Monday, 21 September 2026

सर्वगामी सवैया

 सर्वगामी सवैया


1,(भोला भण्डारी)
माथा म चंदा जटा जूट गंगा गला मा अरोये हवे साँप माला।
नीला  रचे  कंठ  नैना भये तीन नंदी सवारी धरे हाथ भाला।
काया लगे काल छाया सहीं बाघ छाला सजे रूप लागे निराला।
लोटा म पानी रुतो के रिझाले चढ़ा पान पाती ग जाके सिवाला।

2,(गाड़ी सड़क के)
लामे हवे रोड चारों मुड़ा मा लिलागे गली खोर खेती ग बाड़ी।
कोनो अकेल्ला त कोनो चढ़े चार मारे ग सेखी धरे देख गाड़ी।
आगी लगे  हे  मरे  जी  कुदावै  गिरे  हाथ टूटे  फुटे मूड़ माड़ी।
भोगे सजा देख कोनो के कोई कभू तो जुड़ागे जिया हाथ नाड़ी।

3,(ताजा भोजन)
तातेच खाना मिठाये सुहाये बिमारी ल बासी ग खाना ह लाने।
ताजा रहे साग भाजी घलो हा पियौ तात पानी ग रोजेच छाने।
धोवौ बने हाथ खाये के  बेरा म कौरा कभू  पेट जादा न ताने।
खाये  ग  कौरा  पचाये  बने  तेन गा आदमी रोग राई न जाने।

4,(बेटी बिहाव म पानी)
आये बराती खड़े हे मुहाटी म पानी दमोरे करौं का विधाता।
राँधे गढ़े भात बासी म पानी पनौती मिहीं हा हरौं का विधाता।
एकेक कौड़ी ल रोजेच जोड़ेव आगी लगा मैं बरौं का विधाता।
सोज्झे गिरे गाज छाती म मोरे तभो फेर आशा धरौं का विधाता।

5,(होली के रंग,डोली मा)
होरा चना के खवाहूँ ग आबे घुमाहूँ सबो खेत डोली ल तोला।
हे  कुंदरा  मेड़  मा बैठ लेबे सुनाहूँ ग पंछी के बोली ल तोला।
टेसू फुले खूब लाली गुलाली दिखाहूँ ग भौंरा के टोली ल तोला।
पूर्वा  बसंती  घलो फाग  गाये खवाहूँ  बने भांग गोली ल तोला।

6,(बने बूता बने बेरा म)
माटी के काया म माया मिलाये ग बूता बने संग साने नही गा।
बूता बड़े हे हवे नाम छोटे दिही काम हा साथ आने नही गा।
टारे बिधाता के लेखा भला कोन होनी बिना होय माने नही गा।
बेरा रहे काम बूता सिराले अमीरी गरीबी ल जाने नही गा।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"के गीतिका छंद

 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"के गीतिका छंद


दाई
तोर अँचरा के तरी मा,घाम हे ना जाड़ वो।
दूध पी मैं तोर दाई,गेंव अतका बाढ़ वो।
तोर पँवरी नित परँव मैं,जे सरग के छाँव वो।
मैं मया ले तोर दाई,झन कभू दुरिहाँव वो।1।

मया
आग इरसा के धरे हस,बोल हे चारी सहीं।
छोड़ के तैं प्रीत फोकट,काटथस आरी सहीं।
काखरो ले तोर काबर,नइ पटे तारी सहीं।
धर मया भर भर मुठा तैं,बाँट देवारी सहीं।2।

जेठ बैसाख
जेठ अउ बैसाख आथे,तब बियापे बेर हा।
का बतावँव बात मनके,घेर लेथे ढेर हा।
झाँझ ताते तात चलथे,चाम जलथे घाम मा।
धार धर झरथे पछीना,नइ लगे मन काम मा।3।

कपूत नहीं सपूत बनो(किरीट सवैया)

 कपूत नहीं सपूत बनो(किरीट सवैया)


देखव ए जुग के लइका मन  हावय  अब्बड़  हे  बदमास ग।
बात कहाँ सुनथे कखरो बस दाँत  निपोरय ओ मन हाँस ग।
मान करे कखरो नइ जानय  होवत हे मति हा  अब नास ग।
संगत साथ घलो बिगड़े बड़ दाइ ददा रखही कइसे आस ग।

