Friday, 11 September 2026

कानून के डर

 कानून के डर


जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


खास आदमी, कानून कायदा ला नइ माने।

पइसा पहुँच के दम मा, घुमथे सीना ताने।।

धन बल ज्ञान गुण के, रोब झाड़त दिखथे।

अइसन मनके आघू, सबे चीज हा बिकथे।

ये मन सब घातक हें, साँप बिच्छू घून ले।

जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


पढ़े लिखे मनखें के, अंतस मा कोइला भरगे।

दया मया धरम करम, पाके पना कस झरगे।।

मनखें अब सिर्फ डरथे, कुदरत के कानून ले।

आसाढ़ के बाढ़, अउ टघलत मई जून ले।।

विकास खेलत हे होली, मनखें के खून ले।

जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


कथे झूठ सच पकड़े के, नवा नवा मशीन हे।

तभो जज वकील, अदालती खेल मा लीन हें।।

कानून के लंबा हाथ, आम जन के गला नापथे।

खास के आघू मा, साहब सिपइहा मन काँपथें।।

मनखें दूर भागत हें, धरम करम पाप पुण्य ले।

जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

लोकगीत-सरसी छंद गीत

 लोकगीत-सरसी छंद गीत


लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।

सुआ ददरिया कर्मा पंथी, करे जिया मा राज।।


बोह भोजली बेटी माई, लहर तुरंगा गाँय।

थपड़ी पिट पिट सुआ नाचके, सबके जिया लुभाँय।।

बर बिहाव अउ पंथी जस के, मनभावन अंदाज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


दरद भुलाके छेड़ ददरिया, बूता करें किसान।

नाचें कर्मा ताल मा झुमके, लइका संग सियान।।

सवनाही साल्हो अउ डंडा, जतरा धनकुल साज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


बाँस पंडवानी दोहा मा, कथा कथन भरमार।

ढोलामारू लोरिक चंदा, फागुन फाग बहार।।

नगमत गौरा खेल गीत मा, झूमें सरी समाज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


सोहर लोरी भजन भर्थरी, आल्हा मन ले जीत।

जनम बिहाव परब अउ ऋतु के, अबड़ अकन हे गीत।।

गायें गाना छत्तीसगढ़िया, करत अपन सब काज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Wednesday, 9 September 2026

स्थायी और अस्थायी व्यवस्था-जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया

 *स्थायी और अस्थायी व्यवस्था*


— जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'


                  स्थायी और अस्थायी—ये केवल दो शब्द नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति के कार्य, सोच, जिम्मेदारी, विश्वास और भविष्य से जुड़े दो अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। आज के समय पर विचार करें तो चारों ओर अस्थायी व्यवस्था का बोलबाला दिखाई देता है। नियमित और स्थायी नियुक्तियों के स्थान पर ठेकेदारी, संविदा और अस्थायी रोजगार का चलन बढ़ता जा रहा है। अनेक नियुक्तिकर्ता अपने कर्मचारियों को स्थायी रूप से साथ रखने के बजाय आवश्यकता के अनुसार काम लेना पसंद करते हैं। इससे कर्मचारी के मन में हमेशा यह अनिश्चितता बनी रहती है कि आज जो काम उसके पास है, वह कल भी रहेगा या नहीं। इस अस्थिरता का प्रभाव केवल कर्मचारी की आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ता, बल्कि उसके काम करने की मानसिकता पर भी पड़ता है। जिस व्यक्ति को अपने भविष्य का भरोसा नहीं होता, उसके लिए लंबे समय की योजना बनाकर काम करना कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, स्थायित्व व्यक्ति को अपने कार्य से जुड़ने, अनुभव प्राप्त करने और भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने का अवसर देता है।

                   इसे *किसान और खेत* के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक किसान अपने खेत की देखभाल केवल बरसात में नहीं करता, बल्कि गर्मी, सर्दी और बरसात—हर मौसम में उसे सँवारता है। वह मिट्टी तैयार करता है, खाद डालता है, बीज बोता है, सिंचाई करता है और फसल की रक्षा करता है, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि यही खेत लंबे समय तक उसके और उसके परिवार की आजीविका का आधार रहेगा। लेकिन यदि उसी किसान से कह दिया जाए कि तुम्हें केवल एक-दो वर्ष तक ही इस खेत से पैदावार लेनी है, उसके बाद यह खेत तुम्हारा नहीं रहेगा, तो उसके भीतर पहले जैसा अपनापन और भविष्य का विश्वास नहीं रहेगा। वह तत्काल मिलने वाली पैदावार पर अधिक ध्यान देगा, क्योंकि उसे पता होगा कि भविष्य की फसल का लाभ उसे नहीं मिलने वाला। इसके विपरीत, स्थायी किसान आज की फसल के साथ आने वाले वर्षों की उपज के बारे में भी सोचता है।

                 यही बात किसी संस्था और उसके कर्मचारियों पर लागू होती है। जो कर्मचारी जानता है कि उसे लंबे समय तक इसी संस्था के साथ काम करना है, वह अपने कार्यस्थल को केवल नौकरी करने की जगह नहीं, बल्कि अपने भविष्य का हिस्सा समझता है। वह अपने काम को बेहतर बनाने, नई बातें सीखने और संस्था की उन्नति में योगदान देने का प्रयास करता है। वर्षों से जुड़ा कर्मचारी संस्था की कार्यप्रणाली, उसकी समस्याओं और उनके समाधान को अनुभव से समझता है। इसलिए बार-बार कर्मचारियों को बदलना केवल व्यक्ति को बदलना नहीं, बल्कि संस्था के संचित अनुभव को भी कमजोर करना है।

