गरीब मजदूर किसान
गरीब मन उपर अत्याचार,सरे-आम होवत हे।
मान मरियादा महिनत,नित नीलाम होवत हे।
जाँगर टोरे दिन- रात,पर बर जे हा,
वोला दू टेम के रोटी,हराम होवत हे।
सबके सपना सँजोये,जे एके साँस मा,
ओखरे सपना आज,धड़ाम होवत हे।
सब कन्नी काटत हे,कोन देय सहारा।
छूरी धरइया कोती, राम होवत हे।
आजो गरीब,गड़ जावत हे नेंव बन,
सेठ साहूकार मनके नाम होवत हे।
महिनत करइया घर चूल्हा,गुंगवाय घलो नही,
बैठान्गुर तले भजिया,जब साम होवत होवत हे।
बेंदरा कस नाँचे मजदूर किसान,
कुंदरा म दिनों दिन,घाम होवत हे।
करिया काया म, बरसे दनादन कोर्रा,
महिनत के कमती,अब दाम होवत हे।
बड़े बड़े महल अटारी,बनवाये शाहजहाँ,
फेर हाथ ल काटवाये,जब काम होवत हे।
जरगे-मरगे-गड़गे-सरगे,कतको खैरझिटिया,
छोड़ न अब अइसन घटना ,आम होवत हे।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बाल्को(कोरबा)
9981441795
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