कानून के डर
जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।
उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।
खास आदमी, कानून कायदा ला नइ माने।
पइसा पहुँच के दम मा, घुमथे सीना ताने।।
धन बल ज्ञान गुण के, रोब झाड़त दिखथे।
अइसन मनके आघू, सबे चीज हा बिकथे।
ये मन सब घातक हें, साँप बिच्छू घून ले।
जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।
उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।
पढ़े लिखे मनखें के, अंतस मा कोइला भरगे।
दया मया धरम करम, पाके पना कस झरगे।।
मनखें अब सिर्फ डरथे, कुदरत के कानून ले।
आसाढ़ के बाढ़, अउ टघलत मई जून ले।।
विकास खेलत हे होली, मनखें के खून ले।
जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।
उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।
कथे झूठ सच पकड़े के, नवा नवा मशीन हे।
तभो जज वकील, अदालती खेल मा लीन हें।।
कानून के लंबा हाथ, आम जन के गला नापथे।
खास के आघू मा, साहब सिपइहा मन काँपथें।।
मनखें दूर भागत हें, धरम करम पाप पुण्य ले।
जेन डरथे बाढ़त, चाँउर दार तेल नून ले।
उही मनखें भर डरथे, कायदा कानून ले।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को,कोरबा(छग)
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