Saturday, 11 June 2022

गीतिका छंद(जोरा खेती किसानी के)



गीतिका छंद(जोरा खेती किसानी के)


उठ बिहनिया काम करके,सोझियाबों खेत ला।

कोड़  खंती    मेड़  रचबों, पालबों तब पेट ला।

धान  होही  खेत  भीतर,मेड़  मा  राहेर जी।

सोन उपजाबोन मिलके,रोज जाँगर पेर जी।


हे  किसानी  के समय अब,काम ला झट टारबों।

बड़  झरे  काँटा  झिटी हे,गाँज बिन बिन बारबों।

काँद दूबी हे उगे चल,खेत ला चतवारबों।

जोर के गाड़ा म खातू,खार मा डोहारबों।


काम ला करबोंन डँटके,साँझ अउ मुँधियार ले।

संग  मा  रहिबोन  हरदम,हे  मितानी  खार  ले।

रोज बासी पेज धरके,काम करबों खेत मा।

हे बचे बूता अबड़ गा, काम  बइठे चेत मा।


रूख बँभरी के तरी मा,घर असन डेरा हवे।

ए मुड़ा ले ओ मुड़ा बस,मोर बड़ फेरा हवे।

हाथ  धर  रापा कुदारी,मेड़ के मुँह बाँधबों।

आय पानी रझरझा रझ,फेर नांगर फाँदबों।


जेठ हा बुलकत हवे अब,आत हे आसाड़ हा।

हे   चले   गर्रा   गरेरा ,डोलथे  बड़   डार  हा।

अब उले दर्रा सबो हा,भर जही जी खेत के।

झट  सुनाही  ओह  तोतो,हे  अगोरा नेत के।


धान  बोये  बर  नवा मैं,हँव बिसाये टोकरी।

खेत बर बड़ संग धरथे, मोर नान्हें छोकरी।

कोड़हूँ टोकॉन कहिथे,भात खाहूँ मेड़ मा।

तान  चिरई के सुहाथे ,गात रहिथे पेड़ मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

बरसात (गीतिका छ्न्द)


 बरसात (गीतिका छ्न्द)

घन घटा घनघोर धरके, बूँद बड़ बरसात हे।
नाच के गाके मँयूरा, नीर ला परघात हे।
ताल डबरी एक होगे, काम के हे शुभ लगन।
दिन किसानी के हबरगे, कहि कमैया हें मगन।।

ढोंड़िहा धमना हा भागे, ए मुड़ा ले ओ मुड़ा।
साँप बिच्छू बड़ दिखत हे, डर हवैं चारो मुड़ा।
बड़ चमकथे बड़ गरजथे, देख ले आगास ला।
धर तभो नाँगर किसनहा, खेत बोंथे आस ला।

घूमथे बड़ गोल लइका, नाचथें बौछार मा।
हाथ मा चिखला उठाके, पार बाँधे धार मा।
जब गिरे पानी रदारद, नइ सुनें तब बात ला।
नाच गाके दिन बिताथें, देख के बरसात ला।

लोग लइका जब सनावैं, धोयँ तब ऍड़ी गजब।
नाँदिया बइला चलावैं, चढ़ मचें गेड़ी गजब।
छड़ गड़उला खेल खेलैं, छोड़ गिल्ली भाँवरा।
लीम आमा बर लगावैं, अउ लगावैं आँवरा।।

ताल डबरी भीतरी ले, बोलथे टर मेचका।
ढेंखरा उप्पर मा चढ़के, डोलथे बड़ टेटका।
खोंधरा झाला उझरगे, का करे अब मेकरा।
टाँग के डाढ़ा चलत हें, चाब देथें केकरा।।

पार मा मछरी चढ़े तब, खाय बिनबिन कोकड़ा।
रात दिन खेलैं गरी मिल, छोकरा अउ डोकरा।
जब करे झक्कर झड़ी, सब खाय होरा भूँज के।
पाँख खग बड़ फड़फड़ाये, मन लुभाये गूँज के।।

खेत मा डँटगे कमैया, छोड़ के घर खोर ला।
लोर गेहे बउग बत्तर, देख के अंजोर ला।
फुरफुँदी फाँफा उड़े बड़, अउ उड़ें चमगेदरी।
सब कहैं कर जोर के घन, झन सताबे ए दरी।

