Friday, 31 July 2026

आज के व्यवस्था ऊपर--कुंडलियाँ छंद

 आज के व्यवस्था ऊपर--कुंडलियाँ छंद


नेता मनके घर मिले, बोरा बोरा नोट।

कखरो डर उन ला नहीं, थरथर काँपय छोट।

थरथर काँपय छोट, चुकावैं पाई पाई।

बड़े खाय मिल बाँट, बने सब भाई भाई।

पइसा जेखर तीर, उही ए विश्व विजेता।

कुर्सी ला पोटार, खाय भारत ला नेता।


भारत भुइयाँ मा हमर, गजब मचे हे लूट।

मनखे आम पिसात हे, बड़का ला हे छूट।

बड़का ला हे छूट, करै रोजे मनमानी।

सुरसा कस मुह फार, खाय नित धन दोगानी।

धरम करम सत मान, बड़े मन हावैं बारत।

साथ देय सरकार, बढ़े आघू का भारत।


लंबा कर कानून के, धरे छोट के घेंच।

बात बड़े के होय ता, फँस जाये बड़ पेंच।

फँस जाये बड़ पेंच, करे का कोट कछेरी।

पद पइसा के तीर, लगावैं सबझन फेरी।

मूंदे आँखी कान, कलेचुप बनके खंबा।

देखे बस कानून, जीभ ला करके लंबा।


खीसा मा धनवान के, अफसर नेता नोट।

डरै आम जन देख के, वर्दी करिया कोट।।

वर्दी करिया कोट, सके छोटे मनखे ले।

गले कभू नइ दाल, बड़े मन उल्टा पेले।

नवें रथे दिनरात, छोट बन खम्भा पीसा।

अकड़ अमीर दिखाय, भरे हे कोठी खीसा।


फ्री के झोरे रेवड़ी, नेता अउ जन खास।।

आम आदमी  हे तभे, होवत हवे विकास।

होवत हवे विकास, फकत कुर्सी वाले के।

मर मोटा नइ पाय, आम जन ला सब छेंके।

कई किसम के टैक्स, देय पानी पी पी के।

मनखे आम कमाय, खाय नेता मन फ्री के।


करजा के दम मा बड़े, बड़े बने हे आज।

लोक लाज के डर नही, नइ हे सगा समाज।

नइ हे सगा समाज, कोन देखाये अँगरी।

रंभा रति नचवाय, मंद पी तीरे टँगड़ी।

इँखरे हे सरकार, भले मर जावैं परजा।

सकल सुरत पद देख, बैंक तक देवै करजा।


फर्जी फाइल ला धरे, होगे बड़े फरार।

रोक छोट के साइकिल, गरजै पहरेदार।

गरजै पहरेदार, दिखाके लउठी डंडा।

नाक तरी धनवान, लुटैं सब ला बन पंडा।

पद पा पूँजी जोर, करैं कारज मनमर्जी।

भागे तज के देश, बनाके फाइल फर्जी।


छोट मँझोलन के रहत, बचे हवै ईमान।

गिरथें उठथें रोज के, बड़े बड़े धनवान।

बड़े बड़े धनवान, चलैं पइसा के दम मा।

धर इज्जत ईमान, जिये छोटे मन कम मा।

जादा के ले चाह, नियत नइ देवैं डोलन।

चादर भीतर पाँव, रखैं नित छोट मँझोलन।


माया पइसा मा मिले, पइसा मा रस रास।

इज्जत देखे जाय नइ, पइसा हे यदि पास।

पइसा हे यदि पास, पास वो सब पेपर मा।

रखे जेन मा हाथ, पहुँच जाये वो घर मा।

पइसा मा धूल जाय, चरित अउ बिरबिट काया।

कोन पार पा पाय, जबर पइसा के माया।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मर लगगे फोटू विडियो-कुकुभ छंद

 मर लगगे फोटू विडियो-कुकुभ छंद


कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।

सबे चीज के फोटू विडियो, सदा मान थोरे पाही।।


सेवा सत सुख गुण गियान ला, देखाये बर नइ लागे।

तोपे ढाँके के उघरत हे, उघरे के हा तोपागे।।

हवै मनुष के आय जातरी, धारेच धार बोहाही।

कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।।


बर बिहाव छट्ठी बरही के, समझ आय विडियो फोटू।

मरनी हरनी जलत लाश ला, नइ छोड़त हावय मोटू।।

रील बनाये के चक्कर मा, नवा जमाना बोहाही।

कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।।


फोटू विडियो मा हे नत्ता, असल बइठगे हे भट्ठा।

मरगे हावय मान मनुष के, भक्ति भाव होगे ठट्ठा।।

आँखी मूँदे बर लागत हे, अउ का काली देखाही।

कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Wednesday, 29 July 2026

पइसा अउ संगी- सार छन्द

 पइसा अउ संगी- सार छन्द


पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।

रोज चढ़ाथें चना झाड़ मा, ख्वाब दिखा सतरंगी।।


काम करयँ नइ कभू अकेल्ला, रटथें यारी यारी।

जुगत बनाथें खाय पिये के, घूम घूम के भारी।।

चाँटुकार के घोर चासनी, बात कहयँ बेढंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


जिया जीतथें जुरमिल फोकट, झूठमूठ कर दावा।

राहन नइ दय पहली जइसे, रंग रूप पहिनावा।।

बना डारथें सिधवा ला तक, अपने कस हुड़दंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


देवयँ नइ सुझाव फोकट मा, साहब बइगा गुनिया।

किसन सुदामा के जुग नोहे, मतलब के हे दुनिया।

रसा रहत ले चुहके मनभर, तजयँ देख के तंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


अइसनो संगी मन ला मित्रा दिवस के बधाई

Sunday, 26 July 2026

जब तक चुनाव रिहिस

 खातू-कुंडलियाँ छंद


खातू मनके राज मा, खातू बर लुलवान।

खातू ले खेती हवै, का अब करन किसान।।

का अब करन किसान, अधर मा हवै किसानी।

कोन सुने गोहार, कोन दै खातू पानी।।

हें जे जिम्मेदार, सबे खाए के पातू।

संसो खाए खूब, कतिक कब मिलही खातू।।


जीतेन्द्र वर्मा'₹"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



जब तक चुनाव रिहिस


अच्छा दिन के हाव भाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

आम जनता के हियाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।1


आव अउ समस्या बताव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

अंडा मछरी भेल खाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।2


तेल पानी गैस में ठहराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

नारा मा महँगाई दुरिहाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।3


ईरान अमरीका संग जुराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

हारमुज ले बुलकत नाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।4


संसो के नइ दिखत सिर पाँव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

चारों खूंट विश्व गुरु के दबाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।5


जीतेन्द्र वर्मा'"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



गिरगिट जैसा रंग बदलो, राज करोगे।

समय देखके संग बदलो, राज करोगे।।

अपनो से लड़ रहे है, दुश्मन को छोड़कर,

तौर तरीका जंग बदलो, राज करोगे।।


अंग बदलो, राज करोगे।

जंग बदलो , राज करोगे।

बंग बदलो,, राज करोगे।

भंग बदलो,, राज करोगे।

सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद

 सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद


सड़क तीर के तोर खेत मा, नजर हवै बैपारी के।।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


नपा नपा के खेत खार ला, गाँजत हें उन मन खरही।

उँखर हाथ जा महतारी हा, दिखत हवै निच्चट मरही।।

टावर गारा छत मा दरके, छाती हा महतारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


साम दाम अउ दंड भेद ले, भुइयाँ ला उन कब्जाथें।।

नाका बंदी कर पिछोत के, मनखें मन ला रोवाथें।।

औने पौने देय दाम उन, लेय लाभ लाचारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


शासन अफसर सँग पा गरजे, बरजे नइ कोनो उन ला।

सोन उपजइया महतारी मा, छीचत हें उन मन घुन ला।

लोभ आय झन अउ सताय झन, संसो दुनियादारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद

 पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद


पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।

एक जमाना मा घर गाँव ह, सुख के लागे खान ।।


नइ माँगिस हे खपरा छानी, कभ्भू कूलर फ्रीज।

मुड़मिंजनी माटी के आघू, फेल लक्स अउ ब्रीज।।

छेना लकड़ी खाके हाँडी, हाँसे साँझ बिहान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


कोलाबारी के तरकारी, पारा ला दै तार।

नदिया नरवा बोरिंग कुआँ, बहे दूध कस धार।।

असली धन अरसी जौ सरसो, चना गहूँ अउ धान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


नीम आम अमली बर पीपर, देय फूल फर छाँव।

सिंहासन कस चौकउ चौरा, लगे सरग कस गाँव।

छत सीमेंट आय हे जब ले, तब ले हन हल्कान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


बबा कहानी रोज सुनावै, दाई लोरी गाय।

हाट सजे हर हप्ता हप्ता, चीज सबे मिल जाय।।

पेट संग मा जिया अघाये, गांव देय वरदान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।



