Wednesday, 30 September 2026

विश्व शाकाहार दिवस ये अवसर मा--- गीत-शाकाहार

 विश्व शाकाहार दिवस ये अवसर मा---


गीत-शाकाहार


कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।

मछरी कुकरी भेड़ बोकरा, हरे राक्षसी जन आहार।।


महतारी कस धरती दाई, देथें धान पान फर साग।

सेवा करके पा लौ मेवा, हँस हँस खावव सँहिरा भाग।।

फर फुलवारी के नइ पाये, माँस मटन चिटिको कन पार।

कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।


काँदा कूसा के गुण भारी, खाव राँध के दुनो जुवार।

खाव मौसमी फर जर भाजी, तन के भागे रोग हजार।।

खनिज लवण प्रोटीन विटामिन,  सबे तत्व होथे भरमार।

कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।


कई किसम के होय वायरस, मास मटन ले भागव दूर।

जीव जानवर ला झन मारव, अपन पेट बर बनके क्रूर।।

कृषि भूमि भारत उपजाथे, भक्कम फर जर चाँउर दार।

कंद मूल फर फूल पान खा, बनव सबे झन शाकाहार।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


विश्व शाकाहार दिवस के बधाई

अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर म--- गीत--सियान मन

 अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के अवसर म---


गीत--सियान मन


ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।

जनम देवइया जतन करइया, भुइयाँ के भगवान मन।


पेड़ पात पानी पुरवा ला, जस के तस सौपिन हम ला।

रखिन बचा के सरी चीज ला,खुद उपभोग करिन कम ला।

लागा, पागा धर नइ करिन, सपना खातिर सुजान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


चिपके रिहिन हावयँ सबदिन, मानवता के गारा मा।

दया मया ला बाँटत फिरिन, गाँव गली घर पारा मा।

लाँघन नइ गिस जिंखर ठिहा ले,जानवर ना इंसान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


सही गलत अउ पाप पुण्य के, लहराइन सबदिन झंडा।

छोड़दिन बैरी ला बदी देके, नइ देखाइन आँखी डंडा।।

अंतर मन ला आनन्द देवयँ, जिंखर सुर अउ तान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


परम्परा अउ संस्कृति के, सौदा करिन नही कभ्भू।

देखावा अउ चकाचौंध बर, लड़िन मरिन नही कभ्भू।

चद्दर देख लमाइन हें पग, उड़िन मनुष नइ महान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


नता रिस्ता ला हाँस निभाइन,पीठ चढ़ाइन नाती ला।

कथा कहानी न्याय सुनाइन, लिखिन पढ़िन पाती ला।।

नवा समय मा नोहर होही, जुन्ना गुण अउ ज्ञान मन।

ये धरती ले धीरे धीरे, जावत हवयँ सियान मन।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Tuesday, 29 September 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य अउ नारी शक्ति.. खैरझिटिया

 

छत्तीसगढ़ी काव्य अउ नारी शक्ति.. खैरझिटिया

*छत्तीसगढ़ी काव्य सृजन मा महिला शक्ति*-

जे राज के आदिकालिन साहित्य के मुहतुर अहिमन रानी गाथा, केवला रानी गाथा, रेवा रानी गाथा, दसमत कयना गाथा आदि विदुषी महिला मन ले होथें, भला वो राज के नारी शक्ति मन काव्य सिरजन मा कइसे पिछवाय रहीं। साहित्य सृजन प्रसव पीड़ा कस होथे, अउ येला नारी शक्ति मन ले जादा भला कोन जान पाही, तभे तो आज नारी शक्ति मन घलो साहित्य सृजन मा अघवा हे। वइसे तो छत्तीसगढ़ी साहित्य के पहली बेर लिखित प्रमाण भक्ति काल मा मिलथे, ये काल मा धनी धरम दास जी मन काव्य सृजन करिन। संग मा उंखर धर्मपत्नी आमीन माता के छत्तीसगढ़ी मा काव्य सृजन के बात घलो सामने आथे। आजादी के पहली छत्तीसगढ़ी के काव्य सृजन मा नारी शक्ति मनके वर्णन नइ मिले, फेर आजादी के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य मा उन मन बढ़ चढ़ के साहित्य सृजन करत दिखथें। लगभग साठ, सत्तर के दशक मा महिला शक्ति मन छत्तीसगढ़ी साहित्य सृजन करे बर लग गे रिहिन।फेर छत्तीसगढ़ राज बने के बाद छत्तीसगढ़ी साहित्य मा नारी शक्ति के योगदान के का कहना। 2000 के बाद के काल ला उड़ान काल बनाये मा नारी शक्ति मनके घलो भरपूर योगदान हे। ये काल मा कवयित्री मन बढ़ चढ़ के छत्तीसगढ़ी भाँखा मा साहित्य सृजन करिन अउ अभो साहित्य सिरजाते हें। सन 1968 मा प्रकाशित छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "पतरेगी" ला छत्तीसगढ़ के पहली कविता संग्रह अउ ओखर रचयिता कवयित्री डॉ निरुपमा शर्मा ला छत्तीसगढ़ी के पहली महिला कवयित्री के रूप मा माने जाथें। इही समय शकुंतला शर्मा जी मन घलो काव्य सृजन करत रिहिन, उंखर प्रथम कृति "चंदा के छाँव मा ढाई आखर"  प्रकाशित होइस। आजो सरलग छत्तीसगढ़ी भाषा मा अपन मन के उदगार ला डॉ निरुपमा शर्मा,शकुंतला शर्मा के संगे संग डाँ शकुंतला तरार, डॉ अनसुइया अग्रवाल, डॉ सत्यभामा आडिल, सरला शर्मा, डॉ शैल चन्द्रा, सुधा वर्मा,उर्मिला शुक्ला, तुलसीदेवी तिवारी,मृणालिका ओझा, आशा दुबे,दीप देवी दुर्गवी,रंजना शर्मा, डॉ गिरिजा शर्मा, अर्चना पाठक,इंद्रा परमार, संतोष झाँझी,वासंती वर्मा, गीता शर्मा, ज्योति गबेल, सुधा शर्मा,संध्या रानी शुक्ला, चन्द्रावती नागेश्वर, सन्तोषी महंत श्रद्धा, गीता साहू,आशा देशमुख, शोभामोहन श्रीवास्तव, शशि साहू,आशा ध्रुव,संध्या सरगम,आशा दुबे, चित्रा श्रीवास,गीता विश्वकर्मा, सुधा शर्मा,लक्ष्मी करियारे, रश्मि रामेश्वर गुप्ता,नीलम जायसवाल,चन्द्र वैष्णव,गीता देवी हिमधर,योगेश्वरी साहू,आशा भारद्वाज, अनिता सिंह, सुधा देवांगन, आशा मेहर, आशा आजाद, द्रौपती साहू सरसिज, इंद्राणी साहू साँची,सरस्वती चौहान,डाँ मीता अग्रवाल, पद्मा साहू पर्वणी,सुधा झा,उर्मिला देवी उर्मी, अनिता मंदिलवार,प्रभा साहू,पुनीता दरियाना, सुनीता कुर्रे, प्रतिभा प्रधान, चित्ररेखा तिवारी, रामकली कारे,सुजाता शुक्ला,सुमित्रा कामड़िया, केंवरा यदु मीरा, तुलेश्वरी धुरन्धर, शैल शर्मा, प्रिया देवांगन प्रियु, मेनका वर्मा, संगीता वर्मा, भारती राजपूत, निर्मला ब्राम्हणी,द्रौपती साहू, प्रियंका गुप्ता, मधुलिका दुबे,भारती पटेल,ममता राजपूत, सरिता लहरे,अनिता चन्द्राकर, जागृति बाघमार,सुखमोती चौहान,धनेश्वरी सोनी गुल, वसुंधरा पटेल, अन्नापूर्णा पवार,सुष्मा पटेल,हिमकल्याणी सिन्हा, कविता वर्मा,गीता चन्द्राकर, सुचि भुवि,जमुना देवी गढ़ेवाल,शैलेन्द्री परिहार,गीता दुबे आदि अउ कतको कवयित्री मन व्यक्त करत हें। आवन छत्तीसगढ़ी भाषा महतारी ला समर्पित नारी शक्ति मनके मन के उद्गार के एक बानगी देखिन-

*प्राकृतिक छटा मन मा नव उमंग भर देथे, उही ला डॉ निरुपमा शर्मा जी कहिथें*

मन मउरे मउहा महक मारे ना।
सुरता के हिरना डहक मारे राजा महक मारे ना
दोनु आंखी मा तोला मैं काजर बनाएवं
नदिल गेंदवा मा रे पिरोहिल बैठारेंव ।
एक एक बोली मा चहक मारेव मैना ……..
लाली चूरी टिकली रे लाले हे महाउर
मोहनी आंखी के हे कटारी आमा मउर
हुलकथे जीउ अधिआये डारे मैना......

*सरसी छन्द मा,गोस्वामी तुलसीदास जी ला भाव पुष्प अर्पित करत, शकुन्तला शर्मा जी लिखथें*-

आशा के प्रतीक ए तुलसी धरिस एक अभियान
राम - नाव के पाइस डोगा शकुन देख अउ जान ।
रामचरित आधार बनिस हे जाग शकुन तै आज
पय-डगरी जब मिल जाथे तव सुफल होय सब काज ।
जैसे सोच समझ फल तैसे चिंतन लै आकार
शुभ चिंतन के फल भी शुभ हे देख शकुन हर बार ।
तुलसी राज-धर्म समझाइस शकुन तोर  अधिकार
धर्म - अर्थ चारों ला पा ले भवसागर कर पार ।
मनखे जनम बहुत दुर्लभ हे शकुन बात ला मान
धर्म गली मा चल तुलसी कस तै मत बन अनजान ।
तुलसी - बबा बताइस धरसा शकुन तहू पहिचान
अब दिन बूडत हावै नोनी झट के तंबू तान ।

*शिक्षा के अलख जगावत शकुन्तला तरार जी लिखथें*-

पढ़े बर चल दीदी
पढ़े बर चल बहिनी
पढ़े बर चल वो दाई
 भाग ल हम अपन चमकाबो
पढ़े बर चल वो दीदी
आवो चल कमला तयं
अउ चल बिमला तयं रे...
 मेटाबो अगियानता के अंधियारा ला
 शिक्षा के जोत बारबो रे
नान्हे-नान्हे लईका चलव
बूढ़ी दाई काकी चलव रे...
नईं हम रहिबोन अब अनपढ़ वो
बिद्या के गंगा लानबो रे
बनी भूती हम जाबोन
 ठिहा कमाये जाबोन...
दिन भर मिहनत ला हम करबोन
संझा पढ़े जाबों रे...
अब कोनो नई ठगही
अंगठा हम नई चेपावन रे...
रद्दा खुदे हम अपन गढ़ लेबोन
नवा निरमान करबो रे...

*कोरोनाकाल मा जनजागरण करत आशा देखमुख जी के एक समसामयिक शंकर छंद*

आये हावय कोरोना हा, लोगन बड़ डराय।
फइलत हवय महामारी कस,कोन कहाँ लुकाय।
संसो मा सरकार घलो हे,देत हें संदेश।
जनता ला मिलके लड़ना हे,भागय सबो क्लेश।
सावचेत हें देश प्रशासन ,कोनो झन डराव।
जागरूकता फ़इलावव सब ,सुरक्षा अपनाव।
साफ सफाई बहुत जरूरी,धोवत रहव हाथ।
मेल जोल से दूर रहव सब, देश हावय साथ।।
रूप धरे ईश्वर हा देखव,डॉक्टर वो कहाय।
कतको मन के प्राण ल देखव,सेवा कर बचाय।
जनता कर्फ्यू लगत हवय जी,लोग मानौ बात।
मर जाये दुष्टिन कोरोना ,मारव अबड़ लात।

*पतझड़ जे बाद बहार आथे, दुख के बाद सुख आथे, इही बात ला, घनाक्षरी मा बाँधत शोभामोहन श्रीवास्तव जी लिखथें*-

पाना पतझर मा झरे,आवय तभे बहार ।
दुख पाछू सुख हे लगे,लहुटे पहुटे बार ।।
लहुटे पहुटे बार चलत नर ,लाख जतन कर ।
सुख के चक्कर,दुखद गली धर,कतको मर मर।
छोड़ गाँव घर,कहूँ मेर टर,नइ छोंड़य डर ।
बेरा हे खर,बोलत झरझर, पाना पतझर ।।

*बरवै छंद मा, बढ़े मँहगाई ला देखत शशि साहू जी लिखथें*-

मुँह फारे मँहगाई, सुरसा ताय।
जतका होय कमाई,मुँह मा जाय।
सबो जिनिस हर मँहगी,दुरिहा होय।
काला खाँव बचावँव,जिनगी रोय।
बाई मारय ताना, नइ तो भाय ।
घानी कस मँय बइला रथो फँदाय।
चुहके आमा दिखथे काया मोर।
मँहगाई के आघू, खडे़ धपोर।
अजगर कस फुफकारे,मारय पेट।
सबो जिनिस के बाढे़ हावय रेट।
मँहगाई हर मारे, रोजे लात।
पीठ पेट हर सँघरा रोवय रात।

*अमृत ध्वनि छंदछ्न्द मा पद्मा साहू पर्वणी राखी तिहार बर लिखथें*-

राखी के पबरित परब,  पुन्नी सावन मास।
भाई बहिनी के परब, दया मया के आस ।।
दया मया के, आस जगाथे, राखी धागा ।
बाँध कलाई, प्रीत बढ़ाथे, तब ये तागा।
माथे चंदन, तिलक लगाथे, दुनिया साखी।
बहिनी बाँधय, भाई ला जी, सुग्घर राखी।।

*वीर शहीद मनके सुरता करत सार छ्न्द मा चित्रा श्रीवास जी लिखथें*-

सुरता अब तुम करलव संगी,पावन दिन हा आगे ।
मिले रहिस आजादी हमला ,हमर भाग हा जागे।।
हाँसत झूलत फाँसी चढ़गे, खुदीराम बलिदानी ।
तिलक भगत अउ लक्ष्मी बाई,देइन हे कुर्बानी।।
बेटा भारत माता के सब ,हावन भाई भाई।
मिलजुल रहिबो जम्मो मनखे, होवन नही लड़ाई।।

*रक्तदान ला महादान कहिथें, उही ला बतावत रामकली कारे जी लिखथें*-

जग मा बढ़ के हे सुनौ, रक्त दान के दान।
बूॅद - बूॅद दे रक्त ले, बाॅचय मनखे प्रान।।
बाॅचय मनखे, प्रान रक्त दे, जस ला पावव।
नेक करम के, काम आज गा, कर देखावव।।
कली कहे सुन, मानवता भर, अपनो रग मा। 
सबो दान ले, रक्त दान हा, बढ़ के जग मा।।

*मद्यपान निशेष के संदेश देवत सुधा शर्मा जी कज्जल छंद मा लिखथें*-

करत हवे जिनगी उजाड़।
टूटत सबो घर परिवार ।।
बाढ़त नशा अतियाचार।  
हे समात मन मा विकार।।
गारी दाई बाप देत।  
बोले के गा नहीं चेत।।
कोनो देवत गला रेत।
नशा सेती सबोअचेत।।
छोड़व गा सब नशा पान।
एमा ककरो नहीं मान।।
डहर बने रेंगव मितान।
बनके सबो रहव सुजान।। 
जाँगर टूटत करे काम।
दारू भठ्ठी गये शाम।।
दिए कमाय पइसा फेंक। 
लाँघन लइका घर म देख।।

