Wednesday, 26 August 2026

आठे परब के सादर बधाई

 आठे परब के सादर बधाई


मोला किसन बनादे (सार छंद)


पाँख  मयूँरा  मूड़ सजादे,काजर गाल लगादे|

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


बाँध कमर मा करिया करधन,बाँध मूड़ मा पागा|

हाथ अरो दे करिया चूड़ा,बाँध गला मा धागा|

चंदन  टीका  माथ लगादे ,पहिरा माला मुंदी|

फूल मोंगरा के गजरा ला ,मोर बाँध दे चुंदी|

हार गला बर लान बनादे,दसमत लाली लाली |

घींव  लेवना  चाँट  चाँट  के,खाहूँ थाली थाली |

मुचुर मुचुर मुसकावत सोहूँ,दाई लोरी गादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


दूध दहीं ला पीयत जाहूँ,बंसी मीठ बजाहूँ|

तेंदू  लउड़ी  हाथ थमादे,गाय  चराके आहूँ|

महानदी पैरी जस यमुना, रुख कदम्ब बर पीपर।    

गोकुल कस सब गाँव गली हे ,ग्वाल बाल घर भीतर।

मधुबन जइसे बाग बगीचा, रुख राई बन झाड़ी|

बँसुरी  धरे  रेंगहूँ   मैंहा ,भइया  नाँगर  डाँड़ी|

कनिहा मा कँस लाली गमछा,पीताम्बर ओढ़ादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


गोप गुवालीन संग खेलहूँ ,मीत मितान बनाहूँ|

संसो  झन करबे वो दाई,खेल कूद घर आहूँ|

पहिरा  ओढ़ा  करदे  दाई ,किसन बरन तैं चोला|

रही रही के कही सबो झन,कान्हा करिया मोला|

पाँव ददा दाई के परहूँ ,मिलही मोला मेवा |

बइरी मन ला मार भगाहूँ,करहूँ सबके सेवा|

दया मया ला बाँटत फिरहूँ ,दाई आस पुरादे।

हाथ थमादे बँसुरी दाई,मोला किसन बनादे |


जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया "

बालको (कोरबा )


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1,मदिरा सवैया


मोहन माखन माँगत हे मइया मुसकावत देखत हे।

गोकुल के सब गोपिन ला घनश्याम दहीं बर छेकत हे।

देख गुवालिन के मटकी धरके पथरा मिल फेकत हे।

तारन हार हरे हरि हा पँवरी म सबे सिर टेकत हे।


2, मतगयंद सवैया


देख रखे हँव माखन मोहन तैं झट आ अउ भोग लगाना।

रोवत हावय गाय गरू झट लेज मधूबन तीर चराना।

कान ल मोर सुहाय नही कुछु आ मुरलीधर गीत सुनाना।

काल बने बड़ कंस फिरे झट आ मनमोहन प्राण बचाना।


गोप गुवालिन के सँग मोहन रास मधूबन तीर रचावै।

कंगन देख बजे बड़ हाथ के पैजन पाँव के गीत सुनावै।

मोहन के बँसरी बड़ गुत्तुर बाजय ता सबके मन भावै

एक घड़ी म दिखे सबके सँग एक घड़ी सबले दुरिहावै।


चोर सहीं झन आ ललना झन खा ललना मिसरी बरपेली।

तोर हरे सब दूध दहीं अउ तोर हरे सब माखन ढेली।

आ ललना झट बैठ दुहूँ मँय दूध दहीं ममता मन मेली।

मोर जिया ल चुरा नित नाचत गावत तैं करके अटखेली।


गोकुल मा नइ गोरस हे अब गाय गरू ह दुहाय नहीं गा।

फूल गुलाब न हे कचनार मधूबन हे नइ बाग सहीं गा।

मोर सबे सुख शांति उड़े मुरलीधर रास रचे न कहीं गा।

दर्शन दे झट आ मनमोहन हाथ धरे हँव दूध दहीं गा।


धर्म ध्वजा धरनी धँसगे झटले अब आ करिया फहराना।

खोर गली म भरे हे दुशासन द्रौपति के अब लाज बचाना।

शासक संग समाज सबे ल सुशासन के सत पाठ पढ़ाना।

झाड़ कदम्ब जमे कटगे यमुना मतगे मनमोहन आना।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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लोकछंद- रामसत्ता


विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।

दीन दुखी के डर दुख हरके, धर्म ध्वजा फहराये हो राम।


एक समय देवकी बसदेव के, राजा कंस ब्याह रचाये।

उही बेर मा आकाशवाणी, कंस के काने मा सुनाये।।

आठवाँ सुत हा मारही तोला, सुनत कंस भारी बगियाये।

बाँध छाँद बसदेव देवकी ला, कारागर मा झट ओइलाये।।

*सुख शांति के देखे सपना, एके छिन छरियाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।1


राजा कंस हा होके निर्दयी, देवकी बसदेव पूत मारे।

करँय किलौली दूनो भारी, रही रही के आँसू ढारे।।

थर थर काँपे तीनो लोक हा, कंस करे अत्याचारी।

भादो अठमी के दिन आइस, प्रभु अवतरे के बारी।।

*बिजुरी चमके बादर गरजे, नदी ताल उमियाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।2


अधरतिहा अवतरे कन्हैया, बेड़ी भाँड़ी सब टुटगे।

देवी देवता फूल बरसाये, राजा बसदेव देख उठगे।।

देख मनेमने गुनय बसदेव, निर्दयी राजा के हे डर।

धरे कन्हैया ला टुकनी में, चले बसदेव नंद के घर।।

*यमुना बाढ़े शेषनांग ठाढ़े, गिरधारी मुस्काये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।3


छोड़ कन्हैया ला गोकुल में, माया ला धरके लाये।

समै के काँटा रुकगे रिहिस, बसदेव सुधबुध बिसराये।।

रोइस माया तब जागिस सब, आइस दौड़त अभिमानी।

पुत्र नोहे पुत्री ए राजा, हाथ जोड़ बोले बानी।।

*विष्णु के छल समझ कंस हा, मारे बर ऊँचाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।4


छूटे कंस के हाथ ले माया, होय देख पानी पानी।

तोर काल होगे हे पैदा, सुन के काँपे अभिमानी।।

जतका नान्हे लइका हावै, कहै मार देवव सब ला।

सैनिक मन के आघू मा, करे किलौली कई अबला।

*रोवै नर नारी मन दुख मा, हाँहाकार सुनाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।5


राजा कंस के काल मोहना, गोकुल मा देखाय लीला।

दाई ददा संग सब ग्राम वासी, नाचे गाये माई पीला।।

छम छम बाजे पाँव के पइरी, ठुमुक ठुमुक चले कन्हैया।

शेषनाग के अवतारे ए, संग हवै बलदऊ भइया।।

*किसन बलदऊ ला मारे बर, कंस हा करे उपाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।6


कंस के कहना मान पुतना, गोकुल नगरी मा आये।

भेस बदल के कान्हा ला धर, गोरस अपन पिलाये।।

उड़े गगन मा मौका पाके, कान्हा ला धरके पुतना।

चाबे स्तन ला कान्हा हा, तब भारी भड़के पुतना।।

*असल भेस धर गिरे भूमि मा, पुतना प्राण गँवाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।7


पुतना बध सुन तृणावर्त ला, कंस भेजे गोकुल नगरी।

बनके आय बवंडर दानव, होगे धूले धूल नगरी।।

मारे लात फेकाये दानव, प्राण पखेडू उड़े तुरते।

बगुला भेस बनाके बकासुर, गोकुल मा आये उड़ते।

भारी भरकम देख बगुला ला, नर नारी घबराये हो राम।

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।8


अपन चोंच मा मनमोहना ला, धरके बगुला उड़िड़ाये।

चोंच फाड़ बगुला ला मारे, कंस सुनत बड़ घबराये।।

बछरू रूप धरे बरसासुर, मोहन ला मारे आये।

खुदे बरसासुर हा मरगे, अघासुर आ डरह्वाये।।

*गुफा समझ सब ग्वाल बाल मन, अजगर मुख मा जाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।9


कंस के भेजे सब दानव मन, एक एक करके मरगे।

गोकुल वासी जय बोलावै, दानव मन मरके तरगे।।

माखन खावै दही चोरावै, मटकी फोड़े गुवालिन के।

मुँह उला के जग देखावै, माटी खावै बिनबिन के।।

*कदम पेड़ मा बइठ कन्हैया, मुरली मधुर बजाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।10


पेड़ बने दुई यक्ष रिहिन हे, कान्हा उन ला उबारे।

गेंद खेलन सब ग्वाल बाल संग, मोहन गय यमुना पारे।

रहे कालिया नाग जल मा, चाबे नइ कोनो बाँचे।

कालीदाह मा कूदे कन्हैया, नाँग नाथ फन मा नाँचे।

*गोबर्धन के पूजा करके, इन्द्र के घमंड उतारे हो  राम*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।11


