Saturday, 1 July 2023

नियत बचाके रख रे मनखे- तातंक छन्द

 नियत बचाके रख रे मनखे- तातंक छन्द


नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।

लूट मचा झन बनगे लोभी, सिरा जही जिनगानी हा।


कब्जा झन पर्वत नदिया बन, झन खा पेड़उ पाती ला।

जादा झन निकाल खनिज जल, छेद धरा के छाती ला।।

सता प्रकृति ला अब झन जादा, के दिन रही जवानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


चरै तोर बइला विकास के, सुख के धनहा डोली ला।

तोरे बइला तुहिंला पटके, गुनय सुनय ना बोली ला।।

हवै भोंगरा छत अउ छानी, आगी लगे फुटानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


माटी मा गारा मिलगे गे हे, महुरा पुरवा पानी मा।

साँस लेय बर जुगत जमाथस, का हे अब जिनगानी मा।

काली बर बस काल बचे हे, सरगे तोर सियानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


पेड़ लगावत फोटू ढिलथस, कभू बाँचतस नारा तैं।

सात जनम के ख्वाब देखथस, बइठे रटहा डारा तैं।

चाँद सितारा ला देखत हस, तड़पय धरती रानी हा।

नियत बचाके रख रे मनखे, बचही पुरवा पानी हा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बजट अउ आम आदमी

 बजट अउ आम आदमी


आँसों  फेर बजट ला, देखत हे आम आदमी।

आसा के आगी मा हाथ, सेकत हे आम आदमी।।


कखरो मुख मा कहाँ, नाम गाँव रथे इंखर,

ये जग मा सबर दिन, नेपत हे आम आदमी।


पेट्रोल डीजल टोल टेक्स, कुछु मा नइहे राहत,

आहत हो गाड़ी कार ला, बेचत हे आम आदमी।।


न कभू मरे न कभू मोटाय, का खाय का बचाय,

घानी के बने बइला तेल, पेरत हे आम आदमी।।


का बड़े का छोटे, सब खाय इंखरे कमाई ला,

अर्थव्यवस्था ला बोहे, लेगत हे आम आदमी।।


देश राज संस्कृति, अउ संस्कार के बन पुजारी।

खुद के ठिहा ठौर ला, लेसत हे आम आदमी।।


पिसाके दू पाटा बीच, तेल नून आँटा बीच,

सब दिन बस पापड़, बेलत हे आम आदमी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


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आम आदमी


सरकार के उपकार मा, हलाल बनके आम आदमी।

बनत रिहिस मसाल पर,मलाल बनगे आम आदमी।।


न ऊपर वाले जाने, ना नीचे वाले कभू माने ,

सिरिफ सपना मा,जलाल बनगे आम आदमी।।


असकटाके गुलामी के बेड़ी मा,नित फंदाय फंदाय,

खास बने के चाह मा, दलाल बनगे आम आदमी।।


शान शौकत के सपना ला, कभू पाँख नइ लगिस,

आन के सुरा शौक बर, कलाल बनगे आम आदमी।


दुबके दुबके नाम गाँव अउ, पद पार के संसो मा,

माँगे बर हक अपन, अलाल बनगे आम आदमी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)


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करजा परजा बर


सत मत धरम करम के, सदा जय होना चाही।

लत लोभ बैर बुराई के घर, प्रलय होना चाही।।


बड़का उही जे गार पछीना पेट परिवार ला पाले,

करजा काट के अमीरी गरीबी, तय होना चाही।।


काबिल के सर मा, सजै सबर दिन ताज तोरण,

चोर चमचा मन के मन मा,डर भय होना चाही।।


नाम नही काम बोले, नेता अफसर अधिकारी के,

छेरी कस फोकटे फोकट नइ मय मय होना चाही।


सजा छूट विधि विधान सबो बर रहै एक बरोबर,

आम आदमी के मन मा झन संसय होना चाही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया

बाल्को कोरबा(छग)

