लाली फूल सेंम्हर के
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आगे बसंत;कुहके कोयली,
परसा,आमा मन भाय हे|
सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,
बइठे बर बलाय हे.............||
कॉटा पेड़ भर लटके हे|
खाल्हे एकोठन नइ टपके हे||
हॉंसत हे के रोवत हे,
लाली फूल जँऊहर घपटे हे ||
झर्राके पाना फूल ल,
पेड़ तरी सेज बनाय हे...........||
सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,
बइठे बर बलाय हे..............||
लाली फूले हे तभो कोनो नइ भावत हे|
फगुवा पूर्वाइया म उहू ह गावत हे|
कोन अब खाके वोला मुंहु रचावत हे|
मनखे के मया ले सेंम्हर दुरिहावत हे|
बाढ़े हे डंगडंग ले,
छंइहाँ बर डारा-खांधा लमाय हे||
सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,
बइठे बर बलाय हे............||
तीर तखार म मनखे दिखे ल काहत हे|
एकेक ठन कॉंटा तनले झिंके ल काहत हे|
बसंत म मंहु मुचमुचाथो फूल के,
कवि मन ल अपनो बारे में लिखे ल काहत हे|
एके घरी हाँसय एके घरी रोवय,
पाना गिराके फूले फूल म लदाय हे||
सेंम्हर पेड़ घलो अपन तीर,
बइठे बर बलाय हे..............||
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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