सुविधा दुविधा बनत जात, हाल होय बेहाल।

महँगाई के मार पड़त हे, मनुष बजावँय गाल।।

सुरता जुन्ना समय आत हे, काला काय बतान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

खेती किसानी के गत-सरसी छंद

 खेती किसानी के गत-सरसी छंद


विलासना के चीज बनाये, ते होगे धनवान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।


पानी पुरवा के सँग चाही, खाये खातिर अन्न।

फेर आज ये काय चलत हे, सोच होय मन सन्न।।

खाली पेट दिमाक चले नइ, भरे आय तब ज्ञान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।


जांगर खपगे नांगर खपगे, खपगे आस तमाम।

कतका रुपया का के मिलही, गढ़े आन मन दाम।

उद्योगी बैपारी फुदरे, मनके बेंच समान।

साग दार फर अन्न उगाके,रावैं आज किसान।।


बिजनेस बढ़े बढ़े नौकरी, खेती ले दुरिहाँय।

जे हे थेभा ये दुनिया के, तौने भटका खाँय।।

खेत किसानी आये जिनगी, पाय किसानी मान।

साग दार फर अन्न उगाके,रावैं आज किसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वाटर पार्क-सरसी छंद

 वाटर पार्क-सरसी छंद


वाटर पार्क म नाहै खातिर, मनखें मन जुरियाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


घाट घठौंदा अरदा परदा, नइ हावै कुछु चीज।

बेढंगा सब झुमरत दिखथें, नइहें तौर तमीज।।

मजा मजा कहि मान बेंच के, छोट बड़े इतराँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


देहाती मन तँउरे तरिया, कहि नइ झाँकैं पार।

तेन तउल मा पानी पाके, होगे हें मतवार।।

मारे डींग खिंचाये फोटू, सुधबुध अपन भुलाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


नवा उदिम बैपारी मन के, आये सब ला रास।

देखे सुने म अटपट लागे, उड़े मनुष बन तास।।

नवा जमाना के बाजार म, लाज शरम बेंचाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को,कोरबा(छग)

स्कूल जाबों-लावणी छंद

 स्कूल जाबों-लावणी छंद


गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।

घण्टी तख्ता कुर्सी टेबल, आँखी आघू झूलत हे।।


खाना पानी पुस्तक कॉपी, सब हियाव कर धरना हे।

खेल कूद अब कमती करके,पढ़ई लिखई करना हे।।

भारी भरकम बस्ता हावय, साँस देख के फूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


बनही कतको झन स्कूल म, नवा नवा संगी साथी।

सबो किसम के ज्ञान ल पाबों, नइ छूटे माँछी हाथी।।

जघा जघा स्कूल खुले ले, अँधियारी पट धूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


पढ़बों लिखबों आघू बढ़बों, देखे सपना सिरजाबों।।

पढ़े लिखे के मोल गजब हे, पढ़ लिख ज्ञानी कहिलाबों।।

पढ़े लिखे ते छुवै अगासे, पढ़े नही ते ढूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

हम नहीं

 हम नहीं


रिश्ते बिगड़ने का किसी को कोई ग़म नहीं।

आज सबको सिर्फ़ पैसा चाहिए, हमदम नहीं।।


खंजर से खुदे ज़ख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

ज़ुबां से बढ़कर ज़माने में कोई बारूद-बम नहीं।।


खुद को राजा समझ रहे हैं रील वाले।

रीयल में उनमें ज़रा-सा भी दम नहीं।।


एकता, अखंडता, भाईचारा — सब दिखावा है।

ज़हर जाति-धर्म का हो रहा है कम नहीं।।


पता नहीं, ये पैमाना है या मौकापरस्ती।

देश संविधान से चलेगा, पर हम नहीं।।


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)



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नारा-स्वच्छता


जतके बढ़ही साफ सफाई।

ततके बढ़ही मान- बड़ाई।।


साफ सफाई जिंहा हे।

सिरतों सरग तिंहा हे।।


स्वच्छता जे अपनाथे।

वो निरोग हो जाथे।।


स्वच्छ शरीर रहे, स्वच्छ घर गली गाँव।

स्वच्छता चारो कोती रही, तभे होही नाँव।।


साफ सफाई के बिना।

जीना घलो का जीना।।


साफ सफाई देख के, मन मा खुशी हमाथे।

मन लगथे हर चीज मा, रोग- राई दुरिहाथे।।


स्वच्छ जंगल रहे, स्वच्छ नही ताल।

स्वच्छता अपनाबों, होबों खुशहाल।।


खुद साफ सफाई अपनावव।

दूसर ला घलो समझावव।।


खैरझिटिया

पर उपदेस (सार छंद)

 पर उपदेस (सार छंद)


देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।

स्वारथ मा सन काम करत हें, दया मया सत लेस।


धरम करम के बात करैं नित, कहैं झूठ झन बोलौ।

सुख सुम्मत मा जिनगी जीयौ, जहर कभू झन घोलौ।

बात मया मरहम के बोलँय, बाँटय उही कलेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


नशापान के हानि बतावँय, रोजे भाषण पेलें।

उहू भुलागे बात बचन ला, अध्धी पाव ढकेलें।

बिहना लागे संत गियानी, संझा बदले भेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


मनखे मनखे एके आवन, छोड़ौ कहै लड़ाई।

तिही बड़े छोटे नइ मानै, दाई ददा न भाई।

आन छोड़ दे अपने मन ला, पहुँचावत हें ठेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


कहिस तउन करके दिखलाइस, तुलसी बुद्ध कबीरा।

तज दिस धन दौलत वैभव ला, किसन पाय बर मीरा।

आज मनुष तज सही गलत ला, मारत हावँय टेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

सिस्टम के गलती-लावणी छंद

 सिस्टम के गलती-लावणी छंद


जियई मरई पढ़ई लिखई, नव जुग बर सब चलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


चलन बढ़त हावै एकल के, नत्ता रिस्ता दुरिहागे।

सबे शार्टकट कोती भागे, सोय रहे चाहे जागे।।

धीरज हे ना लाज शरम हें, यौवन मोम टघलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


नेता अधिकारी बिगड़े हें, बिगड़े हावैं खुद पालक।

अइसन मा घर के लइकामन, बनबें करहीं कुलघालक।।

कई किसम के कांड सुनावैं, लगथे कलयुग ढलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


निजीकरण होवत हे सबके, स्कूल औषधालय दफ्तर।

जिहाँ काम पइसा से मतलब, दया मया चूल्हा मा धर।।

नवा जमाना के गाना मा, लपर झपर एडल्टी ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

काखर गुण जस गावौं-सार छंद

 काखर गुण जस गावौं-सार छंद


अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।

उड़े हवा मा मैं मैं कहिके, वोला का समझावौं।।


कोनो जल ला कोनो थल ला, कोनो नभ ला नाँपे।

लड़े शेर बघवा भलवा ले, देखत जिवरा काँपे।।

दुर्लभ कारज करे कलेचुप, काखर नाम गिनावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


कोनो अतुलित बल के स्वामी, कोनो धन के राजा।

कोनो अद्भुत नाचे गाये, कोनो पीटे बाजा।।

कतको करतब हवै करइया, देख दंग रहि जावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


कलाकार के कला गजब हे, हावय सेवक दानी।

शूरवीर रँग रूप तेज मा, हें बड़ ज्ञानी ध्यानी।।

कठिन साधना सत जप तप ला, रोजे माथ नवावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 24 July 2026

बड़बोलापन ले बचव-सार छंद

 बड़बोलापन ले बचव-सार छंद


जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।

बड़बोलापन मा हो जाथे, जग मा अपन हँसाई।।


मिलत हवै बोले बर कहिके, आँय बाँय झन बोलव।

बानी ब्रह्म ए छल प्रपंच तज, अमृत बोल मा घोलव।।

बोल बढ़ाये मया दया अउ, बोल बढ़ाय लड़ाई।।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


झूठ बचन के उमर कहाँ, झूठ कराय फभीता।

लेय सहारा झूठ ढोंग के, रहै जउन हा रीता।।

काम दिखे बोली बयना मा, फोकट हे चिल्लाई।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


नव जुग मा रिकार्ड होवत हे, कथनी करनी सबके।

आज पाय नइ बोचक कोनो, बेरा नोहे तब के।।

कल परखे जाही बोली ला, तब होही करलाई।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Thursday, 23 July 2026

कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद

 कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद


कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।

हालत हो जाथे जब  खस्ता, तब पड़थे कदम उठाना।।


सिस्टम के टँगरी टूटत हे, विधि विधान नइहे एको।

होवत हवै हियाव धनी के, बाकी मनखें ला फेको।

सत्ता अउ शासन के बूता,  हाँ में हाँ हवैं मिलाना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


नांगर छोड़ किसान खड़े हें, अउ जांगर छोड़ कमैया।

स्कूल छोड़ के खड़े पढ़इया, डूबय मजदूरी नैया।।

फेरी वाले छेरी वाले, खावत हें रहि रहि ताना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


गाड़ी रोवय हाँड़ी रोवय, रोवय टपरी घर ठेला।

अस्पताल दफ्तर बन रोवय, गुरू संग रोवँय चेला।।

कलम धरइया आस बढ़ैया, सबके मुख में हें ताला।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Tuesday, 21 July 2026

आखिर क्यो मनाए जाते हैं,सावन भादो में ही अधिकतर त्यौहार?

