भाजी बोहार के
भाजी बोहार के।
राँध भूंज बघार के।।
दे लसुन मिर्चा के फोरन।
अउ छीटा मार दार के।।
तन मा चुस्ती देथे,
सुस्ती जाथे हार के।।
बढ़त जात हे मांग भारी,
विनाश होवत हे खेत खार के।
ले दे के ये भाजी मिलथे,
चक्कर लगाय मा बाजार के।।
नइ हे पइसा हाथ मा,
ता देखत रह मुँह फार के।।
बड़ गुणकारी होथे ये भाजी,
राँध खा डकार के।
कफ दुरिहाथे,पाचन बढ़ाथे,
पेट के कृमि ला मार के।।
गर्मी घरी आथे,
उल्हवा उल्हवा राँध निमार के।
फर फूल घलो होथे काम के,
रख पेड़ ला दुलार के।।
जे खाय ते जाने स्वाद ला,
का होही बताय मा चार के।
भाजी पाला बैद आय तन मन के,
अउ मुख्य साग आय बुधियार के।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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