Saturday, 17 September 2022

पितर पाख-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 पितर पाख-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


भगवान गणेश भादो शुक्ल पक्ष के चतुर्थी ले चतुर्दशी तक ग्यारह दिन ले विराजमान रहिथे, लइका लोग संग सियान मन घलो खूब सेवा जतन करथे। गली गली खोर खोर सइमा सइमो करथे। भगवान गणेश के विसर्जन के बाद,कुँवार लगते ही पितर पाख हबर जथे।घरों घर बनत बरा सोंहरी अउ हूम धूप के खुशबू ले चारो मुड़ा महर महर ममहाय बर लग जथे। पितर पाख म मनखे मन अपन गुजरे पुरखा मनके मान गउन म दान दक्षिणा  अउ भजन कीर्तन करथे।संगे संग दीन हीन, ब्राम्हण अउ पास परोसी, ल भोजन घलो कराथे। पाख भर घरों घर म बरा सोंहारी चुरथे। कोनो अपन पुरखा ल एकक्म, त कोनो दूज तीज, त कोनो साते आठे के मानथे। पितर पाख के पन्द्रह दिन भर कखरो न कखरो घर माई पितर रहिबेच करथे। पितर पाख म गुजरे पुरखा आथे कहिके ये बेरा सिर्फ इंखरे पूजा पाठ होथे, भगवान मनके पूजा पाठ घलो बन्द रहिथे। हमर छत्तीसगढ़ म पितर लगभग सबे कोई मनाथे। चाहे वो अपन ददा दाई या पुरखा के सेवा जतन करे रहय या झन करे रहय, फेर पितर पाख म पुरखा मनके सुरता जरूर करथे। वास्तव म तो मनखे मन ल जीते जियत अपन ददा दाई के बढ़िया सेवा जतन करना चाही। कई झन करथे घलो, फेर कतको मन नइ घलो करे। कथे जेन मन अपन ददा दाई के सेवा जतन बढ़िया करे रहिथे, उन मन ल उँखर पितर मन आके बढ़िया आशीष देथे। अउ जेन मन नइ मानिस वो मन कतको पितर मान ले नइ पुन लगे। पितर पाख म पुरखा मनके सुरता के संगे संग उँखर गुण ज्ञान ल  अपनाय के घलो उदिम करे जाथे, उँखर अधूरा सपना ल पूरा करे के प्रयास घलो लइका मन करथे। पितर पाख म दान दक्षिणा के जबर महत्ता हे, कथे ये समय अपन पुरखा जे सुरता म दिए दान दक्षिणा अबड़ फलते फुलथे, अउ घर म गुण गियान अउ धन  रतन के बढ़वार होथे। पितर पाख म मनखे मन संग कौवा मन ल घलो रंग रंग के खाये बर मिलथे। कतको सियान मन तो कथे के पुरखा मन कौआ बनके छानी म आके काँव काँव करथे, तेखरे सेती तो छानी म खीर पूड़ी अउ उरिद दार ल घलो फेके जाथे। आजकल के मनखे मन  मन पितर वितर मनई ल कोसथे घलो, कि ददा दाई के सेवा जियत म होय,मरे म भूत प्रेत बर का मया? बात तो सही हे, तभो ले लगभग सबे मनात हे, महापुरुष मन ल तो घलो सुरता करके उँखर ज्ञान गुण ले सीख लेथन, का पितर मनई वइसने नइ हो सके, हो सकथे, फेर सोच सोच के फरक आय, जेन चलागन चलत हे, वो कोनो गलत नोहे, पर देख देखावा जादा बने घलो नही। पितर मनाये ले पुरखा मन के प्रति मया बने रइथे। मन म भाव भक्ति , अउ दान दक्षिणा के भाव घलो उमड़थे।