 आखिर क्यो मनाए जाते हैं,सावन भादो में ही अधिकतर त्यौहार?


*सावन-भादो के व्रत-त्योहार: छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, नारी शक्ति और स्वास्थ्य चेतना*


छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति में कृषि परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहाँ का प्रत्येक व्रत-त्योहार, संस्कृति-संस्कार और पारंपरिक परंपराएँ कहीं न कहीं कृषि से गहराई से जुड़ी होती  हैं। धान की भरपूर उपज के कारण छत्तीसगढ़ राज्य को *‘धान का कटोरा’* कहा जाता है, और यहाँ मनाए जाने वाले अधिकांश पर्व धान की बुवाई या कटाई से संबंधित होते हैं, जैसे—अक्ति, जुड़वास, सवनाही, इतवारी, सम्मारी, हरेली, भोजली, पोला, नवाखाई, छेराछेरा और मेला मड़ाई। अन्य व्रत-त्योहार भी इसी कृषि चक्र से प्रेरित हैं, जो कृषक जीवन की लय और श्रम की गति को संतुलित करते हैं।


छत्तीसगढ़ की संस्कृति में व्रत और त्योहारों का स्थान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना, स्वास्थ्य चेतना और कृषक जीवन की आवश्यकताओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। एक रोचक तथ्य यह है कि वर्ष भर में मनाए जाने वाले अधिकांश प्रमुख त्योहार सावन और भादो मास में ही केंद्रित होते हैं। यह विचारणीय है कि इन्हीं दो महीनों में व्रत-त्योहारों की इतनी अधिकता क्यों होती है, जबकि इन्हें पूरे वर्ष में वितरित किया जा सकता था। इसका उत्तर छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, मौसमी परिस्थितियों और सामाजिक जीवन की संरचना में छिपा है।


इन महीनों के त्योहारों की एक विशेषता यह है कि इनमें व्रत आधारित पर्वों की संख्या अधिक होती है। *सावन सोमवारी, हरियाली, हरियाली तीज, पोला, कमरछठ, हलछष्ठी, नागपंचमी, ऋषि पंचमी, राखी,भोजली, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी* जैसे पर्व इसी समय मनाए जाते हैं। इन पर्वों में स्त्रियों-पुरुषों की समान भागीदारी रहती है, परंतु आयोजन और परंपरा का निर्वहन मुख्यतः महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। सावन सोमवारी, कमरछठ, हलछष्ठी,भोजली और तीज जैसे व्रत तो पूर्णतः महिलाओं द्वारा ही किए जाते हैं। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन है, बल्कि महिलाओं के सामाजिक नेतृत्व, सामूहिक सहभागिता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का भी प्रतीक है।


इन त्यौहारों के अलावा छत्तीसगढ़ में आदि काल से ही ग्राम-घर, खेती-किसानी की सुरक्षा और श्रमिकों को विश्राम देने के उद्देश्य से सप्ताह में एक दिन को पर्व के रूप में मनाने की परंपरा रही है। इसे विभिन्न गाँवों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है—जैसे इतवारी, बुधवारी, गुरुवारी आदि। इन पर्वों के दिन खेतों में कार्य नहीं किया जाता, जिससे कृषकों को मानसिक और शारीरिक विश्राम मिलता है। यह परंपरा सावन-भादो में विशेष रूप से प्रचलित है, जब खेतों में निंदाई-चलाई व रोपाई जैसे कार्य पूरे जोर पर होते हैं, और महिलाएँ कीचड़-भरे खेतों में दिनभर श्रम करती हैं। जिससे उनके हाथ व पैर पानी व कीचड़ के सम्पर्क में गलने लगते हैं। साथ ही लगातार बारिश में भी रहना होता है। ऐसे में यह पर्व उन्हें विश्राम और पुनर्नव ऊर्जा प्रदान करते हैं।


वर्षा ऋतु के चार महीने—सावन, भादो, आश्विन और कार्तिक—को चौमासा कहा जाता है। इस काल में वातावरण में अत्यधिक नमी, जलभराव, कीचड़ और जीवाणुओं की सक्रियता रहती है। परिणामस्वरूप पाचन क्षमता कमजोर हो जाती है और पेट, नाक, कान और गले से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। हमारे पूर्वजों ने इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए व्रत-उपवास की परंपरा को जन्म दिया। और इन्ही चार महीनों में अधिकतर व्रत वाले त्यौहार होते हैं। उपवास के माध्यम से शरीर को विश्राम मिलता है, आहार पर नियंत्रण से स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है, और रोगों से बचाव संभव होता है। यह परंपरा न केवल शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी है, बल्कि मानसिक संतुलन और आत्मसंयम का अभ्यास भी कराती है।


सावन-भादो के पर्व कृषक जीवन की आवश्यकता से भी जुड़े हैं। लगातार खेतों में काम करने से कृषकों का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। ऐसे में व्रत-त्योहार उन्हें मानसिक और शारीरिक विश्राम प्रदान करते हैं। साथ ही, यह पर्व कृषक वर्ग को कठिन श्रम से कुछ समय के लिए दूर कर सामाजिक और पारिवारिक जीवन से जुड़ने का अवसर भी देते हैं। यदि व्रत-त्योहारों की परंपरा न होती, तो कृषक वर्ग लगातार खेतों में कार्य करता रहता, जिससे उनका स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता था।


इस प्रकार सावन और भादो मास में व्रत-त्योहारों की अधिकता केवल धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकता से जुड़ी हुई है। इन पर्वों के माध्यम से न केवल स्वास्थ्य की रक्षा होती है, बल्कि कृषक जीवन को संतुलन और विश्राम भी मिलता है। और इन सबमें महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी होती है, जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना, नारी शक्ति और कृषि जीवन की जीवंतता को दर्शाती है।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बरसा घरी तरिया-लावणी छंद

 बरसा घरी तरिया-लावणी छंद


पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।

लात तान के जीव ताल के, पानी भीतर सोगे हे।।


छिनछिन बाढ़य घाट घठौदा, डूबत हावँय पचरी हा।

झिमिर झिमिर जल धार झरत हे, नाचैं मेढ़क मछरी हा।

गावत छोटे बड़े मेचका, कूदा मारैं पानी मा।

हाथ गोड़ लहरावैं कछुवा, बरखा के अगवानी मा।

सबे जीव खुश नाचय गावय, डर दुख संसो खोगे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


ढेर मरत नइ हवै ढोंड़िहा, सरपट सरपट भागत हे।

लद्दी भीतर बाम्बी मोंगर, सूतत नइहे जागत हे।

बिहना ले मुँधियारी होगे, भइसा भैइसी बूड़े हे।

लइका कस चढ़ चढ़ कूदे बर, मेढ़क मछरी जूड़े हे।

डड़ई डुडुवा रोहू कतला, गरमी भर दुख भोगे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


पाँखी माँगत हावै पखना, सरलग पानी देख बढ़त।

घूरौं झन कहि डर के मारे, हावय मंतर पार पढ़त।

बने हवै बर पाना डोंगा, सब ला पास बुलावत हे।

मनमाड़े खुश होके लहरा, संझा बिहना गावत हे।

लहू चढ़ाये बर लागत हे, धरे जोंक ला रोगे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


हरियर हरियर पार दिखत हे, भरे लबालब तरिया हे।

ताल कभू नइ पूछे पाछे, कोन गोरिया करिया हे।

तिरिथ बरोबर तरिया लागे, तँउरे तर जावै चोला।

मुचुर मुचुर मुस्कावत हावै, नन्दी सँग शंकर भोला।

जीव जरी का कमल कोकमा, सबे मया मा मो गे हे।

पानी गरमी घरी रिहिस कम, अब टिपटिप ले होगे हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Thursday, 16 July 2026

