Sunday, 6 November 2022

करजा छूट देहूँ लाला(गीत)

 करजा छूट देहूँ लाला(गीत)


धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।

तँय संसो झन कर,मोर मन नइहे काला।


मोर थेभा मोर बेटा बेटी, दाई ददा सुवारी।

मोरेच जतने खेत खार,घर बन अउ बारी।

येला छोड़ नइ पीयँव,कभू मैंहा हाला।

धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


तैंहा सोचत रहिथस,बिगाड़ होतिस मोरे।

घर बन खेत खार सब,नाँव होतिस तोरे।

नइ मानों कभू हार,लोर उबके चाहे छाला।

धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


जब जब दुकाल पड़थे,तब तोर नजर गड़थे।

मोर ठिहा ठउर खेत ल,हड़पे के मन करथे।

नइ आँव तोर बुध म,झन बुन मेकरा जाला।

धान  लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


भूला जा वो दिन ला,जब तोर रहय जलवा।

अब जाँगर नाँगर हे,नइ चाँटव तोर तलवा।

असल खरतरिहा ले,अब पड़े हे पाला।

धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

छुट्टी के दिन........... ---------------------------------------

 ............छुट्टी के दिन...........

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बबा   संग   ढेरा , आँटत    रेहेन।

ददा    संग दॅऊरी , हाँकत   रेहेन।

डोहारत      रेहेन , दाई संग पानी।

कका संग छात रेहेन,खपरा-छानी।

ओइलात  रेहेन  कोठा   म,

गरुवा-छेरी  ल   गिन-गिन।

छुट्टी के दिन,छुट्टी के दिन।


लिपत  रेहेन   ,  अंगना    दुवारी।

टोरत   रेहेन   ,  बम्हरी  मुखारी।

खेत  म   करन , निंदई  - कोड़ई।

बखरी म टोरन,रमकलिया तोरई।

पढ़ई  के  संगे-संग    बुता,

बड़ मजा आय  गऊकिन।

छुट्टी के दिन,छुट्टी के दिन।


बार  के  चूल्हा , भात दार राँधन।

खेत म कूद-कूद,मेड़-पार  बाँधन।

संगी संगवारी संग,मनभर खेलन।

खेवन - खेवन, मही-बासी झेलन।

रमायेण रामसत्ता-रामधुनी म,

हो    जात   रेहेन    लिन ।

छुट्टी के दिन,छुट्टी के दिन।


सँइकिल पनही चप्पल ल,

पोछ - पाँछ    के   रखन।

कका दाई  संग  बजार म,

मुर्रा   -   लाड़ू       चखन।

कुर्था कपड़ा ड्रेस काँच काँच उजरान।

बइला-भँइसा धोके,कूद-कूद नहान।

धनकुट्टी    म   धान   कुटान,

दार-चांउर सिधोन गोंटी बिन।

छुट्टी के  दिन , छुट्टी के  दिन।


ममा घर जाय बर,संग  धरन।

भांटो ल पइसा बर,तंग करन।

तिहार  बार  म , नाचन  गान।

गाँव  भर  के ,  आसीस पान।

बांवत,     बियासी,  भारा,

बुता   करन    कई   ठिंन।

छुट्टी के दिन,छुट्टी के दिन।


  जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

              बालको(कोरबा)

              9981441795

ग्रामीण अर्थव्यवस्था(छत्तीसगढ़ी गीत कविता के माध्यम ले) मा छत्तीसगढ के नारी मन के योगदान-खैरझिटिया*

 *ग्रामीण अर्थव्यवस्था(छत्तीसगढ़ी गीत कविता के माध्यम ले) मा छत्तीसगढ के नारी मन के योगदान-खैरझिटिया*


               नारी मन न सिर्फ गृहस्थी के बल्कि जिनगानी रूपी गाड़ी के घलो दू पहिया मा एक ए। नारी शक्ति के बिगन सृष्टि-समाज के कल्पना करना निर्थक हे। नर जब ले ये धरा मा जनम धरे हें उंखर संगनी बनके नारी सदा संग देवत आवत हे, अउ एखरे प्रताप आय कि आज दुनिया चलत हे। आवन"ग्रामीण अर्थव्यवस्था मा छत्तीसगढ़ के नारी मन के योगदान" ऊपर चर्चा करीं। वइसे तो जब अर्थ के बात होथे, ता नगदी रकम नयन आघू झूले बर लग जथे। शहरी अर्थव्यवस्था मा लगभग काम कर अउ पइसा ले चलथे फेर ग्रामीण अर्थव्यवस्था आजो कतको प्रकार के विनिमय मा चलथे, जइसे वस्तु विनिमय,श्रम विनिमय--। नगद या फेर अर्थ तो बहुत बाद मा आइस, पहली जिनगानी विनिमय मा ही चलत रिहिस। पौनी पसारी परम्परा मा घलो सेवा के बदला मा चाँउर,दार अउ जरूरत के चीज बस मिलत रिहिस। पहली हाथी घोड़ा,गाय भैस वाले घलो धनवान कहिलात रिहिस,फेर आज फकत पइसा वाले ही धनवान हे। आज गांवों मा घलो काम,बूता अउ सेवा सत्कार के अन्ततः मोल अर्थ ही होगे हे। पहली ग्रामीण महिला मन घर मा ही रहिके, घर के अर्थव्यवस्था ल बरोबर नाप तोल मा चलावत रिहिस, आज भले बाहिर नवकरी, व्यवसाय अउ सेवा कारज मा जावत हे। पहली घर मा ही दाई महतारी मन अर्थ के भार ला कम करे बर, चाउंर दार ला घरे मा कुटे अउ दरे, संगे संग साग भाजी बोवत तोड़त, बरी बिजौरी घलो बनावय। घर के जम्मो बूता के संग खेत खार मा घलो श्रम देवयँ। पहली ग्रामीण महिला मन फेरी लगा लगा के सामान, साग भाजी घलो बेचे अउ आजो बेचते हें। दुकान, हाट बाजार,खेत खार,स्कूल कालेज,आफिस दफ्तर,खेल-रेल सबें जघा आज महिला मन अपन बरोबर योगदान देवत हे। 

