Wednesday, 9 September 2026

स्थायी और अस्थायी व्यवस्था-जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया

 *स्थायी और अस्थायी व्यवस्था*


— जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'


                  स्थायी और अस्थायी—ये केवल दो शब्द नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति के कार्य, सोच, जिम्मेदारी, विश्वास और भविष्य से जुड़े दो अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। आज के समय पर विचार करें तो चारों ओर अस्थायी व्यवस्था का बोलबाला दिखाई देता है। नियमित और स्थायी नियुक्तियों के स्थान पर ठेकेदारी, संविदा और अस्थायी रोजगार का चलन बढ़ता जा रहा है। अनेक नियुक्तिकर्ता अपने कर्मचारियों को स्थायी रूप से साथ रखने के बजाय आवश्यकता के अनुसार काम लेना पसंद करते हैं। इससे कर्मचारी के मन में हमेशा यह अनिश्चितता बनी रहती है कि आज जो काम उसके पास है, वह कल भी रहेगा या नहीं। इस अस्थिरता का प्रभाव केवल कर्मचारी की आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ता, बल्कि उसके काम करने की मानसिकता पर भी पड़ता है। जिस व्यक्ति को अपने भविष्य का भरोसा नहीं होता, उसके लिए लंबे समय की योजना बनाकर काम करना कठिन हो जाता है। इसके विपरीत, स्थायित्व व्यक्ति को अपने कार्य से जुड़ने, अनुभव प्राप्त करने और भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने का अवसर देता है।

                   इसे *किसान और खेत* के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक किसान अपने खेत की देखभाल केवल बरसात में नहीं करता, बल्कि गर्मी, सर्दी और बरसात—हर मौसम में उसे सँवारता है। वह मिट्टी तैयार करता है, खाद डालता है, बीज बोता है, सिंचाई करता है और फसल की रक्षा करता है, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि यही खेत लंबे समय तक उसके और उसके परिवार की आजीविका का आधार रहेगा। लेकिन यदि उसी किसान से कह दिया जाए कि तुम्हें केवल एक-दो वर्ष तक ही इस खेत से पैदावार लेनी है, उसके बाद यह खेत तुम्हारा नहीं रहेगा, तो उसके भीतर पहले जैसा अपनापन और भविष्य का विश्वास नहीं रहेगा। वह तत्काल मिलने वाली पैदावार पर अधिक ध्यान देगा, क्योंकि उसे पता होगा कि भविष्य की फसल का लाभ उसे नहीं मिलने वाला। इसके विपरीत, स्थायी किसान आज की फसल के साथ आने वाले वर्षों की उपज के बारे में भी सोचता है।

                 यही बात किसी संस्था और उसके कर्मचारियों पर लागू होती है। जो कर्मचारी जानता है कि उसे लंबे समय तक इसी संस्था के साथ काम करना है, वह अपने कार्यस्थल को केवल नौकरी करने की जगह नहीं, बल्कि अपने भविष्य का हिस्सा समझता है। वह अपने काम को बेहतर बनाने, नई बातें सीखने और संस्था की उन्नति में योगदान देने का प्रयास करता है। वर्षों से जुड़ा कर्मचारी संस्था की कार्यप्रणाली, उसकी समस्याओं और उनके समाधान को अनुभव से समझता है। इसलिए बार-बार कर्मचारियों को बदलना केवल व्यक्ति को बदलना नहीं, बल्कि संस्था के संचित अनुभव को भी कमजोर करना है।

                  शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थायित्व का महत्व स्पष्ट दिखाई देता है। जो *शिक्षक* वर्षों तक एक ही विद्यालय से जुड़े रहते हैं, वे विद्यार्थियों की क्षमता, कमजोरियों और आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। उनका संबंध केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और भविष्य के निर्माण में भी योगदान देते हैं। बार-बार शिक्षक बदलने से पढ़ाई के साथ-साथ शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बनने वाला विश्वास भी प्रभावित हो सकता है। इसलिए शिक्षा जैसे क्षेत्र में अनुभव और निरंतरता का विशेष महत्व है।

                  स्थायित्व को *किराए के घर* और अपने घर के अंतर से भी समझा जा सकता है। जो व्यक्ति जानता है कि उसे लंबे समय तक उसी घर में रहना है, वह उसकी सफाई, मरम्मत, रंग-रोगन और रखरखाव पर ध्यान देता है। वहीं थोड़े समय के लिए रहने वाला व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उतना दूरगामी विचार नहीं करता। यही अंतर कार्यस्थल पर भी दिखाई देता है।

