Thursday, 3 September 2026

बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

                 

                       छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "बहरतीन" पुस्तक नही; बल्कि डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के व्यक्तित्व आय,उँखर मन के उपज आय,गाँव गँवई के सँउहत झाँकी आय। चंद्रा जी के सरल सहज व्यक्तित्व अउ माटी महतारी ले जुड़ाव, ये काव्य संग्रह मा सहज झलकत हे। कहे जाथे कि "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि" माने जननी अउ जन्म भूमि स्वर्ग ले बढ़के होथे। चाहे जनम देवइया महतारी होय या माटी महतारी होय या हमर संस्कृति,पार-परम्परा या संस्कार होय आदि सबके सेवा बर चंद्रा जी सबर दिन अघुवा बनके बूता करें हें अउ अभो करत हें। ये पुस्तक के नाँव ला ही अपन महतारी के नाँव देके चंद्रा जी मन अपन जनम देवइया महतारी ला अमर कर दिन। शिक्षा, साहित्य अउ समाज बर सबर दिन समर्पित, डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के आकर्षक व्यक्तित्व के सबे कायल हें। उँखर नेतृत्व क्षमता के जवाब नइहे। घर-परिवार, गांव अउ समाज संग आज चंद्रा जी कोरबा के जम्मों साहित्यकार मन ला संघेर के साहित्य भवन समिति कोरबा के रथ ला सरलग हाँकत हें। भाव प्रधान सृजन चंद्रा जी के कलम के खास विशेषता ए। जेन लगन अउ महिनत ले चंद्रा जी मन काव्य रचथें, उही लगन अउ महिनत उँखर गायकी मा तको झलकथे। सुमधुर गीतकार के रूप मा चंद्रा जी ला पूरा छत्तीसगढ़ जानथे,पहिचानथे। भले  छत्तीसगढ़ी मा डॉ साहब के ये पहली काव्य संग्रह आय, फेर साहित्य सृजन अउ गायन बनेच पहिली के करत आवत हें।

                           छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी भाषा दूनो मा, चंद्रा जी  मन के समान अधिकार हे। "आनंद के दोहे" नाम से हिंदी मा, काव्य संग्रह चंद्रा जी मन निकाल चुकें हे। कोनो रचना के सृजन होय या पुस्तक छपाई होय, लइका जनई के धैर्य अउ कोख के पीरा कस ही हे। जइसे महतारी लइका ला कोख मा नौ महिना बोहे रथे, वइसने एक कलमकार के मन मा रचना के सिरजन तक भाव अउ शब्द उमड़त घुमड़त रथे। लइका जने के बाद जइसे महतारी परम् सुख के अनुभव करथे, वइसने रचना के सिरजन के बाद कलमकार के दिलो दिमाक ले शब्द के बोझ उतरथे अउ परम् शांति पाथें। चंद्रा जी मन के कई दशक पहिली लिखित रचना मन आज पुस्तक के रूप मा आवत हे। ये उँखर बर खुशी के पल तो है ही, संगे संग पाठक अउ साहित्य जगत बर तको खुशी के बात हे।

                        गांव के गली खोर मा खेलत खावत, नाचत गावत, प्रधान अध्यापक तक के सफर तय करइया चंद्रा जी मा प्रतिभा कूटकूट के भरे हे। चंद्रा जी मधुर कंठ के धनी गीतकार के संगे संग रंगमंच के तको सधे कलाकार आय। बड़े बड़े संस्था मा एक ले बढ़के एक नाटक मा मनमोहक किरदार चंद्रा जी मन निभाये हे। बाल्को सांस्कृतिक मण्डल के बैनर तले "चरण दास चोर" नाटक मा महू ला चंद्रा जी संग काम करे के सौभाग्य मिलिस हे। कलमकार, कलाकार, गायक के संगे संग उद्घोषक, उत्कृष्ट शिक्षक अउ समाज सेवक के रूप तको चंद्रा जी जाने पहिचाने जाथे। जब मैं 2006 मा बाल्को  कोरबा आयेंव, अउ उँखर गीत-कविता ला सुनेंव, तब ले आज तक मोर पसंदीदा गीतकार के रूप मा चंद्रा जी मन मोर मन मे बसे हें। कोरबा मा होवइया साहित्यिक, सामाजिक, शैक्षणिक आदि लगभग सबे कार्यक्रम मा चंद्रा जी ला, अहम भूमिका अदा करत, सरलग देखत-सुनत आवत हँव। अउ आजो उही भागीदारी, जोश-जज्बा, उमंग-उछाह देख मोर कस कतको लिखइया-पढ़इया, कवि-कवियित्री के प्रेरणास्रोत बने हे। चाहे साहित्य होय, समाज होय, शिक्षा होय या घर परिवार के जिम्मेदारी होय, चंद्रा जी सब ला बरोबर समय देवत, सबके सेवा करिस। हाल ही में पीएचडी करके, डॉक्टरेट के उपाधि तको पाइन। सब ला लेके चले अउ सब बर बरोबर समय निकाले, अइसन व्यक्तिव बिरले मिलथे।

                            हमर भारत देश होय या हमर राज छत्तीसगढ़, दूनो के आत्मा गाँव मा ही बसथे, वइसने चंद्रा जी के मन, अपन जनम भूमि अउ गाँव ला कभू नइ बिसरा सके। तभे तो गांव के खेत-खार, बारी-बखरी, नदी-पहाड़, जंगल-झाड़ी, रहन-सहन, तीज-तिहार, संस्कृति-संस्कार, पार-परम्परा, नता-रिस्ता, खेल-खाजी, रोटी-पीठा आदि सब चंद्रा जी के कलम मा नजर आथे। ये पुस्तक के बात करन ता, येमा एक ले बढ़के एक गीत कविता संग्रहित हे।  ये पुस्तक मा संग्रहित गीत "मोला मोर परेवा पाँखी गांव अगोरत हे" मोर बड़ पसंदीदा गीत आय। जे चंद्रा जी के मुख ले सुनके परम् शांति देथे अउ चाहे कहूँ भी खड़े राहस, सुनते ही मन ला, गांव के गली खोर मा ले जाके खड़े कर देथे। अइसने अउ कतको मनभावन गीत चंद्रा जी मन ये पुस्तक मा संग्रहित करें हें। पुस्तक मा भाव पक्ष के बेजोड़ता के संगे संग कला पक्ष बड़ सुदृढ़ हे। ये संग्रह मा, सरल सहज अउ चलती आंचलिक छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग चंद्रा जी मन करें हें। मनभावन अलांकारिक छटा पाठक वर्ग ला प्रभावित करही। ज्यादातर रचना गीत के रूप मा हे। चंद्रा जी कई प्रकार के छंद मा तको काव्य सृजन करे हे, ये पुस्तक मा  शास्त्रीय छंद दोहा अउ लोक छंद पवैया छंद के कविता संग्रहित हे। लोक धुन मा रचित कर्मा गीत , जागरण गीत, जस गीत, होरी गीत,सुमरनी गीत बड़ आकर्षक अउ मनभावन हे। 