     गाँव मा लोहार, नाई, मरार, कुम्हार, धोबी, मोची, रौताइन, मालिन--- आदि कतको समाज के जातिगत व्यवसाय रहय। जेमा वो समाज के महिला अउ पुरुष मन अपन सेवा अउ श्रम देवयँ। जइसे मरारिन मन बाजार हाट अउ गली खोर मा घूम घूम के भाजी पाला बेंचे, तुर्किन मन चुरी चाकी, कुम्हारिन मन गगरी-मटकी,रौताइन मन दूध दही अउ देवार जाति के महिला मन गोदना गोदत रीठा अउ मंदरस------


             मैं ये विषय के अंतरगत, छत्तीसगढ़ी गीत कविता मा ग्रामीण अर्थव्यवस्था ला बढ़ाय बर नारी मन के योगदान के झलकी खोजे के प्रयास करना चाहत हँव। काबर कि कवि मनके गीत कविता समय के पर्याय होथे, जे वो समय ला परिभाषित करत नजर आथे। वइसे तो छत्तीसगढ़ी मा असंख्य गीत अउ कविता हे, जे कतकोन विषय मा लिखाय,गवाय जनमानस बीच रचे बसे हे, अउ कतको कापी पुस्तक मा कलेचुप लुकाये हे। मोला जउन मिलिस उही ला आप सबो के बीच रखे बर जावत हँव,अउ आपो मन के मन मा काम बूता/अर्थव्यवस्था ले सम्बंधित कोनो गीत कविता होही ता जरूर बताहू-----


               छत्तीसगढ़ी दान लीला भगवान कृष्ण के लीला ऊपर आधारित हे, फेर एखर पृष्ठ भूमि गोकुल वृन्दावन ना होके छत्तीसगढ़ लगथे, काबर कि पं सुंदरलाल शर्मा जी मन भगवान कृष्ण,गोप गुवालिन अउ सखा सम्बन्धी सबें ला छत्तीसगढिया अंदाज मा चित्रित करे हे। गोप गुवालिन मन वइसे तो भगवान कृष्ण के मया मा मोहित  किंदरत दिखथें, फेर दूध दही अउ लेवना बेचत घर परिवार ला पालत पोसत घलो नजर आथें--

चौपाई

*जतका-दूध-दही-अउ-लेवना। जोर-जोर-के दुधहा जेवना*

*मोलहा-खोपला-चुकिया-राखिन। तउला ला जोरिन हैं सबझिन॥*

*दुहना-टुकना-बीच मड़ाइन। घर घर ले निकलिन रौताइन*

*एक जंवरिहा रहिन सबे ठिक। दौंरी में फांद के-लाइक॥*


ये परिदृश्य पहली कस आजो हे,कतको रौताइन मन गांव गली मा घूम घूम दूध दही मही बेचथे अउ पार परिवार बर आर्थिक योगदान करथें।


                       मरार समाज के नारी मन पहली अउ आजो साग भाजी बारी बखरी के काम मा बरोबर लगे दिखथें, तभो तो  छत्तीसगढ़ के दुलरुवा गायक शेख हुसैन जी कहिथे--

*एक पइसा के भाजी ला, दू पइसा मा बेचँव दाई*

*गोंदली ला राखेंव वो मँड़ार के*

*कभू मचिया वो, कभू पीढ़ी मा वो बइठे मरारिन बाजार मा*

 ये गीत सिरिफ गीत नही बल्कि वो समय के झांकी आय। जेमा साग भाजी बेच के नारी शक्ति मन ग्रामीण अर्थव्यवस्था मा अपन योगदान देवत दिखथें। एखर आलावा अउ कतको गीत हे जेमा भाजी भाँटा पताल बेचे के वर्णन मिलथे।

    

          छत्तीसगढ़ के नारी मन चूल्हा चौका, बारी बखरी  के बूता काम के संगे संग खेत खार मा घलो काम करथें, बाँवत, बियासी,निंदई,कोड़ई,लुवई-मिंजई कोनोअइसन बूता नइहे जेमा मातृ शक्ति के योगदान नइ हे- तभे तो जनकवि कोदूराम दलित जी नारी शक्ति के नाम गिनावत उंखर किसानी खातिर योगदान बर लिखथे-

*चंदा, बूंदा, चंपा, चैती, केजा, भूरी, लगनी।*

*दसरी, दसमत, दुखिया,ढेला,पुनिया,पाँचो, फगनी।*

*पाटी पारे, माँग सँवारे,हँसिया खोंच कमर-मा,*

*जाँय खेत, मोटियारी जम्मो,तारा दे के घर- मा।*

               धान लुवाई म घलो महिला मनके योगदान के एक अंश दलित जी के काव्य पंक्ति मा देखव-

*दीदी लूवय धान खबा खब, भांटो बांधय भारा।*

*अउहा, झउहा बोहि-बोहि के, लेजय भौजी ब्यारा।*


               अर्थोपार्जन करे बर नारी मन कुटीर उघोग कस कतको छोटे मोटे काम धंधा करयँ जेमा- मुर्रा लाड़ू बनाना, बाहरी,दरी,चटाई बनाना, सूपा चरिहा बनाना-----आजो ये सब चलत हे, संग मा नवा जमाना के चीज जइसे दोना पत्तल बनाना, बाँस शिल्प अउ कतको सजावटी सामान जुड़ गेहे। अइसन बूता मा घलो नारी मन ना पहली पाछू रिहिस ना आजो हे। 

