Thursday, 13 May 2021

छत्तीसगढ़ अउ कबीर साहेब

 छत्तीसगढ़ अउ कबीर साहेब


             वइसे तो कबीर साहेब छत्तीगढ़िया मनके अन्तस् म बसथे, तभो आज कबीर साहेब के महत्ता छत्तीसगढ़ के गाँव-शहर, गली-खोर म देखे के प्रयास करबों। हमर छत्तीसगढ़ का,भारत भर म अइसन कोनो मनखे नइ होही जेन कबीर साहेब नइ जानत होही। संत कबीर कोनो जाति समुदाय के नही बल्कि, थके हारे, दबे कुचले, दीन हीन मनखे के थेभा रिहिन। छत्तीगढ़ भर म कबीर दास जी के नाम म कतको लइका लोग अउ घर दुवार के नाम दिख जथे, संगे संग गली खोर, गांव शहर म कबीर चौक, कबीरचौरा, कबीर पारा आदि कतको ठन चौक चौराहा घलो दिखथे। रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, रायगढ़ जइसे बड़का शहर म घलो कबीर साहेब के नाम म पारा मुहल्ला घलो हे। *बालोद जिला के अंतर्गत कबीर साहेब के नाम म एक भव्य भवन हे, जेला ए डी  सर जी ह जनसहयोग ले बनवाये रिहिस।* *कोरबा म कबीरदास जी के नाम म बड़का वाचनालय सुशोभित हे।*  छत्तीसगढ़ म कबीर दास जी के कतका प्रभाव हे, ये कबीरधाम नाम के हमर जिला ले अंदाजा लगाये जा सकथे। कहे के मतलब कबीर के नाम म चौक, चौराहा ही नही बल्कि 28 ठन जिला म एक ठन जिला ही कबीरधाम नाम के हे, जेला कवर्धा घलो कथन। *सुने म आथे की अपन जीवन काल म कबीरदास जी महाराज सकरी नदी के तट म छत्तीसगढ़ पधारे रिहिन, अउ उही मेर धनी धरम दास जी अपन गद्दी स्थापित करिन, ते पाय के वो स्थान कबीरधाम कहिलाथे।*


                         मनखे मनखे नाम, घर दुवार, गली खोर अउ गाँव शहर मनके नाम म, कबीरदास जी रचे बसे हे, वइसनेच हमर राज के जुन्ना विधा नाचा म घलो कबीर साहेब के प्रभाव दिखथे। पहली समय म कम साधन अउ बिना साज सज्जा के खड़े साज के चलन रहिस। रवेली अउ रिंगनी नाच पार्टी वो बेरा म खूब देखे सुने जावत रिहिस, जेमा मुख्य रूप ले सन्त समाज अउ दर्शक दीर्घा ल कबीर भजन ही परोसे जाय। कबीर साहेब अउ नाचा के जब नाम आथे त *कबीर नाच पार्टी मटेवा* के कलाकार मनके चेहरा अन्तस् म उतर जथे। श्री झुमुक़दास बघेल अउ नाहिक दास मानिकपुरी के जुगल प्रस्तुति सबके मन ल लुभा लेवय। कबीर के दोहा,साखी शबद, भजन,अउ गीत मुख्य आकर्षण के क्रेंद रहय। नाचा म जोक्कड़ मनके जोकड़ई म दर्शक दीर्घा ल हँसाये बर, कबीर के उलटबन्सी अउ दोहा खूब रोचक लगे।छत्तीसगढ़ म रामायण अउ भजन मण्डली म घलो कबीर साहेब के प्रभाव दिखथे।