                     आजकल कतको कवि मन दूसर के रचना ला अपन बताके गा, छपा देथें, जे गलत हे। अइसन करे मा हाँसी फभित्ता ही होथे, अइसने भाव के एक कविता ये पुस्तक मा हे-

"आन के लिखे मा लिखोइया बनथे, ते गिरथे मुड़भर्रा।"


                         "जंगल मा डांका परे हे,कोन बचाही" गीत बड़ मार्मिक अउ चिंतन करे बर मजबूर करत हे। आज जंगल झाड़ी के कटई घास फूस बरोबर होवत हे, संगे संग जंगल ले जुड़े जम्मों रीत-नीत, रहन-सहन सबके विनाश होवत हे। चंद्रा जी के संसो आज सबके संसो होना चाही,काबर कि जंगल हे तभे जीवन हे।


                        

                इरसा द्वेष, ऊँच नीच, तोर मोर के आगी हकीकत के आगी ले तको बड़ खतरनाक होथे। जे एक बेर बरे जे बाद कभू बुझाए जे नाम नइ ले। एखर ले सबला बचना चाही, अउ भाईचारा के गारा मा चिपके रहना चाही। इही भाव मा चंद्रा जी मन लिखथें-    "मनखें खातिर मनखें के ये कइसन बाँटा।

  अपन ब राखे फलफूल,दूसर ब कांटा कांटा।"


                             मैं एक मुक्तक मा हमेशा पढ़थों कि "हर पड़ोसी पाकिस्तान होता है"  अउ देखे बर तको मिलथे, ज्यादातर पड़ोसी संग मनखें मन चिढ़े रथें। उही बात के संसो करत चंद्रा जी मन एक कविता मा लिखें हे---" आज पडोसीपन नँदात जात हे।"


                           कतको लालची मन छत्तीसगढिया मन ला सब ले बढ़िया कहिके भुलवारत उँखर अधिकार अउ चीज बस ला नँगावत हें, चिरई बरोबर लहलहावत आस विश्वास के फसल ला मन के खावत हें। उही ल साव चेत करत चंद्रा जी मन लिखथें--

"छत्तीसगढ़ के रहइया सब मन,जागत रइहा रे।

कहाँ मेर चिड़िया दाना चुगत हे,ताकत रइहा रे।।"

               

                             दाई ददा मन लइका ला अपन खून पसीना बहा बहा के पालथें पोसथें, कि बुढ़त काल में सेवा जतन करही। फेर आधुनिक बेरा मा लइका मन पढ़ लिख के विदेश या गांव ल छोड़ शहर चल देथें, ता कतको मन अपन जिम्मेदारी ले भाग जथें। फेर ददा दाई के सेवा तो नारायण सेवा ले तको बढ़के हे। आज वृद्धाश्रम के संख्या बढ़त जावत हे, जे चिंतनीय हे। ददा दाई के सियानापन मा सेवा करे बर प्रेरित करत चंद्रा जी मन लिखथें-

"उठ जा उठ जा उठ जा बेटा मोर, बिहान होगे गा।

 देख तो दाई ददा तोर, सियान होगे गा।।"


                     ये सब के आलावा ये काव्य संग्रह मा नारी शक्ति के मान सम्मान, मया पिरित, तीज- तिहार, शिक्षा के महत्ता, सार्थक सीख-सिखावन अउ देश- राज, गांव-घर, खेती-बाड़ी, जंगल झाड़ी, ददा दाई आदि सम्बंधी  संसो फिकर के गीत कविता संग्रहित हे। पाठक मन ये संग्रह ला पढ़त पढ़त गाये बर मजबूर हो जहीं, अउ परम् आनंद प्राप्त करहीं। अइसन सुघ्घर सिरजन खातिर डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी ला कोटिशः बधाई अउ शुभकामना।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मनभावन महिना भादो* -जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

 *मनभावन महिना भादो* -जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया


                आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भुइँयाँ भादों मा अघाय कस लगथे, तभे तो तरिया डबरा मा पानी माढ़े अउ लहरा मारत दिखथे। मनमाड़े चलत धारी भादो के आरो पाके धीर धर लेथे। बँधिया,तरिया,ढ़ोंड़गा जे सावन भर दानी कस पानी फेकत रिहिस, वो बनिया बरोबर अब नाप नाप के जादच उपरहा भर ल झलकात दिखथे।सरलग चलत धूका- गर्रा, झड़ी-झक्कर, बिजुरी के चमकई अउ बादर के गरजई घलो कमती होय बर लग जथे। थोर बहुत डबरा खँचका के पानी ल अँटत देख करिया बादर बीच बीच मा हुरहा धुरहा आथे अउ पानी समो के भाग जथे। सुरुज नारायण जे आसाढ़ सावन भर लुकाय लुकाय फिरत रिहिस,भादो के आरो पाके आसमान मा घूमत फिरत आँखी मा दिखेल धर लेथे। थमे पानी ल देख,चिरई चिरगुन मन भादो के आरो पाके उझरे झाला खोंदरा ल नवा सिरजाये के उदिम करत दिखथें।धान-पान, काँदी-कूसा सजोर होके पुरवइया मा नाचत गावत, झुमरत दिखथे। झड़ी बादर ले तंग चिरई चिरगुन, छेरी-बोकरा, गाय गरुवा झूम-झूमके अउ घूम- घूम  चारा चरत दिखथें। घर कुरिया बारिस मा पस्त दिखथें ता खेत खार, तरिया नदियाँ मतंग अउ मस्त। भादो के लगत घर कोठ मा रचे काई केरवस ल दाई महतारी मन उजराये बर लग जथें।