                  शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थायित्व का महत्व स्पष्ट दिखाई देता है। जो *शिक्षक* वर्षों तक एक ही विद्यालय से जुड़े रहते हैं, वे विद्यार्थियों की क्षमता, कमजोरियों और आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। उनका संबंध केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और भविष्य के निर्माण में भी योगदान देते हैं। बार-बार शिक्षक बदलने से पढ़ाई के साथ-साथ शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बनने वाला विश्वास भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए शिक्षा जैसे क्षेत्र में अनुभव और निरंतरता का विशेष महत्व है।

                  स्थायित्व को *किराए के घर* और अपने घर के अंतर से भी समझा जा सकता है। जो व्यक्ति जानता है कि उसे लंबे समय तक उसी घर में रहना है, वह उसकी सफाई, मरम्मत, रंग-रोगन और रखरखाव पर ध्यान देता है। वहीं थोड़े समय के लिए रहने वाला व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उतना दूरगामी विचार नहीं करता। यही अंतर कार्यस्थल पर भी दिखाई देता है।

                 स्थायित्व का महत्व केवल नौकरी तक सीमित नहीं है। परिवार और सामाजिक संबंध भी वर्षों के विश्वास, जिम्मेदारी और अपनत्व से मजबूत होते हैं।व्यक्ति जिस संबंध को स्थायी मानता है, उसमें अपना समय, श्रम और भावनाएँ लगाता है। कार्यस्थल पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। कर्मचारी से दीर्घकालीन निष्ठा की अपेक्षा करने से पहले संस्था को उसके भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। यह भी सही है कि हर अस्थायी कार्य अनुचित नहीं होता। किसी विशेष परियोजना, मौसमी कार्य या सीमित अवधि की आवश्यकता के लिए अस्थायी नियुक्ति उपयोगी हो सकती है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब स्थायी प्रकृति के कार्यों को भी लगातार अस्थायी व्यवस्था के सहारे चलाया जाए और कर्मचारी को वर्षों तक भविष्य की अनिश्चितता में रखा जाए।

                अस्थायी नियुक्ति से नियोक्ता कर्मचारी पर निश्चित रूप से अपना अधिकार जता सकता है। वह आवश्यकता और व्यवस्था के नाम पर काम की शर्तें तय कर सकता है, समय-समय पर कर्मचारी को बदल सकता है और यह भी तय कर सकता है कि किसे कितने समय तक काम देना है। लेकिन प्रश्न यह है कि अधिकार से क्या विश्वास भी प्राप्त किया जा सकता है? कर्मचारी काम तो कर सकता है, निर्देशों का पालन भी कर सकता है, लेकिन उसके मन में यदि यह आशंका बनी रहे कि उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है, तो उसके और संस्था के बीच वह आत्मीयता कैसे विकसित होगी, जो किसी भी कार्य-संबंध को मजबूत बनाती है? अधिकार से काम लिया जा सकता है, लेकिन विश्वास अर्जित करना पड़ता है। *विश्वास किसी नियुक्ति-पत्र की अवधि का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह निरंतरता, सम्मान, सुरक्षा और जिम्मेदारी से पैदा होता है। आखिर दुनिया केवल अधिकार और नियमों से नहीं चलती; दुनिया विश्वास पर टिकी है*। परिवार हो, समाज हो या कोई संस्था—जहाँ विश्वास होता है, वहाँ व्यक्ति अपने सामर्थ्य से आगे बढ़कर योगदान देता है। जहाँ विश्वास नहीं होता, वहाँ व्यक्ति केवल अपने दायित्व की सीमा तक सिमट जाता है। नियोक्ता का अधिकार पद से आता है, लेकिन कर्मचारी का विश्वास व्यवहार से अर्जित होता है। इसलिए कर्मचारी को केवल “काम करने वाला व्यक्ति” समझना पर्याप्त नहीं है। वह संस्था के वर्तमान को गति देने के साथ उसके भविष्य का निर्माण भी करता है। यदि संस्था उससे निष्ठा, समर्पण और बेहतर परिणाम की अपेक्षा करती है, तो उसे भी कर्मचारी के प्रति विश्वास और भविष्य की सुरक्षा का भाव रखना होगा। कर्मचारी से स्थायित्व की अपेक्षा और उसे स्वयं अस्थायित्व देना—यह एक विरोधाभास है।

                    यहाँ एक प्रश्न विचारणीय है—यदि किसी व्यक्ति को अपने भविष्य का ही भरोसा न हो, तो उससे भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने की अपेक्षा कितनी उचित है? पैसा स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार के कार्यों में मिलता है, लेकिन नौकरी केवल पैसे का संबंध नहीं है। इसके साथ विश्वास, सुरक्षा, अनुभव, निष्ठा और अपनत्व भी जुड़े होते हैं। विश्वास केवल वेतन देकर नहीं खरीदा जा सकता; उसे सम्मान, अवसर और भविष्य की सुरक्षा देकर अर्जित करना पड़ता है।

                  अतः स्थायित्व केवल नौकरी की अवधि नहीं, बल्कि विश्वास की नींव है। किसी संस्था की वास्तविक शक्ति उसकी इमारत या पूँजी में नहीं, बल्कि उसके अनुभवी, योग्य और समर्पित लोगों में होती है। इसलिए जहाँ संभव हो, वहाँ स्थायी रोजगार और दीर्घकालीन कार्य-संबंधों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।


*अस्थायी व्यवस्था से काम चलाया जा सकता है, लेकिन स्थायित्व से संस्था, विश्वास और भविष्य का निर्माण होता है।*


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छत्तीसगढ़)

*अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और चाटुकारिता के बीच बदलते मानवीय मूल्य-जीतेन्द्र वर्मा" खैरझिटिया'*

 *अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और चाटुकारिता के बीच बदलते मानवीय मूल्य-जीतेन्द्र वर्मा" खैरझिटिया'*


