Saturday, 1 July 2023

गीत- बतर के बेरा(रोला छंद)

 गीत- बतर के बेरा(रोला छंद)


आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे


गरजे बड़ आगास, जिया हा थरथर काँपे।

आँखी अपन उघार, बिजुरिया भुइयाँ नाँपे।

छाय घटा घनघोर, रात कस दिन तक लागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


घाम घरी भर काम, करे के किरिया खाके।

शहर नगर मा पाँव, रखे हस जोड़ी जाके।

बितगे बैरी घाम, सुरुज मा नरमी छागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


ले दे के दिन काट, बाट नैना जोहत हे।

गरमी भर बरसात, सही सरलग बोहत हे।

बरस बरस दिन रात, चार महिना हे जागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


बरसिस नैनन रोज, मातगिस तन मा गैरी।

छुटगिस भूख पियास, रात दिन बनगिस बैरी।

उसलत नइहे गोड़, हाथ हलना बिसरागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


दे देंतेंव उधार, नयन जल मैं बादर ला।

बरसा होतिस रोज, छोड़ते नइ तैं घर ला।

होगिस गर्मी काल, मोर सुख चैन गँवागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


खुश हो चातक मोर, गीत गावत हें मनभर।

बइला नांगर जोर, ददरिया छेड़य हलधर।

अमुवा निमुवा डार, झूलना डोर बँधागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


दँउड़ दँउड़ गरु गाय, चरत हे कांदी हरियर।

नदिया नरवा ताल, पियत हे पानी फरिहर।

काय जवान सियान, लोग लइका बइहागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


कतको कीट पतंग, चलै दल मा मिल-जुल के।

चिरई चोंच उलाय, चरै चारा झुल-झुल के।

खुद के गत ला सोच, बदन तज मन हा भागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


मछरी झींगुर साँप, मेचका मारे ताना।

मैं रोवौं दिन रात, बाकि सब गावैं गाना।

माटी तक बोहाय, मोर जिनगी मस्कागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


होगे हँव हलकान, बितावत गरमी बेरा।

पा बरसा के शोर, शोरियाले तैं डेरा।

गे जे रिहिस बिदेश, कमैया सब जुरियागे।

आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


https://youtu.be/v3ROmGpVYpI

नेता जी के योग दिवस

 नेता जी के योग दिवस


                     योग दिवस के अवसर मा भारी चमचमावत बड़का मंच, जेमा बइठे हे बड़का नेता संग कतको वीआईपी मनखे अउ नीचे मा चेला चंगुरा संग असल योग करइया। जे मन नेता मन के बुलावा मा अपन काम बूता ला छोड़ के आय हे। योग के पहली नेता के भाषणबाजी अउ ताली के गड़गड़ाहट ले, तीर तखार गूँजत हे। योग के फायदा ले चालू होवत बात वोट के फायदा तक कब पहुँचिस पता नइ लगिस। भाषण बाजी के बाद बेरा आइस योग करे के। योग करवाये बर कतको नामी गिनामी योगा टीचर मंच मा आसन जमाये बइठे रिहिन। नेता घलो तीर मा बइठगे। सीखइया टीचर किहिस जइसे जइसे हमन करबों वइसे वइसे सब करत जाहू। हाथ गोड़ ला झटकारे के बाद घेंच ला चारों कोती घुवावत बेरा नेता के घेंच टेंड़गागे। घेंच एके डाहर अटके रहिगे, मानो योग बीच जनता के नियत ल टकटकी लगाए देखत हे, कि वोट ये कार्यक्रम ले बढ़ही कि नही? मंच मा देखो देखो होगे, नेता के घेंच सीधा होबे नइ करिस, आनन फानन में वोला हॉस्पिटल लेगिस, तब कहीं स्थिति काबू मा आइस। 

