Monday, 9 September 2019

आल्हा छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"



आल्हा छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

जय गजानन महाराज(गीत)

मुस्कावै गजराज गजानन,मुसुर मुसुर मुसवा के संग।
गली गली घर खोर म बइठे,घोरय दया मया के रंग।

तोरन ताव तने सब तीरन,चारो कोती होवै शोर।
हूम धूप के धुँवा उड़ावै,बगरै सब्बो खूँट अँजोर।
लइका लोग सियान जमे के,मन मा छाये हवै उमंग।
मुस्कावै गजराज गजानन,मुसुर मुसुर मुसवा के संग।

संझा बिहना होय आरती,चढ़े रोज लड्डू के भोग।
करै कृपा देवाधी देवा,भागे दुख विपदा जर रोग।
चार हाथ मा शोभा पावै,बड़े पेट मुख हाथी अंग।
मुस्कावै गजराज गजानन,मुसुर मुसुर मुसवा के संग।

होवै जग मा पहिली पूजा,सबले बड़े कहावै देव।
ज्ञान बुद्धि बल धन के दाता,सिरजावै जिनगी के नेव।
भगतन मन ला पार लगावै,दुष्टन मन करे ग तंग।
मुस्कावै गजराज गजानन,मुसुर मुसुर मुसवा के संग।

छंदकार-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)

Monday, 2 September 2019

सार छंद-आजा सजन(गीत)

आजा सजन(गीत)

दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।
लक्ष्मण रेखा लाँघत हावै, घर घर बइठे रावन।

घड़घड़ गरजे चमचम चमके, बादर घेरी बेरी।
का हो जाही कोन घड़ी मा, फड़के आँखी डेरी।
कइसे जिनगी मोर पहाही, संसो लागे खावन।
दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।

देखत देखत मोर सजन ला, नाड़ी हाथ जुड़ागे।
डंक साँप बिच्छू नइ मारे, काठ समझ के भागे।
सजन बिना बन बाग बगीचा, नइ लागे मनभावन।
दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।

नजर गड़त हे कतको झन के, देख अकेल्ला मोला।
आस लगा बिहना मैं जीथौं, साँझ मरे नित चोला।
नैन मुँदावय गला सुखावय, चेत लगे छरियावन।
दउहा नइहे मोर सजन के, बीतत हावै सावन।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)छत्तीसगढ़

Saturday, 31 August 2019

पोरा तिहार



कुकुभ छंद-जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।
राँध ठेठरी खुरमी भजिया,करे हवै सबझन जोरा।

भादो मास अमावस के दिन,पोरा के परब ह आवै।
बेटी माई मन हा ये दिन,अपन ददा घर सकलावै।
हरियर धनहा डोली नाचै,खेती खार निंदागे हे।
होगे हवै सजोर धान हा,जिया उमंग समागे हे।
हरियर हरियर दिखत हवै बस,धरती दाई के कोरा।
सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।1

मोर होय पूजा नइ कहिके,नंदी बइला हा रोवै।
भोला तब वरदान ल देवै,नंदी के पूजा होवै।
तब ले नंदी बइला मनके, पूजा होवै पोरा मा।
सजा धजा के भोग चढ़ावै,रोटी पीठा जोरा मा।
पूजा पाठ करे मिल सबझन,सुख पाये झोरा झोरा।
सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।2

कथे इही दिन द्वापर युग मा,पोलासुर उधम मचाये।
मनखे तनखे बइला भँइसा,सबझन ला बड़ तड़पाये।
किसन कन्हैया हा तब आके,पोलासुर दानव मारे।
गोकुलवासी खुशी मनावै,जय जय सब नाम पुकारे।
पूजा ले पोरा बइला के,भर जावय उना कटोरा।
सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।3

दूध भराये धान म ये दिन,खेत म नइ कोनो जावै।
परब किसानी के पोरा ये,सबके मनला बड़ भावै।
बइला मनके दँउड़ करावै,सजा धजा के बड़ भारी।
पोरा परब तिहार मनावय,नाचय गावय नर नारी।
खेले खेल कबड्डी खोखो,नारी मन भीर कसोरा।
सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।4

बाबू मन बइला ले सीखे,महिनत अउ काम किसानी
नोनी मन पोरा जाँता ले,होवय हाँड़ी के रानी।
पूजा पाठ करे बइला के,राखै पोरा मा रोटी।
भरे अन्न धन सबके घर मा,नइ होवै किस्मत खोटी।
परिया मा मिल पोरा पटके,अउ पीटे बड़ ढिंढोरा।
सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।5

सुख समृद्धि धन धान्य के,मिल सबे मनौती माँगे।
दुःख द्वेष ला दफनावै अउ,मया मीत ला उँच टाँगे।
धरती दाई संग जुड़े के,पोरा देवय संदेशा।
महिनत के फल खच्चित मिलथे,नइ तो होवै अंदेशा।
लइका लोग सियान सबे झन,पोरा के करै अगोरा।
सजे हवे माटी के बइला,माटी के जाँता पोरा।6

छंदकार-जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"
पता-बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)

पोरा(ताटंक छंद)

बने हवै माटी के बइला,माटी के पोरा जाँता।
जुड़े हवै माटी के सँग मा,सब मनखे मनके नाँता।

बने ठेठरी खुरमी भजिया,बरा फरा अउ सोंहारी।
नदिया बइला पोरा पूजै, सजा आरती के थारी।

दूध धान मा भरे इही दिन,कोई ना जावै डोली।
पूजा पाठ करै मिल मनखे,महकै घर अँगना खोली।

