Sunday, 26 April 2026

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे

 तभो नेता मन के कद बाढ़े हे


पानी बिजली के हाल बेहाल हे।

डहर बाट मा खुदे नरवा ताल हे।।

नियम धियम गुंडा मन बनात हें,

न ढंग के स्कूल न अस्पताल हे।

विकास घोषणा पत्र मा माढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


कपड़ा ओनहा बस सादा हे।

मन भीतर भराय खादा हे।।

पैसा पहुँच के बस पर लगाथे,

एको ठन पुरोये नइ वादा हे।।

जनता बर शनि साते साढ़े हे।

तभो नेता मन के कद बाढ़े हे।।


फूल माला के दीवाना ये मन।

जाने बस नित खाना ये मन।।

अपन जेब मा धरके रखें सदा,

कोर्ट कछेरी अउ थाना ये मन।

तभो जयकार करइया ठाढ़े हे।

तभे नेता मन के कद बाढ़े हे।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुंडलियाँ छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


रावन रावन हे तिंहा, राम कहाँ ले आय।

रावन ला रावन हने, रावन खुशी मनाय।

रावन खुशी मनाय, भुलाके अपने गत ला।

अंहकार के दास, बने हे तज तप सत ला।

धनबल गुण ना ज्ञान, तभो लागे देखावन।

नइहे कहुँती राम, दिखे बस रावन रावन।।


रावन के पुतला कहे, काम रतन नइ आय।

अहंकार ला छोड़ दव, झन लेवव कुछु हाय।

झन लेवव कुछु हाय, बाय हो जाही जिनगी।

छुटही जोरे चीज, धार बोहाही जिनगी।

मद माया अउ मोह, खोज के खुदे जलावन।

नइ ते जलहू रोज, मोर कस बनके रावन।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


विजय दशमी की आप सबको ढेरों बधाइयाँ





गीत-तैं मोला भुला के जी पाबे का बता।

 गीत-तैं मोला भुला के जी पाबे का बता।



तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।

मैं तो तड़पते हौं, तैं खुद ला झन सता।।


मोर दिल के धड़कन, नाम लेथे तोर वो।

तोर दिल के धड़कन, नाम लेथे मोर वो।

तोर मोर जिनगी के, एक्के हे पता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।।


कइसे पहाबे जिनगी, तोर उमर हे सोला।

कोन बात ला धरे हस, नइहे सुरता मोला।

जिनगी मा होते रइथे, छोट मोट खता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।।


चुरत रबे रिस मा कब तक, भूत ला भूल जा।

छुटे नही जिनगी भर, मया रंग मा घूल जा।।

ये तन पुजारन ए, दिल आये देवता।

तैं मोला भुला के जी, पाबे का बता।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


गीत-झन छोड़ मया ला।


झन छोड़ मया ला।

झन छोड़ मया ला।।

हाय मोर मया ला।

हाय मोर मया ला।।

जान के तैंहा खेल खिलौना,

झन तोड़ मया ला—----------


मया हे ता,  सांस चलत हे।

मया मा मन पंछी पलत हे।।

बिन मया के तन न मन हे,

राखे रहिबे जोड़ मया ला—------


देखेंव सपना मया ला पा के।

सरी दुनिया ले दुरिहा जाके।।

बीच मझधार मा तैंहा सजनी,

झन बोर मया ला—-----------


लड़की

जरत हवों मैं अलथी कलथी।

होगे मोर ले भारी गलती।।

अंतस मा बसाके रखहूँ,

मैं तोर मया ला—----------


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)







गरमी मा ताल नदी स्नान-सार छंद

 गरमी मा ताल नदी स्नान-सार छंद


देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।

चटचट जरथे चारो कोती, जुड़ जल जिया लुभाथे।।


पार पाय नइ नल अउ बोरिंग, नदिया अउ तरिया के।

भेदभाव नइ करे ताल नद, गुरिया अउ करिया के।

कल कल करथे धार नदी के, लहर ताल के गाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।।