पितर के बहाना पास पड़ोसी अउ गाँव भर मिलके खाना पीना घलो करथे, जेखर ले दया मया घलो बढ़थे। त पितर मनाय म कोनो हर्ज नइहे।तिहार बार मेल मिलाप अउ मया दया के परिचायक होथे, तेखर सेती सब मनखे एक साथ मिलके मनाथे घलो। वइसने पितर पाख घलो ये, जेन आदर सत्कार, अउ पाप पुण्य के सीख घलो देथे। अपन पुरखा ल दुख देके पितर मनाये म कुछु नइ मिले, पितर मनके आशीष पाय बर जीते जियत घलो उँखर सेवा होना जरूरी हे। खैर पितर पाख चलत हे घरों घर बरा , खीर,भजिया घलो चुरत हे। मनखे मन अपन पुरखा बर दतोन मुखारी लोटा म पानी अउ खीर पूड़ी घलो रखे हे। पितर मन आय हे की नही उही मन जाने , फेर मनखे मन बरोबर खीर पूड़ी झोरत हे, कौवा कुकुर घलो काँव काँव हांव हांव करत घूम घूम के खावत हे।  कौआ ले,एक ठन कहूँ मेर पढ़े बात सुरता आवत हे, कइथे कि कौआ मन भादो म प्रजनन करथे। ओमन ल वो समय जादा अउ पोष्टिक भोजन के जरूरत पड़थे। अउ पितर पाख भर छानी परवा म उरिद के दार के संगे संग खीर पूड़ी ओमन ल सहज म मिल जथे।  अउ दिखथे घलो, ये समय माई अउ पिला कौवा मन छानी म बड़ काँव काँव करत। उँखर पिला मनके बढ़वार ये बेरा पितर पाख के रोटी पीठा ले हो जथे। कौआ मनके के संख्या बढ़े ले, बर पीपर के बढ़वार ल घलो जोड़े जाथे। कहिथे कि बर अउ पीपर अइसन शापित पेड़ हरे जेन सिरिफ कौआ मनके मल म रहे बीज द्वारा जगथे। तभे तो उटपुटाँग जघा म नान्हे नान्हे बर पीपर जगे दिख जथे। जेला हमन जतन करके बढ़िया जघा लगाथन घलो, अउ सबला अइसन जघा म जगे बर पीपर ल बने जघा म उगाना चाही अउ ओखर जतन करना चाही। बर पीपर के पेड़ हमर बर कतका उपयोगी हे येला सबे जानथन। यदि अइसन बात हे, त कौआ मनके संरक्षक अउ बढ़वार जरूरी हे, काबर सिरिफ  पितर पाख के रोटी पीठा के भरोसा रहय। फेर पहली के सियान मन ये पाख म  अपन पुरखा मनके सुरता म,कौआ मन ल खीर पूड़ी खावत आवत हे, कोन जन अभिन के मन कतका दिन खवाही? यदि बर अउ पीपर के पौधा सच म उँखर मल द्वारा उत्सर्जित बीज म ही पनपथे, तब तो कौआ ल पुरखा माने म कोनो बुराई घलो नइहे। आज पुरखा मनके लगाये बर पीपर सहज दिखथे, नवा पीढ़ी ल घलो सिर्फ बर पीपर ही नही सबे पेड़ के बढ़वार अउ संरक्षण बर उदिम करना चाही। पितर ले मया बाढ़थे, पितर ले पुरखा मन के मान गउन होथे, पितर ले भुखाय ल घलो भोजन मिलथे, पितर म कौआ कुकुर अघाथे, त पितर मनाये म का बुराई हे। हॉं फेर उही बात कहूँ जीते जियत पुरखा मन के सेवा सत्कार जरूरी हे। तभे उँखर मरे के बाद हमर पितर मनई ह सफल होही। 