मधुर मधुर मुरली धुन छेड़े, रास रचाये मधुबन मा।

गाय बछरू ला गोकुल के, कान्हा चराये कानन मा।।

सिखाय नाहे बर गोपियन ला, चीर हरण करके कान्हा।

राधा ला भिंगोये रंग मा, पिचकारी भरके कान्हा।।

*कृष्ण बलदउ ला अक्रूर जी, मथुरा लेके जाये हो राम।*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।12


गोकुल मधुबन मरघट्टी कस, बिन कान्हा के लागत हे।

मनखे मन कठवा कस होगे, सूतत हे ना जागत हे।।

यमुना आँसू मा भरगे हे, रोवय जम्मो नर नारी।

कान्हा जाके मथुरा नगरी, दुखियन के दुख ला हारी।

*कंस ममा ला मुटका मारे, लहू के धार बोहाये हो राम*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।13


अत्याचारी कंस मरगे, जरासन्त शिशुपाल पाल मरे।

असुरन मनके नाँव बुझागे, विदुर सुदामा सखा तरे।।

दुशासन चिर खींचत थकगे, बने सहारा दुरपति के।

महाभारत ला पांडव जीतिस, कौरव फल पाइस अति के।

*हरि कथा हे अपरम पारे, खैरझिटिया का सुनाये हो राम*

विष्णु के अवतार कन्हैया, द्वापर युग मा आये हो राम।14


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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कलजुग म घलो आबे कान्हा

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स्वारथ म  रक्सा  बनके मनखे,

सिधवा गोप-गुवाल ल मारत हे।

कालीदाह   के   कालिया   नाग,

गली - गली   म    फुस्कारत हे।

बरसत हे ईरसा-दुवेस लड़ई-झगरा,

मया  के  गोवरधन उठाबे कान्हा।।

कलजुग  म  घलो  आबे   कान्हा।।


देवकी-बसदेव  ल  का  किबे,

जसोदा-नन्द  घलो  रोवत  हे।

कहाँ बाजे बंसुरी,कती रचे रास?

घर - घर  महाभारत  होवत   हे।

सड़क डहर म बइठे हे तोर गईया,

मधुबन म ले जाके चराबे कान्हा।

कलजुग  म  घलो आबे   कान्हा।


दूध - दही  ले  दुरिहाके  मनखे,

मन्द - मऊहा   म  डूब   गे  हे।

अलिन-गलिन म  सोवा  परे हे,

कदम  के  रुखवा  टूट  गे  हे।

घेंच म बांधे घूमे भरस्टाचार के हांड़ी,

आके  दही  लूट  देखादे  कान्हा।

कलजुग  म  घलो  आबे  कान्हा।


            जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                बाल्को(कोरबा)

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गीत-करिया कन्हैया आ


मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।

बंसी के बजइया आ----

माखन खवैया आ------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


तोर बिना गोकुल न, तोर बिना मधुबन।

तोरबिन बन बाग सुन्ना, तोरबिन भव भुवन।।

मोर पाँख पहरैया आ-----

नाग के नथैया आ-------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


नंद यशोदा रोवैं, रोवैं गोपी ग्वाला।

राधा के आँखी के, बोहै नदी नाला।।

चीर हरैया आ-----

पीर हरैया आ------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


हवा चलत नइहे, पत्ता हलत नइहे।

गरवा चरत नइहे, बिरवा फरत नइहे।।

गोवर्धन उठैया आ------

भवपार लगैया आ------

करिया कन्हैया आ----

मधुबन मा रास रचैया, गउवा के चरैया आ।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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रामसत्ता-दशावतार गाथा


कल्कि रूप धर ये कलयुग मा, आके दरस देखादे हो राम।

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


पहली लिये तैं मत्स्य अवतारे।

जल परलय ले जग ला उबारे।।

*सत्यव्रत ला तत्वज्ञान दे, मत्स्य पुराण सुनाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


कच्छप रूप दुसर तैं बनाये।

देव दानव मनके भाग जगाये।।

*मंदराचल पर्वत ला बोह के, सागर मंथन कराये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


तीसर रूप बरहा अवतारे।

हिरण्याक्ष के भुजा उखाड़े।।

*समुंद में डूबे धरती ला, तैंहर बाहिर निकाले हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


चौथा रूप मा नरसिंह बनके।

बने सहाई तैं सुर जन के।।

*हिरण्यकश्यप मार गिराके, प्रह्लाद पार लगाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


पाँचवा रूप धर वामन अवतारे।

राजा बलि के गरब उतारे।।

*नाप पाँव मा तीनो लोक, लीला गजब देखाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


परसुराम के ले अवतारे।

सहस्रबाहु ला दिये पछाड़े।।

*क्षत्रिय मनके गरब तोड़ के,जपतप जग ला सिखाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


सातवां अवतार मा बन राम।

त्रेता युग ला तारे तमाम।।

*मर्यादा पुरुषोत्तम बनके, रावण मार गिराये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


आठवा रूप मा बन गोपाला।

कहाये नंद यशोदा के लाला।।

*अर्जुन के रथ हाँक कन्हैया, धर्म ध्वजा लहराये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


नवम रूप मा बुद्ध बनके।

बनगेस राजा तैं जन जन के।।

*सत मारग धर जपतप करके,ज्ञान के धार बोहाये हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


कल्कि रूप धर आजा प्रभु जी।

कलजुग ला सिरजा जा प्रभु जी।।

*सुमरत हावन तोला भगवन, आके दरश देखाजा हो राम।*

*सब दिन लाज बेचाये हवस तैं,आ अब लाज बचादे हो राम।*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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........माते हे दही लूट..........

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गोकुल गँवागे,ब्रिज बोहागे |

सिरागे जम्मो सुख.............|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


परिया तरिया पार लुटागे |

डहर गाँव खेत-खार लुटागे |

नांगर बक्खर बखरी -बारी,

खेक्सा,करेला,सेमी नार लुटागे |

कागज कस फूल ममहाय नही|

गाय-गरवा कोनो ल भाय नही |

न गोपी हे न ग्वाला हे |

जम्मो मनचलहा, मतवाला हे |

नइ पीये दूध दही,

सब ढ़ोकत हें मँउहा घूट...............|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


जसोदा के लोरी लुटागे |

नंद ग्राम के  होरी लुटागे |

दुहना,मथनी,डोरी लुटागे |

किसन बलदाऊ के जोड़ी लुटागे |

पेंट पुट्टी के दिवाल म,

आठे कन्हैया नइ नाँचे |

घर घर भरे असुर के मारे,

गोकुल- मधुबन नइ बाँचे |

अपनेच पेट के देखइया सब,

सुदामा मरत हे भूख.................|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


पहली कस दही,

अब जमे नही |

घीव-लेवना नोहर होगे,

कड़ही तको बने नही |

दूध दही होटल म होत हे |

ग्वाल-बाल गली-गली म रोत हे |

न गौठान हे,न चरागन हे,

कहॉ बाजे बंसरी,नइ हे कदम रूख.....|

जँउहर गॉंव-गॉंव म,

 माते हे दही लूट........|


                जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                        बाल्को(कोरबा )

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गीत-धर्म धजा लहराही कोन


ये कलयुग मा दीन हीन के, साथ देय बर आही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


सौ झन अधमी गरजत हावैं, धन अउ बल के बल रोज।

फिरैं मिलावत हाँ में हाँ सब, फोकट के खा पी अउ बोज।

सच्चा एक अकेल्ला कोती, आज भला बतियाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


करिया नाँग घलो ले बिखहर, बनगे हावैं मनखे आज।

स्वारथ खातिर फुस्कारत हें, बेच-भाँज डारे हें लाज।

सबे ललावैं हाड़ माँस बर, दूध दही घी खाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


बिन ग्वाला के गाय गरू अउ, बिन मुरली के मधुबन रोय।

दाता तरसे दार भात बर, देखावा के पूजा होय।

सुख सुविधा तज दनुज दलन बर, कंस नगरिया जाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


छल प्रपंच होवत हे भारी, अँधरा के सिर मा हे ताज।

हाँसत हवै दुशासन हिहि हिहि, चुपे चाप हें सभा समाज।

पापी मनके गरब तोड़ के, दुरपति लाज बचाही कोन।

सत के रथ के बने सारथी, धर्म धजा लहराही कोन।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को,कोरबा

तीजा

 सुरता मइके के-गीत


सावन काँटेंव मैं गिनगिन, सुरता मा दाई वो।

कि आही तीजा लेय बर, भादो मा भाई वो।।


मइके के सुरता, नजरे नजर म झुलथे।

देखतेंव दसमत पेड़ ल, के फूल फुलथे।

मोर थारी अउ लोटा म, कोन बासी खाथे।

तुलसी चौरा म बिहना, पानी कोन चढ़ाते।

हे का चकचक ले उज्जर, कढ़ाई दाई वो--

आही तीजा------


गाय गरुवा मोर बिन, सुर्हरथे कि नही।

खेकसी कुंदरू बारी म फरथे कि नही।

कुँवा तरिया म पानी कतका भरे रहिथे।

का मोला अगोरत,परोसिन खड़े रहिथे।

कोन करथे मोर कुरिया म पढाई दाई वो---

आही तीजा------


दुरिहा दिये दाई, तैंहर अपन कोरा ले।

मइके लाही कहिके,मोला तीजा पोरा में।

जल्दी भेज न दाई बाट जोहत हँव वो।

मइके के सुरता म मैं हा रोवत हँव वो।

एकेदरी थोरे सुरता भुलाही दाई वो---

आही तीजा---


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा

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करू भात अउ करू पानी


दीदी के करू भात, जीजा के करू पानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