हमर भाँखा हमर अभिमान-

 हमर भाँखा हमर अभिमान-


             चिरई चिरगुन, कुकुर बिलई, गाय गरुवा सबे के मुख के आवाज निकलथे, जेला हमन नरियई या चिल्लई कही देथन, फेर मनखे के मुख ले निकले आवाज ला भाँखा या बोली कहिथन, काबर कि मनखे मन के बोली भाँखा एक खांखा मा चलथे, कहे के मतलब एक बेर बने या बोले बात बोली सरलग वो शब्द या फेर वो बूता काम बर बउरे जाथे। चिरई चिरगुन मन का बोलथे तेखर बर तो इहिच कहिबों- "खग ही जाने खग की भाषा"। फेर गाय गरुवा चिरई चिरगुन घलो हमर थोर बहुत भाँखा ला समझथे तभे तो कुकुर बिलई गाय गरुवा ला आआ, हई आ, ले ले---- कहे मा आ जथे अउ हूत,हात, भाग --- कहे मा भगा जथे।

 हमर महतारी बोली भाँखा छत्तीसगढ़ी आय। एखर जनम कब होइस कइसे होइस तेखर बारे मा कुछु कही पाना सम्भव नइहे। बोली भाँखा ला स्थापित करे मा कतका उदिम लगे होही सोच के थरथरासी लगथे, काबर कि कोनो अंचल या क्ष्रेत्र के भाँखा बोली वो क्षेत्र के सबें रहवासी ला मान्य होथे, अउ तर्कसंगत घलो अउ ओला आन क्षेत्र जे मन घलो नइ डिगा सके। जइसे टेड़ा ल टेड़ के पानी निकाले बर पड़थे, ता वो टेड़ा होगे अउ ओखर पटिया पाटी, जे अपन काल मा मान्य रिहिस अउ आजो  मान्य या चलन मा हे। आज येला बदले नइ जा सके। गांव या अंचल के नामकरण घलो भौगोलिक, राजनीतिक, धार्मिक या अन्य कोनो परिदृश्य मा होवय, जइसे भांठा भुइयां के सेती भांठागाँव, खैर के लकड़ी के कारण खैरझिटी, डीही डोंगरी या देव धामी के कारण देवडोंगढ़, अमलीडीही, डोंगरगढ़ आदि आदि। आज भले स्थल या स्थान विशेष के नाम ल शाब्दिक अभाव या आधुनिकता  के कारण बदलत सुनथन, फेर ओखर मूल कतको बदलना उही रथे। पर वस्तु विशेष या क्रिया विशेष के नाम ला नइ बदल सकन। पंखा पंखा ही कहाही, ढेंकी ढेंकी ही कहाही, लमती, चकरी, टेड़गी तको उहीच कहाही। फेर नइ जाने तेमन ओ वस्तु के रंग रूप अनुसार कुछु आन तान बतावत गोठीयावत काम घलो चला लेथे।  कई ठन शब्द  या बोली अपभ्रंस, देशज रूप मा  घलो चलथे, पर लिखित या भाँखा के रूप मा जस के तस नइ लिखे जाय। कोनो अंचल विशेष मा सरलग बउरे जाने वाला बोली ही भाँखा के रूप लेथे। कोनो चीज जब नवा रूप मा अस्तित्व मा आथे ता ओखर नामकरण ओखर अविष्कारक मन करथे, अइसने काम बूता के नामकरण घलो होय होही। जानकार जे मन वो वस्तु या बूता काम ला आन भाँखा मा का कथे तेला जानत रिहिस होही ता उसनेच शब्द लिस होही, काबर की कई शब्द कई भाँखा मा एके रथे। अउ अनजान या येला का कथे अइसन चीज बस बर नवा शब्द गढ़ीन होही, फेर एखर बारे मा कुछु ठोसलगहा प्रमाण नइ हे। वो समय मनखे के सम्पर्क घलो सिमित राहय अउ आना जाना घलो सहज नइ रहय, ते पाय के हर अंचल के भाँखा बोली लगभग अलगे मिलथे।