                  कबीर दास जी के भजन मन जुन्ना बेरा म जतका प्रभावी रिहिस वइसनेच आजो हे। जीवन दर्शन ऊपर आधारित कबीर साहेब के दोहा, साखी, शबद के कोनो सानी नइहे। *कहत कबीर सुनो भाई साधो, माया तजि न जाय, झीनी रे झीनी चदरिया, साहेब तेरा भेद न जाने कोउ, कुछु लेना न देना मगन रहना, रहना नही देश बिराना, भजले साहेब बन्दगी, लागे मेरो मन फकीरी में*---आदि कतको भजन सुनत ही मनखे ल परम् सुख सहज मिल जथे। स्वरांजलि स्टूडियो ले छत्तीसगढ़ के दुलरुवा कवि अउ गायक  परम श्रध्देय मस्तुरिया जी *कबीर* नाम से एक कैसेट घलो निकाले रिहिस, जे भारी चलिस। जेमा कबीरदास जी के भजन ल अपन अंदाज म मस्तुरिया जी जनमानस के बीच रखे रिहिस। *बीजक मत पर माना, शबद साधना की जै, गुरु गोविंद खड़े, खबर नही आज, हमन है इश्क, माया तजि न जाय* कबीर दास जी के लिखे आदि भजन वी कैसेट म रिहिस। मस्तुरिया जी कबीर के नाम म खुद घलो कई ठन रचना करिन अउ वोला अपन स्वर दिन, जेमा हम तो तेरे साथी कबीरा हो, जइसे उम्दा भजन आजो मन ल मुग्ध कर देथे। कई लोक कलाकार मन घलो कबीरदास जी के भजन ल अपन स्वर दे हें।


                कबीरपंथी समुदाय, कबीर गद्दी आश्रम,  कबीर  के अमृत वाणी, साखी शबद सबे दृष्टि ले हमर छत्तीसगढ़ कबीरमय हे। दामाखेड़ा, कबीरधाम, कुदुरमाल, खरसिया, नादिया,बालोद,जइसन कई कबीर तीर्थ अउ अनेक आश्रम,  हमर छत्तीसगढ़ म बनेच संख्या म सुशोभित हे। कबीरदास जी महाराज छत्तीसगढ़ के कण कण म बिराजमान हे। सादा जीवन अउ उच्च विचार रखे, न सिर्फ कबीर पंथी बल्कि जमे छत्तीगढ़िया मन कबीर साहब के बताये रद्दा म चलही, त उंखर जीवन धन्य हो जाही। 


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मनहरण घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 माँ

मनहरण घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


दूध के कटोरी लाये, चंदा ममा ल बुलाये।

लोरी गाके लइका ला, सुघ्घर सुताय जी।।

अँचरा के छाँव तरी, सरग हे पाँव तरी।

बड़ भागी वो हरे जे, दाई मया पाय जी।।

महतारी के बिना ग, दूभर हवे जीना ग।

घर बन सबे सुन्ना, कुछु नी सुहाय जी।।

महतारी के मया, झन दुरिहाना कभू।

सेवा कर जीयत ले, दाई देवी ताय जी।।



पेट काट काट दाई, मया बाँट बाँट दाई।

लाले लोग लइका ला, घर परिवार ला।।

दया मया खान दाई, हरे वरदान दाई।

शेषनाँग सहीं बोहे, सबे के वो भार ला।

लीपे पोते घर द्वार, दिखे नित उजियार।

हाँड़ी ममहाये बड़, पाये कोन पार ला।

सबे के सहारा दाई, गंगा कस धारा दाई।

माथा मैं नँवाओं नित, देवी अवतार ला।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को, कोरबा(छग)



शंकर छ्न्द-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"



