Thursday, 23 July 2026

कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद

 कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद


कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।

हालत हो जाथे जब  खस्ता, तब पड़थे कदम उठाना।।


सिस्टम के टँगरी टूटत हे, विधि विधान नइहे एको।

होवत हवै हियाव धनी के, बाकी मनखें ला फेको।

सत्ता अउ शासन के बूता,  हाँ में हाँ हवैं मिलाना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


नांगर छोड़ किसान खड़े हें, अउ जांगर छोड़ कमैया।

स्कूल छोड़ के खड़े पढ़इया, डूबय मजदूरी नैया।।

फेरी वाले छेरी वाले, खावत हें रहि रहि ताना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


गाड़ी रोवय हाँड़ी रोवय, रोवय टपरी घर ठेला।

अस्पताल दफ्तर बन रोवय, गुरू संग रोवँय चेला।।

कलम धरइया आस बढ़ैया, सबके मुख में हें ताला।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Tuesday, 21 July 2026

आखिर क्यो मनाए जाते हैं,सावन भादो में ही अधिकतर त्यौहार?

 आखिर क्यो मनाए जाते हैं,सावन भादो में ही अधिकतर त्यौहार?


*सावन-भादो के व्रत-त्योहार: छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, नारी शक्ति और स्वास्थ्य चेतना*


छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति में कृषि परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहाँ का प्रत्येक व्रत-त्योहार, संस्कृति-संस्कार और पारंपरिक परंपराएँ कहीं न कहीं कृषि से गहराई से जुड़ी होती  हैं। धान की भरपूर उपज के कारण छत्तीसगढ़ राज्य को *‘धान का कटोरा’* कहा जाता है, और यहाँ मनाए जाने वाले अधिकांश पर्व धान की बुवाई या कटाई से संबंधित होते हैं, जैसे—अक्ति, जुड़वास, सवनाही, इतवारी, सम्मारी, हरेली, भोजली, पोला, नवाखाई, छेराछेरा और मेला मड़ाई। अन्य व्रत-त्योहार भी इसी कृषि चक्र से प्रेरित हैं, जो कृषक जीवन की लय और श्रम की गति को संतुलित करते हैं।


छत्तीसगढ़ की संस्कृति में व्रत और त्योहारों का स्थान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना, स्वास्थ्य चेतना और कृषक जीवन की आवश्यकताओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। एक रोचक तथ्य यह है कि वर्ष भर में मनाए जाने वाले अधिकांश प्रमुख त्योहार सावन और भादो मास में ही केंद्रित होते हैं। यह विचारणीय है कि इन्हीं दो महीनों में व्रत-त्योहारों की इतनी अधिकता क्यों होती है, जबकि इन्हें पूरे वर्ष में वितरित किया जा सकता था। इसका उत्तर छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, मौसमी परिस्थितियों और सामाजिक जीवन की संरचना में छिपा है।


इन महीनों के त्योहारों की एक विशेषता यह है कि इनमें व्रत आधारित पर्वों की संख्या अधिक होती है। *सावन सोमवारी, हरियाली, हरियाली तीज, पोला, कमरछठ, हलछष्ठी, नागपंचमी, ऋषि पंचमी, राखी,भोजली, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी* जैसे पर्व इसी समय मनाए जाते हैं। इन पर्वों में स्त्रियों-पुरुषों की समान भागीदारी रहती है, परंतु आयोजन और परंपरा का निर्वहन मुख्यतः महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। सावन सोमवारी, कमरछठ, हलछष्ठी,भोजली और तीज जैसे व्रत तो पूर्णतः महिलाओं द्वारा ही किए जाते हैं। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन है, बल्कि महिलाओं के सामाजिक नेतृत्व, सामूहिक सहभागिता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का भी प्रतीक है।


इन त्यौहारों के अलावा छत्तीसगढ़ में आदि काल से ही ग्राम-घर, खेती-किसानी की सुरक्षा और श्रमिकों को विश्राम देने के उद्देश्य से सप्ताह में एक दिन को पर्व के रूप में मनाने की परंपरा रही है। इसे विभिन्न गाँवों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है—जैसे इतवारी, बुधवारी, गुरुवारी आदि। इन पर्वों के दिन खेतों में कार्य नहीं किया जाता, जिससे कृषकों को मानसिक और शारीरिक विश्राम मिलता है। यह परंपरा सावन-भादो में विशेष रूप से प्रचलित है, जब खेतों में निंदाई-चलाई व रोपाई जैसे कार्य पूरे जोर पर होते हैं, और महिलाएँ कीचड़-भरे खेतों में दिनभर श्रम करती हैं। जिससे उनके हाथ व पैर पानी व कीचड़ के सम्पर्क में गलने लगते हैं। साथ ही लगातार बारिश में भी रहना होता है। ऐसे में यह पर्व उन्हें विश्राम और पुनर्नव ऊर्जा प्रदान करते हैं।


