Wednesday, 17 June 2026

बढ़त चमचाई- लावणी छंद

 बढ़त चमचाई- लावणी छंद


घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।

अउ बाहिर मा रिस्ता जोड़े, रातउ दिन चमचाई ले।।


बात बात मा मुँहफट होके, नियम धियम गनवात रथे।

हक के बात घरे मा करथे, बाहिर मुड़ी नवात रथे।।

कथनी करनी जेखर करिया, ओहर बड़े कन्हाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


ददा बनावत हे आने ला, दरदर भटका खावत हे।

देखावा के नत्ता जोरे, कुकुर बरोबर धावत हे।।

बाज आत नइहे धक्का खा, रहि रहि पुछी हलाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।


चमचागिरी बढ़त हे भारी, आघू अउ अब का होही।

स्वभिमानी गिनके बाचे हे, कोन सुमत समता बोही।।

सत के बाना कोन थामही, उबर खुशामद खाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

बरसात (गीतिका छ्न्द)

 बरसात (गीतिका छ्न्द)


घन घटा घनघोर धरके, बूँद बड़ बरसात हे।

नाच के गाके मँयूरा, नीर ला परघात हे।

खेत पानी पी अघागे, काम के हे शुभ लगन।

दिन किसानी के हबरगे, कहि कमैया हें मगन।।


ढोंड़िहा धमना हा भागे, ए मुड़ा ले ओ मुड़ा।

साँप बिच्छू बड़ दिखत हे, डर हवैं चारो मुड़ा।

बड़ चमकथे बड़ गरजथे, देख ले आगास ला।

धर तभो नाँगर किसनहा, खेत बोंथे आस ला।


घूमथे बड़ गोल लइका, नाचथें बौछार मा।

हाथ मा चिखला उठाके, पार बाँधे धार मा।

जब गिरे पानी रदारद, नइ सुनें तब बात ला।

नाच गाके दिन बिताथें, देख के बरसात ला।


लोग लइका जब सनावैं, धोयँ तब ऍड़ी गजब।

नाँदिया बइला चलावैं, चढ़ मचें गेड़ी गजब।

छड़ गड़उला खेल खेलैं, छोड़ गिल्ली भाँवरा।

लीम आमा बर लगावैं, अउ लगावैं आँवरा।।


ताल डबरी भीतरी ले, बोलथे टर मेचका।

ढेंखरा उप्पर मा चढ़के, डोलथे बड़ टेटका।

खोंधरा झाला उझरगे, का करे अब मेकरा।

टाँग के डाढ़ा चलत हें, चाब देथें केकरा।।


पार मा मछरी चढ़े तब, खाय बिनबिन कोकड़ा।

रात दिन खेलैं गरी मिल, छोकरा अउ डोकरा।

जब करे झक्कर झड़ी, सब खाय होरा भूँज के।

पाँख खग बड़ फड़फड़ाये, मन लुभाये गूँज के।।


खेत मा डँटगे कमैया, छोड़ के घर खोर ला।

लोर गेहे बउग बत्तर, देख के अंजोर ला।

फुरफुँदी फाँफा उड़े बड़, अउ उड़ें चमगेदरी।

सब कहैं कर जोर के घन, झन सताबे ए दरी।


होय परसानी गजब जब, रझरझा पानी गिरे।

काखरो घर ओदरे ता, काखरो छानी गिरे।

सज धरा सब ला लुभावै, रूप हरिहर रंग मा।

गीत गावै नित कमैया, काम बूता संग मा।


ओढ़ना कपड़ा महकथे, नइ सुखय बरसात मा।

झूमथें भिनभिन अबड़, माछी मछड़ दिन रात मा।

मतलहा पानी रथे, बोरिंग कुवाँ नद ताल के।

जर घरो घर मा हबरथे, ये समै हर साल के।


चूंहथे छानी अबड़, माते रथे घर सीड़ मा।

जोड़ के मूड़ी पुछी कीरा, चलैं सब भीड़ मा।

देख के कीरा कई, बड़ घिनघिनासी लागथे।

नींद घुघवा के परे नइ, रात भर नित जागथे।


नीर मोती के असन, घन रोज बरसाते हवे।

मन हरेली तीज पोरा, मा मगन माते हवे।

धान कोदो जोंधरी, कपसा तिली हे खेत मा।

लहलहावै पा पवन, छप जाय फोटू चेत मा।


बूँद तक बरसै नही, कतको बछर आसाढ़ मा।

ता कभू घर खेत पुलिया, तक बहे बड़ बाढ़ मा।

बाढ़ अउ सूखा पड़े ता, झट मरे मन आस हा।

चाल के पानी गिरे तब, भाय मन चौमास हा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद

 चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद


पानी गिरे चौमास मा, बादर करे गड़गड़ गजब।

जिवरा डरे सुनके अजब, बिजुरी करे कड़कड़ गजब।


छाये घटा घनघोर अउ, टकराय घन आगास मा।

बिजुरी गिरे के डर रथे, चारो डहर चौमास मा।।


का जानवर अउ का मनुष, सब बर बिजुरिया काल हे।

घर बन घलो जाथे उजड़, बिजुरी बिकट जंजाल हे।।


गिरही कते कोती बिजुरिया, ये समझ मा आय ना।

फोकट मरे झन पेड़ पउधा ना मनुष गरु गाय ना।।


खींचे बिजुरिया ला अपन कोती सुचालक चीज हर।

रहिथे तड़ित चालक जिहाँ तौने सुरक्षित गाँव घर।।


यमराज बनके गिर जथे, अउ प्राण ला लेथे झटक।

पानी गिरत रहिथे गजब ता, बाग बन मा झन भटक।।


बादर गजब गर्जन करे तब, टेप टीवी बंद रख।

नित होश मा रहि काम कर, मुख मा कहानी छंद रख।।


बाहिर हवस ता बैठ उखड़ू, मूंद के मुँह कान ला।

रख जानकारी सावधानी अउ बचाले जान ला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)शीर्षक

हम नहीं

 हम नहीं


रिश्ते बिगड़ने का किसी को कोई ग़म नहीं।

आज सबको सिर्फ़ पैसा चाहिए, हमदम नहीं।।


खंजर से खुदे ज़ख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

ज़ुबां से बढ़कर ज़माने में कोई बारूद-बम नहीं।।


खुद को राजा समझ रहे हैं रील वाले।

रीयल में उनमें ज़रा-सा भी दम नहीं।।


एकता, अखंडता, भाईचारा — सब दिखावा है।

ज़हर जाति-धर्म का हो रहा है कम नहीं।।


पता नहीं, ये पैमाना है या मौकापरस्ती।

देश संविधान से चलेगा, पर हम नहीं।।


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)

Tuesday, 16 June 2026

जिंदा राखेल लगही-गीत

 जिंदा राखेल लगही-गीत


अधमी अत्याचारी मन बर, निंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


बइरी हरहा मन ला, मनाके  रखे बर।

मनखे ला मनखे कस, बनाके के रखे बर।।

धरम करम ला बाँध नियम मा, सोच उछिंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