होय परसानी गजब जब, रझरझा पानी गिरे।
काखरो घर ओदरे ता, काखरो छानी गिरे।
सज धरा सब ला लुभावै, रूप हरिहर रंग मा।
गीत गावै नित कमैया, काम बूता संग मा।

ओढ़ना कपड़ा महकथे, नइ सुखय बरसात मा।
झूमथें भिनभिन अबड़, माछी मछड़ दिन रात मा।
मतलहा पानी रथे, बोरिंग कुवाँ नद ताल के।
जर घरो घर मा हबरथे, ये समै हर साल के।

चूंहथे छानी अबड़, माते रथे घर सीड़ मा।
जोड़ के मूड़ी पुछी कीरा, चलैं सब भीड़ मा।
देख के कीरा कई, बड़ घिनघिनासी लागथे।
नींद घुघवा के परे नइ, रात भर नित जागथे।

नीर मोती के असन, घन रोज बरसाते हवे।
मन हरेली तीज पोरा, मा मगन माते हवे।
धान कोदो जोंधरी, कपसा तिली हे खेत मा।
लहलहावै पा पवन, छप जाय फोटू चेत मा।

बूँद तक बरसै नही, कतको बछर आसाढ़ मा।
ता कभू घर खेत पुलिया, तक बहे बड़ बाढ़ मा।
बाढ़ अउ सूखा पड़े ता, झट मरे मन आस हा।
चाल के पानी गिरे तब, भाय मन चौमास हा।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

मन(जयकारी छंद)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 मन(जयकारी छंद)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


जब तक मन मा हवै उमंग, तब तक हे जिनगी मा रंग।

मर जावै जब मन के आस, तब हो जावैं सबे निरास।


हबरे तब डर जर अउ दुक्ख, भागे नींद चैन अउ भुक्ख।

मन के जब हो जावै हार, नइ भावै तब घर संसार।


करे काट नइ अमरित धार, सूखय दया मया के नार।

होय ह्रदय के धड़कन  तेज, नींद घलो नइ देवै सेज।


सच अउ झूठ परख नइ पाय, कतको गिनहा कदम उठाय।

कतको खुद हो जावय राख, कतको करे दुसर ला खाख।


टूटय जब मनके अरमान, तब गड़ जावै अंतस बान।

बोली बयना बीख समान, अंतस मन ला देवै चान।


कतको ला नइ आवै लाज, करे काज बन धोखाबाज।

धोखा खाके जी घबराय, तभो हताशा मन मा छाय।


रखना चाही जिया कठोर, मार सके झन डर दुख जोर।

करना चाही कारज नाँप, लोटे झन अंतस मा साँप।।


मिले बखाना अउ ना श्राप, यहू बिगाड़े मन के ग्राफ।

करौ कभू झन दगा अनीत, दुवा कमावव मिलही जीत।


भरे दवा मा तनके घाव, मन बर चाही बढ़िया भाव।

आशा मया दया विश्वास, लावय जीवन मा उल्लास।


तन ले जादा मन हे रोठ, तेखर करथे दुनिया गोठ।

ओखर कभू होय नइ हार, मन दरिया अउ मन पतवार।


जेखर मन मा मातम छाय, तेखर जिनगी मा हे हाय।

छोट छोट दुख मा घबराय, हो निराश बस माथ ठठाय।


तन के थेभा मन हा ताय, मन हा सुख के दीप जलाय।

मन जिनगी के आवय आस, बुझ जावै ता जिनगी नास।


अलहन के पथ हवै हजार, सुख सत के दरवाजा चार।

जिंहा होय सुख के बौछार, उँहा भिंगावौ तन मन यार।


दया मया सत राखव मीत, हार भागही होही जीत।

जीते बर जिनगी के जंग, हवै जरूरी आस उमंग।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Wednesday, 1 June 2022