            नेता के तबियत बिगड़े के बाद जनता ला कोन पूछे। जम्मो वीआईपी संग चेला चंगुरा निकल गे पाछू पाछू। एक दिन देखावा करत हाथ, गोड़ मुड़ी, कान ला डोलाये मा अइसन तो होबे करही। सकलाय जनता मन उहाँ का करतिन? जेमन भीड़ बढ़ाये बर चढ़ावा मा आये रिहिन ओमन चढ़ावा लेके टसके लगिन। देखते देखत थोरिक बेरा मा अंडाल, पंडाल सब तिरियागे।  रोग भगाये बर होवत योग ला लोगन मन नेता जी के कारण नइ कर पाइन। अब बपुरा मन के तबियत पानी के का होही? कहूँ योग कर डरे रहितिंन ता साल भर भला चंगा रहितिंन, फेर होनी ला कोन टार सकत हे।

                

                 योग मा भाग ले बर कतको प्रकार के आदमी आये रिहिन, जेमा साहब, बाबू, सिपइहा, कमइयां मजदूर अउ किसान मन तको रिहिन। बूता दू प्रकार ले करे जाथे, एक हाड़ा गोड़ा खपा के ता एक दिमाक लगाके। बूता दूनो जरूरी हे। श्रम अउ सोच के समन्वय होय ले ही ये दुनिया चलत हे। फेर सोचे के बात हे, नेता मन के योग दिवस मा मजदूर किसान मन के का काम? जे बपुरा मन रात दिन जांगर खपावत रइथे, उंखर अपन हाथ,गोड़ थोड़े जाम रही। हाथ गोड़ तो ओखर जकड़े रइथे, जे मन दिन भर सोफा, कुर्सी ला पोगराये रइथे। मोर कहे के मतलब ऑफिस मा दिमाक खपइया साहब, बाबू ला ये सब करना जादा जरूरी हे, जांगर खपइया मन के काया के कसरत तो काम बूता मा आगर तक हो जथे। तभो अइसन देखावा बाजी मा नेता मन के निमंत्रण मा बनिहार,मजदूर मन दिखबे करथे। नेता मन वोट के लालच मा बुलाथे, ता ये मन नोट के लालच मा आ तको जथे। आजकल फोकट मा भीड़ कहाँ जुटथे, अउ भीड़ बढ़ाये बर छोट मोट आदमी मन तो काम आथें। काखर कर आज समय हे, जे बिन स्वार्थ के कोनो फलां ढमका के दर्शन करे। पर जेन श्रम के गाड़ी  ला सबर दिन अपन हाथ म खिचथें, वो नेता मन के बिगारी बर घलो अघुवाय रथे। ऊंखर जिनगी मा गरीबी रूपी रोग सपड़े रथे, जे योग-जोग ले नइ भागे। ये रोग तको नेता मन के कृपा के ही बाट जोहथे, काबर कि काया खपाये मा पेट-परिवार ले देके पलथे, अइसन मा देख देवावा अउ शान शौकत तो सपना मा तको नइ आय। खैर नेता जी के योग दिवस के बहाना भीड़ के हिस्सा बने ले चाय शर्बत अउ एक दिन के रोजी तो मिलगे, अइसने सुध सबर दिन जनता के नेता मन लेवँय। 