वर्षा ऋतु के चार महीने—सावन, भादो, आश्विन और कार्तिक—को चौमासा कहा जाता है। इस काल में वातावरण में अत्यधिक नमी, जलभराव, कीचड़ और जीवाणुओं की सक्रियता रहती है। परिणामस्वरूप पाचन क्षमता कमजोर हो जाती है और पेट, नाक, कान और गले से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। हमारे पूर्वजों ने इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए व्रत-उपवास की परंपरा को जन्म दिया। और इन्ही चार महीनों में अधिकतर व्रत वाले त्यौहार होते हैं। उपवास के माध्यम से शरीर को विश्राम मिलता है, आहार पर नियंत्रण से स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है, और रोगों से बचाव संभव होता है। यह परंपरा न केवल शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी है, बल्कि मानसिक संतुलन और आत्मसंयम का अभ्यास भी कराती है।


सावन-भादो के पर्व कृषक जीवन की आवश्यकता से भी जुड़े हैं। लगातार खेतों में काम करने से कृषकों का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। ऐसे में व्रत-त्योहार उन्हें मानसिक और शारीरिक विश्राम प्रदान करते हैं। साथ ही, यह पर्व कृषक वर्ग को कठिन श्रम से कुछ समय के लिए दूर कर सामाजिक और पारिवारिक जीवन से जुड़ने का अवसर भी देते हैं। यदि व्रत-त्योहारों की परंपरा न होती, तो कृषक वर्ग लगातार खेतों में कार्य करता रहता, जिससे उनका स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता था।


इस प्रकार सावन और भादो मास में व्रत-त्योहारों की अधिकता केवल धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकता से जुड़ी हुई है। इन पर्वों के माध्यम से न केवल स्वास्थ्य की रक्षा होती है, बल्कि कृषक जीवन को संतुलन और विश्राम भी मिलता है। और इन सबमें महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी होती है, जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना, नारी शक्ति और कृषि जीवन की जीवंतता को दर्शाती है।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बरसा घरी तरिया-लावणी छंद

 बरसा घरी तरिया-लावणी छंद


पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।

लात तान के जीव ताल के, पानी भीतर सोगे हे।।


छिनछिन बाढ़य घाट घठौदा, डूबत हावँय पचरी हा।

झिमिर झिमिर जल धार झरत हे, नाचैं मेढ़क मछरी हा।

गावत छोटे बड़े मेचका, कूदा मारैं पानी मा।

हाथ गोड़ लहरावैं कछुवा, बरखा के अगवानी मा।

सबे जीव खुश नाचय गावय, डर दुख संसो खोगे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


ढेर मरत नइ हवै ढोंड़िहा, सरपट सरपट भागत हे।

लद्दी भीतर बाम्बी मोंगर, सूतत नइहे जागत हे।

बिहना ले मुँधियारी होगे, भइसा भैइसी बूड़े हे।

लइका कस चढ़ चढ़ कूदे बर, मेढ़क मछरी जूड़े हे।

डड़ई डुडुवा रोहू कतला, गरमी भर दुख भोगे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


पाँखी माँगत हावै पखना, सरलग पानी देख बढ़त।

घूरौं झन कहि डर के मारे, हावय मंतर पार पढ़त।

बने हवै बर पाना डोंगा, सब ला पास बुलावत हे।

मनमाड़े खुश होके लहरा, संझा बिहना गावत हे।

लहू चढ़ाये बर लागत हे, धरे जोंक ला रोगे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


हरियर हरियर पार दिखत हे, भरे लबालब तरिया हे।

ताल कभू नइ पूछे पाछे, कोन गोरिया करिया हे।

तिरिथ बरोबर तरिया लागे, तँउरे तर जावै चोला।

मुचुर मुचुर मुस्कावत हावै, नन्दी सँग शंकर भोला।

जीव जरी का कमल कोकमा, सबे मया मा मो गे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Thursday, 16 July 2026

