Saturday, 1 August 2026

सुरता के सावन-कुकुभ छंद

 सुरता के सावन-कुकुभ छंद


बही तोर सुरता के सावन, रहरहि आके भींगाथे।

पार जिया के बाँधौं कतको, मया छलक तभ्भो जाथे।।


करिया चुन्दी उड़ै हवा मा, लागे बदरा हे छाये।

आँखी चमके बिजुरी जइसे, मुस्की हा गाज गिराये।।

बूँद मया के बरसै रझरझ, मन मँजूर बन इतराथे।

बही तोर सुरता के सावन, रहरहि आके भींगाथे।


रोम रोम हा मोर रूख कस, लहर लहर बड़ लहराये।

मया जाल मा अरझे सपना, मछरी जइसे अँटियाये।।

नाम रटे मन दादुर बनके , फुरफुन्दी कस उड़ियाथे।।

बही तोर सुरता के सावन, रहरहि आके भींगाथे।।


आस जिया के ताल नदी कस, पी पी के नीर अघाये।

मया दया के घउदे खेती, सावन जिवरा हरसाये।।

झड़ी सही बरसे कतको दिन, सब सुधबुध जिया गँवाथे।

बही तोर सुरता के सावन, रहरहि आके भींगाथे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा

 कुंडलियाँ छंद-डिजिटल दौर मा


डिजिटल इंडिया हा गजब, मारत हावै जोर।

तुरते होवय काम सब, हाँसे रोवँय चोर।।

हाँसे रोवँय चोर, खबर फइले आगी कस।

पाय बने मन मान, डरे मनखें दागी कस।।

बड़े होय या छोट, मिलत हावँय सबला बल।

सबके मन के बात, बतावय बेरा डिजिटल।।


हावी डिजिटल दौर हे, चारो कोती देख।

कई ऊँचाई ले गिरे, फिरे कई के लेख।।

फिरे कई के लेख, कई पछ्तावत तक हें।

घर लागे ना रोड, सबे कोती बकबक हें।।

करनी करही काय, कोन जन बेरा भावी।

सोच समझ बतियाव, हवै डिजिटल युग हावी।।


राखत हवै रिकार्ड ला, डिजिटल अपन मेर।

गुररावत हे साथ पा,  बकरी तक बन शेर।।

बकरी तक बन शेर, आज नाचत हे बन ठन।

चारी चुगली झूठ, आय आघू मन दनदन।।

सबके खोले पोल, देख कतको हें काँखत।

डिजिटल बेर रिकार्ड, सबे के हावय राखत।।


दिखगिस डिजिटल मा चरित, कइसन हावय कोन।

लोहा आये कोन हा, आय कोन हा सोन।।

आय कोन हा सोन, जान जावत हें दुनिया।

झूठ मूठ हे शोर, असल मा काँपे मुनिया।।

धर देखावा झूठ, इही मा सबझन टिकगिस।

राजा प्रजा समेत, सबें के नीयत दिखगिस।।


सबझन इस्टाग्राम मा, करत हवँय बकलोल।

दुनिया ला बतलात हे, अपन जिया के बोल।।

अपन जिया के बोल, सबें झन हावैं बोलत।

कई नाच देखाय, कई झन हें विष घोलत।।

होही कलो हिसाब, बने आजे भर झन बन।

काखर का हे काम, गड़ाये आँखी सबझन।।


डिजिटल के बाजा बजिस, होगिस बत्ती गोल।

छोट लगत हे अउ ना बड़े, सबें कहें दिल खोल।।

सबें कहें दिल खोल, जिया मा जउने हावँय।

मन मुताबित गीत, सबें झन कइसे गावँय।।

पके झूठ सुन कान, करे जिवरा बड़ तलमल।

बनगे हे हथियार, आज ये बेरा डिजिटल।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 31 July 2026

