Monday, 14 July 2025

गरमी मा ताल नदी-सार छंद

 गरमी मा ताल नदी-सार छंद


देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।

चटचट जरथे चारो कोती, जुड़ जल जिया लुभाथे।।


 पार पाय नइ नल अउ बोरिंग, नदिया अउ तरिया के।

भेदभाव नइ करे ताल नद, गुरिया अउ करिया के।।

का जवान लइका सियान सब, डुबकी मार नहाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।।


कोनो कूदे कानों तँउरे, कोनो डुबकी मारे।

तन के कतको रोग घलो हा, डुबकत तँउरत होरे।

बुड़े बुड़े पानी के भीतर, कतको बेर पहाथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


लहरा होथे गहरा होथे, डर रहिथे बड़ भारी।

 नइ जाने तँउरें बर तउने, मारे झन हुशियारी॥ 

जीव जंतु तक के ये डेरा, काम सबे के  आथे।

देख घाम मा नदिया तरिया, सबके मन ललचाथे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

आगे का मानसून(गीत)

 आगे का मानसून(गीत)  


बुलके नइहें मई घलो हा, लागे नइहें जून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


नवतप्पा मा चप्पा चप्पा, माते हावय गैरी।

टुहूँ देखाये कस लागत हे, ये बादर बन बैरी।।

कोई बतावव करहूँ बाँवत, खाके बासी नून।।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


होरी हरिया संसो मा हें, नाँगर धरै कि पेरा।

घर अउ खेत के काम बचे हे, काँपे आमा केरा।।

उमड़त घुमड़त देख बदरा ला, अँउटत हावय खून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


साँप सुते नइ हावय मन भर, बतर किरी हे बौना।

कांदी कुल्थी नार लमेरा, जागे तुलसी दौना।।

हरियर होवत हवै धरा, पुरवा छेड़य धून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद

 चौमास मा बिजुरी के डर-हरिगीतिका छंद


पानी गिरे चौमास मा, बादर करे गड़गड़ गजब।

जिवरा डरे सुनके अजब, बिजुरी गिरे कड़कड़ गजब।


छाये घटा घनघोर अउ, टकराय घन आगास मा।

बिजुरी गिरे के डर रथे, चारो डहर चौमास मा।।


का जानवर अउ का मनुष, सब बर बिजुरिया काल हे।

घर बन घलो जाथे उजड़, बिजुरी बिकट जंजाल हे।।


गिरही कते कोती बिजुरिया, ये समझ मा आय ना।

फोकट मरे झन पेड़ पउधा ना मनुष गरु गाय ना।।


खींचे बिजुरिया ला अपन कोती सुचालक चीज हर।

रहिथे तड़ित चालक जिहाँ तौने सुरक्षित गाँव घर।।


यमराज बनके गिर जथे, अउ प्राण ला लेथे झटक।

पानी गिरत रहिथे गजब ता, बाग बन मा झन भटक।।


बादर गजब गर्जन करे तब, टेप टीवी बंद रख।

नित होश मा रहि काम कर, मुख मा कहानी छंद रख।।


बाहिर हवस ता बैठ उखड़ू, मूंद के मुँह कान ला।

रख जानकारी सावधानी अउ बचाले जान ला।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

हरेली हरियर हरियर

 हरेली हरियर हरियर 


दिखे खेत-खार हरियर।

 डोंगरी पहाड़ हरियर ।

 मन   होगे   बरपेली, हरियर -हरियर।

 आय हे हरेली, हरियर-हरियर।।


 खोंच लेना डारा , निमवा के डेरउठी म। 

चढ़ के देख एक घांव, गेड़ी के पंऊठी  म।

 बड़ मजा आही, मन ह हरसाही।

 नहा-खोर हुम दे दे, पानी फरिहर-फरिहर।।।। 

आय हे हरेला...........।


 हे थारी म चीला, जुरे हवय माई-पिला। 

धोके नांगर-जुड़ा। गेड़ी मचे टुरा। 

माड़े टँगिया-बसला आरी। 

चढ़े पान फूल-सुपारी। 

चढ़ा बंदन-चन्दन, फोड़ ठक-ठक नरियर।।।। 

आय हे हरेला...........। 


हे महुतुर तिहार के, संसो-फिकर ल टार के। 

मानव धरती दाई ल, डारा-पाना रुख-राई ल। 

थेभा मा किसानी के सरी चीज हर।।

 आय हे...........।    


    जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"       