सच कहा जाए तो स्कूल का समय जीवन का स्वर्णिम काल होता है। यही वह समय है जब विद्यार्थी को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं दिया जाता, बल्कि उसके व्यक्तित्व की नींव भी रखी जाती है। विद्यालय में उसे अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, समय का महत्व, नियमों का पालन, परिश्रम, ईमानदारी और अपने कार्य को पूरी निष्ठा के साथ संपादित करने का संस्कार दिया जाता है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं करते, बल्कि उन्हें एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनाने का प्रयास करते हैं। अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ विद्यार्थी शिक्षक के प्रिय होते हैं, क्योंकि उनमें भविष्य के एक अच्छे नागरिक की संभावना दिखाई देती है।


विद्यालय में विद्यार्थी को यह सिखाया जाता है कि सफलता का मार्ग परिश्रम, ज्ञान और ईमानदारी से होकर गुजरता है। उसे बताया जाता है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। यही संस्कार आगे चलकर उसके जीवन का आधार बनने चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या विद्यालय में सीखे गए ये मूल्य वास्तव में हमारे सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में उसी रूप में काम आते हैं?


दुर्भाग्य से, जीवन के अगले पड़ाव पर पहुंचने के बाद कई बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं। जब व्यक्ति विद्यालय से निकलकर नौकरी, व्यवसाय, प्रशासन या सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है, तब उसका सामना ऐसी व्यवस्था से हो सकता है जहां योग्यता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ-साथ व्यक्तिगत संबंध, प्रभाव, सिफारिश और चाटुकारिता भी महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है। यहां एक विचित्र स्थिति पैदा होती है। जिस व्यक्ति को बचपन से अपने काम के प्रति ईमानदार और अनुशासित रहने की शिक्षा दी गई थी, वही व्यक्ति कभी-कभी अपनी प्रगति के लिए किसी अधिकारी, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की प्रशंसा करने को विवश दिखाई देता है।


यहीं से अनुशासन और चाटुकारिता के बीच का संघर्ष शुरू होता है।


विद्यालय में शिक्षक विद्यार्थी को ज्ञान देकर उसके भीतर आत्मसम्मान और कर्तव्यबोध पैदा करने का प्रयास करता है। शिक्षक की दृष्टि में विद्यार्थी की पहचान उसके ज्ञान, व्यवहार, परिश्रम और चरित्र से होती है। इसके विपरीत, जब किसी व्यवस्था में पद और प्रभाव सर्वोपरि हो जाते हैं, तब व्यक्ति की योग्यता से अधिक उसकी निकटता और प्रशंसा करने की क्षमता को महत्व मिलने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने स्वाभिमान को धीरे-धीरे पीछे छोड़कर उस व्यक्ति के आगे-पीछे घूमने लगता है जिसके हाथ में उसके लाभ, पद या प्रगति की शक्ति होती है।


यह केवल एक व्यक्ति का पतन नहीं है; यह मानवीय मूल्यों के कमजोर पड़ने का संकेत है।


चाटुकारिता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे योग्यता और परिश्रम पर आधारित व्यवस्था कमजोर होती है। यदि किसी संस्था में वह व्यक्ति आगे बढ़ता है जो अपने काम में कुशल और ईमानदार है, तो इससे पूरी व्यवस्था में विश्वास पैदा होता है। लेकिन यदि केवल प्रशंसा करने वाला व्यक्ति आगे बढ़ता है और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति उपेक्षित रह जाता है, तो धीरे-धीरे अन्य लोगों के मन में भी यह धारणा बनने लगती है कि मेहनत और ईमानदारी से अधिक प्रभावशाली व्यक्ति को प्रसन्न रखना जरूरी है। यही सोच किसी भी संस्था की कार्यसंस्कृति को भीतर से खोखला कर सकती है।


सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब चमचागिरी को व्यवहारिक बुद्धिमत्ता और ईमानदारी को मूर्खता समझ लिया जाए। व्यक्ति यदि अपने काम को पूरी निष्ठा से करता है, नियमों का पालन करता है और किसी अनुचित दबाव के सामने झुकने से इनकार करता है, तो वह कभी-कभी व्यवस्था में अकेला पड़ जाता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति हर परिस्थिति में बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की प्रशंसा करने के लिए तैयार रहता है, वह जल्दी पहचान बना लेता है। ऐसी विसंगति समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है—आखिर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किस प्रकार के मूल्य दे रहे हैं?


विद्यालय में हम कहते हैं कि सत्य बोलो, ईमानदारी से काम करो, नियमों का पालन करो और अपने कर्तव्य से पीछे मत हटो। लेकिन यदि वास्तविक जीवन में इन मूल्यों को सम्मान नहीं मिलेगा, तो बच्चों के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठेगा कि उन्होंने जो सीखा, उसका वास्तविक जीवन में मूल्य कितना है?


इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हर कार्यालय, संस्था या अधिकारी व्यवस्था भ्रष्ट है अथवा हर जगह चाटुकारिता ही सफलता का माध्यम है। आज भी अनेक ऐसे अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी, उद्यमी और सामान्य नागरिक हैं जो ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को सर्वोच्च महत्व देते हैं। वे बिना किसी दिखावे के अपना काम करते हैं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। समस्या उन परिस्थितियों से है जहां व्यवस्था स्वयं गलत व्यवहार को प्रोत्साहित करने लगती है।


इस स्थिति के लिए केवल व्यक्ति को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। इसके लिए व्यवस्था, संस्थागत संस्कृति और नेतृत्व—सभी की जिम्मेदारी है। यदि किसी कार्यालय में पारदर्शिता हो, कार्य का मूल्यांकन स्पष्ट नियमों के आधार पर हो, पदोन्नति योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर हो तथा गलत आचरण को संरक्षण न मिले, तो चाटुकारिता के लिए जगह अपने आप कम हो जाएगी। इसके विपरीत यदि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद निर्णयों को प्रभावित करने लगे, तो चाटुकारिता को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है।