             भाँखा घलो पानी कस ऊंच ले नीच कोती भागथे , कहे के मतलब सरलता कोती मुड़ जथे। दुनिया मा असंख्य भाँखा हे, सबके अपन अलग अलग अस्तिवव घलो हे। कतको भाँखा के अलगेच लिपि हे ता कतको भाँखा कई लिपि मा ही बउरावत रथे। बोली के जब तक समझइया नइ रही वो भाँखा नइ बन सके। छत्तीसगढ़ी बोली छत्तीसगढ़ भर मा बोले अउ समझे जाथे। जब भाँखा बनिस ता वो समय जेन भी चीज या जेन भी काम धाम वो अंचल विशेष मा चलत रिहिस वो सबके नामकरण होइस होही। जइसे हमर छत्तीसगढ़ मा ढेरा आँटना, मछरी धरना, मुही बाँधना, निंदई करना, धान मिंजना जइसन असंख्य काम--- । अब वो समय कम्प्यूटर, ट्रेक्टर, हार्वेस्टर नइ रिहिस ता कम्प्यूटर, ट्रेक्टर या हार्वेस्टर। चलाये बर अलग से शब्द नइ बनिस, बल्कि मशीन के नाम के अनुसार जब आइस तब अपना लेय गिस। आजो अइसने होवत हे कोनो भी नवा चीज न सिरिफ छत्तीसगढ़ी भाँखा मा बल्कि जम्मे भाँखा बोली मा जस के तस आवत हे,  येला बदले या अपभ्रंस करे के जरूरत घलो नइहे। भाँखा के बारे मा सोचबे ता एकठन अचरज घलो होथे जइसे कतको जुन्ना अउ जरूरी शब्द के नाम कतको भाँखा मा एके दिखथे, उदाहरण बर नाक, कान, दाँत ----  आदि कस कतको अकन शब्द हिंदी या अन्य बोली भाँखा मा वइसनेच मिलथे। जब भौह बर छत्तीसगढ़ी बोली मा चंडी/बटेना/टेपरा बनाइस ता कान ला कान ही काबर किहिस होही, या कान कहिस ता आन भाषी मन तको जस के तस कइसे अपनाइस होही। या हिंदी के शब्द कान ला  छत्तीसगढ़ी मा घलो कान लिस ता भौह ला चंडी काबर किहिस? खैर ये सब ला उही मन जाने।   कतको शब्द के एक ले जादा नाम तको दिखथे। एखर ले साबित होथे, भाँखा के निर्माण कोनो एक व्यक्ति या अंचल विशेष ले नइ होय हे, बल्कि जम्मे कोती के खोज खबर अउ महिनत,मान मनउवल मिले हे। इही क्रम मा सुरता आवत हे, आज कतको संगी मन धन्यवाद या धनबाद या धनेवाद कहिके छत्तीसगढ़ी शब्द बनाथे ,फेर ये उचित नइहे। काबर कि जुन्ना काल मा ये बात बात मा धन्यवाद कहे के परम्परा हमर छत्तीसगढ़ मा नइ रिहिस, बल्कि सेवा के बदला सेवा, अउ बड़े के छोटे के प्रति किये कोनो काम धाम कर्तव्य मा गिनती आवय। ददा अपन लइका बर खजानी लावय ता लइका ददा ला धन्यवाद नइ काहय, दाई रोटी खवावय तभो लइका गबर गबर खाये, धन्यवाद कहिके अभिवादन नइ करे। काबर कि वो दाई ददा के कर्तव्य अउ आदतन निःस्वार्थ बूता रहय,  जेखर करजा लइका बड़े होके चुकावै, धन्यवाद कहिके नइ बोचके। फेर आज तो लइका का दाई, ददा , भाई, बहिनी, यार दोस्त सबें एक दूसर ला धन्यवाद कहत फिरत हे। खैर छोड़व यदि कहना हे ता कहव, फेर छत्तीसगढ़ी भाँखा कहिके बिगाड़ के झन बोलव। मोर कहे के मतलब हे  हमर भाँखा प्राचीन हे जे चीज वो समय रिहिस ओखर बर प्रचलित शब्द हे, अउ नइ रिहिस तेखर बर नइहे। यदि नइहे ता वोला उही रूप मा शामिल करन अउ हवे या महिनत करके जुन्ना सगा सियान ले पूछन। आज कतको अकन प्रचलित ठेठ शब्द मन नइ बउराय के कारण उड़ावत जावत हे, जे हमर पुरखा मनके महिनत के उचित मान सम्मान नोहे।  दाई ला ओखर लइका ही दाई कही, कोनो आन नही अउ दाई के सेवा घलो लइका ल करेल लगही ,काबर की महतारी के करजा ले उऋण होना सम्भव नइहे, वइसने भाँखा घलो हमर महतारी आय अउ हम सब जम्मो छत्तीसगढिया मन ओखर लइका। अब कतका सेवा जतन, मान सम्मान करथन हमरे उपर हे। 

            आवन इही क्रम मा हमर शरीर के अंग मन के नाम ला जानन कि कोन अंग ला छत्तीसगढ़ी मा का कथे---


