Saturday, 14 January 2023

पूस के जाड़-सरसी छंद

 पूस के जाड़-सरसी छंद


जाड़ पूस के गजब जनाथे, जिवरा जाथे काँप।

किनकिन किनकिन ठंडा पानी, लागे जइसे साँप।


सुरुर सुरुर बड़ चले पवन हा, हाले डोले डाल।

जीव जंतु बर पूस महीना, बनगे हावय काल।

संझा बिहना सुन्ना लागे, बाढ़े हावय रात।

नाक कान अउ मुँह तोपाये, नइहे गल मा बात।

चँगुरे कस हे हाथ गोड़ हा, बइठे सब चुपचाप।

जाड़ पूस के गजब जनाथे, जिवरा जाथे काँप।


दाँत करे बड़ किटकिट किटकिट, नाक घलो बोहाय।

सुधबुध बिसरे बढ़े जाड़ मा, ताते तात खवाय।

गरम चीज बर जिया ललाये, ठंडा हा नइ भाय।

तीन बेर तँउरइया टूरा, बिन नाहय रहि जाय।

लइका लोग सियान सबे झन, करें सुरुज के जाप।

जाड़ पूस के गजब जनाथे, जिवरा जाथे काँप।


भुर्री आखिर काय करे जब, पुरवा बरफ समान।

ठंडा पानी छीचय कोनो, निकल जाय तब प्रान।

काम बुता मा मन नइ लागे, भाये भुर्री घाम।

धीर लगाके लगे तभो ले, गजब पिराये चाम।

दिन ला गिनगिन काटत दिखथे, बबा गोरसी ताप।

जाड़ पूस के गजब जनाथे, जिवरा जाथे काँप।


मुँह के निकले गुँगुवा धुँगिया, धुँधरा कुहरा छाय।

कुड़कुड़ कुड़कुड़ मनखे सँग मा, काँपैं छेरी गाय।

चना गहूँ हें खेत खार मा, संसो मा रखवार।

कतको बेरा हा कट जाथे, बइठे भुर्री बार।

कतका जाड़ जनावत हावय, तेखर नइहे नाप।

जाड़ पूस के गजब जनाथे, जिवरा जाथे काँप।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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कुंडलियाँ


पानी बरसे पूस मा,गरज बरस के साथ।

कथरी कम्बल संग मा,छत्ता खुमरी हाथ।

छत्ता खुमरी हाथ,पूस मा अटपट लागे।

खाय मनुस ला जाड़,सुरुज ला बादर खागे।

पड़े दुतरफा मार,कहाँ ले फूटय बानी।

अड़बड़ जाड़ जनाय,ओतको मा ये पानी।


खैरझिटिया

Monday, 2 January 2023

धूंध के ओनहा(गीत)

 धूंध के ओनहा(गीत)


