सुविधा दुविधा-सार छंद
सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।
प्राण ल सीधा हर लेवत हे , आजकाल के गाड़ी।।
खपरा छाये माटी के घर, गर्मी मा मन भाये।
बिन कूलर पंखा एसी के , नींद ससन भर आये।।
छत के घर हा भभके भारी, नइहे ब्यारा बाड़ी।
सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।
जतके सुविधा बढ़त जात हे, ततके दुविधा बाढ़े।
समय बचाके घलो मनुष मन, बोकबाय हें ठाढ़े।।
बम बारुद अउ यंत्र तंत्र ला, देख जुड़ाथे नाड़ी।
सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।
हवै आसरा कम जीये के, कलजुगिया बेरा मा।
रास रसायन बढ़त जात हे, मौत हवै डेरा मा।।
फेक देय हन जुन्ना चीज ल, कहिके कचरा काड़ी।
सइकिल ले जब गिरत रहेन त, फुटे कोहनी माड़ी।।
जीतेंद्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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