Thursday, 16 July 2026

दाई दिखथे........ --------------------------------------------

 ...........दाई दिखथे........

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दाई दिखथे,

ढेंकी के ठक-ठक में।

चुरोना के फट-फट में।

छेना के थप-थप में।

करछुल के खट-खट में।


दाई दिखथे,

अईरसा के पाग में।

भुंजे-बघारे साग में।

लोरी  के   राग   में।

अंचरा के ताग-ताग में।


दाई दिखथे,

गघरी-गुंडी के पानी में।

गुंगवात खपरा छानी में।

बरनी के आमा चानी में।

लईका के तोतवा बानी में।


दाई दिखथे,

चांड़ी-टिपली डुवा में।

घाट-घठौदा कुंवा में।

गौरा भड़ोनी सुवा में।

लईका-लोग के दुवा में।


दाई दिखथे,

तुलसी चंवरा के दिया में।

दुख-पीरा भरे जिया में।

सुखाय छानी के बरी में।

गंजाय कथरी के घरी में।


दाई दिखथे,

लीपे-पोते घर-दुवार में।

बासी माड़े मेड़-पार में।

साग-भाजी नार-बियार में।

बेटा-बेटी के संस्कार में।

       जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

           बाल्को(कोरबा)

किसन्हा आसिक.....

 ....किसन्हा आसिक.....


हव मय आसिक ऑव,

माटी महतारी के|

नागंर बैला गाड़ी के|

पईली काठा खॉड़ी के|

रापा गैंयती कुदारी के|


करथो मया खॉटी,

खाथो नून बासी|

रहिथो वइसने जइसे

दल  म रेगें चॉटी|

भूलागे भोंभरा,

चुंहगे छानी|

कसके छय महिना

अब चलही किसानी|

अब न बात होही,

न मुलाखात होही..........|

जेन भी होही,

किसानी के बाद होही....|


चुक्ता दिन खेत म बीते,

रतिहा सिरिफ खटिया दिखे|

कोनो अगोरे,

चाहे कोनो हाथ जोरे|

किसन्हा अपन,

खेती ल नई छोंड़े|

न बिरस्पत मिलौ,

न ईतवार मिलौ |

न आसाढ़ मिलौ,

न कुवार मिलौ |

न दिन मिलबोन 

न रात मिलबोन..................|

मिलबोन त अब

किसानी के बाद मिलबोन.....|


सुतत उठत बईठत

ऑखी म खेतीखार दिखे|

मेहनत के कलम ले किसन्हा

संसार के भाग लिखे  |

न घर बर टेम हे,

न बन बर टेम हे|

न काली टेम हे

न आज..................|

टेम मिलही

 त किसानी के बाद....|


त चल मया ल,

एकमई होन दे..................|

फेर पहिली बावत बियासी,

अउ लुवई होन दे...............|

                          जीतेन्द्र वर्मा

                        खैरझिटी (राज.)

कतको हे::::::::



::::::::कतको हे::::::::


भाई भाई ल,लड़इय्या  कतको हे।

मीत मया ल, खँड़इय्या कतको हे।


लिगरी  लगाये  बिन  पेट  नइ  भरे,

रद्दा म खँचका करइय्या कतको हे।


हाथ ले छुटे नही,चार आना  घलो,

फोकट के धन,धरइय्या कतको हे।


रोपे  बर  रूख,रोज रोजना धर लेथे,

बाढ़े पेड़ पात ल,चरइय्या कतको हे।


जात - पात  भेस म,छुटगे देश,

स्वारथ बर मरइय्या कतको हे।


दूध दुहइय्या कोई,दिखे घलो नहीं,

फेर  दुहना ल,भरइय्या कतको हे।


पलइया पोंसइया सिरिफ दाई ददा,

मरे  म,खन के,गड़इय्या कतको हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

पाके पाके बिही

 जाम बिही तक खाय बर, सोचें पड़थे आज।

जर बुखार जुड़ हो जथे, बोलत आथे लाज।

खैरझिटिया

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


पाके पाके बिही


पाके पाके बिही।

सोचत होहू दिही।

गय फोकट के जमाना,

कोनो पैसा मा लिही??

