Sunday, 13 September 2026

हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में अंतर्संबंध

 

हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषा में अंतर्संबंध

​जिस प्रकार जल ढलान की ओर स्वाभाविक रूप से बहता है, ठीक उसी प्रकार भाषा भी सरलता को अपनाती हुई प्रवाहित होती है। हिंदी के विकासक्रम को ही देखें—संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, फिर अपभ्रंश से होते हुए आधुनिक हिंदी का स्वरूप सामने आया। जिस तरह सरल और सहज स्वभाव का मनुष्य हर किसी का प्रिय बन जाता है, वैसे ही भाषा की सरलता और सहजता भी उसके सर्वस्वीकार्य होने का मुख्य कारण बनती है।

​पूर्वी हिंदी के विशाल प्रांगण में छत्तीसगढ़ी भाषा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, जहाँ अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी का सुंदर संगम दिखाई देता है। जिस प्रकार हिंदी की उत्पत्ति ब्राह्मी लिपि से जुड़ी है, उसी गौरवशाली परंपरा से हमारी छत्तीसगढ़ी भी उपजी है। आज जब हम हिंदी की बात करते हैं, तो आधुनिक युग से पूर्व के सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, केशव और बिहारी जैसे कालजयी कवियों की रचनाएँ हमारी आँखों के सामने तैरने लगती हैं। इन महान कवियों की भाषा अवधी और ब्रज के साथ-साथ कई लोकबोलियों से परिपुष्ट थी। आधुनिक युग में जब ठेठ खड़ी बोली का दौर आया, तब भारतेंदु, पंत, निराला, प्रसाद, महादेवी वर्मा, मैथिलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद जैसे अनगिनत साहित्यकारों ने अपना संपूर्ण जीवन साहित्य साधना में खपा दिया।

​मूल बात यह है कि जब हिंदी के समानांतर ब्रज और अवधी का अपना एक प्रतिष्ठित स्थान है, तो छत्तीसगढ़ी का क्यों न हो? जबकि हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा भी हिंदी के लगभग सभी समृद्ध गुणों को अपने भीतर समेटे हुए है। यह संभव है कि हमारा साहित्य मात्रा में थोड़ा कम रहा हो या फिर इसे ब्रज और अवधी जैसी ऐतिहासिक ऊँचाई न मिली हो; फिर भी हमारा छत्तीसगढ़ी साहित्य अत्यंत समृद्ध और प्रामाणिक है। हमारे पूर्वज कवियों ने अनेक उत्कृष्ट रचनाएँ रची हैं और आज भी यह सृजन-प्रवाह निरंतर जारी है। इस भागीरथ प्रयास को देखकर यह विश्वास दृढ़ होता है कि वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ी भी ब्रज और अवधी के साहित्य की तरह हिंदी के विशाल सागर में समाहित होकर उसकी शोभा बढ़ाएगी।

​अब बात करते हैं हिंदी और छत्तीसगढ़ी के अंतर्संबंध की। दोनों ही भाषाओं की जननी एक ही है—ब्राह्मी। दोनों का रंग-रूप, बनावट और स्वरूप एक जैसा है; मानो दोनों सगी बहनें हों। आज के आधुनिक कवि और लेखक छत्तीसगढ़ी में हिंदी वर्णमाला के सभी अक्षरों का प्रयोग निसंकोच कर रहे हैं, जो अत्यंत प्रसन्नता का विषय है।

​अन्य राज्यों के कुछ लोग कभी-कभी कह देते हैं कि "हिंदी को थोड़ा बिगाड़ दो तो छत्तीसगढ़ी बन जाती है।" क्या वास्तव में ऐसा है? बिल्कुल नहीं। इस भ्रांति को दूर करने के लिए हमें छत्तीसगढ़ी के अपने पाँच मौलिक (प्रकट) शब्दों का सही प्रयोग करना होगा और हिंदी को जबरन तोड़-मरोड़कर लिखने से बचना होगा। हमारी छत्तीसगढ़ी भाषा का व्याकरण तो हिंदी से भी पहले लिखा जा चुका है, जो हम सभी के लिए अत्यंत गर्व का विषय है।

