Thursday, 12 February 2026

गीत-पतझड़

 गीत-पतझड़


आथे पतझड़ दे जाथे संदेश रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक।।


बनना हे बढ़िया ता, तज दे विकार ला।

अपन बूता खुद कर, झन देख चार ला।

आवत जावत रहिथे, सुख दुख के बेरा।

समय मा चलबे ता, कटथे घन घेरा।।

विधि विधना ला, माथा टेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


राम अउ माया, संग मा नइ मिले।

सदा दिन बिरवा मा, फुलवा नइ खिले।

परसा सेम्हर, पात झर्रा मुस्काथे।

फागुन महीना, पुरवा संग गाथे।

पूरा पानी ला झन कभू छेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक-----


नाहे धोये मा नइ, अन्तस् धोवाये।

मन ला उजराये ते, ज्ञानी कहाये।

मन हावै निर्मल ता, जिनगी हे चोखा।

करबे देखावा ता, खुद खाबे धोखा।

देथे प्रकृति संदेशा नेक रे भैया।

पाके पाना पतउवा ला फेक----


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐


छबि छंद


छाये बहार, चहुँओर यार।

आहे बसंत, सुख हे अनंत।


गावै बयार, नद ताल धार।

फइले उजास,भागे हतास।


सरसो तियार,बाँटे पिंयार।

नाचे पलास,कर ले तलास।


कइथे कनेर,उठ छोड़ ढेर।

बोइर बुलाय,आमा झुलाय।


जिवरा ललाय,अमली जलाय।

मुँह ला फुलाय,लइका रिसाय।


बन बाग मात,दिन मान रात।

होके मतंग,छीचे ग रंग।।


माँदर बजाय,होली जलाय।

सबला सुहाय,शुभ मास आय।


बाजे धमाल,होवय बवाल।

गा फाग गीत,ले बाँट प्रीत।


रचगे कपाल,हे गाल लाल।

फगुवा लुभाय,कनिहा झुलाय।


हे मीठ तान,मधुरस समान।

जब जब सुनाय,आलस चुनाय।


खैरझिटिया

💐💐💐💐💐💐💐💐💐


गोपी छंद- बसंत ऋतु


बसंती गीत पवन गाये।

बाग घर बन बड़ मन भाये।

कोयली आमा मा कुँहके।

फूल के रस तितली चुँहके।


करे भिनभिन भौरा करिया।

कलेचुप हे नदिया तरिया।।

घाम अरझे  अमरइया मा।

भरे गाना पुरवइया मा।।


पपीहा शोर मचावत हे।

कोयली गीत सुनावत हे।

मगन मन मैना हा गावै।

परेवा पड़की मन भावै।।


फरे हे बोइर लटलट ले।

आम हे मउरे मटमट ले।

गिराये बर पीपर पाना।

फूल परसा मारे ताना।।


फुले धनिया सादा सादा।

टमाटर लाल दिखे जादा।

लाल भाजी पालक मेथी।

घुमा देवय सबके चेथी।


मसुर अरहर मुसमुस हाँसे।

बाग बन खेत जिया फाँसे।

चना गेहूँ अरसी सरसो।

याद आवै बरसो बरसो।


सरग कस लागत हे डोली।

कहे तीतुर गुरतुर बोली।

फूल लाली हे सेम्हर के।

बलावै बिरवा डूमर के।।


बबा सँग नाचत हे नाती।

खुशी के आये हे पाती।

नँगाड़ा झाँझ मँजीरा धर।

फाग ले जावै पीरा हर।।


सुनावै हो हल्ला भारी।

मगन मन झूमै नर नारी।

प्रकृति सज धज के हे ठाढ़े।

मया मनखे मा हे बाढ़े।।


मटक के रेंगें मुटियारी।

पार खोपा पाटी भारी।

नयन मा काजर ला आँजे।

मया ममता खरही गाँजे।।


राग फगुवा के रस घोरे।

चले सखि मन बँइहा जोरे।

दबाये बाखा मा गगरी।

नहाये खोरे बर सगरी।


पंच मन बइठे बर खाल्हे।

मगन गावै कर्मा साल्हे।

ढुलावय मिलजुल के पासा।

धरे अन्तस् मा सुख आसा।।


हदर के खावत हे टूरा।

चाँट अँगरी थारी पूरा।।

चुरे हे सेमी अउ गोभी।

पेट तन जावै बन लोभी।


टमाटर चटनी नइ बाँचे।

मटर गाजर मूली नाँचे।

पपीता पिंवरा पिंवरा हे।

ललावत सबके जिवरा हे।।


हाट हटरी मड़ई मेला।

जिंहा होवय पेलिक पेला।

ढेलुवा सरकस अउ खाजी।

मजा लेवय दादी आजी।।


जनावत नइहे जड़काला।

प्रकृति लागत हावै लाला।

खुशी सुख मन भर बाँटत हे।