   बाल्को(कोरबा)

गुरु-कुंडलियाँ

 गुरु-कुंडलियाँ


होवै गुरुवर के कृपा, बाढ़ै तब गुण ज्ञान।

चेला के चरचा चले, पावै यस जस मान।।

पावै यस जस मान,गुणी अउ ज्ञानी बनके।

पा गुरु के आशीष,चलै नित चेला तनके।।

देख जगत इतिहास, बिना गुरु ज्ञानी रोवै।

गुरु हे जेखर तीर, ओखरे यस जस होवै।।


दुरगुन ला दुरिहा करे, मार ज्ञान के तीर।

बड़े कहाए देव ले, गुरु ए गंगा नीर।।

गुरु ए गंगा नीर, शरण आये ला तारे।

अँधियारी दुरिहाय, ज्ञान के जोती बारे।।

बने ठिहा के नेंव, सबर दिन छेड़े सत धुन।

जे घट गुरु के वास, तिहाँ ले भागे दुरगुन।।


गुरु के गुण अउ ज्ञान ले, खुलै शिष्य के भाग।

जगा शिष्य ला नींद ले, धोय चरित के दाग।।

धोय चरित के दाग, हाथ चेला के धरके।

चेला होय सजोर, सहारा पा गुरुवर के।।

हाँकिस जीवन डोर, कृष्ण बल पार्थ पुरु के।

महिमा अपरंपार, जगत मा हावै गुरु के।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




घर की नाली जाम है, और कोसी की बात कर रहे हो।

चाटुकारिता में जुबान है और सरफ़रोशी की बात कर रहे हो।

बाप ही कातिल है, जमाने का, यह जानते हो फिर भी,

दोषी में लिस्ट में पड़ोसी की बात कर रहे हो।।

बरसात और महँगाई

 बरसात और महँगाई


प्रकृति समस्त जीवों की जीवनदायिनी है। यदि हम सब मनुष्य उसके नियमों का सम्मान करते हुए समरस जीवन व्यतीत करे, और उसे हानि न पहुँचाये तो निःसंदेह हमारा जीवन सुखमय, संतुलित और समृद्ध हो सकता है। किंतु हमारी अतृप्त लालसा, भौतिकता की दौड़ और स्वार्थपरक दृष्टिकोण के कारण हम निरंतर प्रकृति का दोहन  कर रहे हैं। परिणामस्वरूप हमें विभिन्न त्रासदियों और आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है—कहीं विनाशकारी बाढ़, कहीं अकाल-सूखा, तो कहीं प्रचंड तूफान। ये सब प्रकृति में उत्पन्न असंतुलन के दुष्परिणाम हैं, और उही असंतुलन कई समस्याओं को जन्म देती है। उनमें से एक समस्या है,महँगाई। जो बरसात ऋतु में अपेक्षाकृत बढ़ जाती है, और यह महँगाई ज्यादातर खाने पीने के वस्तुओं से सम्बंधित रहती है। क्योकि बारिश के समय पानी के चलते साग सब्जियों के फसल नष्ट हो जाते हैं। 


