Monday, 16 March 2026

बता भला-सार छंद

 बता भला-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी तन टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

जल बिन जल जावत हे टोंटा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गड़ी

 शक्ति छन्द- गड़ी चल


गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन झरे बस झड़ी।।

झड़क भात बासी अदौरी बड़ी।

किंजरबों गली मा हँसत हर घड़ी।


निकलबों ठिहा ले बहाना बना।

बबा डोकरी दाइ माँ ला मना।

सबें यार जुरबोंन बर रुख कना।

नँगत खेलबों धूल माटी सना।


कका देही गारी दिखाही छड़ी।

तभो नइ टुटे मीत मन के लड़ी।

गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन झरे बस झड़ी।।


उड़ाबों हवा मा बना फिलफिली।

चना भूंज खाबोंन खाबों तिली।।

नहाबों नदी मा उड़ाबों मजा।

जगाबों सुते ला नँगाड़ा बजा।।


छिंदी चार आमा कमल के जड़ी।

झराबोंन अमली ग जिद मा अड़ी।।

गड़ी चल ढुलाबों दुनो गड़गड़ी।

मया के सबे दिन झरे बस झड़ी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

भाजी बोहार के

 भाजी बोहार के


भाजी बोहार के।

राँध भूंज बघार के।।

दे लसुन मिर्चा के फोरन।

अउ छीटा मार  दार के।।


तन मा चुस्ती देथे,

सुस्ती जाथे हार के।।

बढ़त जात हे मांग भारी,

विनाश होवत हे खेत खार के।


ले दे के ये भाजी मिलथे,

चक्कर लगाय मा बाजार के।।

नइ हे पइसा हाथ मा,

ता देखत रह मुँह फार के।।


बड़ गुणकारी होथे ये भाजी,

राँध खा डकार के।

कफ दुरिहाथे,पाचन बढ़ाथे,

पेट के कृमि ला मार के।।


गर्मी घरी आथे,

उल्हवा उल्हवा राँध निमार के।

फर फूल घलो होथे काम के,

रख पेड़ ला दुलार के।।


जे खाय ते जाने स्वाद ला,

का होही बताय मा चार के।

भाजी पाला बैद आय तन मन के,

अउ मुख्य साग आय बुधियार के।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Friday, 6 March 2026

अऊ आगे बईरी बादर तन म मॉस नई बॉचे हे,


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  अऊ आगे बईरी बादर


तन म मॉस नई बॉचे हे,

अब हाड़ा ल घलो खा डर |

मोर सपना ल सरोय बर,

अऊ आगे बईरी बादर|

करेजा ल चानी करेबर,

फर म चना के पानी भरे बर|

रौंदें  बर  लाख-लाखड़ी  ल|

बॉचे-खोंचे आस आखरि ल|

मसरंगी अरसी के फूल कस,

हिरदे म जागे रिहिस सपना|

राहेर सरसो कस खड़े रेंहेव,

बईरी  हवा  हलईस  कतना|

लिड़िंग-लिड़िंग हालत रेंहेव,

अऊ आगे बिपत आगर....|

सरोय  बर मोर  सपना  ल,

अऊ आगे बईरी बादर......|


मोर मंसूर ल मसके बर|

मारे टोंटा ल कसके धर|

मंय   गंहू   कस,  गोहार   पारत  हंव|

जांगर ल जीतेव,जिनगी ल हारत हंव|

बुता करथन; करके करेजा के चानी|

फेर फूले-लुवे-मिंसे के बेरा; गिरथे पानी|

मंय कॉपत हंव थर-थर,

सब कीथे  जॉंगर हे त का डर.......?

