मुक्तक-होली
एक हाथ में माला, एक हाथ में भाला है।
ज़्यादातर मदहोशी का कारण हाला है।
आख़िर होली उसको क्या रंग लगाए,
जिनका तन और मन बिल्कुल काला है।।
हाथ में बम-गोली है कहकर लूट लिया,
खाली मेरी झोली है कहकर लूट लिया।
लुटेरों की न सूरत और न सीरत होती है,
"बुरा न मानो, होली है" कहकर लूट लिया।।
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अक्षत, चंदन, रोली है,
मधुर-रस घुली बोली है।
झूमो, नाचो, गाओ यारो—
झूमकर आई होली है।।
रंग जाए ऐसा अंग नहीं है।।
मन भाए ऐसा भंग नहीं है।
मैं बदला हूँ या बदल गई होली—
रंग में भी अब वो रंग नहीं है,
गाँव, थाना, कस्बा, ज़िला—सब बाँट लिए हैं,
पर्व, त्योहार, नृत्य-लीला—सब बाँट लिए हैं।
होली रंगे तो भला किसको किस रंग में रंगे?
हरा, नीला, लाल, पीला—सब बाँट लिए हैं।।
लाया हूँ तुम्हारे लिए ये सुर्ख लाल रंग,
आँखों से उतारो चश्मा—तो रंग दूँ मैं।।
सभी तो कल है, आज कौन है।
नजर में सब है, राज कौन है।।
सब तो हाक रहे है, विद्वता अपनी
तो बताओ मूर्खाधिराज कौन है।।
खैरझिटिया
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