Thursday, 3 September 2026

बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

                 

                       छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "बहरतीन" पुस्तक नही; बल्कि डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के व्यक्तित्व आय,उँखर मन के उपज आय,गाँव गँवई के सँउहत झाँकी आय। चंद्रा जी के सरल सहज व्यक्तित्व अउ माटी महतारी ले जुड़ाव, ये काव्य संग्रह मा सहज झलकत हे। कहे जाथे कि "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि" माने जननी अउ जन्म भूमि स्वर्ग ले बढ़के होथे। चाहे जनम देवइया महतारी होय या माटी महतारी होय या हमर संस्कृति,पार-परम्परा या संस्कार होय आदि सबके सेवा बर चंद्रा जी सबर दिन अघुवा बनके बूता करें हें अउ अभो करत हें। ये पुस्तक के नाँव ला ही अपन महतारी के नाँव देके चंद्रा जी मन अपन जनम देवइया महतारी ला अमर कर दिन। शिक्षा, साहित्य अउ समाज बर सबर दिन समर्पित, डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के आकर्षक व्यक्तित्व के सबे कायल हें। उँखर नेतृत्व क्षमता के जवाब नइहे। घर-परिवार, गांव अउ समाज संग आज चंद्रा जी कोरबा के जम्मों साहित्यकार मन ला संघेर के साहित्य भवन समिति कोरबा के रथ ला सरलग हाँकत हें। भाव प्रधान सृजन चंद्रा जी के कलम के खास विशेषता ए। जेन लगन अउ महिनत ले चंद्रा जी मन काव्य रचथें, उही लगन अउ महिनत उँखर गायकी मा तको झलकथे। सुमधुर गीतकार के रूप मा चंद्रा जी ला पूरा छत्तीसगढ़ जानथे,पहिचानथे। भले  छत्तीसगढ़ी मा डॉ साहब के ये पहली काव्य संग्रह आय, फेर साहित्य सृजन अउ गायन बनेच पहिली के करत आवत हें।

                           छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी भाषा दूनो मा, चंद्रा जी  मन के समान अधिकार हे। "आनंद के दोहे" नाम से हिंदी मा, काव्य संग्रह चंद्रा जी मन निकाल चुकें हे। कोनो रचना के सृजन होय या पुस्तक छपाई होय, लइका जनई के धैर्य अउ कोख के पीरा कस ही हे। जइसे महतारी लइका ला कोख मा नौ महिना बोहे रथे, वइसने एक कलमकार के मन मा रचना के सिरजन तक भाव अउ शब्द उमड़त घुमड़त रथे। लइका जने के बाद जइसे महतारी परम् सुख के अनुभव करथे, वइसने रचना के सिरजन के बाद कलमकार के दिलो दिमाक ले शब्द के बोझ उतरथे अउ परम् शांति पाथें। चंद्रा जी मन के कई दशक पहिली लिखित रचना मन आज पुस्तक के रूप मा आवत हे। ये उँखर बर खुशी के पल तो है ही, संगे संग पाठक अउ साहित्य जगत बर तको खुशी के बात हे।

                        गांव के गली खोर मा खेलत खावत, नाचत गावत, प्रधान अध्यापक तक के सफर तय करइया चंद्रा जी मा प्रतिभा कूटकूट के भरे हे। चंद्रा जी मधुर कंठ के धनी गीतकार के संगे संग रंगमंच के तको सधे कलाकार आय। बड़े बड़े संस्था मा एक ले बढ़के एक नाटक मा मनमोहक किरदार चंद्रा जी मन निभाये हे। बाल्को सांस्कृतिक मण्डल के बैनर तले "चरण दास चोर" नाटक मा महू ला चंद्रा जी संग काम करे के सौभाग्य मिलिस हे। कलमकार, कलाकार, गायक के संगे संग उद्घोषक, उत्कृष्ट शिक्षक अउ समाज सेवक के रूप तको चंद्रा जी जाने पहिचाने जाथे। जब मैं 2006 मा बाल्को  कोरबा आयेंव, अउ उँखर गीत-कविता ला सुनेंव, तब ले आज तक मोर पसंदीदा गीतकार के रूप मा चंद्रा जी मन मोर मन मे बसे हें। कोरबा मा होवइया साहित्यिक, सामाजिक, शैक्षणिक आदि लगभग सबे कार्यक्रम मा चंद्रा जी ला, अहम भूमिका अदा करत, सरलग देखत-सुनत आवत हँव। अउ आजो उही भागीदारी, जोश-जज्बा, उमंग-उछाह देख मोर कस कतको लिखइया-पढ़इया, कवि-कवियित्री के प्रेरणास्रोत बने हे। चाहे साहित्य होय, समाज होय, शिक्षा होय या घर परिवार के जिम्मेदारी होय, चंद्रा जी सब ला बरोबर समय देवत, सबके सेवा करिस। हाल ही में पीएचडी करके, डॉक्टरेट के उपाधि तको पाइन। सब ला लेके चले अउ सब बर बरोबर समय निकाले, अइसन व्यक्तिव बिरले मिलथे।

