खेती अपन सेती
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किसन्हा के भाग मेटा झन जाय |
बाँचे-खोंचे भुँइया बेचा झन जाय ||
भभकत हे चारो मुड़ा आफत के आगी,
कुंदरा किसनहा के लेसा झन जाय |
अँखमुंदा भागे नवा जमाना के गाड़ी,
किसनहा बपुरा मन रेता झन जाय|
मूड़ मुड़ागे,ओढ़ना - चेंदरा चिरागे,
मुड़ के पागा अउ गल फेटा झन जाय|
बधिन बधना, बिधाता तीर जाके रात-दिन,
कि सावन-भादो भर गोड.के लेटा झन जाय|
भूंजत हे भुंजनिया, सब बिजरात हे उनला,
अवइया पीढ़ी ल खेती बर चेता झन जाय |
हँसिया-तुतारी,नांगर -बइला- गाडी़,
कहीं अब इती-उती फेका झन जाय |
साहेब बाबू बने के बाढ़त हे आस ,
देख के उन ला किसानी के पेसा झन जाय|
दँउड़े हें खेत-खार म खोर्रा पॉंव घाव ले,
कहूँ बंभरी कॉटा तहूँ ल ठेसा झन जाय |
नइ धराय मुठा म रेती, खेती अपन सेती,
भूख मरे बर खेत कखरो बेटा झन जाय|
जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'
बाल्को( कोरबा)
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फेर ए बारी किसन्हा के हार होइस
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न बारी;बारी रिहिस,
न बारी कोठार होइस|
फेर ए बारी ,
किसन्हा के हार होइस|
न जमके असाड़ अइस,
न जमके सावन |
मरे के जघा सजोर होगे,
अऊ बइरी रावन |
जे हुदरत हे;हपटत हे;झपटत हे|
किसन्हा रो-रोके मुडी़ पटकत हे|
न हरेली;न तीजा पोरा,
न बने देवारी तिहार होइस......|
फेर ए बारी,किसन्हा के हार होईस|
कइसे खवाओ तोला,
कोला के साग |
ढेला तरी धान बोजागे,
नइ पइस बने जाग |
चांऊर सिरागे अंदहन डबकत हे|
साग-दार के भाव भभकत हे|
गिस चांऊर-दार कोठी ले गोदाम म |
त बढ़ोतरी होगे जँउहर ओखर दाम म |
मिल-उद्धोग सोना उपजात हे|
खेत-खार म करगाअऊ बन झपात हे |
भूंजात ले घाम होइस,
ठुठरत हे जाड़ होइस|
एक तो नइ गिरे पानी,
गिरिस त उजाड़ होइस.....|
फेर ए बारी किसन्हा के हार होइस|
बस घाम -पानी चाल के चाही|
ताहन सुख-समृद्धि साल के आही|
गांज देबोन मया के खरही |
त कइसे छ.ग.आघू नइ बढ़ही|
सुखाय हे भुंइया ,
फेर भींगे हे ऑखी|
सुलगत हे तन हर,
चिराय हे छॉती |
फेर ए दरी घर म,
खुशी नही गोहार होइस |
पथरा लादे सुनत हौ,
छाती मोर पहाड़ होइस.....|
फेर ए बारी किसन्हा के हार होइस|
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जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को {कोरबा}
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