*तिहार बार*- 

हमर छत्तीसगढ़ राज का, हमर देश घलो कृषि प्रधान हे, जिहाँ के रहन सहन अउ तीज तिहार, खेती किसानी के हिसाब  ले चलथे। सावन अउ भादो तीज तिहार के महीना होथे। ये महीना मा अतेक जादा तीज तिहार होथे कि सबके बरनन कर पाना सम्भव घलो नइहे। अतेक तीज तिहार मनाये के तको कारण हे। ज्यादातर मनखे मन पहली खेती किसानी करैं, अउ बरसा घरी भरे पानी मा निंदई कोड़ई करत सरलग खेतेच मा  लगे रहैं। जेखर ले हाथ अउ गोड़ दूनो सेठरा जाय,अउ सरलग भींगई तको होय। मनखे मन काम बूता मा अतिक रमे रहैं, कि यदि कोई तिहार बार नइ होतिस ता हाथ गोड़ के घलो खियाल नइ रखतिस, काम के संग आराम घलो चाही, ते पाय के ये घरी अतिक तिहार मनाये के चलन हे। जे मनखे मन के तन के संगे संग मन ला घलो भला चंगा करथे। आजो ये चलागन चलते हे। भादो महीना मा बेटी माई मन निंदई कोड़ई करके तीजा के बहाना मइके जाथे, काबर कि काम कमई के मारे बनेच दिन ले घर ले नइ निकले रहैं। कमरछठ,तीजा-पोरा, नारबोध,कड़ाबन्द, इतवारी, सोमवारी, जन्माष्टमी, रामसताव, गणेश चतुर्थी कस बनेच अकन तिहार भादो महीना म मनाये जाथे। ये सब तिहार बार मनखे  मनखे बीच दया मया,उछाह उमंग के बरसा करे के संगे संग खेती किसानी, संस्कार-संस्कृति, पार अउ परम्परा ले मानुष ल जोड़े रखथें।

                     भादो महीना के बड़का तिहार आय तीजा।  ये महतारी बहिनी मन के तिहार आय, जेला वो मन मइके मा रहिके मनाथे। ये दिन के रद्दा सबें बहिनी मन जोहत रथे, कि ददा नहीं ते भैया आही अउ तीजा ले जाही। जे बेटी ददा दाई के अंगना मा ननपन ले खेलिस खइस, फेर बिहाव के बाद वो अंगना के दुरिहागिस, अइसन मा वो पावन ठिहा मा फेर जब महतारी बहिनी मन पाँव रखथे ता सरग के सुख घलो, उन मन ला कमती लगथे। दाई, ददा, बहिनी, भाई के मया के धार अउ ननपन के जम्मो सुरता मा अन्तस् तक भींग जथे। तीजा के नेंग जोग ल तो सबें जानत हव,उपास कइसे रथे? का खाथें? कोन ल मनाथे? मोला लिखे के जरूरत नइहे। मइके के लुगरा तीजहारिन मन बर अनमोल होथे। तीजा मा संगी संगवारी संग जम्मों बहिनी ले मइके मा ये दरी भेंट होथे। ये पावन बेरा मा महतारी, बहिनी मन मइके जाके अपन जम्मों थकान अउ संसो ल बिसार देथें। मइके के माहौल उन ला एक बेर अउ ननपन के सुरता अउ  जुन्ना मस्ती मा डुबो देथे। तीजा संस्कृति संस्कार, मया दया अउ सुख शांति के बरसा करथे।  जमाना ले चलत आवत तीजा ला बहिनी महतारी मन बड़ उछाह अउ उमंग ले मनाथें। अउ जड़-चेतन, घर बार, खेत खार, पार परिवार  सबके सुख शांति के कामना करथें। ये सब तिहार बार के उपास धास शरीर बड़ बड़ उपयोगी होथे।


*खेत खार अउ फूल फुलवारी के सुघराई*-

खेत मा भराय पानी अउ ओमा तँउरत मछरी, मेचका, केकरा संग, सजोर  होके नाचत गावत धान ल देख मारे खुसी के, किसान खेतेच मा नाच अउ गा देथे। निंदइया मनके कर्मा ददरिया अउ सनन सनन चलत पुरवाही मन ल मता देथे। पड़की, पपीहा अउ तीतुर के मीठ बोली खेत खार मा रहिरहि राग रंग घोरत रहिथे। मेड पार मा फुले- फरे मुंगेसा,कोलिहापुरी, फोटका,फूट अउ काँसी काँद- दूबी मन ल मोह लेथे। काँसी के पोनी कस पड़ड़ी फूल देख जिया मा उमंग हमा जथे। तुलसीदास जी महाराज काँसी के फूल ल देखत लिखे हे- 


*फुले काँस सकल महि छाई।*

*जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई।*


माने धरती मा काँसी ल फुले देख अइसे लगत हे, मानो बरसा ऋतु हा अपन बुढ़ापा प्रकट करत हे। वइसे भादो घरी कांसी फुले के चालू होथे अउ शरद ऋतु घरी चारो मुड़ा खेत खार पड़री पड़री दिखथें। मेड़ पार के बम्हरी मा सोनहा फूल लद जथे।  बम्हरी के सोनहा फूल देख अधर म सहज ही माटी पूत लक्ष्मण मस्तुरिहा जी के ये गीत आ जथे- 

*हरियर हरियर बम्हरी म सोन के खिनवा।*


संग मा फागुन चैत मा फुलइया सरई ला सइगोंन बिजरावत दिखथे, ता मधुमास मा मउरइया आमा ल रियाँ अउ फागुन मा नचइया परसा अउ अमलतास ला पिंयर गुलमोहर। मोर कहना गलत होही ता भादो मा सइगोंन, रियाँ अउ पिंयर गुलमोहर ल देख के खुदे आंकलन कर सकथव, न गुलमोहर, अमलतास अउ परसा ले कमती दिखथे, न रियाँ आमा मौर ले अउ न सइगोन सरई ले। जइसे परसा अउ अमलतास माघ फागुन मा सड़क गांव गली खेत खार मा आगी बरोबर बरत दिखथें, ठीक वइसने भादो मा पिंवरी गुलमोहर शहर, गांव, गली, रद्दा बाट मा पिवरा पिवरा फूल मा लदाय लहसत, नाचत गावत दिखथे। मधुमास मा मउरे आमा कस रियाँ, भादो मा सजे सँवरे रथे। सइगोंन के बड़े  बड़े पाना घलो  फूल मा लुकाय दिखथें, कहे के मतलब सइगोंन अतका फुले रहिथे कि ओखर जबर पाना ह घलो नइ दिखे, सिर्फ फुले फूल नजर आथें। मन ला ललचावत   कदम्ब के फूल ला देखत दाई के लोरी

* "झूलना के झूल कदम्ब जे फूल"*  

अउ "*यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे"* 


ये कविता अन्तस् मा उमड़े बर लग जथे। भादों घरी पिंयर गुलमोहर कस हिंगलाज घलो गली-खोर, खेत-खार,डहर-बाट मा माते रहिथे, दूनो के फूल घलो लगभग एके दिखथें, अंतर रथे ता सिर्फ ऊंचाई के। एक ऊँच पेड़ आय अउ एक छोट झाड़ीनुमा पौधा। नदिया नरवा तरिया अउ मेड़ पार म उगे बेसरम अउ धतुरा के पौधा घलो भादो मा हल्का गुलाबी रंग मा मनमोहत मुस्कावत दिखथें। एके गुच्छा मा कतको रंग ल समेटे मोकैया के फूल जघा जघा मुचमुचावत, भौरा तितली संग मनखे मनके जिया ल ललचावत दिखथे।