*कुंडलियाँ छ्न्द मा गुरु वंदना करत नीलम जायसवाल जी लिखथें*-

गुरु के चरण पखार लव, मन ले देवव मान।
गुरु के किरपा ले बनय, मूरख हा गुणवान।।
मूरख हा गुणवान, चतुर की निरमल बनथे।
जेखर पर गुरु हाथ, उही आकाश म तनथे।।
जइसे गरमी घाम, छाँव निक लागे तरु के।
वइसे शीतल होय, बचन हा हरदम गुरु के।

*नवा शिक्षा के लाभ बतावत तातन्क छ्न्द मा आशा आजाद जी लिखथें*-

शिक्षा के अनमोल रतन ले,करलव मन उजियारा जी।
हर विपदा  मा पार  लगाही,मिट जाही अँधियारा जी।।
जम्मो कारज  बन जाथे जी,तुरते हल मिल जाथे जी।
जेखर मन मा ज्ञान दीप हे,जिनगी भर सुख पाथे जी।।
वैज्ञानिक बन जाथे कतको,खोज करें आनी बानी।
जब मशीन नावा खोजे ता,तब कहलाथे ओ ज्ञानी।।
शिक्षा के तकनीक देखले,नव विधि आज पढ़ाये गा।
प्रोजेक्टर  मा  चित्र  देख ले,सबला  देख  बताये गा।।
कम्यूटर  मा  सबो  आँकड़ा,राख  सुरक्षा  दे जानौ।
जनम मरन के कागद लेले,सुग्घर सुविधा ला मानौ।।

*करिया बादर देख पुष्पलता भार्गव लिखथें*-

जा रे, जा रे,करिया बादर
      जा के मुहूँ लुका  रे ...
संगी के सुरता आथे
        करौं में ह का रे...
तैं आथस त मन मा उठथे
     पीरा बिजुरी जइसे ...
का हो जाथे तन अऊ मन ला
     काहव में ह कइसे...
पानी मा तन ह जरगे,उठै गुंगुवा रे
जा रे,जा रे....
वो निर्मोही ,वो परदेसी
    आए नहीं अब ले....
रद्दा देखत पखरा बनगे
    आंखी मोरे कबले...
का जादू करके गे हे,वो टोनहा रे

*चेत धरे बर कहत द्रोपदी साहू सरसिज लिखथें*-

द्रोपती साहू "सरसिज"महासमुन्द, छत्तीसगढ़

का गरज परे हे दूसर के,
      तिहीं तोर रद्दा ला चतवार।
चर देही हरहा मन खेती,
      तिहीं अपन धनहा रखवार।।
पर भरोसा रहिबे झन तैं ,
      जिनगी अपन तँय संवार।
चेत लगाके बुता करबे,
      होबे झन गंजहा मतवार।।
चील जइसन नेत जमाए,
        बइठे जइसे हे हितवार।
केकरा कस रेंगे दुनो कोति,
      वो मन नो होय तोर लगवार।।

*बसंत पंचमी मा माँ वीवापानी ला भाव पुष्प अर्पित करत गायत्री श्रीवास जी लिखथें*-

सबके मन ला भागे संगी,सुग्घर मौसम आगे  |
ये बसंत पंचमी सुहावन,मन मा आस समागे|
अवतार लिये माँ हंसवाहिनी,वाणी के देवइया हा |
श्वेत वस्त्र ला धारन करथे,मातु शारदा मइया हा ||
मिल-जुल के सब पूजा करबो,हमर भाग हा जागे

*जाड़ा के आरो देवत कावेरी साहू जी लिखथें*-

जाड़ के महिना आगे दाई,जुड़हा हवा चलत हे।
सर-सर धुँकी चलत हे,हाथ अउ गोड़ कँपत हे।।
दाँत हा अइसे कटरत हे,जइसे चना चबावत हे
जूड़ चीज तो छुवन नइ भावय,ताते तात खवाथे।
बासी ला तो दुरिहा रखदे,भाते भात सुहाथे।।
पुरवइया हा मारत रहिथे,करा बरोबर जनावत हे।
गली गली मा भुर्री बरथे ,लइका सब सकलाथे।
कथरी हा तो छोड़न न भाये,जाड़ा गजब सताथे।।
साल स्वेटर छुंटय नहीं अब,सुरुज घलो लजावत हे।

*मतगयंद सवैया मा सुधा देवांगन जी लिखथें*-

आगय पावन सावन मास ह,दूध दही म नहावय भोले।
जाप करें उपवास करें, सबके जिबिया शिवशंकर बोले।
देय  बने वरदान ल शंकर, दुःख हरे जिनगी नइ डोले
पीर सबो जन के हरके, शिव नाम दबे सुख भाग ल खोले।

    
*उपसंहार*-
छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य मा सबले जादा यदि कोनो विधा मा लिखे गेहे ता वो काव्य विधा आय। कवि मनके संख्या घलो दिन ब दिन बाढ़त दिखत हे। आज छत्तीसगढ़ मा अतेक कवि हे, जिंखर रचना अउ नाम के जिक्र कर पाना मुश्किल हे, तभो लेख मा कुछ कवि मनके नाम संघेरे के प्रयास करे हँव, उंखर नाम ला सोसल मीडिया या अन्य उपब्धत पुस्तक या फेर  कोनो पत्र पत्रिका पेज मा खोज करके,पूरा जानकारी लिये जा सकथे। उदाहरण स्वरूप दिये गय कुछ पंक्ति वो कवि अउ वो काल ला पूरा के पूरा बयां करे मा घलो असक्षम हे, तभो एक बागनी देय के प्रयास होय हे। आधुनिक काल के ज्यादातर कवि मन सोशलमीडिया मा जुड़े हे, उंखर रचना मन घलो फेसबुक, वॉट्सप मा दिख जथे, उंखर मनके चाहे तो नाम खोज के पढ़े जा सकत हे, बस अतेक नाम देय के अतके कारण हे। संगे संग एक कारण यहू हे कि वो कवि मन कोन काल मा रचना लिखिन या लिखत हे। काल विशेष मा संरेखाय कवि मनके नाम घलो आघु पाछु हो सकत हे, जइसे आजादी के
पहली के कवि मन आजादी के बाद घलो लिखिन, अउ आजादी के बाद के कवि मन छत्तीसगढ़ राज निर्माण के बाद लिखत रिहिन अउ कतको लिखते हें।
पर मुख्य बात तो आधुनिक काव्य के दशा दिशा ऊपर बात करना रिहिस, आलेख मा  सँरेखाय काव्य पंक्ति एक उदाहरण मात्र हे, जे वो समय ला ज्यादातर परिभाषित करत दिखिन, चाहे बात आदि काल के होय, या आधुनिक काल के। रचना के विषय वस्तु ही वो समय ला देखाथे, आधुनिक काल के समसायिक रचना जइसे कोरोना महामारी, महँगाई, बेमौसम बारिश, चन्द्रयान, शौचालय, चुनाव,धान खरीदी, मोबाइल, प्लास्टिक कचरा,नवा नवा यन्त्र औजार आदि समाज मा चलत वस्तु स्थिति के परिचय देवत दिखथे। नदी, पहाड़, धरती, पाताल, राम कृष्ण , दया मया मीत आदि सब,  आदि काल मा घलो रिहिस अउ आजो यथावत हे, ता स्वभाविक हे आजो येमा रचना होही अउ होवत घलो हे। फेर वो समय मोबाइल, शौचालय, चन्द्रयान आदि कई चीज नइ रिहिस ता नइ होइस। केहे के मतलब कवि के लेखन मा धरातल मा घटत विषय वस्तु के छाप रहिथे। आज आधुनिक काल के रचना ये काल ला दर्पण कस देखाय, एखर बर कवि मन ला समाज मा चलत चीज ला विषय वस्तु बनाके लिखना चाही, ताकि अवइया पीढी मन ये युग ला पढ़ के देख सके। 2000 के बाद के काल ला उड़ान काल केहे के मोर आशय ये हे, कि ये काल के कुछ दशक बाद कवि मनके संख्या अउ काव्य लेखन मा गजब के बढ़ोतरी होइस हे। *"आधुनिक युग के साहित्य मा पंख लग गेहे"* भाषाविद मन आधुनिक काल मा साहित्य के बढ़वार देख  अइसन कहत नइ थके। फेर पंख हे ता उड़ान तो दिखबे करही। आज साहित्य मा उड़ान देखते बनत हे। आज हजारों कवि कवयित्री मन छत्तीसगढ़ी काव्य के सृजन मा सरलग लगे हें।  छ्न्द के छ के आय के बाद  सन 2016 मा उड़ान भरत नव कलमकार मन ला *छ्न्द के छ नामक* एक माँजा डोर मिलिस, जे उन मन ला साहित्य के जमीन मा बाँधे रखिस, जेखर परिणाम स्वरूप आज छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य महतारी भाषा के अन्तस् मा बंधाये ऊँच आगास मा उड़त दिखत हे। यदि ये आंदोलन नइ रहितिस तभो ये काल उड़ान काल हो जतिस, काबर कि नव कलमकार मा साहित्य ला उड़ाय छोड़ खुदे मन के लिखत उड़ित रिहिन। आजो हवाई यात्रा सबले महँगा हे, फेर ओखर उड़े अउ उतरे के ठौर ठिकाना,तिथि बार हे तब।

जीतेंन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)

Monday, 28 September 2026

विश्व रेबीज डे" के अवसर मा* सरसी छंद -गीत

 *"विश्व रेबीज डे" के अवसर मा*


सरसी छंद -गीत


भूं भूं भूं भूं गली खोर मा, करँय कुकुर मन रोज।

रेंगव सबझन साव चेत हो, अपन पाथ मा सोज।।


कई पोंसवा कई सीधवा, कई करें उत्पात।

हबक दिही कब काय भरोसा, हरे कुकुर के जात।।

चाबे चाहे नख गड़ जाये, लेवव टीका डोज।।

भूं भूं भूं भूं गली खोर मा, करँय कुकुर मन रोज।।


जहर कुकुर के होथे घातक, तुरते करव उपाय।

झट ले जावव डॉक्टर तीरन, नइ ते होथे बाय।।

दे देहे विग्यान मनुष ला, रेबीज दवा खोज।

भूं भूं भूं भूं गली खोर मा, करँय कुकुर मन रोज।।


देव दवाई टीका गोली, तब घर भीतर लाव।

रखव कुकुर ला कुकुर बरोबर, देव मनुष ला भाव।।

कई कुकुर बइठे गद्दी मा, बनके राजा भोज।

भूं भूं भूं भूं गली खोर मा, करँय कुकुर मन रोज।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Monday, 21 September 2026

सर्वगामी सवैया

 सर्वगामी सवैया


1,(भोला भण्डारी)
माथा म चंदा जटा जूट गंगा गला मा अरोये हवे साँप माला।
नीला  रचे  कंठ  नैना भये तीन नंदी सवारी धरे हाथ भाला।
काया लगे काल छाया सहीं बाघ छाला सजे रूप लागे निराला।
लोटा म पानी रुतो के रिझाले चढ़ा पान पाती ग जाके सिवाला।

2,(गाड़ी सड़क के)
लामे हवे रोड चारों मुड़ा मा लिलागे गली खोर खेती ग बाड़ी।
कोनो अकेल्ला त कोनो चढ़े चार मारे ग सेखी धरे देख गाड़ी।
आगी लगे  हे  मरे  जी  कुदावै  गिरे  हाथ टूटे  फुटे मूड़ माड़ी।
भोगे सजा देख कोनो के कोई कभू तो जुड़ागे जिया हाथ नाड़ी।

3,(ताजा भोजन)
तातेच खाना मिठाये सुहाये बिमारी ल बासी ग खाना ह लाने।
ताजा रहे साग भाजी घलो हा पियौ तात पानी ग रोजेच छाने।
धोवौ बने हाथ खाये के  बेरा म कौरा कभू  पेट जादा न ताने।
खाये  ग  कौरा  पचाये  बने  तेन गा आदमी रोग राई न जाने।

4,(बेटी बिहाव म पानी)
आये बराती खड़े हे मुहाटी म पानी दमोरे करौं का विधाता।
राँधे गढ़े भात बासी म पानी पनौती मिहीं हा हरौं का विधाता।
एकेक कौड़ी ल रोजेच जोड़ेव आगी लगा मैं बरौं का विधाता।
सोज्झे गिरे गाज छाती म मोरे तभो फेर आशा धरौं का विधाता।

5,(होली के रंग,डोली मा)
होरा चना के खवाहूँ ग आबे घुमाहूँ सबो खेत डोली ल तोला।
हे  कुंदरा  मेड़  मा बैठ लेबे सुनाहूँ ग पंछी के बोली ल तोला।
टेसू फुले खूब लाली गुलाली दिखाहूँ ग भौंरा के टोली ल तोला।
पूर्वा  बसंती  घलो फाग  गाये खवाहूँ  बने भांग गोली ल तोला।

6,(बने बूता बने बेरा म)
माटी के काया म माया मिलाये ग बूता बने संग साने नही गा।
बूता बड़े हे हवे नाम छोटे दिही काम हा साथ आने नही गा।
टारे बिधाता के लेखा भला कोन होनी बिना होय माने नही गा।
बेरा रहे काम बूता सिराले अमीरी गरीबी ल जाने नही गा।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"के गीतिका छंद

 जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"के गीतिका छंद


दाई
तोर अँचरा के तरी मा,घाम हे ना जाड़ वो।
दूध पी मैं तोर दाई,गेंव अतका बाढ़ वो।
तोर पँवरी नित परँव मैं,जे सरग के छाँव वो।
मैं मया ले तोर दाई,झन कभू दुरिहाँव वो।1।

मया
आग इरसा के धरे हस,बोल हे चारी सहीं।
छोड़ के तैं प्रीत फोकट,काटथस आरी सहीं।
काखरो ले तोर काबर,नइ पटे तारी सहीं।
धर मया भर भर मुठा तैं,बाँट देवारी सहीं।2।

जेठ बैसाख
जेठ अउ बैसाख आथे,तब बियापे बेर हा।
का बतावँव बात मनके,घेर लेथे ढेर हा।
झाँझ ताते तात चलथे,चाम जलथे घाम मा।
धार धर झरथे पछीना,नइ लगे मन काम मा।3।

कपूत नहीं सपूत बनो(किरीट सवैया)

 कपूत नहीं सपूत बनो(किरीट सवैया)


देखव ए जुग के लइका मन  हावय  अब्बड़  हे  बदमास ग।
बात कहाँ सुनथे कखरो बस दाँत  निपोरय ओ मन हाँस ग।
मान करे कखरो नइ जानय  होवत हे मति हा  अब नास ग।
संगत साथ घलो बिगड़े बड़ दाइ ददा रखही कइसे आस ग।

पूत सपूत कहूँ मिल जातिस नैन नसीब म काबर रोतिस।
राम सहीं लइका हर होतिस दाइ ददा नइ लाँघन सोतिस।
जानत  होतिस  दाइ ददा तब फोकट बन ला काबर बोतिस।
नाँव बुझावँव वो कुल के तब ओखर भार ला काबर ढोतिस।