ये सन्दर्भ मा, दलित जी के काव्य के एक पंक्ति देखव-

*ताते च तात ढीमरिन लावय,  बेंचे खातिर मुर्रा।*

*लेवँय दे के धान सबो झिन, खावँय उत्ता-धुर्रा।।*

धान देके मुर्रा लाड़ू लेय बर कहना वस्तु विनिमय प्रणाली ल घलो बतावत हे।


              निर्माण अउ विनिर्माण के काम मा घलो नारी शक्ति मन सबर दिन अपन जांगर खपावत आयँ हे, चाहे घर,सड़क, पूल- पुलिया, महल- अटारी होय या फेर ईटा भट्ठा अउ कोनो उधोग धंधा। छत्तीसगढ़ के नारी मन अपन घर परिवार के स्थिति देखत सबें क्षेत्र मा काम करके पार परिवार ला पाले पोसे के उदिम करे हे। मरारिन,रौताइन, तुर्किन, कुम्हारिन, बनिहारिन, पनिहारिन, मालिन, कड़ड़िन,देवारिन,रेजा ना जाने का का रूप धरके, नारी शक्ति मन जीवकायापण बर जांगर बेच के धनार्जन करें हें- 

रोज रोज काम के तलास मा चौड़ी मा बइठे रेजा मन के मार्मिक चित्रण करत वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुशील भोले जी लिखथें-


*चौड़ी आए हौं जांगर बेचे बार, मैं बनिहारिन रेजा गा*

*लेजा बाबू लेजा गा, मैं बनिहारिन रेजा गा...*

*सूत उठाके बड़े बिहन्वे काम बुता निपटाए हौं*

*मोर जोड़ी ल बासी खवाके रिकसा म पठोए हौं*

*दूध पियत बेटा ल फेर छोड़ाए हौं करेजा गा*

*लेजा बाबू लेजा गा, मैं बनिहारिन रेजा गा॥*


             हमर छत्तीसगढ़ मा नाना किसम के जाति हे, ओमा एक जाति हे- देवार जाति। ये जाति के नारी शक्ति मन गाँव गली मा फेरी लगावत मंदरस,रीठा बेचत गोदना गोदे के बूता करयँ। मनखे के मरे के बाद घलो गोदना साथ नइ छोड़े ते पाय के हमर छत्तीसगढ़ मा ना सिर्फ महिला मन बल्कि पुरुषों मन गोदना गोदवाथें। हाथ,पाँव,नाँक,ठुड्डी अउ  गला मा गोदना गोदवाये के रिवाज हे। फूल, चँदा, सितारा, नाम,गाँव, अउ देवी देवता के चित्र गोदना मा दिखथें। पारम्परिक ददरिया मा छत्तीसगढ़ के कतको लोक गायिका मन *गोदना गोदाले रीठा लेले वो मोर दाई* ये गीत ला गायें हे। तभो ये गीत ममता चन्द्राकर जी के स्वर मा जादा सुने बर मिलथे। किस्मत बाई देवार, रेखा बाई देवार, लता खापर्डे, कुल्वनतींन बाई, दुखिया बाई कस कतको लोक गायिका मन गोदना उपर कतको गाना गायें हे।

         

         माटी के दुलरुवा कवि गायक लक्ष्मण मस्तूरिहा के लिखे गीत - *ले चल गा ले चल* मा साग भाजी बेचइया महिला के मार्मिक पुकार हे। जेमा वोहा मोटर वाले ला अपन गाँव ले चल कहिके किलौली करत हे, संगे संग बदला मा भाजी भाँटा देय के बात कहत हे,काबर कि ओखर एको सौदा गंडई बाजार मा नइ बेचा पाय हे। पंक्ति देखन----


*ले चल गा ले चल, ए मोटर वाला ले चल*

*रुक तो सुन वही धमधा डहर बर हावै मोला जाना*

*बेर ढरकगे साँझ होगे, थक गे पाँव चलई मा।*

*सौदा कुछु बेचाइस नही, अई गंडई मड़ई मा।*

*पइसा तो नइ पास हे मोरे,लेले भाजी पाला।*

         कुछु सामान बेचे बर का का दुख झेलना पड़थे, पइसा कमाए बर कतका धीर धरेल लगथे,कतका दुरिहा दुरिहा के बाजार हाट,मेला-मड़ई (धमधा ले गंडई),कइसे कइसे आय जाय बर पड़थे, ये सब दुख दरद ला मस्तूरिहा जी अपन कलम ले उकेरे हे। अउ ओतके मधुर गायें हे लता खापर्डे जी अउ कविता वासनिक जी मन।

               पंचराम मिर्झा अउ कुल्वनतीन बाई के गाये गीत- *"सस्ती मा बेचे वो, बस्ती मा बेचे"* मा घलो साग भाजी बेचे के चित्र मिलथे। अउ कतको जुन्ना अउ नवा गायक गायिका मन घलो भाजी भाँटा पताल करेला--- बेचे के वर्णन करे हे, फेर कतकोन गीत मन द्विअर्थी हे,जुन्ना गीत कस सुने मा आनंद नइ दे सके। 


              सुराज मिले के बाद सरकार डहर ले गांव गांव मा, विकास लाये बर काम बूता खुले लगिस, जइसे सड़क, पुल, नदिया, नहर  बांध बनई-बंधई आदि आदि। जेमा नारी शक्ति मन के श्रम ला कभू नइ भुलाये जा सके। आजो मनरेगा कस कतको बूता मा श्रम साधत नारी शक्ति मन धनार्जन करत माटी महतारी सँग देश अउ राज के सेवा करत हे,अउ देश राज ला आघू बढ़ावत हें। माटी पूत गायक कवि लक्ष्मण मस्तूरिहा जी के लिखे ये अमर गीत ला  स्वर कोकिला कविता वासनिक जी के स्वर मा सुन, मन मन्त्र मुग्ध हो जथे 