                 फुले कउहा,कसही,बोइर,छीता,जाम अउ छोट फर धर झूलत अमली भादो मा मनभावन लगथे। पड़री पड़री तिली के फूल, पिवरी पिवरी फूल धरे बम्हरी, मूँगेसा, फूट, सोयाबीन, कोलिहापुरी अउ बोदेला खेतखार मा भादो मास भर मगन रहिथे। अनमोल झुमका कस शिव बम्भूर के मनभावन फूल घलो दिखे बर लग जथे। भादो मा पानी मा बूड़े धान, फूल झराके पोटराये बर लगथे। खेत के मेड़ मा राहेर, तिली मनभावन लगथे। फुले पटवा के फूल के का कहना जउन देखे होही ते भागमानी आय, देखे मा ही ओखर फूल के सुघराई समझ आही, लिखके कहना मुश्किल हे। कनिहा भर बाढ़े काँदी, बन कचरा अउ लाम लाम लामे बेल बूटा देखत मन मा उमंग हमा जथे।


*घर अउ बारी-बखरी*

आसाढ़  मा बोय साग भाजी भादो मा फूल फर धरके नार बियार मा झूलत रथे। रमकलिया के छोट पौधा मा पिवरी सफेद अउ लाली रंग के मेल ले बने मनभावन फूल अइसे लगथे मानो कोनो पेंटर ह कागज मा उकेरे हे। मनमाड़े घपटे तोरई,करेला,कुंदरू,कोमढ़ा,पोपट,खेकसी घलो फूल फर के इतरावत रथे। भादो मा थोर थोर साग भाजी बारी बखरी ले निकले बर लग जथे, चारो कोती लामे नार बियार, अउ बाढ़े भाजी पाला ल देख मन झूमर जथे। काँद काँदी म घलो फूल आ जाय रहिथे। घर अउ बारी बखरी मा फुले बैजंत्री,चिरइयाँ के किसम किसम के रंग जिया ल खींच लेथे। नीला नीला फुले सूँतई के फूल(अपराजिता) नार बियार सुद्धा देवारी घरी लटके कोनो झालर बरोबर मनभावन लगथे। घर के दुवारी मा घउदे दसमत, कागज फूल(फाटक फूल), माते सादा सोहागी, मनमाड़े घउदे गोंदा अउ मोंगरा बरसा के पानी ले लड़ भिड़ के भादो मा खुलखुल खुलखुल हाँसत दिखथें,मानो जीत जे खुशी मनावत हें।


*कुवाँ,तरिया,नरवा*

आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भादो मा तरिया कुवाँ नरवा कोटकोट ले अघाये दिखथें। पार, पचरी, तट,तीर सब धोवा मँजा के उज्जर दिखथें। पानी पाके मछरी,मेचका मनमाड़े मगन होके तँउरत दिखथे। रंग रंग के कमल कोकमा तरिया ढ़ोंड़गा के सुघराई ला बढ़ावत दिखथें। बरसा के पानी घरी मतलाये कुवाँ,तरिया, नरवा के पानी भादो के आरो पाके फरिहर होय बर लग जथे, पानी भीतर  तँउरत मछरी केकरा घलो चकचक ले दिखेल  धर लेथे। उबुक चुबुक करत घाट घठोंधा राहत के साँस लेवत, मनखे मन ला अपन ऊपर चढ़े नाहत-खोरत देख मगन रहिथे। तरिया नरवा भराय पानी ला पइसा बरोबर हिसाब किताब लगा के जतके जरूरी हे ततके बोहावत दिखथे। कहे के मतलब जादा होथे तभे उलट भागथे, नही ते टिपटिप ले भरे रहिथे। 


                तीज तिहार के मजा उड़ावत, झूमत नाचत गावत, रंग रंग के रोटी पीठा खावत, काबा काबा काँदी डोहारत, खेत खार के मुही पानी बाँधत फोड़त, धान पान ल निंदत चालत अउ नजर भर निहारत, किसम किसम के भाजी पाला खावत, पेड़-पात, फूल-फर के सुघराई देखत देखत भादो कब बुलक जथे पतच नइ चले। अन्तर मन ले देखे,सोचे,गुने, सुने अउ नजर भर निहारे जाय ता,हमर हिंदी पंचाग के छठवा महीना भादो बड़ मनभावन हे।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

कलंक मनखे -सरसी छन्द

 कलंक मनखे -सरसी छन्द


गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।

अइसन सबक सिखादे उन ला, विनती हे भगवान।।


अत्याचार करत हें भारी, सुनँय गुनँय नइ बात।

मानव होके मानवता ला, मारत फिरथें लात।।

डर हे ना पछतावा चिटको, गरजे बन शैतान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


अस्मत लूटे अत्याचारी, मद मउहा में चूर।

बेटी माई बेबस मनखे, दुख पाये भरपूर।।

नेता गुंडा साब सिपैहा, पाय हवै वरदान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


करनी के फल भुगते तुरते, तुरते होय नियाँव।

बजे काल के डंका अइसे, होय झने चिंव चाँव।।

मारे काटे लूटे पाटे, तेखर मरे बिहान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


न्याय तंत्र हा ये कलजुग के, बनके रहिगे खेल।

कैदी मन के कदर बढ़े हे, घर जइसे हे जेल।।

चोर सिपैहा भाई भाई, बिगड़े हवै विधान।

गलत करे के पहली सोंचैं, लाख घांव इंसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Tuesday, 1 September 2026

