Friday, 18 April 2025

अंतरराष्ट्रीय डांस डे म

 अंतरराष्ट्रीय डांस डे म


"""""फकत नचइयाँ बाढ़गे""""


गवइया बजइया कमती होगे,

बढ़िया जिनिस तरी मा माढ़गे।

गांव लगत हे ना शहर लगत हे,

फकत नचइयाँ बाढ़गे-----------।


परी जोक्कड़ मन देख के दंग हें।

नचइया मन मा चढ़े जबर रंग हे।

बिन बाजा के घलो हाथ पांव हलात हें।

आ आ कहिके एला ओला बलात हें।।

नाचते नाचत जाड़,घाम अउ आसाढ़ गे।

गांव लगत हे------------------------।।


टूरा टूरी भउजी भैया ना बहू लगत हे।

एक जघा झूमत सब महू लगत हे।।

चुंहकत हें लाज शरम के फसल ला।

ढेंगा देखावत हे जुन्ना कल ला।।

नाचे संझा बिहना, रति रंभा ला पछाढ़गे।

गांव लगत हे------------------------।।


आज पर के नाच देख, कहाँ मजा आत हे।

नचनइया बनके नाचत हे, तभे मजा पात हे।।

मरनी भर ला छोड़, ताहन सब मा फकत नचई,

सोसल मीडिया मा तो, सबके आ गय हे रई।।

बरतिया कस धक्का मारे, झगड़ा लड़ई ठाढ़गे।

गांव लगत हे-------------------------------।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


डांस अच्छा चीज आय फेर मान मर्यादा अउ मांग म हो।। *उंगली म नाचना*  एक हाना रहय, फेर आज तो उंगली घलो नइ लगत हे, बर बिहाव, छट्ठी, बरही, भागवत, रमायन सब म,आज के छोटे बड़े सब दिखावटी नचइया मन जोक्कड़, परी,डांसर मन के रिकार्ड तोड़ देवत हें।।

गर्मी मा बरफ गोला- सार छंद

 गर्मी मा बरफ गोला- सार छंद


गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।

लइका संग सियान खाय बर, हो जाथे झट राजी।।


काड़ी वाले होय बरफ या, रंग रंग के गोला।

रबड़ी कुल्फी बरफ मलाई, देय नियत ला डोला।।

सस्ता होवय या हो महँगा, कइथे सब झन ला जी।

गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।।


आमा गन्ना नीम्बू रस मा, डार बरफ के चूरा।

ठंडा ठंडा मन भर पीले, जिया जुड़ाथे पूरा।।

बरफ संग मा सेवइ कतरी, खा के कहिबे वा जी।

गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।


खुशी हमाथे मन मा भारी, देख बरफ के ठेला।

कोनो ला गर्मी नइ भाये, सब ठंडा के चेला।।

फोकट हे धन बल के गर्मी, जुड़ रख जिया जुड़ा जी।

गजब सुहाथे घाम घरी मा, बरफ बरफ के खाजी।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बुझो तो जाने-दोहा

