Friday, 1 May 2026

कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद

 कुदरत ले झन खेलव-लावणी छंद


मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।

गँवा जथे कतको जिनगी हा, मजा करे के चक्कर मा।।


बीहड़ डोंगर पर्वत घाटी, बन बरफ समुंदर पानी।

ये सब सँग खेले के सेती, उजड़े कतको जिनगानी।।

खेलव झन पानी पुरवा ले, हवा गरेरा झक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


अपन दायरा जतका हावै, ततके नित पाँव लमावव।

कुदरत के कानून कड़ा हे, जादा झने मेछरावव।।

पानी मिल पानी कर देथे, नून होय या शक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


मनखें मन सँग हाँसव खेलव, गढ़व कढ़व कुदरत ला।

सोचें समझे के ताकत हे, छोडव मद जिद अउ लत ला।।

काम करव झन बनके अड़हा, पड़के लउहा लक्कर मा।

मनुष रहू बौना के बौना, अगिन अनिल जल टक्कर मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)