Tuesday, 2 June 2026

गीत गाँबों

 गीत गाँबों


घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।

दुःख दरद डर द्वेष मिटाके, लेबों मन ला जीत।


कोई सुलगे भीतर भीतर, कोई कहय लबारी।

कोई देखय गुर्री गुर्री, कोई देवय गारी।

भभकत इरखा मा पिरीत के, पानी देबों छीत।।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत----।


रोज डराय डरे ला सबझन, अउ हराय हारे ला।

मया करइया नइहे कोई, दँउड़े सब मारे ला।

मनखे मनखे ला मिलवाक़े, बधवाबों चल मीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


गिरे थके हारे हपटे ला, देबों चलव पँदोली।

कोन काय करना चाहत हे, सबके जिया टटोली।

मनुष होय के फरज निभाबों, बदल बुरा गत रीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मनखे मन के करनी के फल- सार छंद

 मनखे मन के करनी के फल- सार छंद


छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।

फल ला भोगत हावँय फोकट, मनखें के करनी के।।


चिरई चिरगुन मरैं घाम मा, नइहे पेड़उ पानी।

लहकत हावँय बानर भालू, हलाकान जिनगानी।

बोहय बन विकास के गंगा, धारा बैतरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


धरती दाई के छाती मा, छड़ सीमेन्ट छभागे।

माटी के सेउक मन मरगे, उद्योगी हरियागे।।

इंच इंच ला चाँट खात हें, चटनी कस बरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


आज जनम धर काली मरगे, जीव जंतु मन कतको।

कोनो जुग मा नइ देखें हन, निरदई मनखें अतको।।

स्वारथ बर सरलग माते हे, लूट पाट धरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)

 गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)


चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।

दाई अँचरा कस जुड़ छइहाँ, ओढ़ ओढ़ इतराबों।


पवन धूकथे पंखा रहि रहि, सुरुज देव बिजराथे।

छमछम नाचय पाना डारा, गीत कोयली गाथे।

ढेला फेक गिराबों आमा, मिलजुल के सब खाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गरमी घरी तको जुड़ रहिथे, अमरइया के छइहाँ।

जिहाँ पहुँच सब खेल खेलबों, जोर सबे झन बइहाँ।

आम तरी मा बाँध झूलना, झुलबों अउ झूलाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


बइहाँ जोड़े पेड़ खड़े हे, सहि जुड़ बादर पानी।

हवा दवा फल फूल लुटाथे, सबदिन बनके दानी।

ठिहा ठौर हे जीव जंतु के, देख देख हरसाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गली खोर घर खेत खार सँग, साथी ताल तलैया।

गिल्ली डंडा बाँटी भँवरा, के हम सब खेलैया।।

चंदन जइसे धुर्रा माटी, माथा तिलक लगाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

आगे का मानसून(गीत)

 आगे का मानसून(गीत)  


बुलके नइहें मई घलो हा, लागे नइहें जून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


नवतप्पा मा चप्पा चप्पा, माते हावय गैरी।

टुहूँ देखाये कस लागत हे, ये बादर हर बैरी।।

कोई बतावव करहूँ बाँवत, खाके बासी नून।।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


होरी हरिया संसो मा हें, नाँगर धरै कि पेरा।

घर अउ खेत के काम बचे हे, काँपे आमा केरा।।

उमड़त घुमड़त देख बदरा ला, अँउटत हावय खून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


साँप सुते नइ हावय मन भर, बतर किरी हे बौना।

कांदी कुल्थी नार लमेरा, जागे तुलसी दौना।।

हरियर होवत हवै धरा, पुरवा छेड़य धून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)