 बुझो तो जाने-दोहा


करिया रँग के फूल हा, सिर के ऊपर छाय।

गरमी पानी  मा खिले, बाकि समय मिटकाय।1


आघू पाछू बाप माँ, लइका मन हे बीच।

लेजय अपने संग मा, दुरिहा दुरिहा खीच।2


पर के साँसा मा चलय, तन हे लंबा गोल।

छेद गला अउ पेट मा, बोले गुरतुर बोल।3


जुड़वा भाई दास बन, रहे सबे दिन संग।

एक बिना बिरथा दुसर, एक दुनो के रंग।4


खटे सबे एकेक झन, का दिन अउ का रात।

 इंखर सँग दुनिया चले, होवय भाई सात।5


पढ़े लिखे के काम बर, रखय कई झन संग।

नोहे कागज अउ कलम, नोहे कोनो अंग।6


जतिक देर पीये लहू, ततिक देर लै साँस।

ना रक्सा ना देवता, ना हाड़ा ना माँस।।7


तीन पेट दू गोड़ के, जुन्ना एक सियान।

दूसर थेभा मा चले, नइहे तन मा जान।।8


चार गोड़ के बोकरा, बोले ना बतियाय।

चढ़ना चाहे सब मनुष, झगरा घलो कराय।9


रंग बिरंगी छोकरी, मुँह ला रथे उलाय।

झुले झूलना खांध मा, खा पी के मोटाय।10


धरा उपर उल्टा कुँवा, चारो मुड़ा ढँकाय।

भरे सिराये रोज के, दुह दुह सब पी जाय।11


स्वेत रंग के एक ग्रह, जीव रहै जहँ एक।

पिंयर चाँद जल चिपचिपा, हड़पै दनुज अनेक।12


तीन गोड़ के केकड़ा, आलू जादा खाय।

तँउरे खौलत तेल मा, मनुष देख ललचाय।13


लुका जाय अँधियार मा, निकले देख अँजोर।

हरे नकलची बेंदरा, काम आय ना तोर।।14

                        

करिया जंगल मा रथे, करिया रँग के शेर।

सुबे शाम पीये लहू, सहज दिखे नइ फेर।15

                                                

होली मा बिकथौं गजब, शहर लगे ना गाँव।

कथे सखा सुख दुःख के, बता चीज का आँव।16

                         

बित्ता भर के छोकरी, रतिहा बेरा आय।

आग लगा के मूड़ मा, उजियारा फैलाय।17

                         

हवा खाय मोटाय तब, हवा देख उड़ जाय।

हवा चलत हे एखरे, लइकन ला रोवाय।।18

                   

बिना जीव के कोकड़ा, नापे ऊँच अगास।

एक पूँछ हाड़ा दुई, आवय सब ला रास।।19

               

चढ़े रथे जे नाक मा,धरे रथे जे कान।

मजबूरी कतकोन के,ता कतको के शान।20


लइका मा पीयर दिखे,किशोरहा हरियाय।

लाल बुढ़ापा मा लगे,सबके मन ला भाय।21


दुनो हाथ अउ गोड़ मा,रहे सबे दिन संग।

काट  काट सब फेकथे,हरे बदन के अंग।22


जल लाये पाताल ले,भागीरथ कस काम।

सबके प्यास बुझाय जे,का ओखर हे नाम।23


कौड़ी के ना काम के,छोड़े नही ग संग।

मरे कटे नइ वो कभू,रइथे करिया रंग।24


रोजे बिहना माँजथे,आरा ला बत्तीस।

दुई चिराके हो जथे,करे तभो ना रीस।25


हाथ गोड़ दोनों नही,दुनिया तभो घुमाय।

बिन मुँह बाँटे ज्ञान ला,बता चीज का आय।26


जेखर छाती मा चले,मोटर गाड़ी कार।

चुपे चाप जेहर सहे,सबे चीज के भार।27


अपन अपन मा हे मगन,जेला धर सब हाथ।

बाप संग बेटा भिड़े,बबा ठठाये माथ।28


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गर्मी छुट्टी(रोला छंद)

 """"""""गर्मी छुट्टी(रोला छंद)