​उदाहरण के लिए, 'परगट' शब्द हिंदी के 'प्रकट' का ही तद्भव रूप है। 'परगट' कहने से अर्थ में कोई भटकाव या परिवर्तन नहीं आता और यह संपूर्ण छत्तीसगढ़ में पूरी तरह से प्रचलित भी है। ऐसे अनेक शब्द हैं जो हिंदी के अपभ्रंश या तद्भव रूप में हमारी भाषा में रचे-बसे हैं; जैसे—हृदय (हिरदे), उम्र (उमर), दर्द (दरद), वज्र (बजुर), तीर्थ (तीरथ), छतरी (छत्ता), त्योहार (तिहार) आदि।

​कुछ शब्दों का प्रयोग थोड़े से उच्चारण परिवर्तन के साथ किया जाता है; जैसे—व्याकुल (ब्याकुल), विनाश (बिनास), व्रत (बरत), पर्व (परब), व्यवहार (ब्यवहार), वरदान (बरदान), वंदन (बंदन), वन (बन) आदि। लेकिन इन प्रयोगों को देखकर कुछ लोग यह मान लेते हैं कि छत्तीसगढ़ी में 'व' वर्ण होता ही नहीं है—यह धारणा अनुचित है। प्राचीन समय से ही इसका प्रयोग होता आया है। 'होवत', 'बोवत', 'खोवत', 'पोवत' जैसे शब्द किसके हैं? हमारे ही तो हैं, फिर कैसे कह सकते हैं कि 'व' नहीं है? यदि हम हर जगह 'व' के स्थान पर 'ब' ही लिखते रहेंगे, तो 'वर' (दूल्हा) को 'बर' कहना पड़ेगा। इससे तो वटवृक्ष (बरगद), 'काबर' (क्यों) और 'वर' (दूल्हा) सब एक ही में मिलकर भ्रम पैदा कर देंगे। आज के बच्चों के नाम रामेश्वरी, जागेश्वरी, रामेश्वर, ईश्वर, श्रवण आदि रखे जाते हैं, अतः भाषा की शुद्धता का लोप नहीं होना चाहिए।

​मेरा स्पष्ट संकेत यही है कि हमें अर्थसंगत शब्दों का प्रयोग करना चाहिए तथा निरर्थक या संज्ञा का अर्थ बदल देने वाले शब्दों से परहेज करना चाहिए। जैसे हिंदी का 'प्रकृति' शब्द है, इसे 'परकिरिती', 'प्रकार' को 'परकार', 'प्रकाश' को 'परकास', 'क्षमा' को 'छिमा', 'शक्कर' को 'सककर' या 'रायगढ़' को 'रइगढ़' लिखना भ्रम उत्पन्न करता है। इसलिए इस विषय पर गंभीर चिंतन आवश्यक है और आज स्पष्ट एवं शुद्ध शब्दों की माँग उठ रही है।

​हिंदी के शब्द छत्तीसगढ़ी में घुले-मिले हैं या छत्तीसगढ़ी के शब्द हिंदी में, इसे सिद्ध करने के लिए हमें किसी से उलझने की आवश्यकता नहीं है। भाषा तो जल की भाँति सदा गतिमान रहती है, वह अपना स्वरूप बदलती रहती है और किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होती। एक साधारण छत्तीसगढ़ी भाषी व्यक्ति हिंदी को सहजता से समझ लेता है और हिंदी भाषी व्यक्ति छत्तीसगढ़ी को; इससे बड़ा अंतर्संबंध और क्या हो सकता है?

​अक्षर ज्ञान के बाद एक हिंदी भाषी व्यक्ति सहज छत्तीसगढ़ी पढ़ सकता है और छत्तीसगढ़ी भाषी व्यक्ति हिंदी। क्योंकि दोनों का आधार और बनावट एक ही है—दोनों का 'क' एक है, दोनों का 'ट' एक है। हिंदी की फ़िल्में छत्तीसगढ़ का जनमानस बड़े चाव से देखता और समझता है, अब छत्तीसगढ़ी सिनेमा को भी अन्य प्रदेशों तक पहुँचाने के लिए हमें स्वयं प्रयास करना होगा।

​जिस प्रकार ब्रजभाषा और अवधी ने हिंदी की शान और समृद्धि को बढ़ाया, उसी प्रकार छत्तीसगढ़ी भाषा भी हिंदी के वैभव को अवश्य बढ़ाएगी। निश्चित ही यह गौरव बढ़ेगा, बस आवश्यकता इस बात की है कि हमारे बीच वैसा ही उत्कृष्ट साहित्य रचा जाए, और उसका निरंतर पठन-पाठन तथा वाचन होता रहे।

— जितेंद्र वर्मा "खैरझिटिया"

बाल्को, कोरबा (छ.ग.)

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