पहिरे हे पहट हा, धूंध के ओनहा।

दिखत नइहे एकोकनी, कोनो कोनहा।


पा के बड़ इतराये, पूस के जाड़ ला।

कभू सुते सड़क मा, अमरे कभू झाड़ ला।

बनगे दुशासन, सुरुज टोनहा---।

पहिरे हे पहट हा, धूंध के ओनहा----


मनमाड़े डुबके हे, करिया समुंदर मा।

मोती निकाल के, धरे हवय कर मा।।

आगे बन लुटेरा , घाम सोनहा-----।

पहिरे हे पहट हा, धूंध के ओनहा---


दुबके हे गाय गरु, दुबके दीदी भैया।

तभो नाचत गावत हे, पहट ताता थैया।

देखे सुघराई, जागे जल्दी जोन हा।

पहिरे हे पहट हा, धूंध के ओनहा--


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

उपरछवां(देखावा)********

 *********उपरछवां(देखावा)********


                       जब ले सेल्फी के दौर आये हे, तब ले उपरछवां जइसे शब्द भारी मोटावत अउ मेछरावत हे, पहली घलो मोठ डाँट रिहिस, फेर अब तो झन पूछ,,, जे नही ते चाहे कुछु भी होय धन, बल, गुण, ज्ञान, मया, पीरा, कपड़ा, लत्ता  सबे ल अपन उपर मा छाय बरोबर लपेटथे ताहन निकाल के फेक देवत हे। उपरछवां माने भीतर ले कुछ अउ, अउ बाहिर ले कुछ अउ। गदहा ल बघवा के खाल ओढ़ा देय ले गदहा बघवा नइ बने, येला तो हम तुम सब जानथन, फेर फोटू खिचइयाँ कैमरा थोरे जानथे, अउ फोटू खींचे के बाद में हमू मन कोनो नइ जान सकन कि वो सही मा बघवा ये कि गदहा, बिल्कुल अइसने उपरछवां चलत हे, सबे कोती। मनखे मन आप ला खुद जान सकत हे, कि वो भीतर ले का हे, आन तो ओखर ऊपरी हाव भाव ला ही देख पढ़ सकथे।कतको बेर ओखर उपरछवां पकड़ा जथे ता कतको बेर चल जथे। फेर सोसल मीडिया बपुरा ओला, मनखे मन कस थोरे परख पाही, कि अमुख आदमी ज्ञानी, गुनी, सन्यासी,चोर, पुलिस, हितैषी बनके फोटू खीचाय हे, तेन असल मा कइसन हे। अउ उही सोसल मीडिया के माध्यम ले दुरिहा दुरिहा मा रहवइया मनखे मन घलो नइ जान पावयँ। 


            मन के भाव मया, पीरा, इरखा, बैर ये तो दिखे नही, ते पाय के सब भोरहा खा जाथन अउ जेला बने बने समझत रहिथन उही कहूँ दगा दे देथे, त सहज मुँह ले निकल जथे कि, वाह रे तोला भल जानत रेहेंन, फेर तोर मया पीरा तो उपरछवां निकलिस। ना मया देखे जा सके ना पीरा ला, येखर परख तो बखत परे मा ही होथे, अउ कहूँ उपरछवां हे ता परख पाना मुश्किल घलो हे। कोई पीरा के देखावा करत मिलथे, ता कोई मया के। पेट भीतर के दाँत ला देखे के ताकत काखर में हे? दगा देय बर ना सगा लगत हे ,ना आन। सब आज दया, मया, दुख, पीरा, गुण ज्ञान ला कोनो ओन्हा बरोबर अरोथे अउ बखत परे उतार देखे। खैर ये तो बनेच दिन ले चलत आवत हे। हद तो तब हो जावत हे, जब मनखे मोबाइल मा फोटू खींच के ये भाव ला मीडिया मा परोसत हे- जइसे कोनो गरीब ला रोटी, कपड़ा देवत सेल्फी, कखरो मरनी हरनी मा शामिल होय के सेल्फी, कोनो मरीज ले मिलत सेल्फी, कखरो कुछु अटके बूता टारत सेल्फी। खैर आज जमाना उपरछवां के हे, अइसन नइ करही ता नाम कइसे होही, फेर आम जन ला नेता मन कस नाम कमाय के का भूख, जे खेवन खेवन अइसने सेल्फी ला जगजाहिर करत फिरथे। अमुख पार्टी के नेता निच्चट गरीब घर भात खाइस, फलाँ ला पइसा बाँटिस, फलाँ के मदद करिस आदि आदि। ये सब ओखर वोट बटोरे के उदिम आय, चाहे मन मा सेवा भाव होय चाहे झन होय। अइसन करना उंखर मजबूरी घलो आय। नेता व्यपारी या जेला अपन काम बूता टरकाना हे उन मन अइसन करत हे ता कोनो ताज्जुब के बात नइहे, फेर सगा सोदर, यार दोस्त अउ करीबी मन घलो अइसने देख देखावा करें लगिन,ता तो गय। उन मन ले दया, मया सेवा सत्कार के उम्मीद नइ करबों ता काखर ले करबों, अउ कहूँ उहूँ मन सेल्फी लेके सोसल मीडिया मा पठोइस ता तो गय। गाँव ले कका आइस तेला खीर पूड़ी खावत हमर मेहरारू,,, बबा ला अस्पताल लेगत बेरा के फोटू,,,,भतीजा मन ला मया के मारे पइसा धरवत फोटू, गाय गरुवा ला पैरा देवत फोटू,गिरत, हपटत,मरत, बचावत फोटू,,, शायद मैं पिछ्वागे हँव,  सेल्फी के दौर मा ये सब होवत हे। खावत पीयत उठत बइठत घूमत फिरत कुछु भी होय, मनखे के उपरछवां सेल्फी के रूप मा सोसल मीडिया मा दिख जावत हे। मरनी हरनी, पान प्रसादी खावत घलो सेल्फी ''' हद नइहे।   दाई अपन लइका ला दुलारत सेल्फी लेवत हे, ददा अपन लइका ला पीठ मा चघाय सेल्फी लेवत हे, किसान नांगर जोतत सेल्फी लेवत हे, मजदूर पथरा फोड़त सेल्फी लेवत हे, दूधवाला दूध बाँटत सेल्फी लेवत हे, गुरुजी पढ़ात सेल्फी लेवत हे, लइकामन पढ़त सेल्फी लेवत हे, पण्डित। जी पूजा पढ़त सेल्फी लेवत हे,,,,,, अउ झन पूछ का का सेल्फी दिखथे। एको दूध वाला दूध मा पानी मिलावत सेल्फी खींचे ता जानबों, फेर अइसन ना व्यपारी करे ना नेता ना कोनो आम आदमी। अब जे बूता मनखे के रोजमर्रा के काम आय, ओला सेल्फी लेके देखाय के का काम, फेर होवत हे, हाथ मा मोबाइल हे ता तो होबे करही। पहली नेकी कर दरिया मा डार चलत रिहिस, फेर आज तो सोसल मीडिया के दौर मा कुछु चीज भी तोपय नइहे, सब तुरते बगर जावत हे। दया,मया, ममता, काम,बूता, फर्ज, सबे उपरछवां बरोबर होगे हे।

                    डिमांड अउ सप्लाई के नियम अनुसार- जे जिनिस बाजार मा जादा हो जथे ओखर किम्मत घलो घट जथे, आज मनखे के उपरछवां ला देखत दया,मया, ममता, सेवा सत्कार,गुण, ज्ञान जइसे अमोल मनोभाव के मोल खतरा मा हे। कपड़ा, लत्ता , रंग रोगन, साज सज्जा देखाय के चीज आय, फेर जिनगी के नेव दया, मया, ममता, सेवा, सत्कार,गुण ज्ञान थोरे। घर के जमकरहा बने छत ला देखात हन चलही, चमकत दीवाल, दरवाजा, टाइल्स ला देखाबों तहू चलही अउ कहू नेव ला देखा देबों ता--- । फेर आज मनखे कोन कोती जावत हे, देखावा के दौर मा काला काला नइ परोस देवत हे। लोक लाज, पद- प्रतिष्ठा, सही गलत,,,, कखरो परवाह नइहे। सेल्फी ले घलो आघू मनखे रोजमर्रा के बूता काम, अउ कहूँ घुमई फिरई ला स्टेटस बना के डारत हे। कई बखत अइसने लुकलुकावत सेल्फी काल घलो हो जथे। एक झन संगवारी सपरिवार गोवा घूमे के प्लान करिस। घर ले निकले नइहे अउ स्टेटस चालू- दस दिनों के लिये गोवा टूर फिक्स, बस से एयरपोर्ट जाते हुए, हवाई जहाज में सफर, गोवा का एयरपोर्ट, आलीशान होटल गोवा में, गोवा में पहली सुबह समुंदर किनारे, दूसरा दिन-----, तीसरा दिन---, फलाँ जघा, ढेकाँ जघा, ये मॉल, वो मॉल -------- बाप रे। जा कतको करीबी जर भूँजा गे, कि भारी आनंदमय समय बितावत हे। जब सब ऑनलाइन बिजी हे, ता चोर ढोर घलो रही। चोर मन स्टेटस देखिस कि फलाना दस दिन के टूर मा सपरिवार गोवा जावत हे, पहली दिन ले उंखर घर मा पहुँच गे। पास परोसी ला काहत हे, हमन ओखर ममा के लइका आन, घर के देख रेख बर रेहेल केहे हे। चोर मन मस्त खाय पीये अउ एक एक समान ला देख ताक के निकाले लग गिन, कोनो देख डरे ता कहै-टीवी बिगड़ गेहे, बनवाय बर लेगत हन। ओती गोवा मा आखरी दिन के स्टेटस चिपकिस अउ इती चोर मन चेन्द्रा तक ला लेके फरार। घर पहुँचिस ता काटो तो खून नही, सबे चीज चोरी होगे रहय। पड़ोसी मन किहिस,  कि तुम्हर ममा के लइका मन देख रेख बर आय रिहिस, अउ तुम्हर गोवा के फ़ोटो ला घलो देखावत रिहिस, काली तो घर गिस हवे। पता करिस ता कहाँ के कोनो रिस्तेदार----- आँखी खुले के खुले रहिगे। महँगा पड़गे स्टेस्टस अउ सेल्फी हा। फेसबुक वाट्सअप मा कोन काखर फ्रेंड हे, तेला कह पाना मुश्किल हे। सावधानी जरूरी हे, गोवा टूर के बाद घलो स्टेटस हो जातिस, फेर मनखे मन मा देख देखावा अतका हे कि कोनो एको क्षण दम नइ धरे।