एक ला जुन्ना सहेली मिलगे,एक ला जुन्ना संगी।

एक पीटत हे मुड़ी, एक फेरत हे सरलग कंगी।।

एक हाँसे हाहा हाहा, एक के नइ फुटत हे जुबानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


दीदी मन सम्हरे हे, जीजा मन के कुकुर गत हें।

दीदी मन बिंदास सुतत हें, जीजा मन जागत हें।।

जय जय गूँजे एक कोती, एक कोती राजा जानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


राँध के जीजा, नइ खा सकत हे कँवरा।

पड़े हे कपड़ा लत्ता, पड़े हे बर्तन भँवरा।

चेहरा मा चमक नइहे,रद खद हे छत छानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


तीजा के बिहान दिन, सरी सरी लुगरा।

इती घोंडे पड़े हे जीजा, दमदम ले उघरा।।

दीदी फोन उठात नइहे, हे हलाकान जिनगानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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मरना हे तीजा मा


सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


लइका लोग ल धरके गय हे,मइके मोर सुवारी।

खुदे बनाये अउ खाये के, अब आ गय हे पारी।


कभू भात चिबरी हो जावै,कभू होय बड़ गिल्ला।

बर्तन भँवड़ा झाड़ू पोछा, हालत होगे ढिल्ला।

एक बेर के भात साग हा,चलथे बिहना संझा।

मिरी मसाला नून मिले नइ,मति हा जाथे कंझा।

दिखै खोर घर अँगना रदखद, रदखद हाँड़ी बारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।1।


सुते उठे के समय बिगड़गे,घर बड़ लागै सुन्ना।

नवा पेंट कुर्था मइलागे, पहिरँव ओन्हा जुन्ना।

कतको कन कपड़ा कुढ़वागे,मूड़ी देख पिरावै।

ताजा पानी ताजा खाना, नोहर हो गय हावै।

कान सुने बर तरसत हावै,लइकन के किलकारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।2।


खाय पिये बर कहिही कहिके,ताकँव मुँह साथी के।

चना चबेना मा अब कइसे,पेट भरे हाथी के।

मोर उमर बढ़ावत हावै,मइके मा वो जाके।

राखे तीजा के उपास हे,करू करेला खाके।

चारे दिन मा चितियागे हँव,चले जिया मा आरी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।3।


छंदकार-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)

Tuesday, 25 August 2026

अवतरण दिवस के बेरा म.. सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया" तुलसी तोर रमायण(भजन)

 अवतरण दिवस के बेरा म..


सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


तुलसी तोर रमायण(भजन)


जग बर अमरित पानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।


शब्द शब्द मा राम रमे हे, शब्द शब्द मा सीता।

गूढ़ ग्यान गुण गोठ गँजाये, चिटिको नइहे रीता।

सत सुख शांति कहानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।


सब दिन बरसे कृपा राम के, दरद दुःख डर भागे।

राम नाम के महिमा भारी, भाग भगत के जागे।।

धर्म ध्वजा धन धानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।


सहज तारथे भवसागर ले, ये डोंगा कलजुग के।

दूर भगाथे अँधियारी ला, सुरुज सहीं नित उगके।

बेघर के छत छानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।


प्रश्न घलो कमती पड़ जाही, उत्तर अतिक भरे हे।

अधम अनाड़ी गुणी गियानी, सबके दुःख हरे हे।

मीठ कलिंदर चानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।

कतको के जिनगानी बनगे, तुलसी तोर रमायण।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


तुलसी दास जयंती की बहुत बहुत बधाई

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महाकवि तुलसीदास जी अउ छत्तीसगढ़-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                   गोस्वामी तुलसीदास जी हमर छत्तीसगढ़ राज म रामचरित मानस के माध्यम ले गांव गांव अउ घर घर म पूज्यनीय हे, कोनो परब-तिहार, छट्ठी बरही, मरही हरनी सबे दुख सुख के बेरा म गोस्वामी जी के पावन कृति"रामचरितमानस" घरो घर म पढ़े सुने जाथे। चाहे कोनो गाँव होय या शहर जमे कोती गाँव गाँव, पारा पारा म एक दू ठन रमायण मण्डली खच्चित मिलथे। तुलसीकृत रामचरित के दोहा चौपाई जमे छत्तीसगढ़िया मनके अंतर आत्मा म समाय हे, ते पाय के कभू अइसे नइ लगिस कि गोस्वामी जी आन कोती के आय, सदा अइसे लगथे, कि हमरे अपने राज के आय। गोस्वामी महराज ह हम सब छत्तीसगढ़िया मन ल दुर्लभ प्रसाद देहे, अउ हम सबके दिलो दिमाक म सदियों ले राज करत आवत हे,, अउ अवइया समे घलो राज करही। तुलसीकृत रामचरित मानस अउ अवधी म लिखे अन्य ग्रंथ मन छत्तीसगढिया मन ल सहज ही समझ आ जथे, काबर कि माता कौशल्या के मइके छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़ी और अयोध्या के अवधी म एक दुसर के राज म अवई जवई ले दुनो भाषा आपस म चिपक गे रिहिस। यहू कारण तुलसीदास की के अवधी म रचित ग्रंथ ह छत्तीसगढ़िया मन बर अटपटा नइ लगय। तुलसीदास जी के जयंती छत्तीसगढ़ म धूमधाम से मनाये जाथे, ये दिन राम कथा पाठ अउ भजन कीर्तन जम्मो कोती होथे। सिरिफ छत्तीसगढ़ मन ही नही बल्कि पूरा भारत वर्ष तुलसीदास जी के राम चरित रूपी भव तरे बर डोंगा ल पाके कृतार्थ हें।


                  कथे कि तुलसीदास जी महाराज प्रभु कृपा अउ अपन आत्म शक्ति ले कलयुग के मनखे मन बर भगसागर तरे बर डोंगा(रामचरित मानस) के रचना करिन। तुलसीदास जी ल महर्षि बाल्मीकि जी के अवतार घलो माने जाथे। संगे सँग यहू कहे जाथे कि तुलसीदास जी ल शिव पार्वती, बजरंगबली के संगे संग भगवान राम, लक्ष्मण अउ जॉनकी समेत दर्शन देय रिहिस।


*चित्रकूट की घाट पर, भये सन्तन की भीड़।*


*तुलसीदास चन्दन घँसे, तिलक देत रघुवीर।*


 गोस्वामी जी के रचना म दोहा चौपाई अउ कतको प्रकार के छ्न्द के माध्यम से छत्तीसगढ़ सँउहत शोभा पाथे। पुनीत ग्रंथ ल पढ़के अइसे लगथे कि तुलसीदास जी महाराज छत्तीसगढ़ म घूम घूम के रामचरित मानस के रचना करे हे। भगवान राम अपन वनवास के बनेच समय छत्तीसगढ़ म गुजारे हे।जुन्ना समय म छत्तीसगढ़ दण्डकारण्य कहलावै, अउ तुलसीदास जी महाराज कतकोन बेर अपन रचना म इही नाम ल सँघेरे हे-


*दण्डक बन प्रभु कीन्ह सुहावन।जन मन अमित नाम किये पावन*


तुलसीदास जी महाराज रामचरित मानस के रचना करत बेरा छत्तीसगढ़ ल अपन अंतरात्मा ले देखे हे। तभे तो इहाँ के संत मुनि-दीन दुखी मनके पीरा ल हरत भगवान राम ल देखाय हे।उत्तर छत्तीसगढ़ म सरभंग ऋषि के आश्रम म पहुँचे के चित्रण गोस्वामी जी के रचना म मिलथे----


*तुरतहि रुचिर रूप तेहि पावा।देखि दुखी निज धाम पठावा*


*पुनि आए जहँ मुनि सरभंजा।सुंदर अनुज जानकी संगा*


पुत्र यज्ञ बर छत्तीसगढ़ ले सृंगी ऋषि के अयोध्या जाय के वर्णन, अउ श्री राम के  सिहावा पर्वत म बाल्मीकि आश्रम आय के वर्णन , गोस्वामी तुलसीदास जी अपन महाकाव्य म करे हे-


*सृंगी ऋषिहि वशिष्ट बोलावा। पुत्र काम शुभ यज्ञ करावा।*


*देखत बन सर सैल सुहाये।बाल्मीकि आश्रम प्रभु आये।*


येखर संगे संग गोस्वामी तुलसीदास जी ह, सिहावा पर्वत अउ महानदी के पावन जल के घलो बड़ मनभावन ढंग ले चित्रण करे हे-