आस  धरे  बड़   पालय  पोंसय  पूत  बने  बन  मान  बचावव।
ध्यान रखो ग सदा सुख के दुख के झन जी अब नाच नचावव।
जावत  हावव छोड़ कहाँ घर द्वार सबो मिल साथ बसावव।
लाय हवे जग मा तुँहला भगवान हरे हरे नित माथ नवावव।

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

किसन के मथुरा जाना(मत्तगयंद सवैया)

 किसन के मथुरा जाना(मत्तगयंद सवैया)


आय हवे अकरूर धरे रथ जावत  हे मथुरा ग मुरारी।
मात यशोमति नंद ह रोवय रोवय गाय गरू नर नारी।
बाढ़त हे जमुना जल  हा  जब  नैनन नीर झरे बड़ भारी।
थाम जिया बस नाम पुकारय हाथ धरे सब आरति थारी।

कोन  ददा  अउ  दाइ  भला  अपने  सुत  दे बर  होवय राजी।
जाय चिराय जिया सबके जब छोड़ चले हरि गोकुल ला जी।
गोप  गुवालिन  संग  सखा  सब काहत हावय जावव ना जी।
हाल कहौं कइसे मुख ले  दिखथे बिन जान यशोमति माँ जी।

गोकुल मा नइ गोरस हे अब गाय गरू ह दुहाय नहीं जी।
फूल  गुलाब  न हे कचनार मधूबन हे नइ बाग सहीं जी।
बार तिथी सब हे बिगड़े बिन मोहन रास रचे  न कहीं जी।
जेखर जान निकाल दिही कइसे रइही ग बता न तहीं जी।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)

हिजगा(दोहा-चौपाई)

 हिजगा(दोहा-चौपाई)


*हिजगा पारी के कथा,कहत हवँव मैं आज।
कहत कहत मोला घलो,आवत हे बड़ लाज।*

एक ददा के दू हे टूरा,दोनों झन बड़ धरहा छूरा।
पटे नही दोनों के तारी,करें एक दूसर के चारी।।

एक मंगलू एक छगन हे,अपन अपन मा दुनों मगन हे
एके हे घर बखरी बारी,करे काम बस हिजगा पारी।।

फ्रीज रेडियो मोटर गाड़ी,लेवय दोनों हिजगा पारी।
जइसन करनी करे एक झन,तइसन होवै दूसर के मन।

उँखर समझ आये ना  चक्कर,दोनों मा काँटा के टक्कर।
करे गरब बड़ हाड़ मास मा,चारी होवय आस पास मा।

बर बिहाव का मरनी हरनी,एके रहै दुनों के करनी।
ओढ़े देखावा के चोला,लेवय बारुद अउ बम गोला।

देखावा मा पइसा फेके, लड़े भिड़े बर रोजे टेके।
मान गौन सँग धन अउ दउलत,हिजगा पारी मा हे पउलत।

मन मा रखके हिजगा पारी,देय एक दूसर ला गारी।
ददा धरे सिर दुखी मनाये, कोन दुनों झन ला समझाये।

तड़फै कभू ददा पसिया बर,कभू खाय अड़बड़ टठिया भर।
कभू झुलावै दुनों हिंडोला,कभू गिरावय दुख के गोला।

हरहर कटकट रोजे ताये,देख ददा दुख प्राण गँवाये।
तभो दुनों ना हिजगा छोड़े,कुवाँ एक दूसर बर कोड़े।

*परलोकी दाई ददा,रिस्ता नत्ता तोड़।
हिजगा पारी मा तिरै, भाई भाई गोड़।*

धन अउ धान सबे झट उरके,दुनों एक दूसर ले कुड़के।
लड़े भिड़े जादा अउ खुल के,बोरों दोनों नाँव ल कुल के।

लइका मन मा अवगुण आये,देख दुनों झन दुखी मनाये।
खुदे बार डारिस हे घर ला,का बद्दी दे पाही पर ला।

लइका मन हा बनगे लावा,अब का चिंता अउ पछतावा।
करे काम ला मातु पिता के,जोरे लकड़ी उँखर चिता के।

हिजगा पारी काय काम के,घर बन बारे द्वेष थाम के।
सुख ले जिनगी जीना चाही,मया पिरित सत पीना चाही।

हिजगा पारी के बीमारी,अच्छा नोहे जी सँगवारी।
छोडों झगड़ा झंझट चारी,दया मया धर बध लौ यारी।

छगन मंगलू झन होवव जी,इरसा द्वेष म झन खोवव जी।
चारी  चुगली  द्वेष  लबारी,छोड़व भैया हिजगा पारी।

*हिजगा पारी ला  धरे,जेन जेन अँटियाय।
तेखर नइया एक दिन,बीच धार बुड़ जाय।*

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
9981441795

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पुतना वध(दुर्मिल सवैया)

 पुतना वध(दुर्मिल सवैया)

किसना घर जावव मार गिरावव कंस कहे सुन हे पुतना।
कहना सुन के पुतना कइथे झट जावत हौं किसना ग कना।
पुतना रँग रूप बनेच बनाय बढ़े स्तन ला बिष मा ग सना।
पुतना ललना ल धरे किंजरे ग तभो नइ मात करे ग मना।

चुपचाप धरे पुतना ललना उड़ गोकुल बाहिर जावत हे।
छतिया म लगाय हवे बइरी अउ गोरस देख पियावत हे।
स्तन मोहन चाब दिये तब वो पुतना बइरी बगियावत हे।
हरहूँ झट मोहन प्राण कही अपने सँच भेस म आवत हे।

कटरे बड़ दाँत नटेर ग देखय मार सके नइ मोहन ला।
छिन मा बढ़के गरजे बरसे छिन छोट करे अपने तन ला।
सब देख हवे बड़ ब्याकुल गा पुतना सँग मोहन के रण ला।
बलराम कहे बस धीर धरौं सब बाँध रखौ  अपने मन ला।

पुतना बिलखे बड़ रोवत हे जब मार पड़े मुटका
जमके।
मरके तरगे मनमोहन हाथ म भाग ह ओखर गा चमके।
सब गोकुल के जन देखत हे सँग देखय नीर हवा थमके।
अवतार हरे हरि के किसना गुणगान करौं ग सबो रमके।

ललना ल लगाय हवे छतिया मइया खुश हो बड़ रोवत हे।
प्रभु खेल करे सबके मन भावय मीत मया जग मोवत हे।
अटके भटके नइया सबके तब खेवन हार ह खोवत हे।
बरसा करथे सुर फूल धरे जयकार सबो खुँट होवत हे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को (कोरबा)

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" के जयकारी छंद(जनउला)

 जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया" के जयकारी छंद(जनउला)


जड़काला मा जे मन भाय,गरमी घरी अबड़  रोवाय।
बरसा भर जे फिरे लुकाय,ओखर बता नाम का आय।1

हावय जेखर दू ठन गोड़,बइठे बबा पालथी मोड़।
गोड़ तिरइया के हे चार,भागे जेहा खारे खार।2।

घर भीतर हे सीटी मार,बइठे धरे भात अउ दार।
कोनो नइ ओला खिसियाय,हेर हेर के सब झन खाय।3

आघू मा बइठे रोवाय,नइ खावय वो तभो खवाय।
कान धरे अउ अबड़ घुमाय,काम होय सब छोड़ भगाय।4।

हाँड़ी के सबदिन आधार,खाये सब झन भूँज बघार।
रंग भूरवा रहिथे गोल,राजा हरे नाम दे बोल।5।

महतारी मन पोंसय साँप,बाढ़य ता खुश होवय नाँप।
तेल फूल अउ साबुन खाय,कनिहा उप्पर चढ़ मटकाय।6।

चार गोड़िया बोझा ढोय,उप्पर दुई गोड़िया सोय।
घर भीतर मा डेरा डाल,लादे कथरी चद्दर साल।7।

साबुन राख लगावै नाँच,तापय नहा खोर के आँच।
धनिया मिरी तेल अउ नून,माँगय पर बर दूनो जून।8।
जवाब-1)घाम,2)गाड़ा,3)कुकर,4)जाँता,5)आलू, 6)बेनी,7)खटिया,8)कढ़ाई

सृंगार-दोहा

सृंगार-दोहा

पड़ड़ी चंपा  फूल के,गजरा  लिए बनाय।
खोपा बीच लगाय हे, गली खोर ममहाय।

सेंदुर हे  बिजुरी  बरन, सोहे  मांग के बीच।
पवन चलय चुंदी हलय, जिवरा लेवे खीच।

टिकली दिखय कपार मा, चंदा जइसन गोल।
पान  खाय  मुँह  लाल  हे,बोले  गुरतुर  बोल।

पहिरे फूली सोन के,चमचम चमकय नाक।
करन फूल  हे कान मा, नरी  हार  के धाक।

माला  मुँदी  छभाय  हे, का चाँदी का सोन।
पुतरी कस सँउहत लगे,काहत हौं सिरतोन।

लाली लुगरा गजब फभे,हाथ  चुरी  हे लाल।
सूरुज लाल लजात हे, लाल दिखत हे गाल।

मुंदरी  अंगरी  मा  सजे,भरे   भरे   हे   हाथ।
ककनी बनुरी जब बजे,भुलय चलइया पाथ।

करधन हे कइ ताग गे,होवय कतको बात।
सुघराई   ला  देख  के,बुरई   हवे   भगात।

छुनुर छुनुर पैरी करय, बिछिया छाँटी पांव।
जेवर हे  हर अंग  मा, कइसे  महिमा  गांव।

महक भरे हे सरीर मा, एड़ी महुर लगाय।
गहना  गुठिया गोदना,देखय परी लजाय।

जीतेंद्र वर्मा
बालको(कोरबा)

बाँटा(दोहा)

 बाँटा(दोहा)

बाँटे   मा   बाढ़े   मया,  बाँटे  बाढ़े ग्यान।
बाँटे मा दुख कम लगे,खाये बाँट सियान।

पेट  भरे  के बाद मा ,आगर झन तैं बोज।
देदे भले भुखाय ला,तड़पय कतको रोज।

बाँचे  बासी  बाँट ले,बाँटव  बाँचे  साग।
दया मया ला बाँट ले,आही तभे सुराज।

बाँटे  मा पहिचान बने,बाँट मान सम्मान।
देवन कस देवत रहा,हाथ खोल के दान।

मनखे मन ला बाँट झन,बाँट न इरसा द्वेस।
घर  दुवार  झन  बाँट तैं,बाँट  राज ना देस।

बाँटा   बाँटय  बैर   ला, भाई  भाई   बीच।
बाँटा काँटा झन बनय, फूल मया के छीत।

भाई  बसे  परोस  मा , टाँगे  हे  तलवार।
सगा   दगा  देवत   हवे, होवे  हाँहाकार।

जीतेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)

पथना बोले चीख के(दोहा)

 पथना बोले चीख के(दोहा)


चंदन चोवा जल चढ़े,कभू फूल अउ हार।
देवन  कस पूजय कभू,मंदिर  मा बइठार।

सबके  झेलँव  भार  मैं ,बनके  भीतर  नेंव।
घाव करे तन मा अपन,हँसिया बसुला टेंव।

लद्दी  भीतर  फेक  दे,पँवठा  मैं  बन जाँव।
लड़ई कर झन फेकबे,उजर जही जी गाँव।

लइका  खेले  खेल मा,मारतूल  धर हाथ।
विष्णु घलो पथना बने,हे तुलसी के साथ।

नँदिया नरवा ताल के ,कभू बनँव मैं पूल।
कभू पड़ँव मैं पाँव मा,कभू धरँव मैं फूल।

शेर  दहाड़े  देख  ले,बइठे  छाती मोर।
घर बन सागर डोंगरी,मैं हौं चारो ओर।

पथना  बोले  चीख   के,  माटी  होके  देख।
कभू कड़ा कोमल कभू,बनही बढ़िया लेख।

समय समय के बात हे,काम आय जी धूल।
कभू  धार  हथियार  मैं, कभू बनँव मैं फूल।

कखरो उप्पर हाँस झन,गरब भरौं झन कूट।
कहाँ  किसानी  मोर  में,जान  गरब के छूट।

हवे रूप के खेल जी,जग के वासी सीख।
रूप अपन संवार तैं, काहत हँव मैं चीख।

नेक काम जग मा करौं,मनखे तैंहर चेत।
पथरा  घलो  ह  घूर के ,हो जाथे जी रेत।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)


Friday, 18 September 2026

काँसी फूल-सरसी छंद

 काँसी फूल-सरसी छंद


सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।

छटा धरा के लगे सुहावना, जब काँसी मुस्काय।।


हरियर धरती सादा फूल मा, सज हो जाथे खास।

मनुष देव अउ पितर घलो ला, आये फुलवा रास।

देत बिदाई बरसा ऋतु ला, शरद मास परघाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


चारो मूड़ा छाये दिखथे, स्वेत काँस के फूल।

हाथ हलाके नाचे लगथे, पुरवइया मा झूल।।

दिखे गगन कस दिन भर धरती, बिहना बरफ जनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


तना फूल जड़ सब काँसी के, आथे अड़बड़ काम।

माटी ला बोहान देय नइ, पके घास दै दाम।।

डोरी बहरी खटिया मचिया, जाने तौन बनाय।

सादा सादा काँसी फुलवा, जिवरा ला हर्षाय।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बढ़त चमचाई- लावणी छंद

 बढ़त चमचाई- लावणी छंद


घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।

अउ बाहिर मा रिस्ता जोड़े, रातउ दिन चमचाई ले।।


बात बात मा मुँहफट होके, नियम धियम गनवात रथे।

हक के बात घरे मा करथे, बाहिर मुड़ी नवात रथे।।

कथनी करनी जेखर करिया, ओहर बड़े कन्हाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


ददा बनावत हे आने ला, दरदर भटका खावत हे।

देखावा के नत्ता जोरे, कुकुर बरोबर धावत हे।।

बाज आत नइहे धक्का खा, रहि रहि पुछी हलाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।


चमचागिरी बढ़त हे भारी, आघू अउ अब का होही।

स्वभिमानी गिनके बाचे हे, कोन सुमत समता बोही।।

सत के बाना कोन बोहही, उबर असत लत खाई ले।

घर मा लड़त भिड़त हे टूरा, ददा बहिन माँ भाई ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

बाढ़त बिजली बिल-(16-12)

 बाढ़त बिजली बिल-(16-12)


टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।

नेता अधिकारी बैपारी, लूटत हावैं मिल के।।


वाट वाट कहि वाट लगावै, रुपिया वसुलै भारी।

छोट वाट के लट्टू पंखा, मीटर के मति हारी।।

बता बजावत रहिबों ताली, अउ केदिन मुँह सिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


बरत बगाबग एक ठिहा हे, एक ठिहा अँधियारी।

सरकारी बिल सर जावत हे, सिस्टम जस गंधारी।।

पाले हमर कोइला पानी, आन लेग के ढिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।


सोलर सिस्टम लेवव कहिके, चलत हवै मनमानी।

हाँसत हावय हिही हिही बड़ , घर मा बइठ अडानी।।

बँटे रेवड़ी आनी बानी, हमर चाम ला छिल के।

टेंशन हे बड़ टेंशन हे रे, बाढ़त बिजली बिल के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