कुकुभ छंद-पोरा जाँता

 पोरा तिहार के गाड़ा गाड़ा बधाई


कुकुभ छंद-पोरा जाँता


सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।

राँध ठेठरी खुरमी भजिया,करे हवै सबझन जोरा।


भादो मास अमावस के दिन,पोरा के परब ह आवै।

बेटी माई मन हर ये दिन,अपन ददा घर सकलावै।

हरियर धनहा डोली नाचै,खेती खार निंदागे हे।

होगे हवै सजोर धान हा,जिया उमंग समागे हे।

हरियर हरियर दिखत हवै बस,धरती दाई के कोरा।

सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।1


मोर होय पूजा नइ कहिके,नंदी बइला हर रोवै।

भोला जब वरदान ल देवै,नंदी के पूजा होवै।

तब ले नंदी बइला मनके, पूजा होवै पोरा में।

सजा धजा के भोग चढ़ावै,रोटी पीठा जोरा में।

पूजा पाठ करे मिल सबझन,सुख पाये झोरा झोरा।

सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।2


कथे इही दिन द्वापर युग में,पोलासुर उधम मचाये।

मनखे तनखे बइला भँइसा,सबझन ला बड़ तड़पाये।

किसन कन्हैया हर तब आके,पोलासुर दानव मारे।

गोकुलवासी खुशी मनावै,जय जय सब नाम पुकारे।

पूजा ले पोरा बइला के,भर जावय उना कटोरा।

सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।3


दूध भराये धान म ये दिन,खेत म नइ कोनो जावै।

परब किसानी के पोरा ये,सबके मनला बड़ भावै।

बइला मनके दँउड़ करावै,सजा धजा के बड़ भारी।

पोरा परब तिहार मनावय,नाचयँ गावयँ नर नारी।

खेले खेल कबड्डी खोखो,नारी मन भीर कसोरा।

सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।4


बाबू मन बइला ले सीखे,महिनत अउ काम किसानी

नोनी मन पोरा जाँता ले,होवय हाँड़ी के रानी।

पूजा पाठ करे बइला के,राखै पोरा में रोटी।

भरे अन्न धन सबके घर में,नइ होवै किस्मत खोटी।

परिया में मिल पोरा पटके,अउ पीटे बड़ ढिंढोरा।

सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।5


सुख समृद्धि धन धान्य के,मिल सबे मनौती माँगे।

दुःख द्वेष ला दफनावै अउ,मया मीत ला उँच टाँगे।

धरती दाई संग जुड़े के,पोरा देवय संदेशा।

महिनत के फल खच्चित मिलथे,कभू रहै नइ अंदेशा।

लइका लोग सियान सबे झन,पोरा के करै अगोरा।

सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।6


छंदकार-जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

पता-बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


पोरा(ताटंक छंद)


बने हवै माटी के बइला,माटी के पोरा जाँता।

जुड़े हवै माटी के सँग मा,सब मनखे मनके नाँता।


बने ठेठरी खुरमी भजिया,बरा फरा अउ सोंहारी।

नदिया बइला पोरा पूजै, सजा आरती के थारी।


दूध धान मा भरे इही दिन,कोई ना जावै डोली।

पूजा पाठ करै मिल मनखे,महकै घर अँगना खोली।


कथे इही दिन द्वापर युग मा,कान्हा पोलासुर मारे।

धूम मचे पोला के तब ले,मनमोहन सबला तारे।


भादो मास अमावस पोरा,गाँव शहर मिलके मानै।

हूम धूप के धुँवा उड़ावै,बेटी माई ला लानै।


चंदन हरदी तेल मिलाके,घर भर मा हाँथा देवै।

धरती दाई अउ गोधन के,आरो सब मिलके लेवै।


पोरा पटके परिया मा सब,खो खो अउ खुडुवा खेलै।

संगी साथी सबो जुरै अउ,दया मया मिलके मेलै।


बइला दौड़ घलो बड़ होवै,गाँव शहर मेला लागै।

पोरा रोटी सबघर पहुँचै,भाग किसानी के जागै।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

आज पोरा हे

----------------------------

चूरे   हे   ठेठरी-खुरमी,

चूरे   हे   बरा-भजिया।

टिपटिप ले भरे हे तरिया,

छापा  चलत हे नदिया।

नाचत हे,डोली म धान।

होवत हे,खेती के  मान।

बेटी माई घर अमराय बर,

रोटी-पिठा म ,भरे  झोरा हे।

आज पोरा हे,आज पोरा हे।


माड़े  हे माटी के बइला,

माटी के पोरा -  जांता।

अधियागे      किसानी,

जंउहर  जुड़े  हे नाता।

बाजत    हे       घण्टी,

नाचत     हे      बइला।

झन पूछ लइका मनके,

खेलई  -  कूदई    ला।

घरो - घर बेटी के अगोरा हे।

आज पोरा हे,आज पोरा हे।


कहूँ  मेर   फुगड़ी माते हे,

त  कहूँ  मेर   खो-कबड्डी।

कतको अतलंगहा टुरामन,

बइठे  हे   धरे  तास  गड्डी।

रोटी - पिठा ले फुले हे पेट।

नई गेहे  आज  कोनो खेत।

किसानी   के   तिहार पोरा,

जुड़ धरती दाई के कोरा हे।

आज पोरा हे,आज पोरा हे।

    जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

        बालको(कोरबा)

         9981441795

💐💐💐💐💐💐💐

मोर गाँव ल काय होगे..

 मोर गाँव ल काय होगे..

----------------------------------------------


पीपर के पाना डोले त डर लागे |

कोयली कुहु-कुहु बोले त डर लागे |

रद्दा म रक्सा रहि रहिके दिखत हे |

जाँव कते कोती जघा-जघा बिपत हे |

जिंहा मयना मन भाय,

तिहाँ साँय साँय होगे ........|

हे बिधाता! 

मोर गॉंव ल काय होगे........|


न जाड़ म जुड़ हे,

न असाड़ म पानी |

सावन भादो घलो,

लकलकाय हे छानी |

चुल्हा ले गुंगवा गुंगवात नइहे |

पेट भर जेवन कभू खात नइ हौं |

का  काम बुता करौं,

सबो आँय बाँय होगे...............|

हे बिधाता !

मोर गॉंव ल काय होगे ............|


सोवा परगे हे,गॉंव के गॉंव म |

कोनो नइ जुरे हे,बर पीपर छॉंव म |

लइका मनके,

गिल्ली-भंवरा माते नइहे |

अटकन-मटकन खेले के ,

चँवरा बाचे नइहे |

न गॉंगर चुरे न ठेठरी,

बनेच दिन खीर खाय होगे.......|

हे बिधाता !