कोनो कूदे कानों तँउरे, कोनो डुबकी मारे।

तन के कतको रोग रई हा, डुबकत तँउरत हारे।

बुड़े बुड़े पानी के भीतर, कतको बेर पहाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


लहरा होथे गहरा होथे, डर तक रहिथे भारी।

नइ जाने तँउरें बर तउने, मारे झन हुशियारी॥ 

जीव जंतु तक के ये डेरा, काम सबे के आथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गर्मी छुट्टी(रोला छंद)

 """"""""गर्मी छुट्टी(रोला छंद)


बन्द हवे इस्कूल,जुरे सब लइका मन जी।

बाढ़य कतको घाम,तभो घूमै बनबन जी।

मजा उड़ावै घूम,खार बखरी अउ बारी।

खेले  खाये खूब,पटे  सबके  बड़ तारी।


किंजरे धरके खाँध,सबो साथी अउ संगी।

लगे जेठ  बइसाख,मजा  लेवय  सतरंगी।

पासा  कभू  ढुलाय,कभू  राजा अउ रानी।

मिलके खेले खेल,कहे मधुरस कस बानी।


लउठी  पथरा  फेक,गिरावै  अमली मिलके।

अमरे आमा जाम,अँकोसी मा कमचिल के।

धरके डॅगनी हाथ,चढ़े सब बिरवा मा जी।

कोसा लासा हेर ,खाय  रँग रँग के खाजी।


घूमय खारे  खार,नहावय  नँदिया  नरवा।

तँउरे ताल मतंग,जरे जब जब जी तरवा।

आमाअमली तोड़,खाय जी नून मिलाके।

लाटा खूब बनाय,कुचर अमली ला पाके।


खेले खाय मतंग,भोंभरा  मा गरमी के।

तेंदू कोवा चार,लिमउवा फर दरमी के।

खाय कलिंदर लाल,खाय बड़ ककड़ी खीरा।

तोड़  खाय  खरबूज,भगाये   तन   के  पीरा।


पेड़ तरी मा लोर,करे सब हँसी ठिठोली।

धरे  फर  ला  जेब,भरे बोरा अउ झोली।

अमली आमा देख,होय खुश घर मा सबझन।

कहे  करे बड़ घाम,खार  मा  जाहू  अबझन।


दाइ ददा समझाय,तभो कोनो नइ माने।

किंजरे  घामे घामे,खेल  भाये  ना आने।

धरे गोंदली जेब,जेठ ला बिजरावय जी।

बर पीपर के छाँव,गाँव गर्मी भावय जी।


झट बुलके दिन रात,पता कोई ना पावै।

गर्मी छुट्टी आय,सबो  मिल मजा उड़ावै।

बाढ़े मया पिरीत,खाय अउ खेले मा जी।

तन मन होवै पोठ,घाम  ला झेले मा जी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

Saturday, 25 April 2026

खूनी खेल जारी हे,, काबर लालेच म खेलथस???

 खूनी खेल जारी हे,,


काबर लालेच म खेलथस???


अऊ तो रंग बहुत हे,

काबर लालेच म काबर खेलथस?

हॉसत खेलत जिनगी म,

काबर बारूद मेलथस?


पीके पानी फरी,

जुडा़ अपन नरी,

फेर काबर लहू पियत हस?

मनखे अस ता, मन म समा,

रक्सा कस का जियत हस?


हरिंयर रंग हरागे हे,

ललहूं होगे हे माटी।

थोरकन तो दया धरम देखा,

का पथरा के हे तोर छाती?

भरके बंदूक म  गोली,

निरदई कस ठेलथस......

अऊ तो रंग ............

.............खेलथस  ???


बंदूक गईंज चलायेस,

अब भाईचारा भँजा के देख !

मारे हस जेखर गोंसईंया,बेटा ल,

ओखरो घर जाके देख,!.

मनखे होके मनखे ल ,                                                                                                                                                                     खावत हस नोंच नोंच !