अइसने म कइसे होही,तोर अउ मोर मेल गोरी

 अइसने म कइसे होही,तोर अउ मोर मेल गोरी


तैं सरग ले सुघ्घर,अउ मैं नरक के द्वार।

तै ठाहिल पटपर भाँठा,मैं चिखला कोठार।

तैं उर्वर बाहरा,अउ मैं बंजर भर्री।

मोर नैन झिमिर झामर,तोर नैन कर्री।

तोर जिनगी ताजमहल कस उज्जर,

अउ मोर जिनगी, करिया जेल गोरी।

अइसने म कइसे होही,

तोर अउ मोर मेल गोरी।


छप्पन भोग माढ़े हवै,तोर चारो कोती।

चाबत हौं मैं नानकुन,सुख्खा जरहा रोटी।

खीर मेवा पकवान कस,तैं करे भूख के नास।

मैं हड़िया मा लटके हौं, बने चिबरी भात।

तैं हवा संग उड़ागेस,

अउ मैं बढ़त हौं जिनगी ल ढँकेल गोरी।

अइसने म कइसे होही,तोर अउ मोर मेल गोरी


आगर इत्तर माहुर मोहर,सेंट के भरमार के।

चंपा चमेली मोगरा कस,महके महार महार तैं।

तन धोवा निरमल हो जाथे, वो गंगा के धार तैं।

मोर झन पूछ ठिकाना,मैं खजवइय्या तेल गोरी।

अइसने म कइसे होही,तोर अउ मोर मेल गोरी।


तैं कहाँ सरग के परी,उड़े अगास मा पंख लगाके।

मैं रेंगत हौं उलंड-घोलंड के,चिखला पानी मा सनाके।

संगमरमर के तैं ईमारत,तोर नाम जमाना मा छागे।

ओदरहा मोर ठौर ठिहा मा,नइ आये कोनो भगाके।

तै छाये क्रिकेट हाँकी कस,

मैं लुकाछुपउल के खेल गोरी।

अइसने म कइसे होही,तोर अउ मोर मेल गोरी।।


तैं कहाँ मथुरा अउ काँसी, मैं हरौं फाँसी के दासी।

तिहीं खींचे अपन करम के रेखा,मोर हवै बिगड़हा राशि।

चंपा चमेली कमल कुमुदिनी,गोंदा कस तैं गमके।

इती उती उड़ात हौं, मैं फूल बने बेसरम के।

तै कम्प्यूटर के सीपीयू,मैं सस्तहा सेल गोरी।

अइसने म कइसे होही,तोर अउ मोर मेल गोरी


तैं कहाँ पिंकी अउ रिंकी,मैं बुधारू मंगलू।

तैं जनम के मालामाल,मैं जनमजात कंगलू।

मैं हँसिया अउ तुतारी,तैं कहाँ बारूद के गोला।

नवा डिजाइन के बैग तैं, अउ मैं चिरहा झोला।

मैं मरहा मेचका,अउ तैं मछरी व्हेल गोरी।

अइसने म कइसे होही,तोर अउ मोर मेल गोरी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


बहुत पहिली(2005-06) के रचना

छत्तीसगढ़ के भाजी-खैरझिटिया

 छत्तीसगढ़ के भाजी-खैरझिटिया


हमर राज के साग मा,भाजी पावय मान।

आगर दू कोरी हवै,सुनव लगाके कान।।


चना चनौरी चौलई,चेंच चरोटा लाल।

चुनचुनिया बर्रे कुसुम,खाव उँचाके भाल।


मुसकेनी मेथी गुमी,मुरई मास्टर प्याज।

तिनपनिया अउ लहसुवा,करे हाट मा राज।


खाव खोटनी खेड़हा, खरतरिहा बन जाव।

पटवा पालक ला झड़क,तन के रोग भगाव।


कुल्थी कांदा करमता,कजरा गोल उरीद।

कुरमा कुसमी कोचई,के हे कई मुरीद।।


झुरगा गोभी लाखड़ी,भथवा गुड़डू  टोर।

राँधव भूँज बखार के,महकै घर अउ खोर।


पोई अउ सरसो मिले,मिले अमारी साग।

मछेरिया बोहार के,बने बनाये भाग।।।


करू करेला के घलो,भाजी होथे खास।

रोपा पहुना बरबटी,आथे सबला रास।।


मखना मुनगा मा मिले,विटामीन भरपूर।

कोइलार लुनिया करे,कमजोरी ला दूर।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

कुकुभ छंद(गीत)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 कुकुभ छंद(गीत)-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