मया के डोरी  आँटत हे।


सबे ऋतुवन के ये राजा।

बजावै आ सुख के बाजा।

खुशी हबरे चोरो कोती।

बरे  नित दया मया जोती।


खैरझिटिया

कुवाँ के आंसू

 कुवाँ के आंसू


कुवाँ के घिर्री म,

अब बाल्टी नइ झूले|

पार मा ऑवर-भॉवर,

भँसकटिया नइ फूले |


टेंड़ा पाटी टूट के सरगे हे|

कोला-बारी परिया परगे हे |

तरी ले ऊप्पर तक,

मेकरा के जाला बनगे हे|

गोड़ेला,पुचपुची,सल्हई के,

चारो मुड़ा झाला बनगे हे|


जागे हे बोईर-बंम्भरी,

कुवाँ के पार म |

खोजे म बिरले मिलथे,

कुवाँ खेत-खार म |


मनखे ल नल अउ बोरिंग मिलगे|

कुवाँ ल भीतरे-भीतर पाताल लिलगे|

कनकी कोदई धोवत नइ दिखे दादी नानी|

अब लगर नहाये नही कोनो राजा रानी |


नवा जमाना ह करे हे,

ओखर हिरदे के चानी|

कुवाँ के ऑसू ए,

 थोर बहुत भराय पानी|


                जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को(कोरबा)

सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा


 सुरता:- रेडियो के वो सोनहा बेरा


                                सुरता आथे वो बेरा के, जब गाँव के घर,गली,खोर,कोठार, कोला, ब्यारा, बारी  रेडियो के गूँज मा गुंजायमान रहय। तन संग मन घलो रेडियो के गीत संगीत मा बिधुन  होके नाँचे। रेडियो के उहू सोनहा बेरा ला देखे हन जब, घर मा रेडियो नइ राहय ता संगी संगवारी या पारा परोसी घर के चौरा मा बइठ के संझा, बिहना अउ मंझनिया के कतकोन कार्यक्रम के आनंद लेवन। रेडियो ऐसे मनोरंजन के साधन रिहिस जे भले एक घर बजे फेर सुनात भर ले पारा परोसी सबके मनोरंजन करे। एक जमाना मा घरों घर रेडियो घर के कोठ मा अरवाय रहय। आकाशवाणी अउ आंचलिक स्टेशन ले हिंदी, अंग्रेजी अउ छत्तीसगढ़ी मा कतकोन कार्यक्रम आय। हिंदी छत्तीसगढ़ी गीत संगीत, खेती किसानी/ज्ञान विज्ञान/ परब तिहार, संस्कृति-संस्कार के गोठ, रोजगार के अवसर,खेल, समाचार, युवा/ नारी/ लइका अउ सियान मन के कार्यक्रम, नाटक,कहानी,कविता, रूपक,भाव,भजन,खेल कमेंट्री, ------- का का नइ सुनन रेडियों मा। ऐसे नही कि ये सब अब रेडियो मा नइ आय। आजो बरोबर अइसन कतको कार्यक्रम रेडियो मा आथे फेर नवा जमाना के नवा शोरगुल मा दबगे हे। नवा जमाना के नवा नवा ढेंचरा जुन्ना दौर के सोनहा सुरता ऊपर कुंडली मार के बइठ गय हे। रेडियो सुनत सुनत घर के बुता काम अउ बेरा कब बुलके पता नइ लगत रिहिस। सुरता आथे कुनकुन कुनकुन जाड़ के बेरा मा बजत रेडियो अउ बबा के फाँदे दौरी/बेलन। धान कोदो कब मिंजा जाय पता तको नइ चले। जाड़ घरी  कोठार बियारा मा काम कमई के बेरा मा, कमइयां मन बर रेडियो ताकती बरोबर काम करे। घर बनइया मिस्त्री, दर्जी, कुम्हार, लोहार, हजामत बनइया होय या एक जघा बइठ के सिधोय वाले अउ कतकोन काम, रेडियो सबके तीर रहय। पहली रेडियो सेल ले चले,ताहन बिजली ले अउ अब तो मोबाइल मा ही aap के माध्यम ले कतको चैनल संघरा मिल जावत हे, बस छुए करे भर के देरी हे, तभो मनखे मन के रुझान जादा नइ दिखे। चाहे लोकगीत संगीत होय या फिल्मी गीत संगीत/ गजल/ सुगम संगीत-------खांटी रेडियो सुनइया मन ला मुँहअखरा गीत, गीतकार, फिल्म, संगीतकार आदि के नाँव सुरता रहय। आजो जेन रेडियो के वो सोनहा बेरा ला जिये होही, वोखर जेहन मा रेड़ियो के मनभावन रिंगटोन अउ जुन्ना गीत संगीत अंतस जे कोनो कोंटा मा समाय होही। जेन स्टेशन के कार्यक्रम ला सुनना हे, वो स्टेशन के नम्बर मिलाय के अलगे आनन्द रहय। 

