Sunday, 29 March 2026

टीबी रोग- दोहा छंद

 टीबी रोग- दोहा छंद


बड़का बड़का रोग के, हवै दवाई आज।

घबराये मा नइ बने, करवावव ईलाज।।1


टीबी के लक्षण दिखे, डॉक्टर ला देखाव।

बेरा मा खाके दवा, झट बढ़िया हो जाव।।2


साँस फुले बाढ़े दरद, बिकट पछीना आय।

वजन घटे तीपे बदन, टीबी रोग झपाय।।3


खाँसी आथे रोज के, लहू घलो दिख जाय।

अँकड़े जकड़े तन बदन, जी मचले घबराय।।4


खाँसे छीके अउ छुये, मा फइले ये रोग।

जेन सावधानी रखें, पाये सुख संजोग।।5


इम्यूनिटी शरीर के, होथे जब कमजोर।

टीबी के बैक्टीरिया, दै तन ला झकझोर।।6


जेन छुपाये तेन हा, खुद बर काल बुलाय।

लक्षण देखत करँय दवा, समझदार उहि आय।।7


होय फेफली फेफड़ा, धूम्रपान दव त्याग।

बीड़ी अउ सिगरेट ए, तन बर बिखहर नाग।।8


खाना खावव ताकती, हरा साग फल फूल।

रखव सफाई सब तिरन, इहि सेहत के मूल।।9


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


24 मार्च विश्व टीबी दिवस

Sunday, 22 March 2026

महतारी-लावणी छंद

 महतारी-लावणी छंद


मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।

मया लुटाथे बेसुध होके, अवतारी उपकारी ए।।


मया कतिक होथे माई के, तउल सके नइ कोनों हा।

कलम काय गुण बरनन सकही, नइ सकैं धरा नभ दोनों हा।।

महतारी देवी धरती के, सगरो जगत पुजारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


नइ पनपे ये जग मा जिनगी, मया बिना महतारी के 

जतन लोग लइका के करथे, तज सुख दुनियादारी के।।

महतारी ए खान मया के, बाकी सब बैपारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


मया पाय बर महतारी के, देवन तक तरसत रहिथे।

मुख मा लोरी अँचरा ओली, गोरस गंगा कस बहिथे।।

लड़ जाथे लइकन बर सब ले, ज्वाला ए चिंगारी ए।

मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 20 March 2026

चइत नवरात्री अउ हिन्दू नव बछर के गाड़ा गाड़ा बधाई आगे आगे नवा साल

 चइत नवरात्री अउ हिन्दू नव बछर के गाड़ा गाड़ा बधाई


नवा साल-गीत


ये नवा साल मा का हे नवा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


चैत अँजोरी एक्कम, दाई पधारे हे।

माता के भक्ति मा, गूँजत घर द्वारे हे।।

सब माँ ला मनाएँ, जस गा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


जम्बूद्वीप के जामुन, नवा सजे हे।

उल्हवा निमवा मा, फूल लदे हे।।

नाचे रुख राई, फूल पात पा।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


सरसो अरसी चना गहूँ, घर आवत हे।

पडकी परेवना मन झूम झूम गावत हें।।

जाड़ घाम के नइहे पता।

मैं बतावत हँव, आ संगी आ।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)