बन्द हवे इस्कूल,जुरे सब लइका मन जी।

बाढ़य कतको घाम,तभो घूमै बनबन जी।

मजा उड़ावै घूम,खार बखरी अउ बारी।

खेले  खाये खूब,पटे  सबके  बड़ तारी।


किंजरे धरके खाँध,सबो साथी अउ संगी।

लगे जेठ  बइसाख,मजा  लेवय  सतरंगी।

पासा  कभू  ढुलाय,कभू  राजा अउ रानी।

मिलके खेले खेल,कहे मधुरस कस बानी।


लउठी  पथरा  फेक,गिरावै  अमली मिलके।

अमरे आमा जाम,अँकोसी मा कमचिल के।

धरके डॅगनी हाथ,चढ़े सब बिरवा मा जी।

कोसा लासा हेर ,खाय  रँग रँग के खाजी।


घूमय खारे  खार,नहावय  नँदिया  नरवा।

तँउरे ताल मतंग,जरे जब जब जी तरवा।

आमाअमली तोड़,खाय जी नून मिलाके।

लाटा खूब बनाय,कुचर अमली ला पाके।


खेले खाय मतंग,भोंभरा  मा गरमी के।

तेंदू कोवा चार,लिमउवा फर दरमी के।

खाय कलिंदर लाल,खाय बड़ ककड़ी खीरा।

तोड़  खाय  खरबूज,भगाये   तन   के  पीरा।


पेड़ तरी मा लोर,करे सब हँसी ठिठोली।

धरे  फर  ला  जेब,भरे बोरा अउ झोली।

अमली आमा देख,होय खुश घर मा सबझन।

कहे  करे बड़ घाम,खार  मा  जाहू  अबझन।


दाइ ददा समझाय,तभो कोनो नइ माने।

किंजरे  घामे घामे,खेल  भाये  ना आने।

धरे गोंदली जेब,जेठ ला बिजरावय जी।

बर पीपर के छाँव,गाँव गर्मी भावय जी।


झट बुलके दिन रात,पता कोई ना पावै।

गर्मी छुट्टी आय,सबो  मिल मजा उड़ावै।

बाढ़े मया पिरीत,खाय अउ खेले मा जी।

तन मन होवै पोठ,घाम  ला झेले मा जी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

Monday, 14 April 2025

कुकुभ छंद-पिंजरा के पंछी(गीत)

 कुकुभ छंद-पिंजरा के पंछी(गीत)


घर में बैठे देख मनुष ला,पिंजरा के पंछी बोले।

कइसे लगथे बता धँधाये,पाँव पाँख ला बिन खोले।


असकटात हस दू दिन मा तैं,अपने महल अटारी मा।

मन नइ माढ़त हावय तोरे,कुरिया अँगना बारी मा।

बित्ता भरके मोरे पिंजरा,तनमन ला रहिरहि छोले।

घर में बैठे देख मनुष ला,पिंजरा के पंछी बोले----


दाना पानी देके मोला,धाँधे रहितथ तँय रोजे।

अउ कहिथस मैं गावौं गुरतुर,डर दुख जिवरा मा बोजे।

बँधे बँधे पिंजरा मा जिनगी,डगमग डगमग नित डोले।

घर में बैठे देख मनुष ला,पिंजरा के पंछी बोले----


मन मोरो नइ माड़े भैया,पिंजरा के बीच धँधाये।

छूना ऊँच अगास चाहथौं, डेना पंखा फइलाये।

तोर गली मा आफत आ हे,पिंजरा के पंछी होले।

घर में बैठे देख मनुष ला,पिंजरा के पंछी बोले--


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Saturday, 12 April 2025

गीत-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया" का तोला परघाँव(सरसी छ्न्द)

 गीत-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


का तोला परघाँव(सरसी छ्न्द)


का तोला परघाँव भवानी, का तोला परघाँव।

कोरोना हे काल बरोबर, घड़ी घड़ी घबराँव।।


चहल - पहल नइहे मंदिर मा, नइहे तोरन ताव।

डर हे बस अन्तस् के भीतर, भक्ति हवै ना भाव।

जिया बरत हे बम्बर मोरे, कइसे जोत जलाँव।

का तोला परघाँव भवानी, का तोला परघाँव।


मनखे मनखे ले दुरिहागे, खोगे सब सुख चैन।

लइका संग सियान सबे के, बरसत हावै नैन।

मातम पसरे हवै देख ले, शहर लगे ना गाँव।

का तोला परघाँव भवानी, का तोला परघाँव।


जियई मरई एक्के लागे, होवय हाँहाकार।

रक्तबीज कस बढ़े कोरोना, लेके आ अवतार।

आफत भारी हवै टार दे,परौं तोर मैं पाँव।

का तोला परघाँव भवानी, का तोला परघाँव।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 4 April 2025

नवरात्रि(कज्जल छंद)



 नवरात्रि(कज्जल छंद)

लागे महिना,हे कुँवार।

बोहावत हे,भक्ति धार।

सजा दाइ बर,फूल हार।

सुमिरन करके,बार बार।


महकै अँगना,गली खोल।

अन्तस् मा तैं,भक्ति घोल।

जय माता दी,रोज बोल।

मनभर माँदर,बजा ढोल।


सबे खूँट हे,खुशी छाय।

शेर सवारी,चढ़े आय।

आस भवानी,हा पुराय।

जस सेवा बड़,मन लुभाय।


पबरित महिना,हरे सीप।

मोती पा ले,मोह तीप।

घर अँगना तैं,बने लीप।

जगमग जगमग,जला दीप।


माता के तैं,रह उपास।

तोर पुराही,सबे आस।

आही जिनगी,मा उजास।

होही दुख अउ,द्वेष नास।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा