हम नहीं
रिश्ते बिगड़ने का किसी को कोई ग़म नहीं।
आज सबको सिर्फ़ पैसा चाहिए, हमदम नहीं।।
खंजर से खुदे ज़ख्म भी भर जाते हैं मरहम से।
ज़ुबां से बढ़कर ज़माने में कोई बारूद-बम नहीं।।
खुद को राजा समझ रहे हैं रील वाले।
रीयल में उनमें ज़रा-सा भी दम नहीं।।
एकता, अखंडता, भाईचारा — सब दिखावा है।
ज़हर जाति-धर्म का हो रहा है कम नहीं।।
पता नहीं, ये पैमाना है या मौकापरस्ती।
देश संविधान से चलेगा, पर हम नहीं।।
जीतेन्द्र वर्मा 'खैरझिटिया'
बाल्को, कोरबा (छ.ग.)
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नारा-स्वच्छता
जतके बढ़ही साफ सफाई।
ततके बढ़ही मान- बड़ाई।।
साफ सफाई जिंहा हे।
सिरतों सरग तिंहा हे।।
स्वच्छता जे अपनाथे।
वो निरोग हो जाथे।।
स्वच्छ शरीर रहे, स्वच्छ घर गली गाँव।
स्वच्छता चारो कोती रही, तभे होही नाँव।।
साफ सफाई के बिना।
जीना घलो का जीना।।
साफ सफाई देख के, मन मा खुशी हमाथे।
मन लगथे हर चीज मा, रोग- राई दुरिहाथे।।
स्वच्छ जंगल रहे, स्वच्छ नही ताल।
स्वच्छता अपनाबों, होबों खुशहाल।।
खुद साफ सफाई अपनावव।
दूसर ला घलो समझावव।।
खैरझिटिया
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