आगे आगे नवा साल 


आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।

डारा  पाना  गीत   गाये,पुरवाही  मा  हाल।


पबरित महीना हे,एक्कम  चैत अँजोरी के।

दिखे चक ले भुइँया हा,रंग लगे हे होरी के।

माता रानी आये हे,रिगबिग बरत हे जोती।

घन्टा शंख बाजत हे,संझा बिहना होती।

मुख  मा  जयकार  हवे ,तिलक  हवे  भाल।

आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


नवा  नवा  पाना  मा,रूख  राई नाचत हे।

परसा फुलके लाली,रहिरहि के हाँसत हे।

कउहा अउ मउहा हा इत्तर लगाये हे।

आमा  के  मौर मा छोट फर आये हे।

कोयली  नाचत गावत हे,लहसे आमा डाल।

आगे आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


सोन फूल्ली बेंच बम्भरी,पयरी बेंचे चॉदी के।

मउहा  परसा   पाना  म, पतरी बने मांदी के।

अमली कोकवानी हा,सबला ललचाय।

मन  के  चरत  हावय,छेल्ला गरू गाय।

लइका  मन  नाचत  हे,झनपूछ हाल चाल।

आगे आगे नवा सालआगे आगे नवा साल।


खेत ले घर आगे हे,चना गहूँ सरसो अरसी।

गर्मी  के  दिन आवत  हे,बेंचावत हे करसी।

साग भाजी बारी म,निकलत हे जमके।

दीया  रोज  बरत  हे, गली खोर चमके।

बरतिया मन नाचत हे,दफड़ा दमऊ के ताल।

आगे  आगे नवा साल,आगे आगे नवा साल।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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नवा बछर (सार छंद)


फागुन के  रँग कहाँ हटे हे, कहाँ  घटे हे मस्ती।

नवा बछर धर चैत हबरगे,गूँजय घर बन बस्ती।


चैत  चँदैनी  चंदा  चमकै,चमकै रिगबिग जोती।

नवरात्री के पबरित महिना,लागै जस सुरहोती।

जोत जँवारा  तोरन  तारा,छाये चारों कोती।

झाँझ मँजीरा माँदर बाजै,झरै मया के मोती।

दाई  दुर्गा  के  दर्शन ले,तरगे  कतको  हस्ती।

फागुन के रँग कहाँ हटे हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


कोयलिया बइठे आमा मा,बोले गुरतुर बोली।

परसा  सेम्हर  पेड़  तरी  मा,बने  हवै रंगोली।

साल लीम मा पँढ़री पँढ़री,फूल लगे हे भारी।

नवा  पात धर नाँचत हावै,बाग बगइचा बारी।

खेत खार अउ नदी ताल के,नैन करत हे गस्ती।

फागुन  के रँग कहाँ हटे  हे,कहाँ  घटे हे मस्ती।


बर  खाल्हे  मा  माते पासा, पुरवाही मन भावै।

तेज बढ़ावै सुरुज नरायण,ठंडा जिनिस सुहावै।

अमरे बर आगास गरेरा,रहि रहि के उड़ियावै।

गरती चार चिरौंजी कउहा,मँउहा बड़ ममहावै।

लाल कलिंदर ककड़ी खीरा,होगे हावै सस्ती।

फागुन के रँग कहाँ हटे हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


खेल मदारी नाचा गम्मत,होवै भगवत गीता।

चना गहूँ सरसो घर आगे,खेत खार हे रीता।

चरे  गाय गरुवा मन मनके,घूम घूम के चारा।

बर बिहाव के बाजा बाजै,दमकै गमकै पारा।

चैत अँजोरी नवा साल मा,पार लगे भव कस्ती।

फागुन के रँग  कहाँ  हटे  हे,कहाँ घटे हे मस्ती।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरखिटिया"

बाल्को(कोरबा)


नवरात🐾🐾


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माता रानी के आगे , नवरात  संगी रे।

दाई के पँवरी म , नंवे हे  माथ संगी रे।


बिराजे हे दाई,गाँव गली खोर म,

कुँवार अंजोरी  हे, पाख संगी रे।


झांझ  - मंजीरा ,  मादर   बजत  हे,

जस-सेवा  सेऊक  हे,गात  संगी रे।


बरत हे देवाला,रिगबिग-रिगबिग,

अंगना म लइका,मेछरात संगी रे।


घन्टा अउ संख संग,गुंजत हे आरती,

भरे माड़े  हे परसाद म,परात संगी रे।


संख चक्र गदा धरे,बघवा म बइठे,

धरम ध्वजा दाई,फहरात  संगी रे।


चल   रे  "जीतेन्द्र" , भक्ति   के  रद्दा,

दाई दुर्गा के रहि,मुड़ म हाथ संगी रे।


             जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


              बालको(कोरबा)