Sunday, 13 September 2026

हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी भाँखा म अन्तर्सम्बन्ध

 हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी भाँखा म अन्तर्सम्बन्ध

          जइसे पानी ढलान कोती बहिथे, उसने भाषा घलो सरलता ल धरत जाथे। अब हिंदीच ल ले लौ संस्कृत- पाली- प्राकृत- तेखर बादअपभ्रंस होवत हिंदी। जइसे सरल सहज मनखे ल सबो चाहथे, वइसने भाषा के सरलता घलो ओखर अपनाये के कारण बनथे। पूर्वी हिंदी के अंतर्गत हमर छत्तीसगढ़ी भाषा आथे, जेमा अवधी, बघेली अउ हमर छत्तीसगढ़ी भाषा मिंझरे हे। ब्राम्ही लिपि ले उपजे जइसे हिंदी हे वइसने छत्तीसगढ़ी घलो हे। आज जब हमन हिंदी के बात करथन, तब आधुनिक युग के पहली के कवि सुर, तुलसी, कबीर, जायसी, केशव, बिहारी जैसे कवि मनके कालजयी रचना घलो हमर आँखी म झुलथे, जेमन के भाषा अवधी, ब्रज के साथ साथ कई ठन मिंझरा भाषा बोली रहिस। आधुनिक युग म तो ठेठ खड़ी बोली म जबर रचना होइस, जेमा भारतेंदु, पन्त, निराला, प्रसाद,महादेवी वर्मा, मैथलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, जइसे कतको कवि लेखक मन अपन जीवन ल खपा दीन। मोर कहे के मतलब हे कि हिंदी के समानांतर ही ब्रज अउ अवधी अपन स्थान रखथे, त छत्तीसगढ़ी काबर नइ रखे? जबकि हमर भाँखा घलो लगभग हिंदी के सबे गुण ल समेटे हे।  हो सकथे हमर साहित्य कमसल होही, या फेर ब्रज अउ अवधी कस ऊंचाई नइ पाइस होही। फेर हमर साहित्य घलो पोठ हे, कतको उत्कृष्ठ साहित्य हमर पुरखा कवि मन लिखे हे अउ आजो लिखावत हे, अइसन उदिम होवत देख इही कल्पना मन म आथे कि वो दिन दूर नइहे जब छत्तीसगढ़ी घलो ब्रज, अवधी के साहित्य कस हिंदी म मिल जही। 

        अब बात हिंदी अउ छत्तीसगढ़ी के अन्तर्सम्बन्ध के हो जाय। दूनों भाँखा के महतारी एके आय(ब्राम्ही), दूनो के रंग रूप, चेहरा- मुहरा एक्के जइसे हे, दूनो सगे बहिनी बरोबर हे। आजकल के कवि लेखक मन हिंदी वर्णमाला के जम्मो आखर ल बउरत घलो हे, जे बड़ खुसी के बात आय। *आन राज के कई मनखे मन हमर छत्तीसगढ़ी के बारे म कहिथे कि हिंदी ल बिगाड़ दव त छत्तीसगढ़ी हो जही* का सच म अइसने हे???? आपो मन कस मोरो न हे। येखर ले बचे बर छत्तीसगढ़ी के पाँच परगट शब्द ल बउरे ल लगही अउ हिंदी ल तोड़ मरोड़ करे ले बचेल लगही। हमर भाँखा के व्याकरण घलो हिंदी ले पहली बने हे, जेन हम सब बर गर्व के बात ये। एक बात अउ *जइसे मैं उप्पर म परगट शब्द लिखेंव, जे हिंदी के प्रगट के अपभ्रंश ये। परगट कहे म घलो अर्थ म कोनो प्रकार के भटकाव नइ लगत हे, अउ ये छत्तीसगढ़ म पूर्णतः चलन म घलो हे। अइसने कई ठन शब्द हे, जे हिंदी के अपभ्रंश के रूप म हमर भाँखा म रचे बसे हे ,अउ चलत घलो हे। जइसे ह्रदय(हिरदे),उम्र(उमर), दर्द(दरद), बज्र(बजुर), तीर्थ(तीरथ), छतरी(छत्ता)त्यौहार(तिहार) आदि आदि। कई ठन शब्द ल चिटिक बदलाव के साथ घलो बउरथन, जइसे व्याकुल(ब्याकुल), विनास(बिनास), व्रत(बरत), पर्व(परब), व्यवहार(ब्यवहार), वरदान(बरदान), वंदन(बंदन), वजन(बजन), वन(बन) आदि आदि। फेर येला देख के कतको झन कहि देथे की छत्तीसगढी म "व" नइ होय,, तेहा नइ जमे। पहली चलत घलो रिहिस हे, फेर ये बात गलत हे की 'व' ल लिखेच नइहे। होवत , बोवत, खोवत, पोवत काखर शब्द ये,,,, हमरे न,, त कइसे "व" नइ होही। यदि पहली कस(व बर ब लिखबों) आजो करबों त वर(दूल्हा) ल बर कहिबो। तब तो पेड़ वाले बर, काबर वाले बर अउ दूल्हा वाले बर, सब एक्के म जर बर जही। आज के लइका मनके रामेश्वरी, जागेश्वरी, रामेश्वर, ईश्वर, श्रवण, आदि घलो होथे, तिखर मरना हो जही। मोर एके इशारा हे अर्थ संगत शब्द ल बउरे जाय, अउ निर्थक या जेन वो संज्ञा ल बदल देय ओखर ले परहेज करना चाही। जइसे हिंदी म प्रकृति अब येला परकिरिती, प्रकार ल परकार, प्रकास ल परकास, क्षमा ल छिमा,शक्कर ल सककर, रायगढ़ ल रइगढ़,आदि आदि। ये मन थोड़ीक भ्रम पैदा करथे, तेखर सेती येमा चिंतन जरूरी हे अउ सही अउ स्पस्ट शब्द के माँग आज होवत घलो हे।*

       हिंदी के आखर अउ शब्द छत्तीसगढ़ी म घुरे हे,काहन या फेर  छत्तीसगढ़ी के शब्द मन हिंदी म घुरे हे काहन,,, येला सिद्ध करे म हमला कोनो ल नइ घूरना चाही। काबर भाँखा गतिमान हे, पानी असन स्वरूप बदलत जथे, कखरो पोगरी घलो नोहे। *एक छत्तीसगढिया मनखे घलो हिंदी लगभग समझ जथे, अउ हिंदी वाले छत्तीसगढ़ी, त येखर ले बढ़के अउ का अन्तर्सम्बन्ध देखन* हिंदी वाले घलो सहज छत्तीसगढ़ी पढ़ सकथे,अउ छत्तीसगढ़ी वाले घलो आखर ज्ञान के बाद हिंदी। काबर के पहली घलो केहेंव दुनो के रंग, रूप, चेहरा-मुहरा एके हे दुनो के *क* एक्के हे दुनो के *ट* एक्के हे। हिंदी के पिक्चर ल घलो छत्तीसगढिया मन मन लगाके देखथे अउ समझथे ,अब छत्तीसगढ़ी के पिक्कर आन कोती काबर नइ देखे जाय येखर बर खुद ल सोचेल लगही। *ब्रज भाँखा ले हिंदी के शान बाढ़िस, अवधी भाँखा ले हिन्दी के शान बाढ़िस त छत्तीसगढ़ी भाँखा ले हिंदी के शान काबर नइ बाढ़ही*।खच्चित बाढ़ही फेर उसने साहित्य हमर बीच म आय उसने पठन, पाठन अउ वाचन होय अतकी विनती हे।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में अंतर्संबंध

 

हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में अंतर्संबंध

​जिस प्रकार जल ढलान की ओर स्वाभाविक रूप से बहता है, ठीक उसी प्रकार भाषा भी सरलता को अपनाती हुई प्रवाहित होती है। हिंदी के विकासक्रम को ही देखें—संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, फिर अपभ्रंश से होते हुए आधुनिक हिंदी का स्वरूप सामने आया। जिस तरह सरल और सहज स्वभाव का मनुष्य हर किसी का प्रिय बन जाता है, वैसे ही भाषा की सरलता और सहजता भी उसके सर्वस्वीकार्य होने का मुख्य कारण बनती है।

​पूर्वी हिंदी के विशाल प्रांगण में छत्तीसगढ़ी भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, जहाँ अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी का सुंदर संगम दिखाई देता है। जिस प्रकार हिंदी की उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि से जुड़ी है, उसी गौरवशाली परंपरा से हमारी छत्तीसगढ़ी भी उपजी है। आज जब हम हिंदी की बात करते हैं, तो आधुनिक युग से पूर्व के सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, केशव और बिहारी जैसे कालजयी कवियों की रचनाएँ हमारी आँखों के सामने तैरने लगती हैं। इन महान कवियों की भाषा अवधी और ब्रज के साथ-साथ कई लोकबोलियों से परिपुष्ट थी। आधुनिक युग में जब ठेठ खड़ी बोली का दौर आया, तब भारतेंदु, पंत, निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद जैसे अनगिनत साहित्यकारों ने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य साधना में खपा दिया।

​मूल बात यह है कि जब हिंदी के समानांतर ब्रज और अवधी का अपना एक प्रतिष्ठित स्थान है, तो छत्तीसगढ़ी का क्यों न हो? जबकि हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा भी हिंदी के लगभग सभी समृद्ध गुणों को अपने भीतर समेटे हुए है। यह संभव है कि हमारा साहित्य मात्रा में थोड़ा कम रहा हो या फिर इसे ब्रज और अवधी जैसी ऐतिहासिक ऊँचाई न मिली हो; फिर भी हमारा छत्तीसगढ़ी साहित्य अत्यंत समृद्ध और प्रामाणिक है। हमारे पूर्वज कवियों ने अनेक उत्कृष्ट रचनाएँ रची हैं और आज भी यह सृजन-प्रवाह निरंतर जारी है। इस भागीरथ प्रयास को देखकर यह विश्वास दृढ़ होता है कि वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ी भी ब्रज और अवधी के साहित्य की तरह हिंदी के विशाल सागर में समाहित होकर उसकी शोभा बढ़ाएगी।

​अब बात करते हैं हिंदी और छत्तीसगढ़ी के अंतर्संबंध की। दोनों ही भाषाओं की जननी एक ही है—ब्राह्मी। दोनों का रंग-रूप, बनावट और स्वरूप एक जैसा है; मानो दोनों सगी बहनें हों। आज के आधुनिक कवि और लेखक छत्तीसगढ़ी में हिंदी वर्णमाला के सभी अक्षरों का प्रयोग निसंकोच कर रहे हैं, जो अत्यंत प्रसन्नता का विषय है।

​अन्य राज्यों के कुछ लोग कभी-कभी कह देते हैं कि "हिंदी को थोड़ा बिगाड़ दो तो छत्तीसगढ़ी बन जाती है।" क्या वास्तव में ऐसा है? बिल्कुल नहीं। इस भ्रांति को दूर करने के लिए हमें छत्तीसगढ़ी के अपने पाँच मौलिक (प्रकट) शब्दों का सही प्रयोग करना होगा और हिंदी को जबरन तोड़-मरोड़कर लिखने से बचना होगा। हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा का व्याकरण तो हिंदी से भी पहले लिखा जा चुका है, जो हम सभी के लिए अत्यंत गर्व का विषय है।

​उदाहरण के लिए, 'परगट' शब्द हिंदी के 'प्रकट' का ही तद्भव रूप है। 'परगट' कहने से अर्थ में कोई भटकाव या परिवर्तन नहीं आता और यह संपूर्ण छत्तीसगढ़ में पूरी तरह से प्रचलित भी है। ऐसे अनेक शब्द हैं जो हिंदी के अपभ्रंश या तद्भव रूप में हमारी भाषा में रचे-बसे हैं; जैसे—हृदय (हिरदे), उम्र (उमर), दर्द (दरद), वज्र (बजुर), तीर्थ (तीरथ), छतरी (छत्ता), त्योहार (तिहार) आदि।

​कुछ शब्दों का प्रयोग थोड़े से उच्चारण परिवर्तन के साथ किया जाता है; जैसे—व्याकुल (ब्याकुल), विनाश (बिनास), व्रत (बरत), पर्व (परब), व्यवहार (ब्यवहार), वरदान (बरदान), वंदन (बंदन), वन (बन) आदि। लेकिन इन प्रयोगों को देखकर कुछ लोग यह मान लेते हैं कि छत्तीसगढ़ी में 'व' वर्ण होता ही नहीं है—यह धारणा अनुचित है। प्राचीन समय से ही इसका प्रयोग होता आया है। 'होवत', 'बोवत', 'खोवत', 'पोवत' जैसे शब्द किसके हैं? हमारे ही तो हैं, फिर कैसे कह सकते हैं कि 'व' नहीं है? यदि हम हर जगह 'व' के स्थान पर 'ब' ही लिखते रहेंगे, तो 'वर' (दूल्हा) को 'बर' कहना पड़ेगा। इससे तो वटवृक्ष (बरगद), 'काबर' (क्यों) और 'वर' (दूल्हा) सब एक ही में मिलकर भ्रम पैदा कर देंगे। आज के बच्चों के नाम रामेश्वरी, जागेश्वरी, रामेश्वर, ईश्वर, श्रवण आदि रखे जाते हैं, अतः भाषा की शुद्धता का लोप नहीं होना चाहिए।

​मेरा स्पष्ट संकेत यही है कि हमें अर्थसंगत शब्दों का प्रयोग करना चाहिए तथा निरर्थक या संज्ञा का अर्थ बदल देने वाले शब्दों से परहेज करना चाहिए। जैसे हिंदी का 'प्रकृति' शब्द है, इसे 'परकिरिती', 'प्रकार' को 'परकार', 'प्रकाश' को 'परकास', 'क्षमा' को 'छिमा', 'शक्कर' को 'सककर' या 'रायगढ़' को 'रइगढ़' लिखना भ्रम उत्पन्न करता है। इसलिए इस विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक है और आज स्पष्ट एवं शुद्ध शब्दों की माँग उठ रही है।

​हिंदी के शब्द छत्तीसगढ़ी में घुले-मिले हैं या छत्तीसगढ़ी के शब्द हिंदी में, इसे सिद्ध करने के लिए हमें किसी से उलझने की आवश्यकता नहीं है। भाषा तो जल की भाँति सदा गतिमान रहती है, वह अपना स्वरूप बदलती रहती है और किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होती। एक साधारण छत्तीसगढ़ी भाषी व्यक्ति हिंदी को सहजता से समझ लेता है और हिंदी भाषी व्यक्ति छत्तीसगढ़ी को; इससे बड़ा अंतर्संबंध और क्या हो सकता है?