*चल सँगी जुरमिल कमाबों गा, करम खुलगे*

*पथरा मा पानी ओगराबों, माटी मा सोना उपजाबों*

*गंगरेल बाँधेन पैरी ला बाँधेन*

*हसदेव ला लेहन रोक।*

*खरखरा खारुन रुद्री के पानी*

*खेत मा देहन झोंक।*

*महानदी ला गांव गांव पहुँचाबों गा---*


       अर्थ भार कम करके अर्थव्यवस्था ला सुदृढ़ बनाय बर ग्रामीण महिला मन सबर दिन अघवा रहिथे, चाहे घरे मा साग भाजी उपजई होय या घरे मा चाँउर दार सिधोई या फेर घरे मा बरी बिजौरी बनई। रखिया बरी बनाये के विचार के एक बानगी वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण निगम जी के घनाक्षरी मा देखव--

रखिया   के    बरी   ला    बनाये   के   बिचार    हवे


*धनी  टोर  दूहू   छानी  फरे  रखिया के  फर*

*उरिद  के  दार  घलो   रतिहा   भिंजोय  दूहूँ*

*चरिह्या-मा  डार , जाहूँ   तरिया  बड़े  फजर*

*दार  ला नँगत  धोहूँ  चिबोर  -  चिबोर  बने*

*फोकला  ला  फेंक दूहूँ , दार  दिखही  उज्जर.*

*तियारे  पहटनीन  ला  आही    पहट   काली*      

*सील  लोढ़हा मा दार पीस देही  वो सुग्घर।।*


               हमर छत्तीसगढ़ चारो कोती ले जंगल झाड़ी के घिरे हे,जिहाँ किसम किसम के रुख राई, महुवा कोसा, लासा मन्दरस सँग नाना प्रकार के जीव जंतु निवास करथे,अउ संग मा रहिथे वनवासी मन,जउन मन जंगल ल ही जिनगी मानत ओखरे सेवा श्रम मा लगे रथे। चाहे महुवा बिनई होय, या तेंदू पाना टोरई या फेर कोसा लासा हेरई। जइसे मैदानी भाग मा काम बूता करत मनखे सुवा ददरिया गाथे,वइसने वनवासी मन घलो काम बूता संग अपन गीत रीत ला नइ भुलाये,येमा ना पुरुष लगे  ना महिला। 


*चल संगी मउहा बीने बर जाबों।*


*तेंदू पाना टोरेल आबे,डोंगरी मा ना।*

अइसने अउ कतकोन मनभावन सुने सुनाये गीत हे, जे वनवासी महिला मनके योगदान,समर्पण धनार्जन मा कतका हे तेला दिखाथें। चाहे तेंदू पाना टोरई होय या फेर मउहा बिनई या फर फुलवारी लकड़ी फाटा ल जतनई-- अइसन सबें बूता मा नारी शक्ति मा सतत लगे रिहिन अउ आजो लगे हे।    

 

         मालिन फूल चुनके हार अउ गजरा बनाके कभू माता ला चढ़ावत दिखथें ता कभू भक्तन मन ला बेचत, एक पारम्परिक जस गीत देखन-

*तैं गूथे वो मैया बर मालिन फूल गजरा।*

*काहेंन फूल जे गजरा*

*काहेंन फूल के हार।*

*काहेन फूल के माथ मुकुटिया सोला वो सिंगार*

             अइसने होली मा पिचका, बाजार हाट मा काँदा कुशा,भाजी पाला, चूड़ी चाकी, होटल मा बड़ा भजिया,पान ढेला मा पान अउ दुकान मा सामान बेचे के तको गीत सुने बर मिलथे, फेर ओतिक प्रचलित अउ ग्राह्य नइ हे।


             मनखे के जिनगी बराबर चलत रिहिस उही बीच मा बछर 2019 मा घोर विकराल महामारी कोरोना धमक दिस, खाय कमाए बर शहर नगर गे सबें कमइया ला बिनजबरन  सपरिवार अपन ठाँव लहुटे बर लग गिस। गाड़ी मोटर थमे के बाद,होटल ढाबा, बाजार दुकान  मा ताला लगे के बाद कोन कइसे छइयां भुइयाँ लहुटिस तेला उही मन जाने। *कहिथे जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि* इही भाव के दर्द वो समय मोरो आँखी मा दिखिस, तब महूँ लिखेंव, जेमा पत्नी अपन पति ला काहत हे--

