अशिक्षा-सार छंद
अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।
इती उती भागे बर लगथे, जैसे कुकुर बिलैया।।
काम करे नइ मति बेरा मा, फुटे घलो नइ बानी।
अपढ़ जान के दुनिया वाले, करथें नित मनमानी।।
देय सहारा कोनों हा नइ, मिलथें टाँग खिंचैया।
अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।
कोई हा नइ करे पुछारी, मारे रहिरहि ताना।
आज जुटा पाना नोहर हे, दुनों टेम के खाना।।
हाव भाव नइ देखे कोई, सब हें घाव करैया।
अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।
अलगा देथें अड़हा कहिके,अउ सब जाथें जुरिया।
आये अभिशाप अशिक्षा हा, हले नेव घर कुरिया।।
हक माँगे हकलासी लगथे, डूबे लगथे नैया।
अनपढ़ रहिबे ता दुख भारी, झेले पड़थे भैया।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
No comments:
Post a Comment