            जब प्रकृति संतुलित रहती है, तो वह किसी भी प्राणी को जीवन-आवश्यक वस्तुओं की कमी नहीं होने देती। वर्षा ऋतु इसका उत्तम उदाहरण है। पहली वर्षा की फुहार के साथ ही धरती की गोद में सोए हुए बीज जागृत होकर अंकुरित होते हैं, और निरंतर जल-प्राप्ति से धीरे-धीरे फैलते व फलीभूत होते हैं। वर्षा ऋतु में पेड़ पौधे खूब बढ़ते है। चहुँओर हरियाली नजर आती है। नदी, ताल, कुआँ, बावली अपने पूर्ण रूप में होते है। दादुर, मोर, पपीहा वर्षा ऋतु में खूब गाते नाचते हैं। कई लोग बरसात के दिनों में पानी से परेशान रहते है, वहीं कृषक वर्ग खेतों में काम करते हुए कर्मा, ददरिया की तान छेड़ते है। इस समय न केवल पशुओं के लिए चारागाह की सुविधा होती है, बल्कि मनुष्यों को भी बिना किसी श्रम के स्वमेव उगने वाली साग-भाजियाँ प्राप्त होती हैं। छत्तीसगढ़ में ऐसे स्वतः उगने वाले पौधों और बेलों को "लमेरा" कहा जाता है—जो वर्षा ऋतु में ग्रामीण जीवन की पोषण-आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इनमें चरोटा, जरी, बर्रे, पोई, खोटनी जैसी भाजी के साथ-साथ पिहरी, करील और पुटू जैसी कंद-मूल भी आती हैं, जो स्वाद और पोषण दोनों में समृद्ध होती हैं। साथ ही, पेड़ों के कोमल पत्ते जैसे इमली, बोहार, कोईलार आदि भी इस मौसम में लाभदायक साग के रूप में उपयोग किए जाते हैं।  बारिश के मौसम में खेकसी, करेला, कुंदरू भी खूब फैलते हैं, और फलते हैं। ये सब बरसात में साग भाजी के रूप में काम आते है। पर आज के समय में आधुनिकीकरण और विकास की दौड़ ने शहरों के साथ-साथ गांवों की भी हरियाली और खाली स्थानों को निगल लिया है। कारखाने, सड़कों, पुलों, ऊँचे टावरों की प्रतिस्पर्धा में ऐसी भूमि का अभाव हो गया है जहाँ प्रकृति स्वतंत्र रूप से पनप सके। न खेत बच पा रहा है, और न ही ब्यारा, बाड़ी। जब प्रकृति स्वयं ही अपने अस्तित्व को बचा पाने में असमर्थ हो, तो वह जीवन को भोजन देने की शक्ति भी खो देती है।


इस असंतुलन का दुष्परिणाम महंगाई, खाद्य संकट और पारिस्थितिक संकट के रूप में सामने आता है।मनुष्य प्रकृति से दूर होते हुए, बाजार-निर्भर हो गया है, जहाँ व्यापारी केवल लाभ के उद्देश्य से कार्य करते हैं। वे जन-संकट का लाभ उठाकर साग-सब्जियों के दाम बढ़ा देते हैं। लेकिन जो प्रकृति के समीप रहते हैं, उन्हें ऐसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता; क्योंकि वे लमेरा और अन्य साग-भाजियों को सहज रूप से प्राप्त कर लेते हैं।


              बरसात में जब नदी-नाले उफान पर होते हैं, तब मछलियाँ भी बृहद मात्रा में दिखाई देने लगती हैं, जो मांसाहारी लोगों के लिए भोजन का स्रोत बन जाती हैं। पहले की पीढ़ियाँ, जैसे दीदी-नानी आदि, साग-सब्जियों को सुखाकर वर्षा में उपयोग के लिए संग्रहित करती थीं। आज की पीढ़ी ने यह परंपरा लगभग छोड़ दी है, जिससे हमें पूर्णतः बाजार की महँगी वस्तुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में वही प्राकृतिक उपहार—पिहरी, पुटू, करील—जो कभी सहज उपलब्ध थे, ऊँचे दामों में बिकते हैं। यह प्रकृति से दूरी और हमारी सुविधाभोगी मानसिकता का परिणाम है।