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वैध शराब-कुंडलियाँ

 वैध शराब-कुंडलियाँ


पीयव वैध शराब ला, हे अवैध बेकार।

साथ देव सरकार के, झन पारव गोहार।

झन पारव गोहार, कोष बर हवै जरूरी।

जनता मन के मांग, इही मा होही पूरी।।

भट्ठी बढ़ही रॉज5, मरौ चाहे तुम जीयव।

सरकारी फरमान, वैध दारू ले पीयव।।


मानो शासन बात ला, होठ दाँत मा दाब।।

वैध शराब अमृत हरे, जहर अवैध शराब।

जहर अवैध शराब, बचो पीये ले येला।

बेंचे जेला लोग, कई मोहल्ला ठेला।।

वैध शराब बिसाव, स्वाद ओखर पी जानो।

भरत हवै नित कोष, बात शासन के मानो।।


भट्ठी हे सरकार के, काबर जाथस भूल।

दू पइसा बचही कही, इती उती झन ढूल।

इती उती झन ढूल, तीर के भट्ठी मा जा।

होही यदि तकलीफ, बात शासन ला बतला।।

असली मंद खरीद, मना शादी अउ छट्ठी।

झांक तीर तखार, हवै सरकारी भट्ठी।


 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


चुप हैं


बाबा लोग लत लोभ और प्रपंच लेकर चुप हैं।

नेता साहब वैपारी नोटों का बंच लेकर चुप हैं।।

आम जनता शिफ्ट बलेनो पंच लेकर चुप हैं।।

वक्ता कवि लेखक माइक मंच लेकर चुप हैं।।

अय्यासी करने वाले माल टंच लेकर चुप हैं।।

दल्ला लोग टूर और पंच लंच लेकर चुप हैं।।


खैरझिटिया


पावस पावन-सवैया


पावस पावन आ बरसावन लागत हे रस धार सखा।

तरिया परिया हरिया भरगे जल लांघत हावय पार सखा।।

गरजे बदरा चमके बिजुरी जस मातय हावय रार सखा।

झिंगुरा खग दादुर मोर ह गावय लागय रोज तिहार सखा।।


खोर गली बन बाग कली सब नीर ल पी मुस्कात जही।

ताल कुआँ नदिया नरवा भरही तब दादुर बात कही।।

सूरज देव लुकाय रही त बिहान घलो हर रात रही।

झींगुर चातक मोर खुशी अब मोर जिया म हमात नही।।


पावस के बड़ पावन बूंद ल लावत हे बरसा धरके।

हाँसत हे बखरी अउ रोज नहावत हे परवा घर के।।

ताल खुशी म नाचत हे सुर छेड़त हे डबरा भरके।

मंद फुहार धरे बरसा सब जीव म आस भरे झरके।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा


https://youtu.be/j2V9_XbiozI?si=nW_f6ZdokiZwPjCg


मनखें मनके अति-सार छंद


सब के संख्या हवै बराबर, ताल मेल तभ्भे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


हवा दवा फर फूल देय बन, बन बिन नइ जिनगानी।

ताल नदी नरवा नदिया दै, जीव जंतु ला पानी।।

माटी उप्पर छाभे गारा, ये जग संकट में हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


मनखें मनके स्वारथ आघू, कुछु हा नइ बाँचत हें।

हाय हटर कर रतन जोरके, देख देख नाँचत हें।

हाथी माँछी कुकुर बिलाई, धरती मा सब्बे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


कोनो काटे बन बिरवा ला, कोनो नदिया पाटे।

मछरी कुकरी कुकुर मार के, लहू घलो ला चाँटे।।

मनुष अकेल्ला जी पाही का, कतका अवकाते हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


मनखें करैं जे मन मा आये, कइसन किरिया खाहे।

अपन जघा मा सबें जियत हें, तभो जातरी आहे।।

भुगते पड़ही करनी के फल, लिखे विधाता जे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


काव्याञ्जलि- दलित जी

 काव्याञ्जलि- दलित जी


करिस छंद के जौन हा, लिख लिख नित बढ़वार।

पग मा माथ नवाँव मँय, पिरो भाव के हार।।1


नाँव मिटाये नइ मिटै, करनी जेखर पोठ।

साहित के आगास मा, बरै सियानी गोठ।।2


पैरी जब जब बाजही, मुख मा आही गीत।

दया मया सत बाढ़ही, फुलही फलही मीत।।3


रचना रिगबिग हे बरत, भले बछर गे बीत।

डहर नवा गढ़ते हवै, जनकवि जी के गीत।।4


जनकवि जी के काव्य ए, जन जन के आवाज।

पढ़े दलित जी मंच ले, करै जिया मा राज।।5


नाँव अमर जुगजुग रही, जब तक पुरवा नीर।

जनकवि कोदू राम जी, लिखिन जगत के पीर।।6


साहित के वो देंवता, जनकवि वो कहिलाय।

बगरै बाँढ़य छंद बड़, आस ओखरे आय।।7


सँजो ददा के आस ला, अरुण निगम जी आज।

पालत पोंसत छंद ला, करत हवैं निक काज।।8


साधक बन सीखत हवैं, कतको कवि मन छंद।

महूँ करत हँव साधना, लइका अँव मतिमंद।।9


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा)


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