Saturday, 22 November 2025

पेट--जयकारी (चौपई) छंद

 पेट--जयकारी (चौपई) छंद 


पेट देख के होवय गोठ,कखरो पातर कखरो मोठ।

पेट देख के जाहू जान,कोन सेठ मजदूर किसान।1।


पेट करावय करम हजार,कोनो खावय दर-दर मार।

नाचा गम्मत होय व्यपार,सजे पेट बर हाट बाजार।2।


पेट पालथे कोनो हाँस,कोनो ला गड़ जाथे फाँस।

धरे पेट बर कोनो तीर,ता कोनो बन जावय वीर।3।


मचे पेट बर कतको रार,कोनो बेंचें खेती खार।

पेट पलायन कभू कराय,गाँव ठाँव सबला छोड़ाय।4।


नाप नाप के कतकों पेट,खान पान ला करथें सेट।

कई भूख मा पेट ठठाय,कोनो खा पी के अँटियाय।5।


कखरो पेट ल भाये नून,कतको झन पी जावय खून।

कोनो खोजे मँदिरा माँस,पेट फुलावय कोनो हाँस।6।


पेट भरे तब लालच आय,धन दौलत मनखे सिरजाय।

पेट जानवर के दमदार,तभो धरे नइ चाँउर यार।7।


बित्ता भर वाले ला देख,रटे पेट ताकय कर रेख।

रखे पेट खातिर धन जोर,कतको मन बन जावय चोर।8।


ऊँच नीच जब खाना होय,पचे नहीं बीमारी बोय।

पेट पीरा हर लेवय चैन,पेट कभू बरसावय नैन।9।


लाँघन ला दौ दाना दान,पेट हरे सबझन के जान।

दाना चाही दूनो जून,पेट भरे ता मिले सुकून।10।


ढोंगी अधमी पावै दुःख, मरे पेट ओ मन के भूख।

करे जउन मन हा सतकाम,पेट भरे सबके गा राम।11।


 जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"

बाल्को(कोरबा)

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