                हाथी, घोड़ा, गाय गरवा, पेड़, पहाड़, नदी, नरवा,गाड़ी, मोटर-------डहर चलत का का संग मनखे मन सेल्फी नइ लेवत हे, खैर लेना भी चाही, अउ सोसल मीडिया मा चिपकाना भी, काबर देखावा के जमाना हे। फेर कोनो अचेत, लाँघन, घायल, मजबूर मनखे या जीव जंतु संग सेल्फी लेके सोसल मीडिया मा चिपका देना नइ जमे। थोरिक गुण गियान धरके अपने मुँह मिया मिट्ठू बनना घलो बने बात नोहे। पहली मनखे के गुण ज्ञान कभू पेपर मा खबर बनत रिहिस, आजो बनथे फेर सेल्फी के रूप मा जादा दिखथे। मन के भाव(दया मया ममता सेवा सत्कार गुण ज्ञान) जेला देखे नइ जा सके वोला सेल्फी मा उतार देना अशोभनीय हे, ये सब तो उपरछवां ले घलो जादा खरनाक हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

लावणी छन्द गीत- मनखे रे स्वभिमानी बन

 लावणी छन्द गीत- मनखे रे स्वभिमानी बन


फोकट बनथस अभिमानी तैं, मनखे रे स्वभिमानी बन।

चाल चलन आदत कर बढ़िया, जग बर नवा कहानी बन।।


झन कखरो आघू पाछू हो, कुकुर बरोबर पुछी हला।

दुसर इशारा मा बन बानर, खून पछीना झने गला।।

अपन पाथ ला खुदे बनाले, नदिया के तैं पानी बन।

फोकट बनथस अभिमानी तैं, मनखे रे स्वभिमानी बन।।


मनखेपन के लाज राख ले, गदहा बन झन ढो झोला।

धरम करम धर काज करत रह,फल मिलही खच्चित तोला।

साध साधना करके सब ला, गुण गियान धर ग्यानी बन।

फोकट बनथस अभिमानी तैं, मनखे रे स्वभिमानी बन।।


समय गुलामी के अब नइहे, तभो गुलामी करथस तैं।

लोभ मोह के चक्कर में पड़, पर के पँवरी परथस तैं।।

सही गलत ला नाप तौल ले, झन हाँ भरत जुबानी बन।

फोकट बनथस अभिमानी तैं, मनखे रे स्वभिमानी बन।।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को, कोरबा(छग)