अवइया पीढ़ी मा, मानवता भरे बर।।

जानवर अउ मनखें मा, भेद करे बर।।

मन मा आस विश्वास राम गोविंदा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


नता रिस्ता अउ छोटे बड़े के, लिहाज बर।

देखावा मा चूर उड़त मनखें, रंगबाज बर।।

दंभ दुराचारी बधे बर, किष्किन्धा राखेल लगही।

सत संस्कृति संस्कार ला, जिंदा राखेल लगही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सुविधा दुविधा-सार छंद

 सुविधा दुविधा-सार छंद


सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।

प्राण ल सीधा हर लेवत हे , आजकाल के गाड़ी।।


खपरा छाये माटी के घर, गर्मी मा मन भाये।

बिन कूलर पंखा एसी के , नींद ससन भर आये।।

छत के घर हा भभके भारी, नइहे ब्यारा बाड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


जतके सुविधा बढ़त जात हे, ततके दुविधा बाढ़े।

समय बचाके घलो मनुष मन, बोकबाय हें ठाढ़े।।

बम बारुद अउ यंत्र तंत्र ला, देख जुड़ाथे नाड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


हवै आसरा कम जीये के, कलजुगिया बेरा मा।

रास रसायन बढ़त जात हे, मौत हवै डेरा मा।।

फेक देय हन जुन्ना चीज ल, कहिके कचरा काड़ी।

सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कुंडलियाँ-भीड़

 कुंडलियाँ-भीड़ 


बाबा मन हा बाप कस, देवत हें उपदेश।

धरम करम ले मुक्ति कहि, होय मनुष मन पेश।

होय मनुष मन पेश, भीड़ के हिस्सा बनके।

भीड़ भाड़ ला देख, चले बाबा मन तनके।।

बिना भीड़ नइ होय, मदीना काशी काबा।

जाति धरम के नाम, सबे कोती हे बाबा।।


झंडा डंडा भीड़ बिन, मान कहाँ ले पाय।

बने बने मा हे बने, गिनहा मा हे बाय।।

गिनहा मा हे बाय, भीड़ हा भेड़ ताय जी।

सहमति साथ विरोध, सबे बर भीड़ आय जी।

मेला नेता खेल, संत राजा का पंडा।

सब ला चाही भीड़, भीड़ हे ता हे झंडा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सब बण्ठाधार होगे

 सब बण्ठाधार होगे


दहीं के जघा कपसा माढ़े हे।

देवता के जघा रक्सा ठाढ़े हे।

दवा अउ दुवा थोरको भी, काम नइ आत हे।

जरूरतमंद के राशनकार्ड म, नाम नइ आत हे।

मिर्चा मिट्ठा होगे, नून जमकरहा झार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।


मार मा झरगेहे, ढोलक तबला के खरवन।

ददा दाई ला तपत हे, आज के सरवन।

नाम के नदियाँ हे, जिहाँ पानी के नाम नही।

कोड़िहा मन काटे फर्जी,कमैया बर काम नही।

घर मा बारी बखरी दबगे, बंजर खेत खार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


मनखे दवा ल मजबूरी मा,अउ दारू ल हाँस के पीयत हे।

कोई जीये बर खात हे, ता कतको खाय बर जीयत हे।

शहर के सताये सर्व सुविधा गाँव खोजत हे।

गाँव के लफरहा, पिज़्ज़ा बर्गर बोजत हे।

हँसिया बसुला भोथरागे,मनखे मन कटार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


भँइसा के भाग म, स्विमिंग पूल हे।

तितली भौरा मरे,माछी बर फूल हे।

बेंदरा बइठे हे, परवा छानी मा।

झगरा फदके हे, जेठानी देरानी मा।

करधन ककनी ले वजनी, झुमका ढार होगे ।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


खजाना वाले, चिख चिख के खात हे।

भुखाय मनखे चीख चीख चिल्लात हे।

बूता के मारे कखरो,माँस नइहे।

ता कखरो तन मा, अमात नइहे।

निच्चट सरहा, नत्ता रिस्ता के तार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


राजा घोड़ा छोड़, गदहा चढ़त हे।

सत स्वाहा होवत हे,बुराई बढ़त हे।

एक दूसर के ला खात हे, ता एक ला दूसर खवात हे।

बने मनखे बीच के,घानी के बइला कस पेरात हे।

बिन लड़े भिड़े, सिपइहा के हार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


मनखे आन लाइन गुलाम होगे।

मोबाइल धरे सुबे ले शाम होगे।।

भीड़ घलो गोठियात नइहे।

नता गोत्ता सुहात नइहे।

रमजत हे घेरी बेरी आँखी अउ बाटा ला।

बुता  सब माड़े हे उरकात हे डाटा ला।

लाइक कमेंट चाहे ते साहित्यकार होगे।

सब बण्ठाधार होगे हे, सब बण्ठाधार होगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सत्ता- कुंडलियाँ

 सत्ता- कुंडलियाँ


सत्ता बदलत देर हे, नइ दे कोनो साथ।

बदल लिही पाला अपन, मान आन ला नाथ।।

मान आन ला नाथ, तोर बर गड्ढा खनही ।

ताज तोरन छोड़, बचे नइ पग के पनही।।

राजनीति के खेल, आय पुरवा अउ पत्ता।

हे तब तक जयकार, हाथ हे जब तक सत्ता।।1


मुद्दा पंथ विचार ना, ना सत सुम्मत आय।

देख ताख के फायदा, नेता मन तिरियाय।।

नेता मन तिरियाय, देख के दल अउ बल ला।

निर्लज बन मुस्काय, भुला के करनी कल ला।।

सत्ता आघू दूम, हलावँय खाकें हुद्दा।

काय मान सम्मान, काय उंखर बर मुद्दा।।2


कुकुर घलो हा जानथे, पालिस पोसिस कोन।

राजनीति के खेल मा, का कौड़ी का सोन।।

का कौड़ी का सोन, मोल नइ चिन्हें सत्ता।

का सग अउ का आन, काम नइ आये नत्ता।।

होवत हे बदनाम, आज के संग कलो हा।

नेता जाथें भूल, चिन्हथे कुकुर घलो हा।।3


खेमा बदलैं हार मा, जीते अधम मचाय।

धरम करम ईमान नइ, उहिमन नेता ताय।।

उहिमन नेता ताय, जेन ला कुछ नइ लागे।

एती ओती होत, अपन धुन मा बस भागे।।

भूला तैं अउ तोर, जियत रहिथें नित में मा।

आयँ घलो नइ लाज, हार मा बदलैं खेमा।।4


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

बाल्को कोरबा(छग)

गत तरिया के (दोहा चौपाई)

 गत तरिया के (दोहा चौपाई)