महतारी


महतारी कोरा मा लइका, खेल खेले नाँच।

माँ के राहत ले लइका ला, आय कुछु नइ आँच।

दाई दाई काहत लइका, दूध पीये हाँस।

महतारी हा लइका मनके, हरे सच मा साँस।।



अंगरखा पहिरावै दाई, आँख काजर आँज।

सब समान ला मॉं लइका के,रखे धो अउ माँज।

धरे रहिथे लइका ला दाई, बाँह मा पोटार।

अबड़ मया महतारी के हे, कोन पाही पार।।



करिया टीका माथ गाल मा, लगाये माँ रोज।

हरपल महतारी लइका बर, खुशी लाये खोज।

लइका ला खेलाये दाई, बजा तुतरू झाँझ।

किलकारी सुन माँ खुश होवै, रोज बिहना साँझ।



महतारी ला नइ देखे ता, गजब लइका रोय।

पाये आघू मा दाई ला, कलेचुप तब सोय।

बिन दाई के लइका मनके, दुःख जाने कोन।

लइका मन बर दाई कोरा, सरग हे सिरतोन।।


-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

सन्त गुरु घासीदास अउ छत्तीसगढ़

 सन्त गुरु घासीदास अउ छत्तीसगढ़


                       "मनखे मनखे एक कहिके"  मानुष मन ल एक धागा म पिरोइया, संत गुरु घासीदास के पावन पग चिन्ह पाके हमर छत्तीसगढ़ धन्य हे। जब समाज म ऊँच नीच अउ छुवाछुत चरम सीमा म रहिस, ते समय हमर राज के  बलोदाबाजार जिला के गिरौदपुरी नाम के गाँव म महगू दास अउ माता अमरौतिन के कोरा म दीन दुखिया मनके सहारा बनके, 18 दिसम्बर सन 1756 म, सन्त घासीदास जी प्रगट होइस। गुरु घासीदास जी मानुष समाज म फइले बुराई ल देख के बहुत दुखी होइस। बलौदा बाजार जिला के छाता पहाड़ म औरा धौरा पेड़ तरी अखण्ड साधना म लीन होके, सदज्ञान पाके, अपन जिनगी ल संत घासीदास जी ह दीन हीन मनके नाम करदिस। चोरी, मद्यपान, अंधविश्वास, व्यभिचारी, झूठ अउ जीव हत्या जइसन समाज म व्याप्त सबे बुराई ल घासीदास जी दुरिहाय के प्रण लिस अउ समाज सेवा म सतत लग गे। घासीदास जी के सतुपदेश के मनखे मन म अतका प्रभाव पड़िस कि, एक नवा पंथ सतनाम पंथ, वो बेरा ले चले ल लगिस। अउ आजो घलो छत्तीसगढ़ के कोना कोना म सतनाम पंथ चलत हे। 

                          संत घासीदास जी के उपदेश हमर महतारी भाषा छत्तीसगढ़ी म रहय, जेखर कारण जनमानस के अन्तस् म जस के तस समा जावव। गुरु घासीदास जी हमर छत्तीसगढ़ के आन बान शान आय। हमर छत्तीसगढ़ म भारी संख्या म सतनाम समाज उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम चारो दिशा म विद्यमान हे। करमा सुवा ददरिया कस पंथी(गुरुमहिमा ज्ञान) घलो हमर लोक नृत्य आय। पंथी नृत्य म कई कलाकार मन सन्त घासीदास जी के महिमा गान न सिर्फ भारत बल्कि विदेश म घलो कर चुके हे। जेमा स्व मोहनदास बंजारे जी के नाम पहली पंक्ति म आथे। 

                       वइसे तो हर शहर गाँव गली म सन्त घासीदास जी के पावन स्तम्भ जैत खाम रिहिथे, फेर गिरौदपुरी म बने बड़ ऊँच जैत खाम न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि हमर भारत देश के धरोहर आय। छत्तीसगढ़ अउ गुरु घासीदास जी के बात जब होथे, त हमर बिलासपुर जिला म बने क्रेंदीय विश्वविद्यालय नजर आघू झूल जथे।  छत्तीसगढ़ सरकार संत घासीदास जी के नाम म हर बछर पुरुस्कार घलो देथे। गुरु घासीदास जी छत्तीगढ़िया मनके अन्तस् म बसथे, तभो घर, गाँव गली खोर के नाम तको बाबा जी के सतविचार ल अन्तस् म जगा देथे। 

