Friday, 14 November 2025

खेती अपन सेती

 खेती अपन सेती

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किसन्हा के भाग मेटा झन जाय |

बाँचे-खोंचे भुँइया बेचा झन जाय ||


भभकत हे चारो मुड़ा आफत के आगी,

कुंदरा  किसनहा के लेसा  झन जाय |


अँखमुंदा भागे नवा जमाना के गाड़ी,

किसनहा बपुरा मन रेता  झन जाय|


मूड़  मुड़ागे,ओढ़ना - चेंदरा चिरागे,

मुड़ के पागा अउ गल फेटा झन जाय|


बधिन बधना, बिधाता तीर जाके रात-दिन,

कि सावन-भादो भर गोड.के लेटा झन जाय|


भूंजत हे भुंजनिया, सब बिजरात हे उनला,

अवइया पीढ़ी ल खेती बर चेता झन जाय |


हँसिया-तुतारी,नांगर -बइला-  गाडी़,

कहीं अब इती-उती फेका झन जाय |


साहेब बाबू बने के बाढ़त हे आस ,

देख के उन ला किसानी के पेसा झन जाय|


दँउड़े हें खेत-खार म खोर्रा पॉंव घाव ले,

कहूँ बंभरी कॉटा तहूँ ल ठेसा झन जाय |


नइ धराय मुठा म रेती, खेती अपन सेती,

भूख मरे बर खेत कखरो बेटा झन जाय|


                 जीतेन्द्र वर्मा'खैरझिटिया'

                      बाल्को( कोरबा)


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फेर ए बारी किसन्हा के हार होइस

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न बारी;बारी रिहिस,

न बारी कोठार होइस|

फेर ए बारी ,

किसन्हा के हार होइस|


न जमके असाड़ अइस,

न    जमके    सावन |

मरे के जघा सजोर होगे,

अऊ   बइरी    रावन |

जे हुदरत हे;हपटत हे;झपटत    हे|

किसन्हा  रो-रोके  मुडी़  पटकत हे|

न हरेली;न तीजा पोरा,

न बने देवारी तिहार होइस......|

फेर ए बारी,किसन्हा के हार होईस|


कइसे खवाओ तोला,

कोला  के  साग |

ढेला तरी धान बोजागे,

नइ पइस बने जाग |

चांऊर सिरागे अंदहन डबकत हे|

साग-दार के भाव भभकत हे|

गिस चांऊर-दार कोठी ले गोदाम म |

त बढ़ोतरी होगे जँउहर ओखर दाम म |

मिल-उद्धोग सोना उपजात  हे|

खेत-खार म करगाअऊ बन झपात हे  |

भूंजात ले घाम होइस,

ठुठरत हे जाड़ होइस|

एक तो नइ गिरे पानी,

गिरिस त उजाड़ होइस.....|

फेर ए बारी किसन्हा के हार होइस|


बस घाम -पानी चाल के चाही|

ताहन सुख-समृद्धि साल के आही|

गांज देबोन मया के खरही |

त कइसे छ.ग.आघू नइ बढ़ही|

सुखाय हे भुंइया  ,

फेर भींगे हे ऑखी|

सुलगत हे तन हर,

चिराय  हे  छॉती |

फेर ए दरी घर म,

खुशी नही गोहार होइस |

पथरा लादे सुनत हौ,

छाती मोर पहाड़ होइस.....|

फेर ए बारी किसन्हा के हार होइस|

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                  जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

                     बाल्को  {कोरबा}

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