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वैध शराब-कुंडलियाँ

 वैध शराब-कुंडलियाँ


पीयव वैध शराब ला, हे अवैध बेकार।

साथ देव सरकार के, झन पारव गोहार।

झन पारव गोहार, कोष बर हवै जरूरी।

जनता मन के मांग, इही मा होही पूरी।।

भट्ठी बढ़ही रॉज5, मरौ चाहे तुम जीयव।

सरकारी फरमान, वैध दारू ले पीयव।।


मानो शासन बात ला, होठ दाँत मा दाब।।

वैध शराब अमृत हरे, जहर अवैध शराब।

जहर अवैध शराब, बचो पीये ले येला।

बेंचे जेला लोग, कई मोहल्ला ठेला।।

वैध शराब बिसाव, स्वाद ओखर पी जानो।

भरत हवै नित कोष, बात शासन के मानो।।


भट्ठी हे सरकार के, काबर जाथस भूल।

दू पइसा बचही कही, इती उती झन ढूल।

इती उती झन ढूल, तीर के भट्ठी मा जा।

होही यदि तकलीफ, बात शासन ला बतला।।

असली मंद खरीद, मना शादी अउ छट्ठी।

झांक तीर तखार, हवै सरकारी भट्ठी।


 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


चुप हैं


बाबा लोग लत लोभ और प्रपंच लेकर चुप हैं।

नेता साहब वैपारी नोटों का बंच लेकर चुप हैं।।

आम जनता शिफ्ट बलेनो पंच लेकर चुप हैं।।

वक्ता कवि लेखक माइक मंच लेकर चुप हैं।।

अय्यासी करने वाले माल टंच लेकर चुप हैं।।

दल्ला लोग टूर और पंच लंच लेकर चुप हैं।।


खैरझिटिया


पावस पावन-सवैया


पावस पावन आ बरसावन लागत हे रस धार सखा।

तरिया परिया हरिया भरगे जल लांघत हावय पार सखा।।

गरजे बदरा चमके बिजुरी जस मातय हावय रार सखा।

झिंगुरा खग दादुर मोर ह गावय लागय रोज तिहार सखा।।


खोर गली बन बाग कली सब नीर ल पी मुस्कात जही।

ताल कुआँ नदिया नरवा भरही तब दादुर बात कही।।

सूरज देव लुकाय रही त बिहान घलो हर रात रही।

झींगुर चातक मोर खुशी अब मोर जिया म हमात नही।।


पावस के बड़ पावन बूंद ल लावत हे बरसा धरके।

हाँसत हे बखरी अउ रोज नहावत हे परवा घर के।।

ताल खुशी म नाचत हे सुर छेड़त हे डबरा भरके।

मंद फुहार धरे बरसा सब जीव म आस भरे झरके।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा


https://youtu.be/j2V9_XbiozI?si=nW_f6ZdokiZwPjCg


मनखें मनके अति-सार छंद


सब के संख्या हवै बराबर, ताल मेल तभ्भे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


हवा दवा फर फूल देय बन, बन बिन नइ जिनगानी।

ताल नदी नरवा नदिया दै, जीव जंतु ला पानी।।

माटी उप्पर छाभे गारा, ये जग संकट में हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


मनखें मनके स्वारथ आघू, कुछु हा नइ बाँचत हें।

हाय हटर कर रतन जोरके, देख देख नाँचत हें।

हाथी माँछी कुकुर बिलाई, धरती मा सब्बे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


कोनो काटे बन बिरवा ला, कोनो नदिया पाटे।

मछरी कुकरी कुकुर मार के, लहू घलो ला चाँटे।।

मनुष अकेल्ला जी पाही का, कतका अवकाते हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


मनखें करैं जे मन मा आये, कइसन किरिया खाहे।

अपन जघा मा सबें जियत हें, तभो जातरी आहे।।

भुगते पड़ही करनी के फल, लिखे विधाता जे हे।

जड़ चेतन चाहे हो कोनो, ये धरती सबके हे।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


काव्याञ्जलि- दलित जी

 काव्याञ्जलि- दलित जी


करिस छंद के जौन हा, लिख लिख नित बढ़वार।

पग मा माथ नवाँव मँय, पिरो भाव के हार।।1


नाँव मिटाये नइ मिटै, करनी जेखर पोठ।

साहित के आगास मा, बरै सियानी गोठ।।2


पैरी जब जब बाजही, मुख मा आही गीत।

दया मया सत बाढ़ही, फुलही फलही मीत।।3


रचना रिगबिग हे बरत, भले बछर गे बीत।

डहर नवा गढ़ते हवै, जनकवि जी के गीत।।4


जनकवि जी के काव्य ए, जन जन के आवाज।

पढ़े दलित जी मंच ले, करै जिया मा राज।।5


नाँव अमर जुगजुग रही, जब तक पुरवा नीर।

जनकवि कोदू राम जी, लिखिन जगत के पीर।।6


साहित के वो देंवता, जनकवि वो कहिलाय।

बगरै बाँढ़य छंद बड़, आस ओखरे आय।।7


सँजो ददा के आस ला, अरुण निगम जी आज।

पालत पोंसत छंद ला, करत हवैं निक काज।।8


साधक बन सीखत हवैं, कतको कवि मन छंद।

महूँ करत हँव साधना, लइका अँव मतिमंद।।9


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को (कोरबा)


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संगीत की दुनिया ही अलग है

 संगीत की दुनिया ही अलग है


संगीत में शक्ति है,

संगीत में विरक्ति है।

संगीत में अभिव्यक्ति है,

संगीत में भक्ति है।

संगीत में भाव है,

संगीत में जुड़ाव है।

संगीत में लगाव है,

संगीत नाव है।

संगीत के बिना सब अलग-थलग है,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत में धरती है,

संगीत में अंबर है।

संगीत में कानन है,

संगीत में घर है।

संगीत में सादगी है,

संगीत में आज़ादगी है।

संगीत हकीम है,

संगीत असीम है।

संगीत में थिरकते सबके पग हैं,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत हवा है,

संगीत दवा है।

संगीत साज है,

संगीत आवाज़ है।

संगीत परवाज़ है,

संगीत रिवाज़ है।

संगीत तलाश है,

संगीत मोह-पाश है।

संगीत विश्वास है,

संगीत सबसे ख़ास है।

संगीत सुनते जड़-चेतन नभ-खग हैं,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत में प्रीत है,

संगीत अमृत है।

संगीत में जीत है,

संगीत में रीत है।

संगीत आनंद है, 

संगीत परमानंद है।

संगीत में न भूख है, न प्यास है,

कला साधकों के लिए संगीत एक आस है।

जो संगीत से भागे, वह ठग है,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


संगीत सुकून है,

संगीत धुन है।

संगीत प्रसून है,

संगीत बिन सब सून है।

संगीत भोर है,

संगीत शाम है।

संगीत स्वर है,

संगीत आराम है।

संगीत उड़ान है,

संगीत उत्थान है।

संगीत ईमान है,

संगीत पहचान है।

संगीत में समाया सारा जग है,

संगीत की दुनिया ही अलग है।।


 जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा (छग)


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साथी कस हवा बरोड़ा-लावणी छंद

 साथी कस हवा बरोड़ा-लावणी छंद


हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।

बिजली चमके बादर गरजे, घूमन बन बन हाथी कस।।


बादर पानी देखत लइका, घर भीतर आज लुकाये।

फेर हमन ला हवा गरेरा, संगी के असन बुलाये।।

भाग ठिहा ले खेत खार मा, रेंगत राहन पाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


घाम घरी भर खेत खार मा, डारे राहन सब डेरा।

कांदा कूसा फर फुलवा बर, रोज लगावन फेरा।।

बाग बगीचा खेत मेड़ मा, रहन बइठ शरनाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


आमा अमली काइत जामुन, बेल लान बिन बिन के।

एक जघा सँकला के बाँटन, फर फुलवा गिन गिन के।।

खेत खार बन बाग मया ला, गठियाय रहन थाथी कस।

हवा बरोड़ा झाँझ अउ झोला, लागे संगी साथी कस।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

छत्तीसगढ़ मा अभिवादन के परम्परा मा जोहार अउ जय जोहार*

 *छत्तीसगढ़ मा अभिवादन के परम्परा मा जोहार अउ जय जोहार*


गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज भगवान के नाम के महिमा के बखान करत लिखथें कि- 

1,एक घड़ी आधो घड़ी, पुनि आधो के आध।

 तुलसी चर्चा राम के, कटे कोटि अपराध।।


2,कलयुग केवल नाम अधारा।

 सुमर सुमर नर उतरहीं पारा।।


                आदिजुग ले मनखें मन भगवान के महिमा के गुनानवाद करत आवत हें, नाम लेवत आवत हें, चाहे भजन कीर्तन होय या फेर दुआ सलामती या फेर अभिवादन। भारतीय संस्कृति मा अभिवादन करे के जुन्ना परम्परा हे। अभिवादन मा जय राम, राम राम, जय श्री कृष्ण, राधे राधे, सीताराम, जय भगवान, जय भोले, हरि ओम, जय माता दी आदि ...... कस कतकोन नाम मनखें मन लेथें। जेमा वो विधाता के नाम तो लेवाते हे, संगे संगे इही अभिवादन के बहाना मनखें के आत्मीय जुड़ाव, मया ममता अउ सादर सम्मान के भाव घलो दिखथें। वइसे तो बड़े के छोटे मन पाँव पायलागी करथें, फेर गांव घर के रोज मिलइया लइका, सियान, जवान मन ला अभिवादन करके आदर भाव दे जाथें। अभिवादन के शब्द बोले बर बड़े छोटे नइ लगे सब अपन जुड़ाव अउ विनम्रता देखावत अभिवादन करथें। छत्तीसगढ़ मा मितान बदे के घलो रिवाज। एक मितान दूसर मितान ल घलो बरोबर अभिवादन के शब्द बोलथे, जैसे- सीताराम मितान, जय जोहार मितान, सीताराम गंगाजल, गंगाबारु आदि आदि।