फिलगे हे अचरा आंसू म,

अब ताे दाई के आंसू पोंछ !

छेदा छेदा के बम बारूद म,

दाई के छाती चानी हाेगे हे !

तरिया ढोंड़गा नरवा के पानी,

ललहुं  बानी होगे हे  !

कोन देखाथे ऑखी तोला,

बता!! का बात ल पेलथस?

अऊ तो रंग................

.....................खेलथस ??


अलहन ऊपर अलहन होत हे।

जंगल तीर के गांव रोज रोत हे।

कल्हरत हे कुंदरा,

 आँसू ढारत हे महतारी।

कब जिवरा ले डर भागही,

 कब टरही गोला बारी।।

खून खराबा बने नोहे,

आखिर दरद तो तहूँ झेलथस।

अऊ तो रंग.....................

..........................खेलथस?


जंगल के जीव जीवलेवा हे,

फेर तोर जइसे नही,!

कहां लुकाबे बनवासी बन,

जब श्री राम आ जही!

छीत मया के रंग,

अऊ खेल रंग गुलाल ले,!

नाच पारा -पारा बाजे नंगाडा़!

निकल जंगल के जाल ले!

खेल खेल म का खेले तैं,

मनखे के जीव लेलेय तैं,

अति के अंत हब ले होही,

बात मोर मान ले!

लड़ना हे त देश बर लड़,

छाती फूलाके शान ले!

फूल-फूलवारी मितान बना,

आखिर काखर बात ल एल्हथस??

अऊ तो रंग.....................

.............................खेलथस????


जीतेन्र्द वर्मा

खैरझिटी(राजनांदगांव)

संगे संग मया

 संगे संग मया


अब कइसे रचही, मधूबन म रास रे ? 

मोर तीर हे बंसरी, अऊ तोर तीर हे साँस रे ।


कलेचुप खड़े हे, कदम के रूखवा ।

 तंय पूर्वाइयाँ, अऊ मंय हर पात ||


कइसे ममहाही,  मोंगरा मया के ?

 मंय हर पतझड़, अऊ तंय मधूमास रे ।।


चलत हे बरोड़ा, उड़ावत हे धूर्रा ।

 तंय हर बिरौनी, मंय हर आँख रे ।।


मइलहा मन, मनभात नइहे मनखे के ।

 मया के तरिया म, मन ल काँच रे ।।


फेंक के देख मया के गरी, छत्तीसगढ़ भर । 

अइसने अरझ जही, फेर छल ले झन फाँस रे ।।


न रो, न रोवा, खा तेंदू -चार - कोवा ।

टपका मुंहुँ ले मंदरस, अऊ मन भर हाँस रे ।।


थोरकिन ते खा, थोरकिन भूखाय ल खवा ।

 कर सिंगार महतारी के, नंवाके माथ रे ।।


ओनहा- कोनहाल, करदे अंजोर । 

मया के माटी ले, उँच-नीच ल पाट रे ।।


का हे भरोसा, जिनगी के सिरतोन म ? 

मया - पिरीत ल, झंऊहा- झंऊहा बाँट रे ।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को कोरबा (छग)

Monday, 20 April 2026

डीजे

 डीजे


जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।

लगे देख अलकरहा, मनखें कुकुर माकर होगे।।


कानफोड़वा साउंड, हिरदे दरकत बेस।

कला दिखे बला मा, आगी लगे हे टेस।।

हो हल्ला हरहा होगे, सुर संगीत बर साँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


ना कोनो  हा सुनत हें, ना कोनो गुनत हें।

लोक लाज के पट ला, सबझन चुनत हें।।

पके बस ख्याली खिचड़ी, मया मीत डाँकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


छट्ठी बरही बर बिहाव, रमाएन गीता भगवद।

सबो मा हबरगे डीजे, होगे खदबद गदबद।।

कला कल्हरे कोंटा मा, बला घर नौकर चाकर होगे।

जब ले डीजे आय हे, सब भिकिर भाकर होगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

