Thursday, 4 July 2019

रथ यात्रा(गीत)

रथ यात्रा(गीत)

अरज दूज मा जगन्नाथ के,जय जय गूँजे नाम।
कृष्ण  सुभद्रा   देवी   बइठे,बइठे  हे  बलराम।

चमचम चमचम रथ हा चमके,ढम ढम बाजय ढोल।
जुरे  हवै  भगतन  बड़  भारी,नाम  जपे  जय  बोल।
झूल झूल के रथ सब खीँचय,करे कृपा भगवान।
गजा - मूंग  के  हे  परसादी,बँटत  हवे  पकवान।
तीनों भाई  बहिनी लागय,सुख के सुघ्घर घाम।
अरज दूज मा जगन्नाथ के,जय जय गूँजे नाम।

दूज अँसड़हूँ पाख अँजोरी,तीनों होय सवार।
भगतन मन ला दर्शन देवै,बाँटय मया दुलार।
सुख अउ दुख के आरो लेके,सबके आस पुराय।
भगतन मनके दुःख हरे बर,अरज दूज मा आय।
नाचत  गावत  मगन सबे हे, रथ के डोरी थाम।
अरज दूज मा जगन्नाथ के,जय जय गूँजे नाम।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Wednesday, 3 July 2019

आसाढ़

*आषाढ़*

            लकलक लकलक जरत भुइयाँ मानसून के हबरे ले वइसने जुड़ हो जथे,जइसे कोनो भभकत अँगेठा या आगी म गघरा भर पानी उल्दा जथे।रिमझिम रिमझिम पानी जब आषाढ़ धरके आथे,तब सबले जादा खुशी किसान मन ल होथे।अउ काबर नइ होही?इही आषाढ़ म किसान मन अपन महिनत ले सपना रूपी धान के बिजहा ल धरती दाई के कोरा म छितथे।आसाढ़ के आय ले धरती महतारी हरियर सवांगा म सजगे मुसुर मुसुर मुस्कायेल लग जथे।डारा पाना पुरवाही म हाथ हला हला के नाचथे।बादर के गरजई घुमरई अउ कड़कड़ कड़कड़ बिजुरी किसान मन बर एक ताल के काम करथे,जेखर सुर ताल म किसान मन अपन जाँगर अउ नाँगर ल साज के धरती दाई के कोरा म,करमा ददरिया के तान छेड़त,ओहो तोतो के घुँघरू बजावत,मगन होके महिनत करत नाचथे।फेर आने मनखे मन बर आसाढ़ या मानसून सिर्फ गर्मी ले राहत आय।वो मन गर्मी ले हदास खा जथे,फेर किसान उही जरत,भभकत गरमी म,मानसून के रद्दा जोहत किसानी के जम्मो जोरा ल करथे।मेड़ पार अउ मुही ल बाँधना,खँचका-डिपरा ल बरोबर चालना,काँटा खूँटी ल बिनना,काँद दूबी ल खनना ये सबो बुता ल तो उही भभकत गर्मी म साजथे।अउ घर म घलो उही गर्मी म आषाढ़ के आये के पहली पैरा धरथे,परदा भाँड़ी म पंदोली देथे,बखरी बारी ल रंग रंग के साग भाजी बोय बर चतवारथे,नार बियार ल चढ़ाये बर ढेंखरा लानथे,चौमास बर लकड़ी छेना ल भितराथे,छानी परवा ल घलो उही गर्मी म छाथे।अइसन घर - बन के जम्मो बूता ल साध के किसान मन आशा के जोती बारे मॉनसून अउ आषाढ़ के अगोरा करथे।अउ जब पानी के पहिली बूँद मूड़ म परथे तब मार खुशी म नाचेल धर लेथे।ताहन का पूछना,भिनसरहा उठ के बइला ल खवा पिया के नाँगर धरके खेत कोती पाँव बढ़ाथे।बइला ल जब किसान भिनसरहा कोटना म पानी पियाथे तब ओखर गला के घण्टी अउ किसान के मुख ले निकले सुघ्घर सिसरी(सीटी) मनभावन लगथे।एखर आनंद उही ले सकथे जेन कभू गाँव म सुने होही या देखे होही।