                 स्थायित्व का महत्व केवल नौकरी तक सीमित नहीं है। परिवार और सामाजिक संबंध भी वर्षों के विश्वास, जिम्मेदारी और अपनत्व से मजबूत होते हैं।व्यक्ति जिस संबंध को स्थायी मानता है, उसमें अपना समय, श्रम और भावनाएँ लगाता है। कार्यस्थल पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। कर्मचारी से दीर्घकालीन निष्ठा की अपेक्षा करने से पहले संस्था को उसके भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। यह भी सही है कि हर अस्थायी कार्य अनुचित नहीं होता। किसी विशेष परियोजना, मौसमी कार्य या सीमित अवधि की आवश्यकता के लिए अस्थायी नियुक्ति उपयोगी हो सकती है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब स्थायी प्रकृति के कार्यों को भी लगातार अस्थायी व्यवस्था के सहारे चलाया जाए और कर्मचारी को वर्षों तक भविष्य की अनिश्चितता में रखा जाए।

                अस्थायी नियुक्ति से नियोक्ता कर्मचारी पर निश्चित रूप से अपना अधिकार जता सकता है। वह आवश्यकता और व्यवस्था के नाम पर काम की शर्तें तय कर सकता है, समय-समय पर कर्मचारी को बदल सकता है और यह भी तय कर सकता है कि किसे कितने समय तक काम देना है। लेकिन प्रश्न यह है कि अधिकार से क्या विश्वास भी प्राप्त किया जा सकता है? कर्मचारी काम तो कर सकता है, निर्देशों का पालन भी कर सकता है, लेकिन उसके मन में यदि यह आशंका बनी रहे कि उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है, तो उसके और संस्था के बीच वह आत्मीयता कैसे विकसित होगी, जो किसी भी कार्य-संबंध को मजबूत बनाती है? अधिकार से काम लिया जा सकता है, लेकिन विश्वास अर्जित करना पड़ता है। *विश्वास किसी नियुक्ति-पत्र की अवधि का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह निरंतरता, सम्मान, सुरक्षा और जिम्मेदारी से पैदा होता है। आखिर दुनिया केवल अधिकार और नियमों से नहीं चलती; दुनिया विश्वास पर टिकी है*। परिवार हो, समाज हो या कोई संस्था—जहाँ विश्वास होता है, वहाँ व्यक्ति अपने सामर्थ्य से आगे बढ़कर योगदान देता है। जहाँ विश्वास नहीं होता, वहाँ व्यक्ति केवल अपने दायित्व की सीमा तक सिमट जाता है। नियोक्ता का अधिकार पद से आता है, लेकिन कर्मचारी का विश्वास व्यवहार से अर्जित होता है। इसलिए कर्मचारी को केवल “काम करने वाला व्यक्ति” समझना पर्याप्त नहीं है। वह संस्था के वर्तमान को गति देने के साथ उसके भविष्य का निर्माण भी करता है। यदि संस्था उससे निष्ठा, समर्पण और बेहतर परिणाम की अपेक्षा करती है, तो उसे भी कर्मचारी के प्रति विश्वास और भविष्य की सुरक्षा का भाव रखना होगा। कर्मचारी से स्थायित्व की अपेक्षा और उसे स्वयं अस्थायित्व देना—यह एक विरोधाभास है।

                    यहाँ एक प्रश्न विचारणीय है—यदि किसी व्यक्ति को अपने भविष्य का ही भरोसा न हो, तो उससे भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने की अपेक्षा कितनी उचित है? पैसा स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार के कार्यों में मिलता है, लेकिन नौकरी केवल पैसे का संबंध नहीं है। इसके साथ विश्वास, सुरक्षा, अनुभव, निष्ठा और अपनत्व भी जुड़े होते हैं। विश्वास केवल वेतन देकर नहीं खरीदा जा सकता; उसे सम्मान, अवसर और भविष्य की सुरक्षा देकर अर्जित करना पड़ता है।

                  अतः स्थायित्व केवल नौकरी की अवधि नहीं, बल्कि विश्वास की नींव है। किसी संस्था की वास्तविक शक्ति उसकी इमारत या पूँजी में नहीं, बल्कि उसके अनुभवी, योग्य और समर्पित लोगों में होती है। इसलिए जहाँ संभव हो, वहाँ स्थायी रोजगार और दीर्घकालीन कार्य-संबंधों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।


*अस्थायी व्यवस्था से काम चलाया जा सकता है, लेकिन स्थायित्व से संस्था, विश्वास और भविष्य का निर्माण होता है।*


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छत्तीसगढ़)

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