यहां गुरु और सत्ता के बीच का अंतर भी समझना आवश्यक है। गुरु का उद्देश्य सामान्यतः व्यक्ति को ज्ञान और विवेक देकर उसे अपने पैरों पर खड़ा करना होता है। वह विद्यार्थी को प्रश्न पूछना, सही और गलत में अंतर करना तथा अपने कर्तव्य का पालन करना सिखाता है। एक आदर्श नेतृत्व भी इसी भावना पर आधारित होना चाहिए। नेता या अधिकारी का वास्तविक दायित्व अपने अधीन कार्य करने वाले लोगों से चापलूसी करवाना नहीं, बल्कि उनकी क्षमता को पहचानना और योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देना है।


पैसा, पद और अधिकार यदि व्यक्ति के विवेक से बड़े हो जाएं, तो व्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है। धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, पद से अधिकार प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन सम्मान और चरित्र खरीदे नहीं जा सकते। किसी व्यक्ति की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके आचरण, ज्ञान, परिश्रम और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार से बनती है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विद्यालय में दिए जाने वाले संस्कारों को केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित न रखें। यदि हम चाहते हैं कि बच्चे ईमानदार, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनें, तो समाज और संस्थाओं को भी उन्हीं मूल्यों का सम्मान करना होगा। शिक्षक द्वारा सिखाया गया अनुशासन तब सार्थक होगा, जब कार्यालय में भी समय की पाबंदी का सम्मान हो। कर्तव्यनिष्ठा तब सार्थक होगी, जब अपने काम को ईमानदारी से करने वाले व्यक्ति को उसका उचित सम्मान मिले। और ज्ञान तब सार्थक होगा, जब निर्णय व्यक्ति की चापलूसी से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और सत्यनिष्ठा से प्रभावित हों।


अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं है कि चाटुकारिता बड़ी है या अनुशासन? वास्तविक प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। यदि हम योग्यता, ईमानदारी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा को सम्मान देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हीं मूल्यों को अपनाएंगी। लेकिन यदि हम लगातार यह संदेश देंगे कि प्रशंसा, सिफारिश और व्यक्तिगत प्रभाव ही आगे बढ़ने का रास्ता है, तो विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले नैतिक मूल्य केवल पाठ्यपुस्तकों के पन्नों तक सीमित रह जाएंगे।


हमारा देश तभी वास्तविक अर्थों में प्रगति करेगा, जब व्यक्ति के पद से अधिक उसके काम का सम्मान होगा, प्रशंसा से अधिक योग्यता को महत्व मिलेगा और संबंधों से अधिक नियमों का पालन होगा। व्यवस्था को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो अपने कर्तव्य का निर्वहन बिना किसी स्वार्थ के करें और नेतृत्व को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो चाटुकारों की भीड़ के बजाय योग्य और ईमानदार लोगों को पहचान सकें।


इसलिए यह केवल सोचने का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है—हम अपने बच्चों को विद्यालय में जो मूल्य सिखा रहे हैं, क्या हमारा समाज उन्हें जीने का अवसर भी दे रहा है? यदि इसका उत्तर नकारात्मक है, तो दोष केवल बच्चों या कर्मचारियों का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जो अच्छे संस्कारों को जीवन में स्थान देने के बजाय चाटुकारिता को सफलता का माध्यम बनने देती है।


विद्यालय से निकलते समय विद्यार्थी के हाथ में केवल प्रमाण-पत्र नहीं होता; उसके भीतर वर्षों से निर्मित संस्कार भी होते हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियां उन संस्कारों को कुचलें नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूत करें। तभी शिक्षा वास्तव में शिक्षा कहलाएगी और अनुशासन तथा कर्तव्यनिष्ठा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित न रहकर पूरे समाज की पहचान बन पाएगी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

Thursday, 3 September 2026

बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

                 

                       छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "बहरतीन" पुस्तक नही; बल्कि डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के व्यक्तित्व आय,उँखर मन के उपज आय,गाँव गँवई के सँउहत झाँकी आय। चंद्रा जी के सरल सहज व्यक्तित्व अउ माटी महतारी ले जुड़ाव, ये काव्य संग्रह मा सहज झलकत हे। कहे जाथे कि "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि" माने जननी अउ जन्म भूमि स्वर्ग ले बढ़के होथे। चाहे जनम देवइया महतारी होय या माटी महतारी होय या हमर संस्कृति,पार-परम्परा या संस्कार होय आदि सबके सेवा बर चंद्रा जी सबर दिन अघुवा बनके बूता करें हें अउ अभो करत हें। ये पुस्तक के नाँव ला ही अपन महतारी के नाँव देके चंद्रा जी मन अपन जनम देवइया महतारी ला अमर कर दिन। शिक्षा, साहित्य अउ समाज बर सबर दिन समर्पित, डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के आकर्षक व्यक्तित्व के सबे कायल हें। उँखर नेतृत्व क्षमता के जवाब नइहे। घर-परिवार, गांव अउ समाज संग आज चंद्रा जी कोरबा के जम्मों साहित्यकार मन ला संघेर के साहित्य भवन समिति कोरबा के रथ ला सरलग हाँकत हें। भाव प्रधान सृजन चंद्रा जी के कलम के खास विशेषता ए। जेन लगन अउ महिनत ले चंद्रा जी मन काव्य रचथें, उही लगन अउ महिनत उँखर गायकी मा तको झलकथे। सुमधुर गीतकार के रूप मा चंद्रा जी ला पूरा छत्तीसगढ़ जानथे,पहिचानथे। भले  छत्तीसगढ़ी मा डॉ साहब के ये पहली काव्य संग्रह आय, फेर साहित्य सृजन अउ गायन बनेच पहिली के करत आवत हें।