आज के व्यवस्था ऊपर--कुंडलियाँ छंद

 आज के व्यवस्था ऊपर--कुंडलियाँ छंद


नेता मनके घर मिले, बोरा बोरा नोट।

कखरो डर उन ला नहीं, थरथर काँपय छोट।

थरथर काँपय छोट, चुकावैं पाई पाई।

बड़े खाय मिल बाँट, बने सब भाई भाई।

पइसा जेखर तीर, उही ए विश्व विजेता।

कुर्सी ला पोटार, खाय भारत ला नेता।


भारत भुइयाँ मा हमर, गजब मचे हे लूट।

मनखे आम पिसात हे, बड़का ला हे छूट।

बड़का ला हे छूट, करै रोजे मनमानी।

सुरसा कस मुह फार, खाय नित धन दोगानी।

धरम करम सत मान, बड़े मन हावैं बारत।

साथ देय सरकार, बढ़े आघू का भारत।


लंबा कर कानून के, धरे छोट के घेंच।

बात बड़े के होय ता, फँस जाये बड़ पेंच।

फँस जाये बड़ पेंच, करे का कोट कछेरी।

पद पइसा के तीर, लगावैं सबझन फेरी।

मूंदे आँखी कान, कलेचुप बनके खंबा।

देखे बस कानून, जीभ ला करके लंबा।


खीसा मा धनवान के, अफसर नेता नोट।

डरै आम जन देख के, वर्दी करिया कोट।।

वर्दी करिया कोट, सके छोटे मनखे ले।

गले कभू नइ दाल, बड़े मन उल्टा पेले।

नवें रथे दिनरात, छोट बन खम्भा पीसा।

अकड़ अमीर दिखाय, भरे हे कोठी खीसा।


फ्री के झोरे रेवड़ी, नेता अउ जन खास।।

आम आदमी  हे तभे, होवत हवे विकास।

होवत हवे विकास, फकत कुर्सी वाले के।

मर मोटा नइ पाय, आम जन ला सब छेंके।

कई किसम के टैक्स, देय पानी पी पी के।

मनखे आम कमाय, खाय नेता मन फ्री के।


करजा के दम मा बड़े, बड़े बने हे आज।

लोक लाज के डर नही, नइ हे सगा समाज।

नइ हे सगा समाज, कोन देखाये अँगरी।

रंभा रति नचवाय, मंद पी तीरे टँगड़ी।

इँखरे हे सरकार, भले मर जावैं परजा।

सकल सुरत पद देख, बैंक तक देवै करजा।


फर्जी फाइल ला धरे, होगे बड़े फरार।

रोक छोट के साइकिल, गरजै पहरेदार।

गरजै पहरेदार, दिखाके लउठी डंडा।

नाक तरी धनवान, लुटैं सब ला बन पंडा।

पद पा पूँजी जोर, करैं कारज मनमर्जी।

भागे तज के देश, बनाके फाइल फर्जी।


छोट मँझोलन के रहत, बचे हवै ईमान।

गिरथें उठथें रोज के, बड़े बड़े धनवान।

बड़े बड़े धनवान, चलैं पइसा के दम मा।

धर इज्जत ईमान, जिये छोटे मन कम मा।

जादा के ले चाह, नियत नइ देवैं डोलन।

चादर भीतर पाँव, रखैं नित छोट मँझोलन।


माया पइसा मा मिले, पइसा मा रस रास।

इज्जत देखे जाय नइ, पइसा हे यदि पास।

पइसा हे यदि पास, पास वो सब पेपर मा।

रखे जेन मा हाथ, पहुँच जाये वो घर मा।

पइसा मा धूल जाय, चरित अउ बिरबिट काया।

कोन पार पा पाय, जबर पइसा के माया।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

मर लगगे फोटू विडियो-कुकुभ छंद

 मर लगगे फोटू विडियो-कुकुभ छंद


कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।

सबे चीज के फोटू विडियो, सदा मान थोरे पाही।।


सेवा सत सुख गुण गियान ला, देखाये बर नइ लागे।

तोपे ढाँके के उघरत हे, उघरे के हा तोपागे।।

हवै मनुष के आय जातरी, धारेच धार बोहाही।

कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।।


बर बिहाव छट्ठी बरही के, समझ आय विडियो फोटू।

मरनी हरनी जलत लाश ला, नइ छोड़त हावय मोटू।।

रील बनाये के चक्कर मा, नवा जमाना बोहाही।

कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।।


फोटू विडियो मा हे नत्ता, असल बइठगे हे भट्ठा।

मरगे हावय मान मनुष के, भक्ति भाव होगे ठट्ठा।।

आँखी मूँदे बर लागत हे, अउ का काली देखाही।

कई काम ला चुपेचाप रहि, मनखे ला करना चाही।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