नाली

 नाली


जब ले घर के आघू मा, नाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बड़े बड़े मच्छर बड़, भभन भनन करथे।

जिवरा करला जाथे, नींद कहाँ परथे।।

का संझा का बिहना, चुँहकय लहू ला।

जर बुखार धरेच रथे, घर मा कहूँ ला।।

बइद डाक्टर हर घर के, माली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


बारो महीना भरे रथे, नहवई धोवई मा।

नाक पिरा जाथे, नाली के बस्सई मा।।

दौना के दम घुटगे, तुलसी तिरियागे।

गमके नइ गोंदा, भौरा तितली भागे।।

ना ठउर थाली, ना दसमत के डाली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


शहर के देखा सीखी, गाँव बउरागे।

सुविधा हा दुविधा, बनके तनियागे।।

नल बोरिंग सुख्खा हे, नाली भराये।

धरती के छाती मा, कांक्रीट हे छाये।।

ना आज बने हावय, ना काली बने हे।

का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

तेंदू- दोहा- चोपाई छंद

 तेंदू- दोहा- चोपाई छंद


लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।

काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।


तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।

छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।


तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।

टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।


बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।

औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।


तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।

तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।


लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।

अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाथे घलो केंवची जर हा।।


आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।

हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।


तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।

फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।


जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।

भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

विश्व हिरदय दिवस म हिरदय- सार छंद

 विश्व हिरदय दिवस म


हिरदय- सार छंद


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम जग नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम सब चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

घाट न घर के-रोला छंद

 घाट न घर के-रोला छंद


छोटे मोटे काम, गिनावय कर बड़ हल्ला।

श्रेय लेत अघुवाय, श्राप सुन भागय पल्ला।।

खुद के खामी तोप, उघारय गलती पर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


सोंचे समझे छोड़, करे मनमानी रोजे।

पर के ठिहा उजाड़, अटारी खुद बर खोजे।।

झटक आन के अन्न, खाय नित उसर पुसर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


दाई ददा ल छोड़, नता के किस्सा खोले।

मीठ मीठ बस बोल, जहर सब कोती घोले।।

कभू होय नइ सीध, रहे अँइठाये जरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


रखे पेट मा दाँत, खोंचका पर बर कोड़े।

अवसर पाके पाँव, गलत पथ कोती मोड़े।

पहिर स्वेत परिधान, चले नित कालिख धरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


घर के भेद ल खोल, मान मरियादा बारे।

आफत जब आ जाय, रहे देखत मुँह फारे।।

बरसे अमरित धार, फुले तभ्भो नइ झरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


पापी बनके पाप, करे नित लेवय बद्दी।

जाने नही नियाव, तभो पोटारे गद्दी।।

दानवीर कहिलाय, आन के धन बल हरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


मरहम धरके हाथ, मले के करे दिखावा।

सुलगे बनके रोज, भीतरे भीतर लावा।।

रहे सदा मिटकाय, मया सत मीत ल चरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 18 April 2026

घाम घरी के फर- सार छंद

 घाम घरी के फर- सार छंद


किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।

रंग रूप अउ स्वाद देख सुन, लड्डू फूटय मन मा।।


पिकरी गंगाअमली आमा, कैत बेल फर डूमर।

जोत्था जोत्था छींद देख के, तन मन जाथें झूमर।।

झुलत कोकवानी अमली हा, डारे खलल लगन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


तेंदू तीरे अपने कोती, चार खार मा नाँचै।

कोसम कारी कुरुलू कोवा, कखरो ले नइ बाँचै।

डिहीं डोंगरी के ये फर मन, राज करै जन जन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