                        हमर राज के गिरौदपुरी, छाता पहाड़, भंडारपुरी, तेलासी पुरी, खपरीपुरी आदि सतनाम पंथ के पावन तीर्थ  आजो मनखे मन ल आकर्षित करथें। संत घासीदास जी सतनाम पंथ के प्रथम गुरु होइस। आजो बाबा जी के वंशज अउ  गुरु परम्परा शुशोभित हे। बालक दास जी महराज, अगम दास जी महराज अउ मिनीमाता जइसे कई महान विभूति बाबा जी के ही वंशज आय, जिंखर ऊपर हम सब छत्तीगढ़िया मन ल गर्व हे।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मया-जीतेन्द्र वर्मा

 मया-जीतेन्द्र वर्मा


मोर जिनगी होगे हे,अँधियार संगी रे।

छोड़ चल देहे मोला मोर,प्यार संगी रे।।


असाड़ आथे,त बिजुरी डरह्वाथे,

रोवाथे सावन के,बऊछार संगी रे।


भादो भर इती उती ,भटकत रहिथँव,

जरथाथँव रावन कस, कुँवार संगी रे।


संसो म बुलके,कातिक के देवारी,

अग्घन अगोरों,दीया बार संगी रे।


पूस  के जाड़ा हा, बनगे हे  काल,

रोवँव माँघ महीना मैं,हार संगी रे।


कवने हा रँगही , फागुन रंग  म?

कइसे अक्ति मनातेंव,तिहार संगी रे।


बइसाख बइरी,रहि-रहि बियापे,

जेठ भूंजे आगी म,डार संगी रे।


तोर बिना मन,नइ लागे "जीतेन्द्र"

नइ भाये महीना,दिन बार संगी रे।


       जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

            बाल्को(कोरबा)

अक्ती तिहार(दोहा चौपाई)

 अक्ती तिहार(दोहा चौपाई)