           आसाढ़ म किसान सँग ओखर पूरा परिवार नाचत झूमत खेती किसानी म लग जथे।बाँवत के बेरा के वर्णन कोनो बढ़िया कैमरा ले फोटू खींचे कस लगथे।चारो मुड़ा खेत।खेत म सइमो-सइमो करत कमइया,टुकनी बोरी म माढ़े धान,हरिया भर नाँगर नाँस म बनत सुघ्घर कूँड़,बइला के गला के खनकत घण्टी,किसान के मुख ले बरसत करमा ददरिया अउ ओहो तोतो के आवाज,निंदईया महतारी मनके हाथ के खनकत चूड़ी,खार म रटत पपीहा,पड़की अउ तीतुर के सुघ्घर बोल मन ल मोह लेथे। नान्हे नान्हे लइका मन हाथ म कुदारी धरे मनमाड़े कूदत नाचत टोकन कोड़थे।ये सब दृश्य मन म अपार खुशी भर देथे।एखर आनंद भी उही मनखे उठा सकथे जेन बाँवत के बेरा म कभू सपड़े होही।लिख के कवि या लेखक घलो वो मनोरम दृश्य अउ आनंद ल नइ दे सकय।ये परम् आनंद के अनुभूति सिर्फ उही मेर मिल सकथे।कतको बूता करे कखरो तन मन म थकासी नइ दिखे।बिहनिया ले सँझा काम बूता म लगे किसान पाछू बरस के जम्मो दुख पीरा ल भुलाके आसाढ़ म नवा आस जगाके,जाँगर टोर महिनत करथे।
               आषाढ़ के पहली बारिस जब भुइयाँ  ल चुमथे तब माटी महतारी सौंधी महक म महकेल लग जथे।वो महक ल लिख के बया करना असंभव हे।उही पहली बारिस के संग भुइयाँ म पड़े जम्मो लमेरा,बन,बिजहा धीरे धीरे अपन आँखी उघारथे।जेमा रंग रंग के काँदी,चरोटा,लटकना,धनधनी, उरदानी,अउ छिंद,परसा, बोइर,आम,जाम,अमली,बम्हरी,कउहा,करंज,के फर पिकी फोड़के जागे बर धर लेथे। आषाढ़ मास म करिया करिया राय जाम पेड़ उप्पर कारी घटा कस दिखथे।लइका मन ओला टोरे बर टोली बनाके ए रुख ले वो चिल्लावत फेरा लगाथे।हाट बाजार म घलो ये फर अब्बड़ बिकथे।गाँव के गौठान म गरुवा गाय आषाढ़ के संग सकलायेल लगथे,काबर की डोली म धान पान बोवाथे।हरियर हरियर चारो मुड़ा चारा देखके गाय गरुवा के मन म घलो अपार खुशी होथे।गर्मी म लहकत लहकत दिन बिताये अउ सुख्खा काँद पात खाय के बाद आषाढ़ म हरियर चारा अउ पीये बर पानी सबो जघा गाय गरुवा म मिलेल लगथे।
            धरती दाई आषाढ़ म अपन नरी के पियास बुझावत ससन भर पानी पीथे। रझरझ रझरझ पानी बरसे ले तरिया,बाँधा, कुँवा बउली म पानी भरेल लग जथे।नरवा ,नँदिया,झरना,म धार बढ़ेल लगथे।चारो मुड़ा खोचका डबरा म पानी भर जथे।गली खोर म चिखला घलो मात जथे।कोनो साहब बाबू सूट बूट पहिरे चिखला पानी के डर ले पँवठा म पाँव मड़ावत धीर लगाके चलथे त उही म किसान मनखे बिन चप्पल के चभरंग चभरंग गीत गावत खुशी म बढ़थे।