मोर गॉंव ल काय होगे............ |


टेस-टेस म अँइठत हें सबो |

टीभी मोबाइल तीर बइठत हें सबो |

न साल्हो हे न सुवा हे |

जघा-जघा मौंत के कुंवा हे |

पहिली जइसे कुछु नइहे,

राम राम हेलो हाय होगे.........|

हे बिधाता:

मोर गॉंव ल काय होगे..............|


             जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

            बाल्को ( कोरबा )


संग्रह-गँवागे मोर गांव से

Wednesday, 26 August 2026

आठे परब के सादर बधाई

 आठे परब के सादर बधाई


मोला किसन बनादे (सार छंद)


पाँख  मयूँरा  मूड़ सजादे,काजर गाल लगादे|

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


बाँध कमर मा करिया करधन,बाँध मूड़ मा पागा|

हाथ अरो दे करिया चूड़ा,बाँध गला मा धागा|

चंदन  टीका  माथ लगादे ,पहिरा माला मुंदी|

फूल मोंगरा के गजरा ला ,मोर बाँध दे चुंदी|

हार गला बर लान बनादे,दसमत लाली लाली |

घींव  लेवना  चाँट  चाँट  के,खाहूँ थाली थाली |

मुचुर मुचुर मुसकावत सोहूँ,दाई लोरी गादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


दूध दहीं ला पीयत जाहूँ,बंसी मीठ बजाहूँ|

तेंदू  लउड़ी  हाथ थमादे,गाय  चराके आहूँ|

महानदी पैरी जस यमुना, रुख कदम्ब बर पीपर।    

गोकुल कस सब गाँव गली हे ,ग्वाल बाल घर भीतर।

मधुबन जइसे बाग बगीचा, रुख राई बन झाड़ी|

बँसुरी  धरे  रेंगहूँ   मैंहा ,भइया  नाँगर  डाँड़ी|

कनिहा मा कँस लाली गमछा,पीताम्बर ओढ़ादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


गोप गुवालीन संग खेलहूँ ,मीत मितान बनाहूँ|

संसो  झन करबे वो दाई,खेल कूद घर आहूँ|

पहिरा  ओढ़ा  करदे  दाई ,किसन बरन तैं चोला|

रही रही के कही सबो झन,कान्हा करिया मोला|

पाँव ददा दाई के परहूँ ,मिलही मोला मेवा |

बइरी मन ला मार भगाहूँ,करहूँ सबके सेवा|

दया मया ला बाँटत फिरहूँ ,दाई आस पुरादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया "

बालको (कोरबा )


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


1,मदिरा सवैया


मोहन माखन माँगत हे मइया मुसकावत देखत हे।

गोकुल के सब गोपिन ला घनश्याम दहीं बर छेकत हे।

देख गुवालिन के मटकी धरके पथरा मिल फेकत हे।

तारन हार हरे हरि हा पँवरी म सबे सिर टेकत हे।


2, मतगयंद सवैया


देख रखे हँव माखन मोहन तैं झट आ अउ भोग लगाना।

रोवत हावय गाय गरू झट लेज मधूबन तीर चराना।

कान ल मोर सुहाय नही कुछु आ मुरलीधर गीत सुनाना।

काल बने बड़ कंस फिरे झट आ मनमोहन प्राण बचाना।


गोप गुवालिन के सँग मोहन रास मधूबन तीर रचावै।

कंगन देख बजे बड़ हाथ के पैजन पाँव के गीत सुनावै।

मोहन के बँसरी बड़ गुत्तुर बाजय ता सबके मन भावै

एक घड़ी म दिखे सबके सँग एक घड़ी सबले दुरिहावै।


चोर सहीं झन आ ललना झन खा ललना मिसरी बरपेली।

तोर हरे सब दूध दहीं अउ तोर हरे सब माखन ढेली।

आ ललना झट बैठ दुहूँ मँय दूध दहीं ममता मन मेली।

मोर जिया ल चुरा नित नाचत गावत तैं करके अटखेली।


गोकुल मा नइ गोरस हे अब गाय गरू ह दुहाय नहीं गा।

फूल गुलाब न हे कचनार मधूबन हे नइ बाग सहीं गा।

मोर सबे सुख शांति उड़े मुरलीधर रास रचे न कहीं गा।

दर्शन दे झट आ मनमोहन हाथ धरे हँव दूध दहीं गा।


धर्म ध्वजा धरनी धँसगे झटले अब आ करिया फहराना।

खोर गली म भरे हे दुशासन द्रौपति के अब लाज बचाना।

शासक संग समाज सबे ल सुशासन के सत पाठ पढ़ाना।

झाड़ कदम्ब जमे कटगे यमुना मतगे मनमोहन आना।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


लोकछंद- रामसत्ता


विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।

दीन दुखी के डर दुख हरके, धर्म ध्वजा फहराये हो राम।


एक समय देवकी बसदेव के, राजा कंस ब्याह रचाये।

उही बेर मा आकाशवाणी, कंस के काने मा सुनाये।।

आठवाँ सुत हा मारही तोला, सुनत कंस भारी बगियाये।

बाँध छाँद बसदेव देवकी ला, कारागर मा झट ओइलाये।।

*सुख शांति के देखे सपना, एके छिन छरियाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।1


राजा कंस हा होके निर्दयी, देवकी बसदेव पूत मारे।

करँय किलौली दूनो भारी, रही रही के आँसू ढारे।।

थर थर काँपे तीनो लोक हा, कंस करे अत्याचारी।

भादो अठमी के दिन आइस, प्रभु अवतरे के बारी।।

*बिजुरी चमके बादर गरजे, नदी ताल उमियाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।2


अधरतिहा अवतरे कन्हैया, बेड़ी भाँड़ी सब टुटगे।

देवी देवता फूल बरसाये, राजा बसदेव देख उठगे।।

देख मनेमने गुनय बसदेव, निर्दयी राजा के हे डर।

धरे कन्हैया ला टुकनी में, चले बसदेव नंद के घर।।

*यमुना बाढ़े शेषनांग ठाढ़े, गिरधारी मुस्काये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।3


छोड़ कन्हैया ला गोकुल में, माया ला धरके लाये।

समै के काँटा रुकगे रिहिस, बसदेव सुधबुध बिसराये।।

रोइस माया तब जागिस सब, आइस दौड़त अभिमानी।

पुत्र नोहे पुत्री ए राजा, हाथ जोड़ बोले बानी।।

*विष्णु के छल समझ कंस हा, मारे बर ऊँचाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।4


छूटे कंस के हाथ ले माया, होय देख पानी पानी।

तोर काल होगे हे पैदा, सुन के काँपे अभिमानी।।

जतका नान्हे लइका हावै, कहै मार देवव सब ला।

सैनिक मन के आघू मा, करे किलौली कई अबला।

*रोवै नर नारी मन दुख मा, हाँहाकार सुनाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।5


राजा कंस के काल मोहना, गोकुल मा देखाय लीला।

दाई ददा संग सब ग्राम वासी, नाचे गाये माई पीला।।

छम छम बाजे पाँव के पइरी, ठुमुक ठुमुक चले कन्हैया।

शेषनाग के अवतारे ए, संग हवै बलदऊ भइया।।

*किसन बलदऊ ला मारे बर, कंस हा करे उपाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।6


कंस के कहना मान पुतना, गोकुल नगरी मा आये।

भेस बदल के कान्हा ला धर, गोरस अपन पिलाये।।

उड़े गगन मा मौका पाके, कान्हा ला धरके पुतना।

चाबे स्तन ला कान्हा हा, तब भारी भड़के पुतना।।

*असल भेस धर गिरे भूमि मा, पुतना प्राण गँवाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।7


