Wednesday, 6 May 2026

मुक्तक

 एटीएम के गत-कुंडलियाँ छंद


पइसा बिन एटीएम हा, खड़े रथे मुँह फार।

हमर होय बैलेंस कम, दंड लेय सरकार।।

दंड लेय सरकार, आम खाता धारी ले।

बोचक जाये बैंक, झाड़ पल्ला पारी ले।।

सुने भला अब कोन, करिन का काये कइसा।

ठँउका रहिथे काम, मिले नइ खोजे पइसा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



कुण्डलियां-नेता घर नेता


नेता के बेटी बहू, बाई भाई पूत।

नित नेता बनते रही , भागे नइ ये भूत।।

भागे नइ ये भूत, हरे कुर्सी इँखरे बर।

होवत रहिथे खेल, इहिच मन ला नित दे बर।

गला फाड़ चिल्लाय, उहू ये पद के क्रेता।

आम चुहकहीं आम, रही नेता घर नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



फेक अकड़ गुमान- कुंडलियाँ

धन दौलत मद जोर झन, हक ला कखरो मार।

बने काम करते रहा, निभा हरेक किरदार।।

निभा हरेक किरदार, जमाना जुगजुग जाने।

बाँचे रहे जमीर, मनुष कस सब झन माने।।

हरस मनुष के जात, मनुष बर झन गड्ढा खन।

फेक अकड़ गुमान, रहे नइ सबदिन तन धन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)



तीन सवारी-कुंडलियाँ


तीन सवारी देख के, काटे पुलिस चलान।

भरे खचाखच रेल हे, निकल जथे जी जान।।

निकल जथे जी जान, व्यवस्था कोन सुधारे।

लेये बर लउहाय, देय बर पल्ला झारे।

आम खास मा भेद, होय सब कोती भारी।

रोड दिखे ना भीड़, दिखे बस तीन सवारी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


कुर्सी-कुंडलियाँ

जनता के पीये लहू, नेता मन बन शेर।

जॉब घटय कुर्सी बढ़य, कइसन आगे बेर।।

कइसन आगे बेर, मचे कुर्सी के झगड़ा।।

कइसे होय विकास, करें घोटाला तगड़ा।।

सब ला जोर सुनाँय, कहानी संता बंता।।

इती उती के बात, सुने हँस हँस के जनता।


खैरझिटिया



अइसन काबर-कुंडलियाँ


डॉक्टर झोला छाप कहि, शासन वसुलै दंड।

नेता झोला छाप हे, मिलजुल खावँय फंड।।

मिलजुल खावँय फंड, उठावै अँगरी कौने।

नियम तोड़थें रोज, नियम नित हाँके तौने।

मनके करथें काम, सबे ला खीसा मा धर।

गरजे अँगठा छाप, डरे भल मास्टर डॉक्टर।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


रोय रसोई


रोय रसोई गैस बिन, गाड़ी हा बिन तेल।

चीज सबे महँगात हे, होय युद्ध जस खेल।।

होय युद्ध जस खेल, बजत हे दुख के बाजा।

बनके तिगड़म बाज, जुलुम ढावत हें राजा।।

कर नइ सके विकास, तेल टावर बिन कोई। 

रहे सदा सुख चैन, कभू झन रोय रसोई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




कोल्ड ड्रिंक्स के राज मा, नींबू सरबत फेल।

कब का हा महँगा जही, आय समझ नइ खेल।

हावी हावय उधोगी।

आम जन भुक्तभोगी।


नेता


नेता मन रैली करे, सड़क चौक ला घेर।

जाम लगे चारो डहर, खड़े पुलिस मुँह फेर।।

खड़े पुलिस मुँह फेर, देख के फुदरे नेता।।

पाके मनखें आम, नियम कहि हुदरे नेता।

शासन ला रख जेब, घुमे बन विश्व विजेता।

जनता जाए भाड़, करे मनमानी नेता।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


फूफा


रिस्ता मा बिखराव आम होगे।

जुड़ छइयां देख आज घाम होगे।

भीतरे भीतर तिगड़म फूफू करे,

इती फूफा बिचारा बदनाम होंगे।

खैरझिटिया



किरायेदार-कुंडलियाँ


गरू लगे दाई ददा, हरू किरायेदार।

होन देन नइ कुछु कमी, खूब करे सत्कार।।

खूब करे सत्कार, लागमानी हो जइसे।

पइसा खातिर आज, मनुष रँग बदले कइसे।।

सबझन के इहि  हाल, कहे मा करू लगे।

कइसन दिन हे आय, ददा दाई गरू लगे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


पद पइसा- कुंडलियाँ

पद पइसा के चाह मा, बाँचे कहाँ ईमान।

झन जा बोली बात मा, बिक जाथे इंसान।।

बिक जाथे इंसान, अपन पहिचान भुलाके।

हो जाथे खामोश, मूड़ मा ताज सजाके।।

माया आघू मान, मनुष के होवव रदखद।

अवसर देख जुगाड़, करें पाए बर सब पद।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बालको,कोरबा(छग)


नत्ता रिस्ता आज बाजारू होगे।

नँदात नरियर गंगा बारू होगे।

गय सुदामा किशन के जमाना,

अब दोस्ती मतलब दारू होगे।।

खैरझिटिया


सोचो यदि मच्छर साठ साल जीते,  

न जाने किसका कितना खून पीते।  

इसीलिए जल्दी मौत मिली है उसे,  

पर आदमी क्यों बन बैठा है चीते।  

खैरझिटिया


छप्पर-छानी कब छत हो गई, पता नहीं चला।  

मेरे खिलाफ़ कब जनमत हो गई, पता नहीं चला।  

कभी यहाँ, कभी वहाँ—रोज़ मंज़िल ढूँढते रहे,  

कब राह से मोहब्बत हो गई, पता नहीं चला।  

खैरझिटिया

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