*तब रघुवीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु शीतल पानी।*


*तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।*


*राम दीख मुनि वायु सुहावन। सुंदर गिरि कानन जलु पावन*


*सरनि सरोज विटप बन फूले।गूँजत मंजु मधुप रस भूले।*


भगवान राम के आय ले, सन्त मन के संगे संग,,दण्डक बन के जीव जानवर मनके मनोदशा देखावत तुलसीदास जी लिखथे---


*खग मृग विपुल कोलाहल करही।बिरहित बैर मुदित मन चरही।*


*नव पल्लव कुसुमित तरु नाना।चंचरीक चटली कर गाना।*


*सीतल मंद सुगंध सुभाउ।सन्तत बटइ मनोहर बाउ।*


*कूह कूह कोकिल धुनि करही।सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरही।*


*चक्रवाक बक खग समुदाई।देखत बनइ बरनि नहि जाई।*


न देखत बने, न बरनत, गोस्वामी जी के अइसन पंक्ति देखत कभू नइ लगे कि गोस्वामी जी दण्डक बन के शोभा ल आँखी म नइ देखे होही।


तुलसीदास जी महराज महानदी के तट म भगवान के रद्दा जोहत शबरी माता के घलो कथा बताये हे, राम जी के दर्शन माता शबरी पाय हे अउ संग म नवधा भक्ति के धारा घलो बहे हे-


*ताहि देइ गति राम उदारा।शबरी के आश्रम प्रभु धारा*


(पक्षी राज ल परम् गति देय के बाद प्रभु राम जी शबरी के आश्रम घलो पहुँचिस।)


तुलसीदास जी महराज शबरी के हाथ ले भगवान राम ल कंद मूल फल देय के घलो बात केहे हे-


*कंद मूल फल सुरस अति, दिए राम कहुँ आनि।*


*प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि*


जंगल म निवास करत दीन दुखी मुनि जन मनके रक्षा बर भगवान राम ल असुरन मन ले लड़े के बात घलो गोस्वामी जी कहे हे, रेंड नदी के तट म बसे रक्सगन्डा नामक जघा, खरौद म खरदूषण, राक्षसराज विराट, अउ मरीज के सँघार के घलो बात दण्डक बन ले जुड़े हे---


*दंडक बन पुनीत प्रभु करहू।उग्र साप मुनिवर कर हरहू*


*बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिह पर दाया।*


गोस्वामी तुलसीदास जी के महाकाव्य ले सहज ही पता लगथे कि ज्यादातर अरण्य कांड के घटना दण्डक बन याने छत्तीसगढ़ ले जुड़े हे। जेमा- पंचवटी निवास, खरदूषण वध, मारीच प्रसंग, सीताहरण, शबरी कृपा आदि


 वइसे तो आने आने  राज के मनखे मन पंचवटी ल अपन अपन क्षेत्र (मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र,उत्तराखण्ड) म होय के बात करथे, फेर सीताबेंगरा, जोगीमारा गुफा म स्थित  लक्षमण गुफा अउ लक्षमण रेखा के साथ साथ गोस्वामी तुलसीदास जी के कतको चौपाई , अउ घटना क्रम जेमा, मारीच वध, खरदूषण वध, आदि छत्तीसगढ़ म होय के पुख्ता सबूत देथे-


*पंचवटी बसि श्री रघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।*


सूर्पनखा अपन नाक कान कटे के बाद खरदूषण ल जाके कइथे-


*खरदूषण पहि गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।*


*धुँवा देखि खरदूषण केरा।जाइ सुपरखा रावण केरा।*


एक सुनती जानकारी अनुसार अपन जीवन के आखिर समय म लवकुश जन्मस्थली म तीन दिन बर गोस्वामी जी छत्तीसगढ़ आये रहिन अउ उँहे अपन कृति कवितावली के तीन ठन छ्न्द ल सिरजाइन। रामचरित मानस ल पढ़त सुनत अइसे लगथे कि तुलसीदास जी ह छत्तीसगढ़ म ही रहिके, छत्तीसगढ़ी संग मिलत जुलत भाषा म छत्तीगढ़िया मनके कल्याण बर रामचरित मानस के रचना करे हे। छत्तीसगढ़ ल राममय करे म गोस्वामी जी के अहम योगदान हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)

साग भाजी ला समेटे छत्तीसगढ़ी गीत- आज के बेरा मा*

 *साग भाजी ला समेटे छत्तीसगढ़ी गीत- आज के बेरा मा*


                 आजकल बड़े लगत हे न छोटे सबे आफत मा अवसर ताकत दिखथे, ईमान धरम तो दूसर लोक के शब्द होगे हे, ये लोक मा अब नही कस हे। कभू कभू अइसन बेरा आथे कि कुछ चीज के उपज/उत्पादन स्थिति परिस्थिति अनुकूल नइ होय के कारण कमती हो जथे, अउ वोकर माँग बढ़े ले, वो चीज महँगा हो जथे। फेर अइसनो नइ होय, जेमा बंगाला 250 रुपिया किलो तक पहुँच जाय, ये तो अंधेर होगे। खैर आँसो सस्ता हे। ये सब काला बाजारी अउ जमाखोरी के नतीजा आय, एक विशेष हाथ मा सरी चीज जाये ले अइसने स्थिति बनथे, तेखरे सेती तो पहली घरों घर कोठी रहय, जेमा धान पान साल भर बर भराय रहय, फेर आज मनखे पइसा के लालच मा कोठी ला फोड़ फाड़ व्यापारी ला सबें धान पान ला बेंच देवत हे। पहली कस दाई दीदी मन अब चौमासा के जोरा घलो नइ करे। बरी बिजौरी, खोइला, सुक्क़सा दिखबे नइ करे। अइसन मा व्यापारी मन मनमानी तो करबे करही, अउ ये सब दिखत तो हे, चाँउर, दार, साग संग कतको भाजी पाला----जइसन मूल जरूरत के चीज सबे महँगात हें। मैं तो एक कविता मा तको लिखे हँव-- *जे दिन तक कोठी मा धान रही, ते दिन तक दुनिया मा ईमान रही।*  खैर छोड़व, आज छत्तीसगढ़ी लोक गीत जेमा साग भाजी के वर्णन हें, वोला महँगाये बेरा मा सुरता करथन अउ गुनथन-------


*चौरा मा गोंदा रसिया, मोर बारी मा पताल*-

सब ले पहिली किस्मत बाई देवार के मुख ले निकल के, जनकवि लक्ष्मण मस्तूरिहा जी के संगीत ले सजे सँवरे अउ बाद मा स्वर कोकिल कविता वासनिक जी के गाये,ये मनभावन गीत, हर छत्तीसगढ़िया के अन्तस् मा समाय हे। फेर जब पताल के भाव 200 रुपिया किलो ले घलो पार चलत रिहिस, ता कोनो मयारू अपन बारी मा पताल हे कहिके बतातिस, ता कोनो भी मनखे सात जनम बर सिरिफ पताले खातिर मया मा बँधा जातिस, रंग रूप मया मोहनी ला छोड़िच दे।  छोटे मनखे ला तो तिरियई दे, बड़का बड़का मनखे मन तक, बाजार ले पताल के भाव पूछ दुच्छा घर आ जावत रिहिस। अइसन मा कखरो भी बारी मा पताल रहितिस ता वो धरती लोक मा पइसा छाप पताल लोक मा घलो राज करतिस। फेर आज राज करत हे जमाखोर मन, जे मन मनमर्जी दाम वसूलत हे। हाय रे पताल, बड़का बड़का ला देयेस हँकाल।


*एक पइसा के भाजी ला दू पइसा मा बेचँव गोई,गोंदली ला रखँव जी मंडार के*

शेख हुसैन जी के लिखे अउ गाये ये मनभावन जुन्ना नाचा गीत जेमा बड़ अकन साग भाजी के वर्णन हे। ये गीत मा सब्जी बेचइया मरारिन पेट परिवार पाले बर एक पइसा के भाजी ला दू पइसा मा बेचे के बात करत हे। फेर आज सबें कोती पैठ जमाये व्यापारी मन पेट परिवार नही, बल्कि सात पीढ़ी ला पाले बर ईमान तक ला बेचत दिखथें। एक के ला दू नही,बल्कि कुछ दिन जमा करके,बाजार मा तंगई लावत, सौ गुना अधिक दाम मा बेचथें।  इंखर कृपा ले कभू पताल,  ता कभू गोंदली, ता कभू अउ कुछु आने साग भाजी महँगायेच रथे। 


*करुहा रे करेला------बखरी के लाल मिर्चा लइका ला रोवाय*

शिवकुमार तिवारी जी के गाये ये गीत कोन नइ सुने होही? फेर जब आज साग भाजी महँगाये हे, ता करुहा करेला होय, चाहे मीठ कुंदरू, तरे के बाद तो मिठाबेच करथे, फेर बाजार ले झोला मा नपावत बेरा ही बड़ खुशी दे देथे। काबर कि महँगाई मा कढ़ाई ले पहली झोरा मा तो आना चाही।महँगाये मिर्चा हा सिरिफ लइका मन भर ला नइ रोवावत हे, सियानो मन ला रोवावत हे। रुपिया दू रुपिया मा कुढ़ी कुढ़ी मिलइया मिर्चा आज कोरी भर मा तको गिन के आवत हे।