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

अब बता-गजल

 अब बता-गजल


बिन काम के पद नाम होगे अब बता।

पैसा पहुँच मा काम होगे अब बता।।1


दू टेम के रोटी कहाँ होइस नशीब।

गारत पछीना शाम होगे अब बता।2


केंवट के शबरी के पुछइया कोन हे।

रावण के थेभा राम होगे अब बता।3


कहिथें चिन्हाथे खून के रिस्ता नता।

बिरवा ले बड़का खाम होगे अब बता।4


नइ मोल मिल पावत हे असली सोन के।

लोहा सहज नीलाम होगे अब बता।5


फल फूल तारिक चीज बस अउ आदमी।

का खास सब तो आम होगे अब बता।6


धन जोर के करबोंन का रटते हवन।

कोठी फुटिस गोदाम होगे अब बता।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 हिंदी दिवस


घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

             1

कहिनी कविता बसे,कृष्ण राम सीता बसे,

हिंदी भाषा जिया के जी,सबले निकट हे।

साकेत के सर्ग म जी,छंद गीत तर्ज म जी,

महाकाव्य खण्डकाय,हिंदी मा बिकट हे।

प्रेम पंत अउ निराला,रश्मिरथी मधुशाला,

उपन्यास एकांकी के,कथा अविकट हे।

साहित्य समृद्ध हवै,भाषा खूब सिद्ध हवै,

भारत भ्रमण बर,हिंदी हा टिकट हे।1।।।

               2

नस नस मा घुरे हे, दया मया हा बुड़े हे,

आन बान शान हरे,भाषा मोर देस के।

माटी के महक धरे,झर झर झर झरे,

सबे के जिया मा बसे,भेद नहीं भेस के।

भारतेंदु के ये भाषा,सबके बने हे आशा,

चमके सूरज कस,दुख पीरा लेस के।

सबो चीज मा आगर,गागर म ये सागर,

भारत के भाग हरे,हिंदी घोड़ा रेस के।2।

                3

सबे कोती चले हिंदी,घरो घर पले हिंदी।

गीत अउ कहानी हरे, थेभा ये जुबान के।।

समुंद के पानी सहीं, बहे गंगा रानी सहीं।

पर्वत पठार सहीं, ठाढ़े सीना तान के।।

ज्ञान ध्यान मान भरे,दुख दुखिया के हरे।

निकले आशीष बन,मुख ले सियान के।।

नेकी धर्मी गुणी धीर,भक्त देव सुर वीर।

बहे मुख ले सबे के,हिंदी हिन्दुस्तान के।3।


छंदकार-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)छत्तीसगढ़


हिंदी दिवस की आप सबको सादर बधाई

कानून के आँखी म पट्टी-,जीतेंन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

 कानून के आँखी म पट्टी-,जीतेंन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"


                     जान ले बढ़के का हे? तभो मनखे जान ल जोखिम म लेके जियत हे। रोज के हाय हटर, अउ चारो मुड़ा  मुँह उलाय खड़े काल कतको ल रोज लील देवत हे। तभो मनखे कहाँ चेतत हे। आज मनखे मनके मौत घलो कुकुर बिलई कस सहज होगे हे, तभे तो मनखे मन आज  माड़े अर्थी ल घलो देख के रेंग देवत हे। अर्थी कर सिरिफ घर वाले, सगा सम्बन्धी अउ एकात झन भावुक मनखे भर दिखथे। नही ते एक जमाना रहय, कहूँ एक भी मौत होय त देखो देखो हो जाय, मनखे दुख म डूब जाय। फेर आज आन बर काखर तीर टाइम हे। धन दौलत संग मरनी हरनी सबे चीज म तोर मोर होगे हे। मरे के हजार अलहन हे, फेर जिये के दू चार आसरा, तभो मनखे मन दया, मया, सत, सुमत जइसन जरूरी चीज ल बरो के  मुर्दा बरोबर जीयत हे। बड़खा बड़खा सड़क ल देख के यमदूत मन घलो संसो म हे, कि ये मनखे मन बिन बेरा मरे के साधन बना डरे हे। हाय रे अँखमुंदा भागत गाड़ी, हाय रे नेवरिया चलइया, हाय रे जल्दीबाजी अउ हाय रे दरुहा मँदहा तुम्हर मारे बने सम्भल के चलत मनखे मन घलो निपट जावत हे। 


          चार दिनिया जिनगी पाके घलो मनखे मन अति करत हे, कोन जन अजर अमर रितिस त का करतिस ते। रोज अपराध बाढ़त हे। इही ल रोके बर आज रोज नवा नवा कानून कायदा बनत हे, तभो अपराध रुके के नांव नइ लेवत हे। कानून म कई प्रकार के सजा हे, फेर मनखे मन डरथे कहाँ। हाँ,, डरत उही हे जेन बपुरा मन गरीब अउ अनपढ़ हे, पुलिस ल देख घलो उँखर पोटा काँप जथे। फेर पढ़े लिखे अउ पइसा वाले म डर नाँव के चीज नइहे, अउ रहना भी नइ चाही, पर अपराध करके कानून ले मुँहजोरी बने थोरे हे। पर जमाना अइसने हे, पद पइसा के आघू कानून कायदा घलो लाचार हे। धरम करम के डर ल तो छोड़िच दे।


