Tuesday, 16 June 2026

कुंडलियाँ-भीड़

 कुंडलियाँ-भीड़ 


बाबा मन हा बाप कस, देवत हें उपदेश।

धरम करम ले मुक्ति कहि, होय मनुष मन पेश।

होय मनुष मन पेश, भीड़ के हिस्सा बनके।

भीड़ भाड़ ला देख, चले बाबा मन तनके।।

बिना भीड़ नइ होय, मदीना काशी काबा।

जाति धरम के नाम, सबे कोती हे बाबा।।


झंडा डंडा भीड़ बिन, मान कहाँ ले पाय।

बने बने मा हे बने, गिनहा मा हे बाय।।

गिनहा मा हे बाय, भीड़ हा भेड़ ताय जी।

सहमति साथ विरोध, सबे बर भीड़ आय जी।

मेला नेता खेल, संत राजा का पंडा।

सब ला चाही भीड़, भीड़ हे ता हे झंडा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सब बण्ठाधार होगे

 सब बण्ठाधार होगे


दहीं के जघा कपसा माढ़े हे।

देवता के जघा रक्सा ठाढ़े हे।

दवा अउ दुवा थोरको भी, काम नइ आत हे।

जरूरतमंद के राशनकार्ड म, नाम नइ आत हे।

मिर्चा मिट्ठा होगे, नून जमकरहा झार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।


मार मा झरगेहे, ढोलक तबला के खरवन।

ददा दाई ला तपत हे, आज के सरवन।

नाम के नदियाँ हे, जिहाँ पानी के नाम नही।

कोड़िहा मन काटे फर्जी,कमैया बर काम नही।

घर मा बारी बखरी दबगे, बंजर खेत खार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


मनखे दवा ल मजबूरी मा,अउ दारू ल हाँस के पीयत हे।

कोई जीये बर खात हे, ता कतको खाय बर जीयत हे।

शहर के सताये सर्व सुविधा गाँव खोजत हे।

गाँव के लफरहा, पिज़्ज़ा बर्गर बोजत हे।

हँसिया बसुला भोथरागे,मनखे मन कटार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


भँइसा के भाग म, स्विमिंग पूल हे।

तितली भौरा मरे,माछी बर फूल हे।

बेंदरा बइठे हे, परवा छानी मा।

झगरा फदके हे, जेठानी देरानी मा।

करधन ककनी ले वजनी, झुमका ढार होगे ।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


खजाना वाले, चिख चिख के खात हे।

भुखाय मनखे चीख चीख चिल्लात हे।

बूता के मारे कखरो,माँस नइहे।

ता कखरो तन मा, अमात नइहे।

निच्चट सरहा, नत्ता रिस्ता के तार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


राजा घोड़ा छोड़, गदहा चढ़त हे।

सत स्वाहा होवत हे,बुराई बढ़त हे।

एक दूसर के ला खात हे, ता एक ला दूसर खवात हे।

बने मनखे बीच के,घानी के बइला कस पेरात हे।

बिन लड़े भिड़े, सिपइहा के हार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


मनखे आन लाइन गुलाम होगे।

मोबाइल धरे सुबे ले शाम होगे।।

भीड़ घलो गोठियात नइहे।

नता गोत्ता सुहात नइहे।

रमजत हे घेरी बेरी आँखी अउ बाटा ला।

बुता  सब माड़े हे उरकात हे डाटा ला।

लाइक कमेंट चाहे ते साहित्यकार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सत्ता- कुंडलियाँ