                        मनखें मनके आपस मा मेल मिलाप के बेरा अभिवादन स्वरूप भगवान मनके नाम लेय के ये जुन्ना परम्परा, आजो सरलग चलन मा हे। आज आधुनिक काल मा गुडमार्निंग, गुड़ इवनिंग,हाय हलो,नमस्ते----आदि  कस कतको नवा शब्द घलो सुनब मा मिलथे। पंथ अउ समाज के अनुसार घलो अभिवादन मा जय सतनाम, साहेब बन्दगी, जय बूढ़ादेव, जय बड़ादेव, जय लोधेश्वर, जय बहादुरीन कलारिन, जय राजिम दाई, जय शकाम्भरी........ आदि कस अउ कतकोन अपन अपन इष्ट देव के नाम लेवत मनखें मन दिखथें। धरम अनुसार घलो अलग अलग अभिवादन के शब्द प्रचलित हे, जैसे सलाम, खुदा हाफिज आदि आदि। हमर भारत वर्ष मा भिन्न भिन्न राज के पहिचान उंखर अभिवादन ले घलो हो जथे, जइसे तमिलनाडु अउ केरल मा वणक्कम, पंजाब मा सत श्री काल, राजस्थान मा खम्बा घणी, गुजरात मा केम छो ---आदि चलथे, वइसने हमर राज छत्तीसगढ़ के बहुप्रचचित अभिवादन के शब्द आय जोहार। हमर छत्तीसगढ़ के पार परम्परा, संस्कृति संस्कार अउ तीज तिहार मा कृषि अउ ऋषि संस्कृति के साथ साथ आदिवासी संस्कृति के घलो बरोबर योगदान हें। "जोहार" जे आदिवासी संस्कृति के उपज आय।  जेला मुख्य रूप ले आस्ट्रो एशियाई/मुंडारी या सन्थाली भाषा ले निकले एक आदिवासी अभिवादन के शब्द माने जाथे। जेखर मूल अर्थ मा प्रकृति के प्रति भाव समर्पण समाहित हे। "जोहार" हमर छत्तीसगढ़ के संगे संग उड़ीसा, झारखंड, मध्यप्रदेश अउ पश्चिम बंगाल के वनांचल क्षेत्र मा अभिवादन के रूप मा सुने बर मिलथे। जोहार माने जो अउ हार या जउन हार गय हे, उंखर मन बर या उंखर जयकार, अइसन शाब्दिक अर्थ बिल्कुल भी नोहे। बल्कि जोहार के एक  अर्थ- जय+हर ला माने जाथे, जय मतलब जय जयकार अउ हर माने प्रकृति के देवता भगवान शिव। मतलब जोहार मा भगवान शिव अउ प्रकृति के जयजयकार समाहित हे। भगवान शिव आदिवासी संस्कृति मा अपन विशेष स्थान रखथें, बड़ादेव, बूढ़ादेव......आदि रूप मा भी भगवान शिव ला पूजे भी जाथे। जोहार के मूल मा सबके कल्याण करइया भगवान शिव अउ प्रकृति के जयकार हे। जोहार कहे से देश, राज,पेड़ प्रकृति अउ मनखें संग जीव जानवर आदि सबो के सलामती अउ बढ़वार के भाव झलकथे। 

           कतको मनखें मन जोहार के संग जय जोड़के "जय जोहार" घलो कथें, जेला सियान/ जानकार मन सही नइ माने।जइसे  राम राम ह जय राम होइस, जय, भोले ह जय भोले होइस, सतनाम ह सतनाम  होइस.......... लगथे इही सब के देखा देखी अउ भाव प्रवाह  के सेती जोहार घलो आज "जय जोहार" के रूप ले ले हे। जानकार मन जोहार शब्द ला अपन आप मा पूर्ण अउ सार्थक अभिवादन के शब्द माने हें, फेर अभी चलन मा जय जोहार घलो हे। जय जुड़े के एक कारण यहू हो सकथे। जइसे खेवनहार, पालनहार, संहार------ आदि शब्द ल देखबों ता येमा हार मतलब हरना अर्थ हे। आखिर खेवनहार/पालनहार/डोंगहार------ तो वो विधाता/भगवान ही आय। मतलब जोहार  माने जो हरन करने वाला ए, अर्थात जो दुख हरइया ए। अइसन दुख हरइया के जय हो, इही भाव मा "जय जोहार" घलो प्रासंगिक लगथे। जोहार के घलो दू भेद दिखथे- सेवा जोहार अउ जय जोहार। आज  सेवा जोहार बनांचल अउ जयजोहार मैदानी छत्तीसगढ़ के अभिवादन के शब्द बन गय हे। उड़ीसा, झारखंड,पश्चिम बंगाल अउ मध्यप्रदेश के वनांचल क्षेत्र मा आजो अभिवादन बर जोहार ही बोले जाथें। 

                     पहली बेर जोहार कोन बोलिस होही, ये शब्द इहाँ कब ले प्रचलित हे, ए डाहर जाबों ता रामचरित मानस के अयोध्याकांड मा एक चोपाई हे, जेमा निषादराज जी महराज भगवान राम ले मिले के बेरा उन लाजोहार करत अपन सैन्य साज के बढ़वार के कामना करत दिखथें--

*चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥*

माने निषादराज जी द्वारा त्रेता युग मा ये शब्द के प्रयोग के वर्णन मिलथे। निषादराज जी पेड़ प्रकति के बीच रहत रिहिन ते पाय के वनांचल मा ये शब्द आजो प्रचलित हे। जोहार ले ही जोहारना बने हे, जेखर मतलब हे अपन श्रद्धा भाव ला व्यक्त करना। यादव भाई मन के दोहा मा सुने बर घलो मिलथे, "ठाकुर घर जोहारेल गेंव बुचुवा हड़िया मा बासी रे" माने  मिलेल जाना, भाव प्रकट करना एखर मूल अर्थ ए। पौनी पसारी के नेंग करत गांव मा ठाकुर, लोहार, बैगा आदि मन घलो घर घर जोहारथे अउ अपन पौनी पसारी लेथें।। कुछ मन भड़के, चिढ़े या खिसियात बेरा घलो कथें कि "मैं फलाना ला बनेच जोहारेंव" फेर एखर मतलब सकारात्मक न होके अपन रिस/रोष ला व्यक्त करना हे।

                     जोहार शब्द ला लेके छत्तीसगढ़ी मा कतको कन मनमोहक गाना सुने बर मिलथे। 


कुछ गीत के मुखड़ा प्रस्तुत हे- जोहर जोहर मोर ठाकुर देवता/ 

बिहना के जोहार लेले, मुस्काके जोहार लेले।

 देवी जोहार-जोहार/

 तोला गाड़ा गाड़ा जोहार/

तैं जोहार लेबे संगी/

जोहार ले सगा/

छेरछेरा जोहार/

तोला सौ सौ जोहार, घेरी बेरी जोहार।।

सेवा जोहार/

जोहार जोहार दाई/

तोला जोहार दाई/जोहार हे जोहार हे/

जोहार जोहार देव 

जोहार बुढ़िदाई------


आदि कतकोन गीत मा जोहार संघरे हे, कुछ गीत मन मा मा जय जोहार भी हे। जइसे- जय जोहार ले ले मोर भैया.... अउ कतकोन गीत हे

  

                    जोहार सिर्फ अभिवादन के शब्द नोहे, येला  बोले भर नइ जाय बल्कि बोलत बेरा हाथ घलो जोड़े जाथे, जेमा सम्मान, विनम्रता अउ आदर के भाव झलकथे। सार मा कहन ता जोहार मा जग कल्याण के भाव, आदर सत्कार, विनम्रता,अभिवादन, सुवागत आदि के संगे संग एक भावात्मक जुड़ाव हे। ता आप जम्मो ला मोर जोहार हे पायलागी हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बुलडोजर एक्शन- सरसी छंद

 बुलडोजर एक्शन- सरसी छंद


घर गरीब के बुलडोजर मा, होवत हे जमिदोज।

बनत बंगला हे सरकारी, देय बनइया पोज।।


अपन अटारी बंगला खातिर, तोड़ें पर के ठौर।

गुड़ी गांव जंगल ला चगले, नेता मन बन रौर।।

नवें रहें कुर्सी पाये बर, पद पा कहैं न सोज।

घर गरीब के बुलडोजर मा, होवत हे जमिदोज।।


वोट पाय बर आँख मूंद दैं, परखें नइ सच झूठ।

जीत जाय ता आय जातरी, खड़ें रहैं बन ठूठ।।

हाथ मिला उद्योगी हांसे, खावत छप्पन भोज।

घर गरीब के बुलडोजर मा, होवत हे जमिदोज।।


दीन हीन मन तोर मोर के, झंडा डंडा थाम।

आपस मा ही लड़थें मरथें, गिरा मान अउ दाम।।

तेखर सेती बड़का मन हा, चलें चाल खा बोज।

घर गरीब के बुलडोजर मा, होवत हे जमिदोज।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