पके पपीता लीची निमुवा, लाल कलिंदर चानी।

खीरा ककड़ी खरबुज अंगुर, करथे पूर्ती पानी।।

जर बुखार लू ला दुरिहाके, ठंडक लाथे तन मा।

किसम किसम के फर बड़ निकले, घाम घरी घर बन मा।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Sunday, 5 April 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 छत्तीसगढ़ी काव्य में शक्ति आराधना-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                छत्तीसगढ़ सबे प्रकार ले अग्रणी राज मा गिने जाथे, चाहे प्राकृतिक छटा होय, पर्वत पठार, जंगल खान खदान होय, कल कारखाना होय या फेर संस्कृति संस्कार।  छत्तीसगढ़ के संस्कृति सब ला अपन कोती खींच लेथे। संस्कृति संस्कार के बाना बोहे छत्तीसगढ़ के परब तिहार के घलो अलगे महत्ता हे। वइसने एक तिहार हे, आदिशक्ति दाई दुर्गा के उपासना के तिहार नवरात्रि।  नवरात्रि जेन बछर मा दू बेर आथे। एक कुँवार मा अउ एक चैत मा। कुँवार नवरात्रि अउ चैत नवरात्रि दूनों मा आदि शक्ति के उपासना,आराधना अउ पूजा पाठ जम्मो छत्तीसगढ़ के मनखें मन तन्मयता ले करथें। ये बेरा मा छत्तीसगढ़ के जम्मो गांव शहर, मंदिर देवाला अउ घरो-घर मा ज्योत जलाए जाथे। माता के भक्ति मा विधुन होके सेउक मन माता के आराधना करथें, सेवा अउ जस गीत गाथें। छत्तीसगढ़ मा कई कोरी देवी मंदिर हे, जिहाँ नवराति के पावन बेरा मा सुघ्घर भक्तन मन के मेला भराथे। डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी, दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी, रतनपुर के महामाई, कोरबा के कोशगाई, धमतरी के बिलई माता, चंद्रपुर के चन्द्रहादिनी, दुरुग के चंडी माई, सूरजपुर के कुदुरगढ़हिन माई, बंजारी दाई, भवानी माई, बूढ़ी माई आदि कस अउ कतको देवी मन पूरा छत्तीसगढ़ मा अपन आशीष अउ मया दुलार लुटावत हें। ता अइसन भक्क्तिमय बेरा मा कवि मन के कलम कइसे चुप रही सकथे? उंखरो कलम ले माता के भक्ति भाव, आखर रूपी गंगा बरोबर बहिथे। संगीतकार मन के महिनत अउ साज बाज के संग कवि के लेखनी ही गीत ला जनम देथे। नवराति के बेरा मा हजारों मनभावन गीत सुने बर मिलथे। ता आवन कवि मन के कविता मा देवी आराधना के दर्शन करथन।

              छत्तीसगढ़ के कोरा मा बिराजे दाई रणचंडी ला माथ नवावत लाला फूलचंद श्रीवास्तव जी लिखथें- 

*रणचंडी चढ़ आये खप्पर। नइ देखे अपन भेष।*

*जय जय जय जय कैसिल्या के जय देश।।*


                माटी पूत महान गायक अउ कवि लक्ष्मण मस्तूरिहा जी मन माता रानी के कतको अकन गीत कविता लिखें हें,अउ स्वर घलो दिए हें--

*हो मइया, तोर तीर आएंव तार लेबे।स्वर-कविता कृष्णमूर्ति*


*रतनपुर वाली महामाया मैया हे पुरवान।*

*शारद रूप सवांगे तोरे, जश गूँजें आसमान।*


              रतनपुर महामाई अउ डोगरगढ़हिन दाई बमलाई ला भाव पुष्प अर्पित करत कवियित्री आशा झा जी मन कहिथें-