हिंदी ले छत्तीसगढ़ी नाम


बाल/केश-चुन्दी

सिर- मूड़

मस्तक-माथा/कपार

भौंह- चंडी/टेपरा/बटेना

पुतली-पुतरी

आँख- आँखी

पलक- बिरौनी

मुँह- मुँहु

कान के बाहरी भाग- कनपट्टी

सिर के पीछे के भाग- चेथी

गला- घेंच/ टोंटा

गाल- कपोल

होट- ओंठ

ठुड्डी- दाढ़ी

कंधा-खाँध

कोहनी- हुद्दा

कलाई-मुरुवा

बाँह-बाँही

उंगली- अँगरी

अँनूठा-अंगठा/ठेंगा

नाखून- नख

जंघा-जांग

हड्डी-हाड़ा

तर्जनी उंगली- डुड़ी अँगरी

मध्यमा- माई अँगरी

अनामिका- पैंती अँगरी

कनिष्ठ- छीनी अँगरी

पंजा- थपोल

पैर- गोड़

टखना-घुटवा

नाभि- बोड़ड़ी

तलवा-पंवरी/तरपंवरी

धमनी/शिरा- नस/रग

कमर-कनिहा

चेहरा-थोथना

ताली-थपड़ी/थपौड़ी

हाथ को कुछ चीज को उठाने के लिये आधा सर्कल में जोड़ना-पसर

मुट्ठी- मुठा

घुटना- माड़ी

आँत-पोटा

काँख-खखोरी

कलेजा-करेजा

मूँछ-मेछा


क्रमशः

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

सार छंद- होगे मरना भारी

 सार छंद- होगे मरना भारी


खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।

रहिरहि रोय किसान छेंव के, कइसे बूता टारी।


धरसा के बिन थमके गाड़ा, थमके नाँगर बइला।

छेंव खेत सब होगे बिरथा, चैन खुशी गे अइला।

फारम बनगे सड़क तीर मा, पइधे हें वैपारी।।

खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।।


सड़क तीर मा जे पइधे हे, ते देखे बन गिधवा।

डहर बाट नइहे कहि डर मा, बेंचैं खेती सिधवा।

चक के चक्कर मा हावय बड़, रुँधना बँधना जारी।

खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।।


हरिया भर नइ जघा रिता हे, नइ बाँचे हे परिया।

हाय हाय गरु गाय करत हे, गय किसान अउ करिया।

भारी भरकम हे दुख तब ले, चुप शासन अधिकारी।

खेत रुँधागे सड़क तीर के, होगे मरना भारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

बराती मन के टेस- सरसी छन्द

 बराती मन के टेस- सरसी छन्द


मारयँ अड़बड़ टेस बरतिया, मारयँ अड़बड़ टेस।

पहिर जींस टोपी अउ चश्मा, अजब गजब धर भेस।।


अँटियावैं बड़ जवान जइसे, लइका संग सियान।

कोनो बरजे कोनो बोले, देवयँ कहाँ धियान।।

मुँहजोरी अउ सीनाजोरी, करयँ लाज ला लेस।

मारयँ अड़बड़ टेस बरतिया, मारयँ अड़बड़ टेस।।


रंग रूप चुन्दी के लागे, जइसे कुकरा पाँख।

अहड़ा हड़हा टूरा तक हा, रेंगयँ फैला काँख।

बाँटी भौरा के खेलैया, खोजयँ कैरम चेस।

मारयँ अड़बड़ टेस बरतिया, मारयँ अड़बड़ टेस।


डिस्को भँगड़ा नागिन नाचत, कतको गिरयँ उतान।

पिचिर पिचिर बड़ थुकयँ बरतिया, खाके गुटका पान।

नाचे खाये पीये तक मा, दिखें लगावत रेस।

मारयँ अड़बड़ टेस बरतिया, मारयँ अड़बड़ टेस।।


नशा बराती मा खुद होथे, तेमा अद्धी पाव।

रहे कलेचुप हाथ गोड़ नइ, देवयँ लेवयँ घाव।

जिया लुभातिस राम सही ता, बन किंजरे लंकेस।

मारयँ अड़बड़ टेस बरतिया, मारयँ अड़बड़ टेस।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


