नाली
जब ले घर के आघू मा, नाली बने हे।
का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।
बड़े बड़े मच्छर बड़, भभन भनन करथे।
जिवरा करला जाथे, नींद कहाँ परथे।।
का संझा का बिहना, चुँहकय लहू ला।
जर बुखार धरेच रथे, घर मा कहूँ ला।।
बइद डाक्टर हर घर के, माली बने हे।
का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।
बारो महीना भरे रथे, नहवई धोवई मा।
नाक पिरा जाथे, नाली के बस्सई मा।।
दौना के दम घुटगे, तुलसी तिरियागे।
गमके नइ गोंदा, भौरा तितली भागे।।
ना ठउर थाली, ना दसमत के डाली बने हे।
का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।
शहर के देखा सीखी, गाँव बउरागे।
सुविधा हा दुविधा, बनके तनियागे।।
नल बोरिंग सुख्खा हे, नाली भराये।
धरती के छाती मा, कांक्रीट हे छाये।।
ना आज बने हावय, ना काली बने हे।
का बताँव संगवारी, जिनगी गाली बने हे।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
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