खेती किसानी के गत-सरसी छंद
विलासना के चीज बनाये, ते होगे धनवान।
साग दार फर अन्न उगाके, रोवैं आज किसान।।
पानी पुरवा के सँग चाही, खाये खातिर अन्न।
फेर आज ये काय चलत हे, सोच होय मन सन्न।।
खाली पेट दिमाक चले नइ, भरे आय तब ज्ञान।
साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।
जांगर खपगे नांगर खपगे, खपगे आस तमाम।
कतका रुपया का के मिलही, गढ़े आन मन दाम।
उद्योगी बैपारी फुदरे, मनके बेंच समान।
साग दार फर अन्न उगाके,रावैं आज किसान।।
बिजनेस बढ़े बढ़े नौकरी, खेती ले दुरिहाँय।
जे हे थेभा ये दुनिया के, तौने भटका खाँय।।
खेत किसानी आये जिनगी, पाय किसानी मान।
साग दार फर अन्न उगाके, रावैं आज किसान।।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को, कोरबा(छग)
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