              9981441795


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गंगोदक सवैया

देख  नारा  लगे  रात  बारा  बजे जेन  सोये  रही तेन खोही  सदा।

नाचही ताल मा जे नवा साल मा ओखरे नाम मा शान होही सदा।

फोकटे  वो नवा साल फैले नसा  जाल पैसा  सिराही पदोही सदा।

चैत जोती जलाले नवा साल वाले जिया मा खुशी दाइ बोही सदा।


खैरझिटिया

विश्व गौरैय्या दिवस विशेष- दोहा गीत

 विश्व गौरैय्या दिवस विशेष- दोहा गीत


गौरैय्या चिरई हरौं, फुदकत रहिथौं खोर।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


मोर पेट भर जाय बस, दाना  देबे  छीत।

पानी रखबे घाम मा, जिनगी जाहूँ जीत।।

गोटीं मोला मारके, देथस काबर खेद।

भले पड़े या झन पड़े, जी हो जाथे छेद।।

हावय तोरे हाथ मा, ये जिनगी हा मोर।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


दू दाना के आस मा, आथँव बिना बुलाय।

कभू पेट जाथे अघा, कभू रथँव बिन खाय।

जंगल झाड़ी भाय नइ, नइ भाये वीरान।

मनुष देख फुदकत रथँव, मैं पंछी अंजान।।

पानी पुरवा पेड़ मा, बिख जादा झन घोर।।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


बाढ़त हावय ताप हा, बाढ़त हे संताप।

छिन भर मा मर जात हौं, मैंहा अपने आप।

सबदिन मैं फुदकत रहौं, इही हवै बस आस।

गाना गाहूँ तोर बर, छोड़ भूख अउ प्यास।

कुनबा देख सिरात हे, आरो ले ले मोर।।

चींव चींव चहकत रथौं, नाँव लेत मैं तोर।।


जीतेंद्र वर्मा"खैझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


गौरइया


परछी अँगना मा फुदक, मन ला लेवै जीत।

वो गौरइया नइ दिखे, नइ सुनाय अब गीत।।

नइ सुनाय अब गीत, सिरावत हे गौरइया।

मारे पानी घाम, मनुष तक हे हुदरैया।

छागे छत सीमेंट, जिया मा गड़गे बरछी।

उजड़त हे बन बाग, कहाँ हे परवा परछी।।


काँदी पैरा जोड़ के, झाला अपन बनाय।

ठिहा ठौर के तीर मा, गौरइया इतराय।।

गौरइया इतराय, चुगे उड़ उड़ के दाना।

छत छानी मा बैठ, सुनावै गुरतुर गाना।

आही गाही गीत, रखव जल भरके नाँदी।

गौरइया के जात, खोजथे पैरा काँदी।।


दाना पानी छीन के, हावय मनुष मतंग।

बाढ़त स्वारथ देख के, गौरइया हे दंग।।

गौरइया हे दंग, तंग जिनगी ला पाके।

गाके काय सुनाय, मौत के मुँह मा जाके।

छिन छिन सुख अउ चैन, झरे जस पाके पाना।

कहाँ खुशी सुख पाय, कोन ला माँगे दाना।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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कुंडलियाँ


चिरई बइठे हाथ मा,कइसे चूमय गाल।

मनखे मनहा आज तो,बनगे हावै काल।

बनगे हावै काल, हवा पानी ला चुँहके।

मरे पखेड़ू भूख,छिंनय चारा ला मुँह के।

जंगल झाड़ी काट, करत हे मनके तिरई।

काखर कर बतियाय,अपन पीरा ला चिरई।


खैरझिटिया


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गीत-चिरई बर पानी


चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।

गरमी के बेरा आगे, तड़पे जीव परानी।।


जरत हवय चटचट भुइँया, हवा तात तात हे।

मनखे बर हे कूलर पंखा, जीव जंतु लरघात हे।।

रुख राई के जघा बनगे, हमर छत छानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