शक्ति छंद

 शक्ति छंद


गड़ी चल ढुलाबों बना गड़गड़ी।

हवे तेल पानी म बड़ गड़बड़ी।।

बने हे तभो ले कहै गड़कड़ी।।

जुड़ावै इही सोच के अब नड़ी।।


खैरझिटिया

डिजिटल युग कब तक टिकही-सार छंद

 डिजिटल युग कब तक टिकही-सार छंद


हे अवशेष हजार साल के, कागज पाथर रूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


सबें चीज डिजिटल होवत हे, बात खुशी के आये।

लउहा लउहा काम होत हे, सब मनखें अपनायें।।

रुपिया पइसा पोथी पाथर, घूमे डिजिटल लूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


नाम काम तक डिजटल होगे, डिजटल होगे सेवा।

कोन जनी काली का होही, कोन ह खाही मेवा।।

डिजिटल डाटा डिलीट होय त, जाथे अंधा कूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


डिजिटल डाँका के तक डर हे, मनुष बने हे थोरे।

नेट सेट अउ पासवर्ड बिन, डिजिटल दाँत निपोरे।।

मिला डरे हन अमृत मदरस, दूध दही सब सूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


का पीतल सोना चांदी कस, डिजिटल सिक्का चलही।

कोष खजाना कोठी धन बिन, डिजिटल भजिया तलही।।

बिन अवशेष कहाँ हो पाही, अंतर रंक-उ भूप म।

का टिक पाही डिजिटल बेरा, वर्षा जाड़ा धूप म।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

बस मिही भर बोलत हँव।

 बस मिही भर बोलत हँव।


अखबार चुप हें, बाजार चुप हें।

विस्तार चुप हें, सार चुप हें।।

संसद चुप हें, सड़क चुप हें।

दमदार चुप हें, कड़क चुप हें।।

रीत चुप हें, नीत चुप हें।

गाथा चुप हें, गीत चुप हें।

निराशा चुप हें, आशा चुप हें।

आखर चुप हें, भाषा चुप हें।।

मैं कोरा कागत अपन गत तोलत हँव।

सब तो चुप हें,बस मिही भर बोलत हँव।।


छोटे चुप हें, बड़े चुप हें।

सोए चुप हें, खड़े चुप हें।।

कोट चुप हें, कछेरी चुप हें।

दुकान चुप हें, फेरी चुप हें।

गांव चुप हें, शहर चुप हें।

गहर चुप हें, लहर चुप हें।

विज्ञान चुप हें, भूगोल चुप हे।

बाँसुरी चुप हें, ढोल चुप हें।।

मैं मुँह लुकात बेगारी, मुँह खोलत हँव।

सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।


सवाल चुप हें, जवाब चुप हें।

जागरण चुप हें, ख्वाब चुप हें।।

दिल्ली चुप हें, दरबार चुप हें।

नींव चुप हें, मीनार चुप हें।।

मौज चुप हें, दर्द चुप हें।

पावस चुप हें, सर्द चुप हें।

मेढ़क चुप हें, मयूर चुप हें।

कौवाँ चुप हें, कुकुर चुप हें।

मैं आदमी अपन आप ला टटोलत हँव।

सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।


सदी के महा महानायक चुप हे।

खिलाड़ी चुप खलनायक चुप हें।।

टाईगर चुप हें, भाई चुप हें।।

पालक चुप हें, कसाई चुप हें।।

डंडा चुप हें, झंडा चुप हें।

मौलवी चुप हें, पंडा चुप हें।।

समाजसेवी, समाज सुधारक चुप हे।

धरम करम धरइया प्रचारक चुप हें।।

सत्ता के सुख पाय बर विष घोलत हँव।

सब तो चुप हें,बस मिही भर बोलत हँव।।


शेर चुप हें, सियार चुप हें।

मचान चुप हें, मियार चुप हें।

सच चुप हें, झूठ चुप हें।

बहार चुप हें, ठूठ चुप हें।।

बाजा चुप हें, राजा चुप हें।

बासी चुप हें, ताजा चुप हें।

आम चुप हें, खास चुप हें।।

मंजिल चुप हें, तलाश चुप हें।।

छद्म आँधी मा रहिरहि डोलत हँव।

सब तो चुप हें,बस मिही भर बोलत हँव।।


आलू चुप हें, गोभी चुप हें।

चमचा चुप हें, लोभी चुप हें।।

चोर चुप हें, रखवार चुप हें।

ज्ञानी चुप हें, गवाँर चुप हें।।

सग चुप हें, आन चुप हें।।

रात चुप हें, दिनमान चुप हें।।

प्रीत चुप हें, बैर चुप हें।।

हाथ चुप हें, पैर चुप हें।।

मैं पापी पेट भूख मा डोलत हँव।

सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।


बार चुप हें, मास चुप हें।।

दूर चुप हें, पास चुप हें।।

शिव चुप हें, जीव चुप हें।

दूध चुप हें, घीव चुप हें।।

सोना चुप हें, चाँदी चुप हें।

बफे चुप हें, माँदी चुप हें,

शिक्षा चुप हें ,भिक्षा चुप हें।

तृप्ति चुप हें, इच्छा चुप हें।।

आँखी के आंसू मा मछरी झोलत हँव।

सब तो चुप हें, बस मिही भर बोलत हँव।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

प्रेम, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम - पुन्नी के चंदा*

 *प्रेम, लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम - पुन्नी के चंदा*


डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ की पुस्तक पुन्नी के चंदा छत्तीसगढ़ी साहित्य की एक उल्लेखनीय कृति है,जिसमें प्रेम,लोकजीवन और सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह मात्र कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि कवि के हृदय में समाहित प्रेम की सजीव अभिव्यक्ति है। ‘पुन्नी’ उनकी धर्मपत्नी का नाम है और ‘चंदा’ स्वयं कवि का प्रतीक बनकर सामने आता है। इस प्रकार यह कृति व्यक्तिगत प्रेम और आत्मीयता को साहित्यिक रूप देती है। कविता-संग्रह में गीत, साल्हो, गीतिका, ददरिया और ग़ज़लें सम्मिलित हैं, जिनमें घर-गाँव, खेत-खार, नदी-पहाड़, मेला-मड़ई और भाव-भजन का चित्रण है। कवि ने प्रेम की कोमल अनुभूतियों के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों, जैसे विवाह की गंभीरता और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता, को भी रेखांकित किया है। साथ ही छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक सहिष्णुता और मेहनतकश जीवन को गौरवगान के रूप में प्रस्तुत किया है। 

पहली ही कविता में कवि अपनी प्रेयसी से अपने प्रेम को पढ़ने का अनुनय विनय करता हुआ दिखाई देता है, साथ ही यह ज्ञात होता है कि यह गीत कवि द्वारा लिखित एक प्रेम पत्र है।

थोरिक आरो ले ले ओ।

मोर जी हा जुड़ाही थोरिक आरो ले ले ओ।

सबों कइथें तोर मया म हो गेंव मय मतवार ।

डोंगरगढ़ हा देखबे बनहीच अब तोर ससुरार ।। थोरिक आरो ले ले ओ।....


पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक कवि और उसके प्रेयसी के मध्य पनपने वाले प्रेम को सहज समझ सकते हैं। बम्लेश्वरी धाम डोंगरगढ़ का विशेष जिक्र कवि ने किया है, साथ ही डोंगरगढ़ को प्रेयसी का मायका भी बताया है। प्रेम के एक बानगी इस कविता में देखिए-


सोवत जागत उठत बइठत तोरेच गीत मंय गाथंव।

आरो पाके तोर मंय जोड़ी एती ओती जाथंव।

मोर सुख चैन नींद गंवागे ओ, 

काली महुआ बीने ल तंय आबे ।।..


अटूट प्रेम प्रदर्शित करती काव्य पंक्तियां दृष्टव्य हैं- 

तोर बिगर जिनगी के आज कोनो ठिकाना नइहे।

तोर रहे ले मंय हंव, तंय नइ त ये जमाना नइहे।


शादी का बंधन केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि एक गहन जिम्मेदारी है। विवाह तभी किया जाता है जब युवक- युवती आत्मनिर्भर होकर कमाने लगता है, क्योंकि उसे परिवार का भरण-पोषण करना होता है। साथ ही सही उम्र भी जरूरी है। इसी तथ्य को कवि विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहता है कि विवाह का उद्देश्य केवल उत्सव या आनंद नहीं, बल्कि जीवन की जिम्मेदारियों को निभाना है। यथा -

भांवर के पहिले चेतव चेतावव पढ़व अउ कमाव गा। 

गुड्डा-गुड्डी के खेल नइहे टूरा-टूरी के बिहाव गा।।

निम्नलिखित कविता में कवि ने छत्तीसगढ़ की महानता का गुणगान किया गया है। साथ ही अपने प्रदेश को महान बताते हुए उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को उजागर किया है-

काकर पांव पखारंव मैं अउ काकर करंव बखान

मोर छत्तीसगढ़ हे महान।

साल्हो, पंडवानी अउ ददरिया सबो के मन ल भाथें

राऊत नाचा, पंथी अउ करमा हर उत्सव म सुहाथें

इहां के कन-कन म लिखे हे गीता अउ कुरान

मोर छत्तीसगढ़ हे महान....


