Friday, 29 May 2026

एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद

 एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद


पइसा बिन एटीएम हा, खड़े रथे मुँह फार।

हमर होय बैलेंस कम, दंड लेय सरकार।।

दंड लेय सरकार, आम खाता धारी ले।

बोचक जाये बैंक, झाड़ पल्ला पारी ले।।

सुने भला अब कोन, करिन का काये कइसा।

ठँउका रहिथे काम, मिले नइ खोजे पइसा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुण्डलियां-नेता घर नेता


नेता के बेटी बहू, बाई भाई पूत।

नित नेता बनते रही , भागे नइ ये भूत।।

भागे नइ ये भूत, हरे कुर्सी इँखरे बर।

होवत रहिथे खेल, इहिच मन ला नित दे बर।

गला फाड़ चिल्लाय, उहू ये पद के क्रेता।

आम चुहकहीं आम, रही नेता घर नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



फेक अकड़ गुमान- कुंडलियाँ

धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा हरेक किरदार।।

निभा हरेक किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



तीन सवारी-कुंडलियाँ


तीन सवारी देख के, काटे पुलिस चलान।

भरे खचाखच रेल हे, निकल जथे जी जान।।

निकल जथे जी जान, व्यवस्था कोन सुधारे।

लेये बर लउहाय, देय बर पल्ला झारे।

आम खास मा भेद, होय सब कोती भारी।

रोड दिखे ना भीड़, दिखे बस तीन सवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


कुर्सी-कुंडलियाँ

जनता के पीये लहू, नेता मन बन शेर।

जॉब घटय कुर्सी बढ़य, कइसन आगे बेर।।

कइसन आगे बेर, मचे कुर्सी के झगड़ा।।

कइसे होय विकास, करें घोटाला तगड़ा।।

सब ला जोर सुनाँय, कहानी संता बंता।।

इती उती के बात, सुने हँस हँस के जनता।


खैरझिटिया



अइसन काबर-कुंडलियाँ


डॉक्टर झोला छाप कहि, शासन वसुलै दंड।

नेता झोला छाप हे, मिलजुल खावँय फंड।।

मिलजुल खावँय फंड, उठावै अँगरी कौने।

नियम तोड़थें रोज, नियम नित हाँके तौने।

मनके करथें काम, सबे ला खीसा मा धर।

गरजे अँगठा छाप, डरे भल मास्टर डॉक्टर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रोय रसोई


रोय रसोई गैस बिन, गाड़ी हा बिन तेल।

चीज सबे महँगात हे, होय युद्ध जस खेल।।

होय युद्ध जस खेल, बजत हे दुख के बाजा।

बनके तिगड़म बाज, जुलुम ढावत हें राजा।।

कर नइ सके विकास, तेल टावर बिन कोई। 

रहे सदा सुख चैन, कभू झन रोय रसोई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




कोल्ड ड्रिंक्स के राज मा, नींबू सरबत फेल।

कब का हा महँगा जही, आय समझ नइ खेल।

हावी हावय उधोगी।

आम जन भुक्तभोगी।


नेता


नेता मन रैली करे, सड़क चौक ला घेर।

जाम लगे चारो डहर, खड़े पुलिस मुँह फेर।।

खड़े पुलिस मुँह फेर, देख के फुदरे नेता।।

पाके मनखें आम, नियम कहि हुदरे नेता।

शासन ला रख जेब, घुमे बन विश्व विजेता।

जनता जाए भाड़, करे मनमानी नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


फूफा


रिस्ता मा बिखराव आम होगे।

जुड़ छइयां देख आज घाम होगे।

भीतरे भीतर तिगड़म फूफू करे,

इती फूफा बिचारा बदनाम होंगे।

खैरझिटिया



किरायेदार-कुंडलियाँ


गरू लगे दाई ददा, हरू किरायेदार।

होन देन नइ कुछु कमी, खूब करे सत्कार।।

खूब करे सत्कार, लागमानी हो जइसे।

पइसा खातिर आज, मनुष रँग बदले कइसे।।

सबझन के इहि  हाल, कहे मा करू लगे।

कइसन दिन हे आय, ददा दाई गरू लगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पद पइसा- कुंडलियाँ

पद पइसा के चाह मा, बाँचे कहाँ ईमान।

झन जा बोली बात मा, बिक जाथे इंसान।।

बिक जाथे इंसान, अपन पहिचान भुलाके।

हो जाथे खामोश, मूड़ मा ताज सजाके।।

माया आघू मान, मनुष के होवव रदखद।

अवसर देख जुगाड़, करें पाए बर सब पद।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


