....आज फेर कलम धरे हों.......
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ओखर बर जे दबते जात हे|
ओखरो बर जे तपते जात हे|
जेन नई बोल सके,
अपन मन के भॉखा|
जेन खात हे,
जघा-जघा चॉटा|
कतरो रोवत हे ,
सुसक-सुसक के|
गोड़ तरी चपकाय हे,
मचान म घलो चक के|
दरद ल दिल के,
देखा नई सके|
जेन रॉंधथे रोटी,
फेर खा नई सके|
जुलूम के तॉवा म,
मंहू जरे हों.............|
आज फेर कलम धरे हों||
गिरे-थके हपटे बर|
खोंचका-डिपरा ल खपटे बर|
सुमत के दिया बारे बर|
अंधरा के ऑखी उघारे बर|
बंटाय मया ल जोरे बर|
सुवारथ के सुरता छोरे बर|
सिखाय बर इंसानी बात|
मॉगे बर सबके साथ|
पंवरी म सबके परे हों.........|
अाज फेर कलम धरे हों......|
खा पेटभर; खवा पेटभर|
कखरो रोटी ल,झन नंगा पेटभर|
देखा भुलाय ल रद्दा|
झन खन कखरो बर गढ्ढा|
उजरा ओनहा- कोनहा ल|
सजा दाई सोनहा ल|
कखरो बॉटा ल ,
कोनो ल खान झन दे|
फोकटे नई रोय,
कोनो ल ऑसू बोहान झन दे|
बॉटे म बढ़ते मया,
मंय धरे मया खड़े हों.....|
आज फेर कलम धरे हों...|
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
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