*दमांद बाबू दुलुरु काबर रिसागेस, आलू अउ गोभी के सुवाद थोरकिन देख ले*

फिरन लाल वर्मा जी अउ संगवारी मन के गाये ये जोक्कड़ गीत जे बेर सुनबे ते बेर मजा आथे। हो सकथे ये गीत मा दमांद बाबू कूकरी बोकरी खाय बर रिसाय रिहिस होही,, फेर आज आज जब पियाज, टमाटर आलू गोभी----दाम मा कूकरी ले घलो अघवा गे हे, अइसन मा दमांद बाबू दुलरू हाँस हाँस के आलू गोभी के साग खाही, वो भी बिगन मुंह फुलाये।


*भाँटा मिर्चा अउ धनिया पताल लेले गा, का लेबे कुंदरू करेला हे*

कुल्वनतींन बाई अउ पंचराम मिर्झा जी के सधे स्वर मा ये गीत बड़ मन भावन लगथे। ये गीत मा मरारिन गली गली घूमत साग भाजी बेंचत हे, अउ वाजिब भाव तको बतावत हे। सुनहू ता पता लगही कि वो बेरा आठ आना, एक रुपिया किलो मा तको साग भाजी आय। फेर आज तो आना के जमानच नइहे। कई सैकड़ा खर्चे मा तको झोला भर नइ पाये। महँगाई के दौर मा भाजी पाला बेचइया पसरा लगाये अँटियावत बइठे हे,अइसन मा घर घर जाके लेले लेले थोरे कही। जेला लेना हे ते हाट बाजार जायें।


*झुमकी तरोई गा भैया, राजा झुमकी तरोई गा भाई*

मेहत्तर राम साहू जी के लिखे अउ साधराम मरावी जी के गाये ये गीत जब रेडियो मा बजे ता सच मा मन झूमर जाय। घरों घर बारी मा तरोई,बरबट्टी,रमकेरिया, खीरा------- मन ला मोह लेय। पितर पाख मा तरोई बरबट्टी बारी ले सहज निकले, कोनो बाजार हाट के मुँह नइ ताके। फेर आज पितर पाख मा तरोई तो महँगाबेच करथे, आन समय तको हाथ नइ आय। एखर बर जरूरी हे, सबके बारी फेर झुमरे, तभे मन ये गीत संग झुमरही। 


*बखरी के तुमा नार बरोबर मन झुमरे*

मस्तूरिहा जी के लिखे अउ कविता वासनिक जी संग गाये ये गीत गजब गुरतुर हे। तुमा नार, जइसे छानी मा चढ़के झुमरथे वइसने वोला देख मन सहज मगन हो जथे। फेर आज बारी बखरी ले नाता टोरत मनखे, महँगाई के बेरा मा काय झुमरही, बल्कि तुमा, रखिया, कोमढ़ा के भाव सुनत बक्क खा जावत हे।


*जिमी जिमी जिमी,कांदा कांदा कांदा*

पॉप स्टाइल मा ये गाना बड़ चलिस। पहली कांदा कुशा भाजी पाला ला गरीबहा साग काहय फेर आज उल्टा होगे हे, इही सब मन महँगाये हे। जिंमी कांदा हमर छत्तीसगढ़ मा भारी फेमस हे। एखर कढ़ी, भुजिन्या बड़ मिठाथे। के गीत ला सुनत मुंह मा पानी आ जथे।


अउ सुरता करबो त.....


*करू करेला वो मीठ कुंदरु, नाचत हे नोनी बजत हे घुंघरू*

*मैहा रांधेव करेला चना दार, रे छैला तोला खाही कहिके न*

*भाजी टोरे बर आबे वो, मोर गांव के मउहारी म*

*नदिया तीर के पटवा भाजी, पटपट करथे रे*

*नीम के डंगानी मा चढ़के करेला के नार*

*भाँटा मुरई बिन पूँछी के चिरई*

*चल तुमा के नार ते कइसे झूले हिंडोलना*


                   वइसे तो अइसने अउ बड़ अकन गीत मा भाजी पाला आथे, सब ला सँजो पाना मुश्किल हे। जुन्ना पारम्परिक गीत के अलगे सुवाद हे, कतको नवा नवा भाजी पाला के गीत द्विअर्थी अउ सुने लाइक घलो नइ हे। मोर मनसा गीत के बहाना आज अउ काली के बेरा ला परिभाषित करना रिहिस। जे बेर मा ये सब गीत मन ला लिखे अउ गाये गे रिहिस वो बेर मा वो आनंद सहज झलकत रिहिस, फेर आज जब मनखे बाजार भरोसा होगे हे, तब ये सब गीत ताना मारे बरोबर लगथे।  बारी मा मेहनत ले उगे भाजी पाला ला अपन हाथ ले टोर के रांधे खाय के अलगे मजा रहय। महँगाई मा एक वर्ग पोखाथे ता एक वर्ग सोखाथे, या काहन ता एक बर महँगाई डायन आय, ता एक बर भौजाई।खैर महँगाई के कारण अउ निवारण ला सबो जानथन, तभो एक दूसर ला कोसत रहिथन, फेर गीत गीत होथे, तन मन सबो ला गदगद कर देथे, ता सुनव अइसन जुन्ना गीत मन ला अउ गुनव तको।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छत्तीसगढ़ के गाँव मन मा प्रयोग मा आनेवाला मशीन औजार अउ सामान के नाम, विवरण अउ उपयोगिता-

 यहू ला जानव


*"छत्तीसगढ़ के गाँव मन मा प्रयोग मा आनेवाला मशीन  औजार अउ सामान के नाम, विवरण अउ उपयोगिता-


*कलारी*- लकड़ी के बने औजार जे धान कोड़ियाये,पैरा अलगाय के काम मा उपयोग आथे। चना, गहूँ,अरसी अउ अन्य फसल ला घलो मिन्जे के बेरा कलारी उपयोगी होथे। ये लम्बा बांस मा कठखोलवा चिरई के मूड़ी बरोबर कोकवानी होथे।


*दॅतारी*- एक ले अधिक दाँता वाले लकड़ी के पाटा। कोदो मा दॅतारी मारे जाथे। छोट/हरु दॅतारी मा धान मिंजत बेरा पैरा ला घलो अलगाये जाथे। एक ठन बाँस मा एक लकड़ी फिट रहिथे,जेमा 7,8 ठन दाँता रहिथे।  भारी ला बइला खेत मा बइला तिरथे, छोट हरु ला मनखे खुदे खिचथे।


*कोप्पर*- कोप्पर लकड़ी के बने रहिथे जे धान, कोदो ला कोपराय के काम आथे। किसान मन कोप्पर ला नेवरिया बइला बछवा ला रेंगें बर सिखाये, खेत/ भर्री ला बरोबर करे आदि काम मा लाथे। एखरे कम वजनी रूप बख्खर कहिलाथे।


*काँवर*- पानी या कोई सामान ला दुनो कोति ओरमा, कंधा मा रख के लेय जाए के बाँस।


*ईरता*- ईरता बाँवत अउ बियासी बेरा उपयोगी होथे। खेत जोतत बेरा नांगर मा लेटा चिपकथे तेला ईरता के उपयोग ले निकाले जाथे, ये छोट लोहा के फरसा बरोबर बइला खेदारे के लउठी के नीचे जोती जुड़े रहिथे।


*सूर*- धान के भारा डोहारे के दू मुड़ी वाले बांस।


*आरी/तुतारी*- बइला खेदे के लउठी मा गड़े छोट खीला आरी कहिलाथे, एखर उपयोग बइला भइसा ला कोचे बर करे जाथे।


*चामटी*- बइला खेदारे के लउठी मा बंधे चमड़ा के रस्सी जेमा बइला ला नइ रेंगें ता मारे जाथे।


*खूँटा*- कोठा अउ दुवार मा गाय बाँधे बर भुइयाँ मा गड़े लकड़ी।


*पहुरा*- गाय गरवा बाँधे के अइसन छोट लकड़ी जेखर मुड़ी मा गरवा के गला के रस्सी अउ पूछी मा खूँटा मा फँसाय के रस्सी रथे।


*कोटना*- गरवा मन के पानी पीये के आयताकार पथरा के पात्र।


*धोनाही*- मिट्टी के गोल छोट गगरी जेमा धोवन फेके जाथे। 


*गरदेवा/केनउरी*- गाय गरवा के गला मा परमानेंट बंधे डोरी।


*खड़खड़ी*-  गाय गरवा के गला मा बंधे लकड़ी के घण्टी 


*लांहगर/लादका*- हरहा गाय गरु जे गला मा बंधे भारी लकड़ी।


*बिंधना*- लकड़ी ला मनवांछित आकार देय, छेद करे बर, काटे पीटे बर बिंधना उपयोगी होथे। चौड़ा नोक वाले पटासी बिंधना अउ पतला नोक वाले सुल्लू बिंधना कहलाथे। कई प्रकार के धार वाले बिंधना होथे। 