Wednesday, 29 July 2026

पइसा अउ संगी- सार छन्द

 पइसा अउ संगी- सार छन्द


पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।

रोज चढ़ाथें चना झाड़ मा, ख्वाब दिखा सतरंगी।।


काम करयँ नइ कभू अकेल्ला, रटथें यारी यारी।

जुगत बनाथें खाय पिये के, घूम घूम के भारी।।

चाँटुकार के घोर चासनी, बात कहयँ बेढंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


जिया जीतथें जुरमिल फोकट, झूठमूठ कर दावा।

राहन नइ दय पहली जइसे, रंग रूप पहिनावा।।

बना डारथें सिधवा ला तक, अपने कस हुड़दंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


देवयँ नइ सुझाव फोकट मा, साहब बइगा गुनिया।

किसन सुदामा के जुग नोहे, मतलब के हे दुनिया।

रसा रहत ले चुहके मनभर, तजयँ देख के तंगी।

पइसा के राहत ले मिलथें, किसम किसम के संगी।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)


अइसनो संगी मन ला मित्रा दिवस के बधाई

Sunday, 26 July 2026

जब तक चुनाव रिहिस

 खातू-कुंडलियाँ छंद


खातू मनके राज मा, खातू बर लुलवान।

खातू ले खेती हवै, का अब करन किसान।।

का अब करन किसान, अधर मा हवै किसानी।

कोन सुने गोहार, कोन दै खातू पानी।।

हें जे जिम्मेदार, सबे खाए के पातू।

संसो खाए खूब, कतिक कब मिलही खातू।।


जीतेन्द्र वर्मा'₹"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



जब तक चुनाव रिहिस


अच्छा दिन के हाव भाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

आम जनता के हियाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।1


आव अउ समस्या बताव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।

अंडा मछरी भेल खाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।2


तेल पानी गैस में ठहराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

नारा मा महँगाई दुरिहाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।3


ईरान अमरीका संग जुराव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

हारमुज ले बुलकत नाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।4


संसो के नइ दिखत सिर पाँव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।

चारों खूंट विश्व गुरु के दबाव रिहिस, जब तक चुनाव रिहिस।।5


जीतेन्द्र वर्मा'"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)



गिरगिट जैसा रंग बदलो, राज करोगे।

समय देखके संग बदलो, राज करोगे।।

अपनो से लड़ रहे है, दुश्मन को छोड़कर,

तौर तरीका जंग बदलो, राज करोगे।।


अंग बदलो, राज करोगे।

जंग बदलो , राज करोगे।

बंग बदलो,, राज करोगे।

भंग बदलो,, राज करोगे।

सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद

 सड़क तीर के तोर खेत मा-लावणी छंद


सड़क तीर के तोर खेत मा, नजर हवै बैपारी के।।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


नपा नपा के खेत खार ला, गाँजत हें उन मन खरही।

उँखर हाथ जा महतारी हा, दिखत हवै निच्चट मरही।।

टावर गारा छत मा दरके, छाती हा महतारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


साम दाम अउ दंड भेद ले, भुइयाँ ला उन कब्जाथें।।

नाका बंदी कर पिछोत के, मनखें मन ला रोवाथें।।

औने पौने देय दाम उन, लेय लाभ लाचारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


शासन अफसर सँग पा गरजे, बरजे नइ कोनो उन ला।

सोन उपजइया महतारी मा, छीचत हें उन मन घुन ला।

लोभ आय झन अउ सताय झन, संसो दुनियादारी के।

सावचेत हो जा जी मंगलू, लाज बचा बन बारी के।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)




पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद

 पाँव लमायेन जतिक जादा-सरसी छंद


पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।

एक जमाना मा घर गाँव ह, सुख के लागे खान ।।


नइ माँगिस हे खपरा छानी, कभ्भू कूलर फ्रीज।

मुड़मिंजनी माटी के आघू, फेल लक्स अउ ब्रीज।।

छेना लकड़ी खाके हाँडी, हाँसे साँझ बिहान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