                           छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी भाषा दूनो मा, चंद्रा जी  मन के समान अधिकार हे। "आनंद के दोहे" नाम से हिंदी मा, काव्य संग्रह चंद्रा जी मन निकाल चुकें हे। कोनो रचना के सृजन होय या पुस्तक छपाई होय, लइका जनई के धैर्य अउ कोख के पीरा कस ही हे। जइसे महतारी लइका ला कोख मा नौ महिना बोहे रथे, वइसने एक कलमकार के मन मा रचना के सिरजन तक भाव अउ शब्द उमड़त घुमड़त रथे। लइका जने के बाद जइसे महतारी परम् सुख के अनुभव करथे, वइसने रचना के सिरजन के बाद कलमकार के दिलो दिमाक ले शब्द के बोझ उतरथे अउ परम् शांति पाथें। चंद्रा जी मन के कई दशक पहिली लिखित रचना मन आज पुस्तक के रूप मा आवत हे। ये उँखर बर खुशी के पल तो है ही, संगे संग पाठक अउ साहित्य जगत बर तको खुशी के बात हे।

                        गांव के गली खोर मा खेलत खावत, नाचत गावत, प्रधान अध्यापक तक के सफर तय करइया चंद्रा जी मा प्रतिभा कूटकूट के भरे हे। चंद्रा जी मधुर कंठ के धनी गीतकार के संगे संग रंगमंच के तको सधे कलाकार आय। बड़े बड़े संस्था मा एक ले बढ़के एक नाटक मा मनमोहक किरदार चंद्रा जी मन निभाये हे। बाल्को सांस्कृतिक मण्डल के बैनर तले "चरण दास चोर" नाटक मा महू ला चंद्रा जी संग काम करे के सौभाग्य मिलिस हे। कलमकार, कलाकार, गायक के संगे संग उद्घोषक, उत्कृष्ट शिक्षक अउ समाज सेवक के रूप तको चंद्रा जी जाने पहिचाने जाथे। जब मैं 2006 मा बाल्को  कोरबा आयेंव, अउ उँखर गीत-कविता ला सुनेंव, तब ले आज तक मोर पसंदीदा गीतकार के रूप मा चंद्रा जी मन मोर मन मे बसे हें। कोरबा मा होवइया साहित्यिक, सामाजिक, शैक्षणिक आदि लगभग सबे कार्यक्रम मा चंद्रा जी ला, अहम भूमिका अदा करत, सरलग देखत-सुनत आवत हँव। अउ आजो उही भागीदारी, जोश-जज्बा, उमंग-उछाह देख मोर कस कतको लिखइया-पढ़इया, कवि-कवियित्री के प्रेरणास्रोत बने हे। चाहे साहित्य होय, समाज होय, शिक्षा होय या घर परिवार के जिम्मेदारी होय, चंद्रा जी सब ला बरोबर समय देवत, सबके सेवा करिस। हाल ही में पीएचडी करके, डॉक्टरेट के उपाधि तको पाइन। सब ला लेके चले अउ सब बर बरोबर समय निकाले, अइसन व्यक्तिव बिरले मिलथे।

                            हमर भारत देश होय या हमर राज छत्तीसगढ़, दूनो के आत्मा गाँव मा ही बसथे, वइसने चंद्रा जी के मन, अपन जनम भूमि अउ गाँव ला कभू नइ बिसरा सके। तभे तो गांव के खेत-खार, बारी-बखरी, नदी-पहाड़, जंगल-झाड़ी, रहन-सहन, तीज-तिहार, संस्कृति-संस्कार, पार-परम्परा, नता-रिस्ता, खेल-खाजी, रोटी-पीठा आदि सब चंद्रा जी के कलम मा नजर आथे। ये पुस्तक के बात करन ता, येमा एक ले बढ़के एक गीत कविता संग्रहित हे।  ये पुस्तक मा संग्रहित गीत "मोला मोर परेवा पाँखी गांव अगोरत हे" मोर बड़ पसंदीदा गीत आय। जे चंद्रा जी के मुख ले सुनके परम् शांति देथे अउ चाहे कहूँ भी खड़े राहस, सुनते ही मन ला, गांव के गली खोर मा ले जाके खड़े कर देथे। अइसने अउ कतको मनभावन गीत चंद्रा जी मन ये पुस्तक मा संग्रहित करें हें। पुस्तक मा भाव पक्ष के बेजोड़ता के संगे संग कला पक्ष बड़ सुदृढ़ हे। ये संग्रह मा, सरल सहज अउ चलती आंचलिक छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग चंद्रा जी मन करें हें। मनभावन अलांकारिक छटा पाठक वर्ग ला प्रभावित करही। ज्यादातर रचना गीत के रूप मा हे। चंद्रा जी कई प्रकार के छंद मा तको काव्य सृजन करे हे, ये पुस्तक मा  शास्त्रीय छंद दोहा अउ लोक छंद पवैया छंद के कविता संग्रहित हे। लोक धुन मा रचित कर्मा गीत , जागरण गीत, जस गीत, होरी गीत,सुमरनी गीत बड़ आकर्षक अउ मनभावन हे। 

                     आजकल कतको कवि मन दूसर के रचना ला अपन बताके गा, छपा देथें, जे गलत हे। अइसन करे मा हाँसी फभित्ता ही होथे, अइसने भाव के एक कविता ये पुस्तक मा हे-

"आन के लिखे मा लिखोइया बनथे, ते गिरथे मुड़भर्रा।"


                         "जंगल मा डांका परे हे,कोन बचाही" गीत बड़ मार्मिक अउ चिंतन करे बर मजबूर करत हे। आज जंगल झाड़ी के कटई घास फूस बरोबर होवत हे, संगे संग जंगल ले जुड़े जम्मों रीत-नीत, रहन-सहन सबके विनाश होवत हे। चंद्रा जी के संसो आज सबके संसो होना चाही,काबर कि जंगल हे तभे जीवन हे।


                        