*बसुला*-  ये लकड़ी ला छोले के काम बर उपयोगी होथे।


*लोहाटी तारा/ताला*- करिया लोहा के जुन्ना ताला जेखर चाबी स्क्रुनुमा रहय।


*सँकरी*- दरवाजा/कपाट मा ताला देय बर लामे लोहा जे साँकल


*टँगिया*- लकड़ी काटे के औजार।


*खुरपी*- बन कांदी निकाले के औजार।


*रापा*- माटी जोरे संकेले के औजार।


*कुदारी*- माटी कोड़े के औजार।


*गैंती*- माटी कोड़े के काम अवइया कुदारी के बड़े रूप।


*हँथौडी*- ये खीला ठोंके के काम आथे, कुछु चीज ला फोड़े फाड़े बर घलो उपयोगी होथे।


*घन*- हथौड़ी के बड़े रूप,जे लकड़ी चीरे, लोहा लक्खड़ काटे बर काम आथे।


*धूम्म्स/धम्मस*-माटी कुचरे या दबाये के लोहा के बड़का पाटा असन औजार।


*छिनी*-लकड़ी फाड़े जे बड़का खीला, ये छोट, मोठ कई प्रकार के होथे।


*रोखनी/रेंदा*- लकड़ी ला प्लेन करे के काम मा आथे।


*भाँवरी/भँवारी*- लकड़ी मा छेदा करे के काम आथे। यहू आकार प्रकार के कई किसम के होथे।


*गिरमिट*- लोहा के औजार जेला घुमा घुमाके लकड़ी ला छेदा करे जाथे।


*हँसिया*- धान,कांदी, बन, दूबी लुवे तोड़े के काम आथे। साग भाजी घलो सुधारे जाथे।


*पैसुल*- सब्जी काटे के काम आथें।


*सब्बल/साबर*- भुइयाँ ला गड्ढा करे के लोहा के औजार।


*आरा/आरी*- लकड़ी चीरे के औजार।


*टेंवना*- लोहा धार करे के पथरा


*ठीहा*- लोहार, बढ़ई के घर गड़े लोहा या लकड़ी के टुकड़ा जेमा रखके लोहा ला पीटे जाथे अउ लकड़ी का काटे छाँटे जाथे।


*निहई*- टेंडग़ाय लोहा ला सोझ करे या मनचाहे आकार देय बर उपयोगी औजार।


*सुम्बा*- सुल्लू जघा मा ठोंकाय खीला खूंटी ला बरोबर करे बर उपयोगी।


*गुनिया*- कोन ला बरोबर मिलाय बर, खिड़की चौखट बनाए बर उपयोगी


*पेन्चिस*- खीला तिरे के काम आथे।


*सुजियारी*- खीला के अनुसार छेद ला बड़े करे के काम आथे।


*कनाछी*- लोहा ला धार दे के काम बर उपयोगी


*धमेला*- घर निर्माण बर उपयोगी लोहा के पात्र


*कौंचा*- घर निर्णाण में गारा मिलाये के काम बर उपयोगी


*फंटी/पाटा*- गारा सीमेंट ला बरोबर करे के काम आथें


*गोली*- ईंट जोड़त बेरा सोझ मिलाये बर काम आथें


*नकवार*- नाक के बाल आदि निकाले के चिमटा


*नाहनी*- नख काटे के औजार


*छूरा*- दाढ़ी बनाये के औजार


*चिमटा/ चिमटी/लोचनी*- आगी बूगी, काँटा खूंटी निकाले के बड़े छोटे लोहा के औजार


*सरोता*- सुपारी काटे के, बड़े हा आमा काटे के काम आथे।


*धुकनी*- लोहार घर रहय जेमा लोहा ला गरम करे।


*चाक*- कुम्हार घर के घड़ा/माटी के समान बनाए के मशीन


*घानी*- तेल पेरे जे मशीन


*टेड़ा/रहट*- पानी पलोये के मशीन।


*मंगठा*-कपड़ा बुने के मशीन।


*चरखा*- सुत काते के मशीन।


*मूसर*- धान/ कोदो छरे के लकड़ी के औजार जेखर तरी मा लोहा लगे होथे।


*बहाना*- बाहना मा ही धान कोदो ल रख के मूसर मा छरे जाथे।


*खलबट्टा/ओखली*- कूटे पीसे के काम बर उपयोगी, लोहा के ओखल।


*डंगनी/ अकोसी*- ऊपर के चीज ला अमरे बर बने बॉस।


*खलिहा*- आमा टोरे के झोला बंधे डंगनी।


*ढेंकी*- ढेंकी धान कूटे के काम आथे, येमा दू तीन आदमी एके संघरा काम करथे। कुछ मन ढेंकी के आघू भाग मा गोड़ ले अघाड़ी ला दबावत जाथे ता कुछ मन पाछू के बाहना मा धान ला डारे निकाले के काम करथें। ये देशी धनकुट्टी घलो कहिलाथे।


*घर लिपनी*- गोबर पानी भराय करसी जेमा घर ला लीपे जाथे, घर लीपे बर प्रयोग मा लाये चेन्द्रा पोतनी कहिलाथे।


*बाहरी*- घर दुवार बाहरे के झाड़ू।


*खर्रा*- कोठा/ बियारा बाहरे के राहेर काड़ी के गुच्छा।


*झंउहा*- गोबर कचरा हेरे, माटी फेके के काम बर उपयोगी बाँस के पात्र।


*सील-लोढ़ा*- चटनी हरदी मिर्चा पीसे बर उपयोगी पथरा।


*जाँता*- गहूँ, चना, अउ अन्य आनाज ला पिसान बनाये के हथ मशीन। कोदो जाँता, पिसान जाँता , ये बड़े छोटे प्रकार के होथे।, जेखर नाम घलो बदल जथे। जइसे जँतली, जँतुलिया,कोदो दरनी।


*पाउ*- जाँता मा लगे लकड़ी जेला धरके गोल गोल घुमाय जाथे।


*टिपली*- मिट्टी तेल रखे के डब्बा


*निसेनी*- चढ़े उतरे के लकड़ी के बने सीढ़ी


*चाँड़ी*- तेल ढारे के उपयोग मा लवइया टिन के नली दार  पात्र


*कुप्पी*- साइकिल,मशीन मा तेल डाले बर ये उपयोगी हे।


*गाड़ा*- बइला गाड़ी, खेती किसानी बर उपयोगी। 


*जुवाड़ी*-नांगर में जुड़ा के बीच के भाग जे मेर डाँड़ी आके मिलथे।


*नाहना*- चमड़ा के डोरी जे जुवाड़ी मेर बंधाय रथे, नाहना जुड़ा अउ डाँड़ी ला बाँधे रखथें।


*पंचारी*- जुड़ा के आखिर भाग के लकड़ी जे मेर बइला फंदाय रथे।


*जोंता*-नांगर जुड़ा के पंचारी मा बंधे डोरी जे बइला ला जुड़ा मा बाँधे रखथें। गाड़ा मा सुमेला मा बंधे रहिथे,अउ बइला ल सके जघा स्थिर रखथें।


*खाँसर*- गाड़ा के छोटे रूप,गांव गौतरी,मेला मड़ई जाय बर उपयोग मा लाये जाथे।


*घांघड़ा*- कौड़ी पट्टी युक्त बड़े घण्टी।


*कसेर गाड़ी*- टट्टा/ चापड़ बंधे गाड़ा।


*कोल्लर/लोदर*- बाँस के  टट्टा जे खूँटा तक  उठे रथे।


*चापड़ा*- गाड़ा मा लगे गोलाकार टट्टा


*नांगर*- हल


*जुड़ा*,- नांगर या गाड़ा के वो लकड़ी जेमा बइला फंदाय रथे, जुड़ा गाड़ा मा हमेशा बंधे रथे, जबकि नांगर मा जुवाड़ी कर नाहना मा बांधेल लगथे।


*बेलन*- अरसी, कोदो मिन्जे बर प्रयोग होवइया लकड़ी के भार युक्त गाड़ी।


*पटनी*- गाड़ा के डाँड़ी मा ठोंकाय पाटा।


*धोखर*- गाड़ा के चक्का के पहली वाले लम्बा पटनी जेमा माई खूंटा रहिथे,अउ बइला ला चक्का कोती आवन नइ देवय।