मारयँ अड़बड़ टेस बरतिया, मारयँ अड़बड़ टेस।

पहिर जींस टोपी अउ चश्मा, अजब गजब धर भेस।।

डिस्को भँगड़ा नागिन नाचत, कतको गिरयँ उतान।

पिचिर पिचिर बड़ थुकयँ बरतिया, खाके गुटका पान।

बाँटी भौरा के खेलैया, खोजयँ कैरम चेस।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

छेना खरही- दोहा चौपाई

 छेना खरही- दोहा चौपाई



पइसा फेकय हाँस के, जाँगर कोन खपाय।

नवा जमाना आय ले, जुन्ना चीज नँदाय।।


नवा जमाना कती हबरही। दिखे नही अब छेना खरही।।

छेना बीने के गय अब दिन। रहै सहारा जेहर सब दिन।।


पाठ पठउँहा बारी बखरी। जिहाँ रहै बड़ छेना लकड़ी।।

गरुवा गाय बँधाये घरघर। गोबर निकले कोल्लर भरभर।।


भाई बहिनी बाबू दाई। बिनै सबे गोबर मुस्काई।।

डार पिरौसी थोपैं छेना। तभो कखरो थकयँ ना डेना।


चलत रिहिस होही ये कब के। खरही राहय रचरच सबके।।

छेना खा खा भभके चूल्हा। दार भात तब झड़के दूल्हा।।


बर बिहाव का छट्ठी बरही। सबके थेभा राहय खरही।।

खरही खाल्हे डारे डेरा। मुसवा रोज लगाये फेरा।।


 घाम घरी बड़ खरही बाढ़े। आय बतर तब रो धो ठाढ़े।।

छेना बिना गोरसी रोये। पेट सेंक तब लइका सोये।।


अब के लइका का ये जाने। छेना धर सब आगी लाने।।

धुँवा दिखाये नजर जाय लग। छेना सुपचा देय हूम जग।।


छेना रचके बाट चढ़ावै। छेना मा खपरा पक जावै।।

छेना के सब बारे होरी। माँजे गहना गुठिया गोरी।।


एक आँच मा बनथे खाना। खाय माँग बड़ दादा नाना।

छेना राख भभूत लागे। धुँवा देख के मच्छर भागे।।


राख अबड़ उपजाऊ होवय। पौधा जर मा राख कुढ़ोवय।

बाढ़े छेना राख मा बिरवा। खातू बिन मिलवट के निरवा।।


छेना राख काम बड़ आये। बर्तन चकचक ले उजराये।।

बइगा छेना राखड़ धरके।  मारे मंतर फू फू करके।।


उपयोगी हे राख दाँत बर। उपयोगी हे राख आँत बर।।

घावउ गोंदर खजरी कीड़ा। राख मथे ले भागे पीड़ा।।


बिके अमेजन मा छेना हा। देख निकलथे मुख ले हाहा।।

जी सकथे मनखे बिन डेना। फेर जरूरी हावै छेना।।


गोधन रख जे सेवा करही। तेखर घर नित बढ़ही खरही।।गुण गोबर के हे आगर जस। गुण कारी छेना हावै तस।।


