Monday, 3 November 2025

सर्दी मा सब्जी भाजी-कुकुभ छंद

 सर्दी मा सब्जी भाजी-कुकुभ छंद


अबक तबक सब्जी सस्ताही, सोचत हन सब सर्दी मा।

फेर कहाँ बखरी बारी हे, नवयुग गुंडागर्दी मा।।


खुलत कारखाना हे भारी, टेकत महल अटारी हे।

बनत हवै रोजे घर कुरिया, जिहाँ न बखरी बारी हे।

उपजइया गिनती के दिखथें, हवैं खवइया बर्दी मा।।

अबक तबक सब्जी सस्ताही, सोचत हन सब सर्दी मा।


सबे चीज के किम्मत बढ़गे, बढ़गे महिनत बेगारी।

बिचौलिया के हाथ लगे बिन, बेंचाये नइ तरकारी।।

माटी संग सनइया कम हें, घुमैं मनुष सब वर्दी मा।

अबक तबक सब्जी सस्ताही, सोचत हन सब सर्दी मा।


फसल समय के बोवाये हे, परिया खेती बाड़ी हे।

फुदरे उद्योगी बैपारी, फँसे किसनहा गाड़ी हे।।

आज जमाना अइसन हावय, कल बितही बेदर्दी मा।


जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को,कोरबा(छग)

No comments:

Post a Comment