Saturday, 24 January 2026

सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा

 सोसल मीडिया अउ साहित्य लेखन-जीतेन्द्र वर्मा


       आज माँदी भात के कोनो पुछारी नइहे, मनखे बफे सिस्टम कोती भागत हे। जिहाँ के साज-सज्जा अउ आनी बानी के मेवा मिष्ठान, खान पान के भारी चरचा घलो चलथे। भले मनखे कहि देथे, कि पंगत म बैठ के खवई म ही आदमी मनके मन ह अघाथे, फेर आखिर म उहू बफे कोती खींचा जथे। मनखे के मन ला कोन देखे हे, आज तन के पहिरे कपड़ा मन के मैल ल तोप देथे। आज कोट अउ सूटबूट के जमाना हे, ओखरे पुछारी घलो हे ,चिरहा फटहा(उज्जर मन) ल कोन पूछत हे। अइसने बफे सिस्टम आय साहित्य अउ साहित्यकार बर सोसल मीडिया। भले अंतस झन अघाय पर पेट तो भरत हे, भले खर्चा होवत हे, पर चर्चा घलो तो होवत हे। कलम कॉपी माँदी बरोबर मिटकाय पड़े हे। 


         सोसल मीडिया के आय ले अउ छाय ले ही पता लगिस कि फलाना घलो कवि, लेखक ए। जुन्ना जमाना के कतको लेखक जे पाठ, पुस्तक, मंच अउ प्रपंच ले दुरिहा सिरिफ साहित्य सेवा करिस, ओला आज कतकोन मन नइ जाने। अउ उँखर लिखे एको पन्ना घलो नइ मिले। फेर ये नवा जमाना म सोसल मीडिया के फइले जाला जमे जमाना ल छिन भर म जनवा देवत हे कि फलाना घलो साहित्यकार ए, अउ ए ओखर रचना। सोसल मीडिया ,साहित्य कार के जरूरत ल चुटकी बजावत पूरा कर देवत हे, कोनो विषय , वस्तु के जानकारी झट ले दे देवत हे, जेखर ले साहित्यकार मन ल कुछु भी चीज लिखे अउ पढ़े  म कोनो दिक्कत नइ होवत हे। पहली  प्रकृति के सुकुमार कवि पंत के रचना ल पढ़ना रहय त पुस्तक घर या फेर पुस्तक खरीद के पढ़े बर लगे, फेर आज तो पंत लिखत देरी हे, ताहन पंत जी के जम्मो गीत कविता आँखी के आघू म दिख जथे। 


             सोसल मीडिया ल बउरना घलो सहज हे, *न कॉपी न पेन-लिख जेन लिखना हे तेन।* शुरू शुरू म थोरिक लिखे पढ़े म अटपटा लगथे ताहन बाद म आदत बनिस, ताहन छूटे घलो नही। सोसल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ साहित्यकार मन भर बर नही,सब बर उपयोगी हे। गूगल देवता बड़ ज्ञानी हे, उँखर कृपा सब उपर बरसत रइथे, बसरते माँग अउ उपयोग के माध्यम सही होय। आज साहित्यकार मन अपन रचना ल कोनो भी कर भेज सकत हे, अपन रचना ल कोनो ल भी देखाके सुधार कर सकत हे। पेपर  अउ पुस्तक म छपाय के काम घलो ये माध्यम ले सहज, सरल अउ जल्दी हो जावत हे। आय जाय के झंझट घलो नइहे। सोसल मीडिया म कोनो भी चीज जतेक जल्दी चढ़थे ,ओतके जल्दी उतरथे घलो, येखर कारण हे मनखे मनके बाहरी लगाव, अन्तस् ल आनंद देय म सोसल मीडिया आजो असफल हे। कोरोनच काल म देख ले रंग रंग के मनखे जोड़े के उदिम आइस, आखिर म सब ठंडा होगे। चाहे कविता बर मंच होय या फेर मेल मिलाप, चिट्ठी पाती अउ बातचीत के मीडिया समूह। पहली कोनो भी सम्मान पत्र के भारी मान अउ माँग रहय फेर ये कोरोना काल के दौरान अइसे लगिस कि सम्मान पत्र फोकटे आय। कोनो भी चीज के अति अंत के कारण बनथे, इही होवत घलो हे सोसल मीडिया म। सोसल मीडिया म सबे मनखे पात्र भर नही बल्कि सुपात्र हे, तभे तो कुछु होय ताहन ,जान दे तारीफ। *वाह, गजब, उम्दा, बेहतरीन जइसे कतको शब्द म सोसल मीडिया के तकिया कलाम बन गेहे।* सब ल अपन बड़ाई भाथे, आलोचना आज कोनो ल नइ रास आवत हे। मनखे घलो दुरिहा म रहिगे कखरो का कमी निकाले, तेखर ले अच्छा वाह, आह कर देवत हे। सात समुंद पार बधाई जावत हे, हैपी बर्थ डे, हैपी न्यू इयर,  हैपी फादर्स डे,हैपी फलाना डे। फेर उही हैपी फादर्स डे या मदर डे लिखइया मन ददा दाई ल मिल के बधाई , पायलागि नइ कर पावत हे, सिर्फ सोसल मीडिया म दाई, ददा, बाई, भाई, संगी साथी के मया दिखथे, फेर असल म दुरिहाय हे। अइसे घलो नइहे कि सबेच मन इही ढर्रा म चलत हे, कई मन असल म घलो अपनाय हे।