जनम धरत छेना ला कहिथे। मरत समय तक छेना रहिथे।

मनुष आधुनिक कतको होवय। कभुन कभू छेना बर रोवय।


छेना हे बड़ काम के, गरुवा गाय बिसाव।

थोपव गोबर सान के, खरही ऊँच बनाव।।


 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

छत्तीसगढ़ के दलहन-तिलहन फसल- खैरझिटिया

 छत्तीसगढ़ के दलहन-तिलहन फसल- खैरझिटिया


                 चिप्स चाकलेट बिस्कुट मा कइसे देह आही, बड़ मरना हे, बिगन दार के लइका भातेच नइ खाय। रोज रोज दार घर मा चुरे घलो कइसे? सैकड़ा ले आगर पइसा खरचबे तब जाके एक किलो राहेर दार आथे। अइसनेच कहानी तेल के तको हे। ले ले के खवई मा बड़े छोटे सबे हख खागे हे। सुरसा कस मुँह उलाय महँगाई मा, हड़िया पउला भरबे नइ करे अउ इती खीसा उन्ना ऊपर उन्ना होवत जाथे। आजकल खवइया जादा हे, उपजइया कम,  ता खांव खांव तो होबे करही, चाहे चांउर, दार होय या तेल। जिहाँ पहली मनमाड़े उन्हारी घटकत रिहिस, तिहाँ आज सोवा परगे हे, भर्री भांठा तो दिखबे नइ करे। रीता भांठा भर्री मा  महल अटारी अउ अंधाधुन बनत कालोनी तिलहन दलहन फसल के घेच ल धर लेहे। कतको फसल तो चुक्ता सिराय के कगार मा तको आगे हे। हमर छत्तीसगढ़ धान के कटोरा कहिलाथे, फेर तिलहन दलहन फसल मा तको पहली बड़ सजोर रिहिस, आज किसनन्हा मन  पइसा के लालच मा भर्री भाँठा ला व्यपारी मन तीर बेच देवत हे, बचे खोचे भुइयाँ कल कारखाना के भेंट चढ़ जावत हे। सड़क तीर के खेत खार मा बड़े बड़े उद्यमी मनके कब्जा होगे हे, जेमन  सिरिफ समय के फसल बोय हे, जे दिन ब दिन बढ़त(दाम) जावत हे। उनला का चिंता? चिंता तो किसान ल हे। चारो कोती चमचम ले तार रुँधा गेहे। ओनहा कोनहा के किसान बपुरा मन के मरना होगे हे। गाय गरुवा तको छेल्ला होंगे हे। किसनहा मन करे ता का करे? गाय गरुवा कोनो प

पालना नइ चाहत हे, काबर कि न तो चरावन हे अउ न परिया। पैकेट के दूध दही अउ ट्रेक्टर हार्वेस्टर उंखर महत्ता ल खागे। गोबर छेना तो नवा जमाना के चीजे नइ रहिगे। खैर छोड़ ये सब बात ल, आज छत्तीसगढ़ मा होवइहा दलहन अउ तिलहन सफल के बारे मा विचार करबों। छत्तीसगढ़ मा फसल जादा मात्रा मा छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाका मा होथे। पठारी पहाड़ी कोती तको होथे फेर कमती। अउ व्व कोती मोटा अनाज कोदो, कुटकी, जव,जई,राई होथे, दलहन तिलहन, चाऊंर, गहूँ मैदानी छत्तीसगढ़ मा उपजथे। आवन छत्तीसगढ़ के मैदान मा दलहन तिलहन फसल के बारे मा जानन।

                   आजकल वइसे डोली खेत दिखे बर मिल जथे, फेर भर्री कमसल होवत जावत हे। दलहन तिलहन फसल ज्यातर भर्री मा घटकथे। पहली समय  के सुरता करबे ता चक के चक राहेर, तिली,चना,तिवरा, अरसी, सोयाबीन, मसूर,  सरसो देखत मन गदगद हो जावत रिहिस। फेर आज एकात ठन भर्री या डोली मा दिख गे ता खुद ला भागमानी जान। धान के फसल मा जतेक महिनत लगथे ,ओखर ले बड़ कमती महिनत उतेरा उन्हारी बर लगथे, तभे तो हाना रहय "बो दे गहूँ अउ निकल जा कहूँ"। फेर आज ये हाना लागू नइ हो सके, कीरा कांटा, गाय गरुवा, बन बेंदरा के मारे कहूँ नइ धियान देबे ता एको बीजा घलो देखना नोहर हो जही। पहली जिहाँ तक नजर जाय उतेरा उन्हारी घटके रहय, जादा रखवारी लगे न कीरा कांटा। फेर आज जे किसान कुछु बोवत हे ओखर मरना हे।