                     मनोरंजन, ज्ञान विज्ञान के संगे संग रेडियो घर बइठे राज भर मा संगवारी बना देवय। सुन के अटपटा लगत हे न, फेर ये सच हे। रेडियो मा लगभग सबे कार्यक्रम मा स्रोता मन के चिट्टी पाती आय। कतको नियमित स्रोता मन बरोबर चिट्टी भेजे, उंखर नाम गांव रेडियो के उद्घोषक संग अन्य स्रोता मन ला तको रटा जावत रिहिस।  कोनो गांव मा घुमत घामत जाय बर मिल जाय ता, नाम बताके पूछे मा वो स्रोता मिल घलो जात रिहिस। रेडियो  मोरो कतको झन संगवारी बनाइस, चाहे नवागढ़ मा होय, बालोद मा होय या बरदा लवन मा--- ------। कई बेर तो इही रेडियो संगवारी मन के सेती रद्दा बाट मा आय कोई अड़चन  सहज टर घलो जाय। महुँ रेडियो मा बरोबर चिट्टी लिखँव, उद्घोषक के मुख ले अपन नाँव सुनत अन्तस् अघा जावत रिहिस। उद्घोषक संग सबे स्रोता मन के मन ला आपस मा जोड़ के रखे रेडियो हा। स्रोता मन के सुझाव,शोर खबर, फरमाइस अउ  कतको कार्यक्रम रेडियो के चिट्ठी पाती कार्यक्रम मा आय, जे बड़ मनभावन लगे।

                       रेडियो के चढ़े दीवानगी राजभर मा चारो कोती दिखे। घर- दुवार, गली-खोर संग चाहे होटल ढाबा होय या खेत खार, नदी-ताल या फेर ठेला-मेला। कोई खीसा मा छोटे रेडियो धरके चले ता कोई  बड़े रेडियो ला छोड़े घलो नही। रेडियो सुनत मन मा आय कि रेडियो के वक्ता/कवि/कलाकार/ गायक आदि मन कतिक भागमानी होही जेन ला सरी जमाना शान ले सुनथे। मोर ननपन आकाशवाणी रायपुर के संग बीते हे। रामचरित मानस के दोहा- चौपाई, चौपाल, बालवाटिका, युगवाणी, घर आंगन, मोर भुइँया, गाँव गुड़ी, ग्राम सभा, फोन इन फरमाइस------ अउ कतको कार्यक्रम के रिंग टोन आजो अन्तस् मा गुंजत रथे। रेडियो मा सुने  छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी गीत मन कभू नइ भुलाये, न वो गीत के गीतकार, संगीतकार अउ गायक मन के नाम। मनोरंजन के जब कमती साधन रिहिस ता आकाशवाणी, दूरदर्शन, खेल मदारी, सर्कस----- आदि कतकोन चीज पूरा तन अउ मन ला रच के रंजित करे, आनन्दित करे। फेर जइसे जइसे मनोरंजन के साधन बढ़त गिस, मनोरंजन मन ल छोड़ सिर्फ नयन तक सिमट गिस। नवा जमाना के नवा चोचला मा अरझ रेडियो ले कइसे दुरिहाएंव मोला खुदे पता नइ चलिस?

                          मैं रेडियो मा आय के कभू सोचे घलो नइ रेहेंव, फेर जब तीन चार साल पहली आकाशवाणी बिलासपुर मा मोर कविता रिकार्डिंग होइस तब खुशी के ठिकाना नइ रिहिस। आज  सात आठ पँइत आकाशवाणी बिलासपुर अउ रायपुर  मा कविता/गीत/कहानी पढ़त गावत होगे। नियमित स्रोता के रूप मा खुद ला, आज नइ पाके आत्मग्लानि होथे। मोर ये हाल हे, ता आने ला का कहँव? तभो विश्वास हे जब दर्शन के चीज ले दिल भर जही ता एक घांव फेर श्रवण के वो सुनहरा दौर जरूर आही। भले नवा रूप मा ही सही। जइसे भाजी कोदई, काँदा कूसा, खोंधरा-झोपड़ी,पंगत, धोती कुर्ता कस कतको जुन्ना चीज नवा रूप मा मनखें मन के बीच आवत हे। अपन रंग रूप बदल, धीरे धीरे सबे बने चीज एक घांव अउ लहुटही, आखिर धरती गोल जे हे।

                          विश्व रेडियो दिवस के आप जमो ला सादर बधाई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)