*तरिया के गत देख के, देथँव मुँह ला फार|*

*एक समय सबझन जिहाँ, लगर नहावै मार|*


*आज हाल बेहाल हे, लिख के काय बताँव।*

*जिवरा थरथर काँपथे, सुन तरिया के नाँव।*


कोन जनी काखर हे बद्दी। तरिया भीतर बड़ हे लद्दी।

सुते ढ़ोड़िहा लामा लामी। धँसे मोंगरी रुदवा बामी।।


तुलमुलाय बड़ मेंढक मछरी। काई मा रचगे हे पचरी।

घोंघा घोंघी जोक जमे हे। सुँतई भीतर जीव रमे हे।


कमल सिंघाड़ा जलकुंभी जड़। पानी उप्पर फइले हे बड़।

उरइ ओगला कुकरी काँदा। लामे हावै जइसे फाँदा।।


टूट गिरे हे बम्हरी डाला। पुरे मेकरा जेमा जाला।

सड़ सड़ मरगे थूहा फुड़हर। सांस आखरी लेय कई जर।


गाद ढेंस चीला हे भारी। नरम कई ता कुछ जस आरी।

जड़ उपजे हे कई किसम के। थकगे हावै पानी थमके।


घाट घठौंदा काँपत हावय। जघा केकड़ा नापत हावय।

तुलमुल तुलमुल करे तलबिया। उफले हे मंजन के डबिया।


भैंसा भैंसी तँउरे नइ अब। मनुष कमल बर दँउड़े नइ अब।

कोन पोखरा जरी निकाले। कोन फोकटे आफत पाले।।


किचकिच किचकिच करे केचुआ। पेट गपागप भरे केछुवा।

चले नाँव कस कीरा करिया। रदखद लागै अब्बड़ तरिया।


बतख कोकडा अउ बनकुकरी। दिखय काखरो नइ अब टुकड़ी।

चिरई चिरगुन डर मा काँपे। मनुष तको कोई नइ झाँके।


*दहरा हे लहरा नही, पानी हे जलरंग।*

*जड़ अउ जल के बीच मा, छिड़े हवै बड़ जंग।।*


*पानी के जस हाल हे, तस फँसगे हे पार।*

*कीरा काँटा काँद धर, पारत हे गोहार।।*


पार तको के हालत बद हे। काँटा काँद उगे रदखद हे।

खजुर केकड़ा चाँटा चाँटी। पार उपर पइधे हे खाँटी।।


बम्हरी बोइर अमली बिरवा। बेला मा ढँकगे हे निरवा।

हवै मोखला गुखरू काँटा। चारो कोती हे बन भाँटा।


सोये जागे आड़ा आड़ी। हवै बेसरम अब्बड़ भारी।

झुँझकुर छँइहा बर पीपर के। सुरुज देव तक भागे डरके।


हले हवा मा झूला बर के। फंदा जइसे सर सर सरके।

मटका पीपर मा झूलत हे। पासा जइसे फर ढूलत हे।


बिच्छी रेंगे डाढ़ा टाँगे। चाबे ते पानी नइ माँगे।।

घिरिया झींगुर उद बनबिल्ली। करे रात दिन चिल्लम चिल्ली।


बिखहर नागिन बिरवा नाँपे। देख नेवला थरथर काँपे।

हे दिंयार मन के घरघुँदिया। सरपट दौड़त हे छैबुँदिया।


घउदे हे बड़ निमवा बुचुवा। भिदभिद भिदभिद भागे मुसुवा।

फाँफा चिटरा मुड़ी हलाये। घर खुसरा घुघवा नरियाये।।


भूत प्रेत के लागे माड़ा। कुकुर कोलिहा चुँहके हाड़ा।

डर मा कतको मनुष मरे हे। कतको कइथे जीव परे हे।


देख जुड़ा जावै नस नाड़ी। पार उपर के झुँझकुर झाड़ी।

काल ताल मा डारे डेरा। नइ लगाय मनखे मन फेरा।


*मन्दिर तरिया पार के, हे खँडहर वीरान।*

*पानी बिन भोला घलो, होगे हे हलकान।*


*तरिया आना छोड़ दिस, जबले मनखे जात।*

*तबले खुशी मनात हे, जींव जंतु जर पात।।*


मनखे के नइ पाँव पड़त हे। जींव जंतु जर पेड़ बढ़त हे।

मछरी मेढक बड़ मोटावै। कछुवा पथरा तरी उँघावै।।


करे साँप हा सलमिल सलमिल। हांसे कमल बिहनिया ले खिल।

पेड़ पात घउदत हे भारी। पटय सबे के सब सँग तारी।


रंग रंग के फुलवा महके। चिरई चिरगुन चिंव चिंव चहके।

खड़े पेड़ सब मुड़ी नँवाके, गूँजै सरसर गीत हवा के।


तिरथ बरोबर राहय तरिया। नाहै जिहाँ गोरिया करिया।

बइला भैसा मनखे बूड़े। दया मया सब उप्पर घूरे।।


दार चुरे तरिया पानी मा। राहै शामिल जिनगानी मा।

करे सबो झन दतुन मुखारी। नाहै धोवै ओरी पारी।


घाम घरी दुबला हो जावै। बरसा पानी पी मोटावै।

लहरा गावै गुरतुर गाना। मछरी कस तँउरे बर पाना।


सुबे शाम डुबके लइका मन। तन सँग मन तक होवै पावन।

छोटे बड़े सबे झन नाहै। तरिया के सुख सब झन चाहै।


अब होगे घर मा बोरिंग नल। चौबिस घण्टा निकलत हे जल।

आगे हे अब नवा जमाना। नाहै घर मा दादा नाना।


हाँसय सब सुख सुविधा धरके। मनखे मन अब होगे घर के।

शहर लहुटगे गाँव जिहाँ के। हाल अइसने हवै तिहाँ के।।


मनखें बिन कई ताल बढ़त हें। जीव जंतु नव आस गढ़त हें।

ता कतको ठन रोयँ पटाके। मनखें के स्वारथ मा आके।।


*नेता मन जुरियाय हें, देख ताल के हाल।*

*तरिया ला सुघराय बर, फेकत हावै जाल।*


*जीव जंतु मरही गजब, कटही कतको पेड़।*

*हो जाही क्रांकीट के, घाट घठौदा मेड।।*


*सुंदरता जब के नाम मा, मनखे करही राज।*

*बिन मनखें झुमरत हवैं, पेड़ पात मन आज।*


नदी ताल बन नाँचथें, जब मनखें दुरिहाय।

फकत मनुष के जात, पर्यावरण मताय।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

स्कूल जाबों-लावणी छंद

 स्कूल जाबों-लावणी छंद


गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।

घण्टी तख्ता कुर्सी टेबल, आँखी आघू झूलत हे।।


खाना पानी पुस्तक कॉपी, सब हियाव कर धरना हे।

खेल कूद अब कमती करके,पढ़ई लिखई करना हे।।

भारी भरकम बस्ता हावय, साँस देख के फूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


बनही कतको झन स्कूल म, नवा नवा संगी साथी।

सबो किसम के ज्ञान ल पाबों, नइ छूटे माँछी हाथी।।

जघा जघा स्कूल खुले ले, अँधियारी पट धूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


पढ़बों लिखबों आघू बढ़बों, देखे सपना सिरजाबों।।

पढ़े लिखे के मोल गजब हे, पढ़ लिख ज्ञानी कहिलाबों।।

पढ़े लिखे ते छुवै अगासे, पढ़े नही ते ढूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Thursday, 11 June 2026