कवि कहता है कि मेहनत, देह का पसीना और मिट्टी ही छत्तीसगढ़ की असली पहचान है। खेती-किसानी छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि यही हमारी संस्कृति और जीवन का आधार है। किसान का खेत और उसकी मेहनत ही घर की इज्जत है। यदि हम अपनी जमीन और खेती को छोड़ देंगे, तो हमारी अस्मिता और सम्मान भी मिट्टी में मिल जाएगा। 

मेहनत देह म माटी पसीना हे छत्तीसगढ़ के निसानी।

छोड़ो झन ये भुइया ल झन छोड़व अपन किसानी।।

अपन घर के इज्जत अपन माटी म झन मिलावव रे ।।

एक बाल कविता भी संग्रहित है है इस काव्य संग्रह में । कुछ पंक्तियाँ-

दूध ल करिया बिलाई पी गे।

भात खावत हे रोगहा कालू ।।

चाहे प्रेम की कविता हो या जनजागरण या फिर प्रकृति की, भाव की गूढ़ता के साथ-साथ शिल्प की प्रगाढ़ता भी विश्वकर्मा जी की विशेष खासियत है। सरल और सहज शब्दों के प्रयोग के साथ अलंकारिक छटा ने कविता को और अधिक निखार दिया है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है-

अनुप्रास अलंकार — “गिजिर गिजिर हांसत हे सुंदरी”,मट मट मट मट,गिजगिज गिजगिज।

रूपक अलंकार — “चूंदी अस लागे नागिन लपटे” फूल सरी खिलके,नागिन कस चुन्दी,तंय हस मोर गंगा सागर।

उपमा अलंकार — “चूंदी जस लागे नागिन, "मोरनी कस नाचय,"मोर आंखी के पुतरी तंय मोर पुन्नी के चन्दा"।

मानवीकरण अलंकार — “गावत हे कोयली, नाचत हवे मोर” 

"नंदिया, नरवा, तरिया सबो देहीं एकर गवाही"


ऐसे ही और अनेक उदाहरण मिलते हैं। इसके साथ ही कविता में चित्रात्मकता और ध्वन्यात्मकता का भी सुंदर प्रयोग दिखाई देता है, जिससे रचना और अधिक प्रभावशाली बन गई है।

हिंदी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी भाषा में भी समान रूप से गद्य और पद्य दोनों विधाओं में लेखन करने वाले डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ जी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उसमें से एक अहम पुस्तक है

छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह  "पुन्नी के चंदा"। इस पुस्तक में दो दर्जन गीत,कविताएं संग्रहित है। इस पुस्तक के अधिकांश कविता गीतात्मक है।

मुझे इस पुस्तक के कविताओं और गीतों को न सिर्फ पढ़ने बल्कि अधिकांश गीतों को विश्वकर्मा जी के मधुर कंठ से सुनने का भी सौभाग्य मिला है। जितने उत्कृष्ट वे लिखते हैं, उतनी ही उत्कृष्ट उनकी प्रस्तुति भी रहती है। पुन्नी के चंदा प्रेम, लोकसंस्कृति, मेहनतकश जीवन और छत्तीसगढ़ की महानता का पिटारा है। यह कृति पाठकों को कवि के हृदय की गहराइयों से जोड़ती है, जहाँ व्यक्तिगत प्रेम और सांस्कृतिक- सामाजिक चेतना एक साथ प्रवाहित है। पाठक इस पुस्तक को जरूर पढ़ें।


*जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"* 

बालको,कोरबा(छग)

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पुन्नी के चंदा (छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह)

कवि - डॉ.माणिक विश्वकर्मा'नवरंग'

प्रकाशक -वैभव प्रकाशन, रायपुर (छ.ग.)

कीमत - 100 रुपये

वर्ष -2014 (छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा) 

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 आ रे!बादर


अस  आड. असाड. म, फभे  नही|

नइ गिरही पानी,त दुख ल कबे नही|

तोपाय हे ढेला म,मोर सपना मोर आस|

तोर अगोरा हे रे! बादर,नही ते हो जही नास|

छीत दे चुरवा-चुरवा करके,

बीजा जाम जाय|

मोर हॉड़ी के इही सहारा,

सब कोई इहिच ल खाय|

खेत बनगे मरघट्टी,

मुरदा बनगे बीजा|

पानी छीत जिया ले,

कइसे मनाहू हरेली तीजा|


मोला सरग नही,बस फल चाही,

जांगर अऊ नांगर के पूरती|

लहलहाय रहे मोर खेती-खार,

तन-बदन म रही  फुरती|

मैं सपना सँजोथँव,

बस आस म खेती के|

लेथो करजा म कपड़ा-लत्ता,

टिकली-फुंदरी बेटी के|

मोर ले जादा कोन भला,

तोर नाम लेथे|

फेर तोर ले जादा तो सेठ-साहूकार मन,

मसका-पालिस वाले ल देथे|


पानी के बाँवत,पानी के बियासी,

पानी के पोटरई-पकई रे !बादर|

तोर रूप देख घरी-घरी घुरघुरासी लगथे,

का नइ दिखे तोला मोर करलई रे !बादर|

गोहार लगात हँव मैं,

गली-गली बेटा-बेटी संग|

सबो खेलथे मोर संग ,

झन खेल तैं, मोर खेती संग|

सुन के मोर कलपना,

लेवाल बन आय हे ब्यपारी|

बचाले बेचाय ले बॉचे भुँइया,

इही मोर भाई-बहिनी,

इही मोर बाप-महतारी|

भले मरे के बाद ,

फेक नरक म घानी दे दे|

फेर जीते जीयत झन मार,

मोर सपना ल समय म पानी दे दे|


        जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

           बाल्को(कोरबा)

           ९९८१४४१७९५

कुंडलियाँ छंद-पइसा के माया

 कुंडलियाँ छंद-पइसा के माया


लंबा कर कानून के, धरे छोट के घेंच।

बात बड़े के होय ता, फँस जाये बड़ पेंच।

फँस जाये बड़ पेंच, करे का कोट कछेरी।

पद पइसा के तीर, लगावैं सबझन फेरी।

मूंदे आँखी कान, कलेचुप बनके खंबा।

देखे बस कानून, जीभ ला करके लंबा।


करजा के दम मा बड़े, बड़े बने हे आज।

लोक लाज के डर नही, नइ हे सगा समाज।

नइ हे सगा समाज, कोन देखाये अँगरी।

रंभा रति नचवाय, मंद पी तीरे टँगड़ी।

इँखरे हे सरकार, भले मर जावैं परजा।

सकल सुरत पद देख, बैंक तक देवै करजा।


फर्जी फाइल ला धरे, होगे बड़े फरार।

रोक छोट के साइकिल, गरजै पहरेदार।

गरजै पहरेदार, दिखाके लउठी डंडा।

नाक तरी धनवान, लुटैं सब ला बन पंडा।

पद पा पूँजी जोर, करैं कारज मनमर्जी।

भागे तज के देश, बनाके फाइल फर्जी।


छोट मँझोलन के रहत, बचे हवै ईमान।

गिरथें उठथें रोज के, बड़े बड़े धनवान।

बड़े बड़े धनवान, चलैं पइसा के दम मा।

धर इज्जत ईमान, जिये छोटे मन कम मा।

जादा के ले चाह, नियत नइ देवैं डोलन।

चादर भीतर पाँव, रखैं नित छोट मँझोलन।


बड़का मन कर नइ रहै, इज्जत सत ईमान।

कोई चाहे कुछु कहै, मूंदें आँखी कान।।

मूंदें आँखी कान, करै का कुटुंब कबीला। 

इंखर करनी कांड, कहावै जग मा लीला।।

खांयें सब दिन खीर, काम बूता ला टड़का।।

उँगली कोन उठाय, आदमी वो ए बड़का।।


माया पइसा मा मिले, पइसा मा रस रास।

इज्जत देखे जाय नइ, पइसा हे यदि पास।

पइसा हे यदि पास, पास वो सब पेपर मा।

रखे जेन मा हाथ, पहुँच जाये वो घर मा।

पइसा मा धूल जाय, चरित अउ बिरबिट काया।

कोन पार पा पाय, जबर पइसा के माया।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


बड़े होय नइ कभु बुरा, कुंद्रा के बड़ फेन।

ललित भगौड़ा के घलो, होगे सुष्मी सेन।

खैरझिटिया

दाई दिखथे........ --------------------------------------------

 ...........दाई दिखथे........