​अक्षर ज्ञान के बाद एक हिंदी भाषी व्यक्ति सहज छत्तीसगढ़ी पढ़ सकता है और छत्तीसगढ़ी भाषी व्यक्ति हिंदी। क्योंकि दोनों का आधार और बनावट एक ही है—दोनों का 'क' एक है, दोनों का 'ट' एक है। हिंदी की फ़िल्में छत्तीसगढ़ का जनमानस बड़े चाव से देखता और समझता है, अब छत्तीसगढ़ी सिनेमा को भी अन्य प्रदेशों तक पहुँचाने के लिए हमें स्वयं प्रयास करना होगा।

​जिस प्रकार ब्रजभाषा और अवधी ने हिंदी की शान और समृद्धि को बढ़ाया, उसी प्रकार छत्तीसगढ़ी भाषा भी हिंदी के वैभव को अवश्य बढ़ाएगी। निश्चित ही यह गौरव बढ़ेगा, बस आवश्यकता इस बात की है कि हमारे बीच वैसा ही उत्कृष्ट साहित्य रचा जाए, और उसका निरंतर पठन-पाठन तथा वाचन होता रहे।

​— जितेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)

अब बता-गजल

 अब बता-गजल


बिन काम के पद नाम होगे अब बता।

पैसा पहुँच मा काम होगे अब बता।।1


दू टेम के रोटी कहाँ होइस नशीब।

गारत पछीना शाम होगे अब बता।2


केंवट के शबरी के पुछइया कोन हे।

रावण के थेभा राम होगे अब बता।3


कहिथें चिन्हाथे खून के रिस्ता नता।

बिरवा ले बड़का खाम होगे अब बता।4


नइ मोल मिल पावत हे असली सोन के।

लोहा सहज नीलाम होगे अब बता।5


फल फूल तारिक चीज बस अउ आदमी।

का खास सब तो आम होगे अब बता।6


धन जोर के करबोंन का रटते हवन।

कोठी फुटिस गोदाम होगे अब बता।7


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

किरदार- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

 किरदार- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया(तेरा धियान किधर है)

                  वास्तव में जिंदगी एक रंगमंच है और हम सभी उसके किरदार हैं। इस रंगमंच पर हर व्यक्ति को कोई न कोई भूमिका मिली है—किसी को पिता की, किसी को माँ की, किसी को शिक्षक, विद्यार्थी, अधिकारी, कर्मचारी या नागरिक की। भूमिका छोटी हो या बड़ी, उसका महत्व इस बात में है कि उसे हम कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से निभाते हैं।

                   किरदार केवल पहनावे या बाहरी रूप का नाम नहीं है। असली किरदार हमारे आचरण, व्यवहार और जिम्मेदारियों से सामने आता है। आज हम अनेक अवसरों पर किसी पात्र का रूप धारण तो कर लेते हैं, लेकिन उसके गुण और मर्यादा को अपनाना भूल जाते हैं। भगवान शिव, श्रीराम या श्रीकृष्ण का रूप धारण करना केवल वेशभूषा बदलना नहीं है। उस रूप की गरिमा और मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। मनोरंजन अपनी जगह है, लेकिन आस्था और चरित्र की मर्यादा का सम्मान उससे ऊपर है।।                                  हमारी परंपरा में रामलीला और नाट्य-मंचन के कलाकार केवल संवाद बोलने तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि अपने पात्र की गरिमा को आत्मसात करने का प्रयास करते थे। दर्शक को अभिनय में पात्र दिखाई देता था, केवल अभिनेता नहीं। यही अभिनय की वास्तविक सफलता थी। आज साधन और मंच बढ़ गए हैं, विशेषकर सोशल मीडिया ने प्रदर्शन के नए अवसर दिए हैं, लेकिन बाहरी रूप को ही किरदार समझ लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म और कर्तव्य का महत्व समझाया। जीवन में भी यही बात लागू होती है। परिस्थितियाँ हमें कोई भूमिका दे सकती हैं, लेकिन उस भूमिका को किस निष्ठा से निभाना है, यह हमारे हाथ में है। केवल अधिकार चाहना आसान है, कर्तव्य निभाना कठिन; केवल सम्मान पाना सरल है, सम्मान के योग्य बनना कठिन।

                 विडंबना यह है कि हम अपना किरदार तो नही निभा पा रहे है, और दिखावे के लिए देवी देवताओं के रूप लेकर, उनके आदर्श को धूमिल करने की कुचेष्टा कर रहें है। दूसरों के प्रति संवेदना, सत्य, ईमानदारी, सहयोग और जिम्मेदारी—यही मनुष्य के सबसे बड़े आभूषण हैं। यदि इन्हें ही जीवन से निकाल दिया जाए तो कोई भी बाहरी वेश हमारे किरदार को सार्थक नहीं बना सकता। किस्सा चाहे मंच का हो या जीवन का, असली पहचान संवादों से नहीं, आचरण से होती है। कपड़े बदलने से किरदार नहीं बदलता, किरदार तब बदलता है जब आचरण बदलता है।

               जिंदगी का मंच एक दिन समाप्त हो जाएगा, लेकिन हमारे निभाए हुए किरदार की छाप लोगों की स्मृतियों में रह जाएगी। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हमें कौन-सा किरदार मिला, बल्कि यह है कि हमने उसे कितनी ईमानदारी से निभाया। जीवन ने हमें जो भूमिका दी है, उसे बोझ नहीं, जिम्मेदारी समझकर निभाना ही सच्चे अर्थों में जिंदगी जीना है।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को, कोरबा(छग)


यह क्या हो रहा है फैशन और दिखावे के नाम पर?* -जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

 *यह क्या हो रहा है फैशन और दिखावे के नाम पर?*

-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


                      समय बदलता है, समाज बदलता है और उसके साथ मनुष्य की जीवन-शैली भी बदलती है। आधुनिकता ने हमें अनेक सुविधाएँ दी हैं, लेकिन इसी आधुनिकता की दौड़ में हमने अपनी कई सहज, प्राकृतिक और पारंपरिक जीवन-पद्धतियों को पीछे छोड़ दिया। आश्चर्य तब होता है, जब वही पुरानी चीजें नए नाम, नए रूप और नई कीमत के साथ हमारे सामने लौटती हैं और हम उन्हें फैशन, एडवेंचर, ऑर्गेनिक जीवनशैली या विशेष अनुभव के रूप में स्वीकार करने लगते हैं।

                     कभी मिट्टी के बर्तन हमारे घरों की सामान्य आवश्यकता थे। मिट्टी की हांडी, मटकी और कुल्हड़ में खाना-पीना आम बात थी। आज वही मिट्टी के बर्तन महँगे रेस्तराँ में पारंपरिक भोजन का आकर्षण बन गए हैं। कभी कोदो-कुटकी, देशी अनाज, भाजी और स्थानीय सब्जियाँ सामान्य भोजन थीं; आज वही भोजन स्वास्थ्यवर्धक और पारंपरिक भोजन के नाम पर विशेष कीमत में परोसा जा रहा है। जिस भोजन को कभी साधारण समझा गया, वही आज विशेष बन गया है।

                   पहनावे में भी यही बदलाव दिखाई देता है। कभी कपड़ा फट जाने पर उसे सिलकर दोबारा पहनना हमारी जरूरत और मितव्ययिता थी। आज उसी फटे हुए रूप को फैशन के नाम पर महँगी कीमत देकर खरीदा जाता है। अंतर केवल इतना है कि पहले कपड़ा फटने के बाद पहना जाता था, आज फैशन के लिए पहले से फटा हुआ खरीदा जाता है।

                    हमारे बचपन के मनोरंजन और खेल भी इसी बदलाव के उदाहरण हैं। तालाब, नदी और नहर में तैरना, खेतों और गलियों में खेलना, पेड़ों पर चढ़ना, मिट्टी में दौड़ना-कूदना और बरसात में फिसलना हमारे जीवन का सहज हिस्सा था। आज इन्हीं अनुभवों के लिए स्विमिंग पूल, एडवेंचर पार्क और विभिन्न प्रकार की गतिविधियों पर पैसा खर्च किया जाता है। जो रोमांच कभी प्रकृति मुफ्त में देती थी, आज उसे पैकेज के रूप में खरीदा जा रहा है।

                   रहन-सहन में भी पुरानी चीजें नए रूप में लौट रही हैं। मिट्टी के घर, खपरैल की छत और घास-फूस के छप्पर कभी गरीबी और पिछड़ेपन के प्रतीक माने जाते थे। आज वही ग्रामीण परिवेश, मिट्टी के घर और प्राकृतिक जीवन “रूरल टूरिज्म”, “नेचर स्टे” और “इको रिसॉर्ट” के नाम पर आकर्षण बन गए हैं। बैलगाड़ी की सवारी से लेकर पारंपरिक भोजन और ग्रामीण जीवन के अनुभव तक, अनेक चीजें अब पर्यटन का हिस्सा बन चुकी हैं।

                    यहाँ प्रश्न होटल, रिसॉर्ट या पर्यटन व्यवसाय का विरोध करना नहीं है। आधुनिक सुविधाओं और पर्यटन का अपना महत्व है। असली प्रश्न हमारी सोच का है। जब ये चीजें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध थीं, तब हमने इन्हें महत्व क्यों नहीं दिया? हमने स्थानीय भोजन को कमतर क्यों माना? पारंपरिक पहनावे को पिछड़ेपन से क्यों जोड़ा? मिट्टी और खपरैल के घरों को गरीबी का प्रतीक क्यों समझा? और आज वही चीजें बाजार में नए नाम से सामने आती हैं तो हम उन्हें प्रतिष्ठा और आधुनिकता का प्रतीक क्यों मान लेते हैं?

                   मनुष्य अक्सर किसी वस्तु का मूल्य तब समझता है, जब वह उससे दूर हो जाता है। हमारे आसपास उपलब्ध प्राकृतिक और पारंपरिक चीजों को हमने आधुनिकता की दौड़ में पीछे छोड़ दिया और अब उन्हीं चीजों को पाने के लिए बाजार का सहारा ले रहे हैं। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम विकास के नाम पर अपनी जड़ों से तो दूर नहीं हो गए? हालाँकि यह भी सच है कि पुराना हमेशा अच्छा और नया हमेशा खराब नहीं होता। पुराने समय में अनेक कठिनाइयाँ और सामाजिक बुराइयाँ थीं, जिन्हें बदलना जरूरी था। आधुनिक विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा और तकनीक ने जीवन को बेहतर बनाया है। इसलिए आवश्यकता पुराने और नए के बीच संघर्ष की नहीं, बल्कि दोनों के श्रेष्ठ पक्षों के संतुलन की है।

                     हमें आधुनिकता अपनानी चाहिए, लेकिन अपनी जड़ों को छोड़कर नहीं। स्थानीय भोजन, पारंपरिक कला, ग्रामीण खेल, प्राकृतिक वास्तुकला, लोकपहनावा और जीवन-पद्धति को केवल फैशन बनाकर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक मूल्य को समझकर बचाना चाहिए। यदि हमने इन्हें समय रहते सम्मान और संरक्षण दिया होता, तो शायद आज इन्हीं चीजों को महँगी कीमत देकर खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

                     आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या हम वास्तव में आगे बढ़ रहे हैं, या अपनी ही छोड़ी हुई चीजों को नए नाम से दोबारा खरीद रहे हैं? समय का चक्र घूमता रहता है। पुरानी चीजें नए रूप में लौटती रहेंगी। लेकिन समझदारी इसी में है कि हम अपनी विरासत को बाजार की वस्तु बनने से पहले पहचान लें। आधुनिकता और परंपरा का संतुलन ही ऐसा रास्ता है, जहाँ विकास भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ाव भी बना रहे।

                    फैशन बदलता रहेगा, बाजार बदलता रहेगा और समय भी बदलता रहेगा; लेकिन अपनी जड़ों का मूल्य यदि हम समय रहते समझ लें, तो अपनी ही विरासत को दोबारा खरीदने की नौबत नहीं आएगी। आखिर हमें यह सोचना ही होगा—जिस रास्ते को हमने पुराना समझकर छोड़ दिया था, कहीं आज उसी रास्ते पर लौटने के लिए हम महँगी टिकट तो नहीं खरीद रहे हैं?


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

Saturday, 12 September 2026

तीजा तिहार : सुरता मइके के-गीत

तीजा तिहार : सुरता मइके के-गीत


सावन काँटेंव मैं गिनगिन, सुरता मा दाई वो।

कि आही तीजा लेय बर, भादो मा भाई वो।।


मइके के सुरता, नजरे नजर म झुलथे।

देखतेंव दसमत पेड़ ल, के फूल फुलथे।

मोर थारी अउ लोटा म, कोन बासी खाथे।

तुलसी चौरा म बिहना, पानी कोन चढ़ाते।

हे का चकचक ले उज्जर, कढ़ाई दाई वो--

आही तीजा------


गाय गरुवा मोर बिन, सुर्हरथे कि नही।

खेकसी कुंदरू बारी म फरथे कि नही।

कुँवा तरिया म पानी कतका भरे रहिथे।

का मोला अगोरत,परोसिन खड़े रहिथे।

कोन करथे मोर कुरिया म पढाई दाई वो---

आही तीजा------


दुरिहा दिये दाई, तैंहर अपन कोरा ले।

मइके लाही कहिके,मोला तीजा पोरा में।

जल्दी भेज न दाई बाट जोहत हँव वो।

मइके के सुरता म मैं हा रोवत हँव वो।

एकेदरी थोरे सुरता भुलाही दाई वो---

आही तीजा---


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा


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मरना हे तीजा मा


सार छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


लइका लोग ल धरके गय हे,मइके मोर सुवारी।

खुदे बनाये अउ खाये के, अब आ गय हे पारी।


कभू भात चिबरी हो जावै,कभू होय बड़ गिल्ला।

बर्तन भँवड़ा झाड़ू पोछा, हालत होगे ढिल्ला।

एक बेर के भात साग हा,चलथे बिहना संझा।

मिरी मसाला नून मिले नइ,मति हा जाथे कंझा।

दिखै खोर घर अँगना रदखद, रदखद हाँड़ी बारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।1।


सुते उठे के समय बिगड़गे,घर बड़ लागै सुन्ना।

नवा पेंट कुर्था मइलागे, पहिरँव ओन्हा जुन्ना।

कतको कन कपड़ा कुढ़वागे,मूड़ी देख पिरावै।

ताजा पानी ताजा खाना, नोहर हो गय हावै।

कान सुने बर तरसत हावै,लइकन के किलकारी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।2।


खाय पिये बर कहिही कहिके,ताकँव मुँह साथी के।

चना चबेना मा अब कइसे,पेट भरे हाथी के।

मोर उमर बढ़ावत हावै,मइके मा वो जाके।

राखे तीजा के उपास हे,करू करेला खाके।

चारे दिन मा चितियागे हँव,चले जिया मा आरी।

खुदे बनाये अउ खाये के,अब आ गय हे पारी।3।


छंदकार-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छत्तीसगढ़)

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लावणी छंद-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"


तीजा पोरा


मुचुर मुचुर मन मोर करत हे, देख करत तोला जोरा।

महूँ ममा घर जाहूँ दाई, तोर संग तीजा पोरा।


कभू अकेल्ला कहाँ रहे हँव, तोर बिना मैं महतारी।

जावन नइ दँव मैंहर तोला, देवत रह कतको गारी।

बेटी बर हे सरग बरोबर, दाई के पावन कोरा।

महूँ ममा घर जाहूँ दाई, तोर संग तीजा पोरा।


अपन पीठ मा ममा चघाके, मोला ननिहाल घुमाही।

भाई बहिनी संग खेलहूँ, मोसी मन सब झन आही।

मया ममा दाऊ के पाहूँ, खाहूँ खाजी अउ होरा।

महूँ ममा घर जाहूँ दाई, तोर संग तीजा पोरा।


कइसे रथे उपास तीज के, नियम धियम होथे कइसन।

सीखे पढ़े महूँ ला लगही, नारी मैं तोरे जइसन।

गिनगिन सावन मास काटहूँ, भादो के करत अगोरा।

महूँ ममा घर जाहूँ दाई, तोर संग तीजा पोरा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

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करू भात अउ करू पानी


दीदी के करू भात, जीजा के करू पानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