                जंगल तीर के एक ठन गाँव म विकास के गाड़ी पहुँच गे, लोगन मन पढ़ लिख के हुसियार होगे, स्कूल कालेज कोर्ट कछेरी सब बन गे, अब जंगल अउ गाँव कहना सार्थक घलो नइ रही गे। कागत म कानून कायदा लिखाय हे, तभो ले जीयत मनखे मन, गलती ऊपर गलती करत हे, फेर एक झन *मरे मनखे* के फांदा होगे, काबर कि उही गाँव के एक झन पढ़े लिखे आदमी ह, कोर्ट म केस करदिस, कि फलाना ह,अपन जमाना म कानून कायदा के गजब धज्जी उड़ाय हे, बन बिरवा ला अँखमुंदा काटे हे, जंगल के कतको जीव जिनावर मन ल घलो मारे हे।  कानून म ये सब करना अपराध हे तेखर सेती वोला उम्र कैद के सजा होगे। फेर वोहा कानून ले लड़े बर जिंदा नइ रिहिस, दू चार पेसी देखे के बाद जज वकील मन सजा सुना दिन। आदेश जारी होइस वोला पकड़ के जेल म डारे जाय, खोजबीन म पता चलिस कि वो तो परलोक वासी होगे हे, अब गाज गिरिस ओखर परिवार वाले मन ऊपर। बड़े बेटा आन जात म बिहाव कर डरे रहय त, वो समाज से बहिष्कृत रिहिस, ददा ले कोनो नता नही। पुलिस वोला कुछु करिस घलो नही , फेर  छोटे बेटा घर ओखर ददा के फोटू  टँगाय रहय, उही ल पुलिस मन धरिस अउ कोर्ट लेग गे। उहू अकचका गे रहय, का होवत हे कहिके, आखिर म सब चीज जाने के बाद कहिस- कि, ददा के जमाना म शिकार के चलन रिहिस, जंगल म रहय अउ पेड़ पात के सहारा जिये, अब वो जऊन करिस जीयत म सजा पातिस मरे म काबर? अउ येमा मोर का गलती हे? जवाब आइस कि तोर गलती ये हे कि तैं ओखर टूरा अस। कार्यवाही आघू बढ़िस, छोटे बेटा अपन पक्ष रखे बर वकील करिस, लाखो रुपिया खर्चा करिस, पइसा भरात गिस तारिक बढ़त गिस एक दिन ओखरो देहांत होगे। अब बारी आइस ओखर लइका मन के। ओखरो दू लइका रहय, एक झन कही दिस, मैं ददा बबा नइ माँनव, त दूसर जे ददा बबा के मया म बँधाय रहय ते केस लड़े बर तैयार होइस। आखिर म कम पइसा खर्चा अउ कमती धियान देय के कारण वो केस हारगे। अब उमर कैद के सजा अर्थ दंड म बदल गे, वो मरे आदमी ल 10,000 के जुर्माना होइस, अउ फाइल ल बन्द करे बर ओतका पइसा के माँग करिस। ओखर नाती  इती उती करके पइसा पटाइस, तब जाके वो फाइल बंद होइस। कहूँ नइ पइसा फेकतिस त बपुरा ल घलो हथकड़ी लग सकत रिहिस, कानून ए भई, अभियुक्त तो चाहिच। देख आज कोनो राजा महाराजा मनके पोथी ल झन खोले, नही ते जे अपन आप ल,फलाना वीर के वंसज काहत हे,तहू कन्नी काट लिही, काबर कि वो जमाना म लड़ई झगड़ा, इकार शिकार चलते रिहिस।