पुतना बध सुन तृणावर्त ला, कंस भेजे गोकुल नगरी।

बनके आय बवंडर दानव, होगे धूले धूल नगरी।।

मारे लात फेकाये दानव, प्राण पखेडू उड़े तुरते।

बगुला भेस बनाके बकासुर, गोकुल मा आये उड़ते।

भारी भरकम देख बगुला ला, नर नारी घबराये हो राम।

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।8


अपन चोंच मा मनमोहना ला, धरके बगुला उड़िड़ाये।

चोंच फाड़ बगुला ला मारे, कंस सुनत बड़ घबराये।।

बछरू रूप धरे बरसासुर, मोहन ला मारे आये।

खुदे बरसासुर हा मरगे, अघासुर आ डरह्वाये।।

*गुफा समझ सब ग्वाल बाल मन, अजगर मुख मा जाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।9


कंस के भेजे सब दानव मन, एक एक करके मरगे।

गोकुल वासी जय बोलावै, दानव मन मरके तरगे।।

माखन खावै दही चोरावै, मटकी फोड़े गुवालिन के।

मुँह उला के जग देखावै, माटी खावै बिनबिन के।।

*कदम पेड़ मा बइठ कन्हैया, मुरली मधुर बजाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।10


पेड़ बने दुई यक्ष रिहिन हे, कान्हा उन ला उबारे।

गेंद खेलन सब ग्वाल बाल संग, मोहन गय यमुना पारे।

रहे कालिया नाग जल मा, चाबे नइ कोनो बाँचे।

कालीदाह मा कूदे कन्हैया, नाँग नाथ फन मा नाँचे।

*गोबर्धन के पूजा करके, इन्द्र के घमंड उतारे हो  राम*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।11


मधुर मधुर मुरली धुन छेड़े, रास रचाये मधुबन मा।

गाय बछरू ला गोकुल के, कान्हा चराये कानन मा।।

सिखाय नाहे बर गोपियन ला, चीर हरण करके कान्हा।

राधा ला भिंगोये रंग मा, पिचकारी भरके कान्हा।।

*कृष्ण बलदउ ला अक्रूर जी, मथुरा लेके जाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।12


गोकुल मधुबन मरघट्टी कस, बिन कान्हा के लागत हे।

मनखे मन कठवा कस होगे, सूतत हे ना जागत हे।।

यमुना आँसू मा भरगे हे, रोवय जम्मो नर नारी।

कान्हा जाके मथुरा नगरी, दुखियन के दुख ला हारी।

*कंस ममा ला मुटका मारे, लहू के धार बोहाये हो राम*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।13


अत्याचारी कंस मरगे, जरासन्त शिशुपाल पाल मरे।

असुरन मनके नाँव बुझागे, विदुर सुदामा सखा तरे।।

दुशासन चिर खींचत थकगे, बने सहारा दुरपति के।

महाभारत ला पांडव जीतिस, कौरव फल पाइस अति के।

*हरि कथा हे अपरम पारे, खैरझिटिया का सुनाये हो राम*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।14


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


कलजुग म घलो आबे कान्हा

----------------------------------------

स्वारथ म  रक्सा  बनके मनखे,

सिधवा गोप-गुवाल ल मारत हे।

कालीदाह   के   कालिया   नाग,

गली - गली   म    फुस्कारत हे।

बरसत हे ईरसा-दुवेस लड़ई-झगरा,

मया  के  गोवरधन उठाबे कान्हा।।

कलजुग  म  घलो  आबे   कान्हा।।


देवकी-बसदेव  ल  का  किबे,

जसोदा-नन्द  घलो  रोवत  हे।

कहाँ बाजे बंसुरी,कती रचे रास?

घर - घर  महाभारत  होवत   हे।

सड़क डहर म बइठे हे तोर गईया,

मधुबन म ले जाके चराबे कान्हा।

कलजुग  म  घलो आबे   कान्हा।


दूध - दही  ले  दुरिहाके  मनखे,

मन्द - मऊहा   म  डूब   गे  हे।

अलिन-गलिन म  सोवा  परे हे,

कदम  के  रुखवा  टूट  गे  हे।

घेंच म बांधे घूमे भरस्टाचार के हांड़ी,

आके  दही  लूट  देखादे  कान्हा।

कलजुग  म  घलो  आबे  कान्हा।


            जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                बाल्को(कोरबा)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


गीत-करिया कन्हैया आ


मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।

बंसी के बजइया आ----

माखन खवैया आ------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


तोर बिना गोकुल न, तोर बिना मधुबन।

तोरबिन बन बाग सुन्ना, तोरबिन भव भुवन।।

मोर पाँख पहरैया आ-----

नाग के नथैया आ-------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


नंद यशोदा रोवैं, रोवैं गोपी ग्वाला।

राधा के आँखी के, बोहै नदी नाला।।

चीर हरैया आ-----

पीर हरैया आ------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


हवा चलत नइहे, पत्ता हलत नइहे।

गरवा चरत नइहे, बिरवा फरत नइहे।।

गोवर्धन उठैया आ------

भवपार लगैया आ------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


रामसत्ता-दशावतार गाथा


कल्कि रूप धर ये कलयुग मा, आके दरस देखादे हो राम।

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


पहली लिये तैं मत्स्य अवतारे।

जल परलय ले जग ला उबारे।।

*सत्यव्रत ला तत्वज्ञान दे, मत्स्य पुराण सुनाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


कच्छप रूप दुसर तैं बनाये।

देव दानव मनके भाग जगाये।।

*मंदराचल पर्वत ला बोह के, सागर मंथन कराये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


तीसर रूप बरहा अवतारे।

हिरण्याक्ष के भुजा उखाड़े।।

*समुंद में डूबे धरती ला, तैंहर बाहिर निकाले हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


चौथा रूप मा नरसिंह बनके।

बने सहाई तैं सुर जन के।।

*हिरण्यकश्यप मार गिराके, प्रह्लाद पार लगाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


पाँचवा रूप धर वामन अवतारे।

राजा बलि के गरब उतारे।।

*नाप पाँव मा तीनो लोक, लीला गजब देखाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


परसुराम के ले अवतारे।

सहस्रबाहु ला दिये पछाड़े।।

*क्षत्रिय मनके गरब तोड़ के,जपतप जग ला सिखाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


सातवां अवतार मा बन राम।

त्रेता युग ला तारे तमाम।।

*मर्यादा पुरुषोत्तम बनके, रावण मार गिराये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


आठवा रूप मा बन गोपाला।

कहाये नंद यशोदा के लाला।।

*अर्जुन के रथ हाँक कन्हैया, धर्म ध्वजा लहराये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


नवम रूप मा बुद्ध बनके।

बनगेस राजा तैं जन जन के।।

*सत मारग धर जपतप करके,ज्ञान के धार बोहाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


कल्कि रूप धर आजा प्रभु जी।

कलजुग ला सिरजा जा प्रभु जी।।

*सुमरत हावन तोला भगवन, आके दरश देखाजा हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


........माते हे दही लूट..........

