Monday, 20 April 2026

डीजे

 डीजे


जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।

लगे देख अलकरहा, मनखें कुकुर माकर होगे।।


कानफोड़वा साउंड, हिरदे दरकत बेस।

कला दिखे बला मा, आगी लगे हे टेस।।

हो हल्ला हरहा होगे, सुर संगीत बर साँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


ना कोनो  हा सुनत हें, ना कोनो गुनत हें।

लोक लाज के पट ला, सबझन चुनत हें।।

पके बस ख्याली खिचड़ी, मया मीत डाँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


छट्ठी बरही बर बिहाव, रमाएन गीता भगवद।

सबो मा हबरगे डीजे, होगे खदबद गदबद।।

कला कल्हरे कोंटा मा, बला घर नौकर चाकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

नाली

 नाली


जब ले घर के आघू मा, नाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बड़े बड़े मच्छर बड़, भभन भनन करथे।

जिवरा करला जाथे, नींद कहाँ परथे।।

का संझा का बिहना, चुँहकय लहू ला।

जर बुखार धरेच रथे, घर मा कहूँ ला।।

बइद डाक्टर हर घर के, माली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बारो महीना भरे रथे, नहवई धोवई मा।

नाक पिरा जाथे, नाली के बस्सई मा।।

दौना के दम घुटगे, तुलसी तिरियागे।

गमके नइ गोंदा, भौरा तितली भागे।।

ना ठउर थाली, ना दसमत के डाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


शहर के देखा सीखी, गाँव बउरागे।

सुविधा हा दुविधा, बनके तनियागे।।

नल बोरिंग सुख्खा हे, नाली भराये।

धरती के छाती मा, कांक्रीट हे छाये।।

ना आज बने हावय, ना काली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

तेंदू- दोहा- चोपाई छंद

 तेंदू- दोहा- चोपाई छंद


लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।

काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।


तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।

छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।


तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।

टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।


बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।

औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।


तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।

तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।


लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।

अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाथे घलो केंवची जर हा।।


आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।

हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।


तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।

फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।


जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।

भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

विश्व हिरदय दिवस म हिरदय- सार छंद

 विश्व हिरदय दिवस म


हिरदय- सार छंद


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम जग नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम सब चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

घाट न घर के-रोला छंद

 घाट न घर के-रोला छंद


छोटे मोटे काम, गिनावय कर बड़ हल्ला।

श्रेय लेत अघुवाय, श्राप सुन भागय पल्ला।।

खुद के खामी तोप, उघारय गलती पर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


सोंचे समझे छोड़, करे मनमानी रोजे।

पर के ठिहा उजाड़, अटारी खुद बर खोजे।।

झटक आन के अन्न, खाय नित उसर पुसर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


दाई ददा ल छोड़, नता के किस्सा खोले।

मीठ मीठ बस बोल, जहर सब कोती घोले।।

कभू होय नइ सीध, रहे अँइठाये जरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


रखे पेट मा दाँत, खोंचका पर बर कोड़े।

अवसर पाके पाँव, गलत पथ कोती मोड़े।

पहिर स्वेत परिधान, चले नित कालिख धरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


घर के भेद ल खोल, मान मरियादा बारे।

आफत जब आ जाय, रहे देखत मुँह फारे।।

बरसे अमरित धार, फुले तभ्भो नइ झरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


पापी बनके पाप, करे नित लेवय बद्दी।

जाने नही नियाव, तभो पोटारे गद्दी।।

दानवीर कहिलाय, आन के धन बल हरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


मरहम धरके हाथ, मले के करे दिखावा।

सुलगे बनके रोज, भीतरे भीतर लावा।।

रहे सदा मिटकाय, मया सत मीत ल चरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 18 April 2026

घाम घरी के फर- सार छंद

 घाम घरी के फर- सार छंद


किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।

रंग रूप अउ स्वाद देख सुन, लड्डू फूटय मन मा।।


पिकरी गंगाअमली आमा, कैत बेल फर डूमर।

जोत्था जोत्था छींद देख के, तन मन जाथें झूमर।।

झुलत कोकवानी अमली हा, डारे खलल लगन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


तेंदू तीरे अपने कोती, चार खार मा नाँचै।

कोसम कारी कुरुलू कोवा, कखरो ले नइ बाँचै।

डिहीं डोंगरी के ये फर मन, राज करै जन जन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