              अउ कखरो फाइल खुले झन, नही ते आज के जमाना म वो मरे मनखे के कोई नइ मिलही, त ओखर आत्मा ल केस लड़े बर पड़ जाही। मरे आदमी के केस म कई साहेब सिपइहा पइसा पीट मोटा गे। जउन बबा ददा के मया म बँधाय रिहिस, तउन फोकटे फोकट पेरा गे। तभे तो कानून के डर म आज मनखे मन कोनो घटना ल, देख सृन के घलो आँखी कान ल मूंद देवत हे। इहाँ जीयत मनखे मन अत्याचार के ऊपर अत्याचार करत हे, अउ जे कुछ बोल नइ सके(मरे आदमी कस), जे कोट कछेरी ले डरथे, तेला सोज्झे फोकटे फोकट सजा मिल जावत हे। चाल बाज, पद पइसा, अउ पहुँच के जमाना हे। गलत ह सही अउ सही ह गलत, ये कोर्ट के मैदान म साबित हो जावत हे। *नियाव के उप्पर वाले देवता शुन्न हे,त नीचे वाले देवता मन टुन्न,* पद,पइसा, मंद मउहा के भारी नशा हे। अतिक अकन कानून कायदा अउ दंड विधान होय के बाद घलो अपराध के नइ थमना, अउ सिधवा मनखे ल सजा हो जाना कानून के मुँह म तमाचा पड़े जइसे हे। कोनो सरकारी पद पाये बर अदालती कार्यवाही नइ होना चाही, फेर सरकार चलाये बर जे नेता के पद होथे, तेमा सब चलथे, वाह रे कानून। कतको बड़े करम कांड होय पइसा के दम म सही हो जावत हे, बड़े बड़े अत्याचारी मन साबुत बरी हो जावत हे। का कानून के आँखी म पट्टी एखरे सेती बंधाय हे।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कुंडलियाँ

 कुंडलियाँ


चिरई बइठे हाथ मा,कइसे चूमय गाल।

मनखे मनहा आज तो,बनगे हावै काल।

बनगे हावै काल, हवा पानी ला चुँहके।

मरे पखेड़ू भूख,छिंनय चारा ला मुँह के।

जंगल झाड़ी काट, करत हे मनके तिरई।

काखर कर बतियाय,अपन पीरा ला चिरई।


खैरझिटिया

हरिगीतिका छंद-ओजोन

 हरिगीतिका छंद-ओजोन


होथे परत ओजोन के समताप मण्डल के तरी।

रक्षा कवच बन छाय रहिथे रोज करथे चाकरी।।

घातक किरण निकले सुरुज ले हम सबे के काल बन।

छाये रहे ओजोन जब तब वो किरण नइ आय छन।।


सब झन जियत हन जिंदगी बनके विलासी रात दिन।

टीवी फिरिज बउरत हवन हाँसत हवन बन बाग बिन।।

ओ जोन हा ओजोन के जाने नही कुछु फायदा।

ते आँख मूंदें तोड़थे पर्यावरण के कायदा।।


एसी फिरिज के गैस मा ओजोन हा छेदात हे।

कतको बिमारी तेखरे सेती हमन ला खात हे।।  

कैंसर त्वचा के संग मा आँखी के छीने रोशनी।

बड़ हानिकारक हे किरण छन आय झन एको कनी।।


युग आधुनिक नभ मा उड़े पर नित जुड़े संकट नवा।

मिल खोजना पड़ही हमी ला खुद गढ़े दुख के दवा।

पर्यावरण के नाश होवै आस खोवय जिंदगी।

ठाढ़े हवै वो मोड़ मा हाँसै कि रोवै जिंदगी।।


नइ हन अमर कारज हमर नुकसान एखर झन करे।

का जानवर बन का मनुष रक्षा कवच सबके हरे।

सुध लेव मिलजुल के सबे बड़ कीमती ओजोन हे।

इहि हा बचाथे जिंदगी फीका रतन धन सोन हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


विश्व ओजोन-परत संरक्षण दिवस के सादर बधाई

Sunday, 4 September 2022

भादो मनभावन*


 
