बिहना आथे चिंवचिंव गाथे, रोथे मँझनी बेरा।

प्यास मा मर खप जाथे, संझा जाय का डेरा।।

काल बनगे जीव जंतु बर, हमर मनमानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


दू बूँद पानी माँगे, दू बीजा दाना।

पेड़ पात बीच रहिथे, बनाके ठिकाना।।

चिरई बिन कहानी कइसे, कही दादी नानी।

चिरई बर मढ़ाबों चल, नाँदी मा पानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


https://youtu.be/KOhYz_btXhQ?si=-9HU9ANTZirSyr_A&sfnsn=wiwspwa

खेती अफीम के-सरसी छंद

 खेती अफीम के-सरसी छंद


धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।

का होही अब छत्तीसगढ़ के, चढ़े करेला नीम।।


गोल्लर पइधे धान खेत मा, हें किसान मजबूर।।

हवे चमाचम बाड़ नसा के, मनखें तक ले दूर।।

पर नइ मारन सके परिंदा, हवें रखे बर टीम।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


बड़े बड़े पहिचान बताके, कतको एकड़ घेर।

सूट पहिर के करे किसानी, इँखरे हावँय बेर।।

दानी धर्मी इहिमन बनगें, लें लें के इस्कीम।।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


काय उगाही का ला खाहीं, कुच्छु समझ नइ आय।

लालच के खेती बाढ़त हे, करम धरम तिरियाय।।

खेती के होही का काली,  दरकत हावय बीम।

धान कटोरा मा उपजत हे, गांजा चरस अफीम।।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको, कोरबा(छग)


लगथे अइसने मा दारू बंद होही। विकल्प आवत हे

घर होना चाही.....

 ......घर होना चाही.....

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मनखे अस त मों मया ल,

फरे हस त गुत्तुर फर होना चाही|


कर मनके;मन ल भाय त,

फेर ऊप्पर वाले के,डर होना चाही|


इतराबे धन के राहत ले,

फेर मरे म नसीब कबर होना चाही|


अत्तीक झन भूला अपनेच म,

दुनिया के घलो खबर होना चाही|


बड़े नई होय कोनो धन-दऊलत ले,

बड़का बने बर छाती जबर होना चाही|


चाहे महल-अटारी;फ्लेट ;बंगला राहय,

फेर वोला सबले पहिली घर होना चाही|


               जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया'

                   बाल्को(कोरबा)

आज फेर कलम धरे हों.......

 ....आज फेर कलम धरे हों.......

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ओखर बर जे दबते जात हे|

ओखरो बर जे तपते जात हे|

जेन नई बोल सके,

अपन मन के भॉखा|

जेन खात हे,

जघा-जघा चॉटा|

कतरो रोवत हे ,

सुसक-सुसक के|

गोड़ तरी चपकाय हे,

मचान म घलो चक के|

दरद ल दिल के,

देखा नई सके|

जेन रॉंधथे रोटी,

फेर खा नई सके|

जुलूम के तॉवा म,

मंहू जरे हों.............|

आज फेर कलम धरे हों||


गिरे-थके हपटे बर|

खोंचका-डिपरा ल खपटे बर|

सुमत के दिया बारे बर|

अंधरा के ऑखी उघारे बर|

बंटाय मया ल जोरे बर|

सुवारथ के सुरता छोरे बर|

सिखाय बर इंसानी बात|

मॉगे बर सबके साथ|

पंवरी म सबके परे हों.........|

अाज फेर कलम धरे हों......|


खा पेटभर; खवा पेटभर|

कखरो रोटी ल,झन नंगा पेटभर|

देखा भुलाय ल रद्दा|

झन खन कखरो बर गढ्ढा|

उजरा ओनहा- कोनहा ल|

सजा दाई सोनहा ल|

कखरो बॉटा ल ,

कोनो ल खान झन दे|

फोकटे नई रोय,

कोनो ल ऑसू बोहान झन दे|

बॉटे म बढ़ते मया,

मंय धरे मया खड़े हों.....|

आज फेर कलम धरे हों...|

              जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                  बाल्को(कोरबा)