प्रकृति सदैव हमें सिखाती है कि जब हम उसके नियमों का सम्मान करते हैं, तो वह हमारी हर आवश्यकता की पूर्ति करती है। लेकिन जब हम स्वार्थ और लालसा में डूब जाते हैं, तो वही प्रकृति संतुलन बिगाड़ देती है। प्रकृति से जितने हम दूर होंगें ,उतने ही ज्यादा दुख भी झेलेंगें। इसलिए हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हुए चलना चाहिए। पेड़ पौधों को नही काटना चाहिए, ज्यादा से ज्यादा खेत, मैदान, बाग-बगीचा,बाड़ी-ब्यारा, ताल नदी व बांधों आदि के संरक्षण में कार्य करना चाहिए। यदि हम प्रकृति को पोसेंगे तो निःसन्देह वह हमें पोसेंगी, और यदि हम नष्ट करेंगे टी हमारा भी विनाश सुनिश्चित है।


बरसात और महँगाई


प्रकृति समस्त जीवों की जीवनदायिनी है। यदि हम मनुष्य उसके नियमों का सम्मान करते हुए समरस जीवन व्यतीत करें और उसे हानि न पहुँचाएँ, तो निःसंदेह हमारा जीवन सुखमय, संतुलित और समृद्ध हो सकता है। किंतु हमारी अतृप्त लालसा, भौतिकता की दौड़ और स्वार्थपरक दृष्टिकोण के कारण हम निरंतर प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। परिणामस्वरूप हमें विभिन्न त्रासदियों और आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है—कहीं विनाशकारी बाढ़, कहीं अकाल-सूखा, तो कहीं प्रचंड तूफान। ये सब प्रकृति में उत्पन्न असंतुलन के दुष्परिणाम हैं, और यही असंतुलन कई समस्याओं को जन्म देता है। उनमें से एक समस्या है महँगाई, जो बरसात ऋतु में अपेक्षाकृत बढ़ जाती है। यह महँगाई अधिकतर खाने-पीने की वस्तुओं से संबंधित होती है, क्योंकि बारिश के समय पानी के चलते साग-सब्जियों की फसलें नष्ट हो जाती हैं।


जब प्रकृति संतुलित रहती है, तो वह किसी भी प्राणी को जीवन-आवश्यक वस्तुओं की कमी नहीं होने देती। वर्षा ऋतु इसका उत्तम उदाहरण है। पहली फुहार के साथ ही धरती की गोद में सोए हुए बीज जागृत होकर अंकुरित होते हैं, और निरंतर जल-प्राप्ति से धीरे-धीरे फैलते व फलीभूत होते हैं। वर्षा में पेड़-पौधे खूब बढ़ते हैं, चहुँओर हरियाली नजर आती है। नदी, ताल, कुआँ, बावली अपने पूर्ण रूप में होते हैं। दादुर, मोर, पपीहा वर्षा में खूब गाते-नाचते हैं। कई लोग बरसात के दिनों में पानी से परेशान रहते हैं, वहीं कृषक वर्ग खेतों में काम करते हुए कर्मा, ददरिया की तान छेड़ते हैं। इस समय न केवल पशुओं के लिए चारागाह की सुविधा होती है, बल्कि मनुष्यों को भी बिना किसी श्रम के स्वमेव उगने वाली साग-भाजियाँ प्राप्त होती हैं।


छत्तीसगढ़ में ऐसे स्वतः उगने वाले पौधों और बेलों को लमेरा कहा जाता है, जो ग्रामीण जीवन की पोषण-आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। इनमें चरोटा, जरी, बर्रे, पोई, खोटनी जैसी भाजी के साथ-साथ पिहरी, करील और पुटू जैसे कंद-मूल भी शामिल हैं, जो स्वाद और पोषण दोनों में समृद्ध होते हैं। पेड़ों के कोमल पत्ते जैसे—इमली, बोहार, कोईलार—भी इस मौसम में लाभकारी साग के रूप में उपयोग में आते हैं। बरसात में खेकसी, करेला, कुंदरू खूब फैलते हैं और फलते हैं, जो स्थानीय भोजन व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं।