मोर सपना  ल  सरोय  बर,

अऊ आगे  बईरी बादर.................|


पड़े ले थपड़ा ,करके थोथना तिरछा|

सुसके कोला म,धनिया-मेथी-मिरचा|

बिगड़हा बनाय हे जनम जात,

भगवान  मोर  रासि |

मोर लगाय ऑलू-भॉटा-गोभी,

अरो  लेहे   फॉंसी |

किसानी ल धरम मान के,

सिधोथो खेत-खार,बखरी-बारी|

उद्धमी ब्यपारी मन हॉसथे ,

गरियाथे बेटा-बहू-सुवारी |

मन  ल  मनाथो ,

किसान होय के सजा पा डर.....|

सपना ल सरोय बर,

अऊ आगे बईरी बादर.............|

               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                     बाल्को( कोरबा)

                     ९९८१४४१७९५

Sunday, 1 March 2026

गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)

 गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)



आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।


बिन अमुवा के करे कोयली का, कांता हा बिन कंत।।



बिन फुलवा के हावय सुन्ना, मोर जिया के बाग।


आसा के तितली ना भौरा, ना सुवना के राग।।


हे बहार नइ पतझड़ बस हे, हावय दुःख अनंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



सनन सनन बोलय पुरवइया, तन मन लेवय् जीत।


आय पिया हा हाँसत गावत, धर फागुन जे गीत।।


मरत हवै मन माँघ मास मा, पठा संदेश तुरंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



देख दिखावा के दुनिया हा, बैरी होगे मोर।


छीन डरिस सुख चैन पिया के, काट मया के डोर।


पुरवा पानी पियत बने ना, आगे बेरा अंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)



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 होरी अउ पीरा पलायन के- सरसी छन्द



होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।


रंग छीच के फेर बुझाहूँ, फागुन हवय बुलात।।



देवारी के दीया बुझथे, बरथे मन मा आग।


शहर दिही दू पइसा कहिके, देथौं गाँव तियाग।


अपन ठिहा मा दरद भुलाहूँ, फागुन ला परघात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



प्लास आम डूमर कस ठाढ़े, नित गातेंव मल्हार।


फोकट देहस मोला भगवन, पेट पार परिवार।


जनम भूमि जुड़ अमरइया हे, करम भूमि हे तात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



अइसन रँगबे सब ला आँसो, हे फागुन महराज।


सबे बाँह बर होवै बूता, झलकत रहै अनाज।।


दरद पलायन के झन भुगते, गाँव गुड़ी देहात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)




दोहा गीत- माँ शारदे



जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।



तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।


तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।


रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।


मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।


वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।


प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।


दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)






गीत- बने करे भगवान(सरसी छंद)

 गीत- बने करे भगवान(सरसी छंद)



काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।


महिनत करथौं पइसा पाथौं, नइ डोले ईमान।



पचे नहीं फोकट के पइसा, जस आये तस जाय।


होथे बिरथा बड़का बनना, कखरो ले के हाय।।


बने करम नित करत रहौं मैं, भरत रहै धन धान।


काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।



खून पछीना के धन दौलत, देवय चैन सुकून।


जादा के हे लालच बिरथा, लोभ मोह ए घून।


बने करम के होथे पूजा, करम धरम अउ दान।


काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।



घूसखोर के गत देखे हँव, माया पइस न राम।


लरहा बनके घुमते रहिगे, होगिस काम तमाम।।


इँहें सरग हे इँहें नरक हे, लिखथे करम विधान।


काम घूस खाये के दै नइ, बने करे भगवान।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)




गीत-करजा(लावणी छन्द)



बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।


लूट लूट बाजार बैंक ला, पाय रथें बड़का दरजा।



राज देश दुनिया मा करथें, करत रथें नित मनमानी।


उँखर ठिहा मा नेता गुंडा, अउ अफसर भरथें पानी।


सुरा सुंदरी शौक पुरावय,जय जयकार करयँ परजा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



दुनिया के कोना कोना मा, करजा के महल अटारी।


कहे कंगला अपन आप ला, आय चुकाये के बारी।


देश छोड़ के होवैं चंपत, कहि जो करना हे कर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



भेद करे बाजार बैंक हा, सूट बूट अउ पटको के।


एक ठिहा मा पहुँचे पइसा, घींसय पनही कतको के।


लगे एक घर कोट कछेरी, धरे एक ला घर घर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



मान शान ला भारत भू के, कोनो कोढ़ी झन चाँटे।


एक होय सब नियम धियम हा, बैंक रेवड़ी झन बाँटे।


फोकट मा बाँटे बर हे ता, सबके खीसा ला भर जा।


बड़े बड़े उद्योगी मन के, रथें करोड़ों मा करजा।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)