नत्ता रिस्ता आज बाजारू होगे।

नँदात नरियर गंगा बारू होगे।

गय सुदामा किशन के जमाना,

अब दोस्ती मतलब दारू होगे।।

खैरझिटिया


सोचो यदि मच्छर साठ साल जीते,  

न जाने किसका कितना खून पीते।  

इसीलिए जल्दी मौत मिली है उसे,  

पर आदमी क्यों बन बैठा है चीते।  

खैरझिटिया


छप्पर-छानी कब छत हो गई, पता नहीं चला।  

मेरे खिलाफ़ कब जनमत हो गई, पता नहीं चला।  

कभी यहाँ, कभी वहाँ—रोज़ मंज़िल ढूँढते रहे,  

कब राह से मोहब्बत हो गई, पता नहीं चला।  

खैरझिटिया

तेंदू- दोहा- चोपाई छंद

 तेंदू- दोहा- चोपाई छंद


लउठी तेंदू सार के, चलव खांध मा डार।

काँपे बैरी देख के, बल पावव भरमार।।


तेंदू रुखवा हमर राज के। खास पेड़ ए काल आज के।।

छोटे बड़े सबो झन जाने। तेंदू के गुण गोठ बखाने।।


तेंदू पाना हरियर सोना। बनथे जेखर पत्तल दोना।।

टोरें गर्मी दिन मा सबझन। पायँ बेंच के रुपया खनखन।।


बने बिड़ी तेंदू पाना के। हरे दवा दादा नाना के।।

औषधि गुण तेंदू के अड़बड़। पेड़ बिना जिनगी हे गड़बड़।।


तेंदू के लउठी हे नामी। संग देय जस देवन धामी।।

तेंदू लकड़ी रथे टिकाऊ। बने बेठ नांगर अउ पाऊ।।


लकड़ी चिटचिट करे जले मा। अपन तीर ये खिंचे फले मा।।

अबड़ मिठाथे पाके फर हा। भाभे घलो केंवची जर हा।।


आँख पेट सर्दी खाँसी बर। काम आय एखर पत्ता फर।।

हरे जानवर मन के चारा। पात केंवची लगथे न्यारा।।


तेंदू फर मा होथे रेसा। पात देय कतको ला पेसा।

फले फुले जिनगी के खेती। जल जंगल जमीन के सेती।


जंगल हा तेंदू बिना, जंगल कहाँ कहाय।

भरे जेठ बैसाख मा, तेंदू पेड़ बुलाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद

 कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद


मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।

गँवा जथे कतको जिनगी हा, मजा करे के चक्कर मा।।


बीहड़ डोंगर पर्वत घाटी, बन बरफ समुंदर पानी।

ये सब सँग खेले के सेती, उजड़े कतको जिनगानी।।

खेलव झन पानी पुरवा ले, हवा गरेरा झक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।


अपन दायरा जतका हावै, ततके नित पाँव लमावव।

कुदरत के कानून कड़ा हे, जादा झने मेछरावव।।

पानी मिल पानी कर देथे, नून होय या शक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।


मनखें मन सँग हाँसव खेलव, गढ़व कढ़व कुदरत ला।

सोचें समझे के ताकत हे, छोडव मद जिद अउ लत ला।।

काम करव झन बनके अड़हा, पड़के लउहा लक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, पवन पेय के टक्कर मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

रार मचे हे खाड़ी मा

 रार मचे हे खाड़ी मा


भात चुरे नइ काड़ी मा।

सोवा परगे हाँड़ी मा।

गैस सिरागे जेब चिरागे,

रार मचे हे खाड़ी मा।।


साग उगे नइ बाड़ी मा।

खेत पटागे झाड़ी मा।।

आफत हा अब अवसर बनगे,

लहू सुखागे नाड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


हें मजदूर दिहाड़ी मा।

फोकस हवैं खिलाड़ी मा।।

भला भरोसा काय करीं अब।

गुजराती मरवाड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


दरद उठत हे माड़ी मा।

तेल सिरागे गाड़ी मा।।

पिसागेन पर के झगरा मा,

बइठे बइठे भाँड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


कतकों बिकगे साड़ी मा।

कतकों  दारू ताड़ी मा।

नेता ला बस कुर्सी चाही,

सोज बाय अउ आड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)

 वर दे माँ शारदे (सरसी छन्द)


दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।

गुण गियान यश धन बल बाढ़ै,बाढ़ै झन अभिमान।


तोर कृपा नित होवत राहय, होय कलम अउ धार।

बने बात ला पढ़ लिख के मैं, बढ़ा सकौं संस्कार।

मरहम बने कलम हा मोरे, बने कभू झन बान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जेन बुराई ला लिख देवँव, ते हो जावय दूर।

नाम निशान रहे झन दुख के, सुख छाये भरपूर।

आशा अउ विस्वास जगावँव, छेड़ँव गुरतुर तान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


मोर लेखनी मया बढ़ावै, पीरा के गल रेत।

झगड़ा झंझट अधम करइया, पढ़के होय सचेत।

कलम चले निर्माण करे बर, लाये नवा बिहान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


अपन लेखनी के दम मा मैं, जोड़ सकौं संसार।

इरखा द्वेष दरद दुरिहाके, टार सकौं अँधियार।

जिया लमाके पढ़ै सबो झन, सुनै लगाके कान।

दे अइसन वरदान शारदा, दे अइसन वरदान।।।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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सुभगति छंद-शारद मां


दे ज्ञान माँ।वरदान माँ।

भव तारदे।माँ शारदे।


आनन्द दे।सुर छंद दे।

गुण ज्ञान दे।सम्मान दे।


सुख गीत दे।सत मीत दे।

सुरतान दे।अरमान दे।


दुख क्लेश ला।लत द्वेश ला।

दुरिहा भगा।सतगुण जगा।।


जोती जला।दे गुण कला।

माथा नवा।माँगौ दवा।


चढ़ हंस मा।सुभ अंस मा।

आ द्वार मा।भुज चार मा।


दुरिहा बला।अवगुण जला।

बिगड़ी बना।सतगुण जना।


वीणा सुना।मैं हँव उना।

पैंया परौं।अरजी करौं।


सद रीत दे।अउ जीत दे।

सत वार दे।माँ शारदे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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दोहा गीत- माँ शारदे


जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।

तोर शरण मा आय हौं, आरो लेबे मोर।।


तैं जननी सुर साज के, तिही ज्ञान आधार।

तोर कृपा के सध जथे, भव बाधा संसार।।

रखबे मोला बाँध के, अँचरा के माँ कोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


नइ चाही माँ धन रतन, नइ चाही रँग रूप।

मन भीतर अज्ञान के, रहय न एको कूप।

वीणा के झंकार मा, गुँजै गली घर खोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


झरत रहय माँ बोल मा, सबदिन सुर संगीत।

प्रेम देख मैं हार जँव, अहंकार लौं जीत।

दै सुकून नित सांझ हा, आस जगावै भोर।

जयजय जय माँ शारदे,पाँव परत हँव तोर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


जय माँ शारदे, बसन्त पंचमी की सादर बधाइयाँ

जब तक चुनाव रिहिस

 जब तक चुनाव रिहिस


अच्छा दिन के हाव भाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

आम जनता के हियाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।1


आव अउ समस्या बताव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

अंडा मछरी भेल खाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।2


तेल पानी गैस में ठहराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

नारा मा महँगाई दुरिहाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।3


ईरान अमरीका संग जुराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

हारमुज ले बुलकत नाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।4


संसो के नइ दिखत सिर पाँव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

चारों खूंट विश्व गुरु के दबाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।5


जीतेन्द्र वर्मा'₹"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

झालमुड़ी अभी के का?

 झालमुड़ी अभी के का?


डिही घर गांव गुड़ी, अभी के का।

ये बिंदिया ये चुड़ी, अभी के का।।1


रँग रँग के रोटी पीठा खात आवत हन,

ये भजिया ये पुड़ी, अभी के का।।2


कोनो ला गर्मी लगे, कोनो ला सर्दी,

तन लोर फोड़ा जुड़ी, अभी के का।।3


तँउरे के अलगे मजा हे नदी ताल के,

लहरा फोटका बुड़बुड़ी,अभी के का।।4


खात हें देखा देखा आज सब अचानक,

ये भेल झालमुड़ी, अभी के का।।5


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद

 सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद


सड़क तीर के तोर खेत मा, नजर हवै बैपारी के।।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


नपा नपा के खेत खार ला, गाँजत हें उन मन खरही।

उँखर हाथ जा महतारी हा, दिखत हवै निच्चट मरही।।

टावर गारा छत मा दरके, छाती हा महतारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


साम दाम अउ दंड भेद ले, भुइयाँ ला उन कब्जाथें।।

नाका बंदी कर पिछोत के, मनखें मन ला रोवाथें।।

औने पौने देय दाम उन, लेय लाभ लाचारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


शासन अफसर सँग पा गरजे, बरजे नइ कोनो उन ला।

सोन उपजइया महतारी मा, छीचत हें उन मन घुन ला।

लोभ आय झन अउ सताय झन, संसो दुनियादारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद

 पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद


पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।

एक जमाना मा घर गाँव ह, सुख के लागे खान ।।


नइ माँगिस हे खपरा छानी, कभ्भू कूलर फ्रीज।

मुड़मिंजनी माटी के आघू, फेल लक्स अउ ब्रीज।।

छेना लकड़ी खाके हाँडी, हाँसे साँझ बिहान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


कोलाबारी के तरकारी, पारा ला दै तार।

नदिया नरवा बोरिंग कुआँ, बहे दूध कस धार।।

असली धन अरसी जौ सरसो, चना गहूँ अउ धान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


नीम आम अमली बर पीपर, देय फूल फर छाँव।

सिंहासन कस चौकउ चौरा, लगे सरग कस गाँव।

छत सीमेंट आय हे जब ले, तब ले हन हल्कान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


बबा कहानी रोज सुनावै, दाई लोरी गाय।

हाट सजे हर हप्ता हप्ता, चीज सबे मिल जाय।।

पेट संग मा जिया अघाये, गांव देय वरदान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।



सुविधा दुविधा बनत जात, हाल होय बेहाल।

महँगाई के मार पड़त हे, मनुष बजावँय गाल।।

सुरता जुन्ना समय आत हे, काला काय बतान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

खेती किसानी के गत-सरसी छंद

 खेती किसानी के गत-सरसी छंद


विलासना के चीज बनाये, ते होगे धनवान।

साग दार फर अन्न उगाके, रोवैं आज किसान।।


पानी पुरवा के सँग चाही, खाये खातिर अन्न।

फेर आज ये काय चलत हे, सोच होय मन सन्न।।

खाली पेट दिमाक चले नइ, भरे आय तब ज्ञान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।


जांगर खपगे नांगर खपगे, खपगे आस तमाम।

कतका रुपया का के मिलही, गढ़े आन मन दाम।

उद्योगी बैपारी फुदरे, मनके बेंच समान।

साग दार फर अन्न उगाके,रावैं आज किसान।।



बिजनेस बढ़े बढ़े नौकरी, खेती ले दुरिहाँय।

जे हे थेभा ये दुनिया के, तौने भटका खाँय।।

खेत किसानी आये जिनगी, पाय किसानी मान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।



जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वाटर पार्क-सरसी छंद

 वाटर पार्क-सरसी छंद


वाटर पार्क म नाहै खातिर, मनखें मन जुरियाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


घाट घठौंदा अरदा परदा, नइ हावै कुछु चीज।

बेढंगा सब झुमरत दिखथें, नइहें तौर तमीज।।

मजा मजा कहि मान बेंच के, छोट बड़े इतराँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