*चल चल जोड़ी किरिया खाबों,सेवा करबों माटी के।*

*साग दार अउ अन्न उगाबों, मया छोड़ लोहाटी के।*

*चरदिनिया सुख चटक मटक बर,छइयां भुइयाँ नी छोड़न।*

*परके काज गुलामी खातिर, माटी के मुँह नइ मोड़न।*

*ठिहा बनाबों जनम भूमि मा,माटी मता मटासी के----*

           शहर नगर मा जाके नकदी कमाना ही धनार्जन नोहे, जइसे जिनगी जिये बर माटी मा पाँव रखना पड़थे,वइसने माटी ले जुड़ाव जरूरी हे। अपन ठिहा ठौर मा खेती किसानी करत, दू पइसा कमावत दया मया के धन दोगानी जोड़त सुकून के जिनगी बिताए जा सकत हे, जादा अउ चमक धमक के प्यास भारी घलो पड़ जथे। श्रम, सेवा के बदला पइसा मिले, वस्तु मिले या फेर मया, जीवकोपार्जन बर धन ही आय। जेखर थेभा मा सुकूँन के जिनगी जिये जा सकत हे। ग्रामीण अंचल मा आजो ये सब चलत हे,अब जब बात नारी मन के होवत हे ता, उन मन घलो जम्मो प्रकार के,सेवा - श्रम मा बरोबर योगदान देवत हे, जेला गीत कविता के माध्यम ले देख सुन सकथन। गीत कविता भले नारी मनके सबे बूता अउ योगदान तक नइ पहुँचे होही पर नारी मन आज आगास-पताल, जल-थल, खेल-रेल,घर-खेत, उत्तर दक्षिण,पूरब पश्चिम सबें कोती अपन श्रम सेवा,गुण गियान के परचम लहरावत हे, जेमा हमर छत्तीसगढ़ के नारी मन उन्नीस नही बीस हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

तो मार मुझे............. ----------------------------------------------

 ...........तो मार मुझे.............

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माना     नजरें , गलत   थी    मेरी,

पर नजरें तेरी सही है,तो मार मुझे।


हाँ दिल में  बैर, पाल  रखा  था  मैंने,

पर तेरे दिल में बैर नही है,तो मार मुझे।


आज तो बुराई घर घर, घर कर गई है,

यदि सच में बुराई यही है,तो मार मुझे।


मैं तो कब का मर चुका हूँ,श्रीराम के हाथो,

तेरे  दिल  में  राम  कही  है, तो  मार  मुझे।


मैं तो बहक गया था,हाल बहन का देखकर,

वो सनक तेरी रग में बही है,तो मार मुझे।


मैंने तो लुटा दिया,घर परिवार सब कुछ,

मेरे कारण तेरी आस ढही है,तो मार मुझे।


हजार बुराई लिये, हँस रहा है आज का रावण,

ये लकड़ी का पुतला वही है,तो मार मुझे।


मैं तो हर बार मरने को,  तैयार  बैठा हूँ,

यदि बुराई कम हो रही है ,तो मार मुझे।


              जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                बालको(कोरबा)

विजयदशमी पर्व की आप सबको ढेरों बधाइयाँ


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कुंडलियाँ छंद- रावन(जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया")


रावन रावन हे तिंहा, राम कहाँ ले आय।

रावन ला रावन हने, रावन खुशी मनाय।

रावन खुशी मनाय, भुलागे अपने गत ला।

अंहकार के दास, बने हे तज तप सत ला।

धनबल गुण ना ज्ञान, तभो लागे देखावन।

नइहे कहुँती राम, दिखे बस रावन रावन।।


रावन के पुतला कहे, काम रतन नइ आय।

अहंकार ला छोड़ दव, झन लेवव कुछु हाय।

झन लेवव कुछु हाय, बाय हो जाही जिनगी।

छुटही जोरे चीज, धार बोहाही जिनगी।

मद माया लत लोभ, खोज लग जाव जलावन।

नइ ते जलहू रोज, मोर कस बनके रावन।


रावन हा कइसे जले, सावन कस हे क्वांर।

रझरझ रझरझ पानी गिरे, होवय हाँहाकार।

होवय हाँहाकार, देख के पानी बादर।

दिखे ताल कस खेत, धान हा रोवय डर डर।

जगराता जस नाच, कहाँ होइस मनभावन।

का दशहरा मनान, जलावन कइसे रावन।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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दोहा


थर-थर कापत हे धरा, का बिहना का शाम।

आफत ला झट टार दौ, जयजय जय श्री राम।


घनाक्षरी


आशा विश्वास धर,सियान के पाँव पर,

दया मया डोरी बर,रेंग सुबे शाम के।

घर बन एक मान,जीव सब एक जान,

जिया कखरो न चान,छाँव बन घाम के।

मीत ग मितानी बना,गुरतुर बानी बना,

खुद ल ग दानी बना,धर्म ध्वजा थाम के।

रद्दा ग देखावत हे,जग ला बतावत हे,

अलख जगावत हे,चरित्र ह राम के।


मन म बुराई लेके,आलस के आघू टेके,

तप जप सत फेके,कैसे जाबे पार गा।

झन कर भेदभाव,दुख पीरा न दे घाव,

बढ़ाले अपन नाँव,जोड़ मया तार गा।

बोली के तैं मान रख,बँचाके सम्मान रख,

उघारे ग कान रख,नइ होवै हार गा।

पीर बन राम सहीं,धीर बन राम सहीं,

वीर बन राम सहीं,रावण ल मार गा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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आज के रावण


बिन डर के मनमर्जी करत हे,आज के रावण।

सीता संग लक्ष्मी सरसती हरत हे,आज के रावण।

अधमी ,स्वार्थी ,लालची अउ बहरूपिया हे,

राम लखन के रूप घलो धरत हे,,आज के रावण।


बहिनी के दुख दरद नइ जाने,आज के रावण।

मंदोदरी हे तभो मेनका लाने,आज के रावण।

न संगी न साथी न लंका न डंका,

तभो तलवार ताने,आज के रावण।


भला बनके भाई के भाग हरे,आज के रावण।

आगी बूगी म घलो नइ जरे,आज के रावण।

ज्ञान गुण के नामोनिशान नही जिनगी म,

घूमय हजारों बुराई धरे ,आज के रावण।


जाने नही एको जप तप ,आज के रावण।

दारू पीये शप शप, आज के रावण।

मुर्गी मटन मछरी ल, पेट म पचावव,

सबे चीज झड़के गप गप,आज के रावण।


हे गली गली घर घर भरे,आज के रावण।

तीर तलवार म नइ मरे,आज के रावण।

बनाये खुद बर झूठ के कायदा कानून,

दिनोदिन तरक्की करे,आज के रावण।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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एसो के रावण