लाजवाब कृति - गांव के हो गए (हिंदकी संग्रह)*

 *लाजवाब कृति  - गांव के हो गए (हिंदकी संग्रह)* 



                  डॉ माणिक विश्वकर्मा "नवरंग" जी की कृति "गाँव के हो गए" पढ़ने को मिला। पढ़कर मैं पूर्णतः "नवरंग" जी का हो गया। मैं क्या?  जो भी पाठक इस पुस्तक को पढ़ेंगे "नवरंग" जी के कायल हो जाएंगे। "गांव के हो गए" ग़ज़ल संग्रह (हिंदकी) एक अथाह सागर की भाँति है,जिसमें, जो पाठक जितना गोता लगाएगा, वो उतना ही जीवनोपउयोगी मोती निकाल सकता है। नवरंग साहब की बेजोड़, बेबाक लेखनी में उनके अनुभव का साक्षात सम्मिश्रण इस पुस्तक में है। नवरंग साहब की यह पुस्तक एक तरफ उनके जीवन की परिभाषा नज़र आती है तो दूसरी तरफ पाठकों को जीवन जीने की कला सिखाती है। हर कलेवर की रचना, बेजोड़ शब्द शिल्प, बिंब, प्रतीक, मुहावरें आदि में पिरोकर नवरंग जी ने इस पुस्तक में अपने मनोभाव और अनुभव को उकेरा है। 208 ग़ज़लों का विशाल संग्रह, आज के समय और विचारों को हूबहू परिभाषित कर, अलौकिक आनंद की सृष्टि निर्मित करने में पूर्णतः सक्षम है। सुप्त मनोभाव उद्वेलित करने की क्षमता नवरंग जी की ग़ज़लों में समाहित है। समाहित है- स्वच्छ चिंतन, सादगी, सत्य, जिम्मेदारी, प्रेम भाव, दर्द, इंसानियत जैसे मानवीय मूल्यों की सभी ज़रूरी चीजें। जीवन और मृत्यु के बीच नवरंग साहब ने अपनी लेखनी के माध्यम से एक हिंडोलना निर्मित कर दिया है, जिसमें मनुष्य सर्वत्र झूलता नजर आता है।


                 विसंगतियों को फटकारते हुए, निर्माण और नवनिर्माण की परिकल्पना नवरंग जी की लेखनी की ख़ासियत है। साहित्यकार होने की सच्ची परिभाषा नवरंग जी के साहित्य में सहज नज़र आती है।  सर्व प्रचलित विषयों को भी मौलिक ढंग से कहने की ताकत नवरंग जी की लेखनी में है। सभी ग़ज़लों के बारे में लिख पाना सम्भव नही है, फिर भी कुछ मतलों, शेरों का जिक्र करना चाहूंगा।



सुर तुलसी हूँ न केशव दास हूँ मैं


भूख से व्याकुलजनों की प्यास हूँ मैं।


चापलूसी कर नही सकता किसी की,


जन्म से बेबाक हूँ बिंदास हूँ मैं।



बेवजह मैं आज तक बोला नही हूँ


सत्य के पथ पर कभी डोला नही हूँ।


जानता हूँ खेल में बाजी पलटना,


मित्रवर पत्ता अभी खोला नही हूँ।


उक्त शेर नवरंग जी को परिभाषित करते नज़र आ रहे, जिसमें उनकी सहजता,सरलता,स्वाभिमान,सत्यता और आत्मविश्वास के साथ साथ बिंदास और बेबाकपन है।



ज़रूरत पड़ने पर अपनों और रिश्ते नातों के लिये ख़ामोशी और कुर्बानी की बात करते हुए, नवरंग जी लिखते है--


दर्द सहना पड़े तो सह लेना


चोट खा लेना वार मत करना।


टूटकर रिश्ते कभी नही जुड़ते,


भूलकर भी दरार मत करना।


राज़ मन मे दबा के रख लेना


तुम कभी इश्तिहार मत करना।



श्रम,अभाव और पीड़ा को शब्द देना,कोई नवरंग जी से सीखें-


पेट में सूरज लिए निकला हूँ घर से


शाम की ख़ातिर सुबह से जल रहा हूँ।


नाम के पीछे कभी भागा नही हूँ


अनबूझे प्रश्नों का मैं ही हल रहा हूँ।



धीरज ,सन्तोष, सब्र जीवन की ज़रूरी चीजों में से एक है, इसे ज़िंदगी के शब्दकोश में किस तरह समाहित करना चाहिये, एक बानगी देखिये-