कोलाबारी के तरकारी, पारा ला दै तार।

नदिया नरवा बोरिंग कुआँ, बहे दूध कस धार।।

असली धन अरसी जौ सरसो, चना गहूँ अउ धान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


नीम आम अमली बर पीपर, देय फूल फर छाँव।

सिंहासन कस चौकउ चौरा, लगे सरग कस गाँव।

छत सीमेंट आय हे जब ले, तब ले हन हल्कान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


बबा कहानी रोज सुनावै, दाई लोरी गाय।

हाट सजे हर हप्ता हप्ता, चीज सबे मिल जाय।।

पेट संग मा जिया अघाये, गांव देय वरदान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।



सुविधा दुविधा बनत जात, हाल होय बेहाल।

महँगाई के मार पड़त हे, मनुष बजावँय गाल।।

सुरता जुन्ना समय आत हे, काला काय बतान।

पाँव लमायेन जतिक जादा, ततिक हवन परसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

खेती किसानी के गत-सरसी छंद

 खेती किसानी के गत-सरसी छंद


विलासना के चीज बनाये, ते होगे धनवान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।


पानी पुरवा के सँग चाही, खाये खातिर अन्न।

फेर आज ये काय चलत हे, सोच होय मन सन्न।।

खाली पेट दिमाक चले नइ, भरे आय तब ज्ञान।

साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।


जांगर खपगे नांगर खपगे, खपगे आस तमाम।

कतका रुपया का के मिलही, गढ़े आन मन दाम।

उद्योगी बैपारी फुदरे, मनके बेंच समान।

साग दार फर अन्न उगाके,रावैं आज किसान।।


बिजनेस बढ़े बढ़े नौकरी, खेती ले दुरिहाँय।

जे हे थेभा ये दुनिया के, तौने भटका खाँय।।

खेत किसानी आये जिनगी, पाय किसानी मान।

साग दार फर अन्न उगाके,रावैं आज किसान।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

वाटर पार्क-सरसी छंद

 वाटर पार्क-सरसी छंद


वाटर पार्क म नाहै खातिर, मनखें मन जुरियाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


घाट घठौंदा अरदा परदा, नइ हावै कुछु चीज।

बेढंगा सब झुमरत दिखथें, नइहें तौर तमीज।।

मजा मजा कहि मान बेंच के, छोट बड़े इतराँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


देहाती मन तँउरे तरिया, कहि नइ झाँकैं पार।

तेन तउल मा पानी पाके, होगे हें मतवार।।

मारे डींग खिंचाये फोटू, सुधबुध अपन भुलाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


नवा उदिम बैपारी मन के, आये सब ला रास।

देखे सुने म अटपट लागे, उड़े मनुष बन तास।।

नवा जमाना के बाजार म, लाज शरम बेंचाँय।

तिरिथ बरोबर तरिया तज के, डबरा म हें मुडाँय।।


जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

बाल्को,कोरबा(छग)

स्कूल जाबों-लावणी छंद

 स्कूल जाबों-लावणी छंद


गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।

घण्टी तख्ता कुर्सी टेबल, आँखी आघू झूलत हे।।


खाना पानी पुस्तक कॉपी, सब हियाव कर धरना हे।

खेल कूद अब कमती करके,पढ़ई लिखई करना हे।।

भारी भरकम बस्ता हावय, साँस देख के फूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


बनही कतको झन स्कूल म, नवा नवा संगी साथी।

सबो किसम के ज्ञान ल पाबों, नइ छूटे माँछी हाथी।।

जघा जघा स्कूल खुले ले, अँधियारी पट धूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।।


पढ़बों लिखबों आघू बढ़बों, देखे सपना सिरजाबों।।

पढ़े लिखे के मोल गजब हे, पढ़ लिख ज्ञानी कहिलाबों।।

पढ़े लिखे ते छुवै अगासे, पढ़े नही ते ढूलत हे।

गर्मी छुट्टी घलो सिरागे, फेर स्कूल अब खूलत हे।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

बाप बनना आसान नही

 बाप बनना आसान नही


जिंदगी में ताना है तान नही, बाप बनना आसान नही।

कभी घर में खोजे मान नही, बाप बनना आसान नही।।


जिनके कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ रहता है हरदम।

फिर भी चेहरे पर थकान नही, बाप बनना आसान नही।।


पत्नी बेटी बेटों की हर आस को पूरा करने में लगा रहता है।

उनका अपना कोई अरमान नही,बाप बनना आसान नही।।


सिर्फ घर के लिए ही घर से हर रोज बाहर जाता है कमाने,

घर से बढ़कर कोई जहान नही,बाप बनना आसान नही।।


जीते जी ही बाँट देता है, घर द्वार खेत खार रुपिया पइसा,

मानो तन में अपनी जान नही, बाप बनना आसान नही।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)


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...............ददा.....................