                    योग ध्यान दुनिया मा जमाना ले चलत आवत हे। साधु, संत मन सरलग योग ध्यान मा लीन रहै। बचपन मा खेलकूद, जवानी मा कामधाम अउ बुढापा मा भाव भजन, ये  सब विधान अस्त पस्त हो गे हे। अइसन मा आज योग सबके जरूरत बनगे हे। आधुनिक खान पान अउ दूषित पर्यावरण के आघू कोनो निरोग नइ रही सके। मनखे के शरीर मशीन आय, जेखर देख रेख अउ उचित खानपान ही, वोला बढ़िया रख सकथे। योग ध्यान तभे काम के हे, जब खानपान अउ दिनचर्या बने रहय, काबर कि योग सात्विक आचार विचार अउ खानपान के द्योतक होथे। योग अउ कसरत अलग अलग चीज आय। योग ध्यान आत्मिय अउ कसरत शारीरिक क्रिया ले जुड़े हे। कमइयां बनिहार, मजदूर किसान के आत्मीय जुड़ाव भुइयाँ अउ करत काम संग सहज रइथे, संग मा काया के कसरत तो होबे करथे, अइसन मा का  योग, का कसरत अउ का जिम सिम? आज ठलहा अउ स्मार्ट बूता करइया मन इम- जिम मा पछीना ओगारत तको दिखथे। किसान मजदूर कस आज मनखे ला चाही, कि जे भी काम ला करे, पूरा बूड़ के करे। काम टड़काये मा मूड़ पिराबे करही। बूता- काम ही सब ले बड़े योग ध्यान आय, बस वो काम मा काया जरूरत के हिसाब ले खटे अउ मन बरोबर रमे अउ रचे। कमइयां मन जाँगर खपा खपा के थक जावत हे, ता बैठइया मन बइठे बइठे जाँगर ला हलाय-डोलाय अउ मोटाय के उदिम करत पस्त दिखथें। कोनो भी चीज एक दिन मा कुछु नइ होय, वइसने योग ध्यान तको एक दिन के चीज  नोहे, येमा सरलग समय निकाल के जुड़े रहना चाही, नही ते नेता जी कस घेंच ला घुमावत बेरा घेंच धरबे करही। 


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

कविता-QC

 कविता-QC


QCFI हे गजब काम के।

सफल हो जाबों येला थाम के।।

ये जब अपन गुण देखाथे।

समस्या तक अवसर बन जाथे।।

जड़ ले जुड़े लोग ला जोड़ के।

गुणवत्ता चक्र मा निचोड़ के।।

समस्या ला सब आघू लाथे।

ये बूता सबके मन भाथे।।

समस्या ला परिभाषित करके।

छोट बड़े सब बात ला धरके।।

प्रश्न पूछ अउ दिमाक लगा।

अध्ययन करथें सब सकला।।

जड़ मा समस्या के जाना होथे।

मूल कारण ला लाना होथे।।

उठथे जब महिनत के तूफान।

तब दिख जाथे समाधान।।

सोचे समझे ले बार बार।

सपना होय लगथे साकार।।

आथे जब बढ़िया परिणाम।

तब हो जाथे सफल काम।।

महिनत हा रंग लाथे अब्बड़।

मन मा खुशी छाथे अब्बड़।।

सोच समीक्षा जब पाथे पंख।

बजथे तब विकास के शंख।।

जेहर भी QCFI अपनाथे।

उहाँ सुख समृद्धि शांति छाथे।।


खैरझिटिया

घाट न घर के-रोला छंद

 घाट न घर के-रोला छंद


छोटे मोटे काम, गिनावय कर बड़ हल्ला।

श्रेय लेत अघुवाय, श्राप सुन भागय पल्ला।।

खुद के खामी तोप, उघारय गलती पर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


सोंचे समझे छोड़, करे मनमानी रोजे।

पर के ठिहा उजाड़, अटारी खुद बर खोजे।।

झटक आन के अन्न, खाय नित उसर पुसर के।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


दाई ददा ल छोड़, नता के किस्सा खोले।

मीठ मीठ बस बोल, जहर सब कोती घोले।।

कभू होय नइ सीध, रहे अँइठाये जरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


रखे पेट मा दाँत, खोंचका पर बर कोड़े।

अवसर पाके पाँव, गलत पथ कोती मोड़े।

पहिर स्वेत परिधान, चले नित कालिख धरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


घर के भेद ल खोल, मान मरियादा बारे।

आफत जब आ जाय, रहे देखत मुँह फारे।।

बरसे अमरित धार, फुले तभ्भो नइ झरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


पापी बनके पाप, करे अउ लेवय बद्दी।

जाने नही नियाव, तभो पोटारे गद्दी।।

दानवीर कहिलाय, आन के धन बल हरके।

अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


Tuesday, 7 March 2023

काबर बुरा नइ मानबों

 काबर बुरा नइ मानबों


काबर बुरा नइ मानबों,

बुरा    करबे          त?