देहाती मन तँउरे तरिया, कहि नइ झाँकैं पार।

तेन तउल मा पानी पाके, होगे हें मतवार।।

मारे डींग खिंचाये फोटू, सुधबुध अपन भुलाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


नवा उदिम बैपारी मन के, आये सब ला रास।

देखे सुने म अटपट लागे, उड़े मनुष बन तास।।

नवा जमाना के बाजार म, लाज शरम बेंचाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को,कोरबा(छग)

खातू-कुंडलियाँ छंद

 खातू-कुंडलियाँ छंद


खातू मनके राज मा, खातू बर लुलवान।

खातू ले खेती हवै, का अब करन किसान।।

का अब करन किसान, अधर मा हवै किसानी।

कोन सुने गोहार, कोन दै खातू पानी।।

हें जे जिम्मेदार, सबे खाए के पातू।

संसो खाए खूब, कतिक कब मिलही खातू।।


जीतेन्द्र वर्मा'₹"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Wednesday, 27 May 2026

गरीब मजदूर किसान

 गरीब मजदूर किसान


गरीब मन उपर अत्याचार,सरे-आम होवत हे।

मान  मरियादा महिनत,नित नीलाम होवत हे।


जाँगर टोरे  दिन- रात,पर  बर जे हा,

वोला दू टेम के रोटी,हराम होवत हे।


सबके सपना सँजोये,जे एके साँस मा,

ओखरे  सपना आज,धड़ाम होवत हे।


सब कन्नी काटत हे,कोन देय सहारा।

छूरी  धरइया  कोती, राम  होवत  हे।


आजो गरीब,गड़ जावत हे नेंव बन,

सेठ साहूकार मनके नाम होवत हे।


महिनत करइया  घर  चूल्हा,गुंगवाय  घलो नही,

बैठान्गुर तले भजिया,जब साम होवत होवत हे।


बेंदरा  कस  नाँचे मजदूर  किसान,

कुंदरा म दिनों दिन,घाम होवत हे।


करिया काया म, बरसे दनादन  कोर्रा,

महिनत के कमती,अब दाम होवत हे।


बड़े  बड़े महल अटारी,बनवाये शाहजहाँ,

फेर हाथ ल काटवाये,जब काम होवत हे।


जरगे-मरगे-गड़गे-सरगे,कतको खैरझिटिया,

छोड़  न अब अइसन घटना ,आम होवत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

9981441795

Saturday, 23 May 2026

हाल खेती भुइयाँ के- सरसी छंद

 हाल खेती भुइयाँ के- सरसी छंद


भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।

शहर लगत ना गाँव लगत हे, फइले हावै जाल।।


कुटका कुटका कर भुइयाँ ला, बना बना के प्लाट।

बेंचत हावै वैपारी मन, नदी ताल तक पाट।।

धान गहूँ तज समय फसल बो, नाचै दे दे ताल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


माटी हा महतारी जइसे, उपजाये धन सोन।

आफत आगे ओखर ऊपर,जतन करै अब कोन।।

धमकी चमकी अउ पइसा मा, होय किसान हलाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


बड़े बड़े बिल्डर बइठे हें, भुइयाँ मा लिख नाम।

गला घोंट खेती भुइयाँ के, करत हवै नीलाम।।

अइसन मा मुश्किल हो जाही, कल बर रोटी दाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


इंच इंच मा बनगे बासा, नइ बाँचिस दैहान।

जीव जंतु के मरना होगे, देवै कोन धियान।।

तार रुधांगे भू कब्जागे, बचिस पात ना डाल।

भुइयाँ के रखवार सिरागे, बढ़गे देख दलाल।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Friday, 22 May 2026

सार छंद -जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 सार छंद -जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"


मुखारी(दतुन)


ब्रस मंजन के माँग बाढ़गे, दतुन देख फेकागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


खेत खार अब कोन ह जावै, तोड़ै कोन मुखारी।

मंजन आगे आनी बानी, होवै मारा मारी।

करँव भला का गोठ शहर के, गाँव ह घलो झपागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


दवा बरोबर दतुन जान के, पहली सबझन खोजे।

बम्हरी नीम करंज जाम के, दतुन करे सब रोजे।

दाँत मसूड़ा मुँह के रोग ह, करत मुखारी भागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


एक मिनट मा दाँत चमकगे, चाबे के नइ कंझट।

जीभी आगे अब नइ हावय, चिड़ी करे के झंझट।

दाँत बरत हे मोती जइसे, चाबत चना खियागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


दाँत घलो हा पोंडा परगे, ब्रस मंजन के सेती।

चना ठेठरी चाब सके नइ, चाब पाय का रेती।

शरद गरम नइ सहि पावत हे, असली नकली लागे।

आगे आगे आगे संगी, नवा जमाना आगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद

 पस्त यात्री पथभ्रष्ट रेलगाड़ी- कुंडलियाँ छंद


कतको गाड़ी रद्द हे, कतको मा बड़ झोल।

सफर रेल के जेल ले, का कमती हे बोल।

का कमती हे बोल, रेलवे के सुविधा मा।

देख मगज भन्नाय, पड़े यात्री दुविधा मा।

सिस्टम होगे फेल, उतरगे पागा पटको।

ढोवत हावै कोल, भटकगे मनखे कतको।


ना तो कुहरा धुंध हे, ना गर्रा ना बाढ़।

तभो ट्रेन सब लेट हे, लाहो लेवय ठाढ़।

लाहो लेवय ठाढ़, रेलवे अड़बड़ भारी।

चलत ट्रेन थम जाय, मचे बड़ मारा मारी।

टीटी छिड़के नून, कहै आ टिकट दिखा तो।

यात्री हें हलकान, होय सुनवाई ना तो।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Monday, 18 May 2026