                इरसा द्वेष, ऊँच नीच, तोर मोर के आगी हकीकत के आगी ले तको बड़ खतरनाक होथे। जे एक बेर बरे जे बाद कभू बुझाए जे नाम नइ ले। एखर ले सबला बचना चाही, अउ भाईचारा के गारा मा चिपके रहना चाही। इही भाव मा चंद्रा जी मन लिखथें-    "मनखें खातिर मनखें के ये कइसन बाँटा।

  अपन ब राखे फलफूल,दूसर ब कांटा कांटा।"


                             मैं एक मुक्तक मा हमेशा पढ़थों कि "हर पड़ोसी पाकिस्तान होता है"  अउ देखे बर तको मिलथे, ज्यादातर पड़ोसी संग मनखें मन चिढ़े रथें। उही बात के संसो करत चंद्रा जी मन एक कविता मा लिखें हे---" आज पडोसीपन नँदात जात हे।"


                           कतको लालची मन छत्तीसगढिया मन ला सब ले बढ़िया कहिके भुलवारत उँखर अधिकार अउ चीज बस ला नँगावत हें, चिरई बरोबर लहलहावत आस विश्वास के फसल ला मन के खावत हें। उही ल साव चेत करत चंद्रा जी मन लिखथें--

"छत्तीसगढ़ के रहइया सब मन,जागत रइहा रे।

कहाँ मेर चिड़िया दाना चुगत हे,ताकत रइहा रे।।"

               

                             दाई ददा मन लइका ला अपन खून पसीना बहा बहा के पालथें पोसथें, कि बुढ़त काल में सेवा जतन करही। फेर आधुनिक बेरा मा लइका मन पढ़ लिख के विदेश या गांव ल छोड़ शहर चल देथें, ता कतको मन अपन जिम्मेदारी ले भाग जथें। फेर ददा दाई के सेवा तो नारायण सेवा ले तको बढ़के हे। आज वृद्धाश्रम के संख्या बढ़त जावत हे, जे चिंतनीय हे। ददा दाई के सियानापन मा सेवा करे बर प्रेरित करत चंद्रा जी मन लिखथें-

"उठ जा उठ जा उठ जा बेटा मोर, बिहान होगे गा।

 देख तो दाई ददा तोर, सियान होगे गा।।"


                     ये सब के आलावा ये काव्य संग्रह मा नारी शक्ति के मान सम्मान, मया पिरित, तीज- तिहार, शिक्षा के महत्ता, सार्थक सीख-सिखावन अउ देश- राज, गांव-घर, खेती-बाड़ी, जंगल झाड़ी, ददा दाई आदि सम्बंधी  संसो फिकर के गीत कविता संग्रहित हे। पाठक मन ये संग्रह ला पढ़त पढ़त गाये बर मजबूर हो जहीं, अउ परम् आनंद प्राप्त करहीं। अइसन सुघ्घर सिरजन खातिर डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी ला कोटिशः बधाई अउ शुभकामना।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मनभावन महिना भादो* -जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

 *मनभावन महिना भादो* -जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया


                आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भुइँयाँ भादों मा अघाय कस लगथे, तभे तो तरिया डबरा मा पानी माढ़े अउ लहरा मारत दिखथे। मनमाड़े चलत धारी भादो के आरो पाके धीर धर लेथे। बँधिया,तरिया,ढ़ोंड़गा जे सावन भर दानी कस पानी फेकत रिहिस, वो बनिया बरोबर अब नाप नाप के जादच उपरहा भर ल झलकात दिखथे।सरलग चलत धूका- गर्रा, झड़ी-झक्कर, बिजुरी के चमकई अउ बादर के गरजई घलो कमती होय बर लग जथे। थोर बहुत डबरा खँचका के पानी ल अँटत देख करिया बादर बीच बीच मा हुरहा धुरहा आथे अउ पानी समो के भाग जथे। सुरुज नारायण जे आसाढ़ सावन भर लुकाय लुकाय फिरत रिहिस,भादो के आरो पाके आसमान मा घूमत फिरत आँखी मा दिखेल धर लेथे। थमे पानी ल देख,चिरई चिरगुन मन भादो के आरो पाके उझरे झाला खोंदरा ल नवा सिरजाये के उदिम करत दिखथें।धान-पान, काँदी-कूसा सजोर होके पुरवइया मा नाचत गावत, झुमरत दिखथे। झड़ी बादर ले तंग चिरई चिरगुन, छेरी-बोकरा, गाय गरुवा झूम-झूमके अउ घूम- घूम  चारा चरत दिखथें। घर कुरिया बारिस मा पस्त दिखथें ता खेत खार, तरिया नदियाँ मतंग अउ मस्त। भादो के लगत घर कोठ मा रचे काई केरवस ल दाई महतारी मन उजराये बर लग जथें।


*तिहार बार*- 

हमर छत्तीसगढ़ राज का, हमर देश घलो कृषि प्रधान हे, जिहाँ के रहन सहन अउ तीज तिहार, खेती किसानी के हिसाब  ले चलथे। सावन अउ भादो तीज तिहार के महीना होथे। ये महीना मा अतेक जादा तीज तिहार होथे कि सबके बरनन कर पाना सम्भव घलो नइहे। अतेक तीज तिहार मनाये के तको कारण हे। ज्यादातर मनखे मन पहली खेती किसानी करैं, अउ बरसा घरी भरे पानी मा निंदई कोड़ई करत सरलग खेतेच मा  लगे रहैं। जेखर ले हाथ अउ गोड़ दूनो सेठरा जाय,अउ सरलग भींगई तको होय। मनखे मन काम बूता मा अतिक रमे रहैं, कि यदि कोई तिहार बार नइ होतिस ता हाथ गोड़ के घलो खियाल नइ रखतिस, काम के संग आराम घलो चाही, ते पाय के ये घरी अतिक तिहार मनाये के चलन हे। जे मनखे मन के तन के संगे संग मन ला घलो भला चंगा करथे। आजो ये चलागन चलते हे। भादो महीना मा बेटी माई मन निंदई कोड़ई करके तीजा के बहाना मइके जाथे, काबर कि काम कमई के मारे बनेच दिन ले घर ले नइ निकले रहैं। कमरछठ,तीजा-पोरा, नारबोध,कड़ाबन्द, इतवारी, सोमवारी, जन्माष्टमी, रामसताव, गणेश चतुर्थी कस बनेच अकन तिहार भादो महीना म मनाये जाथे। ये सब तिहार बार मनखे  मनखे बीच दया मया,उछाह उमंग के बरसा करे के संगे संग खेती किसानी, संस्कार-संस्कृति, पार अउ परम्परा ले मानुष ल जोड़े रखथें।

