सवैया-पावस
पावस पावन आ बरसावन लागत हे रस धार सखा।
तरिया परिया हरिया भरगे जल लांघत हावय पार सखा।
गरजे बदरा चमके बिजुरी जस मातय हावय रार सखा।
झिंगुरा सँग दादुर गीत सुनावय लागय रोज तिहार सखा।
सवैया-पावस
पावस पावन आ बरसावन लागत हे रस धार सखा।
तरिया परिया हरिया भरगे जल लांघत हावय पार सखा।
गरजे बदरा चमके बिजुरी जस मातय हावय रार सखा।
झिंगुरा सँग दादुर गीत सुनावय लागय रोज तिहार सखा।
गाँव मा
खुलगे विकास के, पोल गाँव मा।
दिन रात रथे बिजली, गोल गाँव मा।।
सो पिस के जमाना मा, सोवत हे सुख चैन।
जागत नइहे गुठलू अउ, चिचोल गाँव मा।।
उपरे उपर दिखथे दया मया, उबटन कस।
फेर भीतरे भीतर हे, बड़ झोल गाँव मा।।
हीरक के नइ देखे, कुर्सी ला पाके नेता।
बस चुनाव दरी पीटथे, आके ढोल गाँव मा।।
फइलत हे जँउहर, देखमरी के बीमारी।
धीर लगाके नँदात हे, गुरतुर बोल गाँव मा।।
डहर बाट मा बोहात हे, नहानी के पानी।
पर सुख दुख के नइहे, कोई मोल गाँव मा।।
विकास के बइला बस, कागज मा मेछरात हे।
टर्रावत हे मेचका अउ, बिंधोल गाँव मा।।
भागत हे सुख सुविधा बर, शहर गँवइहा।
व्यपारी जमीन नपात हे, होलसोल गाँव मा।।
ददा दाई घिरलत ले कमात हे, खेत खार मा।
बाढ़े टूरी टूरा मन मारत हें, रोल गाँव मा।।
बोहाय पड़े हे घर के, पिछोत बखरी बारी।
ठाढ़े हे अँगना दुवारी, मुँह खोल गाँव मा।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
बरसात (गीतिका छ्न्द)
घन घटा घनघोर धरके, बूँद बड़ बरसात हे।
नाच के गाके मँयूरा, नीर ला परघात हे।
खेत पानी पी अघागे, काम के हे शुभ लगन।
दिन किसानी के हबरगे, कहि कमैया हें मगन।।
ढोंड़िहा धमना हा भागे, ए मुड़ा ले ओ मुड़ा।
साँप बिच्छू बड़ दिखत हे, डर हवैं चारो मुड़ा।
बड़ चमकथे बड़ गरजथे, देख ले आगास ला।
धर तभो नाँगर किसनहा, खेत बोंथे आस ला।
घूमथे बड़ गोल लइका, नाचथें बौछार मा।
हाथ मा चिखला उठाके, पार बाँधे धार मा।
जब गिरे पानी रदारद, नइ सुनें तब बात ला।
नाच गाके दिन बिताथें, देख के बरसात ला।
लोग लइका जब सनावैं, धोयँ तब ऍड़ी गजब।
नाँदिया बइला चलावैं, चढ़ मचें गेड़ी गजब।
छड़ गड़उला खेल खेलैं, छोड़ गिल्ली भाँवरा।
लीम आमा बर लगावैं, अउ लगावैं आँवरा।।
ताल डबरी भीतरी ले, बोलथे टर मेचका।
ढेंखरा उप्पर मा चढ़के, डोलथे बड़ टेटका।
खोंधरा झाला उझरगे, का करे अब मेकरा।
टाँग के डाढ़ा चलत हें, चाब देथें केकरा।।
पार मा मछरी चढ़े तब, खाय बिनबिन कोकड़ा।
रात दिन खेलैं गरी मिल, छोकरा अउ डोकरा।
जब करे झक्कर झड़ी, सब खाय होरा भूँज के।
पाँख खग बड़ फड़फड़ाये, मन लुभाये गूँज के।।
खेत मा डँटगे कमैया, छोड़ के घर खोर ला।
लोर गेहे बउग बत्तर, देख के अंजोर ला।
फुरफुँदी फाँफा उड़े बड़, अउ उड़ें चमगेदरी।
सब कहैं कर जोर के घन, झन सताबे ए दरी।
होय परसानी गजब जब, रझरझा पानी गिरे।
काखरो घर ओदरे ता, काखरो छानी गिरे।
सज धरा सब ला लुभावै, रूप हरिहर रंग मा।
गीत गावै नित कमैया, काम बूता संग मा।
ओढ़ना कपड़ा महकथे, नइ सुखय बरसात मा।
झूमथें भिनभिन अबड़, माछी मछड़ दिन रात मा।
मतलहा पानी रथे, बोरिंग कुवाँ नद ताल के।
जर घरो घर मा हबरथे, ये समै हर साल के।