एसो के रावण, घुर घुर के मरही।


बरसा बड़ बरसत हे,बुड़ के मरही।


कुँवार महीना घलो,पानीच पानी।


छत्ता ओढ़े बइठे हवै,माता रानी।


जम्मो कोती माते,हावै गैरी।


कोन हितवा हे,कोन हे बैरी।


बन के का,रक्सा अन्तःपुर के मरही।


एसो के रावण, घुर घुर के मरही----।


एसो जादा सजे कहाँ हे।


बाजा गाजा बजे कहाँ हे।


आँखी कान पेट धँस गेहे,


मेंछा घलो मँजे कहाँ हे।


पहली ले एसो,खड़े नइहे।


तलवार धरके,अँड़े नइहे।


कोरबा रायगढ़ अउ रायपुर के मरही।


एसो के रावण,घुर घुर के मरही------।


नइ बाजे डंका।


नइ बाँचे लंका।


लगन तिथि बार,


सब मा हे शंका।


हाल बेहाल हे,गरजे कइसे।


सब तो रावण हे,बरजे कइसे।


पानी अउ अभिमानी देख,चुर चुर के मरही।


एसो के रावण, घुर घुर के मरही-----------।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

शरद पुन्नी के आप सबो ला सादर बधाई

 शरद पुन्नी के आप सबो ला सादर बधाई


सूरज कस उजियार कर, हवस कहूँ यदि एक।

चंदा बन चमकत रहा, तारा बीच अनेक।।।।।।


पुन्नी के चंदा(सार चंदा)


सज धज के पुन्नी रतिहा मा, नाँचत हावै चंदा।

अँधियारी रतिहा ला छपछप,काँचत हावै चंदा।


बरै चँदैनी सँग में रिगबिग, सबके मन ला भाये।

घटे बढ़े नित पाख पाख मा,एक्कम दूज कहाये।

कभू चौथ के कभू ईद के, बनके जिया लुभाये।

शरद पाख सज सोला कला म,अमृत बूंद बरसाये।

सबके मन में दया मया ला,बाँचत हावै चंदा--।

सज धज के पुन्नी रतिहा मा,नाँचत हावै चंदा।


बिन चंदा के हवै अधूरा,लइका मन के लोरी।

चकवा रटन लगावत हावै,चंदा जान चकोरी।

कोनो मया म करे ठिठोली,चाँद म महल बनाहूँ।

कहे पिया ला कतको झन मन,चाँद तोड़ के लाहूँ।

बिरह म रोवत बिरही ला अउ,टाँचत हावै  चंदा--।

सज धज के पुन्नी रतिहा मा, नाँचत हावै चंदा।


सबे तीर उजियारा हावै,नइहे दुःख उदासी।

चिक्कन चिक्कन घर दुवार हे,शुभ हे सबके रासी।

गीता रामायण गूँजत हे, कविता गीत सुनाये।

खीर चुरत हे चौक चौक मा,मिलजुल भोग लगाये।

धरम करम ला मनखे मनके,जाँचत हावै चंदा----।

सज धज के पुन्नी रतिहा मा, नाँचत हावै चंदा।


शरद पुन्नी के चंदा,


ए,शरद पुन्नी के चंदा,

टुकनी म बइठार के तोला।

देखाहूँ मोर गाँव घर,

खेत खार घर कोला---।।


तोर बरसत अमृत ले,

सींचहूँ खेत खार ल।

तोर तेज ले टारहूँ,

इरसा जर बुखार ल।

बाँटहूँ मैं सबला,

तोर कला सोला-----।।


घुमाहूँ,मयारु मनके,

नजर ले बँचावत।

नान नान लइका मन ल,

टुहूँ देखावत।

उतारहूँ आमा तरी म,

तोर डोला------------।।

 

जिहाँ सुरुज घलो नइ जाय,

उँहचो ल उजराहूँ।

जागत मनखे मन बर,

दाई लक्ष्मी बन जाहूँ।

मोर टुकनी के लाड़ू खा ले,

बिरथा हे धनी के झोला----।।


नदी धार म,दीया ढील के,

मनभर डुबकी लगाहूँ।

हूम धूप दे पूजा करहूँ,

तोर महिमा ल गाहूँ।

आसा के पुल बाँधत हावै

मोर गरीबिन चोला----।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)


अपने ही जलाते हैं, तो आग ढूँढकर क्या करूँ।

आस्तीन ही डसते हैं, तो नाग ढूँढकर क्या करूँ।

तेरे-मेरे;  इसके-उसके; सब में तो है,

फिर कोसों दूर चंद्रमा में दाग ढूँढकर क्या करूँ।

खैरझिटिया

शरद पूर्णिमा के अवसर पर,,,चाँद पर गीत

 शरद पूर्णिमा के अवसर पर,,,चाँद पर गीत


1,रे चांदनी हमारी गली चांद ले के आज, जा जा रे चंदा फिल्म - चांद (1959) --------------------------------- ---------------------------- ------------------------

2,आधा है चंद्रमा रात आधी, रह ना जाए तेरी मेरी बात आधी फिल्म - नवरंग (1958) --------------- -------------------------------------------------- 

 3,ऐ चॉद तेरी चांदनी की कसम मेरा चांद मेरे पास है फिल्म - तेरा जादू चल गया (2000) ----------------------------- ----------------- ------------------

4,भरोसा करो तुम साथ निभाऊंगा ..चांद के पार चलो

फिल्म - चांद के पार चलो (2006)

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5,चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो

फिल्म - पाकीजा (1972)

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6,चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला

फिल्म - आवारागी (1990)

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7,चांद आहें भरेगा फूल दिल थाम लेंगे

फिल्म - फूल बने अंगरे (1963) 