पर उपदेस (सार छंद)

 पर उपदेस (सार छंद)


देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।

स्वारथ मा सन काम करत हें, दया मया सत लेस।


धरम करम के बात करैं नित, कहैं झूठ झन बोलौ।

सुख सुम्मत मा जिनगी जीयौ, जहर कभू झन घोलौ।

बात मया मरहम के बोलँय, बाँटय उही कलेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


नशापान के हानि बतावँय, रोजे भाषण पेलें।

उहू भुलागे बात बचन ला, अध्धी पाव ढकेलें।

बिहना लागे संत गियानी, संझा बदले भेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


मनखे मनखे एके आवन, छोड़ौ कहै लड़ाई।

तिही बड़े छोटे नइ मानै, दाई ददा न भाई।

आन छोड़ दे अपने मन ला, पहुँचावत हें ठेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


कहिस तउन करके दिखलाइस, तुलसी बुद्ध कबीरा।

तज दिस धन दौलत वैभव ला, किसन पाय बर मीरा।

आज मनुष तज सही गलत ला, मारत हावँय टेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Thursday, 7 May 2026

मोर गॉव अब शहर बनगे.....

 ....मोर गॉव अब शहर बनगे.....

शहरिया शोर म दबगे,सिसन्हिन के ताना|

लहलहावत खेतखार म बनगे,बड़े-बड़े कारखाना|

नदिया नहर जबर होगे ,डाहर बनगे बड़ चंवड़ा|

पड़की परेवा फुरफुंदी नंदात हे,नंदात हे तितली भंवरा|

सड़क तीर के बर पीपर कटगे, कटगे अमली आमा|

सियान के किस्सा नई भॉय,सब देखे टीभी डरामा|

पाहट के आहट,अउ संझा के शॉति आज कहर बनगे...|

मैय हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज  शहर बनगे.........|


संगमरमर के मंदिर ह,देवत हवे नेवता|

कहॉ पाबे गली म,अब बंदन चुपरे देवता?

तरिया ढोड़गा सुन्ना होगे,घर म होगे पखाना सावर|

बोंदवा होगे बिन रूख राई के,डंगडंग ले गड़गे टावर|

मया के बोली करकस होगे,लईका होगे हुशियार|

अत्तिक पढ़ लिख डारे हे,दाई ददा ल देथे बिसार|

बिहनिया के ताजा हवा घलो,अब जहर बनगे....|

मै हॉसव कि रोववौ,मोर गॉव आज शहर बनगे...|


मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारा संग, सबला बॉट डरिस|

जंगल अउ रीता भुंइया ल,चुकता चॉट डरिस|

छत के घर म, कसके तमासा|

नई करेय कोई कखरो ले आसा|

होरी देवारी तीजा पोरा,घर के डेहरी म सिमटागे|

चाहे कोनो परब तिहार होय,सब एक बरोबर लागे|

नक्सा खसरा संग आदमी बदलगे होगे ताना बाना|

चाकू छुरी बंदूक निकलगे  सजगे  मयखाना |

चपेटागे बखरी बियारा,पैडगरी अब फोरलेन डहर बनके....|

मै हॉसव कि रोववौ मोर गॉव आज  शहर बनगे......|

                                    जीतेन्द्र कुमार वर्मा

                                   खैरझिटी (राजनॉदगॉव)

कलम रोंये हे

कलम रोंये हे

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सब बर रोटी पोये हे,

तभो बिन खाय सोये हे......|

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे..............||


हे खई-खजाना ओली म,

मीठ मंदरस हे बोली म||

सिधोत बारी-बखरी;खेत-खार,

दिन गुजरगे रंधनी खोली म||

जब ले धरे जनम,

तब ले करे जतन||

घर-बन;लइका; गोंसैंया के,

बेटी;महतारी;सुवारी बन|

मुंदरहा पहिली जागे हे ,

रतिहा आखिर म सोये हे.....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे...........||


कोख के पीरा कोन मेर बॉचे|

रोवत  लइका  कोरा म  हॉसे|

सोना  चॉदी  हीरा  बनाइस,

रहिके  जिनगी  भर  कॉचे|

बनके दरपन घर के,

सजाये घर-परिवार ल|

कोन बोह पाही ये भुंइयाँ म,

महतारी  के  भार  ल|

फरे साग-भाजी;महके फूल-फूलवारी,

बाढ़े रूख-राई ;महतारी जे बोये हे....|

जे बेर लिखे हे, गोठ महतारी के,

ते  बेर  कलम  रोये हे....................|


बारे हे दिया तुलसी चंवरा म,

लिपे-पोते हे अँगना दुवारी||

मुचमुच हॉसे कुंदरा ह घलो,

जेन   घर   हे      महतारी||

महतारी अवतार दुरगा काली के|

देखाइस दुख म  घलो जी के|

हॉसिस ऑखी के ऑसू ल पी के|

फेर कोनो नइ देखिस घाव ल छी के|

खुदे मइलाके ;गंगा कस,

जग के  पाप ल धोये हे....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते   बेर   कलम   रोये  हे......||

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                 📝  जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को( कोरबा )