चूंहथे छानी अबड़, माते रथे घर सीड़ मा।
जोड़ के मूड़ी पुछी कीरा, चलैं सब भीड़ मा।
देख के कीरा कई, बड़ घिनघिनासी लागथे।
नींद घुघवा के परे नइ, रात भर नित जागथे।
नीर मोती के असन, घन रोज बरसाते हवे।
मन हरेली तीज पोरा, मा मगन माते हवे।
धान कोदो जोंधरी, कपसा तिली हे खेत मा।
लहलहावै पा पवन, छप जाय फोटू चेत मा।
बूँद तक बरसै नही, कतको बछर आसाढ़ मा।
ता कभू घर खेत पुलिया, तक बहे बड़ बाढ़ मा।
बाढ़ अउ सूखा पड़े ता, झट मरे मन आस हा।
चाल के पानी गिरे तब, भाय मन चौमास हा।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
गीत- बतर के बेरा(रोला छंद)
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे
गरजे बड़ आगास, जिया हा थरथर काँपे।
आँखी अपन उघार, बिजुरिया भुइयाँ नाँपे।
छाय घटा घनघोर, रात कस दिन तक लागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
घाम घरी भर काम, करे के किरिया खाके।
शहर नगर मा पाँव, रखे हस जोड़ी जाके।
बितगे बैरी घाम, सुरुज मा नरमी छागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
ले दे के दिन काट, बाट नैना जोहत हे।
गरमी भर बरसात, सही सरलग बोहत हे।
बरस बरस दिन रात, चार महिना हे जागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
बरसिस नैनन रोज, मातगिस तन मा गैरी।
छुटगिस भूख पियास, रात दिन बनगिस बैरी।
उसलत नइहे गोड़, हाथ हलना बिसरागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
दे देंतेंव उधार, नयन जल मैं बादर ला।
बरसा होतिस रोज, छोड़ते नइ तैं घर ला।
होगिस गर्मी काल, मोर सुख चैन गँवागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
खुश हो चातक मोर, गीत गावत हें मनभर।
बइला नांगर जोर, ददरिया छेड़य हलधर।
अमुवा निमुवा डार, झूलना डोर बँधागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
दँउड़ दँउड़ गरु गाय, चरत हे कांदी हरियर।
नदिया नरवा ताल, पियत हे पानी फरिहर।
काय जवान सियान, लोग लइका बइहागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
कतको कीट पतंग, चलै दल मा मिल-जुल के।
चिरई चोंच उलाय, चरै चारा झुल-झुल के।
खुद के गत ला सोच, बदन तज मन हा भागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
मछरी झींगुर साँप, मेचका मारे ताना।
मैं रोवौं दिन रात, बाकि सब गावैं गाना।
माटी तक बोहाय, मोर जिनगी मस्कागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
होगे हँव हलकान, बितावत गरमी बेरा।
पा बरसा के शोर, शोरियाले तैं डेरा।
गे जे रिहिस बिदेश, कमैया सब जुरियागे।
आजा राजा मोर, बतर के बेरा आगे।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
https://youtu.be/v3ROmGpVYpI
नेता जी के योग दिवस