एक ला जुन्ना सहेली मिलगे,एक ला जुन्ना संगी।

एक पीटत हे मुड़ी, एक फेरत हे सरलग कंगी।।

एक हाँसे हाहा हाहा, एक के नइ फुटत हे जुबानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


दीदी मन सम्हरे हे, जीजा मन के कुकुर गत हें।

दीदी मन बिंदास सुतत हें, जीजा मन जागत हें।।

जय जय गूँजे एक कोती, एक कोती राजा जानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


राँध के जीजा, नइ खा सकत हे कँवरा।

पड़े हे कपड़ा लत्ता, पड़े हे बर्तन भँवरा।

चेहरा मा चमक नइहे,रद खद हे छत छानी।

का कहँव संगी, तीजा तिहार के कहानी।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


Friday, 11 September 2026

कानून के डर

 कानून के डर


जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


खास आदमी, कानून कायदा ला नइ माने।

पइसा पहुँच के दम मा, घुमथे सीना ताने।।

धन बल ज्ञान गुण के, रोब झाड़त दिखथे।

अइसन मनके आघू, सबे चीज हा बिकथे।

ये मन सब घातक हें, साँप बिच्छू घून ले।

जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


पढ़े लिखे मनखें के, अंतस मा कोइला भरगे।

दया मया धरम करम, पाके पना कस झरगे।।

मनखें अब सिर्फ डरथे, कुदरत के कानून ले।

आसाढ़ के बाढ़, अउ टघलत मई जून ले।।

विकास खेलत हे होली, मनखें के खून ले।

जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


कथे झूठ सच पकड़े के, नवा नवा मशीन हे।

तभो जज वकील, अदालती खेल मा लीन हें।।

कानून के लंबा हाथ, आम जन के गला नापथे।

खास के आघू मा, साहब सिपइहा मन काँपथें।।

मनखें दूर भागत हें, धरम करम पाप पुण्य ले।

जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।

उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

लोकगीत-सरसी छंद गीत

 लोकगीत-सरसी छंद गीत


लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।

सुआ ददरिया कर्मा पंथी, करे जिया मा राज।।


बोह भोजली बेटी माई, लहर तुरंगा गाँय।

थपड़ी पिट पिट सुआ नाचके, सबके जिया लुभाँय।।

बर बिहाव अउ पंथी जस के, मनभावन अंदाज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


दरद भुलाके छेड़ ददरिया, बूता करें किसान।

नाचें कर्मा ताल मा झुमके, लइका संग सियान।।

सवनाही साल्हो अउ डंडा, जतरा धनकुल साज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


बाँस पंडवानी दोहा मा, कथा कथन भरमार।

ढोलामारू लोरिक चंदा, फागुन फाग बहार।।

नगमत गौरा खेल गीत मा, झूमें सरी समाज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


सोहर लोरी भजन भर्थरी, आल्हा मन ले जीत।

जनम बिहाव परब अउ ऋतु के, अबड़ अकन हे गीत।।

गायें गाना छत्तीसगढ़िया, करत अपन सब काज।

लोकगीत आये हम सबके, अंतस के आवाज।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Wednesday, 9 September 2026

स्थायी और अस्थायी व्यवस्था-जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया

 *स्थायी और अस्थायी व्यवस्था*


— जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'


                  स्थायी और अस्थायी—ये केवल दो शब्द नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति के कार्य, सोच, जिम्मेदारी, विश्वास और भविष्य से जुड़े दो अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। आज के समय पर विचार करें तो चारों ओर अस्थायी व्यवस्था का बोलबाला दिखाई देता है। नियमित और स्थायी नियुक्तियों के स्थान पर ठेकेदारी, संविदा और अस्थायी रोजगार का चलन बढ़ता जा रहा है। अनेक नियुक्तिकर्ता अपने कर्मचारियों को स्थायी रूप से साथ रखने के बजाय आवश्यकता के अनुसार काम लेना पसंद करते हैं। इससे कर्मचारी के मन में हमेशा यह अनिश्चितता बनी रहती है कि आज जो काम उसके पास है, वह कल भी रहेगा या नहीं। इस अस्थिरता का प्रभाव केवल कर्मचारी की आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ता, बल्कि उसके काम करने की मानसिकता पर भी पड़ता है। जिस व्यक्ति को अपने भविष्य का भरोसा नहीं होता, उसके लिए लंबे समय की योजना बनाकर काम करना कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, स्थायित्व व्यक्ति को अपने कार्य से जुड़ने, अनुभव प्राप्त करने और भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने का अवसर देता है।

                   इसे *किसान और खेत* के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक किसान अपने खेत की देखभाल केवल बरसात में नहीं करता, बल्कि गर्मी, सर्दी और बरसात—हर मौसम में उसे सँवारता है। वह मिट्टी तैयार करता है, खाद डालता है, बीज बोता है, सिंचाई करता है और फसल की रक्षा करता है, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि यही खेत लंबे समय तक उसके और उसके परिवार की आजीविका का आधार रहेगा। लेकिन यदि उसी किसान से कह दिया जाए कि तुम्हें केवल एक-दो वर्ष तक ही इस खेत से पैदावार लेनी है, उसके बाद यह खेत तुम्हारा नहीं रहेगा, तो उसके भीतर पहले जैसा अपनापन और भविष्य का विश्वास नहीं रहेगा। वह तत्काल मिलने वाली पैदावार पर अधिक ध्यान देगा, क्योंकि उसे पता होगा कि भविष्य की फसल का लाभ उसे नहीं मिलने वाला। इसके विपरीत, स्थायी किसान आज की फसल के साथ आने वाले वर्षों की उपज के बारे में भी सोचता है।

                 यही बात किसी संस्था और उसके कर्मचारियों पर लागू होती है। जो कर्मचारी जानता है कि उसे लंबे समय तक इसी संस्था के साथ काम करना है, वह अपने कार्यस्थल को केवल नौकरी करने की जगह नहीं, बल्कि अपने भविष्य का हिस्सा समझता है। वह अपने काम को बेहतर बनाने, नई बातें सीखने और संस्था की उन्नति में योगदान देने का प्रयास करता है। वर्षों से जुड़ा कर्मचारी संस्था की कार्यप्रणाली, उसकी समस्याओं और उनके समाधान को अनुभव से समझता है। इसलिए बार-बार कर्मचारियों को बदलना केवल व्यक्ति को बदलना नहीं, बल्कि संस्था के संचित अनुभव को भी कमजोर करना है।

                  शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थायित्व का महत्व स्पष्ट दिखाई देता है। जो *शिक्षक* वर्षों तक एक ही विद्यालय से जुड़े रहते हैं, वे विद्यार्थियों की क्षमता, कमजोरियों और आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। उनका संबंध केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और भविष्य के निर्माण में भी योगदान देते हैं। बार-बार शिक्षक बदलने से पढ़ाई के साथ-साथ शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बनने वाला विश्वास भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए शिक्षा जैसे क्षेत्र में अनुभव और निरंतरता का विशेष महत्व है।

                  स्थायित्व को *किराए के घर* और अपने घर के अंतर से भी समझा जा सकता है। जो व्यक्ति जानता है कि उसे लंबे समय तक उसी घर में रहना है, वह उसकी सफाई, मरम्मत, रंग-रोगन और रखरखाव पर ध्यान देता है। वहीं थोड़े समय के लिए रहने वाला व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उतना दूरगामी विचार नहीं करता। यही अंतर कार्यस्थल पर भी दिखाई देता है।

                 स्थायित्व का महत्व केवल नौकरी तक सीमित नहीं है। परिवार और सामाजिक संबंध भी वर्षों के विश्वास, जिम्मेदारी और अपनत्व से मजबूत होते हैं।व्यक्ति जिस संबंध को स्थायी मानता है, उसमें अपना समय, श्रम और भावनाएँ लगाता है। कार्यस्थल पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। कर्मचारी से दीर्घकालीन निष्ठा की अपेक्षा करने से पहले संस्था को उसके भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। यह भी सही है कि हर अस्थायी कार्य अनुचित नहीं होता। किसी विशेष परियोजना, मौसमी कार्य या सीमित अवधि की आवश्यकता के लिए अस्थायी नियुक्ति उपयोगी हो सकती है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब स्थायी प्रकृति के कार्यों को भी लगातार अस्थायी व्यवस्था के सहारे चलाया जाए और कर्मचारी को वर्षों तक भविष्य की अनिश्चितता में रखा जाए।

                अस्थायी नियुक्ति से नियोक्ता कर्मचारी पर निश्चित रूप से अपना अधिकार जता सकता है। वह आवश्यकता और व्यवस्था के नाम पर काम की शर्तें तय कर सकता है, समय-समय पर कर्मचारी को बदल सकता है और यह भी तय कर सकता है कि किसे कितने समय तक काम देना है। लेकिन प्रश्न यह है कि अधिकार से क्या विश्वास भी प्राप्त किया जा सकता है? कर्मचारी काम तो कर सकता है, निर्देशों का पालन भी कर सकता है, लेकिन उसके मन में यदि यह आशंका बनी रहे कि उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है, तो उसके और संस्था के बीच वह आत्मीयता कैसे विकसित होगी, जो किसी भी कार्य-संबंध को मजबूत बनाती है? अधिकार से काम लिया जा सकता है, लेकिन विश्वास अर्जित करना पड़ता है। *विश्वास किसी नियुक्ति-पत्र की अवधि का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह निरंतरता, सम्मान, सुरक्षा और जिम्मेदारी से पैदा होता है। आखिर दुनिया केवल अधिकार और नियमों से नहीं चलती; दुनिया विश्वास पर टिकी है*। परिवार हो, समाज हो या कोई संस्था—जहाँ विश्वास होता है, वहाँ व्यक्ति अपने सामर्थ्य से आगे बढ़कर योगदान देता है। जहाँ विश्वास नहीं होता, वहाँ व्यक्ति केवल अपने दायित्व की सीमा तक सिमट जाता है। नियोक्ता का अधिकार पद से आता है, लेकिन कर्मचारी का विश्वास व्यवहार से अर्जित होता है। इसलिए कर्मचारी को केवल “काम करने वाला व्यक्ति” समझना पर्याप्त नहीं है। वह संस्था के वर्तमान को गति देने के साथ उसके भविष्य का निर्माण भी करता है। यदि संस्था उससे निष्ठा, समर्पण और बेहतर परिणाम की अपेक्षा करती है, तो उसे भी कर्मचारी के प्रति विश्वास और भविष्य की सुरक्षा का भाव रखना होगा। कर्मचारी से स्थायित्व की अपेक्षा और उसे स्वयं अस्थायित्व देना—यह एक विरोधाभास है।

                    यहाँ एक प्रश्न विचारणीय है—यदि किसी व्यक्ति को अपने भविष्य का ही भरोसा न हो, तो उससे भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने की अपेक्षा कितनी उचित है? पैसा स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार के कार्यों में मिलता है, लेकिन नौकरी केवल पैसे का संबंध नहीं है। इसके साथ विश्वास, सुरक्षा, अनुभव, निष्ठा और अपनत्व भी जुड़े होते हैं। विश्वास केवल वेतन देकर नहीं खरीदा जा सकता; उसे सम्मान, अवसर और भविष्य की सुरक्षा देकर अर्जित करना पड़ता है।

                  अतः स्थायित्व केवल नौकरी की अवधि नहीं, बल्कि विश्वास की नींव है। किसी संस्था की वास्तविक शक्ति उसकी इमारत या पूँजी में नहीं, बल्कि उसके अनुभवी, योग्य और समर्पित लोगों में होती है। इसलिए जहाँ संभव हो, वहाँ स्थायी रोजगार और दीर्घकालीन कार्य-संबंधों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।


*अस्थायी व्यवस्था से काम चलाया जा सकता है, लेकिन स्थायित्व से संस्था, विश्वास और भविष्य का निर्माण होता है।*


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छत्तीसगढ़)

*अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और चाटुकारिता के बीच बदलते मानवीय मूल्य-जीतेन्द्र वर्मा" खैरझिटिया'*

 *अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और चाटुकारिता के बीच बदलते मानवीय मूल्य-जीतेन्द्र वर्मा" खैरझिटिया'*


सच कहा जाए तो स्कूल का समय जीवन का स्वर्णिम काल होता है। यही वह समय है जब विद्यार्थी को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं दिया जाता, बल्कि उसके व्यक्तित्व की नींव भी रखी जाती है। विद्यालय में उसे अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, समय का महत्व, नियमों का पालन, परिश्रम, ईमानदारी और अपने कार्य को पूरी निष्ठा के साथ संपादित करने का संस्कार दिया जाता है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं करते, बल्कि उन्हें एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनाने का प्रयास करते हैं। अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ विद्यार्थी शिक्षक के प्रिय होते हैं, क्योंकि उनमें भविष्य के एक अच्छे नागरिक की संभावना दिखाई देती है।


विद्यालय में विद्यार्थी को यह सिखाया जाता है कि सफलता का मार्ग परिश्रम, ज्ञान और ईमानदारी से होकर गुजरता है। उसे बताया जाता है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। यही संस्कार आगे चलकर उसके जीवन का आधार बनने चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या विद्यालय में सीखे गए ये मूल्य वास्तव में हमारे सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में उसी रूप में काम आते हैं?


दुर्भाग्य से, जीवन के अगले पड़ाव पर पहुंचने के बाद कई बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं। जब व्यक्ति विद्यालय से निकलकर नौकरी, व्यवसाय, प्रशासन या सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है, तब उसका सामना ऐसी व्यवस्था से हो सकता है जहां योग्यता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ-साथ व्यक्तिगत संबंध, प्रभाव, सिफारिश और चाटुकारिता भी महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है। यहां एक विचित्र स्थिति पैदा होती है। जिस व्यक्ति को बचपन से अपने काम के प्रति ईमानदार और अनुशासित रहने की शिक्षा दी गई थी, वही व्यक्ति कभी-कभी अपनी प्रगति के लिए किसी अधिकारी, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की प्रशंसा करने को विवश दिखाई देता है।


यहीं से अनुशासन और चाटुकारिता के बीच का संघर्ष शुरू होता है।


विद्यालय में शिक्षक विद्यार्थी को ज्ञान देकर उसके भीतर आत्मसम्मान और कर्तव्यबोध पैदा करने का प्रयास करता है। शिक्षक की दृष्टि में विद्यार्थी की पहचान उसके ज्ञान, व्यवहार, परिश्रम और चरित्र से होती है। इसके विपरीत, जब किसी व्यवस्था में पद और प्रभाव सर्वोपरि हो जाते हैं, तब व्यक्ति की योग्यता से अधिक उसकी निकटता और प्रशंसा करने की क्षमता को महत्व मिलने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने स्वाभिमान को धीरे-धीरे पीछे छोड़कर उस व्यक्ति के आगे-पीछे घूमने लगता है जिसके हाथ में उसके लाभ, पद या प्रगति की शक्ति होती है।


यह केवल एक व्यक्ति का पतन नहीं है; यह मानवीय मूल्यों के कमजोर पड़ने का संकेत है।


चाटुकारिता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे योग्यता और परिश्रम पर आधारित व्यवस्था कमजोर होती है। यदि किसी संस्था में वह व्यक्ति आगे बढ़ता है जो अपने काम में कुशल और ईमानदार है, तो इससे पूरी व्यवस्था में विश्वास पैदा होता है। लेकिन यदि केवल प्रशंसा करने वाला व्यक्ति आगे बढ़ता है और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति उपेक्षित रह जाता है, तो धीरे-धीरे अन्य लोगों के मन में भी यह धारणा बनने लगती है कि मेहनत और ईमानदारी से अधिक प्रभावशाली व्यक्ति को प्रसन्न रखना जरूरी है। यही सोच किसी भी संस्था की कार्यसंस्कृति को भीतर से खोखला कर सकती है।


सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब चमचागिरी को व्यवहारिक बुद्धिमत्ता और ईमानदारी को मूर्खता समझ लिया जाए। व्यक्ति यदि अपने काम को पूरी निष्ठा से करता है, नियमों का पालन करता है और किसी अनुचित दबाव के सामने झुकने से इनकार करता है, तो वह कभी-कभी व्यवस्था में अकेला पड़ जाता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति हर परिस्थिति में बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की प्रशंसा करने के लिए तैयार रहता है, वह जल्दी पहचान बना लेता है। ऐसी विसंगति समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है—आखिर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किस प्रकार के मूल्य दे रहे हैं?


