*यह क्या हो रहा है फैशन और दिखावे के नाम पर?*
-जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
समय बदलता है, समाज बदलता है और उसके साथ मनुष्य की जीवन-शैली भी बदलती है। आधुनिकता ने हमें अनेक सुविधाएँ दी हैं, लेकिन इसी आधुनिकता की दौड़ में हमने अपनी कई सहज, प्राकृतिक और पारंपरिक जीवन-पद्धतियों को पीछे छोड़ दिया। आश्चर्य तब होता है, जब वही पुरानी चीजें नए नाम, नए रूप और नई कीमत के साथ हमारे सामने लौटती हैं और हम उन्हें फैशन, एडवेंचर, ऑर्गेनिक जीवनशैली या विशेष अनुभव के रूप में स्वीकार करने लगते हैं।
कभी मिट्टी के बर्तन हमारे घरों की सामान्य आवश्यकता थे। मिट्टी की हांडी, मटकी और कुल्हड़ में खाना-पीना आम बात थी। आज वही मिट्टी के बर्तन महँगे रेस्तराँ में पारंपरिक भोजन का आकर्षण बन गए हैं। कभी कोदो-कुटकी, देशी अनाज, भाजी और स्थानीय सब्जियाँ सामान्य भोजन थीं; आज वही भोजन स्वास्थ्यवर्धक और पारंपरिक भोजन के नाम पर विशेष कीमत में परोसा जा रहा है। जिस भोजन को कभी साधारण समझा गया, वही आज विशेष बन गया है।
पहनावे में भी यही बदलाव दिखाई देता है। कभी कपड़ा फट जाने पर उसे सिलकर दोबारा पहनना हमारी जरूरत और मितव्ययिता थी। आज उसी फटे हुए रूप को फैशन के नाम पर महँगी कीमत देकर खरीदा जाता है। अंतर केवल इतना है कि पहले कपड़ा फटने के बाद पहना जाता था, आज फैशन के लिए पहले से फटा हुआ खरीदा जाता है।
हमारे बचपन के मनोरंजन और खेल भी इसी बदलाव के उदाहरण हैं। तालाब, नदी और नहर में तैरना, खेतों और गलियों में खेलना, पेड़ों पर चढ़ना, मिट्टी में दौड़ना-कूदना और बरसात में फिसलना हमारे जीवन का सहज हिस्सा था। आज इन्हीं अनुभवों के लिए स्विमिंग पूल, एडवेंचर पार्क और विभिन्न प्रकार की गतिविधियों पर पैसा खर्च किया जाता है। जो रोमांच कभी प्रकृति मुफ्त में देती थी, आज उसे पैकेज के रूप में खरीदा जा रहा है।
रहन-सहन में भी पुरानी चीजें नए रूप में लौट रही हैं। मिट्टी के घर, खपरैल की छत और घास-फूस के छप्पर कभी गरीबी और पिछड़ेपन के प्रतीक माने जाते थे। आज वही ग्रामीण परिवेश, मिट्टी के घर और प्राकृतिक जीवन “रूरल टूरिज्म”, “नेचर स्टे” और “इको रिसॉर्ट” के नाम पर आकर्षण बन गए हैं। बैलगाड़ी की सवारी से लेकर पारंपरिक भोजन और ग्रामीण जीवन के अनुभव तक, अनेक चीजें अब पर्यटन का हिस्सा बन चुकी हैं।
यहाँ प्रश्न होटल, रिसॉर्ट या पर्यटन व्यवसाय का विरोध करना नहीं है। आधुनिक सुविधाओं और पर्यटन का अपना महत्व है। असली प्रश्न हमारी सोच का है। जब ये चीजें हमारे पास सहज रूप से उपलब्ध थीं, तब हमने इन्हें महत्व क्यों नहीं दिया? हमने स्थानीय भोजन को कमतर क्यों माना? पारंपरिक पहनावे को पिछड़ेपन से क्यों जोड़ा? मिट्टी और खपरैल के घरों को गरीबी का प्रतीक क्यों समझा? और आज वही चीजें बाजार में नए नाम से सामने आती हैं तो हम उन्हें प्रतिष्ठा और आधुनिकता का प्रतीक क्यों मान लेते हैं?
मनुष्य अक्सर किसी वस्तु का मूल्य तब समझता है, जब वह उससे दूर हो जाता है। हमारे आसपास उपलब्ध प्राकृतिक और पारंपरिक चीजों को हमने आधुनिकता की दौड़ में पीछे छोड़ दिया और अब उन्हीं चीजों को पाने के लिए बाजार का सहारा ले रहे हैं। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं हम विकास के नाम पर अपनी जड़ों से तो दूर नहीं हो गए? हालाँकि यह भी सच है कि पुराना हमेशा अच्छा और नया हमेशा खराब नहीं होता। पुराने समय में अनेक कठिनाइयाँ और सामाजिक बुराइयाँ थीं, जिन्हें बदलना जरूरी था। आधुनिक विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा और तकनीक ने जीवन को बेहतर बनाया है। इसलिए आवश्यकता पुराने और नए के बीच संघर्ष की नहीं, बल्कि दोनों के श्रेष्ठ पक्षों के संतुलन की है।
हमें आधुनिकता अपनानी चाहिए, लेकिन अपनी जड़ों को छोड़कर नहीं। स्थानीय भोजन, पारंपरिक कला, ग्रामीण खेल, प्राकृतिक वास्तुकला, लोकपहनावा और जीवन-पद्धति को केवल फैशन बनाकर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक मूल्य को समझकर बचाना चाहिए। यदि हमने इन्हें समय रहते सम्मान और संरक्षण दिया होता, तो शायद आज इन्हीं चीजों को महँगी कीमत देकर खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या हम वास्तव में आगे बढ़ रहे हैं, या अपनी ही छोड़ी हुई चीजों को नए नाम से दोबारा खरीद रहे हैं? समय का चक्र घूमता रहता है। पुरानी चीजें नए रूप में लौटती रहेंगी। लेकिन समझदारी इसी में है कि हम अपनी विरासत को बाजार की वस्तु बनने से पहले पहचान लें। आधुनिकता और परंपरा का संतुलन ही ऐसा रास्ता है, जहाँ विकास भी हो और अपनी जड़ों से जुड़ाव भी बना रहे।
फैशन बदलता रहेगा, बाजार बदलता रहेगा और समय भी बदलता रहेगा; लेकिन अपनी जड़ों का मूल्य यदि हम समय रहते समझ लें, तो अपनी ही विरासत को दोबारा खरीदने की नौबत नहीं आएगी। आखिर हमें यह सोचना ही होगा—जिस रास्ते को हमने पुराना समझकर छोड़ दिया था, कहीं आज उसी रास्ते पर लौटने के लिए हम महँगी टिकट तो नहीं खरीद रहे हैं?
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को कोरबा(छग)
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