लइका मन मनमाड़े खुशी म चिल्लावत चिल्लावत आषाढ़ के बरसा के मजा लेवत घड़ी घड़ी भींगथे।अउ रंग रंग के खेल खेलथे,गोल गोल घानी मूंदी घूमथे।बरसा के धार म पात पतउवा ल बोहा के थपड़ी पीटत अबड़ मजा करथे।फाँफा फुरफुन्दी के पाछू पाछू भागथे।अउ सबले खास बात जम्मो लइका मन खेलत खेलत "घानी मूंदी घोर दे,पानी दमोर दे कहिके"चिल्लावत फिरथे।इही मास म स्कूल घलो खुलथे।ममादाई के घर गरमी छुट्टी बिताये के बाद कापी बस्ता धरके फेर स्कूल म पढ़े लिखे बर जाथे।
      घुरवा,डबरा तरिया,नरवा,कुँवा,बउली के पानी म मछरी मन मेछरायेल लगथे।तरिया के घठोंदा बाढ़े बर धर लेथे।कहे के मतलब ये की तरिया म पानी भरे ले घाट घठोंदा उपरात जाथे।मेचका अउ झींगुर रट लगायेल लग जथे।बरसा के पानी पाके तलमलावत साँप, बिच्छी ,केकरा अउ कतको कीरा मकोड़ा अपन अपन बीला ले बाहिर निकलथे।पिरपिटी साँप जोथ्था जोथ्था इती उती देखे बर मिल जथे।ये मउसम म ये सब जीव मनके अब्बड़ डर रहिथे।कभू कभू घर कुरिया म घलो घूँस जथे।रंग रंग के कीरा ये मउसम म जघा जघा दिखथे।बउग बत्तर रतिहा अँजोर ल देख अब्बड़ उड़ियाथे।संगे संग रंग रंग के फाँफ़ा फुरफुन्दी घलो उड़थे।झिमिर झिमिर बरसत पानी म कौवा काँव काँव करत पाँख फड़फड़ावत छानी म बइठे रहिथे।त गौरइय्या ह दल के दल अँगना म बरसा म भींगत भींगत चिंव चिंव करत दाना चरथे।
        आषाढ़ ले सबला आस रहिथे।चाहे छोटे से छोटे जीव रहे या कोनो बड़का हाथी।आषाढ़ के बरखा सबला नवा जीवन देथे।आषाढ़ म किसान मन हम सबके पेट के थेभा धान के खेती करथे, उँखर महिनत ले ही सबके पेट बर दाना मिलथे।जइसे पेट भरे के बाद ही जीव मन आने काम ल सिधोथे वइसने खेती म ही दुनिया के आने सबो बूता टिके हवे।आषाढ़ आय के बाद किसान म अपन देवी देवता ल  मनाये  बर कतको अकन तिहार घलो मानथे।जेमा जुड़वास पहली तिहार होथे,जेन आषाढ़ मास के अँधियारी पाँख म अठमी के मनाये जाथे।ये दिन किसान मन अपन गाँव के शीतला दाई म तेल हरदी जघा के खेती किसानी अउ गाँव के समृद्धि बर बारम्बार पूजा अर्चना अउ वंदना करथे।ओखर बाद बारो महीना तीज तिहार के क्रम चलत रहिथे।हमर भारत भइयाँ म तिहार बार खेती के हिसाब ले चलथे।सावन महीना के हरेली ल पहली बड़का तिहार केहे जाथे।
आषाढ़ के बोहावत पानी  ल बचाये बर घलो हम सबला उदिम करना चाही ताकि भूजल  स्तर  म बढ़ोतरी होय,तरिया नदिया,बाँधिया म पानी भरे रहय। अउ बछर भर पानी के तंगई झन होय।आषाढ़ के बने बरसा बने किसानी के निसानी आय,अउ बने किसानी सुखमय जिनगानी के निसानी आय।