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मोर महतारी मोर अभिमान

हम नही

 हम नही


रिस्तें बिगड़ने का, किसी को कोई गम नही।

आज सबको सिर्फ पैसा चाहिये, हमदम नही।।


खंजर से खुदे जख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

जुबां से बढ़कर जमाने में, बारूद बम नही।।


खुद को राजा समझ रहें हैं, रील वालें।

रीयल में उनमें, जरा सा भी दम नही।।


एकता अखंडता भाई चारा, दिखावा है।

जहर जाति धर्म का, हो रहा है कम नही।


पता नही, ये पैमाना है या मौका परस्ती,

देश संविधान से चलेगा, पर हम नही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

खन खन खन खन खन खन।।

 खन खन खन खन खन खन।।


उगती ला खन।

बुड़ती ला खन।

भंडार ला खन।

रक्सेल ला खन।

निकाल कोयला लोहा हीरा।

झन देख कखरो दुःख पीरा।।

भाड़ मा जाय खेत खार घर बन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

जिहां बइला के घुंघरू बाजे।

खन खन खन खन,

तिहां होवत हावय आजे।।

एक के उजड़त हे सुख सपना,

एक के बाढ़त हे धन।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

महतारी के छाती ला खन।

फोड़ पवर्त पठार,

मार बम बारूद हथौड़ा घन।।

खन खन खन खन एकेदरी खन।

झन बचा कुछु एकोकन कन।।

खन खन खन खन खन खन।।


खन खन खन खन,

एक के बाजत हे खीसा।

एक मर जावत हे,

दुख पीरा मा पीसा।।

आजे दुःख खड़े हे ठाढ़,

कोन जन काली का होही?

गुदा खाय आने मन,

छत्तीसगढिया चगले गोही।

सबले बढ़िया हे छत्तीसगढिया मन।

लुल्हाड़त हें नेता वैपारी अउ शासन।।

खन खन खन खन खन खन।।


सहेज सहेज के राखिन सियान मन।

तब कहीं जाके फुदरत हें आन मन।।

पुरखा घलो अपन पाहरो मा सब ला सिरा देतिन।

ता आज ये नवा पीढ़ी घलो जनम नइ लेतिन।।

जतन के रखिन खेत खार ताल नदी बन।

तब जाके जियत साँस लेवत हन।।

खन खन खन खन खन खन।।


हवा मा झन उड़ा माटी मा सन।

मनखें अस ता रक्सा झन बन।।

खन खन खन खन जरूरत के पूर्ति।

सुवारथ तज, बन मानवता के मूर्ति।।

धरती के सुघराई ए, नदी पहाड़ बन।

खन खन खन खन खन खन।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा(छग)

कोन हे

 कोन हे


बात बात मा चिड़थस, बता बात कोन हे।

तोर पेट पिटारा उन्ना हे, ता खात कोन हे।


नसा नाश ए कहे, भट्ठी के ठेका दार मन,

ता मनखें मन ला दारू, पियात कोन हे।।


जय जवान जय किसान के, नारा रटथस,

फेर आपस मा दुनो ला, लड़ात कोन हे।।


जल जंगल जमीन के, करथस रोज बात,

ता लोहा हीरा कोइला ला, चोरात कोन हे।।


गारी गल्ला देय मा, हो जावत हे फांसी।,

मार काट के गली मा, मेछरात कोन हे।।


कोट कछेरी नाम सुनके, थरथर काँपे कोई,

ता कोट कानून के धज्जी, उड़ात कोन हे।।


जीयत मनखें, गड़ जावत हें कबर भीतरी,

ता जुन्ना बात ला घेरी बेरी, सुनात कोन हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)

 मुसवा हाथी जइसे(मात्रा-16,12)


छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।

सात करोड़ी धान डकारे, खबर आय हे अइसे।।


चांटी खाही अब पर्वत ला, दिंयार लोहा सोना।

निगल जही अजगर धरती ला, नइ बाँचे कुछु कोना।।

दूध दही गुड़ माखन मिश्री, कहही पथरा खइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जंगल ला छेरी हा चरके, लगथे बिरान करही।

नवा सड़किया उजड़ जही अब, रेंगय बछिया मरही।।

सागर के पानी पी जाही, बूड़े बुढ़वा भइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


रखवारे के नीयत नइहे, देन कोन ला बद्दी।

कोन जनी कल का हो जाही, गोल्लर तिर हे गद्दी।।

ये कलजुग अउ राजपाठ के, होही विनाश कइसे।

छत्तीसगढ़ मा पाए जाथे, मुसवा हाथी जइसे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द

 मुसवा मन रइपुर में- सार छन्द


बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।

खाय धान ला हवै पचावत, नाचत गावत सुर में।।


मुड़ धर बइठे हे लंबोदर, बिलई देखत भागे।

धाने भर मा पेट भरे नइ, खाथें कुकरी सागे।।

सजा बदी नइ लागे वोला, चपकाये नइ खुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


घूम घूम के चारो कोती, खोजत रहिथें दौलत।

कुछ बिगाड़ नइ पाये ओखर, नीर घलो हा खौलत।।

सेना भारी डेना भारी, उमियायें मदचुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


धरा गगन पाताल घलो ला, भाजी पाला जाने।

सात पुस्त बर माल सकेले, बेच धरम ईमाने।।

बेरा रहिते दे बर पड़ही, मिला दवाई गुर में।

बइठे हावय सात करोड़ी, मुसवा मन रइपुर में।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