उल्लाला-

*बेरा मा बइसाख के,तीज अँजोरी पाख के।*

*सबे तीर मड़वा गढ़े,अक्ती भाँवर बड़ पड़े।*


हरियर मड़वा तोरन तारा,सजे आम डूमर के डारा।

लइका लोग सियान जुरें हे,लीप पोत के चौक पुरें हे।


पुतरी पुतरा के बिहाव बर,सकलाये हें सबे गाँव भर।

बाजे बाजा आय बराती,मगन फिरय सब सगा घराती


खीर बरा लाड़ू सोंहारी,खाये जुरमिल ओरी पारी।

अक्ती के दिन पावन बेरा,पुतरी पुतरा लेवव फेरा।  


सइमो सइमो करे गली घर,सबे मगन हें मया पिरित धर।

अचहर पचहर परे टिकावन,अक्ती बड़ लागे मनभावन।


दोहा-

*परसु राम भगवान के,गूँजय जय जय कार।*

*ये दिन भगवन अवतरे,छाये खुसी अपार।।*


शुभ कारज के मुहतुर होवय,ये दिन खेती बाड़ी बोवय।

बाढ़य धन बल यस जस भारी,आस नवा बाँधे नर नारी।


माँगै पानी बादर बढ़िया,जुरमिल के सब छत्तीसगढ़िया।

दोना दोना धान चढ़ावय,दाइ शीतला ला गोहरावय।


सोना चाँदी कोनो लेवय,दान दक्षिणा कोनो देवय।

पुतरी पुतरा के बिहाव सँग,पिंवरावै कतको झन के अँग।


दोहा-

*देवी देवन ला मना,शुरू करे  सब  काज।*

*पानी बादर के परख,करे किसनहा आज।*


*करसी मा पानी मढ़ा,बारह चना डुबाय।*

*भींगय जतकेकन चना,ततके पानी आय।*


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

हरिगीतिका छंद-अक्ती

 हरिगीतिका छंद-अक्ती


मिलजुल मनाबों चल चली अक्ती अँजोरी पाख में।

करसा सजा दीया जला तिथि तीज के बैसाख में।।

खेती किसानी के नवा बच्छर हरे अक्ती परब।

छाहुर बँधाये बर चले मिल गाँव भर तज के गरब।।


ठाकुरदिया में सब जुरे दोना म धरके धान ला।

सब देंवता धामी मना बइगा बढ़ावय मान ला।।

खेती किसानी के उँहे बूता सबे बइगा करे।

फल देय देवी देंवता अन धन किसानी ले भरे।।


जाँगर खपाये के कसम खाये कमइयाँ मन जुरे।

खुशहाल राहय देश हा धन धान सुख सबला पुरे।।

मुहतुर किसानी के करे सब पाल खातू खेत में।

चीला चढ़ावय बीज बोवय फूल फूलय बेत में।।


ये दिन लिये अवतार हे भगवान परसू राम हा।

द्वापर खतम होइस हवै कलयुग बनिस धर धाम हा।

श्री हरि कथा काटे व्यथा सुमिरण करे ले सब मिले।

धन धान बाढ़े दान में दुख में घलो मन नइ हिले।


सब काज बर घर राज बर ये दिन रथे मंगल घड़ी।

बाजा बजे भाँवर परे ये दिन झरे सुख के झड़ी।।

जाये महीना चैत आये झाँझ  झोला के समय।

मउहा झरे अमली झरे आमा चखे बर मन लमय।


करसी घरोघर लाय सब ठंडा रही पानी कही।

जुड़ चीज मन ला भाय बड़ शरबत मही मट्ठा दही।

ककड़ी कलिंदर काट के खाये म आये बड़ मजा।

जुड़ नीम बर के छाँव भाये,घाम हे सब बर सजा।


लइकन जुरे पुतरा धरे पुतरी बिहाये बर चले।

नाँचे गजब हाँसे गजब मन में मया ममता पले।

अक्ती जगावै प्रीत ला सब गाँव गलियन घर शहर।

पर प्रीत बाँटे छोड़के उगलत हवै मनखे जहर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

9981441795


अक्ती तिहार के बहुत बहुत बधाई

Monday, 26 April 2021

तुलसीदास अउ छत्तीसगढ़-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 तुलसीदास अउ छत्तीसगढ़-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                   गोस्वामी तुलसीदास जी हमर छत्तीसगढ़ राज म रामचरित मानस के माध्यम ले गांव गांव अउ घर घर म पूज्यनीय हे, कोनो परब-तिहार, छट्ठी बरही, मरही हरनी सबे दुख सुख के बेरा म गोस्वामी जी के पावन कृति"रामचरितमानस" घरो घर म पढ़े सुने जाथे। चाहे कोनो गाँव होय या शहर जमे कोती गाँव गाँव, पारा पारा म एक दू ठन रमायण मण्डली खच्चित मिलथे। तुलसीकृत रामचरित के दोहा चौपाई जमे छत्तीसगढ़िया मनके अंतर आत्मा म समाय हे, ते पाय के कभू अइसे नइ लगिस कि गोस्वामी जी आन कोती के आय, सदा अइसे लगथे, कि हमरे अपने राज के आय। गोस्वामी महराज ह हम सब छत्तीसगढ़िया मन ल दुर्लभ प्रसाद देहे, अउ हम सबके दिलो दिमाक म सदियों ले राज करत आवत हे,, अउ अवइया समे घलो राज करही। तुलसीकृत रामचरित मानस अउ अवधी म लिखे अन्य ग्रंथ मन छत्तीसगढिया मन ल सहज ही समझ आ जथे, काबर कि माता कौशल्या के मइके छत्तीसगढ़ के छत्तीसगढ़ी और अयोध्या के अवधी म एक दुसर के राज म अवई जवई ले दुनो भाषा आपस म चिपक गे रिहिस। यहू कारण तुलसीदास की के अवधी म रचित ग्रंथ ह छत्तीसगढ़िया मन बर अटपटा नइ लगय। तुलसीदास जी के जयंती छत्तीसगढ़ म धूमधाम से मनाये जाथे, ये दिन राम कथा पाठ अउ भजन कीर्तन जम्मो कोती होथे। सिरिफ छत्तीसगढ़ मन ही नही बल्कि पूरा भारत वर्ष तुलसीदास जी के राम चरित रूपी भव तरे बर डोंगा ल पाके कृतार्थ हें।

