Thursday, 7 May 2026

कलम रोंये हे

कलम रोंये हे

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सब बर रोटी पोये हे,

तभो बिन खाय सोये हे......|

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे..............||


हे खई-खजाना ओली म,

मीठ मंदरस हे बोली म||

सिधोत बारी-बखरी;खेत-खार,

दिन गुजरगे रंधनी खोली म||

जब ले धरे जनम,

तब ले करे जतन||

घर-बन;लइका; गोंसैंया के,

बेटी;महतारी;सुवारी बन|

मुंदरहा पहिली जागे हे ,

रतिहा आखिर म सोये हे.....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते बेर कलम रोये हे...........||


कोख के पीरा कोन मेर बॉचे|

रोवत  लइका  कोरा म  हॉसे|

सोना  चॉदी  हीरा  बनाइस,

रहिके  जिनगी  भर  कॉचे|

बनके दरपन घर के,

सजाये घर-परिवार ल|

कोन बोह पाही ये भुंइयाँ म,

महतारी  के  भार  ल|

फरे साग-भाजी;महके फूल-फूलवारी,

बाढ़े रूख-राई ;महतारी जे बोये हे....|

जे बेर लिखे हे, गोठ महतारी के,

ते  बेर  कलम  रोये हे....................|


बारे हे दिया तुलसी चंवरा म,

लिपे-पोते हे अँगना दुवारी||

मुचमुच हॉसे कुंदरा ह घलो,

जेन   घर   हे      महतारी||

महतारी अवतार दुरगा काली के|

देखाइस दुख म  घलो जी के|

हॉसिस ऑखी के ऑसू ल पी के|

फेर कोनो नइ देखिस घाव ल छी के|

खुदे मइलाके ;गंगा कस,

जग के  पाप ल धोये हे....||

जे बेर लिखे हे गोठ महतारी के,

ते   बेर   कलम   रोये  हे......||

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                 📝  जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                         बाल्को( कोरबा )

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मोर महतारी मोर अभिमान

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