सन्त कवि सतगुरु कबीरदास जी महराज अउ छत्तीसगढ़-खैरझिटिया

 सतगुरु कबीर साहेब प्राकट्य दिवस के बहुत बहुत बधाई---


सन्त कवि सतगुरु कबीरदास जी महराज अउ छत्तीसगढ़-खैरझिटिया


                   संत कवि सतगुरु कबीर दास जी महाराज के नाम जइसे ही हमर मुखारबिंद म आथे, त ओखर जीवन-दर्शन, साखी-शबद अउ जम्मों सीख सिखौना नजर आघू झूल जथे। *वइसे तो कबीरदास जी के अवतरण हमर राज ले बाहिर होय रिहिस, तभो ले, सन्त कवि कबीर दास जी अउ ओखर शिक्षा दीक्षा हमर छत्तीसगढ़ म अइसे रचबस गिस, जेला देखत सुनत कभू नइ लगिस कि कबीरदास जी आन राज के सिध्द संत रिहिन।* सतगुरु कबीर दास जी के नाम छत्तीसगढ़ भर म रोज सुबे शाम गूँजत रहिथे। इहाँ के बड़खा आबादी कबीरपंथी हें, जेला कबीरहा घलो कहिथें,येमा कोनो जाति विशेष नही, बल्कि सबे जाति धरम के मनखे मन कबीर साहब के पंथ ल स्वीकारे हें। छत्तीसगढ़ ल कबीरमय करे म कबीर दास जी के पट चेला धनी धरम दास(जुड़ावन साहू) जी के बड़खा योगदान हे। सुने म मिलथे कि , एक बेर कबीरदास जी नानक देव संग पंथ के प्रचार प्रसार बर छत्तीसगढ़ के गौरेला पेंड्रा म अपन पावन पग ल मढ़ाये रहिन हे, उही समय ,जुड़ावन साहू जी कबीरदास जी ले अतका प्रभावित होइस कि अपन जम्मों धन दौलत ल कबीरदास के चरण कमल म अर्पित कर दिन, अउ ओखर दास बनगिन(जुड़ावन दीक्षा पाके धरम दास होगिन)। अउ हमर परम् सौभाग्य कि धनी धरम दास जी महाराज अपन गद्दी छत्तीसगढ़ म बनाइन, अउ इँहिचे रहिके कबीरपंथ ल आघू बढ़ाइन, अउ छत्तीगढ़िया मन अड़बड़ संख्या म जुड़िन घलो। धनी धरम दास जी ह कबीर के मुखाग्र साखी शब्द मन ल अपन कलम म ढालिस, ओ भी  हमर महतारी भाषा छत्तीसगढ़ी म। वइसे तो कबीरदास जी के भाषा  ल पंचमेल खिचड़ी या सधुक्कड़ी कहे जाथे, तभो ओखर प्रकशित पोथी म छत्तीसगढ़ी के प्रभाव दिखतेच बनथे--


धनी धर्मदास जी के कुछ छतीसगढ़ी पदः-


मैं तो तेरे भजन भरोसो अविनाशी

तिरथ व्रत कछु नाही करे हो

वेद पड़े नाही कासी

जन्त्र मन्त्र टोटका नहीं जानेव

नितदिन फिरत उदासी

ये धट भीतर वधिक बसत हे

दिये लोग की ठाठी

धरमदास विनमय कर जोड़ी

सत गुरु चरनन दासी

सत गुरु चरनन दासी

**


आज धर आये साहेब मोर। 

हुल्सि हुल्सि घर अँगना बहारौं, 

मोतियन चऊँक पुराई। 

चरन घोय चरनामरित ले हैं 

सिंधासन् बइ ठाई। 

पाँच सखी मिल मंगल गाहैं, 

सबद्र मा सुरत सभाई।

**


संईया महरा, मोरी डालिया फंदावों। 

काहे के तोर डोलिया, काहे के तोर पालकी 

काहै के ओमा बाँस लगाबो 

आव भाव के डोलिया पालकी 

संत नाम के बाँस लगावो 

परेम के डोर जतन ले बांधो, 

ऊपर खलीता लाल ओढ़ावो 

ज्ञान दुलीचा झारि दसाबो, 

नाम के तकिया अधर लगावो 

धरमदास विनवै कर जोरी, 

गगन मंदिर मा पिया दुलरावौ।"


ये पद मन पूर्णतः सतगुरु कबीरदास जी ले ही प्रभावित हे,


              धनी धरम दास जी के जनम घलो छत्तीसगढ़ ले इतर मध्यप्रदेश(उमरिया) म होय रहिस, फेर वो जुन्ना समय म मध्यप्रदेश के  मेड़ो तीर के गांव  सँग गौरेला पेंड्रा के जम्मो इलाका बिलासपुर के सँग जुड़े रहय, तेखर सेती धनी धरमदास जी म छत्तीगढ़िया पन कूट कूट के भरे रिहिस। अउ जब कबीर के साखी शबद रमैनी मन ल धनी धरम दास जी पोथी म उतारिन, त वो  जम्मों छत्तीगढ़िया मनके अन्तस् म सहज उतरगे। 


                   धनी धरम दास जी के परलोक गमन के बाद, ओखर सुपुत्र चूड़ामणि(मुक्तामणि नाम साहेब) साहब घलो छत्तीसगढ़ म ही कबीर पंथ के गद्दी ल सँभालिन, अउ कोरबा जिला के कुदुरमाल गाँव म अपन गद्दी बनाइन, कुदुरमाल के बाद कबीर गद्दी परम्परा आघू बढ़त गिस अउ रतनपुर, मण्डला, धमधा, सिंगोढ़ी, कवर्धा म घलो गुरुगद्दी बनिस। चूड़ामणि साहेब के बाद ओखर सुपुत्र सुदर्शन नाम साहेब रतनपुर म गुरुगद्दी परम्परा के निर्वहन करिन, तेखर बाद कुलपति नाम साहेब, प्रमोध नाम साहेब, केवल नाम साहेब -----आदि आदि गुरु मनके सानिध्य म कबीरपंथ छत्तीसगढ़ म फलन फूलन लगिस। *गुरुगद्दी के 12वा  गुरु महंत अग्रनाम साहेब ह दामाखेड़ा म धनी धरम दास जी महाराज के मठ सन 1903 म स्थापित करिन, जिहाँ आजो कबीरपंथी मनके विशाल मेला भराथे।* वइसे तो कबीर पंथ के मुख्यालय सन्त कवि कबीरदास जी के नाम म बने जिला कबीरधाम जिला म हे, फेर कबीर पंथी मन छत्तीसगढ़ के चारो मुड़ा म समाये हें। 