घर बर 'बर' फेर बइरी  बर, बान कस ददा।

भदरी कांड़ मुड़का म, नेवान कस ददा।


बड़का बर मचान,छोटका बर ढलान,

हाड़ -मांस-गुदा  म, परान कस ददा।


उछिन्द होके सोये, सबो  घर  भरके,

त सोवत-जागत दिखे,उड़ान कस ददा।


बेटा बहू नाती पंथी ,दाई भाई सब बर,

बइठे हे डेरऊठी म , दान  कस  ददा।


मुहूँ के सुवाद बर, बाकी सब कोई,

त पेट भरे बर सबके,धान कस  ददा।


सबो  ल  पुरोथे,जांगर पेर - पेर  के,

सिरागे तभो माड़े रथे,अथान कस ददा।


कभू  नइ  बदले गुँड़ड़ी ल मुड़ी के,

बोहे रथे घर ल ,शेषनांग  कस  ददा।


कोनो हुदरे-कोचके ,कोनो देवे गारी,

तभो कर्मा-ददरिया  के,तान कस ददा।


दिखथे भले उप्पर ले,नरियर कस ठाहिल,

फेर भीतर ले हे कोंवर  पिसान  कस ददा।


हाँकत हे घर के गाड़ा ल रात दिन,

बांधे पागा मुड़ म,ईमान कस ददा।


घपटे अंधियारी,सिरागे सबके मति,

तभो बरथे जगमग,गियान  कस  ददा।


घाव  भरे   हे, जिया   म   जँऊहर,

तभो रिहिथे कलेचुप,सियान  कस  ददा।


तोर चरन पखारे,तोर गुन गाये खैरझिटिया,

तँय  ये   भुइयां   मा   ,भगवान  कस  ददा।


जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"

बालको(कोरबा)

9981441795


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मुक्तक


ना जाने क्या कर लेगा, कुछ ख़ास बचाकर पापा।

हरदम  चलते रहते हैं, बस आस बचाकर पापा।।  

सबको खिलाते हैं, चना-चाट चटपटी चौपाटी में,  

खुद बिना खाए आ जाते हैं, पचास बचाकर पापा।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

पारा गरम हे

 पारा गरम हे


लइका मन के स्कूल खुलगे, पारा गरम हे।

गाड़ी पेलई मा सांस फुलगे, पारा गरम हे।।


बिन खातू के बोकबाय देखँय किसान मन।

कतको झन फाँसी झुलगे, पारा गरम हे।।


धान छोड़ कुछु आन उगावव कहै सरकार।

धान कटोरा के पेंदा उलगे, पारा गरम हे।।


बाढ़त बिजली बिल, लाइन घलो पदोवव।

देख मति एती ओती ढुलगे, पारा गरम हे।।


वाह रे जमाना, मोबाइल के पेट बर कमाना।

ब्याज के चक्कर मा मूल गे,पारा गरम हे।।


महँगा मोटर गाड़ी मन कबाड़ होही कथे।

ददा बबा के जमाना भुलगे,पारा गरम हे।।


अच्छा दिन मा ये हाल हे, बतावन काला,

ये देख बरफ घलो सुलगे, पारा गरम हे।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

हम नहीं

 हम नहीं


रिश्ते बिगड़ने का किसी को कोई ग़म नहीं।

आज सबको सिर्फ़ पैसा चाहिए, हमदम नहीं।।


खंजर से खुदे ज़ख्म भी भर जाते हैं मरहम से।

ज़ुबां से बढ़कर ज़माने में कोई बारूद-बम नहीं।।


खुद को राजा समझ रहे हैं रील वाले।

रीयल में उनमें ज़रा-सा भी दम नहीं।।


एकता, अखंडता, भाईचारा — सब दिखावा है।

ज़हर जाति-धर्म का हो रहा है कम नहीं।।


पता नहीं, ये पैमाना है या मौकापरस्ती।

देश संविधान से चलेगा, पर हम नहीं।।


जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)