गजब दिन भइगे

 गजब दिन भइगे


गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।

गुरुजी के गुर्रई अउ, सुँटी बेत देखे।।


दाई के दरघोटनी, सील लोड़हा के चटनी।

नजरे नजर झूलथे, पठउँहा के पटनी।।

बबा के ढेरा, अउ बारी के केरा।

कोठी काठा मरकी, गँजाये पेरा।।

कोदईधोना झेंझरी, नियम नेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


कोठा के झँउहा, खरहेरा गरू गाय।

पपीता मुनगा पेड़, सपना मा आय।।

गोबर के छर्रा छीटा, चूल्हा के आगी।

खुमरी मैनकप्पड़, साफा पागा पागी।।

तरिया के लद्दी, अउ नदी नरवा के रेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।।


घठोंदा के पचरी अउ, पथरा बुलाथे।

सल्हई पँड़की बोली, गजब मन भाथे।।

जुन्ना बर पीपर अउ, छींद बोइर जाम।

हरर हरर बूता अउ, मरत ले काम।।

नाक बोहई लइका के, सियानी चेत देखे।

गजब दिन भइगे, सरसो के खेत देखे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मुक्तक-होली

 मुक्तक-होली


एक हाथ में माला, एक हाथ में भाला है।

ज़्यादातर मदहोशी का कारण हाला है।

आख़िर होली उसको क्या रंग लगाए,

जिनका तन और मन बिल्कुल काला है।।


हाथ में बम-गोली है कहकर लूट लिया,

खाली मेरी झोली है कहकर लूट लिया।

लुटेरों की न सूरत और न सीरत होती है,

"बुरा न मानो, होली है" कहकर लूट लिया।।

`

अक्षत, चंदन, रोली है,

मधुर-रस घुली बोली है।

झूमो, नाचो, गाओ यारो—

झूमकर आई होली है।।


रंग जाए ऐसा अंग नहीं है।।

मन भाए ऐसा भंग नहीं है।

मैं बदला हूँ या बदल गई होली—

रंग में भी अब वो रंग नहीं है,



गाँव, थाना, कस्बा, ज़िला—सब बाँट लिए हैं,

पर्व, त्योहार, नृत्य-लीला—सब बाँट लिए हैं।

होली रंगे तो भला किसको किस रंग में रंगे?

हरा, नीला, लाल, पीला—सब बाँट लिए हैं।।



लाया हूँ तुम्हारे लिए ये सुर्ख लाल रंग,

आँखों से उतारो चश्मा—तो रंग दूँ मैं।।


सभी तो कल है, आज कौन है।

नजर में सब है, राज कौन है।।

सब तो हाक रहे है, विद्वता अपनी

तो बताओ मूर्खाधिराज कौन है।।


खैरझिटिया

आन भरोसा-सार छंद

 आन भरोसा-सार छंद


आन भरोसा तेल गैस सिम, तकनीकी अउ टावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


पर के देख दिखावा मा ये, चलत हवय जिनगानी।

आँय बाँय सब बुता काम हे, चुप हें दादी नानी।।

नरी सुखावत हवय प्यास मा, हवय पखाना सावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


काके करन गुमान भला अब, नइहें खेती बाड़ी।

बेंच भांज के घर दुवार ला, लेवत हावन गाड़ी।।

कटगे निमुवा बर पीपर सँग, चंदन चीड़ चितावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


चूल्हा चाकी लकड़ी नइहें, कइसे जेवन पकही।

टूरा मन जकहा बन घूमँय, टूरी मन बन जकही।।

नेकी धरमी ज्ञानी नइहें, ना नेता कद्दावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जगन्नाथ ए अपन हाथ हा, महिनत पुरथे खुद के।

स्वारथ के सब रिस्ता नाता, चार पहर बस फुदके।।

लत परवादिस फोकट मा दे, अब माँगें न्यौछावर।

बता भला अइसन मा कइसे, देखाबों हम पावर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Wednesday, 6 May 2026

मुक्तक

 एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद


पइसा बिन एटीएम हा, खड़े रथे मुँह फार।

हमर होय बैलेंस कम, दंड लेय सरकार।।

दंड लेय सरकार, आम खाता धारी ले।

बोचक जाये बैंक, झाड़ पल्ला पारी ले।।

सुने भला अब कोन, करिन का काये कइसा।

ठँउका रहिथे काम, मिले नइ खोजे पइसा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुण्डलियां-नेता घर नेता


नेता के बेटी बहू, बाई भाई पूत।

नित नेता बनते रही , भागे नइ ये भूत।।

भागे नइ ये भूत, हरे कुर्सी इँखरे बर।

होवत रहिथे खेल, इहिच मन ला नित दे बर।

गला फाड़ चिल्लाय, उहू ये पद के क्रेता।

आम चुहकहीं आम, रही नेता घर नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



फेक अकड़ गुमान- कुंडलियाँ

धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा हरेक किरदार।।

निभा हरेक किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



तीन सवारी-कुंडलियाँ


तीन सवारी देख के, काटे पुलिस चलान।

भरे खचाखच रेल हे, निकल जथे जी जान।।

निकल जथे जी जान, व्यवस्था कोन सुधारे।

लेये बर लउहाय, देय बर पल्ला झारे।

आम खास मा भेद, होय सब कोती भारी।

रोड दिखे ना भीड़, दिखे बस तीन सवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