हँमू                लड़बों,

बरपेली      लड़बे  त।


आय   हे      होली,

बोल  मीठ   बोली।

काबर उलगत हस,

मुँह   ले       गोली।

छीत देबों माटी तेल,अपने अपन बरबे त।

काबर    बुरा  नइ  मानबों,बुरा  करबे  त?


मया   के    तिहार हे।

जुरे पारा -परिवार हे।

उड़य   रंग     गुलाल,

हमाय खुसी अपार हे।

बाँट खुसी,खाबे गारी;कहूं लड़बे त।

काबर बुरा नइ मानबों,बुरा करब त?


माते हे फागुन, रचे  हे रास।

मजा उड़ाले,झन कर नास।

बाजे  नँगाड़ा,गा अउ नाच।

सबला  हँसा, तहूँ  हा हाँस।

मार खाबे मया के बगिया ल;चरबे त।

काबर बुरा नइ मानबों,बुरा  करबे  त?


समा    सबके  मुँह   मा,

काबर फोकटे लड़थस?

का      मिलथे    तोला?

कोचके  कस   करथस।

मया    के    रंग  लगाले,

कोन       का      कही?

रबे         बने      बनके,

त  सबके  आसिस रही।

कोनो        तिहार    हा,

बुरा   करेल नइ काहय।

फोकटे अँटियात हस,कोन रोही मरबे त?

काबर    बुरा  नइ  मानबों,बुरा  करबे  त?


रंग लगाय बर गाल का?

हिरदे   घलो  लमा देबों।

पाँव  ला का  खिंचथस?

मूड़    मा   चढ़ा   लेबों।

मनखे कोनो अलग नोहे,

सब  ला   अपन   मान।

दाई -ददा  रीत-रिवाज।

सबके    कर   सम्मान।

नाव बगरही,अंजोर बर;भभका धरबे त।

काबर   बुरा  नइ मानबों,बुरा  करबे  त?


होली    हे ;   त   हद  में  रहा।

मनखे    कस,   कद  में   रहा।

मान   बड़े   के  बात   बरजना,

छीत फूल,झन रद-खद में रहा।

सबो   दिही   पलोंदी,  सोझ   चढ़बे   त।

काबर    बुरा  नइ  मानबों,बुरा करबे  त?


चल   बुरा  नइ  मानन,

होली                   हे।

का   हिरदे    मा मया?

अउ   मीठ    बोली हे?

जेन दिन तोर हिरदे मा,

मया    जाग      जही।

बोली  मीठ  साफ रही।

वो   दिन  लइका कस,

तोरो गलती माफ रही।

बड़ पून्न कमाबे,सुनता के संग धरबे त।

काबर बुरा  नइ  मानबों,बुरा  करबे  त?


राचर कपाट ला,

कुवाँ बावली मा बोर देथे।

रंग  गुलाल ठीक हे फेर

नाली मा तक बोर देथे।

हुदरे कोचके कस करथे,

का मारी दिही ता जानबे?

जी खखवा जाथे,

कइसे बुरा नइ मानबे।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795

Monday, 6 March 2023

देश भक्ति-स्वतंत्रता दिवस अमर रहे, जय जय जय भारत

 देश भक्ति-स्वतंत्रता दिवस अमर रहे, जय जय जय भारत


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया: बागीश्वरी सवैया


मले  मूड़  मा  धूल  माटी  धरा के सिवाना म ठाढ़े हवे वीर गा।

लगे तोप गोला सहीं वीर काया त ओधे भला कोन हा तीर गा।

नवाये  मुड़ी  जेन  माँ  भारती तीर वोला खवाये बुला खीर गा।

दिखाये  कहूँ देश ला आँख बैरी त फेके भँवाके जिया चीर गा।


जीतेंद्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को,कोरबा(छग)