 सत्ता- कुंडलियाँ


सत्ता बदलत देर हे, नइ दे कोनो साथ।

बदल लिही पाला अपन, मान आन ला नाथ।।

मान आन ला नाथ, तोर बर गड्ढा खनही ।

ताज तोरन छोड़, बचे नइ पग के पनही।।

राजनीति के खेल, आय पुरवा अउ पत्ता।

हे तब तक जयकार, हाथ हे जब तक सत्ता।।1


मुद्दा पंथ विचार ना, ना सत सुम्मत आय।

देख ताख के फायदा, नेता मन तिरियाय।।

नेता मन तिरियाय, देख के दल अउ बल ला।

निर्लज बन मुस्काय, भुला के करनी कल ला।।

सत्ता आघू दूम, हलावँय खाकें हुद्दा।

काय मान सम्मान, काय उंखर बर मुद्दा।।2


कुकुर घलो हा जानथे, पालिस पोसिस कोन।

राजनीति के खेल मा, का कौड़ी का सोन।।

का कौड़ी का सोन, मोल नइ चिन्हें सत्ता।

का सग अउ का आन, काम नइ आये नत्ता।।

होवत हे बदनाम, आज के संग कलो हा।

नेता जाथें भूल, चिन्हथे कुकुर घलो हा।।3


खेमा बदलैं हार मा, जीते अधम मचाय।

धरम करम ईमान नइ, उहिमन नेता ताय।।

उहिमन नेता ताय, जेन ला कुछ नइ लागे।

एती ओती होत, अपन धुन मा बस भागे।।

भूला तैं अउ तोर, जियत रहिथें नित में मा।

आयँ घलो नइ लाज, हार मा बदलैं खेमा।।4


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

बाल्को कोरबा(छग)

गत तरिया के (दोहा चौपाई)

 गत तरिया के (दोहा चौपाई)