                हमर छत्तीसगढ़ मा तिलहन फसल के रूप मा मुख्य रूप ले सोयाबीन, सरसो, तिली, अरसी, मूंगफली अउ सूरजमुखी बोय जाथे। सोयाबीन एक समय सबे कोती कन्हार भुइयाँ मा उपजे ,फेर एक बेर  उड़ के चाबे वाले सांप के अफवाह के कारण कतको जघा बंद होगे। ता कतको जघा लुवे टोरे के बेरा पानी बादर के कारण।  सोयाबीन भर्री मा उपजथे, फेर धीरे धीरे भर्री डोली बनगे या उधोगी मनके नियत डोलगे। सोयाबीन खरीफ के फसल आय, इही मौसम मा उरीद, मूंग,राहेर जइसे दलहन फसल के खेती तको होथे। एक समय घरों घर अरसी के तेल बउरे जावत रिहिस, फेर आज के लइका मन का अरसी जाने अउ का ओखर तेल। अरसी बोवइया किसान बिरले दिखथे। अरसी के तेल बड़ गुणकारी होवय, रांधे खाय, चुपरे बर पहली खूब चलत रिहिस, एखर खरी घलो लाभकारी रहय। तिली के बोवइया तको जादा नइ दिखे। सरसो कहूँ न कहूँ कोती माँघ फागुन मा मन मोहत दिखी जथे। तिलहन मा सोयाबीन, मूंगफली,तिली खरीफ़ के ता सरसो अरसी रबी फसल के रूप मा बोय जाथे। कहूँ कहूँ कोती मूंगफली अउ सूरजमुखी खरीफ रबी दोनो मौसम मा बोवत दिखथे। धान बोय के बाद भर्री भांठा मा किसान मन सोयाबीन, राहेर, मूंग, उड़द, मुंगफली बोथे। ये फसल मन बर धान ले कम महिनत अउ कम उपजाऊ भुइयाँ घलो चलथे। तिलहन फसल के कम पैदावार, आज के लागत के हिसाब ले दाम नइ मिले के कारण अउ बिचौलिया मन के कारण, तेल के दाम आसमान छूवत हे।

                किसान मन धान लुवाय के बाद नमीयुक्त धनहा डोली मा लाख, लाखड़ी, मसूर उतेरथे ता भर्री मा चना, गहूँ ,सरसो, मसूर,अरसी ओनारथे। चना, तिवरा, मसूर, मूंग, उड़द,राहेर, मटर, मोठबीन, जिल्लो, ग्वार, खेसारी ये सब दलहन फसल आय। जेमा कुछ ला खरीफ फसल अउ कुछ ला रबी फसल के रूप मा बोय जाथे। तिवरा के खेत मा जिल्लो अपने आप खरपतवार के रूप मा उगे। पहली के किसान मन एखरो दार खायँ, अब तो काये तेला बनेच मन जाने घलो नही। चना, मसूर, अरसी,मटर,  सरसो,तिवरा रबी फसल के शान रहय। चना के खेत मा  छीताय बीच बीच मा सरसो के पिंवरा फूल अउ धनिया के सफेद फूल देखत जउन आत्मीय आनन्द मिलथे, वोला लिख के बयां नइ करे जा सके। अरसी के  घमाघम माते मसरंगी फूल जन्नत के सैर कराथे। ये सबके रखवारी करे बर जेखर बूता लगे, उंखर दिनचर्या सरग बरोबर लगे। रंग रंग के फूल,फर, गावत भौरा, नाचत तितली, चहकत तीतुर,मैना अउ बहकत पुरवइया, आ हाहाहा का कहना। खेत के मेड मा बने कुंदरा मा बइठे बइठे चिरई चिरगुन के गीत सुनत, कागभगोड़ा अउ खेत खार ला निहारत, बोइर अमली झडक़त कब चना,गहूँ, सरसो, मसूर, अरसी पक जथे पता नइ चले। फेर आज रखवार बन बेंदरा के मारे मर जावत हे, अउ बाँचे खोचे आस, चोरहा मनखे मन के मारे नास हो जाथे। एक अनार सौ बीमार के स्थिति कई गांव मा देखे बर मिलथे। आजो कई डहर चक के चक चना गहूँ माते दिखथे, फेर अब धीरे धीरे कमती होवत जावत हे। 

                 अरसी, जिल्लो,उरदानी,सोयाबीन के बोवइया कमतिच बचे हे। दलहन तिलहन फसल घर मा खाय,बउरे के साथ बाजार मा अच्छा दाम तको देथे। आज दलहन अउ तिलहन फसल के प्रति किसान मन के  कम रुझान चिंतनीय हे, अइसने रही ता आघू अउ सबे चीज महँगाही। शहर लहुटत गांव टेस् टेस मा अपन असली धन दौलत (खेत किसानी) ला बरोवत जावत हे, अउ आधुनिकता के चंगुल मा फँसके अभी हाँसत हे, फेर काली का होही तेखर चिटको संसो नइ करत हे। सरकार एक समय दलहनी फसल ल बढ़ाये बर पीली क्रांति लाय रिहिस आजो वइसने कुछु उपाय के जरूरत हे, ताकि धान के कटोरा कहिलइया हमर छत्तीसगढ़ दलहन तिलहन के डलिया तको कहाय।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)