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अमृत महोत्सव (आल्हा छंदगीत)


आजादी के अमृत महोत्सव, सबे मनावत हाँवन आज।

जनम धरे हन भारत भू मा, हम सब ला हावयँ बड़ नाज।


स्कूल दफ्तर कोट कछेरी, गली खोर घर बन अउ बाट।

सबे खूँट लहराय तिरंगा, तोर मोर के खाई पाट।।

हर हिन्दुस्तानी के भीतर, भारत माता करथे राज।

आजादी के अमृत महोत्सव, सबे मनावत हाँवन आज।


रही सबर दिन सुरता हम ला, बलिदानी मनके बलिदान।

टूटन नइ देन उँखर सपना, नइ जावन देवन स्वभिमान।

सुख समृद्धि के पहिराबों, भारत माँ के सिर मा ताज।

आजादी के अमृत महोत्सव, सबे मनावत हाँवन आज।


सब दिन रही तिरंगा दिल मा, सबदिन करबों जयजयकार।

छोटे बड़े सबे सँग सबदिन, रखबों लमा मया के तार।।

छोड़ सुवारथ सुमता गारत, देश धरम बर करबों काज।

आजादी के अमृत महोत्सव, सबे मनावत हाँवन आज।


जंगल झाड़ी झरना नदिया, खेत खदान हवय भरमार।

सोना उगले भारत भुइयाँ, कोई नइ पा पाये पार।

रक्षा खातिर लड़बों भिड़बों, बैरी उपर गिराबों गाज।

आजादी के अमृत महोत्सव, सबे मनावत हाँवन आज।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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एक दिन के देश भक्ति (सरसी छन्द)-

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


देशभक्ति चौदह के जागे, सोलह के छँट जाय।

पंद्रह तारिक के दिन बस सब, जय भारत चिल्लाय।


आय अगस्त महीना मा जब, आजादी के बेर।

देश भक्ति के गीत बजे बड़, गाँव शहर सब मेर।

लइका संग सियान मगन हे, झंडा हाथ उठाय।

पंद्रह तारिक के दिन बस सब, जय भारत चिल्लाय।


रँगे बसंती रंग म कोनो, कोनो हरा सफेद।

गावै हाथ तिरंगा थामे, भुला एक दिन भेद।

तीन रंग मा सजे तिरंगा, लहर लहर लहराय।

पंद्रह तारिक के दिन बस सब, जय भारत चिल्लाय।


ये दिन आये सबझन मनला, बलिदानी मन याद।

गूँजय लाल बहादुर गाँधी, भगत सुभाष अजाद।

देशभक्ति के भाव सबे दिन, अन्तस् रहे समाय।

पंद्रह तारिक के दिन बस सब, जय भारत चिल्लाय।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया: अपन देस(शक्ति छंद)


पुजारी  बनौं मैं अपन देस के।

अहं जात भाँखा सबे लेस के।

करौं बंदना नित करौं आरती।

बसे मोर मन मा सदा भारती।


पसर मा धरे फूल अउ हार ला।

दरस बर खड़े मैं हवौं द्वार मा।

बँधाये  मया मीत डोरी  रहे।

सबे खूँट बगरे अँजोरी रहे।

बसे बस मया हा जिया भीतरी।

रहौं  तेल  बनके  दिया भीतरी।


इहाँ हे सबे झन अलग भेस के।

तभो हे घरो घर बिना बेंस के--।

पुजारी  बनौं मैं अपन देस के।

अहं जात भाँखा सबे लेस के।


चुनर ला करौं रंग धानी सहीं।

सजाके बनावौं ग रानी सहीं।

किसानी करौं अउ सियानी करौं।

अपन  देस  ला  मैं गियानी करौं।

वतन बर मरौं अउ वतन ला गढ़ौ।

करत  मात  सेवा  सदा  मैं  बढ़ौ।


फिकर नइ करौं अपन क्लेस के।

वतन बर बनौं घोड़वा रेस के---।

पुजारी  बनौं मैं अपन देस के।

अहं जात भाँखा सबे लेस के।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया: स्वतंत्रता दिवस अमर रहे,,,