कथे इही दिन द्वापर युग मा,कान्हा पोलासुर मारे।
धूम मचे पोला के तब ले,मनमोहन सबला तारे।

भादो मास अमावस पोरा,गाँव शहर मिलके मानै।
हूम धूप के धुँवा उड़ावै,बेटी माई ला लानै।

चंदन हरदी तेल मिलाके,घर भर मा हाँथा देवै।
धरती दाई अउ गोधन के,आरो सब मिलके लेवै।

पोरा पटके परिया मा सब,खो खो अउ खुडुवा खेलै।
संगी साथी सबो जुरै अउ,दया मया मिलके मेलै।

बइला दौड़ घलो बड़ होवै,गाँव शहर मेला लागै।
पोरा रोटी सबघर पहुँचै,भाग किसानी के जागै।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया",
 बाल्को(कोरबा)

Monday, 29 July 2019

जब एक राय होही

2212 122 2212 122
बूता बने तहूँ हा करबे त काय होही।
गिनहा डहर कहूँ तैं धरबे त बाय होही।1

रोटी ले जेन खेले अउ भेदभाव मेले।
फोकट लगाय नारा वो का भुखाय होही।2

तैं मार पीट करबे संसो फिकर मरबे।
खाके कसम मुकरबे तब हाय हाय होही।3

ये देश के सिपाही  मन लाय बर अजादी।
लड़ मर अबड़ सबे झन जाँगर खपाय होही।4

अँधियार खोर घर मा अउ डर भरे डहर मा।
फैलाय बर उजाला दीया जलाय होही।5

बस पेड़ एक ठन धर फोटू खिचाय कतको।
कइसे हमर बबा मन बिरवा लगाय होही।6

जब कोयली कुहुकही अउ रट लगाही मैना।
तब बाग अउ बगीचा मा फूल छाय होही।7

ये गाँव हे सुहावन,ये ठाँव हे सुहावन।
आके इहाँ मुरारी बँसुरी बजाय होही।8

बूता बड़े बड़े सब टर जाही खैरझिटिया।
जब काम धाम मा सबके एक राय होही।9

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Friday, 19 July 2019

आ जा रे बादर

आजा बादर(गीत)

तैं बरसबे के नही बता बादर।
लगथे घुरघुरासी,
आथे बड़ रोवसी,
अब जादा झन तैं,सता बादर-----।

दर्रा  हनत  डोली  हे,धान  मरत हावे।
आके तैं जियादे,मोर आस जरत हावे।
कोठी काठा उन्ना हे,उन्ना हे बोरा बोरी।
घाम  बड़  टँड़ेरत  हे,धान  बरय  होरी।
उमड़ घुमड़ आएस,
तँय धान बोआएस,
अब नइ हे तोर पता बादर--------।

रहिरहि तोर नाँव,माई पिला रटत रहिथन।
आस  धर  तोरे ,खेत  म   खटत  रहिथन।
तोला गिरही कहिके,जिनगी के जुआ खेले हौं।
भर  जा  भले  घर मा,देख खपरा ल उसेले हौं।
तोर मान गौन करथों,
तोर पँवरी रोज परथों,
का होगे मोर ले खता बादर--------।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Friday, 5 July 2019

गजल (मन)

छत्तीसगढ़ी गजल

बहर-(2122 2122 212)

कोन फुलवा रास आही का पता।
कोन हा मन ला लुभाही का पता।1।

काम मनके नित करे जिद मा अड़े।
कब ठिहा काखर जलाही का पता।2।

अरदली  मन के सुवा माने नही।
कब कते कोती उड़ाही का पता।3।

तान  डेना  लाँघथे  आगास  ला।
पिंजरा मा कब धँधाही का पता।4।

नित उठे मन मा लहर सागर  सहीं।
कब किनारा पार पाही का पता।5।

साज  पर  के देख लिगरी मा जरे।
आग कब कइसे बुझाही का पता।6।

पेट भर दाना चरे तभ्भो मरे।
खैरझिटिया काय खाही का पता।7।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

Thursday, 4 July 2019

बचपन बरसा मा(गीत)

बचपन बरसा मा(गीत)

बचपना हिलोर मारे रे,रिमझिम बरसात मा।
घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा......।

कागज के डोंगा बना धार मा,बोहावन।
घानी मूँदी खेलन,अड़बड़ मजा पावन।
पाछू पाछू भागन,देख फाँफा फुरफुंदी।
रहिरहि के भींगन, झटकारन बड़ चुंदी।
दया मया रहय,हमर बोली बात मा.......।
घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा...।

घर ले निकलन,ददा दाई ले बचके।
धार  ल  रोकन, माटी पथरा रचके।
तरिया  के पार में,बइठे गोटी फेंकन।
गोरसी के आगी में,हाथ गोड़ सेंकने।
मन रमे राहय,माटी गोटी पात मा........।
घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा..।

बरसा के बेरा,करे झक्कर झड़ी।
खेलेल  बुलाये,संगी साथी गड़ी।
रीता नइ राहन,हमन एको घड़ी।
खोइला मिठाये,भाये काँदा बड़ी।
सबे खुशी राहय,गाँव गली देहात मा....।
घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा..।

झूलन बंभरी मा,खेत खार जावन।
नदी पहाड़ खेलन,लोहा गड़ावन।
बिच्छल रद्दा मा, मनमाड़े उंडन।
माटी ह  गाँवे के,लागे जी कुंदन।
बिन माँगे मया मिले,वो दरी खैरात मा...।
घड़ी घड़ी सुरता,सतावय दिन रात मा...।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)