                     भादो महीना के बड़का तिहार आय तीजा।  ये महतारी बहिनी मन के तिहार आय, जेला वो मन मइके मा रहिके मनाथे। ये दिन के रद्दा सबें बहिनी मन जोहत रथे, कि ददा नहीं ते भैया आही अउ तीजा ले जाही। जे बेटी ददा दाई के अंगना मा ननपन ले खेलिस खइस, फेर बिहाव के बाद वो अंगना के दुरिहागिस, अइसन मा वो पावन ठिहा मा फेर जब महतारी बहिनी मन पाँव रखथे ता सरग के सुख घलो, उन मन ला कमती लगथे। दाई, ददा, बहिनी, भाई के मया के धार अउ ननपन के जम्मो सुरता मा अन्तस् तक भींग जथे। तीजा के नेंग जोग ल तो सबें जानत हव,उपास कइसे रथे? का खाथें? कोन ल मनाथे? मोला लिखे के जरूरत नइहे। मइके के लुगरा तीजहारिन मन बर अनमोल होथे। तीजा मा संगी संगवारी संग जम्मों बहिनी ले मइके मा ये दरी भेंट होथे। ये पावन बेरा मा महतारी, बहिनी मन मइके जाके अपन जम्मों थकान अउ संसो ल बिसार देथें। मइके के माहौल उन ला एक बेर अउ ननपन के सुरता अउ  जुन्ना मस्ती मा डुबो देथे। तीजा संस्कृति संस्कार, मया दया अउ सुख शांति के बरसा करथे।  जमाना ले चलत आवत तीजा ला बहिनी महतारी मन बड़ उछाह अउ उमंग ले मनाथें। अउ जड़-चेतन, घर बार, खेत खार, पार परिवार  सबके सुख शांति के कामना करथें। ये सब तिहार बार के उपास धास शरीर बड़ बड़ उपयोगी होथे।


*खेत खार अउ फूल फुलवारी के सुघराई*-

खेत मा भराय पानी अउ ओमा तँउरत मछरी, मेचका, केकरा संग, सजोर  होके नाचत गावत धान ल देख मारे खुसी के, किसान खेतेच मा नाच अउ गा देथे। निंदइया मनके कर्मा ददरिया अउ सनन सनन चलत पुरवाही मन ल मता देथे। पड़की, पपीहा अउ तीतुर के मीठ बोली खेत खार मा रहिरहि राग रंग घोरत रहिथे। मेड पार मा फुले- फरे मुंगेसा,कोलिहापुरी, फोटका,फूट अउ काँसी काँद- दूबी मन ल मोह लेथे। काँसी के पोनी कस पड़ड़ी फूल देख जिया मा उमंग हमा जथे। तुलसीदास जी महाराज काँसी के फूल ल देखत लिखे हे- 


*फुले काँस सकल महि छाई।*

*जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई।*


माने धरती मा काँसी ल फुले देख अइसे लगत हे, मानो बरसा ऋतु हा अपन बुढ़ापा प्रकट करत हे। वइसे भादो घरी कांसी फुले के चालू होथे अउ शरद ऋतु घरी चारो मुड़ा खेत खार पड़री पड़री दिखथें। मेड़ पार के बम्हरी मा सोनहा फूल लद जथे।  बम्हरी के सोनहा फूल देख अधर म सहज ही माटी पूत लक्ष्मण मस्तुरिहा जी के ये गीत आ जथे- 

*हरियर हरियर बम्हरी म सोन के खिनवा।*


संग मा फागुन चैत मा फुलइया सरई ला सइगोंन बिजरावत दिखथे, ता मधुमास मा मउरइया आमा ल रियाँ अउ फागुन मा नचइया परसा अउ अमलतास ला पिंयर गुलमोहर। मोर कहना गलत होही ता भादो मा सइगोंन, रियाँ अउ पिंयर गुलमोहर ल देख के खुदे आंकलन कर सकथव, न गुलमोहर, अमलतास अउ परसा ले कमती दिखथे, न रियाँ आमा मौर ले अउ न सइगोन सरई ले। जइसे परसा अउ अमलतास माघ फागुन मा सड़क गांव गली खेत खार मा आगी बरोबर बरत दिखथें, ठीक वइसने भादो मा पिंवरी गुलमोहर शहर, गांव, गली, रद्दा बाट मा पिवरा पिवरा फूल मा लदाय लहसत, नाचत गावत दिखथे। मधुमास मा मउरे आमा कस रियाँ, भादो मा सजे सँवरे रथे। सइगोंन के बड़े  बड़े पाना घलो  फूल मा लुकाय दिखथें, कहे के मतलब सइगोंन अतका फुले रहिथे कि ओखर जबर पाना ह घलो नइ दिखे, सिर्फ फुले फूल नजर आथें। मन ला ललचावत   कदम्ब के फूल ला देखत दाई के लोरी

