Sunday, 1 March 2026

गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)

 गीत-आइस नही बसंत(सरसी छन्द)



आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।


बिन अमुवा के करे कोयली का, कांता हा बिन कंत।।



बिन फुलवा के हावय सुन्ना, मोर जिया के बाग।


आसा के तितली ना भौरा, ना सुवना के राग।।


हे बहार नइ पतझड़ बस हे, हावय दुःख अनंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



सनन सनन बोलय पुरवइया, तन मन लेवय् जीत।


आय पिया हा हाँसत गावत, धर फागुन जे गीत।।


मरत हवै मन माँघ मास मा, पठा संदेश तुरंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



देख दिखावा के दुनिया हा, बैरी होगे मोर।


छीन डरिस सुख चैन पिया के, काट मया के डोर।


पुरवा पानी पियत बने ना, आगे बेरा अंत।


आइस नही बसंत सखी रे, आइस नही बसंत।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)



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 होरी अउ पीरा पलायन के- सरसी छन्द



होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।


रंग छीच के फेर बुझाहूँ, फागुन हवय बुलात।।



देवारी के दीया बुझथे, बरथे मन मा आग।


शहर दिही दू पइसा कहिके, देथौं गाँव तियाग।


अपन ठिहा मा दरद भुलाहूँ, फागुन ला परघात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



प्लास आम डूमर कस ठाढ़े, नित गातेंव मल्हार।


फोकट देहस मोला भगवन, पेट पार परिवार।


जनम भूमि जुड़ अमरइया हे, करम भूमि हे तात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।।



अइसन रँगबे सब ला आँसो, हे फागुन महराज।


सबे बाँह बर होवै बूता, झलकत रहै अनाज।।


दरद पलायन के झन भुगते, गाँव गुड़ी देहात।


होरी जइसे अगिन पेट के, जरत रथे दिन रात।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)




दोहा गीत- माँ शारदे



जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।



तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।


तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।


रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।


मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।


वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।


प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।


दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)






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