कुर्सी-कुंडलियाँ

जनता के पीये लहू, नेता मन बन शेर।

जॉब घटय कुर्सी बढ़य, कइसन आगे बेर।।

कइसन आगे बेर, मचे कुर्सी के झगड़ा।।

कइसे होय विकास, करें घोटाला तगड़ा।।

सब ला जोर सुनाँय, कहानी संता बंता।।

इती उती के बात, सुने हँस हँस के जनता।


खैरझिटिया



अइसन काबर-कुंडलियाँ


डॉक्टर झोला छाप कहि, शासन वसुलै दंड।

नेता झोला छाप हे, मिलजुल खावँय फंड।।

मिलजुल खावँय फंड, उठावै अँगरी कौने।

नियम तोड़थें रोज, नियम नित हाँके तौने।

मनके करथें काम, सबे ला खीसा मा धर।

गरजे अँगठा छाप, डरे भल मास्टर डॉक्टर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रोय रसोई


रोय रसोई गैस बिन, गाड़ी हा बिन तेल।

चीज सबे महँगात हे, होय युद्ध जस खेल।।

होय युद्ध जस खेल, बजत हे दुख के बाजा।

बनके तिगड़म बाज, जुलुम ढावत हें राजा।।

कर नइ सके विकास, तेल टावर बिन कोई। 

रहे सदा सुख चैन, कभू झन रोय रसोई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




कोल्ड ड्रिंक्स के राज मा, नींबू सरबत फेल।

कब का हा महँगा जही, आय समझ नइ खेल।

हावी हावय उधोगी।

आम जन भुक्तभोगी।


नेता


नेता मन रैली करे, सड़क चौक ला घेर।

जाम लगे चारो डहर, खड़े पुलिस मुँह फेर।।

खड़े पुलिस मुँह फेर, देख के फुदरे नेता।।

पाके मनखें आम, नियम कहि हुदरे नेता।

शासन ला रख जेब, घुमे बन विश्व विजेता।

जनता जाए भाड़, करे मनमानी नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


फूफा


रिस्ता मा बिखराव आम होगे।

जुड़ छइयां देख आज घाम होगे।

भीतरे भीतर तिगड़म फूफू करे,

इती फूफा बिचारा बदनाम होंगे।

खैरझिटिया



किरायेदार-कुंडलियाँ


गरू लगे दाई ददा, हरू किरायेदार।

होन देन नइ कुछु कमी, खूब करे सत्कार।।

खूब करे सत्कार, लागमानी हो जइसे।

पइसा खातिर आज, मनुष रँग बदले कइसे।।

सबझन के इहि  हाल, कहे मा करू लगे।

कइसन दिन हे आय, ददा दाई गरू लगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पद पइसा- कुंडलियाँ

पद पइसा के चाह मा, बाँचे कहाँ ईमान।

झन जा बोली बात मा, बिक जाथे इंसान।।

बिक जाथे इंसान, अपन पहिचान भुलाके।

हो जाथे खामोश, मूड़ मा ताज सजाके।।

माया आघू मान, मनुष के होवव रदखद।

अवसर देख जुगाड़, करें पाए बर सब पद।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


नत्ता रिस्ता आज बाजारू होगे।

नँदात नरियर गंगा बारू होगे।

गय सुदामा किशन के जमाना,

अब दोस्ती मतलब दारू होगे।।

खैरझिटिया


सोचो यदि मच्छर साठ साल जीते,  

न जाने किसका कितना खून पीते।  

इसीलिए जल्दी मौत मिली है उसे,  

पर आदमी क्यों बन बैठा है चीते।  

खैरझिटिया


छप्पर-छानी कब छत हो गई, पता नहीं चला।  

मेरे खिलाफ़ कब जनमत हो गई, पता नहीं चला।  

कभी यहाँ, कभी वहाँ—रोज़ मंज़िल ढूँढते रहे,  

कब राह से मोहब्बत हो गई, पता नहीं चला।  

खैरझिटिया

रार मचे हे खाड़ी मा

 रार मचे हे खाड़ी मा


भात चुरे नइ काड़ी मा।

सोवा परगे हाँड़ी मा।

गैस सिरागे जेब चिरागे,

रार मचे हे खाड़ी मा।।


साग उगे नइ बाड़ी मा।

खेत पटागे झाड़ी मा।।

आफत हा अब अवसर बनगे,

लहू सुखागे नाड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


हें मजदूर दिहाड़ी मा।

फोकस हवैं खिलाड़ी मा।।

भला भरोसा काय करीं अब।

गुजराती मरवाड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


दरद उठत हे माड़ी मा।

तेल सिरागे गाड़ी मा।।

पिसागेन पर के झगरा मा,

बइठे बइठे भाँड़ी मा।।

रार मचे हे खाड़ी मा----


कतकों बिकगे साड़ी मा।

कतकों  दारू ताड़ी मा।

नेता ला बस कुर्सी चाही,

सोज बाय अउ आड़ी मा।

रार मचे हे खाड़ी मा----


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 1 May 2026

कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद

 कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद


मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।

गँवा जथे कतको जिनगी हा, मजा करे के चक्कर मा।।


बीहड़ डोंगर पर्वत घाटी, बन बरफ समुंदर पानी।

ये सब सँग खेले के सेती, उजड़े कतको जिनगानी।।

खेलव झन पानी पुरवा ले, हवा गरेरा झक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


अपन दायरा जतका हावै, ततके नित पाँव लमावव।

कुदरत के कानून कड़ा हे, जादा झने मेछरावव।।

पानी मिल पानी कर देथे, नून होय या शक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


मनखें मन सँग हाँसव खेलव, गढ़व कढ़व कुदरत ला।

सोचें समझे के ताकत हे, छोडव मद जिद अउ लत ला।।

काम करव झन बनके अड़हा, पड़के लउहा लक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)