*खूँटा*- डाँड़ी अउ पटनी ला छेद जे गड़ाये गय बॉस या लकड़ी।


*अघाड़ी*- गाड़ा चक्का के आघू के पटनी।


*पिछाड़ी*- गाड़ा चक्का के बाद के पटनी।


*आरा*- चक्का के मूड मा गुथाये लकड़ी।


*पाठा/पुट्ठा*- आरा मा लगे लकड़ी, पुट्ठा  जुड़के गोल बनथे।


*पट्टा*- पाठा के ऊपर लगे गोल लोहा।


*चीपा*- पाठा अउ पट्टी के बीच गेप ला भरे बर ठोंके गय बॉस के टुकड़ा।


*मुड़*- चक्का के बीच के गोल लकड़ी।


*गुर्दा*- मुड़ मा फिट लकड़ी जेमा असकुड़ लगे रहिथे।


*असकुड़*- दोनो चक्का ला जोड़े बर बने लोहा।


*पोटिया*- असकुड़ ऊपर के बड़े खोल वाले लकड़ी।


*बैसकी* पोटिया ऊपर मा लगे लकड़ी जेमा डाँड़ी माड़थे।


*खीला* - असकुड़ के आखिर मा लगे रॉड, जे चक्का ला छेंके रखथें।


*धुरखिली*- पोटिया पटनी के मुख्य खीला।


*बरही*- डाँड़ी अउ जुड़ा के बंधना।


*धूरा*- गाड़ा के आघू के भाग जेमा दोनो डाँड़ी अउ जुड़ा बंधाय रथे।


*सुमेला*- जुड़ा के छेद मा लगाइया लोहा जेमा बइला फन्दाथे।


*सांकड़/ काँसड़ा*- बइला के गला के डोरी जे नाथ अउ केनवरी ले जुड़े होथे, जेला गाड़ा हाँकइया बइला ला काबू मा करे बर धरे रहिथे।


*केनवरी*- बइला के गला मा बंधाय डोरी।


*नाथ*- वो डोर जेमा बइला नँथाय रथे।


*टेकनी*- गाड़ा के धूरा मा टेकाय जाने वाला लकड़ी। ये गाड़ा ला खड़े करे बर उपयोग मा लाये जाथे।


*ओंगना*- गाड़ा के गुर्दा मा अण्डी तेल/ चिट ला चिकनाहट बर डारे जाथे।


*कंडील*- माटी तेल ले जलइया, काँच के गोल  छेंका मा बरत बाती।


*चिमनी/ढिबरी/भभका*- सीसी मा माटी तेल भरके ढक्कन मा बाती लगाके जराय जाथे।


*गियास*- देवारी तिहार बर कुछु प्लेट ला सजाके दीया ला बार के ऊँच आगास मा टांगना।


*तेल कुप्पी*- साइकिल या मशीन मा तेल डारे के छोटे डब्बा।


*गोरसी*- आगी तापे या आगी का रात भर छेना मा सिपचा/दगा के रखे बर उपयोग मा आने वाला माटी के टोकरी।


*पउला/फूला*- अनाज धरे बर बने माटी के छोटे पात्र


*कोठी*- अनाज धरे के बड़े पात्र


*ओंगना*- कोठी मा धान निकाले बर बने छेदा।


*पर्रा*- बॉस के बड़का पर्री।


*पर्री*- भात पसाये या तोपे बर बॉस के बने तोपना।


*तर्री*- जर्मन के तोपना


*बिजना*- बाँस के बड़े टुकना।


*सुताइल/रोखनी*-  छिले के काम बर उपयोगी।


 *चन्नी/चलनी* -  पिसान छाने के, चाउर चाले के काम बर।


*कोदई धोना*- कोदई धोय के काम बर उपयोगी,ये टिन के होथे।


*झेंझरी*- कनकी,कोदई धोय बर बॉस के टुकनी।


*चरिहा*- बॉस के बड़े टुकनी, धान पान नापे भितराये के काम


*सूपा*- छँटाई, निमराई,धान ओसई के काम बर उपयोगी।


*पउवा*- धान चाँउर नापे के पाव भर डब्बा।


*पैली*- एक किलो के डब्बा।


*काठा*- लगभग चार पैली धरउ लकड़ी या टीना के पात्र।


*झिपारी*- बरसात के पहली कोठ/ पर्दा ला पानी ले बचाये बर छिंद राहेर काड़ी अउ खदर मिलाके बनाये जिनिस। झिपार ले बचे बर घलो झिपारी के उपयोग होथे।


*मइरका*-पेंदी मा माटी छभाय करिया रंग के गगरी, जेमा आनाज आदि धरे जाथे।


*गगरी*- करिया रंग के माटी के बर्तन।


*गघरा गुंडी*- पानी भरके रखे बर ये उपयोगी होथे।


*कलौंजी*- साग राँधे के मिट्टी के बर्तन।


*ठेका*- दार चुरोये के माटी के छोटे बर्तन।


*गिरी*- गगरा, गुंडी ला बने मड़ाय बर जड़ या कपड़ा ला गोल गुरमेट के बनाय जाथे,एखर के गगरा गुंडी उंडे नइ।


*गूँड़ड़ी*- पानी लाने,माटी फेके के समय मूड़ ऊपर उपयोग मा अवइया कपड़ा, जे गोल गुरमेटाय रथे।


*बंगुनिया*- पीतल के छोट बर्तन।


*बटलोईया*- स्टील के छोटे मुंह वाले गोल बर्तन।


*गंज*- पीतल या स्टील के बड़े मुँह के बर्तन।


*गंजी*- पानी भरे,खाना बनाये के जर्मन के बर्तन।


*बॉल्टी*- कुँवा ले पानी निकाले के लोहा बर्तन, आजकल स्टील बाल्टी घलो पानी भरे के काम मा आथे।


*माली/कटोरी/कोपरी*- काँच/ स्टील के बर्तन


कुटेला-कपड़ा धोय या कोनो सुखाय फसल ल कुचरे के काम अवइया लकड़ी के  गोल या चाकर पटिया


मुड़ेसा- कपड़ा ले बने मोठ छोट गोल चाकर गद्दा जेन मुड़ के तरी सोवत बेर उपयोग होय।


चुरोना  - जादा या मोठ कपड़ा ल  धोय बर निरमा म डुबोना।


टठिया-- खाय के थाली जेला थारी घलो कथन


मुड़सरिया-तकिया कोती, मुड़ कोती


गोड़सरिया- गोड़ कोती


ओढ़ना..ओढ़े के


दसना...बिछाए के, बिस्तर


कोपरा ..परात


बटुवा.... भात राँधे के बर्तन


हँउला....पानी भरे के गुंडी या गगरी


मलिया,थरकुलिया...प्लेट..


सइकमी/सइकमा- बासी खाय के बटकी


कुंड़ेरा....माटी के दूध चुरोय के बर्तन..


*सुपेती*....रजाई


*कईधोना*= चाउर धोय के


*होमाही*= हूम देके


*तखत*=बइठे के लकड़ी के बाजवट जेंन सोय के घलो काम आवय


*करची*-जर्मन के बर्तन जेन भात बनाए के काम आथे


*जांँता*-अनाज पीसे के चक्की


*ढकेल गाड़ी* -लइका मन के गाड़ी


*तख्ता*-जमीन में बिछाय वाला,जेमा पहिली दर्जी मन कपड़ा काटे


*कागज के टुकनी*-  टुकनी


 *मरपरई*- सिसली गोरसी,कम गहराई के


*कजरौटी* काजर धरे के


*सुराही*-पानी भरे के 


*ढेरा*-रस्सी बनाय के 


*भँदई*-चमड़े का सेंडिल नुमा चप्पल जेला अक्सर राउत मन पहिरे ।


*मोरा*- पाना या झिल्ली से बने हुए  बरसाती जेला मुड़ी मा टाँग के ओढ़े जाथे।


*खुमरी*- पाना, कमचील या झिल्ली से बने हुए बड़का टोपी कस  बरसाती 


*संदूक*- पेटी


*धूसा*- बड़का साल जेला कंबल बरोबर ओढ़े जाथे।


*खोल*- कथरी जे उपर जे कपड़ा/गद्दा रजाई में चढ़ाने वाला कवर।


*पार्खत*- तामा के बने नान्हे मलिया जेमा भगवान के मूर्ति ल नहवाय जाथे।


*नेवार*- पलंग मा गंथे नायलोन/कपड़ा


*मचोली/माची*- छोट खटिया


*भेलवा*- लकड़ी के *झूलना*


*खूँटी*- बाँस के लकड़ी जे कोठ मा गड़े रहे


*मोरा*- बरसात मा ओढ़े के पन्नी


*पौतरा*- प्लेट


*कोपरी*-  गड्ढा वाले प्लेट


*कठौता*- लकड़ी के बर्तन


*फूलबहिरी/काँसी बहिरी/छीनबहिरी/खरेटा बहिरी/खरहेरा बहिरी/ झारिनि*- झाड़ू


*मोड़ा*- बइठे के 


*ठप्पा*- चौंक चाँदन पुरे के छेदरहा डब्बा


*पिल्हर/ मुड़की*- भारन


*चौखट*- दरवाजा के आधार


*कुँदवा खुरा*- खटिया के कुंदाये खुरा


*पठेरा/खोलखा*-कोठ के भीतर बनाय आलमारी


*तुमड़ी* --खेत जाय तब पानी भर के ले जाय, ये तुमा के बने रहय, जब तुमा सूखा जाय तब वोला बनाय।