पूत सपूत कहूँ मिल जातिस नैन नसीब म काबर रोतिस।
राम सहीं लइका हर होतिस दाइ ददा नइ लाँघन सोतिस।
जानत  होतिस  दाइ ददा तब फोकट बन ला काबर बोतिस।
नाँव बुझावँव वो कुल के तब ओखर भार ला काबर ढोतिस।

आस  धरे  बड़   पालय  पोंसय  पूत  बने  बन  मान  बचावव।
ध्यान रखो ग सदा सुख के दुख के झन जी अब नाच नचावव।
जावत  हावव छोड़ कहाँ घर द्वार सबो मिल साथ बसावव।
लाय हवे जग मा तुँहला भगवान हरे हरे नित माथ नवावव।

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

किसन के मथुरा जाना(मत्तगयंद सवैया)

 किसन के मथुरा जाना(मत्तगयंद सवैया)


आय हवे अकरूर धरे रथ जावत  हे मथुरा ग मुरारी।
मात यशोमति नंद ह रोवय रोवय गाय गरू नर नारी।
बाढ़त हे जमुना जल  हा  जब  नैनन नीर झरे बड़ भारी।
थाम जिया बस नाम पुकारय हाथ धरे सब आरति थारी।

कोन  ददा  अउ  दाइ  भला  अपने  सुत  दे बर  होवय राजी।
जाय चिराय जिया सबके जब छोड़ चले हरि गोकुल ला जी।
गोप  गुवालिन  संग  सखा  सब काहत हावय जावव ना जी।
हाल कहौं कइसे मुख ले  दिखथे बिन जान यशोमति माँ जी।

गोकुल मा नइ गोरस हे अब गाय गरू ह दुहाय नहीं जी।
फूल  गुलाब  न हे कचनार मधूबन हे नइ बाग सहीं जी।
बार तिथी सब हे बिगड़े बिन मोहन रास रचे  न कहीं जी।
जेखर जान निकाल दिही कइसे रइही ग बता न तहीं जी।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

हिजगा(दोहा-चौपाई)

 हिजगा(दोहा-चौपाई)


*हिजगा पारी के कथा,कहत हवँव मैं आज।
कहत कहत मोला घलो,आवत हे बड़ लाज।*

एक ददा के दू हे टूरा,दोनों झन बड़ धरहा छूरा।
पटे नही दोनों के तारी,करें एक दूसर के चारी।।

एक मंगलू एक छगन हे,अपन अपन मा दुनों मगन हे
एके हे घर बखरी बारी,करे काम बस हिजगा पारी।।

फ्रीज रेडियो मोटर गाड़ी,लेवय दोनों हिजगा पारी।
जइसन करनी करे एक झन,तइसन होवै दूसर के मन।

उँखर समझ आये ना  चक्कर,दोनों मा काँटा के टक्कर।
करे गरब बड़ हाड़ मास मा,चारी होवय आस पास मा।

बर बिहाव का मरनी हरनी,एके रहै दुनों के करनी।
ओढ़े देखावा के चोला,लेवय बारुद अउ बम गोला।

देखावा मा पइसा फेके, लड़े भिड़े बर रोजे टेके।
मान गौन सँग धन अउ दउलत,हिजगा पारी मा हे पउलत।

मन मा रखके हिजगा पारी,देय एक दूसर ला गारी।
ददा धरे सिर दुखी मनाये, कोन दुनों झन ला समझाये।

तड़फै कभू ददा पसिया बर,कभू खाय अड़बड़ टठिया भर।
कभू झुलावै दुनों हिंडोला,कभू गिरावय दुख के गोला।

हरहर कटकट रोजे ताये,देख ददा दुख प्राण गँवाये।
तभो दुनों ना हिजगा छोड़े,कुवाँ एक दूसर बर कोड़े।

*परलोकी दाई ददा,रिस्ता नत्ता तोड़।
हिजगा पारी मा तिरै, भाई भाई गोड़।*

धन अउ धान सबे झट उरके,दुनों एक दूसर ले कुड़के।
लड़े भिड़े जादा अउ खुल के,बोरों दोनों नाँव ल कुल के।

लइका मन मा अवगुण आये,देख दुनों झन दुखी मनाये।
खुदे बार डारिस हे घर ला,का बद्दी दे पाही पर ला।