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को (कोरबा)

डार्क लाइन *बादर के गरजई घुमरई अउ कड़कड़ कड़कड़ बिजुरी किसान मन बर एक ताल के काम करथे,जेखर सुर ताल म किसान मन अपन जाँगर अउ नाँगर ल साज के धरती दाई के कोरा म,करमा ददरिया के तान छेड़त,ओहो तोतो के घुँघरू बजावत,मगन होके महिनत करत नाचथे।*

Monday, 1 July 2019

हाकली छंद(बरसात)

हाकली छंद(बरसात)

रिमझिम रिमझिम जल बरसे,ताल तलैया बड़ हरसे।
गड़गड़ गड़गड़ नभ गरजे,लइका मन ला माँ बरजे।1

रहि रहि झड़ी म भींगत हे, घर भीतर नइ नींगत हे।
पथरा  ढेला  फेकत हे,माड़ी के  बल  टेकत हे।2।

हाँसत हे अउ गावत हे, अबड़ मजा सब पावत हे।
कुरता  पेंट सनाय  हवै,गढ्ढा  कोड़  बनाय  हवै।3।

खाये बिन एको कँवरा,ए चँवरा ले वो चँवरा।
घानी मूंदी घूमत हे,सब लइका बीच सुमत हे।4।

संगी साथी जुरमिल के,नाचत हे डोंगा ढिलके।
गिर गिर घेरी घाँव उठै,मीत मितानी मया गुथै।5

पाँख हलावत हे मयना,कँउवा के छिनगे चयना।
ठिहा उजरगे हे कतको,नइ सूखत हावय पटको।6

काँदी काँदा कुसा जगै,हरियर हरियर धरा लगै।
बूता  बाढ़े  हे अबड़े,बेर  किसानी  के  हबरे।7।

छानी परवा टपकत हे,गोड़ म लेटा चपकत हे।
फुरफूँदी बड़ उड़त हवै,फरा अँगांकर चुरत हवै।8

कतको धर बइठे तरवा, चूँहत हे छानी परवा।
मछरी पार म चढ़त हवै,बगुला मंतर पढ़त हवै।9

फाँदे हावय बबा गरी,नइ खावँव कहि जरी बरी।
चूल्हा बड़ गुँगवावत हे,झड़ी म घर मे दावत हे।10

सइमो सइमो खेत करे,बइला हरियर काँद करे।
घण्टी गर के बाजत हे,काम बुता मा सब रत हे।11

निकले बरसाती खुमरी,भाय ददरिया अउ ठुमरी।
बाढ़त हे दनदन थरहा,मजा करे बइला हरहा।12

टरटर मेंढक गावत हे,झींगुर राग लमावत हे।
बत्तर फाँफा मच्छर हे,बगरे बीमारी जर हे।13

किरा मकोड़ा के डर हे,करिया नागिन बिखहर हे।
बिच्छल सब्बो तीर हवै,धीर म भइया खीर हवै।14

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)


Thursday, 13 June 2019

गजल (छत्तीसगढ़ी)बहर में

बहर-2122 1212 22

छत्तीसगढ़ी गजल

1,गर्मी जेठ के (गजल)

जेठ आगी बरत हवै भारी।
तन चटाचट जरत हवै भारी।1।

हाल बेहाल हे सबे झन के।
तन ले पानी झरत हवै भारी।2।

बैरी बनके सुरुज नरायण हा।
चैन सुख ला चरत हवै भारी।3।

झाँझ झोला घलो चले रहिरहि,
देख जिवरा डरत हवै भारी।4।

बांध तरिया दिखत हवै सुख्खा,
रोना जल बर परत हवै भारी।5।

डोले डारा चले न पुरवइया।
घर म भभकी भरत हवै भारी।6।

खैरझिटिया न खैर अब तोरे।
गर्मी दिन दिन फरत हवै भारी।7।

खैरझिटिया

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2,गजल(छत्तीसगढ़ी)

रात दिन मन खसर मसर होही।
ता भला का गुजर बसर होही।1।

हाथ आही चिटिक अकन कुछु हा।
अउ खइत्ता पसर पसर होही।2।

लोग लइका सगा दिही धोखा।
ता बने मन म का असर होही।3।

आदमी आदमी कहाही का।
मीत ममता मया कसर होही।4।

खैरझिटिया बचे नही काया।
जल बिना थल ठसर ठसर होही।5।

खैरझिटिया
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3,गजल(छत्तीसगढ़ी)

छल कपट मुँह उलाय झन भैया।
तोर सुरता भुलाय झन भैया।1।

देबे कुछु भी ठठा बजा देबे।
माँगे बेरा झुलाय झन भैया।2।

सुध बचा होश मा रबे हरदम।
पासा जइसे ढुलाय झन भैया।3।

झूठ मक्कार के जमाना हे।
कोनो तोला रुलाय झन भैया।4।

मार मालिस चघा चना मा जी।
फुग्गा कस फुलाय झन भैया।5।

फेंक चारा गरी फँसा कोई।
आ आ कहिके बुलाय झन भैया।6।

खोचका खन के खैरझिटिया गा।
सेज कहिके सुलाय झन भैया।7।

खैरझिटिया
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4,गजल(छत्तीसगढ़ी)