मन को काबू में रखने से खुशियां मिलती है


धीरे-धीरे दुख का हर लम्हा टल जाता है


लाख हवा विपरीत रहे फिर भी इस गुलशन में


जिसकी किस्मत में फलना है वो फल जाता है



परोपकार और स्वालम्बन मानवता का मापदंड है,तभी तो नवरंग जी क़लम चलाते हुए लिखते है--


फिर ना कहना दोस्तों जोड़ा नहीं


बो दिया एक बार भी कोड़ा नहीं


हो सका जितना किया मैं शौक़ से


काम औरों के लिए छोड़ा नहीं


चल सको तो दूर तक ले जाऊंगा


मैं किसी की राह का रोड़ा नहीं



फक्कड़पन सादगी जिन्दगी में कुछ इस तरह हो--


जिंदगी में सुर नहीं है लय नहीं है


इसलिए मन में किसी का भय नहीं है


पूछते हैं लोग ठहरूँगा कहां पर


मुझको जाना किधर है यह तय नहीं है


आपको अच्छा नहीं लगता करूं क्या


यह मेरा अंदाज़ है अभिनय नहीं है



नवरंग जी के शब्द दर्पण की तरह दाग़ दिखाते नज़र आते है----


कब तलक चल पाओगे लेकर मुखौटा


सब समझते हैं बुरे कितने भले हो


जिसने भी बढ़ कर दिया है हाथ तुमको


मूंग छाती में उसी की तुम दले हो


सीढ़ियों के वास्ते बैठे रहे तुम


क्या किसी के साथ दो पल भी चले हो



मनुष्य को दूरदर्शी होकर कोरे दिखावे से दूर चले जाने की बात कहते हुए,नवरंग जी लिखते है---


नींव गर कमजोर हो तो घर बदल देता हूं मैं


छोड़कर शहनाइयां को दूर चल देता हूं मैं



व्यवस्था पर तंज कसते हुए नवरंग जी लिखते है-


योजनाएं कागजों में है सफल


जी रहे हैं ये मसल है क्या करें


पा गया बहुरूपिया मंत्री का पद


आजकल वो ही सफल है क्या करें


रोज होता है पलायन गांव से


फाइलों में ही फसल है क्या करें



अर्श से फर्श पर पहुँची ज़िंदगी, कोई क़ागज का टुकड़ा नही होता है, जो हवाओं में उड़ जाए। परिश्रम कभी भी व्यर्थ नही जाता, इसी तरह के भाव, प्रकट करते हुए नवरंग जी लिखते है--


धूल से लिपता हूं कीचड़ से सना हूं


इसलिए मजबूत हूं सबसे घना हूं


है सभी हैरान क्यों टूटा नहीं मैं


धुन रहे हैं सिर निहाई का बना हूं


खिल रही है शाखाएं मेरे ही दम से


जो जड़ों को सींचता हो वो तना हूँ



गरीबी भुखमरी के बीच क़ागजी पहल के कोरे किस्से, कैसे नवरंग जी की क़लम से छूट जाएंगे---


हर तरफ रोटी नून के किस्से


माह हफ्ते दो जून के किस्से


वक्त पे कारगर नहीं होते


 कागजी है कानून के किस्से



फटकार में भी शालीनता, नवरंग जी की ख़ासियत है, शब्द तीर की तरह लक्ष्य भेदन में समर्थ है -


सालों भट्ठी में तपा हूं तब गला हूं


इसलिए सब कह रहे हैं जलजला हूं


ज़ुल्म सहने की मेरी फ़ितरत नहीं है


छीन लूंगा नींद रातों की बला हूँ



कुछ लोग मद महुआ के नशे में चूर है, तो कुछ लोग चीज बस के, तभी तो नवरंग जी कहते है,