       सोसल मीडिया हाथी के खाय के दाँत नइ होके दिखाय के दाँत होगे हे। जम्मो छोटे बड़े मनखे येमा बरोबर रमे हे। सोसल मीडिया साहित्यकार मन बर वरदान साबित होइस। लिख दे, गा दे अउ फेसबुक वाट्सअप म चिपका दे। नाम, दाम ल घलो सोसल मीडिया तय कर देवत हे। सोसल मीडिया म जतका लिखे जावत हे, ओतका पढ़े नइ जावत हे, ते साहित्य जगत बर बने नइहे। ज्ञान ही जुबान बनथे, बिन ज्ञान के बोलना या लिखना जादा  प्रभावी नइ रहे। सोसल मीडिया के उपयोग ल साहित्यकार मन नइ करत हे, बल्कि सोसल मीडिया के उपयोग साहित्यकार मन खुद ल साबित करे बर करत हे, खुद ल देखाय बर करत हे। कुछु भी पठो के वाहवाही पाय के चाह बाढ़ गेहे। कुछु मन तो कॉपी पेस्ट म घलो मगन हे, बस पठोये विषय वस्तु ल इती उती बगराये म लगे हे, वो भी बिन पढ़े। कॉपी पेस्ट म सही रचनाकार के नाम ल घलो कई झन मेटा देवत हे। सोसल मीडिया सहज, सरल, कम लागत अउ त्वरित काम करइया प्लेटफार्म आय, जे साहित्य, समाज, ज्ञान ,विज्ञान के साथ साथ  दुर्लभ जइसे शब्द ल भी हटा देहे। येखर भरपूर सकारात्मक  उपयोग करना चाही। छंद के छ परिवार सोसल मीडिया के बदौलत 300 ले जादा, प्रदेश भर के साधक मन ल संघेरके 50, 60 ले जादा प्रकार के छंद आजो सिखावत हे। 2016 ले  छंदपरिवार सरलग  छत्तीसगढ़ी साहित्य के मानक रूप म  काम  करत हे। इसने लोकाक्षर, गद्य खजाना,आरुग चौरा, हमर गँवई गाँव अउ कई ठन समूह घलो हे जे येखर सकारात्मक उपयोग करत हे। सोसल मीडिया दिखावा के साधन मात्र झन बने।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा

अमीर ए ना--

 अमीर ए ना--


इज्जत गँवाके वो इज्जत वाला हे, अमीर ए ना।

कोन का कहे सबके मुँह मा ताला हे, अमीर ए ना।


बने करइया मन बन बन भटकत रहिथे रात दिन।

पाये आसन काम जेखर काला हे, अमीर ए ना।।


भगत के पथरा मा पात पानी घलो नइ चढ़त हे।

ओखर देवाला मा भगवान बाला हे, अमीर ए ना।


रोज चढ़थे रोज उतरथे कई किसम के नकाब।

उँहचे मरहम, उँहचे बरछी भाला हे, अमीर ए ना।


पानी मिला पी जथे खून,मनखे होय के गुण हे शून।

गिनाये बर धन दोगानी महल माला हे, अमीर ए ना।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