बात बानी सुने कहाँ कोई।
आज मनखे गुने कहाँ कोई।1।

अब फिकर जान के घलो नइहे।
जाल खुद बर बुने कहाँ कोई।2।

मन म इरखा दुवेस के बदरा।
मोह माया फुने कहाँ कोई।3।

कद अहंकार के बढ़े निसदिन।
फेर ओला चुने कहाँ कोई।4।

मरते रह भूख खैरझटिया।
तोर बर कुछु भुने कहाँ कोई।5।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझटिया"
बाल्को(कोरबा)
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5,,गजल(छत्तीसगढ़ी)

दुख दबाके चलेल लगही जी।
चोट खाके पलेल लगही जी।2।

भूख पर के भगाये बर तोला।
दार जइसन गलेल लगही जी।2।

काँपही रात मा जिया कखरो।
दीप बन तब जलेल लगही जी।3।

घाम अउ छाँव मान सुख दुख ला।
मन म दूनो मलेल लगही जी।4।

बैर रखके दिही दगा कोई।
बनके छलिया छलेल लगही जी।5।

मान सम्मान नइ मिले फोकट।
पाय बर तो फलेल लगही जी।6।

खैरझटिया खड़े रबे कब तक।
जीये बर तो हलेल लगही जी।7।

खैरझटिया

Wednesday, 12 June 2019

काव्यांजलि

खुमान जी ल काव्यांजलि (चौपई छंद)

धान कटोरा के दुबराज,कइसे दुबके तैंहर आज।
सुसकत हावय सरी समाज,रोवय तोर साज अउ बाज।1।

चंदैनी गोदा मुरझाय,संगी साथी मुड़ी ठठाय।
तोर बिना दुच्छा संगीत,लेवस तैं सबके मन जीत।2।

हारमोनियम धरके हाथ,तबला ढोलक बेंजो साथ।
बाँटस मया दया सत मीत,गावस बने मजा के गीत।3।

तोर दिये जम्मो संगीत,हमर राज के बनके रीत।
सुने बिना नइ जिया अघाय,हाय साव तैं कहाँ लुकाय।4।

झुलथस नजर नजर मा मोर,काल बिगाड़े का जी तोर।
तोर कभू नइ नाम मिटाय,सातो जुग मा रही लिखाय।5।

तोर पार ला पावै कोन,तैंहर पारस अउ तैं सोन।
मस्तुरिहा सँग जोड़ी तोर,देय धरा मा अमरित घोर।6।

तोर उपर हम सबला नाज,शासन ले हे बड़े समाज।
माटी गोंटी मुरुख सकेल,खेलन दे देखावा खेल।7।

गाँव ठेकवा के शमशान,गा गा कहे खुमान खुमान।
धन धन धरा ठेकवा धाम,होय जिहाँ सुर म सुबे शाम।8।

सबके अन्तस् मा दे घाव,बसे सरग मा दुलरू साव।
सच्चा छत्तीसगढ़िया पूत,शारद मैया के तैं दूत।9।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
खैरझिटी, राजनांदगांव(छग)
9981441795

Sunday, 5 May 2019

हिजगा पारी

हिजगा(दोहा-चौपाई)

*हिजगा पारी के कथा,कहत हवँव मैं आज।*
*कहत कहत मोला घलो,आवत हे बड़ लाज।*

एक ददा के दू हे टूरा,दोनों झन बड़ धरहा छूरा।
पटे नही दोनों के तारी,करें एक दूसर के चारी।।

एक मंगलू एक छगन हे,अपन अपन मा दुनों मगन हे
एके हे घर बखरी बारी,करे काम बस हिजगा पारी।।

फ्रीज रेडियो मोटर गाड़ी,लेवय दोनों हिजगा पारी।
जइसन करनी करे एक झन,तइसन होवै दूसर के मन।

उँखर समझ आये ना चक्कर,दोनों मा काँटा के टक्कर।
करे गरब धन हाड़ मास मा,होय फभित्ता आस पास मा।

बर बिहाव का मरनी हरनी,एके रहै दुनों के करनी।
ओढ़े देखावा के चोला,लेवय तम बम बारुद गोला।

देखावा मा पइसा फेके, लड़े भिड़े बर रोजे टेके।
मान गौन सँग धन अउ दउलत,हिजगा पारी मा हे पउलत।