लोग आदत से बहुत मजबूर हैं


कीजिएगा क्या नशे में चूर हैं


लूटते हैं जो वफ़ा के नाम पर


ठीक क्या हो पाएंगे नासूर हैं



इतिहास में नाम दर्ज़ कराने के लिए ज़िंदगी के सारे जंग जीतने पड़ते हैं, हार निराशा जैसी चीजों से दूर होकर  विश्वास लेकर आगे बढ़ना पड़ता है, तभी तो नवरंग जी लिखते हैं-


दर्ज़ होते हैं वही इतिहास में


जीतते हैं जंग जो खरमास में


दिल किसी का तोड़ना अच्छा नहीं


हौसला होता है हर विश्वास में


जीत लेंगे हम यकीनन एक दिन


आज हिम्मत और प्रण है पास में



वर्ष,व्यवस्था और वातावरण की वस्तुस्थिति पर चुटकी लेते हुए नवरंग जी लिखते हैं---


कल रहा जो वही आज का हाल है


बोलने के लिए यह नया साल है


योजनाएं धरी की धरी रह गई


जो मिला मित्रवर जी का जंजाल है


बेवजह लोग डरते रहे उम्र भर


जिस्म पर भेड़ के शेर की खाल है



ख़ास चलता है आम चलता है


बस इसी तरह काम चलता है


नाम लिखना जिन्हें आता नहीं


ऐसे लोगों का नाम चलता है


इल्म वाले किनारे बैठे हैं


आजकल तामझाम चलता है



समाज में बेवजह शोर-शराबा देख दिखावा किस कदर हावी है नवरंग जी की पंक्ति  देखिये-


तुम मेरी मौत को भुनाना मत


हर जगह अस्थियां ले जाना मत


डाल देना नदी में चुपके से


देश भर में बिगुल बजाना मत


दूर रखना मुझे सियासत से


नाम पर झांकियां सजाना मत


 लोग हर बात को समझते हैं


 बेवजह शोर तुम मचाना मत



इंसान को इंसानियत से लबरेज़ आत्म आंकलन करने की ज़रूरत है, तभी तो नवरंग जी कहते हैं--


प्यार से आजकल डांटता कौन है


खाइयाँ औरो की पाटता कौन हैं


जो मिला वह उठाते रहे उम्र भर


बेबसी में भला छाँटता कौन है


लोग लिखने लगे औरों की गलतियां


अपनी गुस्ताखियां आँटता कौन है



नवरंग जी ने मानव समाज में जो देखा उसे हूबहू लिख दिया, पर लिखने जा अंदाज़ क्या कहना--


रहा जुगनू जब से सितारा हुआ हूं


तभी से शहर में नकारा हुआ हूं


नदिया तो सब पूजा करते थे मेरी


समुंदर से मिलकर मैं खारा हुआ हूं



पहले भोले थे ये शहर वाले


दांत रखते हैं अब जहर वाले


औरों के दम पर लोग उड़ते हैं


अब परिंदे बचे न पर वाले



पौराणिक कथ्य का आधुनिक परिवेश में प्रयोग पाठक को वाह-वाह करने के लिए मजबूर कर देता है-


करने से पहले वार कई बार सोचना


धोखे से मारा जाए वह बाली नहीं हूं मैं


बरगद बना हुआ हूं मैं दुनिया के वास्ते


तूफ़ां में टूट जाए वह डाली नहीं हूं मैं



मंदिर में था तो कोई मुझे जानता न था


बाज़ार में आते ही ख़बर हो रहा हूं मैं



बिंब,प्रतीक और अभिव्यक्ति की कलात्मकता कोई नवरंग जी से सीखे--


मेढकी को जुकाम आया है


आजकल मुद्दा ये गर्माया है


मछलियां कांपने लगी डर से


बाखुदा कैसा वक्त आया है


जांच से यह नतीजा निकला है


आग मेंढक ने ही लगाया है


वो पकड़ में नहीं आया अब तक


सारे षड्यंत्र का जो पाया है


 


नवरंग जी की हिंदकी संग्रह में सिर्फ हिंदी का नहीं बल्कि विविध आयातित भाषाओं(उर्दू,फारसी,तुर्की,अंग्रेजी--) का भी प्रयोग, बेशुमार हुआ है, मनुष्य की फ़ितरत को शेर में बांधते हुए नवरंग जी कहते हैं---