तैं सपना मा जबजब आथस,झटले रतिहा कट जाथे।

तोर मया ला पाके मोरे,संसो फिकर ह हट जाथे।।


मुचमुच मुसकी मया बढ़ाथे,तोर रेंगना मन भाथे।

देखे बिना जिया नइ माने,सुरता रहिरहि के आथे।

मोर मया ला देख जलइया,रद्दा चलत अपट जाथे।

तोर मया ला पाके मोरे,संसो फिकर ह हट जाथे।।


बोल कोयली कस गुरतुर हे,भर देथे मन मा आसा।

आघू पाछू होवत रहिथौं,तोर मया जइसे लासा।।

लहरावय जब तोर केंस हा,कारी बदरी छँट जाथे।

तोर मया ला पाके मोरे,संसो फिकर ह हट जाथे।।


खोपा पारे पाटी बाँधे, पहिरे लुगरा लाली के।

कनिहा लचकावत जब चलथस,झरथे फुलवा डाली के।

हमर दुनो के नैन मिले ता, सुख छाथे दुख घट जाथे।

तोर मया ला पाके मोरे,संसो फिकर ह हट जाथे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Friday, 29 April 2022

रोला छंद-मजबूर मैं मजदूर


 

रोला छंद

मजबूर मैं मजदूर

करहूँ का धन जोड़, मोर तो धन जाँगर ए।
रापा गैंती संग, मोर साथी नाँगर ए।
मोर गढ़े मीनार, देख लौ अमरे बादर।
मोर धरे ए नेंव, पूछ लौ जाके घर घर।

भुँइया ला मैं कोड़, ओगराथौं नित पानी।
जाँगर रोजे पेर, धरा ला करथौं धानी।
बाँधे हवौं समुंद, कुँआ नदिया अउ नाला।
बूता ले दिन रात, हाथ मा उबके छाला।

घाम जाड़ आषाढ़, कभू नइ सुरतावौं मैं।
करथौं अड़बड़ काम, तभो फल नइ पावौं मैं।
हावय तन मा जान, छोड़ दौं महिनत कइसे।
धरम करम ए काम, पूजथौं देवी जइसे।

चिरहा ओन्हा ओढ़, ढाँकथौं करिया तन ला।
कभू जागही भाग, मनावत रहिथौं मन ला।
रिहिस कटोरा हाथ, देख वोमा सोना हे।
भूख मरौं दिन रात, भाग मोरे रोना हे।

आँखी सागर मोर, पछीना यमुना गंगा।
झरथे झरझर रोज, तभे रहिथौं मैं चंगा।
मोर पार परिवार, तिरिथ जइसन सुख देथे।
फेर जमाना कार, अबड़ मोला दुख देथे।

थोर थोर मा रोष, करैं मालिक मुंसी मन।
काटत रहिथौं रोज, दरद दुख डर मा जीवन।
मिहीं बढ़ाथौं भीड़, मिहीं चपकाथौं पग मा।
अपने घर ला बार, उजाला करथौं जग मा।

पाले बर परिवार, नाँचथौं बने बेंदरा।
मोला दे अलगाय, बदन के फटे चेंदरा।
कहौं मनुष ला काय, हवा पानी नइ छोड़े।
ताप बाढ़ भूकंप, हौसला निसदिन तोड़े।।

सच मा हौं मजबूर, रोज महिनत कर करके।
बिगड़े हे तकदीर, ठिकाना नइहे घर के।
थोरिक सुख आ जाय, विधाता मोरो आँगन।
महूँ पेट भर खाँव, रहौं झन सबदिन लाँघन।।

मोर मिटाथे भूख, रात के बोरे बासी।
करत रथौं नित काम, जाँव नइ मथुरा कासी।
देखावा ले दूर, बिताथौं जिनगी सादा।
चीज चाहथौं थोर,  मेहनत करथौं जादा।

आँधी कहुँती आय, उड़ावै घर हा मोरे।
छीने सुख अउ चैन, बढ़े डर जर हा मोरे।
बइठ कभू नइ खाँव, काम मैं मांगौं सबदिन।
करके बूता काम, घलो काँटौं दिन गिनगिन।

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795
मजदूर दिवस अमर रहे,,,,

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गीतिका छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