Saturday, 31 December 2022

नूतन वर्ष 2023 के आप सबो ल सपरिवार बधाई, नमन

 उत्तरोत्तर उन्नति करो, जीवन में हो हर्ष।

सुख समृद्धि सत शान्ति ले,आये नूतन वर्ष।।


बधाई नवा बछर के(सार छंद)


हवे  बधाई   नवा   बछर   के,गाड़ा  गाड़ा  तोला।


सुख पा राज करे जिनगी भर,गदगद होके चोला।


सबे  खूँट  मा  रहे  अँजोरी,अँधियारी  झन  छाये।


नवा बछर हर अपन संग मा,नवा खुसी धर आये।


बने चीज  नित नयन निहारे,कान सुने सत बानी।


झरे फूल कस हाँसी मुख ले,जुगजुग रहे जवानी।


जल थल का आगास नाप ले,चढ़के उड़न खटोला।


हवे  बधाई  नवा  बछर  के,गाड़ा  गाड़ा  तोला----।


धन बल बाढ़े दिन दिन भारी,घर लागे फुलवारी।


खेत  खार  मा  सोना  उपजे,सेमी  गोभी  बारी।


बढ़े बाँस कस बिता बिता बड़,यश जश मान पुछारी।


का  मनखे  का  जीव जिनावर, पटे  सबो सँग तारी।


राम रमैया कृष्ण कन्हैया,करे कृपा शिव भोला-----।


हवे  बधाई  नवा  बछर के,गाड़ा  गाड़ा  तोला------।


बरे बैर नव जुग मा बम्बर,बाढ़े भाई चारा।


ऊँच नीच के भेद सिराये,खाये झारा झारा।


दया मया के होय बसेरा,बोहय गंगा धारा।


पुरवा गीत सुनावै सबला,नाचे डारा पारा।


भाग बरे पुन्नी कस चंदा,धरे कला गुण सोला।


हवे बधाई नवा बछर के,गाड़ा गाड़ा तोला---।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को(कोरबा)


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गीत-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


नवा बछर मा नवा आस धर,नवा करे बर पड़ही।


द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


साधे खातिर अटके बूता,डॅटके महिनत चाही।


भूलचूक ला ध्यान देय मा,डहर सुगम हो जाही।


चलना पड़ही नवा पाथ मा,सबके अँगरी धरके।


उजियारा फैलाना पड़ही, अँधियारी मा बरके।


गाँजेल पड़ही सबला मिलके,दया मया के खरही।


द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


जुन्ना पाना डारा झर्रा, पेड़ नवा हो जाथे।


सुरुज नरायण घलो रोज के,नवा किरण बगराथे।


रतिहा चाँद सितारा मिलजुल,रिगबिग रिगबिग बरथे।


पुरवा पानी अपन काम ला,सुतत उठत नित करथे।


मानुष मन सब अपन मुठा मा,सत सुम्मत ला धरही।


द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


गुरतुर बोली जियरा जोड़े,काँटे चाकू छूरी।


घर बन सँग मा देश राज के,संसो हवै जरूरी।


जीव जानवर पेड़ पकृति सँग,बँचही पुरवा पानी।


पर्यावरण ह बढ़िया रइही, तभे रही जिनगानी।


दया मया मा काया रचही,गुण अउ ज्ञान बगरही।


द्वेष दरद दुख पीरा हरही,देश राज तब बड़ही।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को,कोरबा(छग)


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गजल- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया


बिछे जाल देख के मोर उदास हावे मन हा।


बुरा हाल देख के मोर उदास हावे मन हा।।1


बढ़े हे गजब बदी हा, बहे खून के नदी हा।


छिले खाल देख के मोर उदास हावे मन हा।2


अभी आस अउ बचे हे, बुता खास अउ बचे हे।


खड़े काल देख के मोर उदास हावे मन हा।।3


गला आन मन धरत हे, सगा तक दगा करत हे।


चले चाल देख के मोर उदास हावे मन हा।।4


कती खोंधरा बनावँव, कते मेर जी जुड़ावँव।


कटे डाल देख के मोर उदास हावे मन हा।5


धरे हाथ मा जे पइसा, उही लेगे ढील भँइसा।


गले दाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।।6


कई खात हे मरत ले, ता कहूँ धरे धरत ले।


उना थाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।7


जे कहाय अन्न दाता, सबे मारे वोला चाँटा।


झुके भाल देख के  मोर उदास हावे मन हा।8


नशा मा बुड़े जमाना, करे नाँचना नँचाना।


नवा साल देख के मोर उदास हावे मन हा।9


जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


बाल्को, कोरबा(छग)


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घनाक्षरी-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


             1


बिदा कर गाके गीत,बारा मास गये बीत।


का खोयेस का पायेस,तेखर बिचार कर।।


गाँठ बाँध बने बात,गिनहा ला मार लात।


बाइस के अटके ला,तेइस मा पार कर।।


बैरी झन होय कोई,दुख मा न रोय कोई।


तोर मोर छोड़ संगी,सबला जी प्यार कर।।


जग म जी नाम कमा,सबके मुहुँ म समा।


बढ़ा मीत मितानी ग,दू ल अब चार कर।।


              2


गुजर गे बारा मास,बँचे जतके हे आस।


पूरा कर ये बछर,हटा जमे रोक टोंक।।


मुचमुच हाँस रोज,पथ धर चल सोज।


बुता काम बने कर,खुशी खुशी ताल ठोंक।


दिन मजा मा गुजार,बांटत मया दुलार।


खाले तीन परोसा जी,लसून पियाज छोंक।।


नवा नवा आस लेके,दिन तिथि खास लेके।


हबरे बछर नवा,हमरो बधाई झोंक।।


              3


होय झन कभू हानि,चले बने जिनगानी।


बने रहे छत छानी,बने मुड़की मिंयार।।


फूल के बिछौना रहै, महकत दौना रहे।


जीव शिव प्रकृति के,सदा मिले जी पिंयार।।


आदर सम्मान बढ़े,भाग नित खुशी गढ़े।


सपना के नौका चढ़े,होके घूम हुसियार।।


होवै दिन रात बने,मनके के जी बात बने।


नवा साल खास बने,भागे दूर अँधियार।।


               4


सबे चीज के गियान,पा के बनो गा सियान।


गाँव घर देश राज,छाये चारो कोती नाम।।


मीठ करू खारो लेके,सबके जी आरो लेके।


सेवा सतकार करौ,धरम करम थाम।।


खुशी खुशी बेरा कटे,दुख के बादर छँटे।


जिनगानी मा समाये,सुख शांति सुबे शाम।।


हमरो झोंको बधाई,संगी संगवारी भाई।


नवा बछर मा बने,अटके जी बुता काम।।


                5


अँकड़ गुमान फेक,ईमान के आघू टेक।


तोर मोर म जी मन, काबर सनाय हे।।।


दुखिया के दुख हर,अँधियारी म जी बर।


कतको लाँघन परे, कतको अघाय हे।।।


उही घाट उही बाट,उही खाट उही हाट।


उसनेच घर बन,तब नवा काय हे।। ।।।।


