे  जी देवारी।

कर आदर सत्कार,बधाई सबला देवव।

मया  रंग  मा रंग,असीस सबे के लेवव।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


दोहा-

देवारी   रिगबिग   बरय,हवे  बधाई   मोर।

माँ लक्ष्मी किरपा करे,काज सधे सब तोर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

देवारी तिहार के बधाई हो

आप सबको सादर नमन करत

देवारी तिहार के सपरिवार गाड़ा गाड़ा बधाई🌺🌺🙏🙏

अतंर्राष्ट्रीय चमचागिरी दिवस के अवसर म.....

 अतंर्राष्ट्रीय चमचागिरी दिवस के अवसर म.....


चमचागिरी- लावणी छंद


एखर ओखर खास बने बर, जीभ लमा के करबे का।

सरग सिंहासन हावै रीता, बता आज तैं मरबे का।।


स्वारथ अउ देखावा खातिर, काबर चम्मच बनगे हस।

मनखे हो के स्वाभिमान खो, रब्बड़ जइसे तनगे हस।।

चापलुसी के चरम लांघ के, आन बान सत चरबे का।

एखर ओखर खास बने बर, जीभ लमा के करबे का।।


पद पइसा धन बल वाले के, तेवर तोरे सेती हे।

नेकी धर्मी सतवादी के, परिया परगे खेती हे।।

आदर देना अलग बात ए, चमचा बनके सरबे का।

एखर ओखर खास बने बर, जीभ लमा के करबे का।


असल गुणी ज्ञानी मनखे मन, चम्मच एको नइ पोसे।

चमचा गिरी करइया मन ला, सदा जमाना हा कोसे।।

कखरो आघू पाछू होके, भव सागर ले तरबे का।

एखर ओखर खास बने बर, जीभ लमा के करबे का।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


जीभ लमाये के का जरूरत


जीभ लमाये के का जरूरत, हे कलम जब हाथ मा।

शोभा देय नही चम्मच हा, कलम दवात साथ मा।।


मंच माइक सम्मान के खातिर, कलमकार नइ भागे।

कला गला के दम मा छाये, उही शारद पूत लागे।।

शब्द जोड़ के फूल बनालव, काँटा वाले पाथ मा।

जीभ लमाये के का जरूरत, हे कलम जब हाथ मा।


ताकत हौ मुँह कखरो काबर, जानव कलम के ताकत।

ये दुनिया के रथ ला आजो, साहित्य हावय हाँकत।।

मुड़ी उँचाके कलम चलावव, झन अरझो गेरवा नाथ मा।

जीभ लमाये के का जरूरत, हे कलम जब हाथ मा।


सूर कबीरा तुलसी जायसी, आजो अजर अमर हे।

जीभ लमाके नाम कमइया, नइ बाँचे स्वार्थ समर हे।।

सेवा मान के साहित गढ़लव, सजही ताज माथ मा।

जीभ लमाये के का जरूरत, हे कलम जब हाथ मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


कलमकार न बने


जो चाटुकार है वो कलमकार न बने।

बस डाक पत्र बन रहें, अखबार न बने।।1


जिनको नही है कद्र, अपने आन बान की।

वो देश राज गाँव के, रखवार न बने।।2


चुपचाप खीर खाने की,आदत है जिनकी,

वो बंद रहे बस्ते में, बाजार न बने।।3


धन हराम के हो, किसी के तिजोरी में।

तो फाँस गल के बने, उपहार न बने।।4


वीर शिवा जी नही, न क्षत्रसाल है।

भूषण समझ के खुद को, खुद्दार न बने।।5


स्वार्थ से सने हुये जो, रहते हैं सदा।

औरो का मैल धोने, कोई धार न बने।।6


झूठ का पुलिंदा, बाँधने वाले सावधान।

सच होश उड़ा देंगें, होशियार न बने।।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


@@@कलमकार@@@


कलमकार  हरौं, चाँटुकार  नही।

दरद झेल सकथौं,फेर मार नही।


दुख के दहरा म,अन्तस् ल बोरे हँव।

अपन लहू म,कलम ल चिभोरे हँव।

मैं तो मया मधुबन चाहथौं,

पतझड़ अउ उजार नही-----------


बने बात के गुण,गाथौं घेरी बेरी।

चिटिक नइ सुहाये,ठग-जग हेरा फेरी।

सत अउ श्रद्धा मा,माथ नँवथे बरपेली,

फेर फोकटे दिखावा स्वीकार नही-------


हारे ला ,हौंसला देथौं मँय।

दबे स्वर ला,गला देथौं मँय।

सपना निर्माण के देखथौं,

चाहौं  कभू उजार नही---------


समस्या बर समाधान अँव मैं।

प्रार्थना आरती अजान अँव मैं।

मनखे अँव साधारण मनखे,

कोनो ज्ञानी ध्यानी अवतार नही-------


फोकटे तारीफ,तड़पाथे मोला।

गिरे थके के संसो,सताथे मोला।

जीते बर उदिम करहूँ जीयत ले,

मानौं कभू हार नही-------------


ऊँच नीच भेदभाव पाटथौं।

कलम ले अँजोरी बाँटथौं।

तोड़थौं इरसा द्वेष क्लेश,

फेर मया के तार नही----------


भुखाय बर पसिया,लुकाय बर हँसिया अँव।

महीं कुलीन,महीं घँसिया अँव।

मँय मीठ मधुरस हरौं,

चुरपुर मिर्चा झार नही----------


हवा पानी अगास पाताल।

कहिथौं मँय सबके हाल।

का सजीव का निर्जीव मोर बर,

मँय हौसला अँव,हँथियार नही-------


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

Saturday, 17 October 2026

बैपारी- सार छंद

 बैपारी- सार छंद


ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।

जब किसान के महिनत आथे, सबे चीज बोहाथें।।


अब किसान कर नइहे कोठी, ना पउला ना पैली।

उपज जाय गोदाम खेत ले, भरा भरा के थैली।।

औने पौने दाम थमाके, गरी फेंक ललचाथें।

ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।


आलू मुनगा मेथी धनिया, का बंगाला भाँटा।

बैपारी कर सोना बनथे, अउ किसान कर काँटा।।

बिकै अन्न फर भाजी पाला, बिचौलिया के हाथें।

ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।


कई चीज मा करैं मिलावट, अउ काला बाजारी।

नियम धियम शासन राशन ले, बड़का हें बैपारी।।

अधिकारी अउ नेता चुप हें, आम मनुष गरियाथें।

ताग ताग के बैपारी मन, कीमत बड़ पा जाथें।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)