*खड़ाऊ*- लकड़ी के चप्पल


*अकतरिया* -खेत खार म कांटा खूंटी ले बांचें बर महतारी मन पहिरे सेंडिल नुमा चप्पल


अरगेसनी- घर मा कपड़ा टांगें अउ सुखोय बांस के लकड़ी के


*भंदई* - चमड़ा के बने सेंडिल जइसे चप्पल


*कांवर* - लगभग 4-5 फीट फिट लंबा बांस के दूनों छोर मा जोंति लगा के पानी लाये बर उपयोग करे जाथे


*सिंगार पेटी*- सिंगार के समान रखे के बॉक्स


*मर्रा*-मुड़ कोरे के ककवा/कंघी


*कुरो*=धान नापे के


*पटका*- टॉवेल


*अँगोछा*- पानी मा भींगो के पोछे जाय वाले फरिया/कपड़ा


*गोदरी /कथरी*- सूती लुगरा के मोटा बिछोना


*झाँपी*- बाँस के बड़े टुकना


【रँधनी खोली ले संबधित कतको अकन समान अउ हे जइसे,--*गोरसी (मरपरई),पीढ़ही/ पीढ़ा,माली(काँसा का छोटा प्लेट),फुलकसिया लोटा, फुलकसिया थारी,

बटकी,कोपरा,कोपरी,झारा,डुआ,डुई,पलटनी,सइतमा,थारी,लोटा,गिलास,भँवराही,बटकी,कसेली,दइहा,मइरसा,मथनी,घम्मर,सीका,गिरि,हँउला,मरकी,गगरा,गगरी,घैला,दोहनी,

दुहना,तउला,ठेकवा,लकड़ी,चिल्फा,झिटका,परइ,कनौजी,तोपना,सील,लोढ़ा,पर्रा,पर्री,टुकनी,फुँकनी,अथनहाँ,मरकी,सरकी,दरी,पिढ़वा,फुला,पठेरा,घनौची,एकमूँहा चूल्हा,दुमुँहा चुल्हा,अँगेठा,अँगरा,कोइला, खोइला,तउला, चाक-कनौजी के दूसरा किसम,चँदाही-सबो किसम के थारी,लेन्च-सबो किसम के बाल्टी-बाल्टा, गोड़ही लोटा-गोड़ा वाला लोटा,खूराही गिलास-खूरा वाला गिलास, गोड़ही बटकी-गोड़ा वाला बटकी, भँवराही बटकी-बिगन गूरा वाला,ढिबरी, चिमनी, चटिया-मटिया, कुड़ेरा, डेचकी, चन्नी,कोटना, फरिया, चेंदरा( कपड़ा), फोरन, सुखसी*】


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बोलने की महत्ता: एक लोककथा के माध्यम से सीख

 बोलने की महत्ता: एक लोककथा के माध्यम से सीख


​एक समय की बात है, एक राज्य में एक अत्यंत धर्मात्मा, न्यायप्रिय और प्रतापी राजा राज करता था। प्रजा अपने राजा से बेहद प्रेम करती थी और पूरे राज्य में सुख-शांति फैली हुई थी। लेकिन राजा का एक छोटा भाई भी था, जो मन ही मन ईर्ष्या और सत्ता के लालच से जल रहा था।


​एक दिन अवसर पाकर उसने छल से धर्मात्मा राजा की हत्या कर दी। राजा की शक्ल अपने भाई से काफी मिलती-जुलती थी, इसलिए उसने राजा का चेहरा (मुखौटा) धारण कर लिया और खुद राजा बनकर सिंहासन पर बैठ गया। प्रजा यही समझती रही कि उनके प्रिय राजा ही राज संभाल रहे हैं, जबकि वास्तव में एक हत्यारा उनका शासक बन चुका था। नए राजा ने अपने मंत्रियों और दरबारियों को भी मौत के खौफ से चुप करा दिया था। पूरे राज्य पर डर का सन्नाटा छा गया।


​कुछ समय बाद, राजा की हजामत बनाने के लिए एक नाई (ठाकुर) दरबार में आया। सेवा करते-करते किसी गुप्त भेद से नाई को इस बात का पता चल गया कि यह धर्मात्मा राजा नहीं, बल्कि उनका हत्यारा भाई है। राजा को जब एहसास हुआ कि नाई को सच मालूम हो चुका है, तो उसने तीखे शब्दों में चेतावनी दी—"यदि यह बात तुम्हारे मुँह से बाहर निकली, तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा।"


​नाई डर के मारे काँप उठा। उसने वादा तो कर दिया, लेकिन यह सच उसके सीने में भारी पत्थर की तरह बैठने लगा। वह दिन-रात बेचैन रहने लगा, उसे नींद आना बंद हो गई। जहाँ भी जाता, उसके दिमाग में बस यही गूँजता कि राजा नकली है! पर जान के डर से वह किसी इंसान से कुछ कह नहीं पा रहा था।


​जब सच का बोझ असहनीय हो गया, तो वह गाँव से दूर एक निर्जन जंगल में चला गया। वहाँ उसने एक विशाल वृक्ष के तने में बने गहरे खोखले (कोटर) के पास जाकर जोर से चिल्लाकर अपने दिल का सारा गुबार निकाल दिया—"हमारा राजा नकली है! इसने असली धर्मात्मा राजा को मारकर उसका मुखौटा पहन रखा है!"

​इतना कहते ही नाई का मन हल्का हो गया और वह अपने घर लौट आया।


​समय बीता। जिस पेड़ के खोखले में नाई ने सच कहा था, वह पेड़ धीरे-धीरे सूख गया। कुछ समय बाद एक संगीतकार उस जंगल से गुज़रा और उसने उसी सूखे पेड़ की लकड़ी से एक सुंदर तबला बनाया।


​जब राजसभा में एक बड़ा उत्सव हुआ, तो उस संगीतकार को तबला बजाने के लिए आमंत्रित किया गया। जैसे ही संगीतकार ने तबले पर अपनी थाप दी, तबले की आवाज़ से संगीत के बजाय एक स्पष्ट बोल गूँजने लगा—

​"राजा नकली है! असली राजा मारा गया! यह हत्यारा मुखौटा पहनकर राज कर रहा है!"

​दरबार में मौजूद सभी लोग और पूरी प्रजा यह सुनकर स्तब्ध रह गए। तबले की आवाज़ ने राजा के डर के साम्राज्य को झकझोर कर रख दिया। मामले की तुरंत निष्पक्ष जाँच बैठाई गई और नाई समेत अन्य गवाहों ने सच उगल दिया। छल का पर्दाफाश हुआ, नकली राजा को उसके कुकर्मों की सजा मिली और राज्य को अन्याय से मुक्ति मिली।


*​कहानी का सार (बोलने की महत्ता)*


​यह कहानी इस बात की प्रत्यक्ष प्रमाण है कि अन्याय और असत्य की सबसे बड़ी ताकत इंसान का 'मौन' और उसका 'डर' है।


​बुराई को बढ़ावा: जब हम सच जानते हुए भी डर के मारे चुप रहते हैं, तो हम अनजाने में बुराई के हाथ मजबूत कर रहे होते हैं।


​सत्य का स्वभाव: सच कभी दबता नहीं। आप उसे कितना भी दबाने की कोशिश करें, वह किसी न किसी माध्यम से बाहर आ ही जाता है—चाहे वह एक सूखे पेड़ से बना तबला ही क्यों न हो।


​आवाज़ उठाने का कर्तव्य: यदि दुनिया में अच्छी व्यवस्था स्थापित करनी है और गलत करने वालों को उनके कर्मों का फल दिलाना है, तो बोलना ही होगा। सच बोलने के लिए भीड़ की ज़रूरत नहीं होती; आपकी अकेली आवाज़ भी अन्याय की नीव हिलाने के लिए काफ़ी है।

​डरो मत, बोलो—क्योंकि आपके बोलने से ही बदलाव की शुरुआत होती है।


​संकलनकर्ता: जीतेंद्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कलजुग म घलो आबे कान्हा ----------------------------------------

 कलजुग म घलो आबे कान्हा

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स्वारथ म  रक्सा  बनके मनखे,

सिधवा गोप-गुवाल ल मारत हे।

कालीदाह   के   कालिया   नाग,

गली - गली   म    फुस्कारत हे।

बरसत हे ईरसा-दुवेस लड़ई-झगरा,

मया  के  गोवरधन उठाबे कान्हा।।

कलजुग  म  घलो  आबे   कान्हा।।


देवकी-बसदेव  ल  का  किबे,

जसोदा-नन्द  घलो  रोवत  हे।

कहाँ बाजे बंसुरी,कती रचे रास?

घर - घर  महाभारत  होवत   हे।

सड़क डहर म बइठे हे तोर गईया,

मधुबन म ले जाके चराबे कान्हा।

कलजुग  म  घलो आबे   कान्हा।


दूध - दही  ले  दुरिहाके  मनखे,

मन्द - मऊहा   म  डूब   गे  हे।

अलिन-गलिन म  सोवा  परे हे,

कदम  के  रुखवा  टूट  गे  हे।

घेंच म बांधे घूमे भरस्टाचार के हांड़ी,

आके  दही  लूट  देखादे  कान्हा।

कलजुग  म  घलो  आबे  कान्हा।


            जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                बाल्को(कोरबा)