                            हमर भारत देश होय या हमर राज छत्तीसगढ़, दूनो के आत्मा गाँव मा ही बसथे, वइसने चंद्रा जी के मन, अपन जनम भूमि अउ गाँव ला कभू नइ बिसरा सके। तभे तो गांव के खेत-खार, बारी-बखरी, नदी-पहाड़, जंगल-झाड़ी, रहन-सहन, तीज-तिहार, संस्कृति-संस्कार, पार-परम्परा, नता-रिस्ता, खेल-खाजी, रोटी-पीठा आदि सब चंद्रा जी के कलम मा नजर आथे। ये पुस्तक के बात करन ता, येमा एक ले बढ़के एक गीत कविता संग्रहित हे।  ये पुस्तक मा संग्रहित गीत "मोला मोर परेवा पाँखी गांव अगोरत हे" मोर बड़ पसंदीदा गीत आय। जे चंद्रा जी के मुख ले सुनके परम् शांति देथे अउ चाहे कहूँ भी खड़े राहस, सुनते ही मन ला, गांव के गली खोर मा ले जाके खड़े कर देथे। अइसने अउ कतको मनभावन गीत चंद्रा जी मन ये पुस्तक मा संग्रहित करें हें। पुस्तक मा भाव पक्ष के बेजोड़ता के संगे संग कला पक्ष बड़ सुदृढ़ हे। ये संग्रह मा, सरल सहज अउ चलती आंचलिक छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग चंद्रा जी मन करें हें। मनभावन अलांकारिक छटा पाठक वर्ग ला प्रभावित करही। ज्यादातर रचना गीत के रूप मा हे। चंद्रा जी कई प्रकार के छंद मा तको काव्य सृजन करे हे, ये पुस्तक मा  शास्त्रीय छंद दोहा अउ लोक छंद पवैया छंद के कविता संग्रहित हे। लोक धुन मा रचित कर्मा गीत , जागरण गीत, जस गीत, होरी गीत,सुमरनी गीत बड़ आकर्षक अउ मनभावन हे। 

                     आजकल कतको कवि मन दूसर के रचना ला अपन बताके गा, छपा देथें, जे गलत हे। अइसन करे मा हाँसी फभित्ता ही होथे, अइसने भाव के एक कविता ये पुस्तक मा हे-

"आन के लिखे मा लिखोइया बनथे, ते गिरथे मुड़भर्रा।"


                         "जंगल मा डांका परे हे,कोन बचाही" गीत बड़ मार्मिक अउ चिंतन करे बर मजबूर करत हे। आज जंगल झाड़ी के कटई घास फूस बरोबर होवत हे, संगे संग जंगल ले जुड़े जम्मों रीत-नीत, रहन-सहन सबके विनाश होवत हे। चंद्रा जी के संसो आज सबके संसो होना चाही,काबर कि जंगल हे तभे जीवन हे।


                        

                इरसा द्वेष, ऊँच नीच, तोर मोर के आगी हकीकत के आगी ले तको बड़ खतरनाक होथे। जे एक बेर बरे जे बाद कभू बुझाए जे नाम नइ ले। एखर ले सबला बचना चाही, अउ भाईचारा के गारा मा चिपके रहना चाही। इही भाव मा चंद्रा जी मन लिखथें-    "मनखें खातिर मनखें के ये कइसन बाँटा।

  अपन ब राखे फलफूल,दूसर ब कांटा कांटा।"


                             मैं एक मुक्तक मा हमेशा पढ़थों कि "हर पड़ोसी पाकिस्तान होता है"  अउ देखे बर तको मिलथे, ज्यादातर पड़ोसी संग मनखें मन चिढ़े रथें। उही बात के संसो करत चंद्रा जी मन एक कविता मा लिखें हे---" आज पडोसीपन नँदात जात हे।"


                           कतको लालची मन छत्तीसगढिया मन ला सब ले बढ़िया कहिके भुलवारत उँखर अधिकार अउ चीज बस ला नँगावत हें, चिरई बरोबर लहलहावत आस विश्वास के फसल ला मन के खावत हें। उही ल साव चेत करत चंद्रा जी मन लिखथें--

"छत्तीसगढ़ के रहइया सब मन,जागत रइहा रे।

कहाँ मेर चिड़िया दाना चुगत हे,ताकत रइहा रे।।"

               

                             दाई ददा मन लइका ला अपन खून पसीना बहा बहा के पालथें पोसथें, कि बुढ़त काल में सेवा जतन करही। फेर आधुनिक बेरा मा लइका मन पढ़ लिख के विदेश या गांव ल छोड़ शहर चल देथें, ता कतको मन अपन जिम्मेदारी ले भाग जथें। फेर ददा दाई के सेवा तो नारायण सेवा ले तको बढ़के हे। आज वृद्धाश्रम के संख्या बढ़त जावत हे, जे चिंतनीय हे। ददा दाई के सियानापन मा सेवा करे बर प्रेरित करत चंद्रा जी मन लिखथें-

"उठ जा उठ जा उठ जा बेटा मोर, बिहान होगे गा।

 देख तो दाई ददा तोर, सियान होगे गा।।"


                     ये सब के आलावा ये काव्य संग्रह मा नारी शक्ति के मान सम्मान, मया पिरित, तीज- तिहार, शिक्षा के महत्ता, सार्थक सीख-सिखावन अउ देश- राज, गांव-घर, खेती-बाड़ी, जंगल झाड़ी, ददा दाई आदि सम्बंधी  संसो फिकर के गीत कविता संग्रहित हे। पाठक मन ये संग्रह ला पढ़त पढ़त गाये बर मजबूर हो जहीं, अउ परम् आनंद प्राप्त करहीं। अइसन सुघ्घर सिरजन खातिर डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी ला कोटिशः बधाई अउ शुभकामना।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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