कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा
डिजिटल इंडिया हा गजब, मारत हावै जोर।
तुरते होवय काम सब, हाँसे रोवँय चोर।।
हाँसे रोवँय चोर, खबर फइले आगी कस।
पाय बने मन मान, डरे मनखें दागी कस।।
बड़े होय या छोट, मिलत हावँय सबला बल।
सबके मन के बात, बतावय बेरा डिजिटल।।
हावी डिजिटल दौर हे, चारो कोती देख।
कई ऊँचाई ले गिरे, फिरे कई के लेख।।
फिरे कई के लेख, कई पछ्तावत तक हें।
घर लागे ना रोड, सबे कोती बकबक हें।।
करनी करही काय, कोन जन बेरा भावी।
सोच समझ बतियाव, हवै डिजिटल युग हावी।।
राखत हवै रिकार्ड ला, डिजिटल अपन मेर।
गुररावत हे साथ पा, बकरी तक बन शेर।।
बकरी तक बन शेर, आज नाचत हे बन ठन।
चारी चुगली झूठ, आय आघू मन दनदन।।
सबके खोले पोल, देख कतको हें काँखत।
डिजिटल बेर रिकार्ड, सबे के हावय राखत।।
दिखगिस डिजिटल मा चरित, कइसन हावय कोन।
लोहा आये कोन हा, आय कोन हा सोन।।
आय कोन हा सोन, जान जावत हें दुनिया।
झूठ मूठ हे शोर, असल मा काँपे मुनिया।।
धर देखावा झूठ, इही मा सबझन टिकगिस।
राजा प्रजा समेत, सबें के नीयत दिखगिस।।
सबझन इस्टाग्राम मा, करत हवँय बकलोल।
दुनिया ला बतलात हे, अपन जिया के बोल।।
अपन जिया के बोल, सबें झन हावैं बोलत।
कई नाच देखाय, कई झन हें विष घोलत।।
होही कलो हिसाब, बने आजे भर झन बन।
काखर का हे काम, गड़ाये आँखी सबझन।।
डिजिटल के बाजा बजिस, होगिस बत्ती गोल।
छोट लगत हे अउ ना बड़े, सबें कहें दिल खोल।।
सबें कहें दिल खोल, जिया मा जउने हावँय।
मन मुताबित गीत, सबें झन कइसे गावँय।।
पके झूठ सुन कान, करे जिवरा बड़ तलमल।
बनगे हे हथियार, आज ये बेरा डिजिटल।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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