है हवा जिस तरफ उस तरफ फेस कर


जी रहे हैं सभी आत्मा बेचकर


गांव पहले जहां था वहीं रह गया


लोग आए गए रोटियां सेक कर


यह नया दौर है बच के रहना


यहां कोई रुकता नहीं चीखते देखकर



आज हर कोई जल्दी मुकाम पाने के लिए छटपटा रहा है, पर मानव मेहनत कम और जुगत ज्यादा बना रहा है, तभी तो नवरंग जी लिखते हैं---


पकने से पहले वो बिकना चाहता है


मीर गालिब जैसा दिखना चाहता है


इतनी जल्दी है शिखर छूने की उसको


कुछ भी पढ़ना कुछ भी लिखना चाहता है


नाचती है रात दिन आंखों में दौलत


सालों वो महफ़िल में टिकना चाहता है



समस्या, संस्कृति, संस्कार,गंभीर चिंतन,निर्माण,पुनर्निर्माण और तात्कालिक प्रसंगों के साथ-साथ नवरंग जी के ग़ज़ल संग्रह में प्रेम मोहब्बत की बानगी भी सहज नजर आते है---


चले आओ सुरों में गीत बनकर


लुभाऊंगा तुम्हें संगीत बनकर


करूंगा रात दिन पूजा तुम्हारी


रहूंगा उम्र भर मैं प्रीत बनकर


 समय रहते बसा लो धड़कनों में


जुदा होने न पाऊं रीत बनकर



उनकी बात निराली है


वह पूजा की थाली है


जब से उनके पांव पड़े


आंगन में हरियाली है


महक रहा है मन उपवन


फूलों वाली डाली है



जब तुम लेती हो अंगड़ाई


बजने लगती है शहनाई


मादकता में भर जाती है


आलिंगन करने पुरवाई


मंडराने लगते हैं भौरे


मौसम करता है अगवाई



मनुष्यों को मजहबी रंग में नही बल्कि मानवता के रंग में रंगकर भाई चारे की भावना रखनी चाहिये, इसी भाव में अपनी अन्तर्रात्मा के शब्दों को लेखनी में ढालते हुए नवरंग जी कहते हैं--


परिंदों को मैं हर दिन प्यार से पानी पिलाता हूं


जहां होती है पहुनाई मैं उस सुबे में आता जाता हूं


मनाता हूँ दिवाली ईद वैशाखी और क्रिसमस भी


सभी देवालयों के सामने मैं सिर झुकाता हूं


कहीं नवरंग होकर रह ना जाए एक ही दर का


उजाला दे जो हर चौखट पर वह दीपक जलाता हूं*्



                अनुभव के आकाश में तारों की तरह टिमटिमाते नवरंग जी के एक एक शब्द कही सुनी बातों को नही बल्कि, जी गयी जिंदगी की हकीकत को बयां कर रहे है। जीवन या जमाने का कोई भी पहलू अछूता नही है, पाठक पढ़कर सभी रंगों में रंग सकता है। बहु प्रचलित बहरों में गुथे, राग रंग का अद्भुत संग्रह है, गाँव के हो गए गजल संग्रह, जिसके शब्दों में शक्ति है- निर्माण की, अधंकार को चीरने की, गलत को रोकने टोकने की, बैर वैमनस्य दूर करने की, प्रेम भाव भरने की, सही राह प्रशस्त करने की। यही नवरंग साहब की ख़ासियत है। गांव के हो गए गजल संग्रह में, नवरंग जी की क़लम आत्मरंजन के लिए नही बल्कि सत्य, सामाजिक समरसता और प्रेम भाव स्थापित करने के लिए चली है। एक शब्द में कहूँ तो "गाँव के हो गए" ग़ज़ल संग्रह एक पुस्तक नही, आईना है।


विविध कलेवर के 208 गजलों को शब्द दे पाना या उसके एक एक शेर के बारे में कह पाना मुश्किल है, इसके लिये पाठक को स्वयं शब्दों के समुंदर में डूबना होगा। अतः आप सब जरूर पढ़ें, नवरंग जी की लाजवाब कृति--- गांव के हो गए।



जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)


मो.नं.99814 41795,