*अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और चाटुकारिता के बीच बदलते मानवीय मूल्य-जीतेन्द्र वर्मा" खैरझिटिया'*
सच कहा जाए तो स्कूल का समय जीवन का स्वर्णिम काल होता है। यही वह समय है जब विद्यार्थी को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं दिया जाता, बल्कि उसके व्यक्तित्व की नींव भी रखी जाती है। विद्यालय में उसे अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, समय का महत्व, नियमों का पालन, परिश्रम, ईमानदारी और अपने कार्य को पूरी निष्ठा के साथ संपादित करने का संस्कार दिया जाता है। शिक्षक अपने विद्यार्थियों को केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं करते, बल्कि उन्हें एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनाने का प्रयास करते हैं। अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ विद्यार्थी शिक्षक के प्रिय होते हैं, क्योंकि उनमें भविष्य के एक अच्छे नागरिक की संभावना दिखाई देती है।
विद्यालय में विद्यार्थी को यह सिखाया जाता है कि सफलता का मार्ग परिश्रम, ज्ञान और ईमानदारी से होकर गुजरता है। उसे बताया जाता है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। यही संस्कार आगे चलकर उसके जीवन का आधार बनने चाहिए। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या विद्यालय में सीखे गए ये मूल्य वास्तव में हमारे सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में उसी रूप में काम आते हैं?
दुर्भाग्य से, जीवन के अगले पड़ाव पर पहुंचने के बाद कई बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग दिखाई देती हैं। जब व्यक्ति विद्यालय से निकलकर नौकरी, व्यवसाय, प्रशासन या सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करता है, तब उसका सामना ऐसी व्यवस्था से हो सकता है जहां योग्यता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ-साथ व्यक्तिगत संबंध, प्रभाव, सिफारिश और चाटुकारिता भी महत्वपूर्ण दिखाई देने लगती है। यहां एक विचित्र स्थिति पैदा होती है। जिस व्यक्ति को बचपन से अपने काम के प्रति ईमानदार और अनुशासित रहने की शिक्षा दी गई थी, वही व्यक्ति कभी-कभी अपनी प्रगति के लिए किसी अधिकारी, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की प्रशंसा करने को विवश दिखाई देता है।
यहीं से अनुशासन और चाटुकारिता के बीच का संघर्ष शुरू होता है।
विद्यालय में शिक्षक विद्यार्थी को ज्ञान देकर उसके भीतर आत्मसम्मान और कर्तव्यबोध पैदा करने का प्रयास करता है। शिक्षक की दृष्टि में विद्यार्थी की पहचान उसके ज्ञान, व्यवहार, परिश्रम और चरित्र से होती है। इसके विपरीत, जब किसी व्यवस्था में पद और प्रभाव सर्वोपरि हो जाते हैं, तब व्यक्ति की योग्यता से अधिक उसकी निकटता और प्रशंसा करने की क्षमता को महत्व मिलने का खतरा पैदा हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपने स्वाभिमान को धीरे-धीरे पीछे छोड़कर उस व्यक्ति के आगे-पीछे घूमने लगता है जिसके हाथ में उसके लाभ, पद या प्रगति की शक्ति होती है।
यह केवल एक व्यक्ति का पतन नहीं है; यह मानवीय मूल्यों के कमजोर पड़ने का संकेत है।
चाटुकारिता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे योग्यता और परिश्रम पर आधारित व्यवस्था कमजोर होती है। यदि किसी संस्था में वह व्यक्ति आगे बढ़ता है जो अपने काम में कुशल और ईमानदार है, तो इससे पूरी व्यवस्था में विश्वास पैदा होता है। लेकिन यदि केवल प्रशंसा करने वाला व्यक्ति आगे बढ़ता है और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति उपेक्षित रह जाता है, तो धीरे-धीरे अन्य लोगों के मन में भी यह धारणा बनने लगती है कि मेहनत और ईमानदारी से अधिक प्रभावशाली व्यक्ति को प्रसन्न रखना जरूरी है। यही सोच किसी भी संस्था की कार्यसंस्कृति को भीतर से खोखला कर सकती है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब चमचागिरी को व्यवहारिक बुद्धिमत्ता और ईमानदारी को मूर्खता समझ लिया जाए। व्यक्ति यदि अपने काम को पूरी निष्ठा से करता है, नियमों का पालन करता है और किसी अनुचित दबाव के सामने झुकने से इनकार करता है, तो वह कभी-कभी व्यवस्था में अकेला पड़ जाता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति हर परिस्थिति में बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की प्रशंसा करने के लिए तैयार रहता है, वह जल्दी पहचान बना लेता है। ऐसी विसंगति समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है—आखिर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किस प्रकार के मूल्य दे रहे हैं?
विद्यालय में हम कहते हैं कि सत्य बोलो, ईमानदारी से काम करो, नियमों का पालन करो और अपने कर्तव्य से पीछे मत हटो। लेकिन यदि वास्तविक जीवन में इन मूल्यों को सम्मान नहीं मिलेगा, तो बच्चों के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठेगा कि उन्होंने जो सीखा, उसका वास्तविक जीवन में मूल्य कितना है?