योग दिवस के अवसर मा भारी चमचमावत बड़का मंच, जेमा बइठे हे बड़का नेता संग कतको वीआईपी मनखे अउ नीचे मा चेला चंगुरा संग असल योग करइया। जे मन नेता मन के बुलावा मा अपन काम बूता ला छोड़ के आय हे। योग के पहली नेता के भाषणबाजी अउ ताली के गड़गड़ाहट ले, तीर तखार गूँजत हे। योग के फायदा ले चालू होवत बात वोट के फायदा तक कब पहुँचिस पता नइ लगिस। भाषण बाजी के बाद बेरा आइस योग करे के। योग करवाये बर कतको नामी गिनामी योगा टीचर मंच मा आसन जमाये बइठे रिहिन। नेता घलो तीर मा बइठगे। सीखइया टीचर किहिस जइसे जइसे हमन करबों वइसे वइसे सब करत जाहू। हाथ गोड़ ला झटकारे के बाद घेंच ला चारों कोती घुवावत बेरा नेता के घेंच टेंड़गागे। घेंच एके डाहर अटके रहिगे, मानो योग बीच जनता के नियत ल टकटकी लगाए देखत हे, कि वोट ये कार्यक्रम ले बढ़ही कि नही? मंच मा देखो देखो होगे, नेता के घेंच सीधा होबे नइ करिस, आनन फानन में वोला हॉस्पिटल लेगिस, तब कहीं स्थिति काबू मा आइस।
नेता के तबियत बिगड़े के बाद जनता ला कोन पूछे। जम्मो वीआईपी संग चेला चंगुरा निकल गे पाछू पाछू। एक दिन देखावा करत हाथ, गोड़ मुड़ी, कान ला डोलाये मा अइसन तो होबे करही। सकलाय जनता मन उहाँ का करतिन? जेमन भीड़ बढ़ाये बर चढ़ावा मा आये रिहिन ओमन चढ़ावा लेके टसके लगिन। देखते देखत थोरिक बेरा मा अंडाल, पंडाल सब तिरियागे। रोग भगाये बर होवत योग ला लोगन मन नेता जी के कारण नइ कर पाइन। अब बपुरा मन के तबियत पानी के का होही? कहूँ योग कर डरे रहितिंन ता साल भर भला चंगा रहितिंन, फेर होनी ला कोन टार सकत हे।
योग मा भाग ले बर कतको प्रकार के आदमी आये रिहिन, जेमा साहब, बाबू, सिपइहा, कमइयां मजदूर अउ किसान मन तको रिहिन। बूता दू प्रकार ले करे जाथे, एक हाड़ा गोड़ा खपा के ता एक दिमाक लगाके। बूता दूनो जरूरी हे। श्रम अउ सोच के समन्वय होय ले ही ये दुनिया चलत हे। फेर सोचे के बात हे, नेता मन के योग दिवस मा मजदूर किसान मन के का काम? जे बपुरा मन रात दिन जांगर खपावत रइथे, उंखर अपन हाथ,गोड़ थोड़े जाम रही। हाथ गोड़ तो ओखर जकड़े रइथे, जे मन दिन भर सोफा, कुर्सी ला पोगराये रइथे। मोर कहे के मतलब ऑफिस मा दिमाक खपइया साहब, बाबू ला ये सब करना जादा जरूरी हे, जांगर खपइया मन के काया के कसरत तो काम बूता मा आगर तक हो जथे। तभो अइसन देखावा बाजी मा नेता मन के निमंत्रण मा बनिहार,मजदूर मन दिखबे करथे। नेता मन वोट के लालच मा बुलाथे, ता ये मन नोट के लालच मा आ तको जथे। आजकल फोकट मा भीड़ कहाँ जुटथे, अउ भीड़ बढ़ाये बर छोट मोट आदमी मन तो काम आथें। काखर कर आज समय हे, जे बिन स्वार्थ के कोनो फलां ढमका के दर्शन करे। पर जेन श्रम के गाड़ी ला सबर दिन अपन हाथ म खिचथें, वो नेता मन के बिगारी बर घलो अघुवाय रथे। ऊंखर जिनगी मा गरीबी रूपी रोग सपड़े रथे, जे योग-जोग ले नइ भागे। ये रोग तको नेता मन के कृपा के ही बाट जोहथे, काबर कि काया खपाये मा पेट-परिवार ले देके पलथे, अइसन मा देख देवावा अउ शान शौकत तो सपना मा तको नइ आय। खैर नेता जी के योग दिवस के बहाना भीड़ के हिस्सा बने ले चाय शर्बत अउ एक दिन के रोजी तो मिलगे, अइसने सुध सबर दिन जनता के नेता मन लेवँय।