किन्तु आज के समय में आधुनिकीकरण और विकास की दौड़ ने शहरों के साथ-साथ गाँवों की हरियाली और खाली स्थानों को भी निगल लिया है। कारखानों, सड़कों, पुलों और ऊँचे टावरों की प्रतिस्पर्धा में प्रकृति के पनपने के लिए भूमि का अभाव हो गया है। न खेत बच पा रहा है, न ही ब्यारा, बाड़ी। जब प्रकृति स्वयं ही अपने अस्तित्व को बचा पाने में असमर्थ हो जाती है, तो वह अन्य जीवों को भोजन देने की शक्ति भी खो देती है।


इस असंतुलन का दुष्परिणाम महँगाई, खाद्य संकट और पारिस्थितिक विषमता के रूप में सामने आता है। मनुष्य प्रकृति से दूर होता चला गया है, और बाजार-निर्भर बन गया है, जहाँ व्यापारी केवल लाभ की दृष्टि से कार्य करते हैं। वे जन-संकट का लाभ उठाकर साग-सब्जियों के दाम बढ़ा देते हैं। लेकिन जो प्रकृति के समीप रहते हैं, उन्हें ऐसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता; क्योंकि वे लमेरा और अन्य वनस्पतियों को सहज रूप से प्राप्त कर लेते हैं।


बरसात में जब नदी-नाले उफान पर होते हैं, तब मछलियाँ बड़ी मात्रा में दिखाई देती हैं, जो मांसाहारी लोगों के लिए भोजन का स्रोत बन जाती हैं। पहले की पीढ़ियाँ—जैसे दीदी, नानी आदि—साग-सब्जियों को सुखाकर वर्षा में उपयोग हेतु संग्रहित करती थीं। आज की पीढ़ी ने यह परंपरा लगभग छोड़ दी है, जिससे हमें पूर्णतः बाजार की महँगी वस्तुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में वही प्राकृतिक उपहार—पिहरी, पुटू, करील—जो कभी सहज उपलब्ध थे, अब ऊँचे दामों में बिकते हैं। यह प्रकृति से दूरी और हमारी सुविधाभोगी मानसिकता का परिणाम है।


प्रकृति सदैव सिखाती है कि जब हम उसके नियमों का सम्मान करते हैं, तो वह हमारी हर आवश्यकता की पूर्ति करती है। लेकिन जब हम स्वार्थ और लालसा में डूब जाते हैं, तो वही प्रकृति अपना संतुलन बिगाड़ देती है। प्रकृति से जितने हम दूर होंगे, उतने ही ज्यादा दुख भी झेलेंगे। अतः हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हुए चलना चाहिए। पेड़-पौधों को नहीं काटना चाहिए, बल्कि खेत, मैदान, बाग-बगिचा, बाड़ी-ब्यारा, ताल-नदी और बाँधों के संरक्षण में सक्रिय कार्य करना चाहिए। यदि हम प्रकृति को पोषित करेंगे, तो निःसंदेह वह भी हमें पोषित करेगी; किंतु यदि हम उसे नष्ट करेंगे, तो हमारा भी विनाश निश्चित होगा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

लोकगीत-सरसी छंद गीत

 लोकगीत-सरसी छंद गीत


लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।

सुआ ददरिया कर्मा पंथी, करे जिया मा राज।।


बोह भोजली बेटी माई, लहर तुरंगा गाँय।

थपड़ी पिट पिट सुआ नाचके, सबके जिया लुभाँय।।

बर बिहाव अउ पंथी जस के, मनभावन अंदाज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


दरद भुलाके छेड़ ददरिया, बूता करें किसान।

नाचें कर्मा ताल मा झुमके, लइका संग सियान।।

सवनाही साल्हो अउ डंडा, जतरा धनकुल साज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


बाँस पंडवानी दोहा मा, कथा कथन भरमार।

ढोलामारू लोरिक चंदा, फागुन फाग बहार।।

नगमत गौरा खेल गीत मा, झूमें सरी समाज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


सोहर लोरी भजन भर्थरी, बाँटे भरभर प्रीत।

जनम बिहाव परब अउ ऋतु के, अबड़ अकन हे गीत।।

गायें गाना छत्तीसगढ़िया, करत अपन सब काज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)