हे गजब मजबूर ये,मजदूर मन हर आज रे।
पेट बर दाना नहीं,गिरगे मुड़ी मा गाज रे।।
रोज रहि रहि के जले,पर के लगाये आग मा।
देख लौ इतिहास इंखर,सुख कहाँ हे भाग मा।।

खोद के पाताल ला,पानी निकालिस जौन हा।
प्यास मा छाती ठठावत,आज तड़पे तौन हा।
चार आना पाय बर, जाँगर खपावय रोज के।
सुख अपन बर ला सकिस नइ,आज तक वो खोज के।

खुद बढ़े कइसे भला,अउ का बढ़े परिवार हा।
सुख बहा ले जाय छिन मा,दुःख के बौछार हा।
नेंव मा पथरा दबे,तेखर कहाँ होथे जिकर।
सब मगन अपनेच मा हे,का करे कोनो फिकर।

नइ चले ये जग सहीं,महिनत बिना मजदूर के।
जाड़ बरसा हा डराये, घाम देखे घूर के।
हाथ फोड़ा चाम चेम्मर,पीठ उबके लोर हे।
आज तो मजदूर के,बूता रहत बस शोर हे।।

ताज के मीनार के,मंदिर महल घर बाँध के।
जे बनैया तौन हा,कुछु खा सके नइ राँध के।
भाग फुटहा हे तभो,भागे कभू नइ काम ले।
भाग परके हे बने,मजदूर मनके नाम ले।।

दू बिता के पेट बर,दिन भर पछीना गारथे।
काम करथे रात दिन,तभ्भो कहाँ वो हारथे।
जान के बाजी लगा के,पालथे परिवार ला।
पर ठिहा उजियार करथे,छोड़ के घर द्वार ला।

आस आफत मा जरे,रेती असन सुख धन झरे।
साँस रहिथे धन बने बस,तन तिजोरी मा भरे।
काठ कस होगे हवै अब,देंह हाड़ा माँस के।
जर जखम ला धाँस के,जिनगी जिये नित हाँस के।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)

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आल्हा छन्द - जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

गरमी घरी मजदूर किसान

सिर मा ललहूँ पागा बाँधे,करे  काम मजदूर किसान।
हाथ मले बैसाख जेठ हा,कोन रतन के ओखर जान।

जरे घाम आगी कस तबले,करे काम नइ माने हार।
भले  पछीना  तरतर चूँहय,तन ले बनके गंगा धार।

करिया काया कठवा कस हे,खपे खूब जी कहाँ खियाय।
धन  धन  हे  वो महतारी ला,जेन  कमइया  पूत  बियाय।

धूका  गर्रा  डर  के  भागे , का  आगी  पानी  का  घाम।
जब्बर छाती रहै जोश मा,कवच करण कस हावै चाम।

का मँझनी का बिहना रतिहा,एके सुर मा बाजय काम।
नेंव   तरी   के  पथरा  जइसे, माँगे  मान  न माँगे नाम।

धरे  कुदारी  रापा  गैतीं, चले  काम  बर  सीना तान।
गढ़े महल पुल नँदिया नरवा,खेती कर उपजाये धान।

हाथ  परे  हे  फोरा  भारी,तन  मा  उबके हावय लोर।
जाँगर कभू खियाय नही जी,मारे कोनो कतको जोर।

देव  दनुज  जेखर  ले  हारे,हारे  धरती  अउ  आकास।
कमर कँसे हे करम करे बर,महिनत हावै ओखर आस।

उड़े बँरोड़ा जरे भोंभरा,भागे तब मनखे सुखियार।
तौन  बेर  मा  छाती  ताने,करे काम बूता बनिहार।

माटी  महतारी  के खातिर,खड़े पूत मजदूर किसान।
महल अटारी दुनिया दारी,सबे चीज मा फूँकय जान।

मरे रूख राई अइलाके,मरे घाम मा कतको जान।
तभो  करे माटी के सेवा,माटी  ला  महतारी मान।

जगत चले जाँगर ले जेखर,जले सेठ अउ साहूकार।
बनके  बइरी  चले पैतरा,मानिस नहीं तभो वो हार।

धरती मा जीवन जबतक हे,तबतक चलही ओखर नाँव।
अइसन  कमियाँ  बेटा  मनके, परे  खैरझिटिया हा पाँव।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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