* "झूलना के झूल कदम्ब जे फूल"*  

अउ "*यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे"* 


ये कविता अन्तस् मा उमड़े बर लग जथे। भादों घरी पिंयर गुलमोहर कस हिंगलाज घलो गली-खोर, खेत-खार,डहर-बाट मा माते रहिथे, दूनो के फूल घलो लगभग एके दिखथें, अंतर रथे ता सिर्फ ऊंचाई के। एक ऊँच पेड़ आय अउ एक छोट झाड़ीनुमा पौधा। नदिया नरवा तरिया अउ मेड़ पार म उगे बेसरम अउ धतुरा के पौधा घलो भादो मा हल्का गुलाबी रंग मा मनमोहत मुस्कावत दिखथें। एके गुच्छा मा कतको रंग ल समेटे मोकैया के फूल जघा जघा मुचमुचावत, भौरा तितली संग मनखे मनके जिया ल ललचावत दिखथे।

                 फुले कउहा,कसही,बोइर,छीता,जाम अउ छोट फर धर झूलत अमली भादो मा मनभावन लगथे। पड़री पड़री तिली के फूल, पिवरी पिवरी फूल धरे बम्हरी, मूँगेसा, फूट, सोयाबीन, कोलिहापुरी अउ बोदेला खेतखार मा भादो मास भर मगन रहिथे। अनमोल झुमका कस शिव बम्भूर के मनभावन फूल घलो दिखे बर लग जथे। भादो मा पानी मा बूड़े धान, फूल झराके पोटराये बर लगथे। खेत के मेड़ मा राहेर, तिली मनभावन लगथे। फुले पटवा के फूल के का कहना जउन देखे होही ते भागमानी आय, देखे मा ही ओखर फूल के सुघराई समझ आही, लिखके कहना मुश्किल हे। कनिहा भर बाढ़े काँदी, बन कचरा अउ लाम लाम लामे बेल बूटा देखत मन मा उमंग हमा जथे।


*घर अउ बारी-बखरी*

आसाढ़  मा बोय साग भाजी भादो मा फूल फर धरके नार बियार मा झूलत रथे। रमकलिया के छोट पौधा मा पिवरी सफेद अउ लाली रंग के मेल ले बने मनभावन फूल अइसे लगथे मानो कोनो पेंटर ह कागज मा उकेरे हे। मनमाड़े घपटे तोरई,करेला,कुंदरू,कोमढ़ा,पोपट,खेकसी घलो फूल फर के इतरावत रथे। भादो मा थोर थोर साग भाजी बारी बखरी ले निकले बर लग जथे, चारो कोती लामे नार बियार, अउ बाढ़े भाजी पाला ल देख मन झूमर जथे। काँद काँदी म घलो फूल आ जाय रहिथे। घर अउ बारी बखरी मा फुले बैजंत्री,चिरइयाँ के किसम किसम के रंग जिया ल खींच लेथे। नीला नीला फुले सूँतई के फूल(अपराजिता) नार बियार सुद्धा देवारी घरी लटके कोनो झालर बरोबर मनभावन लगथे। घर के दुवारी मा घउदे दसमत, कागज फूल(फाटक फूल), माते सादा सोहागी, मनमाड़े घउदे गोंदा अउ मोंगरा बरसा के पानी ले लड़ भिड़ के भादो मा खुलखुल खुलखुल हाँसत दिखथें,मानो जीत जे खुशी मनावत हें।


*कुवाँ,तरिया,नरवा*

आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भादो मा तरिया कुवाँ नरवा कोटकोट ले अघाये दिखथें। पार, पचरी, तट,तीर सब धोवा मँजा के उज्जर दिखथें। पानी पाके मछरी,मेचका मनमाड़े मगन होके तँउरत दिखथे। रंग रंग के कमल कोकमा तरिया ढ़ोंड़गा के सुघराई ला बढ़ावत दिखथें। बरसा के पानी घरी मतलाये कुवाँ,तरिया, नरवा के पानी भादो के आरो पाके फरिहर होय बर लग जथे, पानी भीतर  तँउरत मछरी केकरा घलो चकचक ले दिखेल  धर लेथे। उबुक चुबुक करत घाट घठोंधा राहत के साँस लेवत, मनखे मन ला अपन ऊपर चढ़े नाहत-खोरत देख मगन रहिथे। तरिया नरवा भराय पानी ला पइसा बरोबर हिसाब किताब लगा के जतके जरूरी हे ततके बोहावत दिखथे। कहे के मतलब जादा होथे तभे उलट भागथे, नही ते टिपटिप ले भरे रहिथे। 


                तीज तिहार के मजा उड़ावत, झूमत नाचत गावत, रंग रंग के रोटी पीठा खावत, काबा काबा काँदी डोहारत, खेत खार के मुही पानी बाँधत फोड़त, धान पान ल निंदत चालत अउ नजर भर निहारत, किसम किसम के भाजी पाला खावत, पेड़-पात, फूल-फर के सुघराई देखत देखत भादो कब बुलक जथे पतच नइ चले। अन्तर मन ले देखे,सोचे,गुने, सुने अउ नजर भर निहारे जाय ता,हमर हिंदी पंचाग के छठवा महीना भादो बड़ मनभावन हे।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

कलंक मनखे -सरसी छन्द

 कलंक मनखे -सरसी छन्द


गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।

अइसन सबक सिखादे उन ला, विनती हे भगवान।।


अत्याचार करत हें भारी, सुनँय गुनँय नइ बात।

मानव होके मानवता ला, मारत फिरथें लात।।

डर हे ना पछतावा चिटको, गरजे बन शैतान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


अस्मत लूटे अत्याचारी, मद मउहा में चूर।

बेटी माई बेबस मनखे, दुख पाये भरपूर।।

नेता गुंडा साब सिपैहा, पाय हवै वरदान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


करनी के फल भुगते तुरते, तुरते होय नियाँव।

बजे काल के डंका अइसे, होय झने चिंव चाँव।।

मारे काटे लूटे पाटे, तेखर मरे बिहान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


न्याय तंत्र हा ये कलजुग के, बनके रहिगे खेल।

कैदी मन के कदर बढ़े हे, घर जइसे हे जेल।।

चोर सिपैहा भाई भाई, बिगड़े हवै विधान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)