Sunday, 13 September 2026

किरदार- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

 किरदार- जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया(तेरा धियान किधर है)

                  वास्तव में जिंदगी एक रंगमंच है और हम सभी उसके किरदार हैं। इस रंगमंच पर हर व्यक्ति को कोई न कोई भूमिका मिली है—किसी को पिता की, किसी को माँ की, किसी को शिक्षक, विद्यार्थी, अधिकारी, कर्मचारी या नागरिक की। भूमिका छोटी हो या बड़ी, उसका महत्व इस बात में है कि उसे हम कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी से निभाते हैं।

                   किरदार केवल पहनावे या बाहरी रूप का नाम नहीं है। असली किरदार हमारे आचरण, व्यवहार और जिम्मेदारियों से सामने आता है। आज हम अनेक अवसरों पर किसी पात्र का रूप धारण तो कर लेते हैं, लेकिन उसके गुण और मर्यादा को अपनाना भूल जाते हैं। भगवान शिव, श्रीराम या श्रीकृष्ण का रूप धारण करना केवल वेशभूषा बदलना नहीं है। उस रूप की गरिमा और मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। मनोरंजन अपनी जगह है, लेकिन आस्था और चरित्र की मर्यादा का सम्मान उससे ऊपर है।।                                  हमारी परंपरा में रामलीला और नाट्य-मंचन के कलाकार केवल संवाद बोलने तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि अपने पात्र की गरिमा को आत्मसात करने का प्रयास करते थे। दर्शक को अभिनय में पात्र दिखाई देता था, केवल अभिनेता नहीं। यही अभिनय की वास्तविक सफलता थी। आज साधन और मंच बढ़ गए हैं, विशेषकर सोशल मीडिया ने प्रदर्शन के नए अवसर दिए हैं, लेकिन बाहरी रूप को ही किरदार समझ लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म और कर्तव्य का महत्व समझाया। जीवन में भी यही बात लागू होती है। परिस्थितियाँ हमें कोई भूमिका दे सकती हैं, लेकिन उस भूमिका को किस निष्ठा से निभाना है, यह हमारे हाथ में है। केवल अधिकार चाहना आसान है, कर्तव्य निभाना कठिन; केवल सम्मान पाना सरल है, सम्मान के योग्य बनना कठिन।

                 विडंबना यह है कि हम अपना किरदार तो नही निभा पा रहे है, और दिखावे के लिए देवी देवताओं के रूप लेकर, उनके आदर्श को धूमिल करने की कुचेष्टा कर रहें है। दूसरों के प्रति संवेदना, सत्य, ईमानदारी, सहयोग और जिम्मेदारी—यही मनुष्य के सबसे बड़े आभूषण हैं। यदि इन्हें ही जीवन से निकाल दिया जाए तो कोई भी बाहरी वेश हमारे किरदार को सार्थक नहीं बना सकता। किस्सा चाहे मंच का हो या जीवन का, असली पहचान संवादों से नहीं, आचरण से होती है। कपड़े बदलने से किरदार नहीं बदलता, किरदार तब बदलता है जब आचरण बदलता है।

               जिंदगी का मंच एक दिन समाप्त हो जाएगा, लेकिन हमारे निभाए हुए किरदार की छाप लोगों की स्मृतियों में रह जाएगी। इसलिए प्रश्न यह नहीं कि हमें कौन-सा किरदार मिला, बल्कि यह है कि हमने उसे कितनी ईमानदारी से निभाया। जीवन ने हमें जो भूमिका दी है, उसे बोझ नहीं, जिम्मेदारी समझकर निभाना ही सच्चे अर्थों में जिंदगी जीना है।


जीतेन्द्र वर्मा खैरझिटिया

बाल्को, कोरबा(छग)


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