                  कथे कि तुलसीदास जी महाराज प्रभु कृपा अउ अपन आत्म शक्ति ले कलयुग के मनखे मन बर भगसागर तरे बर डोंगा(रामचरित मानस) के रचना करिन। तुलसीदास जी ल महर्षि बाल्मीकि जी के अवतार घलो माने जाथे। संगे सँग यहू कहे जाथे कि तुलसीदास जी ल शिव पार्वती, बजरंगबली के संगे संग भगवान राम, लक्ष्मण अउ जॉनकी समेत दर्शन देय रिहिस।


*चित्रकूट की घाट पर, भये सन्तन की भीड़।*

*तुलसीदास चन्दन घँसे, तिलक देत रघुवीर।*


 गोस्वामी जी के रचना म दोहा चौपाई अउ कतको प्रकार के छ्न्द के माध्यम से छत्तीसगढ़ सँउहत शोभा पाथे। पुनीत ग्रंथ ल पढ़के अइसे लगथे कि तुलसीदास जी महाराज छत्तीसगढ़ म घूम घूम के रामचरित मानस के रचना करे हे। भगवान राम अपन वनवास के बनेच समय छत्तीसगढ़ म गुजारे हे।जुन्ना समय म छत्तीसगढ़ दण्डकारण्य कहलावै, अउ तुलसीदास जी महाराज कतकोन बेर अपन रचना म इही नाम ल सँघेरे हे-


*दण्डक बन प्रभु कीन्ह सुहावन।जन मन अमित नाम किये पावन*


तुलसीदास जी महाराज रामचरित मानस के रचना करत बेरा छत्तीसगढ़ ल अपन अंतरात्मा ले देखे हे। तभे तो इहाँ के संत मुनि-दीन दुखी मनके पीरा ल हरत भगवान राम ल देखाय हे।उत्तर छत्तीसगढ़ म सरभंग ऋषि के आश्रम म पहुँचे के चित्रण गोस्वामी जी के रचना म मिलथे----


*तुरतहि रुचिर रूप तेहि पावा।देखि दुखी निज धाम पठावा*

*पुनि आए जहँ मुनि सरभंजा।सुंदर अनुज जानकी संगा*


पुत्र यज्ञ बर छत्तीसगढ़ ले सृंगी ऋषि के अयोध्या जाय के वर्णन, अउ श्री राम के  सिहावा पर्वत म बाल्मीकि आश्रम आय के वर्णन , गोस्वामी तुलसीदास जी अपन महाकाव्य म करे हे-

*सृंगी ऋषिहि वशिष्ट बोलावा। पुत्र काम शुभ यज्ञ करावा।*


*देखत बन सर सैल सुहाये।बाल्मीकि आश्रम प्रभु आये।*


येखर संगे संग गोस्वामी तुलसीदास जी ह, सिहावा पर्वत अउ महानदी के पावन जल के घलो बड़ मनभावन ढंग ले चित्रण करे हे-


*तब रघुवीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु शीतल पानी।*

*तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।*


*राम दीख मुनि वायु सुहावन। सुंदर गिरि कानन जलु पावन*

*सरनि सरोज विटप बन फूले।गूँजत मंजु मधुप रस भूले।*


भगवान राम के आय ले, सन्त मन के संगे संग,,दण्डक बन के जीव जानवर मनके मनोदशा देखावत तुलसीदास जी लिखथे---