देस बर जीबो , देस बर मरबों

 देस   बर   जीबो , देस  बर  मरबों

--------------------------------------------

चल माटी के काया ल,हीरा करबों।

देस   बर  जीबो, देस   बर  मरबों।

सिंगार करबों,सोन चिरँइया के।

गुन ल गाबोंन,भारत मइया  के।

सुवारथ के  सुरता ले, दुरिहाके।

धुर्रा चुपर के माथा म,भुँइया के।

घपटे अँधियारी भगाय बर,भभका धरबों।

देस    बर      जीबो, देस    बर     मरबों।


उँच    -  नीच    ल, पाटबोन।

रखवार बन देस ल,राखबोन।

हवा   म      मया ,  घोरबोन।

हिरदे ल हिरदे  ले, जोड़बोन।

चल  दुख - पीरा  ल, मिल  के  हरबों।

देस   बर   जीबों,   देस    बर  मरबों।


मोला गरब - गुमान हे,

ए   भुँइया   ल  पाके।

खड़े   रहूं   मेड़ो   म ,

जबर छाती फइलाके।

फोड़ दुहूँ वो आँखी ल,

जे मोर माटी बर गड़ही।

लड़हूँ  -  मरहूँ  देस बर ,

तभे काया के करजा उतरही।

तँउरबों बुड़ती समुंद म,उग्ति पहाड़

चढ़बों।

चल   देस    बर   जीबो,   देस   बर  

मरबों।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा) 

09981441795

गणतंत्रता दिवस की ढेरों बधाइयाँ

Thursday, 22 January 2026

चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

 बसंत

------------------------------------------

चल बइठबों बसंत म,पीपर तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  -  घरी।


मोहे   मन   मोर   मउरे,मउर आमा के।

मधूबन कस लागे,मोला ठउर आमा के।

कोयली   कुहके  ,कूह - कूह   डार  म।

रंग-रंग के फूले हे,परसा-मउहा खार म।

बोइर-बर-बंम्भरी बर,बरदान बने बसंत।

सबो   रितुवन  म , महान  बने   बसंत।

मुड़ नवाये डोले पाना,तरी-तरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी  - घरी।


डोलत हे  जिवरा देख,सरसो  फूल  पिंवरा।

फूल - फर  धरे नाचे ,  राहेर, मसूर, तिवरा।

घमघम  ले   फूले  हे,  अरसी       मसरंगी।

हंरियर गंहूँ-चना बीच,बजाय धनिया सरँगी।

सुहाये  खेत -खार , तरिया - नंदिया कछार।

नाचे  सइगोन-सरई  डार, तेंदु-चिरौंजी-चार।

सुघरई बरनत पिरागे,नरी-नरी।

पूर्वा   गाये   गाना , घरी -घरी।


गोभी-सेमी-बंगाला,निकलत हे बारी म।

रोजेच साग चूरत हे, सबो  के हाँड़ी म।

छेंके  रद्दा रेंगइया ल, हवा अउ बंरोड़ा।

धरे नंगाडा पारा म , फगुवा डारे डोरा।

गाँव लहुटे सहर,अब दुरिहात हे बसंत।

जुन्ना पाना-पतउवा ल,झर्रात हे बसंत।

नवा - नवा  प्रकृति  ल,बनात हे बसंत।

खुदे  रोके;मनखे   बर, गात  हे बसंत।

कर्मा-ददरिया-सुवा,तरी-हरी।

पूर्वा   गाये   गाना ,घरी-घरी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)

 गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।

बिन अमुवा का करे कोयली, कांता हा बिन कंत।।


बिन फुलवा के हावय सुन्ना, मोर जिया के बाग।

आसा के तितली ना भौरा, ना सुवना के राग।।

हे बहार नइ पतझड़ हे बस, अउ हे दुःख अनंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


सनन सनन बोलय पुरवइया, तन मन लेवय जीत।

आय पिया हा हाँसत गावत, धर फागुन के गीत।।

मरत हवौं मैं माँघ मास मा, पठो संदेश तुरंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


देख दिखावा के दुनिया हा, बैरी होगे मोर।

छीन डरिस सुख चैन पिया के, काट मया के डोर।

पुरवा पानी पियत बने ना, आगे बेरा अंत।

आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


अब तो बस अंत नजर आथे, कहाँ अब बसंत नजर आथे।।

माँ सरस्वती पूजा अउ बसंत पंचमी के सादर बधाई

 माँ सरस्वती पूजा अउ बसंत पंचमी के सादर बधाई


वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)


दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।

गुण गियान यश धन बल बाढ़ै,बाढ़ै झन अभिमान।


तोर कृपा नित होवत राहय, होय कलम अउ धार।

बने बात ला पढ़ लिख के मैं, बढ़ा सकौं संस्कार।

मरहम बने कलम हा मोरे, बने कभू झन बान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जेन बुराई ला लिख देवँव, ते हो जावय दूर।

नाम निशान रहे झन दुख के, सुख छाये भरपूर।

आशा अउ विस्वास जगावँव, छेड़ँव गुरतुर तान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