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हर कार्यालय, संस्था या अधिकारी व्यवस्था भ्रष्ट है अथवा हर जगह चाटुकारिता ही सफलता का माध्यम है। आज भी अनेक ऐसे अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी, उद्यमी और सामान्य नागरिक हैं जो ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को सर्वोच्च महत्व देते हैं। वे बिना किसी दिखावे के अपना काम करते हैं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। समस्या उन परिस्थितियों से है जहां व्यवस्था स्वयं गलत व्यवहार को प्रोत्साहित करने लगती है।
इस स्थिति के लिए केवल व्यक्ति को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। इसके लिए व्यवस्था, संस्थागत संस्कृति और नेतृत्व—सभी की जिम्मेदारी है। यदि किसी कार्यालय में पारदर्शिता हो, कार्य का मूल्यांकन स्पष्ट नियमों के आधार पर हो, पदोन्नति योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर हो तथा गलत आचरण को संरक्षण न मिले, तो चाटुकारिता के लिए जगह अपने आप कम हो जाएगी। इसके विपरीत यदि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद निर्णयों को प्रभावित करने लगे, तो चाटुकारिता को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है।
यहां गुरु और सत्ता के बीच का अंतर भी समझना आवश्यक है। गुरु का उद्देश्य सामान्यतः व्यक्ति को ज्ञान और विवेक देकर उसे अपने पैरों पर खड़ा करना होता है। वह विद्यार्थी को प्रश्न पूछना, सही और गलत में अंतर करना तथा अपने कर्तव्य का पालन करना सिखाता है। एक आदर्श नेतृत्व भी इसी भावना पर आधारित होना चाहिए। नेता या अधिकारी का वास्तविक दायित्व अपने अधीन कार्य करने वाले लोगों से चापलूसी करवाना नहीं, बल्कि उनकी क्षमता को पहचानना और योग्य व्यक्ति को आगे बढ़ने का अवसर देना है।
पैसा, पद और अधिकार यदि व्यक्ति के विवेक से बड़े हो जाएं, तो व्यवस्था में असंतुलन पैदा होता है। धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, पद से अधिकार प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन सम्मान और चरित्र खरीदे नहीं जा सकते। किसी व्यक्ति की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके आचरण, ज्ञान, परिश्रम और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार से बनती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विद्यालय में दिए जाने वाले संस्कारों को केवल पुस्तकों और भाषणों तक सीमित न रखें। यदि हम चाहते हैं कि बच्चे ईमानदार, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनें, तो समाज और संस्थाओं को भी उन्हीं मूल्यों का सम्मान करना होगा। शिक्षक द्वारा सिखाया गया अनुशासन तब सार्थक होगा, जब कार्यालय में भी समय की पाबंदी का सम्मान हो। कर्तव्यनिष्ठा तब सार्थक होगी, जब अपने काम को ईमानदारी से करने वाले व्यक्ति को उसका उचित सम्मान मिले। और ज्ञान तब सार्थक होगा, जब निर्णय व्यक्ति की चापलूसी से नहीं, बल्कि उसकी योग्यता और सत्यनिष्ठा से प्रभावित हों।
अंततः प्रश्न केवल इतना नहीं है कि चाटुकारिता बड़ी है या अनुशासन? वास्तविक प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। यदि हम योग्यता, ईमानदारी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा को सम्मान देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां इन्हीं मूल्यों को अपनाएंगी। लेकिन यदि हम लगातार यह संदेश देंगे कि प्रशंसा, सिफारिश और व्यक्तिगत प्रभाव ही आगे बढ़ने का रास्ता है, तो विद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले नैतिक मूल्य केवल पाठ्यपुस्तकों के पन्नों तक सीमित रह जाएंगे।
हमारा देश तभी वास्तविक अर्थों में प्रगति करेगा, जब व्यक्ति के पद से अधिक उसके काम का सम्मान होगा, प्रशंसा से अधिक योग्यता को महत्व मिलेगा और संबंधों से अधिक नियमों का पालन होगा। व्यवस्था को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो अपने कर्तव्य का निर्वहन बिना किसी स्वार्थ के करें और नेतृत्व को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो चाटुकारों की भीड़ के बजाय योग्य और ईमानदार लोगों को पहचान सकें।
इसलिए यह केवल सोचने का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का विषय है—हम अपने बच्चों को विद्यालय में जो मूल्य सिखा रहे हैं, क्या हमारा समाज उन्हें जीने का अवसर भी दे रहा है? यदि इसका उत्तर नकारात्मक है, तो दोष केवल बच्चों या कर्मचारियों का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जो अच्छे संस्कारों को जीवन में स्थान देने के बजाय चाटुकारिता को सफलता का माध्यम बनने देती है।
विद्यालय से निकलते समय विद्यार्थी के हाथ में केवल प्रमाण-पत्र नहीं होता; उसके भीतर वर्षों से निर्मित संस्कार भी होते हैं। हमारी जिम्मेदारी है कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियां उन संस्कारों को कुचलें नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूत करें। तभी शिक्षा वास्तव में शिक्षा कहलाएगी और अनुशासन तथा कर्तव्यनिष्ठा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित न रहकर पूरे समाज की पहचान बन पाएगी।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को कोरबा(छग)
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