Wednesday, 3 June 2026

कुंडलियाँ-भीड़

 कुंडलियाँ-भीड़ 


बाबा मन हा बाप कस, देवत हें उपदेश।

धरम करम मुक्ति कहि, होय मनुष मन पेश।

होय मनुष मन पेश, भीड़ के हिस्सा बनके।

भीड़ भाड़ ला देख, चले बाबा मन तनके।।

बिना भीड़ नइ होय, मदीना काशी काबा।

जाति धरम के नाम, सबे कोती हे बाबा।।


झंडा डंडा भीड़ बिन, मान कहाँ ले पाय।

बने बने मा हे बने, गिनहा मा हे बाय।।

गिनहा मा हे बाय, भीड़ हा भेड़ ताय जी।

सहमति साथ विरोध, सबे बर भीड़ आय जी।

मेला नेता खेल, संत राजा का पंडा।

सब ला चाही भीड़, भीड़ हे ता हे झंडा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

विश्व पर्यावरण दिवस मा

 विश्व पर्यावरण दिवस मा


छींद-जयकारी छंद


कमती कहाँ खजूर ले, हमर गांव के छींद।

गर्मी के फर ये हरे, खाके भाँजव नींद।।


गुण ला सुन उड़ जाही नींद। एक पेड़ जेला कहिथे छींद।।

छींद पेड़ के गुण अउ राज। मोर कलम बरनत हे आज।।


जागे अउ बाढ़े बिन बोय। पात फोंक काँटा कस होय।।

इही गांव के हरे खजूर। खाये हँस किसान मजदूर।।


नरिया नरवा नदी कछार। खेत खार सँग मेड़उ पार।।

रथे छींद के झुँझकुर झाड़। सहत घाम पानी अउ जाड़।।


एक तना मा बाढ़े सोझ। कई मुरख मन माने बोझ।।

काटे कहि नइ आये काम। जाने तेमन पाये दाम।।


चटई बहरी शादी मौर। बिना छींद नइ हाँसे ठौर।।

माटी घर के बन रखवार। रोके बरसा घरी झिपार।।


आय पँदोली दै के काम। एखर कुँदरा दै आराम।।

गाड़ा के टट्टा बन जाय। पहिर बबा कलगी मुस्काय।।


चलत फिरत उद्योग कुटीर। छाये रहे छींद सब तीर।।

छींद रसा तक बड़ मन भाय। गुड़ अउ शक्कर घलो मिठाय।।


छींद गबौती जौने खाय। खेवन खेवन खाय ललाय।।

पाके फर के नही जवाब। खाये ते बन जाय नवाब।।


बैरी काँटा देख डराय। ठिहा छींद मा बया बनाय।।

खग के करलव जिया लुभाय। छतरी जइसन छींद सुहाय।।


पूरा के पानी ला सोख। सींचे धरती दाई कोख।

वाटर लेबल घलो बढ़ाय। नाइट्रोजन जर हा गठियाय।।


बाँध रखे माटी के कोर। जर जइसे रेशम के डोर।।

माटी ला उपजाउ बनाय। सखा किसनहा के ये आय।।


पाना बाजे चटचट खूब। खेले लइका मन हा डूब।।

खेलत बनथे छींद डँगाल। उल्हवा पाना लगे कमाल।।


सुक्खा लकड़ी पाना डार। बने पठउँहा पाठ मियार।।

बनथे सजावटी सामान। मनुष आज के हें अंजान।।


हवा दवा फर लकड़ी देय। खड़े खड़े पर जिनगी सेय।।

धरे काठ मा झटकुन आग। पानी घलो बिगाड़ै राग।।


छिंदवाड़ा छिंदई कस गांव। धरे छींद के कारण नांव।।

पारा मोहल्ला बन खार। छींद नाम ले परे गुहार।।


छिंदी कांदा फर जर पान। देय जीव ला जीवनदान।।

नित डँट पर्यावरण बचाय। दूत प्रकृति के छींद आय।।


सबके अलग महत्त्व हें, होय कइसनों पेड़।।

छींद लगावव जान गुण, रिता रहे झन मेड़।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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जंगल बचाओ-सरसी छन्द


पेड़ लगावव पेड़ लगावव, रटत रथव दिन रात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


हवा दवा फर फूल सिराही, मरही शेर सियार।

हाथी भलवा चिरई चिरगुन, सबके होही हार।

खुद के खाय कसम ला काबर, भुला जथव लघिनात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जंगल हे तब जुड़े हवय ये, धरती अउ आगास।

जल जंगल हे तब तक हावै,ये जिनगी के आस।

आवय नइ का लाज थोरको, पर्यावरण मतात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


सड़क खदान शहर के खातिर, बन होगे नीलाम।

उद्योगी बैपारी फुदकय, तड़पय मनखे आम।

लानत हे लानत हव घर मा, आफत ला परघात।

जंगल के जंगल उजड़त हे, काय कहँव अब बात।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

