कलजुग म घलो आबे कान्हा
----------------------------------------
स्वारथ म रक्सा बनके मनखे,
सिधवा गोप-गुवाल ल मारत हे।
कालीदाह के कालिया नाग,
गली - गली म फुस्कारत हे।
बरसत हे ईरसा-दुवेस लड़ई-झगरा,
मया के गोवरधन उठाबे कान्हा।।
कलजुग म घलो आबे कान्हा।।
देवकी-बसदेव ल का किबे,
जसोदा-नन्द घलो रोवत हे।
कहाँ बाजे बंसुरी,कती रचे रास?
घर - घर महाभारत होवत हे।
सड़क डहर म बइठे हे तोर गईया,
मधुबन म ले जाके चराबे कान्हा।
कलजुग म घलो आबे कान्हा।
दूध - दही ले दुरिहाके मनखे,
मन्द - मऊहा म डूब गे हे।
अलिन-गलिन म सोवा परे हे,
कदम के रुखवा टूट गे हे।
घेंच म बांधे घूमे भरस्टाचार के हांड़ी,
आके दही लूट देखादे कान्हा।
कलजुग म घलो आबे कान्हा।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
No comments:
Post a Comment