-------------------------------------------- 

दाई दिखथे,

ढेंकी के ठक-ठक में।

चुरोना के फट-फट में।

छेना के थप-थप में।

करछुल के खट-खट में।


दाई दिखथे,

अईरसा के पाग में।

भुंजे-बघारे साग में।

लोरी  के   राग   में।

अंचरा के ताग-ताग में।


दाई दिखथे,

गघरी-गुंडी के पानी में।

गुंगवात खपरा छानी में।

बरनी के आमा चानी में।

लईका के तोतवा बानी में।


दाई दिखथे,

चांड़ी-टिपली डुवा में।

घाट-घठौदा कुंवा में।

गौरा भड़ोनी सुवा में।

लईका-लोग के दुवा में।


दाई दिखथे,

तुलसी चंवरा के दिया में।

दुख-पीरा भरे जिया में।

सुखाय छानी के बरी में।

गंजाय कथरी के घरी में।


दाई दिखथे,

लीपे-पोते घर-दुवार में।

बासी माड़े मेड़-पार में।

साग-भाजी नार-बियार में।

बेटा-बेटी के संस्कार में।

       जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

           बाल्को(कोरबा)

किसन्हा आसिक.....

 ....किसन्हा आसिक.....


हव मय आसिक ऑव,

माटी महतारी के|

नागंर बैला गाड़ी के|

पईली काठा खॉड़ी के|

रापा गैंयती कुदारी के|


करथो मया खॉटी,

खाथो नून बासी|

रहिथो वइसने जइसे

दल  म रेगें चॉटी|

भूलागे भोंभरा,

चुंहगे छानी|

कसके छय महिना

अब चलही किसानी|

अब न बात होही,

न मुलाखात होही..........|

जेन भी होही,

किसानी के बाद होही....|


चुक्ता दिन खेत म बीते,

रतिहा सिरिफ खटिया दिखे|

कोनो अगोरे,

चाहे कोनो हाथ जोरे|

किसन्हा अपन,

खेती ल नई छोंड़े|

न बिरस्पत मिलौ,

न ईतवार मिलौ |

न आसाढ़ मिलौ,

न कुवार मिलौ |

न दिन मिलबोन 

न रात मिलबोन..................|

मिलबोन त अब

किसानी के बाद मिलबोन.....|


सुतत उठत बईठत

ऑखी म खेतीखार दिखे|

मेहनत के कलम ले किसन्हा

संसार के भाग लिखे  |

न घर बर टेम हे,

न बन बर टेम हे|

न काली टेम हे

न आज..................|

टेम मिलही

 त किसानी के बाद....|


त चल मया ल,

एकमई होन दे..................|

फेर पहिली बावत बियासी,

अउ लुवई होन दे...............|

                          जीतेन्द्र वर्मा

                        खैरझिटी (राज.)

कतको हे::::::::



::::::::कतको हे::::::::


भाई भाई ल,लड़इय्या  कतको हे।

मीत मया ल, खँड़इय्या कतको हे।


लिगरी  लगाये  बिन  पेट  नइ  भरे,

रद्दा म खँचका करइय्या कतको हे।


हाथ ले छुटे नही,चार आना  घलो,

फोकट के धन,धरइय्या कतको हे।


रोपे  बर  रूख,रोज रोजना धर लेथे,

बाढ़े पेड़ पात ल,चरइय्या कतको हे।


जात - पात  भेस म,छुटगे देश,

स्वारथ बर मरइय्या कतको हे।


दूध दुहइय्या कोई,दिखे घलो नहीं,

फेर  दुहना ल,भरइय्या कतको हे।


पलइया पोंसइया सिरिफ दाई ददा,

मरे  म,खन के,गड़इय्या कतको हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

पाके पाके बिही

 जाम बिही तक खाय बर, सोचें पड़थे आज।

जर बुखार जुड़ हो जथे, बोलत आथे लाज।

खैरझिटिया

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐


पाके पाके बिही


पाके पाके बिही।

सोचत होहू दिही।

गय फोकट के जमाना,

कोनो पैसा मा लिही??

पाके पाके बिही-----1


चाँट चउमिन खाहू।

त चाँट के जाहू।।

फल फुलवारी खाही,

तिही हा जिही।।

पाके पाके बिही------2


पइधथे बेंदरा।

ता पर जथे चेंद्रा।

मनखे पइधही,

ता कोन बने किही?

पाके पाके बिही------3


लटलट ले फरे देख।

पारा परोसी जरे देख।।

दर्जन भर एके घांव,

झडक देथों मिही।

पाके पाके बिही--------4


कतको नइ खा सके।

कतको नइ पा सके।।

नवा जुग लील दिस,

बखरी बगीचा डिही।

पाके पाके बिही--------5


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 11 July 2026

तिहार देख ले

 तिहार देख ले

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आ हमर गांव के ,  तिहार देख ले।

सुग्घर लीपे-पोते,घर दुवार देख ले।


काय हरे हरेली,काय हरे तीजा-पोरा।

कोन-कोन तिहार बर,कईसन होथे जोरा।

झुमय नाचे सबो झन,मिन्झरे पिंयार देख ले।


राखी सवनाही ,सोम्मारी कमरछठ।

रांध के कलेवा,खाथे सबो छक।

झुलना झूले कन्हैया,मिंयार देख ले।


मुसवा संग मुस्काये,गली-गली गनपति।

जस गाये दाई दुर्गा के,मनाये सरसती।

राम जी के जीतई अउ,रावन के हार देख ले।


रामधुनी रामसत्ता,भागवत रमायेन।

दियना देवारी के,जगमग जलायेन।

परसा संग माते,नाचे खेत-खार देख ले।


पूजा-पाठ बर-बिहाव,मड़ई अक्ति छेरछेरा।

सुवा-करमा अउ गम्मत म,बीते कतको बेरा।

नांव के तिहार नही,इहां सार देख ले।

               जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

                  बाल्को(कोरबा)

संकलित-गंवागे मोर गांव

Sunday, 5 July 2026

सरकारी दारू

 सरकारी दारू-सरसी छंद


गांव गांव मा दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।

मंद पियइया बाढ़त हावै, बाढ़त हावै रार।।


कोष भरे बर दारू बेंचय, शासन देखव आज।

नशा नाश ए कहि चिल्लावै, आय घलो नइ लाज।।

पीयैं बेंच भांज दरुहा मन, घर बन खेती खार।

गांव गांव में दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।।


दारू गांजा के चक्कर मा, होवत हवै बिगाड़।

मंद पियइया मनखें मन हा, लाहो लेवैं ठाड़।।

कहाँ सुधर पावत हे कोई, खावँय चाहे मार।

गांव गांव में दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।।


नशा करौ झन कहिके शासन, पीटत रहिथे ढोल।

मंद मिलत हावै सरकारी,  खुल जावत हे पोल।।

कथनी करनी मा अंतर हे, काय कहौं मुँह फार।

गांव गांव में दारू भट्ठी, खोलत हे सरकार।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को नगर कोरबा(छग)

अशिक्षा-सार छंद

 अशिक्षा-सार छंद


अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।

इती उती भागे बर लगथे, जैसे कुकुर बिलैया।।


काम करे नइ मति बेरा मा, फुटे घलो नइ बानी।

अपढ़ जान के दुनिया वाले, करथें नित मनमानी।।

देय सहारा कोनों हा नइ, मिलथें टाँग खिंचैया।

अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।


 कोई हा नइ करे पुछारी, मारे रहिरहि ताना।

आज जुटा पाना नोहर हे, दुनों टेम के खाना।।

हाव भाव नइ देखे कोई, सब हें घाव करैया।

अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।


अलगा देथें अड़हा कहिके,अउ सब जाथें जुरिया।

आये अभिशाप अशिक्षा हा, हले नेव घर कुरिया।।

हक माँगे हकलासी लगथे, डूबे लगथे नैया।

अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

प्रिंट रेट के दुःख(MRP)- सरसी छंद

 प्रिंट रेट के दुःख(MRP)- सरसी छंद


आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।

मूल्य लिखाये रहिथे भारी, देख निकलथे जान।।


दू रुपया के चीज घलो के, रइथे रेट पचास।

कतको मन खा जाथे धोखा, टूट जथे विश्वास।।

फिरिज फटाका दवा दरी के, धरे कोन हा कान।।

आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।।


देखत हे सरकार घलो हा, तभो मुँदे हे नैन।

लूट मचे हे चारो कोती, आय कहाँ ले चैन।।

अधिकारी नेता बैपारी, गाँय मिला सुर गान।

आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।।


एक बिसाये गार पछीना, एक भरे सन्दूक।

जेन ठगाये तेन बताये, काखर कर जा दुःख।

प्रिंट रेट झन होवै जादा, दै शासन हा ध्यान।

आँय बाँय कीमत मा बिकथे, कतको अकन समान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)