Wednesday, 17 June 2026

बढ़त चमचाई- लावणी छंद

 बढ़त चमचाई- लावणी छंद


घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।

अउ बाहिर मा रिस्ता जोड़े, रातउ दिन चमचाई ले।।


बात बात मा मुँहफट होके, नियम धियम गनवात रथे।

हक के बात घरे मा करथे, बाहिर मुड़ी नवात रथे।।

कथनी करनी जेखर करिया, ओहर बड़े कन्हाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


ददा बनावत हे आने ला, दरदर भटका खावत हे।

देखावा के नत्ता जोरे, कुकुर बरोबर धावत हे।।

बाज आत नइहे धक्का खा, रहि रहि पुछी हलाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।


चमचागिरी बढ़त हे भारी, आघू अउ अब का होही।

स्वभिमानी गिनके बाचे हे, कोन सुमत समता बोही।।

सत के बाना कोन थामही, उबर खुशामद खाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

बरसात (गीतिका छ्न्द)

 बरसात (गीतिका छ्न्द)


घन घटा घनघोर धरके, बूँद बड़ बरसात हे।

नाच के गाके मँयूरा, नीर ला परघात हे।

खेत पानी पी अघागे, काम के हे शुभ लगन।

दिन किसानी के हबरगे, कहि कमैया हें मगन।।


ढोंड़िहा धमना हा भागे, ए मुड़ा ले ओ मुड़ा।

साँप बिच्छू बड़ दिखत हे, डर हवैं चारो मुड़ा।

बड़ चमकथे बड़ गरजथे, देख ले आगास ला।

धर तभो नाँगर किसनहा, खेत बोंथे आस ला।


घूमथे बड़ गोल लइका, नाचथें बौछार मा।

हाथ मा चिखला उठाके, पार बाँधे धार मा।

जब गिरे पानी रदारद, नइ सुनें तब बात ला।

नाच गाके दिन बिताथें, देख के बरसात ला।


लोग लइका जब सनावैं, धोयँ तब ऍड़ी गजब।

नाँदिया बइला चलावैं, चढ़ मचें गेड़ी गजब।

छड़ गड़उला खेल खेलैं, छोड़ गिल्ली भाँवरा।

लीम आमा बर लगावैं, अउ लगावैं आँवरा।।


ताल डबरी भीतरी ले, बोलथे टर मेचका।

ढेंखरा उप्पर मा चढ़के, डोलथे बड़ टेटका।

खोंधरा झाला उझरगे, का करे अब मेकरा।

टाँग के डाढ़ा चलत हें, चाब देथें केकरा।।


पार मा मछरी चढ़े तब, खाय बिनबिन कोकड़ा।

रात दिन खेलैं गरी मिल, छोकरा अउ डोकरा।

जब करे झक्कर झड़ी, सब खाय होरा भूँज के।

पाँख खग बड़ फड़फड़ाये, मन लुभाये गूँज के।।


खेत मा डँटगे कमैया, छोड़ के घर खोर ला।

लोर गेहे बउग बत्तर, देख के अंजोर ला।

फुरफुँदी फाँफा उड़े बड़, अउ उड़ें चमगेदरी।

सब कहैं कर जोर के घन, झन सताबे ए दरी।


होय परसानी गजब जब, रझरझा पानी गिरे।

काखरो घर ओदरे ता, काखरो छानी गिरे।

सज धरा सब ला लुभावै, रूप हरिहर रंग मा।

गीत गावै नित कमैया, काम बूता संग मा।


ओढ़ना कपड़ा महकथे, नइ सुखय बरसात मा।

झूमथें भिनभिन अबड़, माछी मछड़ दिन रात मा।

मतलहा पानी रथे, बोरिंग कुवाँ नद ताल के।

जर घरो घर मा हबरथे, ये समै हर साल के।


चूंहथे छानी अबड़, माते रथे घर सीड़ मा।

जोड़ के मूड़ी पुछी कीरा, चलैं सब भीड़ मा।

देख के कीरा कई, बड़ घिनघिनासी लागथे।

नींद घुघवा के परे नइ, रात भर नित जागथे।


नीर मोती के असन, घन रोज बरसाते हवे।

मन हरेली तीज पोरा, मा मगन माते हवे।

धान कोदो जोंधरी, कपसा तिली हे खेत मा।

लहलहावै पा पवन, छप जाय फोटू चेत मा।


बूँद तक बरसै नही, कतको बछर आसाढ़ मा।

ता कभू घर खेत पुलिया, तक बहे बड़ बाढ़ मा।

बाढ़ अउ सूखा पड़े ता, झट मरे मन आस हा।

चाल के पानी गिरे तब, भाय मन चौमास हा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद

 चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद


पानी गिरे चौमास मा, बादर करे गड़गड़ गजब।

जिवरा डरे सुनके अजब, बिजुरी करे कड़कड़ गजब।


छाये घटा घनघोर अउ, टकराय घन आगास मा।

बिजुरी गिरे के डर रथे, चारो डहर चौमास मा।।


का जानवर अउ का मनुष, सब बर बिजुरिया काल हे।

घर बन घलो जाथे उजड़, बिजुरी बिकट जंजाल हे।।


गिरही कते कोती बिजुरिया, ये समझ मा आय ना।

फोकट मरे झन पेड़ पउधा ना मनुष गरु गाय ना।।


खींचे बिजुरिया ला अपन कोती सुचालक चीज हर।

रहिथे तड़ित चालक जिहाँ तौने सुरक्षित गाँव घर।।


यमराज बनके गिर जथे, अउ प्राण ला लेथे झटक।

पानी गिरत रहिथे गजब ता, बाग बन मा झन भटक।।


बादर गजब गर्जन करे तब, टेप टीवी बंद रख।

नित होश मा रहि काम कर, मुख मा कहानी छंद रख।।


बाहिर हवस ता बैठ उखड़ू, मूंद के मुँह कान ला।

रख जानकारी सावधानी अउ बचाले जान ला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)शीर्षक

हम नहीं

 हम नहीं


रिश्ते बिगड़ने का किसी को कोई ग़म नहीं।

आज सबको सिर्फ़ पैसा चाहिए, हमदम नहीं।।


खंजर से खुदे ज़ख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

ज़ुबां से बढ़कर ज़माने में कोई बारूद-बम नहीं।।


खुद को राजा समझ रहे हैं रील वाले।

रीयल में उनमें ज़रा-सा भी दम नहीं।।


एकता, अखंडता, भाईचारा — सब दिखावा है।

ज़हर जाति-धर्म का हो रहा है कम नहीं।।


पता नहीं, ये पैमाना है या मौकापरस्ती।

देश संविधान से चलेगा, पर हम नहीं।।


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)

Tuesday, 16 June 2026

जिंदा राखेल लगही-गीत

 जिंदा राखेल लगही-गीत


अधमी अत्याचारी मन बर, निंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


बइरी हरहा मन ला, मनाके  रखे बर।

मनखे ला मनखे कस, बनाके के रखे बर।।

धरम करम ला बाँध नियम मा, सोच उछिंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


अवइया पीढ़ी मा, मानवता भरे बर।।

जानवर अउ मनखें मा, भेद करे बर।।

मन मा आस विश्वास राम गोविंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


नता रिस्ता अउ छोटे बड़े के, लिहाज बर।

देखावा मा चूर उड़त मनखें, रंगबाज बर।।

दंभ दुराचारी बधे बर, किष्किन्धा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सुविधा दुविधा-सार छंद

 सुविधा दुविधा-सार छंद


सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।

प्राण ल सीधा हर लेवत हे , आजकाल के गाड़ी।।


खपरा छाये माटी के घर, गर्मी मा मन भाये।

बिन कूलर पंखा एसी के , नींद ससन भर आये।।

छत के घर हा भभके भारी, नइहे ब्यारा बाड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


जतके सुविधा बढ़त जात हे, ततके दुविधा बाढ़े।

समय बचाके घलो मनुष मन, बोकबाय हें ठाढ़े।।

बम बारुद अउ यंत्र तंत्र ला, देख जुड़ाथे नाड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


हवै आसरा कम जीये के, कलजुगिया बेरा मा।

रास रसायन बढ़त जात हे, मौत हवै डेरा मा।।

फेक देय हन जुन्ना चीज ल, कहिके कचरा काड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कुंडलियाँ-भीड़

 कुंडलियाँ-भीड़ 


बाबा मन हा बाप कस, देवत हें उपदेश।

धरम करम ले मुक्ति कहि, होय मनुष मन पेश।

होय मनुष मन पेश, भीड़ के हिस्सा बनके।

भीड़ भाड़ ला देख, चले बाबा मन तनके।।

बिना भीड़ नइ होय, मदीना काशी काबा।

जाति धरम के नाम, सबे कोती हे बाबा।।


झंडा डंडा भीड़ बिन, मान कहाँ ले पाय।

बने बने मा हे बने, गिनहा मा हे बाय।।

गिनहा मा हे बाय, भीड़ हा भेड़ ताय जी।

सहमति साथ विरोध, सबे बर भीड़ आय जी।

मेला नेता खेल, संत राजा का पंडा।

सब ला चाही भीड़, भीड़ हे ता हे झंडा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)