*खग मृग विपुल कोलाहल करही।बिरहित बैर मुदित मन चरही।*

*नव पल्लव कुसुमित तरु नाना।चंचरीक चटली कर गाना।*

*सीतल मंद सुगंध सुभाउ।सन्तत बटइ मनोहर बाउ।*

*कूह कूह कोकिल धुनि करही।सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरही।*

*चक्रवाक बक खग समुदाई।देखत बनइ बरनि नहि जाई।*


न देखत बने, न बरनत, गोस्वामी जी के अइसन पंक्ति देखत कभू नइ लगे कि गोस्वामी जी दण्डक बन के शोभा ल आँखी म नइ देखे होही।


तुलसीदास जी महराज महानदी के तट म भगवान के रद्दा जोहत शबरी माता के घलो कथा बताये हे, राम जी के दर्शन माता शबरी पाय हे अउ संग म नवधा भक्ति के धारा घलो बहे हे-


*ताहि देइ गति राम उदारा।शबरी के आश्रम प्रभु धारा*

(पक्षी राज ल परम् गति देय के बाद प्रभु राम जी शबरी के आश्रम घलो पहुँचिस।)


तुलसीदास जी महराज शबरी के हाथ ले भगवान राम ल कंद मूल फल देय के घलो बात केहे हे-


*कंद मूल फल सुरस अति, दिए राम कहुँ आनि।*

*प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि*


जंगल म निवास करत दीन दुखी मुनि जन मनके रक्षा बर भगवान राम ल असुरन मन ले लड़े के बात घलो गोस्वामी जी कहे हे, रेंड नदी के तट म बसे रक्सगन्डा नामक जघा, खरौद म खरदूषण, राक्षसराज विराट, अउ मरीज के सँघार के घलो बात दण्डक बन ले जुड़े हे---


*दंडक बन पुनीत प्रभु करहू।उग्र साप मुनिवर कर हरहू*

*बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिह पर दाया।*


गोस्वामी तुलसीदास जी के महाकाव्य ले सहज ही पता लगथे कि ज्यादातर अरण्य कांड के घटना दण्डक बन याने छत्तीसगढ़ ले जुड़े हे। जेमा- पंचवटी निवास, खरदूषण वध, मारीच प्रसंग, सीताहरण, शबरी कृपा आदि


 वइसे तो आने आने  राज के मनखे मन पंचवटी ल अपन अपन क्षेत्र (मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र,उत्तराखण्ड) म होय के बात करथे, फेर सीताबेंगरा, जोगीमारा गुफा म स्थित  लक्षमण गुफा अउ लक्षमण रेखा के साथ साथ गोस्वामी तुलसीदास जी के कतको चौपाई , अउ घटना क्रम जेमा, मारीच वध, खरदूषण वध, आदि छत्तीसगढ़ म होय के पुख्ता सबूत देथे-


*पंचवटी बसि श्री रघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।*


सूर्पनखा अपन नाक कान कटे के बाद खरदूषण ल जाके कइथे-

*खरदूषण पहि गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।*


*धुँवा देखि खरदूषण केरा।जाइ सुपरखा रावण केरा।*


एक सुनत जानकारी अनुसार अपन जीवन के आखिर समय म लवकुश जन्मस्थली म तीन दिन बर गोस्वामी जी छत्तीसगढ़ आये रहिन अउ उँहे अपन कृति कवितावली के तीन ठन छ्न्द ल सिरजाइन। रामचरित मानस ल पढ़त सुनत अइसे लगथे कि तुलसीदास जी ह छत्तीसगढ़ म ही रहिके, छत्तीसगढ़ी संग मिलत जुलत भाषा म छत्तीगढ़िया मनके कल्याण बर रामचरित मानस के रचना करे हे। छत्तीसगढ़ ल रासमय करे म गोस्वामी जी के अहम योगदान हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)