*भादो मनभावन*


                आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भुइँयाँ भादों मा अघाय कस लगथे, तभे तो तरिया डबरा मा पानी माढ़े अउ लहरा मारत दिखथे। मनमाड़े चलत धारी भादो के आरो पाके धीर धर लेथे। बँधिया,तरिया,ढ़ोंड़गा जे सावन भर दानी कस पानी फेकत रिहिस, वो बनिया बरोबर अब नाप नाप के जादच उपरहा भर ल झलकात दिखथे।सरलग चलत धूका- गर्रा, झड़ी-झक्कर, बिजुरी के चमकई अउ बादर के गरजई घलो कमती होय बर लग जथे। थोर बहुत डबरा खँचका के पानी ल अँटत देख करिया बादर बीच बीच मा हुरहा धुरहा आथे अउ पानी समो के भाग जथे। सुरुज नारायण जे आसाढ़ सावन भर लुकाय लुकाय फिरत रिहिस,भादो के आरो पाके आसमान मा घूमत फिरत आँखी देखाय बर धर लेथे। थमे पानी ल देख,चिरई चिरगुन मन भादो के आरो पाके उझरे झाला खोंदरा ल नवा सिरजाये के उदिम करत दिखथें।धान-पान, काँदी-कूसा सजोर होके पुरवइया मा नाचत गावत, झुमरत दिखथे। झड़ी बादर ले तंग चिरई चिरगुन, छेरी-बोकरा, गाय गरुवा झूम झूम  के घूम घूम  चारा चरत दिखथें। घर कुरिया बारिस मा पस्त दिखथें ता खेत खार, तरिया नदियाँ मतंग अउ मस्त। भादो के लगत घर कोठ मा रचे काई केरवस ल दाई महतारी मन उजराये बर लग जथें।


*तिहार बार*- 

हमर छत्तीसगढ़ राज का, हमर देश घलो कृषि प्रधान हे, जिहाँ के रहन सहन अउ तीज तिहार, खेती किसानी के हिसाब  ले चलथे। सावन अउ भादो तीज तिहार के महीना होथे। ये महीना मा अतेक जादा तीज तिहार होथे कि सबके बरनन कर पाना सम्भव घलो नइहे। अतेक तीज तिहार मनाये के तको कारण हे। ज्यादातर मनखे मन पहली खेती किसानी करैं, अउ बरसा घरी भरे पानी मा निंदई कोड़ई करत सरलग खेतेच मा  लगे रहैं। जेखर ले हाथ अउ गोड़ दूनो सेठरा जाय,अउ सरलग भींगई तको होय। मनखे मन काम बूता मा अतिक रमे रहैं, कि यदि कोई तिहार बार नइ होतिस ता हाथ गोड़ के घलो खियाल नइ रखतिस, काम के संग आराम घलो चाही, ते पाय के ये घरी अतिक तिहार मनाये के चलन हे। जे मनखे मन के तन के संगे संग मन ला घलो भला चंगा करथे। आजो ये चलागन चलते हे। भादो महीना मा बेटी माई मन निंदई कोड़ई करके तीजा के बहाना मइके जाथे, काबर कि काम कमई के मारे बनेच दिन ले घर ले नइ निकले रहैं। कमरछठ,तीजा-पोरा, नारबोध,कड़ाबन्द, इतवारी, सोमवारी, जन्माष्टमी, रामसताव, गणेश चतुर्थी कस बनेच अकन तिहार भादो महीना म मनाये जाथे। ये सब तिहार बार मनखे  मनखे बीच दया मया,उछाह उमंग के बरसा करे के संगे संग खेती किसानी, संस्कार-संस्कृति, पार अउ परम्परा ले मानुष ल जोड़े रखथें।


*तीजा तिहार*- 

भादो महीना के बड़का तिहार आय तीजा।  ये महतारी बहिनी मन के तिहार आय, जेला वो मन मइके मा रहिके मनाथे। ये दिन के रद्दा सबें बहिनी मन जोहत रथे, कि ददा नहीं ते भैया आही अउ तीजा ले जाही। जे बेटी ददा दाई के अंगना मा ननपन ले खेलिस खइस, फेर बिहाव के बाद वो अंगना के दुरिहागिस, अइसन मा वो पावन ठिहा मा फेर जब महतारी बहिनी मन पाँव रखथे ता सरग के सुख घलो, उन मन ला कमती लगथे। दाई, ददा, बहिनी, भाई के मया के धार अउ ननपन के जम्मो सुरता मा अन्तस् तक भींग जथे। तीजा के नेंग जोग ल तो सबें जानत हव,उपास कइसे रथे? का खाथें? कोन ल मनाथे? मोला लिखे के जरूरत नइहे। मइके के लुगरा तीजहारिन मन बर अनमोल होथे। तीजा मा संगी संगवारी संग जम्मों बहिनी ले मइके मा ये दरी भेंट होथे। ये पावन बेरा मा महतारी, बहिनी मन मइके जाके अपन जम्मों थकान अउ संसो ल बिसार देथें। मइके के माहौल उन ला एक बेर अउ ननपन के सुरता अउ  जुन्ना मस्ती मा डुबो देथे। तीजा संस्कृति संस्कार, मया दया अउ सुख शांति के बरसा करथे।  जमाना ले चलत आवत तीजा ला बहिनी महतारी मन बड़ उछाह अउ उमंग ले मनाथें। अउ जड़-चेतन, घर बार, खेत खार, पार परिवार  सबके सुख शांति के कामना करथें।