मन मा रखके हिजगा पारी,देय एक दूसर ला गारी।
ददा धरे सिर दुखी मनाये, कोन दुनों झन ला समझाये।

तड़फै कभू ददा पसिया बर,कभू खाय रँगरँग टठिया भर।
कभू झुलावै दुनों हिंडोला,कभू गिरावय दुख के गोला।

हरहर कटकट रोजे ताये,देख ददा दुख प्राण गँवाये।
तभो दुनों ना हिजगा छोड़े,कुवाँ एक दूसर बर कोड़े।

*परलोकी दाई ददा,रिस्ता नत्ता तोड़।*
*हिजगा पारी मा तिरै, भाई भाई गोड़।*

धन अउ धान सबे झट उरके,दुनों एक दूसर ले कुड़के।
लड़े भिड़े जादा अउ खुल के,बोरों दोनों नाँव ल कुल के।

लइका मन मा अवगुण आये,देख दुनों झन दुखी मनाये।
खुदे बार डारिस हे घर ला,का बद्दी दे पाही पर ला।

लइका मन हा बनगे लावा,अब का चिंता अउ पछतावा।
करे काम ला मातु पिता के,जोरे लकड़ी उँखर चिता के।

हिजगा पारी काय काम के,घर बन बारे द्वेष थाम के।
सुख ले जिनगी जीना चाही,मया पिरित सत पीना चाही।

हिजगा पारी के बीमारी,अच्छा नोहे जी सँगवारी।
छोडों झगड़ा झंझट चारी,दया मया धर बध लौ यारी।

छगन मंगलू झन होवव जी,इरसा द्वेष म झन खोवव जी।
चारी  चुगली  द्वेष  लबारी,छोड़व भैया हिजगा पारी।

*हिजगा पारी ला धरे,जेन जेन मेछराय।*
*तेखर नइया एक दिन,बीच धार बुड़ जाय।*

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
9981441795

Friday, 5 April 2019

नवा बछर,चैत नवरात्री

नवा बछर (सार छंद)

फागुन के  रँग कहाँ हटे हे, कहाँ घटे हे मस्ती।
नवा बछर धर चैत हबरगे,गूँजय घर बन बस्ती।

चैत  चँदैनी  चंदा चमकै,चमकै  रिगबिग जोती।
नवरात्री के पबरित महिना,लागै जस सुरहोती।
जोत जँवारा  तोरन  तारा,छाये चारों कोती।
झाँझ मँजीरा माँदर बाजै,झरै मया के मोती।
दाई  दुर्गा  के  दर्शन ले,तरगे  कतको  हस्ती।
फागुन के रँग कहाँ उड़े हे,कहाँ उड़े हे मस्ती।

कोयलिया बइठे आमा मा,बोले गुरतुर बोली।
परसा  सेम्हर  पेड़  तरी  मा,बने  हवै रंगोली।
साल लीम मा पँढ़री पँढ़री,फूल लगे हे भारी।
नवा  पात धर नाँचत हावै,बाग बगइचा बारी।
खेत खार अउ नदी ताल के,नैन करत हे गस्ती।
फागुन  के रँग कहाँ उड़े  हे,कहाँ  उड़े हे मस्ती।

बर  खाल्हे  मा  माते पासा, पुरवाही मन भावै।
तेज बढ़ावै सुरुज नरायण,ठंडा जिनिस सुहावै।
अमरे बर आगास गरेरा,रहि रहि के उड़ियावै।
गरती चार चिरौंजी कउहा,मँउहा बड़ ममहावै।
लाल कलिंदर ककड़ी खीरा,होगे हावै सस्ती।
फागुन के रँग कहाँ उड़े हे,कहाँ उड़े हे मस्ती।

खेल मदारी नाचा गम्मत,होवै भगवत गीता।
चना गहूँ सरसो घर आगे,खेत खार हे रीता।
चरे  गाय गरुवा मन मनके,घूम घूम के चारा।
बर बिहाव के बाजा बाजै,दमकै गमकै पारा।
चैत अँजोरी नवा साल मा,पार लगे भव कस्ती।
फागुन के रँग  कहाँ  उड़े  हे,कहाँ उड़े हे मस्ती।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरखिटिया"
बाल्को(कोरबा)

नवरात्री अउ नवा बछर के अन्तस् ले बधाई,सादर नमन🌷🌷🌷🌷🌷