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8,चांद अकेला जाए सखी री 

फिल्म - आलाप (1977)

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9,चांद छुपा बादल में  शर्मा के मेरी जाना

फिल्म - हम दिल दे चुके सनम (1999)

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10,चांद एक बेवा की चुड़ी की तरह टूटा हुआ, कोई नहीं मेरा इस दुनिया में

फिल्म - दाग (1952 )

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11,चांद जाने कहां खो गया, तुमको चेहरे से परदा हटाना था फिल्म - मैं चुप रहूंगी (1962) ------------------------ -------------------------------------------------- ----------

12,चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा नहीं भुलेगा मेरी जान फिल्म - सावन को आने दो (1979) -------- -------------------------------------------------- 

13,चांद के पास जो सितारा है, वो सितारा हसीन लगता है फिल्म -  स्वीकर किया मैंने (1983) ----------------------------

14,चांद की कटोरी है रात ये छतोरी है फिल्म - गुजारिश (2010) ------------------------ ------------------------------------------------- -------- 

15, चांद मेरा दिल चांदनी हो तुम, चांद से है दूर सी हांडी कहां फिल्म - हम किसी से कम नहीं (1977 ) ------------------------------------------- --------------------------------------------------------- 

16, चांद ने कुछ कहा, रात ने कुछ सुना फिल्म - दिल तो पागल है (1997) ----------------------------- ---------------------------- ------------------------ 


17,चांद निकलेगा जिधर हम ना  उधार देखेंगे फिल्म - दुर्गेश नंदिनी (1956)----------------------------------- ---------------------------------_ ------------ 

18,चांद फिर निकला, मगर तुम ना आए, जला फिर मेरा दिल, करुण क्या  फिल्म - पेइंग गेस्ट (1957)--------------- ---------------------------------------------------------

19, चांद सा मुखड़ा क्यों शर्मा, आंख मिली और दिल घबराया फिल्म - इंसान जाग उठा ( 1959)

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20, चांद से पर्दा किजिये कहीं चुरा ना ले चेहरे का नूरी 

फिल्म - आओ प्यार करें (1994 ) -------------------------------------------------- _ ------

21,चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था  फिल्म - हिमालय की गॉड मेन (1965) ------------------------ ------------------------------------- --------------- _ ----------------------- 

22,चांद सिफ़रिश जो कर्ता हमारी देता वो तुमको बताता फिल्म - फना (2006) ------------ -------------------------------------------------- ------------- _ ----------------------------------------  

23,चांद तारे फूल शबनम तुमसे अच्छा कौन है फिल्म - तुम से अच्छा कौन है (2002) 


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24,चांद तारे तोड़ लाऊं साड़ी दुनिया पर मैं छौं

फिल्म -  यस बॉस (1997)

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25, चांद तारों में नज़र आया चेहरा तेरा 

फिल्म - 2 अक्टूबर  (2003)

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26,चंदा चमके छम चीखे जो चन्ना छोड़

फिल्म - फना (2006)

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27, चंदा देखे चंदा, तो वो चंदा शरमाये फिल्म -  झूठी  (1985) ----------------------------- -------- -------------------------------------------------- _ ----------  28,चंदा है तू, मेरा सूरज है तू, ओ मेरी आंखों का तारा है तू फिल्म - आराधना (1968) 

 

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29,चंदा की चांदनी में झूमे झूमे दिल मेरा, एक आने जाने लगी

फिल्म - पूनम (1952)

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30,चंदा को धुंधने सभी तारे निकले पाए, गलियां में वो नसीब के

फिल्म - जीने की राह (1969) ----------------------------- ------------- -------------------------------------------------- _ 

31, चंदा मामा दूर के, पुए पकें बुरे के फिल्म - वचन (1955) ----------------------------- -------------------------------------------------- _ _ ---------- 32,चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा,  मेरी आंखों का तारा मेरा मामा फिल्म - कार्तव्य (1979) ------------- -------------------------------------------------- ------------- _ ---------------------------------------- 

33,चंदा ओ चंदा किसने चुराई तेरी मेरी निंदिया जाएंगे सारी रैना फिल्म - लाखों मैं एक (1971)


34,चंदा रे मेरे भैया से कहना बहुत याद करे, चंदा रे फिल्म - चंबल की कसम (19 80 ) ----------- -------------------------------------------------------- - _ -------------------------------------

35, चंदा रे चंदा रे कभी से जमीन पर आ फिल्म - सपने ( 1997) ----------------------------- ------------------- ------------------------------------------------------ 

36,चंदा रे जा रे जा रे , पिया को संदेसा मेरा कहियो जा फिल्म - ज़िद्दी (1948) ----------------------------- -------------------------------------------------- _ ---------


37, चंदा रे मोरी पतियां ल ए जा, स आजन तक पाहुचा दे रे 

फिल्म - बंजारन (1960)

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38,चंदा तोरी चांदनी में  जिया जला जाए रे

फिल्म - बाजी (1963)

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39,चंद्रमा मदभरा क्यू झूमे बदर में, वो खुशी अब कहां 

फिल्म - पटरानी (1956)

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40,चौधवी का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम फिल्म - चौधवी का चांद (1960) ---------------------- -------------------------------------------------- _ ---------------------------

41, धीरे-धीरे चल चाँद गगन में फिल्म -  लव मैरिज (1959) ---------- -------------------------------------------------------- _ -------------------------------------- 


42,गगन के चंदा ना पुछह हम से कहां हूं मैं दिल मेरा कहां है फिल्म - अपने हुए परे (1964) -------------------------


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43,गोरे-गोरे चांद से मुख पर काली-काली आंखें हैं

फिल्म - अनीता (1967)

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44,जब तक जाएंगे चांद गगन में मेरे चांद तुम सोना नहीं