--------------------------------------------


गोकुल गँवागे,ब्रिज बोहागे |

सिरागे जम्मो सुख.............|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


परिया तरिया पार लुटागे |

डहर गाँव खेत-खार लुटागे |

नांगर बक्खर बखरी -बारी,

खेक्सा,करेला,सेमी नार लुटागे |

कागज कस फूल ममहाय नही|

गाय-गरवा कोनो ल भाय नही |

न गोपी हे न ग्वाला हे |

जम्मो मनचलहा, मतवाला हे |

नइ पीये दूध दही,

सब ढ़ोकत हें मँउहा घूट...............|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


जसोदा के लोरी लुटागे |

नंद ग्राम के  होरी लुटागे |

दुहना,मथनी,डोरी लुटागे |

किसन बलदाऊ के जोड़ी लुटागे |

पेंट पुट्टी के दिवाल म,

आठे कन्हैया नइ नाँचे |

घर घर भरे असुर के मारे,

गोकुल- मधुबन नइ बाँचे |

अपनेच पेट के देखइया सब,

सुदामा मरत हे भूख.................|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


पहली कस दही,

अब जमे नही |

घीव-लेवना नोहर होगे,

कड़ही तको बने नही |

दूध दही होटल म होत हे |

ग्वाल-बाल गली-गली म रोत हे |

न गौठान हे,न चरागन हे,

कहॉ बाजे बंसरी,नइ हे कदम रूख.....|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


                जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                        बाल्को(कोरबा )

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

गीत-धर्म धजा लहराही कोन


ये कलयुग मा दीन हीन के, साथ देय बर आही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


सौ झन अधमी गरजत हावैं, धन अउ बल के बल रोज।

फिरैं मिलावत हाँ में हाँ सब, फोकट के खा पी अउ बोज।

सच्चा एक अकेल्ला कोती, आज भला बतियाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


करिया नाँग घलो ले बिखहर, बनगे हावैं मनखे आज।

स्वारथ खातिर फुस्कारत हें, बेच-भाँज डारे हें लाज।

सबे ललावैं हाड़ माँस बर, दूध दही घी खाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


बिन ग्वाला के गाय गरू अउ, बिन मुरली के मधुबन रोय।

दाता तरसे दार भात बर, देखावा के पूजा होय।

सुख सुविधा तज दनुज दलन बर, कंस नगरिया जाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


छल प्रपंच होवत हे भारी, अँधरा के सिर मा हे ताज।

हाँसत हवै दुशासन हिहि हिहि, चुपे चाप हें सभा समाज।

पापी मनके गरब तोड़ के, दुरपति लाज बचाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को,कोरबा

तीजा

 सुरता मइके के-गीत


सावन काँटेंव मैं गिनगिन, सुरता मा दाई वो।

कि आही तीजा लेय बर, भादो मा भाई वो।।


मइके के सुरता, नजरे नजर म झुलथे।

देखतेंव दसमत पेड़ ल, के फूल फुलथे।

मोर थारी अउ लोटा म, कोन बासी खाथे।

तुलसी चौरा म बिहना, पानी कोन चढ़ाते।

हे का चकचक ले उज्जर, कढ़ाई दाई वो--

आही तीजा------


गाय गरुवा मोर बिन, सुर्हरथे कि नही।

खेकसी कुंदरू बारी म फरथे कि नही।

कुँवा तरिया म पानी कतका भरे रहिथे।

का मोला अगोरत,परोसिन खड़े रहिथे।

कोन करथे मोर कुरिया म पढाई दाई वो---

आही तीजा------


दुरिहा दिये दाई, तैंहर अपन कोरा ले।

मइके लाही कहिके,मोला तीजा पोरा में।

जल्दी भेज न दाई बाट जोहत हँव वो।

मइके के सुरता म मैं हा रोवत हँव वो।

एकेदरी थोरे सुरता भुलाही दाई वो---

आही तीजा---


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


करू भात अउ करू पानी


दीदी के करू भात, जीजा के करू पानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


एक ला जुन्ना सहेली मिलगे,एक ला जुन्ना संगी।

एक पीटत हे मुड़ी, एक फेरत हे सरलग कंगी।।

एक हाँसे हाहा हाहा, एक के नइ फुटत हे जुबानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


दीदी मन सम्हरे हे, जीजा मन के कुकुर गत हें।

दीदी मन बिंदास सुतत हें, जीजा मन जागत हें।।

जय जय गूँजे एक कोती, एक कोती राजा जानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


राँध के जीजा, नइ खा सकत हे कँवरा।

पड़े हे कपड़ा लत्ता, पड़े हे बर्तन भँवरा।

चेहरा मा चमक नइहे,रद खद हे छत छानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


तीजा के बिहान दिन, सरी सरी लुगरा।

इती घोंडे पड़े हे जीजा, दमदम ले उघरा।।

दीदी फोन उठात नइहे, हे हलाकान जिनगानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐


मरना हे तीजा मा


सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


लइका लोग ल धरके गय हे,मइके मोर सुवारी।

खुदे बनाये अउ खाये के, अब आ गय हे पारी।


कभू भात चिबरी हो जावै,कभू होय बड़ गिल्ला।

बर्तन भँवड़ा झाड़ू पोछा, हालत होगे ढिल्ला।

एक बेर के भात साग हा,चलथे बिहना संझा।

मिरी मसाला नून मिले नइ,मति हा जाथे कंझा।

दिखै खोर घर अँगना रदखद, रदखद हाँड़ी बारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।1।


सुते उठे के समय बिगड़गे,घर बड़ लागै सुन्ना।

नवा पेंट कुर्था मइलागे, पहिरँव ओन्हा जुन्ना।

कतको कन कपड़ा कुढ़वागे,मूड़ी देख पिरावै।

ताजा पानी ताजा खाना, नोहर हो गय हावै।

कान सुने बर तरसत हावै,लइकन के किलकारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।2।


खाय पिये बर कहिही कहिके,ताकँव मुँह साथी के।

चना चबेना मा अब कइसे,पेट भरे हाथी के।

मोर उमर बढ़ावत हावै,मइके मा वो जाके।

राखे तीजा के उपास हे,करू करेला खाके।

चारे दिन मा चितियागे हँव,चले जिया मा आरी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।3।


छंदकार-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)