बलिदानी (सार छंद)


कहाँ चिता के आग बुझा हे,हवै कहाँ आजादी।

भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।


बैरी अँचरा खींचत हावै,सिसकै भारत माता।

देश  धरम  बर  मया उरकगे,ठट्ठा होगे नाता।

महतारी के आन बान बर,कोन ह झेले गोली।

कोन  लगाये  माथ  मातु के,बंदन चंदन रोली।

छाती कोन ठठाके ठाढ़े,काँपे देख फसादी----।

भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।


अपन  देश मा भारत माता,होगे हवै अकेल्ला।

हे मतंग मनखे स्वारथ मा,घूमत हावय छेल्ला।

मुड़ी हिमालय के नवगेहे,सागर हा मइलागे।

हवा  बिदेसी महुरा घोरे, दया मया अइलागे।

देश प्रेम ले दुरिहावत हे,भारत के आबादी----।

भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।


सोन चिरइयाँ अउ बेंड़ी मा,जकड़त जावत हावै।

अपने  मन  सब  बैरी  होगे,कोन  भला  छोड़ावै।

हाँस हाँस के करत हवै सब,ये भुँइया के चारी।

देख  हाल  बलिदानी  मनके,बरसे  नैना धारी।

पर के बुध मा काम करे के,होगे हें सब आदी--।

भुलागेन  बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।


बार बार बम बारुद बरसे,दहले दाई कोरा।

लड़त  भिड़त हे भाई भाई,बैरी डारे डोरा।

डाह  द्वेष  के  आगी  भभके ,माते  मारा   मारी।

अपन पूत ला घलो बरज नइ,पावत हे महतारी।

बाहिर बाबू भाई रोवै,घर मा दाई दादी--------।

भुलागेन बलिदानी मन ला,बनके अवसरवादी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


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: दोहा गीत(हमर तिरंगा)


लहर लहर लहरात हे,हमर तिरंगा आज।

इही हमर बर जान ए,इही  हमर ए लाज।

हाँसत  हे  मुस्कात  हे,जंगल  झाड़ी देख।

नँदिया झरना गात हे,बदलत हावय लेख।

जब्बर  छाती  तान  के, हवे  वीर  तैनात।

संसो  कहाँ  सुबे   हवे, नइहे  संसो   रात।

महतारी के लाल सब,मगन करे मिल काज।

लहर------------------------------ आज।


उत्तर  दक्षिण देख ले,पूरब पश्चिम झाँक।

भारत भुँइया ए हरे,कम झन तैंहर आँक।

गावय गाथा ला पवन,सूरज सँग मा चाँद।

उगे सुमत  के  हे फसल,नइहे बइरी काँद।

का  का  मैं  बतियाँव गा,हवै सोनहा राज।

लहर------------------------------लाज।


तीन रंग के हे ध्वजा, हरा गाजरी स्वेत।

जय हो भारत भारती,नाम सबो हे लेत।

कोटि कोटि परनाम हे,सरग बरोबर देस।

रहिथे सब मनखे इँहा, भेदभाव ला लेस।

जनम  धरे  हौं मैं इहाँ,हावय मोला नाज।

लहर-----------------------------लाज।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

कोरबा,छत्तीसगढ़


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: कइसे जीत होही(सार छंद)