*रतनपुर मा नरियर धर। बमलाई मा मूड़ नवा।*

*भोरमदेव मा बदना बदके। बिगड़े काम बना।।*


           हथबन्द के वरिष्ठ कवि चोवा राम 'बादल' जी मन माता रानी बर लिखथें--

*लाल चुनरिया लाल सँवागा, शेर सवारी तोर।*

*रावाँभाँठा के बंजारी, निकले धरती फोर।।*

*डोंगरगढ़ मा बमलाई के, लगे रथे दरबार।*

*शरण परे गोहारत हाववँ, सुन ले मातु पुकार।।*


           गाँव गाँव मा माँ शीतला अउ बंजारी दाई के बसेरा होथे, उन ला माथ नवावत, सुमधुर गीतकार छंदकार बलराम चन्द्राकर जी चौपाई के माध्यम ले कहिथें-

*नमन शीतला माँ कल्याणी।बंजारी माँ शक्ति भवानी।*


          कवि नन्दकुमार नन्दगँइहाँ दंतेश्वरी देवी ला सुमरत कहिथें-

*दंतेश्वरी दंतेवाड़ा तोर डेरा हे। जंगल भीतरी मा बसेरा हे।*

*संखनी डंकनी दू नदिया के। तोर तीर मा घेरा हे।।*


           माता रानी के हजारों सेवा गीत लिखइया, हर्ष कुमार बिंदु के कलम के एक भाव, दंतेश्वरी दाई बर-

*दंतेश्वरी तोर हवय महिमाके शोर।चारो दिशा मा मइया मोर।*


             कवि मोहन लाल वर्मा जी मन नवरात मा माता रानी के मनभावन दरबार के वर्णन करत कथें--

*आगे हे नवरात, बरत हे दियना बाती।*

*जगमग-जगमग जोत, करय उजियारी राती।*

*माता के दरबार, भगत मन आथें जाथें।*

*करके पूजा-पाठ, शक्ति ला माथ नवाथें।।*


          जस सम्राट दुकालू यादव के गीत बिना माता रानी के कोरा सुन्ना लगथे, उंखर गाये हजारों जस सेवा गीत, गांव गली मा नवरात्रि के बेरा सहज सुनाथे, वइसने एक गीत हे, गीतकार एम के कुर्रे के लिखे--

*मूड़ मा बिराजे हवै महामाई ना। मोहनी बरन लागे।*


           युवा कवि अउ गीतकार अनिल सलाम जी कहिथें-

*चंडी दाई के आएंव दुवार। आज मोर भाग जागे।*


             छंदकार ज्ञानू दास मानिकपुरी जी मन चंद्रसेनी दाई ला श्रद्धा सुमन अर्पित करत अपन कविता मा कहिथें

*चंद्रपुर तोर गाँव हे। चंद्रसेनी तोर नाँव हे।*


             पारितोष धीरेंद्र जी मन माता रानी बर लिखथें-

*दाई रतनपुर महामाई बरोबर। डोंगरगढ़ बमलाई आय।*

*कोरबा के सरमंगला दाई। छुरी के कोसगाई आय।*


            छत्तीसगढ़ जे देवी मन ला सुमरत श्रेमासिंह ठाकुर जी मन लिखथें--

*डोंगरगढ़ के बम्लेश्वरी ला सुमरंव,रायपुर के दुग्धा-धारी।*

*जय छत्तीसगढ़ सिरपुर चण्डी,राजिम लोचन खल्लारी।*

*बागबाहरा के चण्डी डोंगरी, कुंवर अछरिया बमलाई।*


             हमर छत्तीसगढ़ के सबे जिला मा कतकोन नामी देवी मन बिराजमान हें, अपन कविता मा सबे देवी मन ला सुमरत आचार्य तोषणकुमार चुनेंद्र जी मन लिखथें---