विद्यालय में हम कहते हैं कि सत्य बोलो, ईमानदारी से काम करो, नियमों का पालन करो और अपने कर्तव्य से पीछे मत हटो। लेकिन यदि वास्तविक जीवन में इन मूल्यों को सम्मान नहीं मिलेगा, तो बच्चों के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठेगा कि उन्होंने जो सीखा, उसका वास्तविक जीवन में मूल्य कितना है?


इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हर कार्यालय, संस्था या अधिकारी व्यवस्था भ्रष्ट है अथवा हर जगह चाटुकारिता ही सफलता का माध्यम है। आज भी अनेक ऐसे अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी, उद्यमी और सामान्य नागरिक हैं जो ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को सर्वोच्च महत्व देते हैं। वे बिना किसी दिखावे के अपना काम करते हैं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। समस्या उन परिस्थितियों से है जहां व्यवस्था स्वयं गलत व्यवहार को प्रोत्साहित करने लगती है।


इस स्थिति के लिए केवल व्यक्ति को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। इसके लिए व्यवस्था, संस्थागत संस्कृति और नेतृत्व—सभी की जिम्मेदारी है। यदि किसी कार्यालय में पारदर्शिता हो, कार्य का मूल्यांकन स्पष्ट नियमों के आधार पर हो, पदोन्नति योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर हो तथा गलत आचरण को संरक्षण न मिले, तो चाटुकारिता के लिए जगह अपने आप कम हो जाएगी। इसके विपरीत यदि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद निर्णयों को प्रभावित करने लगे, तो चाटुकारिता को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है।


यहां गुरु और सत्ता के बीच का अंतर भी समझना आवश्यक है। गुरु का उद्देश्य सामान्यतः व्यक्ति को ज्ञान और विवेक देकर उसे अपने पैरों पर खड़ा करना होता है। वह विद्यार्थी को प्रश्न पूछना, सही और गलत में अंतर करना तथा अपने कर्तव्य का पालन करना सिखाता है। एक आदर्श नेतृत्व भी इसी भावना पर आधारित होना चाहिए। नेता या अधिकारी का वास्तविक दायित्व अपने अधीन कार्य करने वाले लोगों से चापलूसी करवाना नहीं, बल्कि उनकी क्षमता को पहचानना और योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देना है।


पैसा, पद और अधिकार यदि व्यक्ति के विवेक से बड़े हो जाएं, तो व्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है। धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, पद से अधिकार प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन सम्मान और चरित्र खरीदे नहीं जा सकते। किसी व्यक्ति की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके आचरण, ज्ञान, परिश्रम और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार से बनती है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विद्यालय में दिए जाने वाले संस्कारों को केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित न रखें। यदि हम चाहते हैं कि बच्चे ईमानदार, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनें, तो समाज और संस्थाओं को भी उन्हीं मूल्यों का सम्मान करना होगा। शिक्षक द्वारा सिखाया गया अनुशासन तब सार्थक होगा, जब कार्यालय में भी समय की पाबंदी का सम्मान हो। कर्तव्यनिष्ठा तब सार्थक होगी, जब अपने काम को ईमानदारी से करने वाले व्यक्ति को उसका उचित सम्मान मिले। और ज्ञान तब सार्थक होगा, जब निर्णय व्यक्ति की चापलूसी से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और सत्यनिष्ठा से प्रभावित हों।


अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं है कि चाटुकारिता बड़ी है या अनुशासन? वास्तविक प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। यदि हम योग्यता, ईमानदारी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा को सम्मान देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हीं मूल्यों को अपनाएंगी। लेकिन यदि हम लगातार यह संदेश देंगे कि प्रशंसा, सिफारिश और व्यक्तिगत प्रभाव ही आगे बढ़ने का रास्ता है, तो विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले नैतिक मूल्य केवल पाठ्यपुस्तकों के पन्नों तक सीमित रह जाएंगे।


हमारा देश तभी वास्तविक अर्थों में प्रगति करेगा, जब व्यक्ति के पद से अधिक उसके काम का सम्मान होगा, प्रशंसा से अधिक योग्यता को महत्व मिलेगा और संबंधों से अधिक नियमों का पालन होगा। व्यवस्था को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो अपने कर्तव्य का निर्वहन बिना किसी स्वार्थ के करें और नेतृत्व को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो चाटुकारों की भीड़ के बजाय योग्य और ईमानदार लोगों को पहचान सकें।


इसलिए यह केवल सोचने का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है—हम अपने बच्चों को विद्यालय में जो मूल्य सिखा रहे हैं, क्या हमारा समाज उन्हें जीने का अवसर भी दे रहा है? यदि इसका उत्तर नकारात्मक है, तो दोष केवल बच्चों या कर्मचारियों का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जो अच्छे संस्कारों को जीवन में स्थान देने के बजाय चाटुकारिता को सफलता का माध्यम बनने देती है।


विद्यालय से निकलते समय विद्यार्थी के हाथ में केवल प्रमाण-पत्र नहीं होता; उसके भीतर वर्षों से निर्मित संस्कार भी होते हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियां उन संस्कारों को कुचलें नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूत करें। तभी शिक्षा वास्तव में शिक्षा कहलाएगी और अनुशासन तथा कर्तव्यनिष्ठा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित न रहकर पूरे समाज की पहचान बन पाएगी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को कोरबा(छग)

Thursday, 3 September 2026

बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

 बहरतीन काव्य संग्रह गँवई-गाँव के सँउहत झाँकी ए-जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

                 

                       छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह "बहरतीन" पुस्तक नही; बल्कि डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के व्यक्तित्व आय,उँखर मन के उपज आय,गाँव गँवई के सँउहत झाँकी आय। चंद्रा जी के सरल सहज व्यक्तित्व अउ माटी महतारी ले जुड़ाव, ये काव्य संग्रह मा सहज झलकत हे। कहे जाथे कि "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि" माने जननी अउ जन्म भूमि स्वर्ग ले बढ़के होथे। चाहे जनम देवइया महतारी होय या माटी महतारी होय या हमर संस्कृति,पार-परम्परा या संस्कार होय आदि सबके सेवा बर चंद्रा जी सबर दिन अघुवा बनके बूता करें हें अउ अभो करत हें। ये पुस्तक के नाँव ला ही अपन महतारी के नाँव देके चंद्रा जी मन अपन जनम देवइया महतारी ला अमर कर दिन। शिक्षा, साहित्य अउ समाज बर सबर दिन समर्पित, डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी के आकर्षक व्यक्तित्व के सबे कायल हें। उँखर नेतृत्व क्षमता के जवाब नइहे। घर-परिवार, गांव अउ समाज संग आज चंद्रा जी कोरबा के जम्मों साहित्यकार मन ला संघेर के साहित्य भवन समिति कोरबा के रथ ला सरलग हाँकत हें। भाव प्रधान सृजन चंद्रा जी के कलम के खास विशेषता ए। जेन लगन अउ महिनत ले चंद्रा जी मन काव्य रचथें, उही लगन अउ महिनत उँखर गायकी मा तको झलकथे। सुमधुर गीतकार के रूप मा चंद्रा जी ला पूरा छत्तीसगढ़ जानथे,पहिचानथे। भले  छत्तीसगढ़ी मा डॉ साहब के ये पहली काव्य संग्रह आय, फेर साहित्य सृजन अउ गायन बनेच पहिली के करत आवत हें।

                           छत्तीसगढ़ी अउ हिंदी भाषा दूनो मा, चंद्रा जी  मन के समान अधिकार हे। "आनंद के दोहे" नाम से हिंदी मा, काव्य संग्रह चंद्रा जी मन निकाल चुकें हे। कोनो रचना के सृजन होय या पुस्तक छपाई होय, लइका जनई के धैर्य अउ कोख के पीरा कस ही हे। जइसे महतारी लइका ला कोख मा नौ महिना बोहे रथे, वइसने एक कलमकार के मन मा रचना के सिरजन तक भाव अउ शब्द उमड़त घुमड़त रथे। लइका जने के बाद जइसे महतारी परम् सुख के अनुभव करथे, वइसने रचना के सिरजन के बाद कलमकार के दिलो दिमाक ले शब्द के बोझ उतरथे अउ परम् शांति पाथें। चंद्रा जी मन के कई दशक पहिली लिखित रचना मन आज पुस्तक के रूप मा आवत हे। ये उँखर बर खुशी के पल तो है ही, संगे संग पाठक अउ साहित्य जगत बर तको खुशी के बात हे।

                        गांव के गली खोर मा खेलत खावत, नाचत गावत, प्रधान अध्यापक तक के सफर तय करइया चंद्रा जी मा प्रतिभा कूटकूट के भरे हे। चंद्रा जी मधुर कंठ के धनी गीतकार के संगे संग रंगमंच के तको सधे कलाकार आय। बड़े बड़े संस्था मा एक ले बढ़के एक नाटक मा मनमोहक किरदार चंद्रा जी मन निभाये हे। बाल्को सांस्कृतिक मण्डल के बैनर तले "चरण दास चोर" नाटक मा महू ला चंद्रा जी संग काम करे के सौभाग्य मिलिस हे। कलमकार, कलाकार, गायक के संगे संग उद्घोषक, उत्कृष्ट शिक्षक अउ समाज सेवक के रूप तको चंद्रा जी जाने पहिचाने जाथे। जब मैं 2006 मा बाल्को  कोरबा आयेंव, अउ उँखर गीत-कविता ला सुनेंव, तब ले आज तक मोर पसंदीदा गीतकार के रूप मा चंद्रा जी मन मोर मन मे बसे हें। कोरबा मा होवइया साहित्यिक, सामाजिक, शैक्षणिक आदि लगभग सबे कार्यक्रम मा चंद्रा जी ला, अहम भूमिका अदा करत, सरलग देखत-सुनत आवत हँव। अउ आजो उही भागीदारी, जोश-जज्बा, उमंग-उछाह देख मोर कस कतको लिखइया-पढ़इया, कवि-कवियित्री के प्रेरणास्रोत बने हे। चाहे साहित्य होय, समाज होय, शिक्षा होय या घर परिवार के जिम्मेदारी होय, चंद्रा जी सब ला बरोबर समय देवत, सबके सेवा करिस। हाल ही में पीएचडी करके, डॉक्टरेट के उपाधि तको पाइन। सब ला लेके चले अउ सब बर बरोबर समय निकाले, अइसन व्यक्तिव बिरले मिलथे।

                            हमर भारत देश होय या हमर राज छत्तीसगढ़, दूनो के आत्मा गाँव मा ही बसथे, वइसने चंद्रा जी के मन, अपन जनम भूमि अउ गाँव ला कभू नइ बिसरा सके। तभे तो गांव के खेत-खार, बारी-बखरी, नदी-पहाड़, जंगल-झाड़ी, रहन-सहन, तीज-तिहार, संस्कृति-संस्कार, पार-परम्परा, नता-रिस्ता, खेल-खाजी, रोटी-पीठा आदि सब चंद्रा जी के कलम मा नजर आथे। ये पुस्तक के बात करन ता, येमा एक ले बढ़के एक गीत कविता संग्रहित हे।  ये पुस्तक मा संग्रहित गीत "मोला मोर परेवा पाँखी गांव अगोरत हे" मोर बड़ पसंदीदा गीत आय। जे चंद्रा जी के मुख ले सुनके परम् शांति देथे अउ चाहे कहूँ भी खड़े राहस, सुनते ही मन ला, गांव के गली खोर मा ले जाके खड़े कर देथे। अइसने अउ कतको मनभावन गीत चंद्रा जी मन ये पुस्तक मा संग्रहित करें हें। पुस्तक मा भाव पक्ष के बेजोड़ता के संगे संग कला पक्ष बड़ सुदृढ़ हे। ये संग्रह मा, सरल सहज अउ चलती आंचलिक छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रयोग चंद्रा जी मन करें हें। मनभावन अलांकारिक छटा पाठक वर्ग ला प्रभावित करही। ज्यादातर रचना गीत के रूप मा हे। चंद्रा जी कई प्रकार के छंद मा तको काव्य सृजन करे हे, ये पुस्तक मा  शास्त्रीय छंद दोहा अउ लोक छंद पवैया छंद के कविता संग्रहित हे। लोक धुन मा रचित कर्मा गीत , जागरण गीत, जस गीत, होरी गीत,सुमरनी गीत बड़ आकर्षक अउ मनभावन हे। 

                     आजकल कतको कवि मन दूसर के रचना ला अपन बताके गा, छपा देथें, जे गलत हे। अइसन करे मा हाँसी फभित्ता ही होथे, अइसने भाव के एक कविता ये पुस्तक मा हे-

"आन के लिखे मा लिखोइया बनथे, ते गिरथे मुड़भर्रा।"


                         "जंगल मा डांका परे हे,कोन बचाही" गीत बड़ मार्मिक अउ चिंतन करे बर मजबूर करत हे। आज जंगल झाड़ी के कटई घास फूस बरोबर होवत हे, संगे संग जंगल ले जुड़े जम्मों रीत-नीत, रहन-सहन सबके विनाश होवत हे। चंद्रा जी के संसो आज सबके संसो होना चाही,काबर कि जंगल हे तभे जीवन हे।


                        

                इरसा द्वेष, ऊँच नीच, तोर मोर के आगी हकीकत के आगी ले तको बड़ खतरनाक होथे। जे एक बेर बरे जे बाद कभू बुझाए जे नाम नइ ले। एखर ले सबला बचना चाही, अउ भाईचारा के गारा मा चिपके रहना चाही। इही भाव मा चंद्रा जी मन लिखथें-    "मनखें खातिर मनखें के ये कइसन बाँटा।

  अपन ब राखे फलफूल,दूसर ब कांटा कांटा।"


                             मैं एक मुक्तक मा हमेशा पढ़थों कि "हर पड़ोसी पाकिस्तान होता है"  अउ देखे बर तको मिलथे, ज्यादातर पड़ोसी संग मनखें मन चिढ़े रथें। उही बात के संसो करत चंद्रा जी मन एक कविता मा लिखें हे---" आज पडोसीपन नँदात जात हे।"


                           कतको लालची मन छत्तीसगढिया मन ला सब ले बढ़िया कहिके भुलवारत उँखर अधिकार अउ चीज बस ला नँगावत हें, चिरई बरोबर लहलहावत आस विश्वास के फसल ला मन के खावत हें। उही ल साव चेत करत चंद्रा जी मन लिखथें--