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नारा-स्वच्छता


जतके बढ़ही साफ सफाई।

ततके बढ़ही मान- बड़ाई।।


साफ सफाई जिंहा हे।

सिरतों सरग तिंहा हे।।


स्वच्छता जे अपनाथे।

वो निरोग हो जाथे।।


स्वच्छ शरीर रहे, स्वच्छ घर गली गाँव।

स्वच्छता चारो कोती रही, तभे होही नाँव।।


साफ सफाई के बिना।

जीना घलो का जीना।।


साफ सफाई देख के, मन मा खुशी हमाथे।

मन लगथे हर चीज मा, रोग- राई दुरिहाथे।।


स्वच्छ जंगल रहे, स्वच्छ नही ताल।

स्वच्छता अपनाबों, होबों खुशहाल।।


खुद साफ सफाई अपनावव।

दूसर ला घलो समझावव।।


खैरझिटिया

पर उपदेस (सार छंद)

 पर उपदेस (सार छंद)


देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।

स्वारथ मा सन काम करत हें, दया मया सत लेस।


धरम करम के बात करैं नित, कहैं झूठ झन बोलौ।

सुख सुम्मत मा जिनगी जीयौ, जहर कभू झन घोलौ।

बात मया मरहम के बोलँय, बाँटय उही कलेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


नशापान के हानि बतावँय, रोजे भाषण पेलें।

उहू भुलागे बात बचन ला, अध्धी पाव ढकेलें।

बिहना लागे संत गियानी, संझा बदले भेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


मनखे मनखे एके आवन, छोड़ौ कहै लड़ाई।

तिही बड़े छोटे नइ मानै, दाई ददा न भाई।

आन छोड़ दे अपने मन ला, पहुँचावत हें ठेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


कहिस तउन करके दिखलाइस, तुलसी बुद्ध कबीरा।

तज दिस धन दौलत वैभव ला, किसन पाय बर मीरा।

आज मनुष तज सही गलत ला, मारत हावँय टेस।

देख जउन ला तउन आज बस, देवत हें उपदेस।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

सिस्टम के गलती-लावणी छंद

 सिस्टम के गलती-लावणी छंद


जियई मरई पढ़ई लिखई, नव जुग बर सब चलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


चलन बढ़त हावै एकल के, नत्ता रिस्ता दुरिहागे।

सबे शार्टकट कोती भागे, सोय रहे चाहे जागे।।

धीरज हे ना लाज शरम हें, यौवन मोम टघलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


नेता अधिकारी बिगड़े हें, बिगड़े हावैं खुद पालक।

अइसन मा घर के लइकामन, बनबें करहीं कुलघालक।।

कई किसम के कांड सुनावैं, लगथे कलयुग ढलती ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


निजीकरण होवत हे सबके, स्कूल औषधालय दफ्तर।

जिहाँ काम पइसा से मतलब, दया मया चूल्हा मा धर।।

नवा जमाना के गाना मा, लपर झपर एडल्टी ए।

पढ़े लिखे मन बकत फिरत हें, यहु सिस्टम के गलती ए।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

काखर गुण जस गावौं-सार छंद

 काखर गुण जस गावौं-सार छंद


अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।

उड़े हवा मा मैं मैं कहिके, वोला का समझावौं।।


कोनो जल ला कोनो थल ला, कोनो नभ ला नाँपे।

लड़े शेर बघवा भलवा ले, देखत जिवरा काँपे।।

दुर्लभ कारज करे कलेचुप, काखर नाम गिनावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


कोनो अतुलित बल के स्वामी, कोनो धन के राजा।

कोनो अद्भुत नाचे गाये, कोनो पीटे बाजा।।

कतको करतब हवै करइया, देख दंग रहि जावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