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**पेड़: न उजाड़ो**  


न उजाड़ो धरती के धन को,

हो सके तो बढ़ाओ वन को।।


बाग-बगीचे, फूल-पौधे,

लुभाते हैं सबके मन को।।


जीवन को खुशहाल बनाते,

निरोग रखते हैं तन को।।


तपती धूप में छाँव देते,

लाते हैं वन-घन को।।


रक्षा का स्वयं संकल्प लो,

समझाओ सभी जन को।।


पेड़ लगाकर पुण्य कमाओ,

धन्य करो जीवन को।।


      जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

                बालको कोरबा

 विश्व परियावरण दिवस की ढेरो बधाई💐💐💐💐💐

हिरदय- सार छंद

 विश्व हिरदय दिवस म


हिरदय- सार छंद


धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।

हिरदे हावय मानुष भीतर, दुनिया तभे पलत हे।।


जे हिरदय ए कठवा पथरा, दया मया नइ जाने।

हिरदय मोम बरोबर होथे, देय इही पहिचाने।।

बरफ बरोबर गलत गलत हे, सँच सत फुलत फलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


तन के ए आधार इही हा, हाव भाव के दाता।

हिरदय हावय तब तक हावय, जनम जनम जग नाता।।

ईर्ष्या द्वेष हवे जे हिरदय, वो तन भभक जलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


खाना पीना सोना गाना, काम धाम सब चंगा।

स्वस्थ रथे वो हिरदय सब दिन, बहिथे बनके गंगा।

हिरदय रो ना हाँस सकत हे, स्वारथ लोभ छलत हे।

धड़कत हावय हिरदय जब तक, तब तक साँस चलत हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Tuesday, 2 June 2026

गीत गाँबों

 गीत गाँबों


घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।

दुःख दरद डर द्वेष मिटाके, लेबों मन ला जीत।


कोई सुलगे भीतर भीतर, कोई कहय लबारी।

कोई देखय गुर्री गुर्री, कोई देवय गारी।

भभकत इरखा मा पिरीत के, पानी देबों छीत।।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत----।


रोज डराय डरे ला सबझन, अउ हराय हारे ला।

मया करइया नइहे कोई, दँउड़े सब मारे ला।

मनखे मनखे ला मिलवाक़े, बधवाबों चल मीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


गिरे थके हारे हपटे ला, देबों चलव पँदोली।

कोन काय करना चाहत हे, सबके जिया टटोली।

मनुष होय के फरज निभाबों, बदल बुरा गत रीत।

घूम घूम के चारो कोती, गाबों गुरतुर गीत।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

मनखे मन के करनी के फल- सार छंद

 मनखे मन के करनी के फल- सार छंद


छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।

फल ला भोगत हावँय फोकट, मनखें के करनी के।।


चिरई चिरगुन मरैं घाम मा, नइहे पेड़उ पानी।

लहकत हावँय बानर भालू, हलाकान जिनगानी।

बोहय बन विकास के गंगा, धारा बैतरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


धरती दाई के छाती मा, छड़ सीमेन्ट छभागे।

माटी के सेउक मन मरगे, उद्योगी हरियागे।।

इंच इंच ला चाँट खात हें, चटनी कस बरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


आज जनम धर काली मरगे, जीव जंतु मन कतको।

कोनो जुग मा नइ देखें हन, निरदई मनखें अतको।।

स्वारथ बर सरलग माते हे, लूट पाट धरनी के।

छोट बड़े सब जीव जंतु बर, बेरा हे मरनी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)

 गीत-अमरइया मा जाबों(सार छन्द)


चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।

दाई अँचरा कस जुड़ छइहाँ, ओढ़ ओढ़ इतराबों।


पवन धूकथे पंखा रहि रहि, सुरुज देव बिजराथे।

छमछम नाचय पाना डारा, गीत कोयली गाथे।

ढेला फेक गिराबों आमा, मिलजुल के सब खाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गरमी घरी तको जुड़ रहिथे, अमरइया के छइहाँ।

जिहाँ पहुँच सब खेल खेलबों, जोर सबे झन बइहाँ।

आम तरी मा बाँध झूलना, झुलबों अउ झूलाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


बइहाँ जोड़े पेड़ खड़े हे, सहि जुड़ बादर पानी।

हवा दवा फल फूल लुटाथे, सबदिन बनके दानी।

ठिहा ठौर हे जीव जंतु के, देख देख हरसाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


गली खोर घर खेत खार सँग, साथी ताल तलैया।

गिल्ली डंडा बाँटी भँवरा, के हम सब खेलैया।।

चंदन जइसे धुर्रा माटी, माथा तिलक लगाबों।

चलो सँगी खेले बर खुडुवा,अमरइया मा जाबों।


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

आगे का मानसून(गीत)

 आगे का मानसून(गीत)  


बुलके नइहें मई घलो हा, लागे नइहें जून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


नवतप्पा मा चप्पा चप्पा, माते हावय गैरी।

टुहूँ देखाये कस लागत हे, ये बादर हर बैरी।।

कोई बतावव करहूँ बाँवत, खाके बासी नून।।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


होरी हरिया संसो मा हें, नाँगर धरै कि पेरा।

घर अउ खेत के काम बचे हे, काँपे आमा केरा।।

उमड़त घुमड़त देख बदरा ला, अँउटत हावय खून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


साँप सुते नइ हावय मन भर, बतर किरी हे बौना।

कांदी कुल्थी नार लमेरा, जागे तुलसी दौना।।

हरियर होवत हवै धरा, पुरवा छेड़य धून।

रझरझ रझरझ बरसे पानी, आगे का मानसून।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)