                   धनी धरम दास जी ल दक्षिण के गुरुगद्दी के कमान सौपत बेरा कबीरदास जी भविष्यबानी करे रिहिन कि, धरम दास जी के नेतृत्व म कबीरपंथ खूब  फलही फुलही, अउ उही होइस घलो। *धनी धरम दास जी, कबीर साहेब के आशीर्वाद ले ,कबीर पंथ के 42 गुरुगद्दी के स्वामी मनके नाम लिख के परलोक गमन करे रिहिन। वर्तमान म 14 वाँ गुरुगद्दी के स्वामी प्रकाशमुनि नाम साहेब जी हे।* छत्तीसगढ़ के कबीरपंथी मन कबीरदास जी महाराज के नीति नियम ल हृदय ले स्वीकार करथें, अउ सुख दुख सबे बेरा कबीरदास जी महाराज के नाम लेथें। छत्तीसगढ़ म कबीरपंथी समुदाय म चौका आरती के परम्परा हें, जेमा कबीर साहेब के साखी शबद गूँजथें। कबीरपंथी छत्तीसगढ़ के उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम चारो मुड़ा सहज मिल जथे, अउ जेमन कबीर पंथी नइहे उहू मन कबीरदास जी के सीख सिखौना ल नइ भुला सकें। सबे जाति वर्ग समुदाय म कबीरदास जी महाराज के छाप हे। छत्तीसगढ़ भर म कबीर जयंती धूमधाम ले मनाये जाथे। जघा जघा मेला भराथे। *दामाखेड़ा, कुदुरमाल, कवर्धा, सिरपुर,नांदिया, खरसिया* आदि जघा कबीरपंथी मनके पावन तीर्थ आय, जिहाँ न सिर्फ कबीर पंथी बल्कि जम्मो जाति समुदाय सँकलाथे।


           कबीरदास जी दलित शोषित मनके मसीहा, पीड़ित मनके उद्धारक, दबे कुचले मनके आवाज रिहिन, सामाजिक अन्याय अउ विषमता के  घोर विरोधी अउ न्याय संग समता के संस्थापक रिहिन। तेखरे सेती न सिर्फ हिन्दू मन बल्कि मुस्लिम अउ ईसाई मन घलो कबीरदास जी के अनुसरण करिन। कबीरदास जी के दोहा, साखी सबद न सिर्फ कबीरपंथी बल्कि छत्तीसगढ़ के घरों घर म टीवी रेडियो टेप टेपरिकार्डर के माध्यम ले मन ल बाँधत सरलग सुनाथे। कबीरदास जी महराज धनी धरम दास जी कारण छत्तीसगढ़ के कण कण म विराजित हे। कबीरदास जी के दोहा साखी सबद मनके कोनो सानी नइहे, विरोध के सुर के संगे संग जिनगी जिये के सार जम्मो छत्तीगढ़िया मन ल अपन दीवाना बना लेहे। पूरा भारत भर म छत्तीसगढ़ म ही कबीर पंथ के सबले जादा आश्रम अउ गद्दी संस्थान हे। कतको छत्तीगढ़िया मन आपस म *साहेब* कहिके सुबे शाम अभिवादन करथें। जनश्रुति के अनुसार कबीर साहेब के कबीरधाम जिला मा घलो आय जे बात पता चलथे। हमर छत्तीसगढ़ मा कबीरदास जी के नाम मा कबीरधाम जिला हे संगे संग गांव शहर गली खोर मा रामायण मण्डली, भजन मंडली, नाच पार्टी, चौक चौराहा, आश्रम, स्थल, पुस्तकालय, नगर, भवन, घर, दुकान सबे मा कबीर साहब के नाम समाहित हे। कबीर दास जी महाराज भक्ति के कभू विरोध नइ करिन, बल्कि भक्ति के नाम मा पैठ जमाये आडम्बर अउ देखावा ला कोसिन। कबीर साहब जी ला नमन करत, मोर कुछ कुंडलियाँ------


धरहा करके लेखनी, कहिन बात ला सार।

सत के जोती बार के, दुरिहाइन अँधियार।

दुरिहाइन अँधियार, सुरुज कस संत कबीरा।

हरिन आन के पीर, झेल के खुद दुख पीरा।

एक तुला सब तोल, बताइन बढ़िया सरहा।

करिन कलह मा वार, बात कहिके बड़ धरहा।


बानी संत कबीर के, दुवा दवा अउ बान।

साधु सुने सत बात ला, लोभी तोपे कान।

लोभी तोपे कान, कहे जब गोठ कबीरा।

लोहा होवय सोन, चमक खो देवय हीरा।

तन मन निर्मल होय, झरे जब अमरित पानी।

तोड़य गरब गुमान, कबीरा के सत बानी।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

असाढ़ म पानी-सार छंद(जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया")

असाढ़ म पानी-सार छंद(जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया")

जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।
निकले कई किसम के कीरा, रेंगय मुँह ला फारे।

रंग रंग के साँप निकलथे, रंग रंग के कीरा।
सावचेत नइ रहे म होथे, तन मन ला बड़ पीरा।
भरका बिला म पानी भरथे, गिल्ला रहिथे मिट्टी।
सरपट सरपट भागत दिखथे, इती उती पिरपिट्टी।
कीरा काँटा साँप बिच्छु ले, कतको जिनगी हारे।
जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।

वाईपर अजगर सँग डोमी, माम्बा अउ मुड़हेरी।
सुतत उठत बस झूलत रहिथे, नयन म घेरी बेरी।
फिरे करैत ढोड़िहा धमना, जिया देख के काँपे।
बारिस घरी काल बन घूमय, कई किसम के साँपे।
ठौर ठिहा बन खेत खार में, रइथे डेरा डारे।
जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।

फाँफा फुरफुन्दी चमगादड़, झिंगुरा मुसवा चाँटा।
कान खजूरा बत्तर अँधरी, बिच्छी कीरा काँटा।
डाढ़ा टाँग केकरा रेंगय, मेंढक टरटर बोले।
किलबिल किलबिल कीरा करथे, देखत जिवरा डोले।
झन सोवव बिन खाट धरा में, रेंगव नयन उघारे।
जइसे गिरे असाढ़ म पानी, भुइयाँ भभकी मारे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

पानी होगे हे का?

 पानी होगे हे का?

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पानी  होगे  हे का,  खून  छत्तीसगढ़िया  के?

कहॉगे ऊबाल अऊ जुनून छत्तीसगढ़िया के?


ये जंगल अऊ जमीन तोर ए|

ये  रात  अऊ  दिन   तोर ए |

धूर्रा चंटाये हस,बड़े-बड़े ल |

दूसर झोरत हे,तोर रॉधे गढ़े ल|

सिरागे बासी अउ,नून छत्तीसगढ़िया के|

पानी होगेहे का,खून छत्तीसगढ़िया के?


अघुवा बेटा पिछलग्गू होगे|

बारूद के गोला लड्डू होगे|

अलगागे जेन संघरा राहय|

ऑखी जेखर अँगरा राहय|

बोले नही दूसर,बोली सुन छत्तीसगढ़िया के|

पानी  होगे  हे  का, खून  छत्तीसगढ़िया के?


गुलामी के बूबू,चॉब देहे सबला|

दूसर के धुन म,बजात हे तबला|

वो मेंछा के ताव कहॉ हे?

लड़ईया मरईया गॉव कहॉ हे?

का करना कहिके काया म,

लगगे घुन छत्तीसगढ़िया के..|

पानी होगे हे का,खून छत्तीसगढ़िया के?