कलाकार के कला गजब हे, हावय सेवक दानी।

शूरवीर रँग रूप तेज मा, हें बड़ ज्ञानी ध्यानी।।

कठिन साधना सत जप तप ला, रोजे माथ नवावौं।

अद्भुत प्रतिभा भरे पड़े हे, काखर गुण जस गावौं।।


जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Friday, 24 July 2026

बड़बोलापन ले बचव-सार छंद

 बड़बोलापन ले बचव-सार छंद


जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।

बड़बोलापन मा हो जाथे, जग मा अपन हँसाई।।


मिलत हवै बोले बर कहिके, आँय बाँय झन बोलव।

बानी ब्रह्म ए छल प्रपंच तज, अमृत बोल मा घोलव।।

बोल बढ़ाये मया दया अउ, बोल बढ़ाय लड़ाई।।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


झूठ बचन के उमर कहाँ, झूठ कराय फभीता।

लेय सहारा झूठ ढोंग के, रहै जउन हा रीता।।

काम दिखे बोली बयना मा, फोकट हे चिल्लाई।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


नव जुग मा रिकार्ड होवत हे, कथनी करनी सबके।

आज पाय नइ बोचक कोनो, बेरा नोहे तब के।।

कल परखे जाही बोली ला, तब होही करलाई।

जतिक जरूरत हवै ओतके, बोलव बहिनी भाई।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Thursday, 23 July 2026

कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद

 कोन चाहथे रोड म आना-कुकुभ छंद


कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।

हालत हो जाथे जब  खस्ता, तब पड़थे कदम उठाना।।


सिस्टम के टँगरी टूटत हे, विधि विधान नइहे एको।

होवत हवै हियाव धनी के, बाकी मनखें ला फेको।

सत्ता अउ शासन के बूता,  हाँ में हाँ हवैं मिलाना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


नांगर छोड़ किसान खड़े हें, अउ जांगर छोड़ कमैया।

स्कूल छोड़ के खड़े पढ़इया, डूबय मजदूरी नैया।।

फेरी वाले छेरी वाले, खावत हें रहि रहि ताना।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।


गाड़ी रोवय हाँड़ी रोवय, रोवय टपरी घर ठेला।

अस्पताल दफ्तर बन रोवय, गुरू संग रोवँय चेला।।

कलम धरइया आस बढ़ैया, सबके मुख में हें ताला।

कोन चाहथे रोड म आके, फोकट चिखना चिल्लाना।।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)

Tuesday, 21 July 2026

आखिर क्यो मनाए जाते हैं,सावन भादो में ही अधिकतर त्यौहार?

 आखिर क्यो मनाए जाते हैं,सावन भादो में ही अधिकतर त्यौहार?


*सावन-भादो के व्रत-त्योहार: छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, नारी शक्ति और स्वास्थ्य चेतना*


छत्तीसगढ़ की प्राचीन संस्कृति में कृषि परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहाँ का प्रत्येक व्रत-त्योहार, संस्कृति-संस्कार और पारंपरिक परंपराएँ कहीं न कहीं कृषि से गहराई से जुड़ी होती  हैं। धान की भरपूर उपज के कारण छत्तीसगढ़ राज्य को *‘धान का कटोरा’* कहा जाता है, और यहाँ मनाए जाने वाले अधिकांश पर्व धान की बुवाई या कटाई से संबंधित होते हैं, जैसे—अक्ति, जुड़वास, सवनाही, इतवारी, सम्मारी, हरेली, भोजली, पोला, नवाखाई, छेराछेरा और मेला मड़ाई। अन्य व्रत-त्योहार भी इसी कृषि चक्र से प्रेरित हैं, जो कृषक जीवन की लय और श्रम की गति को संतुलित करते हैं।


छत्तीसगढ़ की संस्कृति में व्रत और त्योहारों का स्थान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना, स्वास्थ्य चेतना और कृषक जीवन की आवश्यकताओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। एक रोचक तथ्य यह है कि वर्ष भर में मनाए जाने वाले अधिकांश प्रमुख त्योहार सावन और भादो मास में ही केंद्रित होते हैं। यह विचारणीय है कि इन्हीं दो महीनों में व्रत-त्योहारों की इतनी अधिकता क्यों होती है, जबकि इन्हें पूरे वर्ष में वितरित किया जा सकता था। इसका उत्तर छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति, मौसमी परिस्थितियों और सामाजिक जीवन की संरचना में छिपा है।