लइका मन हा बनगे लावा,अब का चिंता अउ पछतावा।
करे काम ला मातु पिता के,जोरे लकड़ी उँखर चिता के।

हिजगा पारी काय काम के,घर बन बारे द्वेष थाम के।
सुख ले जिनगी जीना चाही,मया पिरित सत पीना चाही।

हिजगा पारी के बीमारी,अच्छा नोहे जी सँगवारी।
छोडों झगड़ा झंझट चारी,दया मया धर बध लौ यारी।

छगन मंगलू झन होवव जी,इरसा द्वेष म झन खोवव जी।
चारी  चुगली  द्वेष  लबारी,छोड़व भैया हिजगा पारी।

*हिजगा पारी ला  धरे,जेन जेन अँटियाय।
तेखर नइया एक दिन,बीच धार बुड़ जाय।*

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
9981441795

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पुतना वध(दुर्मिल सवैया)

 पुतना वध(दुर्मिल सवैया)

किसना घर जावव मार गिरावव कंस कहे सुन हे पुतना।
कहना सुन के पुतना कइथे झट जावत हौं किसना ग कना।
पुतना रँग रूप बनेच बनाय बढ़े स्तन ला बिष मा ग सना।
पुतना ललना ल धरे किंजरे ग तभो नइ मात करे ग मना।

चुपचाप धरे पुतना ललना उड़ गोकुल बाहिर जावत हे।
छतिया म लगाय हवे बइरी अउ गोरस देख पियावत हे।
स्तन मोहन चाब दिये तब वो पुतना बइरी बगियावत हे।
हरहूँ झट मोहन प्राण कही अपने सँच भेस म आवत हे।

कटरे बड़ दाँत नटेर ग देखय मार सके नइ मोहन ला।
छिन मा बढ़के गरजे बरसे छिन छोट करे अपने तन ला।
सब देख हवे बड़ ब्याकुल गा पुतना सँग मोहन के रण ला।
बलराम कहे बस धीर धरौं सब बाँध रखौ  अपने मन ला।

पुतना बिलखे बड़ रोवत हे जब मार पड़े मुटका
जमके।
मरके तरगे मनमोहन हाथ म भाग ह ओखर गा चमके।
सब गोकुल के जन देखत हे सँग देखय नीर हवा थमके।
अवतार हरे हरि के किसना गुणगान करौं ग सबो रमके।

ललना ल लगाय हवे छतिया मइया खुश हो बड़ रोवत हे।
प्रभु खेल करे सबके मन भावय मीत मया जग मोवत हे।
अटके भटके नइया सबके तब खेवन हार ह खोवत हे।
बरसा करथे सुर फूल धरे जयकार सबो खुँट होवत हे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को (कोरबा)

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" के जयकारी छंद(जनउला)

 जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" के जयकारी छंद(जनउला)


जड़काला मा जे मन भाय,गरमी घरी अबड़  रोवाय।
बरसा भर जे फिरे लुकाय,ओखर बता नाम का आय।1

हावय जेखर दू ठन गोड़,बइठे बबा पालथी मोड़।
गोड़ तिरइया के हे चार,भागे जेहा खारे खार।2।

घर भीतर हे सीटी मार,बइठे धरे भात अउ दार।
कोनो नइ ओला खिसियाय,हेर हेर के सब झन खाय।3

आघू मा बइठे रोवाय,नइ खावय वो तभो खवाय।
कान धरे अउ अबड़ घुमाय,काम होय सब छोड़ भगाय।4।

हाँड़ी के सबदिन आधार,खाये सब झन भूँज बघार।
रंग भूरवा रहिथे गोल,राजा हरे नाम दे बोल।5।

महतारी मन पोंसय साँप,बाढ़य ता खुश होवय नाँप।
तेल फूल अउ साबुन खाय,कनिहा उप्पर चढ़ मटकाय।6।

चार गोड़िया बोझा ढोय,उप्पर दुई गोड़िया सोय।
घर भीतर मा डेरा डाल,लादे कथरी चद्दर साल।7।

साबुन राख लगावै नाँच,तापय नहा खोर के आँच।
धनिया मिरी तेल अउ नून,माँगय पर बर दूनो जून।8।
जवाब-1)घाम,2)गाड़ा,3)कुकर,4)जाँता,5)आलू, 6)बेनी,7)खटिया,8)कढ़ाई