*तरिया के गत देख के, देथँव मुँह ला फार|*

*एक समय सबझन जिहाँ, लगर नहावै मार|*


*आज हाल बेहाल हे, लिख के काय बताँव।*

*जिवरा थरथर काँपथे, सुन तरिया के नाँव।*


कोन जनी काखर हे बद्दी। तरिया भीतर बड़ हे लद्दी।

सुते ढ़ोड़िहा लामा लामी। धँसे मोंगरी रुदवा बामी।।


तुलमुलाय बड़ मेंढक मछरी। काई मा रचगे हे पचरी।

घोंघा घोंघी जोक जमे हे। सुँतई भीतर जीव रमे हे।


कमल सिंघाड़ा जलकुंभी जड़। पानी उप्पर फइले हे बड़।

उरइ ओगला कुकरी काँदा। लामे हावै जइसे फाँदा।।


टूट गिरे हे बम्हरी डाला। पुरे मेकरा जेमा जाला।

सड़ सड़ मरगे थूहा फुड़हर। सांस आखरी लेय कई जर।


गाद ढेंस चीला हे भारी। नरम कई ता कुछ जस आरी।

जड़ उपजे हे कई किसम के। थकगे हावै पानी थमके।


घाट घठौंदा काँपत हावय। जघा केकड़ा नापत हावय।

तुलमुल तुलमुल करे तलबिया। उफले हे मंजन के डबिया।


भैंसा भैंसी तँउरे नइ अब। मनुष कमल बर दँउड़े नइ अब।

कोन पोखरा जरी निकाले। कोन फोकटे आफत पाले।।


किचकिच किचकिच करे केचुआ। पेट गपागप भरे केछुवा।

चले नाँव कस कीरा करिया। रदखद लागै अब्बड़ तरिया।


बतख कोकडा अउ बनकुकरी। दिखय काखरो नइ अब टुकड़ी।

चिरई चिरगुन डर मा काँपे। मनुष तको कोई नइ झाँके।


*दहरा हे लहरा नही, पानी हे जलरंग।*

*जड़ अउ जल के बीच मा, छिड़े हवै बड़ जंग।।*


*पानी के जस हाल हे, तस फँसगे हे पार।*

*कीरा काँटा काँद धर, पारत हे गोहार।।*


पार तको के हालत बद हे। काँटा काँद उगे रदखद हे।

खजुर केकड़ा चाँटा चाँटी। पार उपर पइधे हे खाँटी।।


बम्हरी बोइर अमली बिरवा। बेला मा ढँकगे हे निरवा।

हवै मोखला गुखरू काँटा। चारो कोती हे बन भाँटा।


सोये जागे आड़ा आड़ी। हवै बेसरम अब्बड़ भारी।

झुँझकुर छँइहा बर पीपर के। सुरुज देव तक भागे डरके।


हले हवा मा झूला बर के। फंदा जइसे सर सर सरके।

मटका पीपर मा झूलत हे। पासा जइसे फर ढूलत हे।


बिच्छी रेंगे डाढ़ा टाँगे। चाबे ते पानी नइ माँगे।।

घिरिया झींगुर उद बनबिल्ली। करे रात दिन चिल्लम चिल्ली।


बिखहर नागिन बिरवा नाँपे। देख नेवला थरथर काँपे।

हे दिंयार मन के घरघुँदिया। सरपट दौड़त हे छैबुँदिया।


घउदे हे बड़ निमवा बुचुवा। भिदभिद भिदभिद भागे मुसुवा।

फाँफा चिटरा मुड़ी हलाये। घर खुसरा घुघवा नरियाये।।


भूत प्रेत के लागे माड़ा। कुकुर कोलिहा चुँहके हाड़ा।

डर मा कतको मनुष मरे हे। कतको कइथे जीव परे हे।


देख जुड़ा जावै नस नाड़ी। पार उपर के झुँझकुर झाड़ी।

काल ताल मा डारे डेरा। नइ लगाय मनखे मन फेरा।


*मन्दिर तरिया पार के, हे खँडहर वीरान।*

*पानी बिन भोला घलो, होगे हे हलकान।*


*तरिया आना छोड़ दिस, जबले मनखे जात।*

*तबले खुशी मनात हे, जींव जंतु जर पात।।*


मनखे के नइ पाँव पड़त हे। जींव जंतु जर पेड़ बढ़त हे।

मछरी मेढक बड़ मोटावै। कछुवा पथरा तरी उँघावै।।


करे साँप हा सलमिल सलमिल। हांसे कमल बिहनिया ले खिल।

पेड़ पात घउदत हे भारी। पटय सबे के सब सँग तारी।


रंग रंग के फुलवा महके। चिरई चिरगुन चिंव चिंव चहके।

खड़े पेड़ सब मुड़ी नँवाके, गूँजै सरसर गीत हवा के।


तिरथ बरोबर राहय तरिया। नाहै जिहाँ गोरिया करिया।

बइला भैसा मनखे बूड़े। दया मया सब उप्पर घूरे।।


दार चुरे तरिया पानी मा। राहै शामिल जिनगानी मा।

करे सबो झन दतुन मुखारी। नाहै धोवै ओरी पारी।


घाम घरी दुबला हो जावै। बरसा पानी पी मोटावै।

लहरा गावै गुरतुर गाना। मछरी कस तँउरे बर पाना।


सुबे शाम डुबके लइका मन। तन सँग मन तक होवै पावन।

छोटे बड़े सबे झन नाहै। तरिया के सुख सब झन चाहै।


अब होगे घर मा बोरिंग नल। चौबिस घण्टा निकलत हे जल।

आगे हे अब नवा जमाना। नाहै घर मा दादा नाना।


हाँसय सब सुख सुविधा धरके। मनखे मन अब होगे घर के।

शहर लहुटगे गाँव जिहाँ के। हाल अइसने हवै तिहाँ के।।


मनखें बिन कई ताल बढ़त हें। जीव जंतु नव आस गढ़त हें।

ता कतको ठन रोयँ पटाके। मनखें के स्वारथ मा आके।।


*नेता मन जुरियाय हें, देख ताल के हाल।*

*तरिया ला सुघराय बर, फेकत हावै जाल।*


*जीव जंतु मरही गजब, कटही कतको पेड़।*

*हो जाही क्रांकीट के, घाट घठौदा मेड।।*


*सुंदरता जब के नाम मा, मनखे करही राज।*

*बिन मनखें झुमरत हवैं, पेड़ पात मन आज।*


नदी ताल बन नाँचथें, जब मनखें दुरिहाय।

फकत मनुष के जात, पर्यावरण मताय।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

स्कूल जाबों-लावणी छंद

 स्कूल जाबों-लावणी छंद


गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।

घण्टी तख्ता कुर्सी टेबल, आँखी आघू झूलत हे।।


खाना पानी पुस्तक कॉपी, सब हियाव कर धरना हे।

खेल कूद अब कमती करके,पढ़ई लिखई करना हे।।

भारी भरकम बस्ता हावय, साँस देख के फूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


बनही कतको झन स्कूल म, नवा नवा संगी साथी।

सबो किसम के ज्ञान ल पाबों, नइ छूटे माँछी हाथी।।

जघा जघा स्कूल खुले ले, अँधियारी पट धूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


पढ़बों लिखबों आघू बढ़बों, देखे सपना सिरजाबों।।

पढ़े लिखे के मोल गजब हे, पढ़ लिख ज्ञानी कहिलाबों।।

पढ़े लिखे ते छुवै अगासे, पढ़े नही ते ढूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)