इन महीनों के त्योहारों की एक विशेषता यह है कि इनमें व्रत आधारित पर्वों की संख्या अधिक होती है। *सावन सोमवारी, हरियाली, हरियाली तीज, पोला, कमरछठ, हलछष्ठी, नागपंचमी, ऋषि पंचमी, राखी,भोजली, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी* जैसे पर्व इसी समय मनाए जाते हैं। इन पर्वों में स्त्रियों-पुरुषों की समान भागीदारी रहती है, परंतु आयोजन और परंपरा का निर्वहन मुख्यतः महिलाओं द्वारा ही किया जाता है। सावन सोमवारी, कमरछठ, हलछष्ठी,भोजली और तीज जैसे व्रत तो पूर्णतः महिलाओं द्वारा ही किए जाते हैं। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन है, बल्कि महिलाओं के सामाजिक नेतृत्व, सामूहिक सहभागिता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का भी प्रतीक है।


इन त्यौहारों के अलावा छत्तीसगढ़ में आदि काल से ही ग्राम-घर, खेती-किसानी की सुरक्षा और श्रमिकों को विश्राम देने के उद्देश्य से सप्ताह में एक दिन को पर्व के रूप में मनाने की परंपरा रही है। इसे विभिन्न गाँवों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है—जैसे इतवारी, बुधवारी, गुरुवारी आदि। इन पर्वों के दिन खेतों में कार्य नहीं किया जाता, जिससे कृषकों को मानसिक और शारीरिक विश्राम मिलता है। यह परंपरा सावन-भादो में विशेष रूप से प्रचलित है, जब खेतों में निंदाई-चलाई व रोपाई जैसे कार्य पूरे जोर पर होते हैं, और महिलाएँ कीचड़-भरे खेतों में दिनभर श्रम करती हैं। जिससे उनके हाथ व पैर पानी व कीचड़ के सम्पर्क में गलने लगते हैं। साथ ही लगातार बारिश में भी रहना होता है। ऐसे में यह पर्व उन्हें विश्राम और पुनर्नव ऊर्जा प्रदान करते हैं।


वर्षा ऋतु के चार महीने—सावन, भादो, आश्विन और कार्तिक—को चौमासा कहा जाता है। इस काल में वातावरण में अत्यधिक नमी, जलभराव, कीचड़ और जीवाणुओं की सक्रियता रहती है। परिणामस्वरूप पाचन क्षमता कमजोर हो जाती है और पेट, नाक, कान और गले से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। हमारे पूर्वजों ने इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए व्रत-उपवास की परंपरा को जन्म दिया। और इन्ही चार महीनों में अधिकतर व्रत वाले त्यौहार होते हैं। उपवास के माध्यम से शरीर को विश्राम मिलता है, आहार पर नियंत्रण से स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है, और रोगों से बचाव संभव होता है। यह परंपरा न केवल शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी है, बल्कि मानसिक संतुलन और आत्मसंयम का अभ्यास भी कराती है।


सावन-भादो के पर्व कृषक जीवन की आवश्यकता से भी जुड़े हैं। लगातार खेतों में काम करने से कृषकों का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। ऐसे में व्रत-त्योहार उन्हें मानसिक और शारीरिक विश्राम प्रदान करते हैं। साथ ही, यह पर्व कृषक वर्ग को कठिन श्रम से कुछ समय के लिए दूर कर सामाजिक और पारिवारिक जीवन से जुड़ने का अवसर भी देते हैं। यदि व्रत-त्योहारों की परंपरा न होती, तो कृषक वर्ग लगातार खेतों में कार्य करता रहता, जिससे उनका स्वास्थ्य और सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता था।


इस प्रकार सावन और भादो मास में व्रत-त्योहारों की अधिकता केवल धार्मिक भावना से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकता से जुड़ी हुई है। इन पर्वों के माध्यम से न केवल स्वास्थ्य की रक्षा होती है, बल्कि कृषक जीवन को संतुलन और विश्राम भी मिलता है। और इन सबमें महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी होती है, जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना, नारी शक्ति और कृषि जीवन की जीवंतता को दर्शाती है।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा(छग)