नवा नवा आस धर,काम बुता खास कर।


नवा बना तन मन,नवा साल आय हे।।।।


जीतेंद्र वर्मा""खैरझिटिया


बाल्को,कोरबा


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Happy new year 2023

नवा साल मा का नवा

नवा साल मा का नवा

                   मनखे मन कस समय के उमर एक साल अउ बाढ़गे, अब 2022 ले 2023 होगे। बीते समय सिरिफ सुरता बनगे ता नवा समय आस। सुरुज, चन्दा, धरती, आगास, पानी, पवन सब उही हे, नवा हे ता घर के खूंटी मा टँगाय कलेंडर, जेमा नवा बछर भर के दिन तिथि बार लिखाय हे। डिजिटल डिस्प्ले के जमाना मा कतको महल अटारी मा कलेंडर घलो नइ दिखे, ता कतको गरीब ठिहा जमाना ले नइ जाने। आजकल जुन्ना बछर ला बिदा देय के अउ नवा बछर के परघवनी करे के चलन हे, फेर उहू सही रद्दा मा कम दिखथे। आधा ले जादा तो मौज मस्ती के बहाना कस लगथे। दारू कुकरी मुर्गी खा पी के, डीजे मा नाचत गावत कतको मनखे मन घुमत फिरत होटल,ढाबा, नही ते घर,छत मा माते रहिथे। अब गांव लगत हे ना शहर सबे कोती अइसनेच कहर सुनाथे, भकर भिकिर डीजे के शोर अउ हाथ गोड़ कनिहा कूबड़ ला झटकारत नवा जमाना के अजीब डांस संगे संग केक के कटई, छितई अउ एक दूसर ऊपर चुपरई, जइसन अउ कतकोन चोचला हे, जेला का कहना । 
              भजन पूजन तो अन्ग्रेजी नवा साल संग मेल घलो नइ खाय, ना कोनो कोती देखे बर मिले। लइका सियान सब अंग्रेजी नवा साल के चोचला मा मगन अधरतिहा झूमरत रहिथे, अउ पहात बिहनिया खटिया मा अचेत, वाह रे नवा साल। फेर आसाढ़, सावन, भादो ल कोनो जादा जाने घलो तो नही, जनवरी फरवरी के ही बोलबाला हे। ता भले चैत मा नवा साल मनाय के कतको उदिम करन, नवा महीना के रूप मा जनवरी ही जीतथे, ओखरे संग ही आज के दिन तिथि चलथे। खैर समय चाहे उर्दू मा चले, हिंदी मा चले या फेर अंग्रेजी मा, समय तो समय ये, जे गतिमान हे। सूरुज, चन्दा, पानी पवन सब अपन विधान मा चलत हे, मनखे मन कतका समय मा चलथे, ते उंखरें मन ऊपर हें। समय मा सुते उठे के समय घलो अब सही नइ होवत हे। लाइट, लट्टू,लाइटर रात ल आँखी देखावत हे, ता बड़े बड़े बंगला सुरुज नारायण के घलो नइ सुनत हे। मनखे अपन सोहलियत बर हाना घलो गढ़ डरे हे, जब जागे तब सबेरा---- अउ जब सोय तब रात। ता ओखर बर का बाईस अउ का तेइस, हाँ फेर नाचे गाये खाय पीये के बहाना, नवा बछर जरूर बन जथे।आज मनखे ना समय मा हे, ना विधान मा, ना कोनो दायरा मा। मनखे बलवान हे , फेर समय ले जादा नही।
           वइसे तो नवा बछर मा कुछु नवा होना चाही, फेर कतका होथे, सबे देखत हन। जब मनुष नवा उमर के पड़ाव मा जाथे ता का करथे? ता नवा साल मा का करही? केक काटना, नाचना गाना, पार्टी सार्टी तो करते हे, बपुरा मन।वइसे तो कोनो नवा चीज घर आथे ता वो नवा कहलाथे, फेर कोनो जुन्ना चीज ला धो माँज के घलो नवा करे जा सकथे। कपड़ा,ओन्हा, घर, द्वार, चीज बस सब नवा बिसाय जा सकथे, फेर तन, ये तो उहीच रहिथे, अउ तन हे तभे तो चीज बस धन रतन। ता तन मन ला नवा रखे के उदिम मनखे ला सब दिन करना चाही। फेर नवा साल हे ता कुछ नवा, अपन जिनगी मा घलो करना चाही। जुन्ना लत, बैर, बुराई ला धो माँज के, सत, ज्ञान, गुण, नव आस विश्वास ला अपनाना चाही। तन अउ मन ला नवा करे के कसम नवा साल मा खाना चाही, तभे तो कुछु नवा होही।  