योग ध्यान दुनिया मा जमाना ले चलत आवत हे। साधु, संत मन सरलग योग ध्यान मा लीन रहै। बचपन मा खेलकूद, जवानी मा कामधाम अउ बुढापा मा भाव भजन, ये सब विधान अस्त पस्त हो गे हे। अइसन मा आज योग सबके जरूरत बनगे हे। आधुनिक खान पान अउ दूषित पर्यावरण के आघू कोनो निरोग नइ रही सके। मनखे के शरीर मशीन आय, जेखर देख रेख अउ उचित खानपान ही, वोला बढ़िया रख सकथे। योग ध्यान तभे काम के हे, जब खानपान अउ दिनचर्या बने रहय, काबर कि योग सात्विक आचार विचार अउ खानपान के द्योतक होथे। योग अउ कसरत अलग अलग चीज आय। योग ध्यान आत्मिय अउ कसरत शारीरिक क्रिया ले जुड़े हे। कमइयां बनिहार, मजदूर किसान के आत्मीय जुड़ाव भुइयाँ अउ करत काम संग सहज रइथे, संग मा काया के कसरत तो होबे करथे, अइसन मा का योग, का कसरत अउ का जिम सिम? आज ठलहा अउ स्मार्ट बूता करइया मन इम- जिम मा पछीना ओगारत तको दिखथे। किसान मजदूर कस आज मनखे ला चाही, कि जे भी काम ला करे, पूरा बूड़ के करे। काम टड़काये मा मूड़ पिराबे करही। बूता- काम ही सब ले बड़े योग ध्यान आय, बस वो काम मा काया जरूरत के हिसाब ले खटे अउ मन बरोबर रमे अउ रचे। कमइयां मन जाँगर खपा खपा के थक जावत हे, ता बैठइया मन बइठे बइठे जाँगर ला हलाय-डोलाय अउ मोटाय के उदिम करत पस्त दिखथें। कोनो भी चीज एक दिन मा कुछु नइ होय, वइसने योग ध्यान तको एक दिन के चीज नोहे, येमा सरलग समय निकाल के जुड़े रहना चाही, नही ते नेता जी कस घेंच ला घुमावत बेरा घेंच धरबे करही।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
कविता-QC
QCFI हे गजब काम के।
सफल हो जाबों येला थाम के।।
ये जब अपन गुण देखाथे।
समस्या तक अवसर बन जाथे।।
जड़ ले जुड़े लोग ला जोड़ के।
गुणवत्ता चक्र मा निचोड़ के।।
समस्या ला सब आघू लाथे।
ये बूता सबके मन भाथे।।
समस्या ला परिभाषित करके।
छोट बड़े सब बात ला धरके।।
प्रश्न पूछ अउ दिमाक लगा।
अध्ययन करथें सब सकला।।
जड़ मा समस्या के जाना होथे।
मूल कारण ला लाना होथे।।
उठथे जब महिनत के तूफान।
तब दिख जाथे समाधान।।
सोचे समझे ले बार बार।
सपना होय लगथे साकार।।
आथे जब बढ़िया परिणाम।
तब हो जाथे सफल काम।।
महिनत हा रंग लाथे अब्बड़।
मन मा खुशी छाथे अब्बड़।।
सोच समीक्षा जब पाथे पंख।
बजथे तब विकास के शंख।।
जेहर भी QCFI अपनाथे।
उहाँ सुख समृद्धि शांति छाथे।।
खैरझिटिया
घाट न घर के-रोला छंद
छोटे मोटे काम, गिनावय कर बड़ हल्ला।
श्रेय लेत अघुवाय, श्राप सुन भागय पल्ला।।
खुद के खामी तोप, उघारय गलती पर के।
अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।
सोंचे समझे छोड़, करे मनमानी रोजे।
पर के ठिहा उजाड़, अटारी खुद बर खोजे।।
झटक आन के अन्न, खाय नित उसर पुसर के।
अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।
दाई ददा ल छोड़, नता के किस्सा खोले।
मीठ मीठ बस बोल, जहर सब कोती घोले।।
कभू होय नइ सीध, रहे अँइठाये जरके।
अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।
रखे पेट मा दाँत, खोंचका पर बर कोड़े।
अवसर पाके पाँव, गलत पथ कोती मोड़े।
पहिर स्वेत परिधान, चले नित कालिख धरके।
अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।
घर के भेद ल खोल, मान मरियादा बारे।
आफत जब आ जाय, रहे देखत मुँह फारे।।
बरसे अमरित धार, फुले तभ्भो नइ झरके।
अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।
पापी बनके पाप, करे अउ लेवय बद्दी।
जाने नही नियाव, तभो पोटारे गद्दी।।
दानवीर कहिलाय, आन के धन बल हरके।
अइसन मनखे होय, कभू भी घाट न घर के।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)