महतारी-लावणी छंद
मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।
मया लुटाथे बेसुध होके, अवतारी उपकारी ए।।
मया कतिक होथे माई के, तउल सके नइ कोनों हा।
कलम काय गुण बरनन सकही, नइ सकैं धरा नभ दोनों हा।।
महतारी देवी धरती के, सगरो जगत पुजारी ए।
मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।
नइ पनपे ये जग मा जिनगी, मया बिना महतारी के
जतन लोग लइका के करथे, तज सुख दुनियादारी के।।
महतारी ए खान मया के, बाकी सब बैपारी ए।
मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।
मया पाय बर महतारी के, देवन तक तरसत रहिथे।
मुख मा लोरी अँचरा ओली, गोरस गंगा कस बहिथे।।
लड़ जाथे लइकन बर सब ले, ज्वाला ए चिंगारी ए।
मनुष होय या जीव जानवर, महतारी महतारी ए।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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