जुन्ना समय के कोर कसर ला नवा बेरा के उगत सुरुज संग खाप खवात नवा करे के किरिया खाना चाही। जुन्ना समय अवइया समय ला कइसे जीना हे, तेखर बारे मा बताथे। माने जुन्ना समय सीख देथे अउ नवा समय नव आस। इही आशा अउ नव विश्वास के नाम आय नवा बछर। हम नवा जमाना के नवा चकाचौंध  तो अपनाथन, फेर जिनगी जीये के नेव ला भुला जाथन। हँसी खुसी, बोल बचन, आदत व्यवहार, दया मया, चैन सुकून, सेवा सत्कार आदि मा का नवा करथन। देश, राज, घर बार बर का नवा सोचथन, स्वार्थ ले इतर समाज बर, गिरे थके, हपटे मन बर का नवा करथन। नवा नवा जिनिस खाय पीये,नवा नवा जघा घूमे फिरे  अउ नाचे गाये भर ले नवा बछर नवा नइ होय।
               नवा बछर ला नवा करे बर नव निर्माण, नव संकल्प, नव आस जरूरी हे। खुद संग पार परिवार,साज- समाज अउ देश राज के संसो करना हमरे मनके ही जिम्मेदारी हे। जइसे  कोनो हार जीते बर सिखाथे वइसने जुन्ना साल के भूल चूक ला जाँचत परखत नवा साल मा वो उदिम ला पूरा करना चाही। कोन आफत हमला कतका तंग करिस, कोन चूक ले कइसे निपटना रिहिस ये सब जुन्ना बेरा बताथे, उही जुन्ना बेरा ला जीये जे बाद ही आथे नव आस के नवा बछर। ता आवन ये नवा बछर ला नवा बनावन अउ दया मया घोर के नवा आसा डोर बाँधके, भेदभाव, तोर मोर, इरखा, द्वेष ला जला, सबके हित मा काम करन, पेड़,प्रकृति, पवन,पानी, छीटे बड़े जीव जन्तु सब के भला सोचन, काबर कि ये दुनिया सब के आय, पोगरी हमरे मनके नही, बिन पेड़,पवन, पानी अउ जीव जंतु बिना अकेल्ला हमरो जिनगी नइहे। नवा बछर के बहुत बहुत बधाई-----

जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)

Sunday, 6 November 2022

करजा छूट देहूँ लाला(गीत)

 करजा छूट देहूँ लाला(गीत)


धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।

तँय संसो झन कर,मोर मन नइहे काला।


मोर थेभा मोर बेटा बेटी, दाई ददा सुवारी।

मोरेच जतने खेत खार,घर बन अउ बारी।

येला छोड़ नइ पीयँव,कभू मैंहा हाला।

धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


तैंहा सोचत रहिथस,बिगाड़ होतिस मोरे।

घर बन खेत खार सब,नाँव होतिस तोरे।

नइ मानों कभू हार,लोर उबके चाहे छाला।

धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


जब जब दुकाल पड़थे,तब तोर नजर गड़थे।

मोर ठिहा ठउर खेत ल,हड़पे के मन करथे।

नइ आँव तोर बुध म,झन बुन मेकरा जाला।

धान  लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


भूला जा वो दिन ला,जब तोर रहय जलवा।

अब जाँगर नाँगर हे,नइ चाँटव तोर तलवा।

असल खरतरिहा ले,अब पड़े हे पाला।

धान लू मिंज के मैं,कर्जा छूट देहूँ लाला।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)