हमर देश मा भरे पड़े हे,कतको पाकिस्तानी।

जे मन चाहै ये माटी हा,होवै चानी चानी----।


देश प्रेम चिटको नइ जानै,करै बैर गद्दारी।

भाई चारा दया मया ला,काटै धरके आरी।

झगरा झंझट मार काट के,खोजै रोज बहाना।

महतारी  ले  मया करै नइ,देवै रहि रहि ताना।

पहिली ये मन ला समझावव,लात हाथ के बानी।

हमर देश मा भरे पड़े हे,कतको पाकिस्तानी--।


राजनीति  के  खेल निराला,खेलै  जइसे  पासा।

अपन सुवारथ बर बन नेता,काटै कतको आसा।

मातृभूमि के मोल न जानै,मानै सब कुछ गद्दी।

मनखे  मनके मन मा बोथै,जात पात के लद्दी।

फौज  फटाका  धरै फालतू,करै मौज मनमानी।

हमर देश मा भरे पड़े हे,कतको पाकिस्तानी--।


तमगा  ताकत  तोप  देख  के,काँपै  बैरी  डर मा।

फेर बढ़े हे भाव उँखर बड़,देख विभीषण घर मा।

घर मा  ये  मन  जात  पात  के,रोज मतावै गैरी।

ताकत हावय हाल देख के,चील असन अउ बैरी।

हाथ  मिलाके  बैरी  मन ले,बारे  घर  बन छानी।

हमर देश मा भरे पड़े हे,कतको पाकिस्तानी----।


खावय ये माटी के उपजे,गावय गुण परदेशी।

कटघेरा मा डार वतन ला,खुदे लड़त हे पेशी।

अँचरा फाड़य महतारी के,खंजर गोभय छाती।

मारय काटय घर वाले ला,पर ला भेजय पाती।

पलय बढ़य झन ये माटी मा,अइसन दुश्मन जानी।

हमर देश मा भरे पड़े हे,कतको पाकिस्तानी-----।


घर के बइला नाश करत हे, हरहा होके खेती।

हारे हन इतिहास झाँक लौ,इँखरे मन के सेती।

अपन देश के भेद खोल के,ताकत करथे आधा।

जीत भला  तब कइसे होही,घर के मनखे बाधा।

पहिली पहटावय ये मन ला,माँग सके झन पानी।

हमर देश मा भरे पड़े हे,कतको पाकिस्तानी----।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा) छग


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जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया: गीत


देस बर जीबो,देस बर मरबो।

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चल माटी के काया ल,हीरा करबो।

देस   बर    जीबो , देस बर  मरबो।

   

सिंगार करबों,सोन चिरँइयाँके।

गुन   गाबोंन , भारत  मइया के।

सुवारथ  के सुरता ले, दुरिहाके।

धुर्रा चुपर के माथा म,भुइयाँ के।


घपटे अंधियारी भगाय बर,भभका धरबो।

देस    बर    जीबो  ,  देस    बर     मरबो।


उंच - नीच    ल ,    पाटबोन।

रखवार बन देस ल,राखबोन।

हवा    म    मया  ,  घोरबोन।

हिरदे ल हिरदे ले , जोड़बोन।


चल  दुख-पीरा  ल , मिल  हरबो।

देस   बर  जीबों  , देस बर मरबो।


हम ला गरब-गुमान  हे,

ए   भुइयाँ  ल  पाके।

खड़े   रबों   मेड़ो   म ,

जबर छाती फइलाके।

फोड़ देबों वो आँखी ल,

जेन हमर भुइयाँ  बर गड़ही।

लड़बों मरबों  देस  बर ,

तभे काया के करजा उतरही।


तँउरबों बुड़ती समुंद म,उक्ती पहाड़ चढ़बो।

देस     बर    जीबो   ,  देस    बर     मरबो।


          जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

              बाल्को(कोरबा)

              9981441795


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अमृत महोत्सव (गीत)