फिल्म - शिव कन्या ( 1954 )

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45,झूमता मौसम मस्त माहिना, सी हाथ सी गोरी, एक हसीना, आंख में काजल

फिल्म - उजाला (1959)

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46,खोया खोया चांद खुला आम आंखों में सारी रात जाएगी

फिल्म -  काला बाजार (1960)

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47,खोया खोया चांद रहता है आप के पास

फिल्म -  खोया खोया चांद (2007) ------------------------ ---------------------------------------------------- _ _ -------------- ------------- 

48,मेरे भैया को संदेशा पहंचना, रे चंदा तेरी ज्योत बढ़े हो फिल्म - दीदी (1959) ----- --------------------------------- _------------------------------------------- 


49,मेरे अनमोल रतन, तेरे बदले मैं जमाने

फिल्म - काजल (1965)

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50,ओ चांद जहां वो जाए, तू भी साथ चले जाना, कैसा है, कहां है वो

फिल्म - शारदा (1957)

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51,ओ रात के मुसाफिर चंदा जरा बता दे, मेरा कुसूर क्या है तू फैसला सुना डी

फिल्म - मिस मैरी (1957)

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52,रोज अकेली आए रोज बेचारी जाए चांद कटोरा लिए भीखरीन रात

फिल्म - मेरे अपने (1972)

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53,तुझे सूरज कहूं या चंदा, तुझे दीप कहूं या तारा फिल्म 

एक फूल दो माली (1969)

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54,तुम आए तो आया मुझे याद, गली में आज चंद निकला फिल्म - ज़ख्म (1998) ---------------- ---------------------------------------------------- _ _ ---------------------------------

55, तुम गगन के चंद्रमा हो, मैं धारा की धूल ह ऊ एन फिल्म - सती सावित्री ( 1964) ----------------------------- ------------------- ------------


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56,हम चांद से प्यारे चांद हो तुम, आकाश पे जो मुस्कुराता है 

फिल्म - रात की रानी (1949)

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57,वो चांद जैसी लड़की है दिल पे छ रही है

फिल्म -  देवदास (2002)

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58,वो चांद खेला वो तारे हंसे ये रात अजब मातवाली है

फिल्म - अनाड़ी (19592)

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59,याद रखना चंद तारों इस सुहानी रात को, याद रखना

फिल्म - अनोखा प्यार (1948)  

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60,ये चांद सा रोशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनाहरा

फिल्म - कश्मीर की कली (1964)

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61,ये चंदा रूस का, ना ये जापान का, ना ये अमेरिकन प्यारे

फिल्म - इंसान जाग उठा (1959)

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62, ये रात भीगी-2, ये मस्ती

फ़िज़ायन, उठा धीरे-2 वो चाँद प्यारा-2

फ़िल्म - चोरी-चोरी (1956)

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63,ये रात ये चांदनी फिर कहां, सुन जा दिल की दास्तान

फिल्म - जाल (1952)

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64,ये वादा करो चांद के सामने भूला तो ना दोगे मेरे प्यार को

फिल्म - राज हाथ (1956 )

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65,यूं शबनमी पहले नहीं थी चंदा चांद वो भरमा गया फिल्म - सांवरिया

(2007)

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66, इस चाँद का मुकाबलाक्या होगा उस चाँद के आगे, तेरे नाम(2003)


67, मैने पूछा चाँद से कि देखा है कहीं, मेरे यार 

अब्दुल्लाह(1980)


68,घूँघट में चाँद होगा आँचल में चांदनी- खूबसूरत (1999)


छत्तीसगढ़ी गीत

1,चंदा रे ए रे मोर चंदा बन जा मोरे


2,चंदा अंजोरी आगे न


3,फटिक अंजोरी निर्मल छैहा गली गली बगरावै वो पुन्नी


4,ए ममा चंदा, देश बर दे हम ला हंडा


5, नीलकमल के चंदा रानी वो, आ रानी मोर


6, चंदा वो चंदा तोला


7,तोर चंदा कस चेहरा आँखी मा झूले वो 


8, दूज के चंदा


9, तैं आये नही चंदा रे


10,मोला बइहा बनाये चंदा


11, तोर सुरता मा चंदा


12, चंदा के टिकली


13, चंदा तोर मया मा


14,चंदा बनके जीबों-लक्ष्मण मस्तुरिया


15, चंदा अँजोरी आगे हो


16,चंदा सुरुज अउ नौ  लाख तारे


17,


साभार-गूगल महराज अउ u tube

लावणी छंद- जानवर ले गय बीतिस मनखे

 लावणी छंद- जानवर ले गय बीतिस मनखे


मानव मन ले मानवता के, नाम निशान मिटावत हे।

मार काट होवत हे भारी, रोज रक्त बोहावत हे।।


मया बाप बेटा मा नइहे, कलपत हे महतारी हा।

भाई भाई लड़त मरत हे, थकगे टँगिया आरी हा।

धरम जात पद पइसा खातिर, कतको मर खप जावत हे।

मानव मन ले मानवता के, नाम निशान मिटावत हे।।।


मोल भुलाके मनुष जनम के, मनखे बनगे बजरंगा।

मया प्रीत के गाँव शहर मा, फैलावत हावय दंगा।।

उफनत हावय रिस मा कोनो, ता कोनो उकसावत हे।

मानव मन ले मानवता के, नाम निशान मिटावत हे।।।


सरग नरक अउ पाप पुण्य ला, कहिके ढोंग दिखावा सब।

बिना डरे काटत भूँजत हे, बनके मिर्मम लावा सब।

शिक्षा हे संस्कार सिरागे, ये कलयुग मतलावत हे।

मानव मन ले मानवता के, नाम निशान मिटावत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)