*खेत खार अउ फूल फुलवारी के सुघराई*-

खेत मा भराय पानी अउ ओमा तँउरत मछरी, मेचका, केकरा संग, सजोर  होके नाचत गावत धान ल देख मारे खुसी के, किसान खेतेच मा नाच अउ गा देथे। निंदइया मनके कर्मा ददरिया अउ सनन सनन चलत पुरवाही मन ल मता देथे। पड़की, पपीहा अउ तीतुर के मीठ बोली खेत खार मा रहिरहि राग रंग घोरत रहिथे। मेड पार मा फुले- फरे मुंगेसा,कोलिहापुरी, फोटका,फूट अउ काँसी काँद- दूबी मन ल मोह लेथे। काँसी के पोनी कस पड़ड़ी फूल देख जिया मा उमंग हमा जथे। तुलसीदास जी महाराज काँसी के फूल ल देखत लिखे हे- 

*फुले काँस सकल महि छाई।जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई।*

माने धरती मा काँसी ल फुले देख अइसे लगत हे, मानो बरसा ऋतु हा अपन बुढ़ापा प्रकट करत हे।  मेड़ पार के बम्हरी मा सोनहा फूल लद जथे।  बम्हरी के सोनहा फूल देख अधर म सहज ही माटी पूत लक्ष्मण मस्तुरिहा जी के ये गीत आ जथे- *हरियर हरियर बम्हरी म सोन के खिनवा।*

संग मा फागुन चैत मा फुलइया सरई ला सइगोंन बिजरावत दिखथे, ता मधुमास मा मउरइया आमा ल रियाँ अउ फागुन मा नचइया परसा अउ अमलतास ला पिंयर गुलमोहर। मोर कहना गलत होही ता भादो मा सइगोंन, रियाँ अउ पिंयर गुलमोहर ल देख के खुदे आंकलन कर सकथव, न गुलमोहर, अमलतास अउ परसा ले कमती दिखथे, न रियाँ आमा ले अउ न सइगोन साल ले। जइसे परसा अउ अमलतास माघ फागुन मा सड़क गांव गली खेत खार मा आगी बरोबर बरत दिखथें, ठीक वइसने भादो मा पिंवरी गुलमोहर शहर, गांव, गली, रद्दा बाट मा पिवरा पिवरा फूल मा लदाय लहसत, नाचत गावत दिखथे। मधुमास मा मउरे आमा कस रियाँ, भादो मा सजे सँवरे रथे। सइगोंन के बड़े  बड़े पाना घलो  फूल मा लुकाय दिखथें, कहे के मतलब सइगोंन अतका फुले रहिथे कि ओखर जबर पाना ह घलो नइ दिखे, सिर्फ फुले फूल नजर आथें। मन ला ललचावत   कदम्ब के फूल ला देखत दाई के लोरी "झूलना के झूल कदम्ब जे फूल"  अउ "यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे" ये कविता अन्तस् मा उमड़े बर लग जथे। भादों घरी पिंयर गुलमोहर कस हिंगलाज घलो गली, खोर, डहर, बाट मा माते रहिथे, दूनो के फूल घलो लगभग एके दिखथें, अंतर रथे ता सिर्फ ऊंचाई के। एक ऊँच पेड़ आय अउ एक छोट झाड़ीनुमा पौधा। नदिया नरवा तरिया अउ मेड़ पार म उगे बेसरम अउ धतुरा के पौधा घलो भादो मा हल्का गुलाबी रंग मा मनमोहत मुस्कावत दिखथें। एके गुच्छा मा कतको रंग ल समेटे मोकैया के फूल जघा जघा मुचमुचावत, भौरा तितली संग मनखे मनके जिया ल ललचावत दिखथे।