पछाड़ के सबला,अघवाएल पड़ही|

कतका दम हे, तेला देखाएल पड़ही|

खात हस तेला छूटना हे|

सबला अब जुटना हे|

तभे गाही सब गुन छत्तीसगढ़िया के..|

पानी होगेहे का,खून छत्तीसगढ़िया के?

कहॉगे ऊबाल अऊ जुनून छत्तीसगढ़िया के?

                जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                    बाल्को(कोरबा)

[ छत्तीसगढ़ में रहने वाले सभी लोग जो यहॉ के अन्न पानी खाये व वस्तुओ और सेवाओ के उत्पादन में अपना योगदान दे....सभी छत्तीसगढ़िया है.]....

Wednesday, 10 June 2026

संगे संग मया

 संगे संग मया


अब कइसे रचही, मधूबन म रास रे ? 

मोर तीर हे बंसरी, अऊ तोर तीर हे साँस रे ।


कलेचुप खड़े हे, कदम के रूखवा ।

 तंय पूर्वाइयाँ, अऊ मंय हर पात ||


कइसे ममहाही,  मोंगरा मया के ?

 मंय हर पतझड़, अऊ तंय मधूमास रे ।।


चलत हे बरोड़ा, उड़ावत हे धूर्रा ।

 तंय हर बिरौनी, मंय हर आँख रे ।।


मइलहा मन, मनभात नइहे मनखे के ।

 मया के तरिया म, मन ल काँच रे ।।


फेंक के देख मया के गरी, छत्तीसगढ़ भर । 

अइसने अरझ जही, फेर छल ले झन फाँस रे ।।


न रो, न रोवा, खा तेंदू -चार - कोवा ।

टपका मुंहुँ ले मंदरस, अऊ मन भर हाँस रे ।।


थोरकिन ते खा, थोरकिन भूखाय ल खवा ।

 कर सिंगार महतारी के, नंवाके माथ रे ।।


ओनहा- कोनहाल, करदे अंजोर । 

मया के माटी ले, उँच-नीच ल पाट रे ।।


का हे भरोसा, जिनगी के सिरतोन म ? 

मया - पिरीत ल, झंऊहा- झंऊहा बाँट रे ।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को कोरबा (छग)

Wednesday, 3 June 2026

वन महोत्सव -खैरझिटिया

 वन महोत्सव -खैरझिटिया


               पानी बरसात के दिन जमे कोती हरियाली हे, मनखे मन संग जीव जंतु जमे मतंग हे। जीव जिनावर तो बिन अक्कल के बस खात पियत पड़े रहिथे बिचारा मन , फेर मनखे मन कर तो अक्कल के भरमार रहिथे। तभे तो मनखे मन, पर्यावरण संरक्षण बर रात दिन  उदिम करथे,गला फाड़ नारा लगाथे, अउ कूद कूद के पेड़ पौधा घलो लगाथे भले एक ठन पेड़ ल लगाय बर 15 झन झूमे रहय, फेर सुध तो सुध होथे, प्रकृति के जतन म तो लगे हे। वो बात अलग हे कि लगाये के बाद भले सब भुला जथे, पेड़ मरे चाहे जिये। अपन काम तो कर देथे बपुरा मन। 

              बड़खा मंच सजे हे, पोगा रेडिया पोरोर पोरोर बजत हे। जमे कार्यकर्ता सूट बूट पहिरे भाग दौड़ करत हे। लइका लोग सियान सबे जुरियाय हे। गीत कविता के तैयारी घलो हे। रेडियो म बजत  *मोर खेती खार रुनझुन मन भँवरा नाचे झुमझुम*  गीत मन ल भावत हे।। पेड़ लगाओ के नारा गजब गूँजत हे, तरिया कस खनाय सड़क म मुरुम बिछ्त हे, काबर की मंत्री जी वृक्षारोपण करे बर अवइया हे। नही नही म मंच के अलग बगल मनखे मिलाके 100 आदमी तो रहिबे करे रिहिस ,अउ मंत्री जी संग जेला चंगुरवा आही ते अलग।  यहू संख्या कोरोना काल म रिहिस, जब जादा भीड़ भाड़ नइ करना हे। फेर पेड़ , जेखर रोपण करना रिहिस वो हर गिन के 10 ठन। खैर दसो पेड़ घलो बहुत होथे, बढ़ जाए त। गर्मी म जरत मनखे संग जीव जंतु बर एक पेड़ के छाँव घलो काफी होथे। लइका सियान जमे के हाथ म झंडा लहरावत हे अउ गला म मंत्री जी के अगुवाई म मिले फेंटा गजब चमकत हे, भले ओ बपुरा मनके ओनहा कुर्था के गत नइहे। कार्यकर्ता मन कोन जन का काम म लगे हे ते, येती वोती मार भागत हे, जबकि जम्मो रेजा, कुली मन बरोबर काम ल सिधोत हे तभो। एक झन गाड़ी म चढ़के आइस अउ खबर देथे के मंत्री जी 10 मिनट म पहुँच जही। ताहन का कहना बताये अनुसार जम्मो मनखे लाइन म खड़ा होके झंडा हलाये अउ  जयकार  करे म लग गे। मंत्री जी के गाड़ी बोमियावत पहुँच गे। फूल माला म मन्त्री जी के घेंच तोपागे। स्वागत सत्कार के बाद भाषण बाजी चालू होगे। उही रटटम रट्टा डयलाक गूँजत रहय जेन आम तौर म बड़े बड़े मंच ले मंत्री ,नेता मनके मुख ले निकलथे। हव बने सुरता करेव, गरीबी भागना हे, रोजगार देना हे, विकास लाना हे ,,,,,,,,आदि आदि। बिसलरी के बोतल के संग, काजू किसमिस के प्लेट घलो नेता मनके  आघू म माढ़गे। फेर बपुरा दर्शक जेन मन अघुवाई करे बर कोन जन कतका बेर ले ओड़ा ल देहे, उन ल पानी पुछइया घलो कोनो नइहे। बिचारा मन जब ले आये हे, तब ले खुद तो हारे हे अउ नेता के जय जयकार करत हे। मंत्री जी के मीठ बचन ल सुनके सब खुश हे, मानो उही म उँखर पेट भरत हे।  उँखर पाछु तुतारी घलो चलत हे कोरोना हे मास्क लगावव। बिचारा मनके मुख बेंदरा कस करिया,पिवरा,लाल दिखत हे। फेर मंच म बैठे कार्यकर्ता मन घलो तोप लिही, त उन मन कोन पहचानही, नेता मन के मास्क घलो  मुँह ले उतर के घेंच म झूलत हे।