*सरगुजा म सरगुजहीन दाई दन्तेवाडा दन्तेश्वरी।*

*बालोद के मोर गंगा मंइया मल्हार म डिडिनेश्वरी।*

*अड़भार म अष्टभुजी मंइया मड़वा के मडवारानी।*

*कोरबा में सरमंगला दाई जशपुर काली भवानी।*


          छंदकार बोधनराम निषादराज विनायक जी मन लिखथें-

*आशीष बने, लेव  सबोझन, ये समलाई।*

*रिक्षिन   दाई, चंडी  दाई, अउ  महमाई।।*

*सर्वमंगला,   हे   बंजारी,    हे   बमलाई।*

*सत्ती   दाई,    गौरी - गौरा,  कोसागाई।।*


            छंद त्रिभंगी मा माता रानी ला मोरो भाव पुष्प अर्पित हे-

*नवरात लगे हे, आस जगे हे, माता रानी, आय हवै।*

*दर्शन पाये बर, जस गाये बर, सेउक सब जुरि-याय हवै।*

*सब करथें सेवा, पाथें मेवा, ढोलक माँदर, झाँझ बजे।*

*हे जोत जँवारा, तोरण तारा, रिगबिग रिगबिग, द्वार सजे।*

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


चैनल इंडिया में स्थान देने हेतु, स्वराज करुण जी को विशेष आभार, नमन

Saturday, 4 April 2026

गोपी छंद- बसंत ऋतु

 गोपी छंद- बसंत ऋतु

बसंती गीत पवन गाये।
बाग घर बन बड़ मन भाये।
कोयली आमा मा कुँहके।
फूल के रस तितली चुँहके।

करे भिनभिन भौरा करिया।
कलेचुप हे नदिया तरिया।।
घाम अरझे  अमरइया मा।
भरे गाना पुरवइया मा।।

पपीहा शोर मचावत हे।
कोयली गीत सुनावत हे।
मगन मन मैना हा गावै।
परेवा पड़की मन भावै।।

फरे हे बोइर लटलट ले।
आम हे मउरे मटमट ले।
गिराये बर पीपर पाना।
फूल परसा मारे ताना।।

फुले धनिया सादा सादा।
टमाटर लाल दिखे जादा।
लाल भाजी पालक मेथी।
घुमा देवय सबके चेथी।

मसुर अरहर मुसमुस हाँसे।
बाग बन खेत जिया फाँसे।
चना गेहूँ अरसी सरसो।
याद आवै बरसो बरसो।

सरग कस लागत हे डोली।
कहे तीतुर गुरतुर बोली।
फूल लाली हे सेम्हर के।
बलावै बिरवा डूमर के।।

बबा सँग नाचत हे नाती।
खुशी के आये हे पाती।
नँगाड़ा झाँझ मँजीरा धर।
फाग ले जावै पीरा हर।।

सुनावै हो हल्ला भारी।
मगन मन झूमै नर नारी।
प्रकृति सज धज के हे ठाढ़े।
मया मनखे मा हे बाढ़े।।

मटक के रेंगें मुटियारी।
पार खोपा पाटी भारी।
नयन मा काजर ला आँजे।
मया ममता खरही गाँजे।।

राग फगुवा के रस घोरे।
चले सखि मन बँइहा जोरे।
दबाये बाखा मा गगरी।
नहाये खोरे बर सगरी।

पंच मन बइठे बर खाल्हे।
मगन गावै कर्मा साल्हे।
ढुलावय मिलजुल के पासा।
धरे अन्तस् मा सुख आसा।।

हदर के खावत हे टूरा।
चाँट अँगरी थारी पूरा।।
चुरे हे सेमी अउ गोभी।
पेट तन जावै बन लोभी।

टमाटर चटनी नइ बाँचे।
मटर गाजर मूली नाँचे।
पपीता पिंवरा पिंवरा हे।
ललावत सबके जिवरा हे।।

हाट हटरी मड़ई मेला।
जिंहा होवय पेलिक पेला।
ढेलुवा सरकस अउ खाजी।
मजा लेवय दादी आजी।।

जनावत नइहे जड़काला।
प्रकृति लागत हावै लाला।
खुशी सुख मन भर बाँटत हे।
मया के डोरी  आँटत हे।

सबे ऋतुवन के ये राजा।
बजावै आ सुख के बाजा।
खुशी हबरे चोरो कोती।
बरे  नित दया मया जोती।

खैरझिटिया