पके पपीता लीची निमुवा, लाल कलिंदर चानी।

खीरा ककड़ी खरबुज अंगुर, करथे पूर्ती पानी।।

जर बुखार लू ला दुरिहाके, ठंडक लाथे तन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Sunday, 5 April 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                छत्तीसगढ़ सबे प्रकार ले अग्रणी राज मा गिने जाथे, चाहे प्राकृतिक छटा होय, पर्वत पठार, जंगल खान खदान होय, कल कारखाना होय या फेर संस्कृति संस्कार।  छत्तीसगढ़ के संस्कृति सब ला अपन कोती खींच लेथे। संस्कृति संस्कार के बाना बोहे छत्तीसगढ़ के परब तिहार के घलो अलगे महत्ता हे। वइसने एक तिहार हे, आदिशक्ति दाई दुर्गा के उपासना के तिहार नवरात्रि।  नवरात्रि जेन बछर मा दू बेर आथे। एक कुँवार मा अउ एक चैत मा। कुँवार नवरात्रि अउ चैत नवरात्रि दूनों मा आदि शक्ति के उपासना,आराधना अउ पूजा पाठ जम्मो छत्तीसगढ़ के मनखें मन तन्मयता ले करथें। ये बेरा मा छत्तीसगढ़ के जम्मो गांव शहर, मंदिर देवाला अउ घरो-घर मा ज्योत जलाए जाथे। माता के भक्ति मा विधुन होके सेउक मन माता के आराधना करथें, सेवा अउ जस गीत गाथें। छत्तीसगढ़ मा कई कोरी देवी मंदिर हे, जिहाँ नवराति के पावन बेरा मा सुघ्घर भक्तन मन के मेला भराथे। डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी, रतनपुर के महामाई, कोरबा के कोशगाई, धमतरी के बिलई माता, चंद्रपुर के चन्द्रहादिनी, दुरुग के चंडी माई, सूरजपुर के कुदुरगढ़हिन माई, बंजारी दाई, भवानी माई, बूढ़ी माई आदि कस अउ कतको देवी मन पूरा छत्तीसगढ़ मा अपन आशीष अउ मया दुलार लुटावत हें। ता अइसन भक्क्तिमय बेरा मा कवि मन के कलम कइसे चुप रही सकथे? उंखरो कलम ले माता के भक्ति भाव, आखर रूपी गंगा बरोबर बहिथे। संगीतकार मन के महिनत अउ साज बाज के संग कवि के लेखनी ही गीत ला जनम देथे। नवराति के बेरा मा हजारों मनभावन गीत सुने बर मिलथे। ता आवन कवि मन के कविता मा देवी आराधना के दर्शन करथन।

              छत्तीसगढ़ के कोरा मा बिराजे दाई रणचंडी ला माथ नवावत लाला फूलचंद श्रीवास्तव जी लिखथें- 

*रणचंडी चढ़ आये खप्पर। नइ देखे अपन भेष।*

*जय जय जय जय कैसिल्या के जय देश।।*


                माटी पूत महान गायक अउ कवि लक्ष्मण मस्तूरिहा जी मन माता रानी के कतको अकन गीत कविता लिखें हें,अउ स्वर घलो दिए हें--

*हो मइया, तोर तीर आएंव तार लेबे।स्वर-कविता कृष्णमूर्ति*


*रतनपुर वाली महामाया मैया हे पुरवान।*

*शारद रूप सवांगे तोरे, जश गूँजें आसमान।*


              रतनपुर महामाई अउ डोगरगढ़हिन दाई बमलाई ला भाव पुष्प अर्पित करत कवियित्री आशा झा जी मन कहिथें-

*रतनपुर मा नरियर धर। बमलाई मा मूड़ नवा।*

*भोरमदेव मा बदना बदके। बिगड़े काम बना।।*


           हथबन्द के वरिष्ठ कवि चोवा राम 'बादल' जी मन माता रानी बर लिखथें--

*लाल चुनरिया लाल सँवागा, शेर सवारी तोर।*

*रावाँभाँठा के बंजारी, निकले धरती फोर।।*

*डोंगरगढ़ मा बमलाई के, लगे रथे दरबार।*

*शरण परे गोहारत हाववँ, सुन ले मातु पुकार।।*


           गाँव गाँव मा माँ शीतला अउ बंजारी दाई के बसेरा होथे, उन ला माथ नवावत, सुमधुर गीतकार छंदकार बलराम चन्द्राकर जी चौपाई के माध्यम ले कहिथें-