             भाषण बाजी के बाद मंत्री मन अपन चेला चन्गुरवा के साथ खाल्हे उतरिस अउ पेड़ लगाय बर खने गढ्ढा मेर पहुँचिस। एक ठन पेड़ मंत्री ल दिस, बाकी 9 ठन ल आने मन धरिस, फेर लगाये म धियान कहाँ हे कखरो? सब तो मंत्री संग फोटो आही कहिके ओखरे पेड़ ल आरती के थारी बरोबर धर लिस। आने मन सब अपन अपन पेड़ ल अइसने खोंच दिस, अउ मंत्री जी के बाजू म खड़ा होगे। मार पेड़ लगाओ, अउ मंत्री जी के जयकार गूँजत हे। कोरोना काल म घलो पेलिक पेला होवत हे। फेर ये का मंत्री पेड़ ल धरे हे, चेला मन खड़े हे, पर फोटोग्राफर के अता पता नइहे। कार्यकर्ता मन दाँत ल कटरत हे, अभी तो रिहिस कहाँ गे रे। बिना फ़ोटो खिंचाय मंत्री जी घलो कइसे पेड़ लगा दिही। सब सन्न हे ,खोजो खोजो मात गेहे। मंत्री जी गुसियागे ये का तमाशा ये, फोटोग्राफर बिन पौधारोपण कइसे होही। दू तीन झन अधिकारी उप्पर गाज घलो गिरगे। तमक के मंत्री जी सस्पेंड कर देहूं कहि दे हे, फेर उहू मन का करे, वो मन तो बकायदा फ़ोटो ग्राफर लगाय रिहिस, अब वो धोखा दे दिही तेला, वो मन का करही? फेर रिस तो रिस ए,का करे? कोनो मन काहत हे, कि फोटोग्राफर गाड़ी धर लकर धकर कोनो  विपत आय कस भागिस हे। कार्यकर्ता मन संग मंत्री जी घलो नाराज हे, *कहूँ फोटोग्राफर घलो सरकारी होतिस, त तो ओखर खैर नइ रितिस।* फेर का विपत आगे ,जउन अत्तिक बड़ कार्यक्रम ल छोड़ भाग गिस भगवान जाने? एती हल्ला होवत हे, कोनो दुसरा फोटोग्राफर बलाव, त कोनो काहत हे महँगा मोबाइल म फ़ोटो खींच लव, त कोनो काहत हे, थोड़ीक देर अउ खोज ली,अभी रूक जाव, पेड़ ल झन खोंचव। नही ते काली के पेपर अउ देश दुनिया म मंत्री जी के पेड़ लगावत फोटू कइसे बगरही? माने पेड़ लगई ले जादा फोटो के महत्व हे। अउ हे घलो तभे तो एक ठन पेड़ ल धरे कईझन मनखे रोजेच सोसल मीडिया म दिख जथे। कोन जन हमर पुरखा मन घलो फोटोग्राफर खोजथिस, त बड़े बड़े बर, पीपर रहितिस कि नही?  पर आज फ़ोटो जरूरी घलो हे काबर कि कोन का करत हे, तेखर पुख्ता सबूत घलो इही ताय। फ़ोटो बिना आज कहाँ कोनो काम होथे। सोसल मीडिया के जमाना हे, उठत बइठत फ़ोटो मनखे मन बगरावत हे, मुँह ल अँइठ  अँइठ के फ़ोटो खिंचावत हे। बिन फ़ोटो के उछाह के काम ल तो छोड़ दी, मरनी हरनी या कहे जाय त दुख के काम घलो नइ होय। फलाना ल श्रद्धाञ्जलि देवत फलाना, अइसनहो फ़ोटो दिखथे। घूमई फिरई , काम बुता सबके फ़ोटो चलत हे। *नांगर जोतत फलाना, अब ले करम फूट गे न।* फेर कइसनो होय केमरामेन के जाय ले सब अधर म लटकगे। तभो अपन अपन हिसाब ले उँधला  धुँधला मोबाईल म खींचत हे,कि मंत्री जी थोड़े घेरी बेरी आही। खैर कार्यकर्ता मन संग मंत्री जी के मूड घलो खराब हे, बिन फोटो ग्राफर के। तभो मोबाइल म फ़ोटो खींच खिंचाके  एक ठन पेड़ ल जम्मो झन ख़ोचीस, अउ नास्ता पानी बर बैठ गे। बाकी 9 ठन पेड़ बने से गड़े घलो नइहे। बता जब आजे ये स्थिति हे त, आघू के देख रेख भला कोन करही। चल कइसनो होय, छेरी पठरू के भोजन के तो जुगाड़ होगे। वोमन चरही,त अउ उल्होही ताहन अउ चरही, अउ उल्होही त अउ--------। फेर जेन दिमाक वाले प्राणी हे तेमन कहूँ टोर फेक दिही, त थोरे उल्होही। खैर आज वृक्षारोपण तो होगे, बाकी समय का होही, तेला का करना हे। बस एके चीज के कमी खलिस, वो हरे कैमरामैन। कैमरामैन रिहितिस, त हाँस हॉस के पेड़ लगावत सबके फ़ोटो रिहितिस। मंत्री जी दल बल समेत भाग गे, ओखर जाते ही कार्यकर्ता मन। बेचारा अगुवाई करइया दर्शक मन देखते रहिगे। फोटोग्राफर के बारे म, कार्यकर्ता मन पता करिस त मालूम चलिस की फ़ोटो ग्राफर के परिवार वाले मनके कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आये हे, अउ गाड़ी म डॉक्टर मन उनला धरके लेजत हे। उहू बपुरा के का गलती हे।येती सभा म जुरे मन म घलो दहसत हे, कैमरामैन पॉजिटिव होही त?


 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

कुंडलियाँ-भीड़

 कुंडलियाँ-भीड़ 


बाबा मन हा बाप कस, देवत हें उपदेश।

धरम करम मुक्ति कहि, होय मनुष मन पेश।

होय मनुष मन पेश, भीड़ के हिस्सा बनके।

भीड़ भाड़ ला देख, चले बाबा मन तनके।।

बिना भीड़ नइ होय, मदीना काशी काबा।

जाति धरम के नाम, सबे कोती हे बाबा।।


झंडा डंडा भीड़ बिन, मान कहाँ ले पाय।

बने बने मा हे बने, गिनहा मा हे बाय।।

गिनहा मा हे बाय, भीड़ हा भेड़ ताय जी।

सहमति साथ विरोध, सबे बर भीड़ आय जी।

मेला नेता खेल, संत राजा का पंडा।

सब ला चाही भीड़, भीड़ हे ता हे झंडा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