मोर लेखनी मया बढ़ावै, पीरा के गल रेत।

झगड़ा झंझट अधम करइया, पढ़के होय सचेत।

कलम चले निर्माण करे बर, लाये नवा बिहान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


अपन लेखनी के दम मा मैं, जोड़ सकौं संसार।

इरखा द्वेष दरद दुरिहाके, टार सकौं अँधियार।

जिया लमाके पढ़ै सबो झन, सुनै लगाके कान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


सुभगति छंद-शारद मां


दे ज्ञान माँ।वरदान माँ।

भव तारदे।माँ शारदे।


आनन्द दे।सुर छंद दे।

गुण ज्ञान दे।सम्मान दे।


सुख गीत दे।सत मीत दे।

सुरतान दे।अरमान दे।


दुख क्लेश ला।लत द्वेश ला।

दुरिहा भगा।सतगुण जगा।।


जोती जला।दे गुण कला।

माथा नवा।माँगौ दवा।


चढ़ हंस मा।सुभ अंस मा।

आ द्वार मा।भुज चार मा।


दुरिहा बला।अवगुण जला।

बिगड़ी बना।सतगुण जना।


वीणा सुना।मैं हँव उना।

पैंया परौं।अरजी करौं।


सद रीत दे।अउ जीत दे।

सत वार दे।माँ शारदे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


दोहा गीत- माँ शारदे


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।

तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।


तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।

तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।

रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।

मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।

वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।

प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।

दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


जय माँ शारदे, बसन्त पंचमी की सादर बधाइयाँ


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

दोहा


पिंयर पिंयर सरसो फुले,देखत मन हर्षाय।

सनन सनन पुरवा चले,सरग पार नइ पाय।


खैरझिटिया

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


रितु बसंत(रोला छंद)


गावय  गीत बसंत,हवा मा नाचे डारा।

फगुवा राग सुनाय,मगन हे पारा पारा।

करे  पपीहा  शोर,कोयली  कुहकी पारे।

रितु बसंत जब आय,मया के दीया बारे।


बखरी  बारी   ओढ़,खड़े  हे  लुगरा  हरियर।

नँदिया नरवा नीर,दिखत हे फरियर फरियर।

बिहना जाड़ जनाय,बियापे  मँझनी बेरा।

अमली बोइर  आम,तीर लइकन के डेरा।


रंग  रंग  के साग,कढ़ाई  मा ममहाये।

दार भात हे तात,बने उपरहा खवाये।

धनिया  मिरी पताल,नून बासी मिल जाये।

खावय अँगरी चाँट,जिया जाँ घलो अघाये।


हाँस हाँस के खेल,लोग लइका मन खेले।

मटर  चिरौंजी  चार,टोर  के मनभर झेले।

आमा  अमली  डार, बाँध  के  झूला  झूलय।

किसम किसम के फूल,बाग बारी मा फूलय।


धनिया चना मसूर,देख के मन भर जावय।

खन खन करे रहेर,हवा सँग नाचय गावय।

हवे  उतेरा  खार, लाखड़ी  सरसो अरसी।

घाम घरी बर देख,बने कुम्हरा घर करसी।


मुसुर मुसुर मुस्काय,लाल परसा हा फुलके।

सेम्हर हाथ हलाय,मगन हो मन भर झुलके।

पीयँर  पीयँर   पात,झरे  पुरवा जब आये।

मगन जिया हो जाय,गीत पंछी जब गाये।


माँघ पंचमी होय,शारदा माँ के पूजा।

कहाँ पार पा पाय,महीना कोई दूजा।

ढोल नँगाड़ा झाँझ,आज ले बाजन लागे।

आगे  मास बसन्त,सबे कोती सुख छागे।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छ्ग)


        💐💐💐💐

उही आम आदमी ए।

 उही आम आदमी ए।


करजा लेके मूड़ नवाय हे, उही आम आदमी ए।

थारी चाँट खाना खाय हे, उही आम आदमी ए।।


ना बन सकिस इती के, ना बन सकिस उती के।

बड़े छोट बीच बोजाय हे, उही आम आदमी ए।।


छोट मोट नवकरी धर, नित नवके चलत हे।

सबके नजर मा आय हे, उही आम आदमी ए।


नियम कानून मानथे, मानथे मान मर्यादा।

बात बात मा घबराय हे,उही आम आदमी ए।


देश वेश रीत नीत, सब हावय इंखरेच थेथा।

धन कमाय हे ना गँवाय हे,उही आम आदमी ए।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)