*नमन शीतला माँ कल्याणी।बंजारी माँ शक्ति भवानी।*


          कवि नन्दकुमार नन्दगँइहाँ दंतेश्वरी देवी ला सुमरत कहिथें-

*दंतेश्वरी दंतेवाड़ा तोर डेरा हे। जंगल भीतरी मा बसेरा हे।*

*संखनी डंकनी दू नदिया के। तोर तीर मा घेरा हे।।*


           माता रानी के हजारों सेवा गीत लिखइया, हर्ष कुमार बिंदु के कलम के एक भाव, दंतेश्वरी दाई बर-

*दंतेश्वरी तोर हवय महिमाके शोर।चारो दिशा मा मइया मोर।*


             कवि मोहन लाल वर्मा जी मन नवरात मा माता रानी के मनभावन दरबार के वर्णन करत कथें--

*आगे हे नवरात, बरत हे दियना बाती।*

*जगमग-जगमग जोत, करय उजियारी राती।*

*माता के दरबार, भगत मन आथें जाथें।*

*करके पूजा-पाठ, शक्ति ला माथ नवाथें।।*


          जस सम्राट दुकालू यादव के गीत बिना माता रानी के कोरा सुन्ना लगथे, उंखर गाये हजारों जस सेवा गीत, गांव गली मा नवरात्रि के बेरा सहज सुनाथे, वइसने एक गीत हे, गीतकार एम के कुर्रे के लिखे--

*मूड़ मा बिराजे हवै महामाई ना। मोहनी बरन लागे।*


           युवा कवि अउ गीतकार अनिल सलाम जी कहिथें-

*चंडी दाई के आएंव दुवार। आज मोर भाग जागे।*


             छंदकार ज्ञानू दास मानिकपुरी जी मन चंद्रसेनी दाई ला श्रद्धा सुमन अर्पित करत अपन कविता मा कहिथें

*चंद्रपुर तोर गाँव हे। चंद्रसेनी तोर नाँव हे।*


             पारितोष धीरेंद्र जी मन माता रानी बर लिखथें-

*दाई रतनपुर महामाई बरोबर। डोंगरगढ़ बमलाई आय।*

*कोरबा के सरमंगला दाई। छुरी के कोसगाई आय।*


            छत्तीसगढ़ जे देवी मन ला सुमरत श्रेमासिंह ठाकुर जी मन लिखथें--

*डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी ला सुमरंव,रायपुर के दुग्धा-धारी।*

*जय छत्तीसगढ़ सिरपुर चण्डी,राजिम लोचन खल्लारी।*

*बागबाहरा के चण्डी डोंगरी, कुंवर अछरिया बमलाई।*


             हमर छत्तीसगढ़ के सबे जिला मा कतकोन नामी देवी मन बिराजमान हें, अपन कविता मा सबे देवी मन ला सुमरत आचार्य तोषणकुमार चुनेंद्र जी मन लिखथें---

*सरगुजा म सरगुजहीन दाई दन्तेवाडा दन्तेश्वरी।*

*बालोद के मोर गंगा मंइया मल्हार म डिडिनेश्वरी।*

*अड़भार म अष्टभुजी मंइया मड़वा के मडवारानी।*

*कोरबा में सरमंगला दाई जशपुर काली भवानी।*


          छंदकार बोधनराम निषादराज विनायक जी मन लिखथें-

*आशीष बने, लेव  सबोझन, ये समलाई।*

*रिक्षिन   दाई, चंडी  दाई, अउ  महमाई।।*

*सर्वमंगला,   हे   बंजारी,    हे   बमलाई।*

*सत्ती   दाई,    गौरी - गौरा,  कोसागाई।।*


            छंद त्रिभंगी मा माता रानी ला मोरो भाव पुष्प अर्पित हे-

*नवरात लगे हे, आस जगे हे, माता रानी, आय हवै।*

*दर्शन पाये बर, जस गाये बर, सेउक सब जुरि-याय हवै।*

*सब करथें सेवा, पाथें मेवा, ढोलक माँदर, झाँझ बजे।*

*हे जोत जँवारा, तोरण तारा, रिगबिग रिगबिग, द्वार सजे।*

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


चैनल इंडिया में स्थान देने हेतु, स्वराज करुण जी को विशेष आभार, नमन