पाके पाके बिही-----1


चाँट चउमिन खाहू।

त चाँट के जाहू।।

फल फुलवारी खाही,

तिही हा जिही।।

पाके पाके बिही------2


पइधथे बेंदरा।

ता पर जथे चेंद्रा।

मनखे पइधही,

ता कोन बने किही?

पाके पाके बिही------3


लटलट ले फरे देख।

पारा परोसी जरे देख।।

दर्जन भर एके घांव,

झडक देथों मिही।

पाके पाके बिही--------4


कतको नइ खा सके।

कतको नइ पा सके।।

नवा जुग लील दिस,

बखरी बगीचा डिही।

पाके पाके बिही--------5


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 11 July 2026

तिहार देख ले

 तिहार देख ले

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आ हमर गांव के ,  तिहार देख ले।

सुग्घर लीपे-पोते,घर दुवार देख ले।


काय हरे हरेली,काय हरे तीजा-पोरा।

कोन-कोन तिहार बर,कईसन होथे जोरा।

झुमय नाचे सबो झन,मिन्झरे पिंयार देख ले।


राखी सवनाही ,सोम्मारी कमरछठ।

रांध के कलेवा,खाथे सबो छक।

झुलना झूले कन्हैया,मिंयार देख ले।


मुसवा संग मुस्काये,गली-गली गनपति।

जस गाये दाई दुर्गा के,मनाये सरसती।

राम जी के जीतई अउ,रावन के हार देख ले।


रामधुनी रामसत्ता,भागवत रमायेन।

दियना देवारी के,जगमग जलायेन।

परसा संग माते,नाचे खेत-खार देख ले।


पूजा-पाठ बर-बिहाव,मड़ई अक्ति छेरछेरा।

सुवा-करमा अउ गम्मत म,बीते कतको बेरा।

नांव के तिहार नही,इहां सार देख ले।

               जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

                  बाल्को(कोरबा)

संकलित-गंवागे मोर गांव

Sunday, 5 July 2026

सरकारी दारू

 सरकारी दारू-सरसी छंद


गांव गांव मा दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।

मंद पियइया बाढ़त हावै, बाढ़त हावै रार।।


कोष भरे बर दारू बेंचय, शासन देखव आज।

नशा नाश ए कहि चिल्लावै, आय घलो नइ लाज।।

पीयैं बेंच भांज दरुहा मन, घर बन खेती खार।

गांव गांव में दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।।


दारू गांजा के चक्कर मा, होवत हवै बिगाड़।

मंद पियइया मनखें मन हा, लाहो लेवैं ठाड़।।

कहाँ सुधर पावत हे कोई, खावँय चाहे मार।

गांव गांव में दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।।


नशा करौ झन कहिके शासन, पीटत रहिथे ढोल।

मंद मिलत हावै सरकारी,  खुल जावत हे पोल।।

कथनी करनी मा अंतर हे, काय कहौं मुँह फार।

गांव गांव में दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को नगर कोरबा(छग)

अशिक्षा-सार छंद

 अशिक्षा-सार छंद


अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।

इती उती भागे बर लगथे, जैसे कुकुर बिलैया।।


काम करे नइ मति बेरा मा, फुटे घलो नइ बानी।

अपढ़ जान के दुनिया वाले, करथें नित मनमानी।।

देय सहारा कोनों हा नइ, मिलथें टाँग खिंचैया।

अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।


 कोई हा नइ करे पुछारी, मारे रहिरहि ताना।

आज जुटा पाना नोहर हे, दुनों टेम के खाना।।

हाव भाव नइ देखे कोई, सब हें घाव करैया।

अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।


अलगा देथें अड़हा कहिके,अउ सब जाथें जुरिया।

आये अभिशाप अशिक्षा हा, हले नेव घर कुरिया।।

हक माँगे हकलासी लगथे, डूबे लगथे नैया।

अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)