विश्व पर्यावरण दिवस मा

 विश्व पर्यावरण दिवस मा


छींद-जयकारी छंद


कमती कहाँ खजूर ले, हमर गांव के छींद।

गर्मी के फर ये हरे, खाके भाँजव नींद।।


गुण ला सुन उड़ जाही नींद। एक पेड़ जेला कहिथे छींद।।

छींद पेड़ के गुण अउ राज। मोर कलम बरनत हे आज।।


जागे अउ बाढ़े बिन बोय। पात फोंक काँटा कस होय।।

इही गांव के हरे खजूर। खाये हँस किसान मजदूर।।


नरिया नरवा नदी कछार। खेत खार सँग मेड़उ पार।।

रथे छींद के झुँझकुर झाड़। सहत घाम पानी अउ जाड़।।


एक तना मा बाढ़े सोझ। कई मुरख मन माने बोझ।।

काटे कहि नइ आये काम। जाने तेमन पाये दाम।।


चटई बहरी शादी मौर। बिना छींद नइ हाँसे ठौर।।

माटी घर के बन रखवार। रोके बरसा घरी झिपार।।


आय पँदोली दै के काम। एखर कुँदरा दै आराम।।

गाड़ा के टट्टा बन जाय। पहिर बबा कलगी मुस्काय।।


चलत फिरत उद्योग कुटीर। छाये रहे छींद सब तीर।।

छींद रसा तक बड़ मन भाय। गुड़ अउ शक्कर घलो मिठाय।।


छींद गबौती जौने खाय। खेवन खेवन खाय ललाय।।

पाके फर के नही जवाब। खाये ते बन जाय नवाब।।


बैरी काँटा देख डराय। ठिहा छींद मा बया बनाय।।

खग के करलव जिया लुभाय। छतरी जइसन छींद सुहाय।।


पूरा के पानी ला सोख। सींचे धरती दाई कोख।

वाटर लेबल घलो बढ़ाय। नाइट्रोजन जर हा गठियाय।।


बाँध रखे माटी के कोर। जर जइसे रेशम के डोर।।

माटी ला उपजाउ बनाय। सखा किसनहा के ये आय।।


पाना बाजे चटचट खूब। खेले लइका मन हा डूब।।

खेलत बनथे छींद डँगाल। उल्हवा पाना लगे कमाल।।


सुक्खा लकड़ी पाना डार। बने पठउँहा पाठ मियार।।

बनथे सजावटी सामान। मनुष आज के हें अंजान।।


हवा दवा फर लकड़ी देय। खड़े खड़े पर जिनगी सेय।।

धरे काठ मा झटकुन आग। पानी घलो बिगाड़ै राग।।


छिंदवाड़ा छिंदई कस गांव। धरे छींद के कारण नांव।।

पारा मोहल्ला बन खार। छींद नाम ले परे गुहार।।


छिंदी कांदा फर जर पान। देय जीव ला जीवनदान।।

नित डँट पर्यावरण बचाय। दूत प्रकृति के छींद आय।।


सबके अलग महत्त्व हें, होय कइसनों पेड़।।

छींद लगावव जान गुण, रिता रहे झन मेड़।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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जंगल बचाओ-सरसी छन्द


पेड़ लगावव पेड़ लगावव, रटत रथव दिन रात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


हवा दवा फर फूल सिराही, मरही शेर सियार।

हाथी भलवा चिरई चिरगुन, सबके होही हार।

खुद के खाय कसम ला काबर, भुला जथव लघिनात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जंगल हे तब जुड़े हवय ये, धरती अउ आगास।

जल जंगल हे तब तक हावै,ये जिनगी के आस।

आवय नइ का लाज थोरको, पर्यावरण मतात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


सड़क खदान शहर के खातिर, बन होगे नीलाम।

उद्योगी बैपारी फुदकय, तड़पय मनखे आम।

लानत हे लानत हव घर मा, आफत ला परघात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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**पेड़: न उजाड़ो**  


न उजाड़ो धरती के धन को,

हो सके तो बढ़ाओ वन को।।


बाग-बगीचे, फूल-पौधे,

लुभाते हैं सबके मन को।।


जीवन को खुशहाल बनाते,

निरोग रखते हैं तन को।।


तपती धूप में छाँव देते,

लाते हैं वन-घन को।।


रक्षा का स्वयं संकल्प लो,

समझाओ सभी जन को।।


पेड़ लगाकर पुण्य कमाओ,

धन्य करो जीवन को।।


      जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

                बालको कोरबा

 विश्व परियावरण दिवस की ढेरो बधाई💐💐💐💐💐

हिरदय- सार छंद

 विश्व हिरदय दिवस म


हिरदय- सार छंद


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम जग नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम सब चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Tuesday, 2 June 2026

गीत गाँबों

 गीत गाँबों


घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।

दुःख दरद डर द्वेष मिटाके, लेबों मन ला जीत।


कोई सुलगे भीतर भीतर, कोई कहय लबारी।

कोई देखय गुर्री गुर्री, कोई देवय गारी।

भभकत इरखा मा पिरीत के, पानी देबों छीत।।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत----।


रोज डराय डरे ला सबझन, अउ हराय हारे ला।

मया करइया नइहे कोई, दँउड़े सब मारे ला।

मनखे मनखे ला मिलवाक़े, बधवाबों चल मीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


गिरे थके हारे हपटे ला, देबों चलव पँदोली।

कोन काय करना चाहत हे, सबके जिया टटोली।

मनुष होय के फरज निभाबों, बदल बुरा गत रीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मनखे मन के करनी के फल- सार छंद

 मनखे मन के करनी के फल- सार छंद


छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।

फल ला भोगत हावँय फोकट, मनखें के करनी के।।


चिरई चिरगुन मरैं घाम मा, नइहे पेड़उ पानी।

लहकत हावँय बानर भालू, हलाकान जिनगानी।

बोहय बन विकास के गंगा, धारा बैतरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


धरती दाई के छाती मा, छड़ सीमेन्ट छभागे।

माटी के सेउक मन मरगे, उद्योगी हरियागे।।

इंच इंच ला चाँट खात हें, चटनी कस बरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


आज जनम धर काली मरगे, जीव जंतु मन कतको।

कोनो जुग मा नइ देखें हन, निरदई मनखें अतको।।

स्वारथ बर सरलग माते हे, लूट पाट धरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)

 गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)


चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।

दाई अँचरा कस जुड़ छइहाँ, ओढ़ ओढ़ इतराबों।


पवन धूकथे पंखा रहि रहि, सुरुज देव बिजराथे।

छमछम नाचय पाना डारा, गीत कोयली गाथे।

ढेला फेक गिराबों आमा, मिलजुल के सब खाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गरमी घरी तको जुड़ रहिथे, अमरइया के छइहाँ।

जिहाँ पहुँच सब खेल खेलबों, जोर सबे झन बइहाँ।

आम तरी मा बाँध झूलना, झुलबों अउ झूलाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


बइहाँ जोड़े पेड़ खड़े हे, सहि जुड़ बादर पानी।

हवा दवा फल फूल लुटाथे, सबदिन बनके दानी।

ठिहा ठौर हे जीव जंतु के, देख देख हरसाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गली खोर घर खेत खार सँग, साथी ताल तलैया।

गिल्ली डंडा बाँटी भँवरा, के हम सब खेलैया।।

चंदन जइसे धुर्रा माटी, माथा तिलक लगाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

आगे का मानसून(गीत)

 आगे का मानसून(गीत)  


बुलके नइहें मई घलो हा, लागे नइहें जून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


नवतप्पा मा चप्पा चप्पा, माते हावय गैरी।

टुहूँ देखाये कस लागत हे, ये बादर हर बैरी।।

कोई बतावव करहूँ बाँवत, खाके बासी नून।।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


होरी हरिया संसो मा हें, नाँगर धरै कि पेरा।

घर अउ खेत के काम बचे हे, काँपे आमा केरा।।

उमड़त घुमड़त देख बदरा ला, अँउटत हावय खून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


साँप सुते नइ हावय मन भर, बतर किरी हे बौना।

कांदी कुल्थी नार लमेरा, जागे तुलसी दौना।।

हरियर होवत हवै धरा, पुरवा छेड़य धून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)