तोरो हाथ मा हवै तिरंगा, मोरो हाथ मा हे।

लइका सियान अउ जवान, सबे साथ मा हे--


आजादी के अमृत उत्सव, जुरमिल सबे मनाबों।

बलिदानी मन के सुरता कर, श्रद्धा सुमन चढ़ाबों।

चरण पखारत हावै सागर, हिमधर माथ मा हे---

लइका सियान अउ जवान, सबे साथ मा हे-----


जात धरम भाँखा नइ जानन, रंग रूप ना भेष।

सबके दिल मा हवै तिरंगा, सबके बड़का देश।।

लहरावत स्कूल दफ्तर सँग, घर गली पाथ मा हे--

लइका सियान अउ जवान, सबे साथ मा हे------


परब परंपरा संस्कृति, सरी दुनिया मा छाये।

धानी धरती नदिया पर्वत, गौरव गाथा गाये।

आँखी कोन देखाही हम ला, बैरी मन नाथ मा हे--

लइका सियान अउ जवान, सबे साथ मा हे------


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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आल्हा छंद- रे बइरी


महतारी के रक्षा खातिर, धरे हवँव मैं मन मा रेंध।

खड़े हवँव नित छाती ताने, काय मार पाबे तैं सेंध।


मोला झन तैं छोट समझबे, अपन राज के मैंहा वीर।

अब्बड़ ताकत हवै बाँह मा, दू फाँकी देहूँ रे चीर।।


तन अउ मन ला करे लोहाटी, बासी चटनी पसिया नून।

देख तोर करनी धरनी ला, बड़ उफान मारे तन खून।।


नाँगर मूठ कुदारी धरधर, पथना कस होगे हे हाथ।

तोर असन कतको हरहा ला, पहिराये हौं मैंहर नाथ।


ललहूँ पटुकू कमर कँसे हौं, चप्पल भँदई सोहे पाँव।

अड़हा जान उलझबे झन तैं, उल्टा पड़ जाही रे दाँव।


कोन खेत के तँय मुरई रे, मोला का तँय लेबे जीत।

परही मुटका कँसके तोला, छिनभर मा हो जाबे चीत।


हवै हवा कस चाल मोर रे, कोन भला पा पाही पार।

चाहे कतको हो खरतरिहा, होही खच्चित ओखर हार।


देश राज बर नयन गड़ाबे, देहूँ खँड़ड़ी मैं ओदार।

महानदी अरपा पैरी मा, बोहत रही लहू के धार।


उड़ा जबे रे बइरी तैंहा, कहूँ मार पाहूँ मैं फूँक।

खड़े खड़े बस देखत रहिबे, होवय नही मोर ले चूँक।


देख मोर नैना भीतर रे, गजब भरे हावय अंगार।

पाना डारा कस तोला मैं, छिन भर मा देहूँ रे बार।


गोड़ हाथ हर पूरे बाँचे, नइ लागय मोला हथियार।

अपन राज के आनबान बर, सुतत उठत रहिथौं तैंयार।


भाला बरछी बम अउ बारुद, भेद सके नइ मोरे चाम।

दाँत कटर देहूँ ततकी मा, तोर बुझा जाही रे नाम।।


जब तक जीहूँ ये माटी मा, बनके रहिहूँ बब्बर शेर।

डर नइहे कखरो ले मोला, करहू काय कोलिहा घेर।


नाँव खैरझिटिया हे मोरे, खरतरिहा माटी के लाल।

चुपेचाप रह घर मा खुसरे, नइ ते हो जाही जंजाल।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

हरिगीतिका छंद-परसा

 हरिगीतिका छंद-परसा


*परसा कहै अब मोर कर भौरा झुले तितली झुले।*

*तड़पे हवौं मैं साल भर तब लाल फुलवा हे फुले।*

*जब माँघ फागुन आय तब सबके अधर छाये रथौं।*

*बाकी समय बन बाग मा चुपचाप मिटकाये रथौं।*


*सजबे सँवरबे जब इहाँ तब लोग मन बढ़िया कथे।*

*मनखे कहँव या जीव कोनो सब मगन खुद मा रथे।*

*कवि के कलम मा छाय रहिथौं एक बेरा साल मा।*

*देथौं झरा सब फूल ला नाचत नँगाड़ा ताल मा।*


खैरझिटिया