                 फुले कउहा,कसही,बोइर,जाम अउ छोट फर धर झूलत अमली भादो मा मनभावन लगथे। पड़री पड़री तिली के फूल, पिवरी पिवरी फूल धरे बम्हरी, मूँगेसा, फूट, सोयाबीन, कोलिहापुरी अउ बोदेला खेतखार मा भादो मास भर मगन रहिथे। कीमती झुमका कस शिव बम्भूर के मनभावन फूल घलो दिखे बर लग जथे। भादो मा पानी मा बूड़े धान, फूल झराके पोटराये बर लगथे। खेत के मेड़ मा सोयाबीन,तिली संग जागे पटवा के फूल जउन देखे होही ते भागमानी आय, देखे मा ही ओखर फूल के सुघराई समझ आही, लिख के कहना मुश्किल हे। कनिहा भर बाढ़े काँदी बन कचरा अउ लाम लाम लामे बेल बूटा देखत मन मा उमंग हमा जथे।


*घर अउ बारी-बखरी*

आसाढ़  मा बोय साग भाजी भादो मा फूल फर धरके नार बियार मा झूलत रथे। रमकलिया के छोट पौधा मा पिवरी सफेद अउ लाली रंग के मेल ले बने मनभावन फूल अइसे लगथे मानो कोनो पेंटर ह कागज मा उकेरे हे। मनमाड़े घपटे तोरई,करेला,कुंदरू,कोमढ़ा,पोपट,खेकसी घलो फूल फर के इतरावत रथे। भादो मा थोर थोर साग भाजी बारी बखरी ले निकले बर लग जथे, चारो कोती लामे नार बियार, अउ बाढ़े भाजी पाला ल देख मन झूमर जथे। काँद काँदी म घलो फूल आ जाय रहिथे। घर अउ बारी बखरी मा फुले बैजंत्री,चिरइयाँ के किसम किसम के रंग जिया ल खींच लेथे। नीला नीला फुले सूँतई के फूल(अपराजिता) नार बियार सुद्धा देवारी घरी लटके कोनो झालर बरोबर मनभावन लगथे। घर के दुवारी मा घउदे दसमत, कागज फूल(फाटक फूल), माते सादा सोहागी, मनमाड़े घउदे गोंदा अउ मोंगरा बरसा के पानी ले लड़ भिड़ के भादो मा खुलखुल खुलखुल हाँसत दिखथें,मानो जीत जे खुशी मनावत हें।


*कुवाँ,तरिया,नरवा*

आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भादो मा तरिया कुवाँ नरवा कोटकोट ले अघाये दिखथें। पार, पचरी, तट,तीर सब धोवा मँजा के उज्जर दिखथें। पानी पाके मछरी,मेचका मनमाड़े मगन होके तँउरत दिखथे। रंग रंग के कमल कोकमा तरिया ढ़ोंड़गा के सुघराई ला बढ़ावत दिखथें। बरसा के पानी घरी मतलाये कुवाँ,तरिया, नरवा के पानी भादो के आरो पाके फरिहर होय बर लग जथे, पानी भीतर  तँउरत मछरी केकरा घलो चकचक ले दिखेल  धर लेथे। उबुक चुबुक करत घाट घठोंधा राहत के साँस लेवत, मनखे मन ला अपन ऊपर चढ़े नाहत-खोरत देख मगन रहिथे। तरिया नरवा भराय पानी ला पइसा बरोबर हिसाब किताब लगा के जतके जरूरी हे ततके बोहावत दिखथे। कहे के मतलब जादा होथे तभे उलट भागथे, नही ते टिपटिप ले भरे रहिथे। 


                तिहार बार के मजा उड़ावत झूमत नाचत गावत, रंग रंग के रोटी पीठा खावत, काबा काबा काँदी डोहारत, खेत खार के मुही पानी बाँधत फोड़त, धान पान ल निंदत चालत, नजर भर निहारत, किसम किसम के भाजी पाला खावत, पेड़-पात, फूल-फर के सुघराई देखत देखत भादो कब बुलक जथे पतच नइ चले। अन्तर मन ले देखे,सोचे,गुने, सुने अउ नजर भर निहारे जाय ता,हमर हिंदी पंचाग के छठवा महीना भादो बड़ मनभावन हे।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)