"छत्तीसगढ़ के रहइया सब मन,जागत रइहा रे।

कहाँ मेर चिड़िया दाना चुगत हे,ताकत रइहा रे।।"

               

                             दाई ददा मन लइका ला अपन खून पसीना बहा बहा के पालथें पोसथें, कि बुढ़त काल में सेवा जतन करही। फेर आधुनिक बेरा मा लइका मन पढ़ लिख के विदेश या गांव ल छोड़ शहर चल देथें, ता कतको मन अपन जिम्मेदारी ले भाग जथें। फेर ददा दाई के सेवा तो नारायण सेवा ले तको बढ़के हे। आज वृद्धाश्रम के संख्या बढ़त जावत हे, जे चिंतनीय हे। ददा दाई के सियानापन मा सेवा करे बर प्रेरित करत चंद्रा जी मन लिखथें-

"उठ जा उठ जा उठ जा बेटा मोर, बिहान होगे गा।

 देख तो दाई ददा तोर, सियान होगे गा।।"


                     ये सब के आलावा ये काव्य संग्रह मा नारी शक्ति के मान सम्मान, मया पिरित, तीज- तिहार, शिक्षा के महत्ता, सार्थक सीख-सिखावन अउ देश- राज, गांव-घर, खेती-बाड़ी, जंगल झाड़ी, ददा दाई आदि सम्बंधी  संसो फिकर के गीत कविता संग्रहित हे। पाठक मन ये संग्रह ला पढ़त पढ़त गाये बर मजबूर हो जहीं, अउ परम् आनंद प्राप्त करहीं। अइसन सुघ्घर सिरजन खातिर डॉ कृष्ण कुमार चंद्रा जी ला कोटिशः बधाई अउ शुभकामना।


जीतेन्द्र कुमार वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मनभावन महिना भादो* -जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

 *मनभावन महिना भादो* -जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया


                आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भुइँयाँ भादों मा अघाय कस लगथे, तभे तो तरिया डबरा मा पानी माढ़े अउ लहरा मारत दिखथे। मनमाड़े चलत धारी भादो के आरो पाके धीर धर लेथे। बँधिया,तरिया,ढ़ोंड़गा जे सावन भर दानी कस पानी फेकत रिहिस, वो बनिया बरोबर अब नाप नाप के जादच उपरहा भर ल झलकात दिखथे।सरलग चलत धूका- गर्रा, झड़ी-झक्कर, बिजुरी के चमकई अउ बादर के गरजई घलो कमती होय बर लग जथे। थोर बहुत डबरा खँचका के पानी ल अँटत देख करिया बादर बीच बीच मा हुरहा धुरहा आथे अउ पानी समो के भाग जथे। सुरुज नारायण जे आसाढ़ सावन भर लुकाय लुकाय फिरत रिहिस,भादो के आरो पाके आसमान मा घूमत फिरत आँखी मा दिखेल धर लेथे। थमे पानी ल देख,चिरई चिरगुन मन भादो के आरो पाके उझरे झाला खोंदरा ल नवा सिरजाये के उदिम करत दिखथें।धान-पान, काँदी-कूसा सजोर होके पुरवइया मा नाचत गावत, झुमरत दिखथे। झड़ी बादर ले तंग चिरई चिरगुन, छेरी-बोकरा, गाय गरुवा झूम-झूमके अउ घूम- घूम  चारा चरत दिखथें। घर कुरिया बारिस मा पस्त दिखथें ता खेत खार, तरिया नदियाँ मतंग अउ मस्त। भादो के लगत घर कोठ मा रचे काई केरवस ल दाई महतारी मन उजराये बर लग जथें।


*तिहार बार*- 

हमर छत्तीसगढ़ राज का, हमर देश घलो कृषि प्रधान हे, जिहाँ के रहन सहन अउ तीज तिहार, खेती किसानी के हिसाब  ले चलथे। सावन अउ भादो तीज तिहार के महीना होथे। ये महीना मा अतेक जादा तीज तिहार होथे कि सबके बरनन कर पाना सम्भव घलो नइहे। अतेक तीज तिहार मनाये के तको कारण हे। ज्यादातर मनखे मन पहली खेती किसानी करैं, अउ बरसा घरी भरे पानी मा निंदई कोड़ई करत सरलग खेतेच मा  लगे रहैं। जेखर ले हाथ अउ गोड़ दूनो सेठरा जाय,अउ सरलग भींगई तको होय। मनखे मन काम बूता मा अतिक रमे रहैं, कि यदि कोई तिहार बार नइ होतिस ता हाथ गोड़ के घलो खियाल नइ रखतिस, काम के संग आराम घलो चाही, ते पाय के ये घरी अतिक तिहार मनाये के चलन हे। जे मनखे मन के तन के संगे संग मन ला घलो भला चंगा करथे। आजो ये चलागन चलते हे। भादो महीना मा बेटी माई मन निंदई कोड़ई करके तीजा के बहाना मइके जाथे, काबर कि काम कमई के मारे बनेच दिन ले घर ले नइ निकले रहैं। कमरछठ,तीजा-पोरा, नारबोध,कड़ाबन्द, इतवारी, सोमवारी, जन्माष्टमी, रामसताव, गणेश चतुर्थी कस बनेच अकन तिहार भादो महीना म मनाये जाथे। ये सब तिहार बार मनखे  मनखे बीच दया मया,उछाह उमंग के बरसा करे के संगे संग खेती किसानी, संस्कार-संस्कृति, पार अउ परम्परा ले मानुष ल जोड़े रखथें।

                     भादो महीना के बड़का तिहार आय तीजा।  ये महतारी बहिनी मन के तिहार आय, जेला वो मन मइके मा रहिके मनाथे। ये दिन के रद्दा सबें बहिनी मन जोहत रथे, कि ददा नहीं ते भैया आही अउ तीजा ले जाही। जे बेटी ददा दाई के अंगना मा ननपन ले खेलिस खइस, फेर बिहाव के बाद वो अंगना के दुरिहागिस, अइसन मा वो पावन ठिहा मा फेर जब महतारी बहिनी मन पाँव रखथे ता सरग के सुख घलो, उन मन ला कमती लगथे। दाई, ददा, बहिनी, भाई के मया के धार अउ ननपन के जम्मो सुरता मा अन्तस् तक भींग जथे। तीजा के नेंग जोग ल तो सबें जानत हव,उपास कइसे रथे? का खाथें? कोन ल मनाथे? मोला लिखे के जरूरत नइहे। मइके के लुगरा तीजहारिन मन बर अनमोल होथे। तीजा मा संगी संगवारी संग जम्मों बहिनी ले मइके मा ये दरी भेंट होथे। ये पावन बेरा मा महतारी, बहिनी मन मइके जाके अपन जम्मों थकान अउ संसो ल बिसार देथें। मइके के माहौल उन ला एक बेर अउ ननपन के सुरता अउ  जुन्ना मस्ती मा डुबो देथे। तीजा संस्कृति संस्कार, मया दया अउ सुख शांति के बरसा करथे।  जमाना ले चलत आवत तीजा ला बहिनी महतारी मन बड़ उछाह अउ उमंग ले मनाथें। अउ जड़-चेतन, घर बार, खेत खार, पार परिवार  सबके सुख शांति के कामना करथें। ये सब तिहार बार के उपास धास शरीर बड़ बड़ उपयोगी होथे।


*खेत खार अउ फूल फुलवारी के सुघराई*-

खेत मा भराय पानी अउ ओमा तँउरत मछरी, मेचका, केकरा संग, सजोर  होके नाचत गावत धान ल देख मारे खुसी के, किसान खेतेच मा नाच अउ गा देथे। निंदइया मनके कर्मा ददरिया अउ सनन सनन चलत पुरवाही मन ल मता देथे। पड़की, पपीहा अउ तीतुर के मीठ बोली खेत खार मा रहिरहि राग रंग घोरत रहिथे। मेड पार मा फुले- फरे मुंगेसा,कोलिहापुरी, फोटका,फूट अउ काँसी काँद- दूबी मन ल मोह लेथे। काँसी के पोनी कस पड़ड़ी फूल देख जिया मा उमंग हमा जथे। तुलसीदास जी महाराज काँसी के फूल ल देखत लिखे हे- 


*फुले काँस सकल महि छाई।*

*जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई।*


माने धरती मा काँसी ल फुले देख अइसे लगत हे, मानो बरसा ऋतु हा अपन बुढ़ापा प्रकट करत हे। वइसे भादो घरी कांसी फुले के चालू होथे अउ शरद ऋतु घरी चारो मुड़ा खेत खार पड़री पड़री दिखथें। मेड़ पार के बम्हरी मा सोनहा फूल लद जथे।  बम्हरी के सोनहा फूल देख अधर म सहज ही माटी पूत लक्ष्मण मस्तुरिहा जी के ये गीत आ जथे- 

*हरियर हरियर बम्हरी म सोन के खिनवा।*


संग मा फागुन चैत मा फुलइया सरई ला सइगोंन बिजरावत दिखथे, ता मधुमास मा मउरइया आमा ल रियाँ अउ फागुन मा नचइया परसा अउ अमलतास ला पिंयर गुलमोहर। मोर कहना गलत होही ता भादो मा सइगोंन, रियाँ अउ पिंयर गुलमोहर ल देख के खुदे आंकलन कर सकथव, न गुलमोहर, अमलतास अउ परसा ले कमती दिखथे, न रियाँ आमा मौर ले अउ न सइगोन सरई ले। जइसे परसा अउ अमलतास माघ फागुन मा सड़क गांव गली खेत खार मा आगी बरोबर बरत दिखथें, ठीक वइसने भादो मा पिंवरी गुलमोहर शहर, गांव, गली, रद्दा बाट मा पिवरा पिवरा फूल मा लदाय लहसत, नाचत गावत दिखथे। मधुमास मा मउरे आमा कस रियाँ, भादो मा सजे सँवरे रथे। सइगोंन के बड़े  बड़े पाना घलो  फूल मा लुकाय दिखथें, कहे के मतलब सइगोंन अतका फुले रहिथे कि ओखर जबर पाना ह घलो नइ दिखे, सिर्फ फुले फूल नजर आथें। मन ला ललचावत   कदम्ब के फूल ला देखत दाई के लोरी

* "झूलना के झूल कदम्ब जे फूल"*  

अउ "*यह कदम्ब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे"* 


ये कविता अन्तस् मा उमड़े बर लग जथे। भादों घरी पिंयर गुलमोहर कस हिंगलाज घलो गली-खोर, खेत-खार,डहर-बाट मा माते रहिथे, दूनो के फूल घलो लगभग एके दिखथें, अंतर रथे ता सिर्फ ऊंचाई के। एक ऊँच पेड़ आय अउ एक छोट झाड़ीनुमा पौधा। नदिया नरवा तरिया अउ मेड़ पार म उगे बेसरम अउ धतुरा के पौधा घलो भादो मा हल्का गुलाबी रंग मा मनमोहत मुस्कावत दिखथें। एके गुच्छा मा कतको रंग ल समेटे मोकैया के फूल जघा जघा मुचमुचावत, भौरा तितली संग मनखे मनके जिया ल ललचावत दिखथे।

                 फुले कउहा,कसही,बोइर,छीता,जाम अउ छोट फर धर झूलत अमली भादो मा मनभावन लगथे। पड़री पड़री तिली के फूल, पिवरी पिवरी फूल धरे बम्हरी, मूँगेसा, फूट, सोयाबीन, कोलिहापुरी अउ बोदेला खेतखार मा भादो मास भर मगन रहिथे। अनमोल झुमका कस शिव बम्भूर के मनभावन फूल घलो दिखे बर लग जथे। भादो मा पानी मा बूड़े धान, फूल झराके पोटराये बर लगथे। खेत के मेड़ मा राहेर, तिली मनभावन लगथे। फुले पटवा के फूल के का कहना जउन देखे होही ते भागमानी आय, देखे मा ही ओखर फूल के सुघराई समझ आही, लिखके कहना मुश्किल हे। कनिहा भर बाढ़े काँदी, बन कचरा अउ लाम लाम लामे बेल बूटा देखत मन मा उमंग हमा जथे।


*घर अउ बारी-बखरी*

आसाढ़  मा बोय साग भाजी भादो मा फूल फर धरके नार बियार मा झूलत रथे। रमकलिया के छोट पौधा मा पिवरी सफेद अउ लाली रंग के मेल ले बने मनभावन फूल अइसे लगथे मानो कोनो पेंटर ह कागज मा उकेरे हे। मनमाड़े घपटे तोरई,करेला,कुंदरू,कोमढ़ा,पोपट,खेकसी घलो फूल फर के इतरावत रथे। भादो मा थोर थोर साग भाजी बारी बखरी ले निकले बर लग जथे, चारो कोती लामे नार बियार, अउ बाढ़े भाजी पाला ल देख मन झूमर जथे। काँद काँदी म घलो फूल आ जाय रहिथे। घर अउ बारी बखरी मा फुले बैजंत्री,चिरइयाँ के किसम किसम के रंग जिया ल खींच लेथे। नीला नीला फुले सूँतई के फूल(अपराजिता) नार बियार सुद्धा देवारी घरी लटके कोनो झालर बरोबर मनभावन लगथे। घर के दुवारी मा घउदे दसमत, कागज फूल(फाटक फूल), माते सादा सोहागी, मनमाड़े घउदे गोंदा अउ मोंगरा बरसा के पानी ले लड़ भिड़ के भादो मा खुलखुल खुलखुल हाँसत दिखथें,मानो जीत जे खुशी मनावत हें।


*कुवाँ,तरिया,नरवा*

आसाढ़ सावन भर पानी पी पी के भादो मा तरिया कुवाँ नरवा कोटकोट ले अघाये दिखथें। पार, पचरी, तट,तीर सब धोवा मँजा के उज्जर दिखथें। पानी पाके मछरी,मेचका मनमाड़े मगन होके तँउरत दिखथे। रंग रंग के कमल कोकमा तरिया ढ़ोंड़गा के सुघराई ला बढ़ावत दिखथें। बरसा के पानी घरी मतलाये कुवाँ,तरिया, नरवा के पानी भादो के आरो पाके फरिहर होय बर लग जथे, पानी भीतर  तँउरत मछरी केकरा घलो चकचक ले दिखेल  धर लेथे। उबुक चुबुक करत घाट घठोंधा राहत के साँस लेवत, मनखे मन ला अपन ऊपर चढ़े नाहत-खोरत देख मगन रहिथे। तरिया नरवा भराय पानी ला पइसा बरोबर हिसाब किताब लगा के जतके जरूरी हे ततके बोहावत दिखथे। कहे के मतलब जादा होथे तभे उलट भागथे, नही ते टिपटिप ले भरे रहिथे। 


                तीज तिहार के मजा उड़ावत, झूमत नाचत गावत, रंग रंग के रोटी पीठा खावत, काबा काबा काँदी डोहारत, खेत खार के मुही पानी बाँधत फोड़त, धान पान ल निंदत चालत अउ नजर भर निहारत, किसम किसम के भाजी पाला खावत, पेड़-पात, फूल-फर के सुघराई देखत देखत भादो कब बुलक जथे पतच नइ चले। अन्तर मन ले देखे,सोचे,गुने, सुने अउ नजर भर निहारे जाय ता,हमर हिंदी पंचाग के छठवा महीना भादो बड़ मनभावन हे।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)